04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 3051–3060
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 3051–3060
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' महारथी राजा बाह्लिक, सिन्धुराज जयद्रथ, सोमदत्त तथा भूरिश्रवाका भी आप मेरी ओरसे आलिंगन करें ॥ तथा पूर्वगतानन्यान् स्वर्गे पार्थिवसत्तमान् ॥ ४५ ॥
अस्मद्वाक्यात् परिष्वज्य सम्पृच्छेस्त्वमनामयम् ॥ ४६ ॥
' दूसरे- दूसरे भी जो नृपश्रेष्ठ पहलेसे ही स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं, उन सबको मेरे कथनानुसार हृदयसे लगाकर उनकी कुशल पूछें ' ॥ ४५-४६ ॥ संजय उवाच
इत्येवमुक्त्वा राजानं भग्नसक्थमचेतनम् ।
अश्वत्थामा समुद्वीक्ष्य पुनर्वचनमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
संजय कहते हैं - महाराज! जिसकी जाँघें टूट गयी थीं, उस अचेत पड़े हुए राजा दुर्योधनसे ऐसा कहकर अश्वत्थामाने पुनः उसकी ओर देखा और इस प्रकार कहा I · ॥ ४७ ॥
दुर्योधन जीवसि त्वं वाक्यं श्रोत्रसुखं शृणु ।
सप्त पाण्डवतः शेषा धार्तराष्ट्रास्त्रयो वयम् ॥ ४८ ॥
' राजा दुर्योधन! यदि आप जीवित हों तो यह कानोंको सुख देनेवाली बात सुनें ।
पाण्डवपक्षमें केवल सात और कौरवपक्षमें सिर्फ हम तीन ही व्यक्ति बच गये हैं ॥
ते चैव भ्रातरः पञ्च वासुदेवोऽथ सात्यकिः ।
अहं च कृतवर्मा च कृपः शारद्वतस्तथा ॥ ४ ९ ॥
‘ उधर तो पाँचों भाई पाण्डव, श्रीकृष्ण और सात्यकि बचे हैं और इधर मैं, कृतवर्मा तथा शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य शेष रह गये हैं ॥ ४ ९ ॥
द्रौपदेया हताः सर्वे धृष्टद्युम्नस्य चात्मजाः ।
पञ्चाला निहताः सर्वे मत्स्यशेषं च भारत ॥ ५० ॥
‘ भरतनन्दन! द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्नके सभी पुत्र मारे गये, समस्त पांचालोंका संहार कर दिया गया और मत्स्य देशकी अवशिष्ट सेना भी समाप्त हो गयी ॥ ५० ॥
कृते प्रतिकृतं पश्य हतपुत्रा हि पाण्डवाः ।
सौप्तिके शिबिरं तेषां हतं सनरवाहनम् ॥ ५१ ॥
‘ राजन्! देखिये, शत्रुओंकी करनीका कैसा बदला चुकाया गया? पाण्डवोंके भी सारे पुत्र मार डाले गये । रातमें सोते समय मनुष्यों और वाहनोंसहित उनके सारे शिविरका नाश कर दिया गया ॥ ५१ ॥
मया च पापकर्मासौ धृष्टद्युम्नो महीपते ।
प्रविश्य शिबिरं रात्रौ पशुमारेण मारितः ॥ ५२ ॥
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' भूपाल! मैंने स्वयं रातके समय शिविरमें घुसकर पापाचारी धृष्टद्युम्नको पशुओंकी तरह गला घोंट- घोंटकर मार डाला है ' ॥ ५२ ॥
दुर्योधनस्तु तां वाचं निशम्य मनसः प्रियाम् ।
प्रतिलभ्य पुनश्चेत इदं वचनमब्रवीत् ॥ ५३ ॥
यह मनको प्रिय लगनेवाली बात सुनकर दुर्योधनको पुनः होश आ गया और वह इस प्रकार बोला— ॥ ५३ ॥
न मेऽकरोत् तद् गाङ्गेयो न कर्णो न च ते पिता ।
यत् त्वया कृपभोजाभ्यां सहितेनाद्य मे कृतम् ॥ ५४ ॥
‘ मित्रवर! आज आचार्य कृप और कृतवर्माके साथ तुमने जो कार्य कर दिखाया है, उसे न गंगानन्दन भीष्म, न कर्ण और न तुम्हारे पिताजी ही कर सके थे ॥
सच सेनापतिः क्षुद्रो हतः सार्धं शिखण्डिना ।
तेन मन्ये मघवता सममात्मानमद्य वै ॥ ५५ ॥
‘शिखण्डीसहित वह नीच सेनापति धृष्टद्युम्न मार डाला गया, इससे आज निश्चय ही मैं अपनेको इन्द्रके समान समझता हूँ ॥ ५५ ॥
स्वस्ति प्राप्नुत भद्रं वः स्वर्गे नः संगमः पुनः ।
इत्येवमुक्त्वा तूष्णीं स कुरुराजो महामनाः ॥ ५६ ॥
प्राणानुपासृजद् वीरः सुहृदां दुःखमुत्सृजन् ।
अपाक्रामद् दिवं पुण्यां शरीरं क्षितिमाविशत् ॥ ५७ ॥
' तुम सब लोगोंका कल्याण हो। तुम्हें सुख प्राप्त हो । अब स्वर्गमें ही हमलोगोंका पुनर्मिलन होगा । ' ऐसा कहकर महामनस्वी वीर कुरुराज दुर्योधन चुप हो गया और अपने सुहृदोंके लिये दुःख छोड़कर उसने अपने प्राण त्याग दिये । वह स्वयं तो पुण्यधाम स्वर्गलोकमें चला गया; किंतु उसका पार्थिव शरीर इस पृथ्वीपर ही पड़ा रह गया ॥ ५६-५७ ॥
एवं ते निधनं यातः पुत्रो दुर्योधनो नृप ।
अग्रे यात्वा रणे शूरः पश्चाद् विनिहतः परैः ॥ ५८ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार आपका पुत्र दुर्योधन मृत्युको प्राप्त हुआ । वह समरांगणमें सबसे पहले गया था और सबसे पीछे शत्रुओंद्वारा मारा गया । ५८ ॥
तथैव ते परिष्वक्ताः परिष्वज्य च ते नृपम् ।
पुनः पुनः प्रेक्षमाणाः स्वकानारुरुहू रथान् ॥ ५ ९ ॥
मरनेसे पहले दुर्योधनने तीनों वीरोंको गले लगाया और उन तीनोंने भी राजाको हृदयसे लगाकर विदा दी, फिर वे बारंबार उसकी ओर देखते हुए अपने - अपने रथोंपर सवार हो गये ॥ ५ ९ ॥ इत्येवं द्रोणपुत्रस्य निशम्य करुणां गिरम् ।
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प्रत्यूषकाले शोकार्तः प्राद्रवन्नगरं प्रति ॥ ६० ॥
इस प्रकार द्रोणपुत्रके मुखसे वह करुणाजनक समाचार सुनकर मैं शोकसे व्याकुल हो उठा और प्रातःकाल नगरकी ओर दौड़ा चला आया ॥ ६० ॥
एवमेष क्षयो वृत्तः कुरुपाण्डवसेनयोः ।
घोरो विशसनो रौद्रो राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ६१ ॥
राजन्! इस प्रकार आपकी कुमन्त्रणाके अनुसार कौरवों तथा पाण्डवोंकी सेनाओंका यह घोर एवं भयंकर विनाशकार्य सम्पन्न हुआ है ॥ ६१ ॥
तव पुत्रे गते स्वर्गं शोकार्तस्य ममानघ ।
ऋषिदत्तं प्रणष्टं तद् दिव्यदर्शित्वमद्य वै ॥ ६२ ॥
निष्पाप नरेश! आपके पुत्रके स्वर्गलोकमें चले जानेसे मैं शोकसे आतुर हो गया हूँ और महर्षि व्यासजीकी दी हुई मेरी वह दिव्य दृष्टि भी अब नष्ट हो गयी है ॥ ६२ ॥
वैशम्पायन उवाच
इति श्रुत्वा स नृपतिः पुत्रस्य निधनं तदा ।
निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च ततश्चिन्तापरोऽभवत् ॥ ६३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार अपने पुत्रकी मृत्युका समाचार सुनकर राजा धृतराष्ट्र गरम - गरम लंबी साँस खींचकर गहरी चिन्तामें डूब गये ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि दुर्योधनप्राणत्यागे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें दुर्योधनका प्राणत्यागविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
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(ऐषीकपर्व ) दशमोऽध्यायः धृष्टद्युम्नके सारथिके मुखसे पुत्रों और पांचालोंके वधका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरका विलाप, द्रौपदीको बुलानेके लिये नकुलको भेजना, सुहृदोंके साथ शिविरमें जाना तथा मारे हुए पुत्रादिको देखकर भाईसहित शोकातुर होना वैशम्पायन उवाच
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां धृष्टद्युम्नस्य सारथिः ।
शशंस धर्मराजाय सौप्तिके कदनं कृतम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! वह रात व्यतीत होनेपर धृष्टद्युम्नके सारथिने रातको सोते समय जो संहार किया गया था, उसका समाचार धर्मराज युधिष्ठिरसे कह सुनाया ॥ १ ॥
सूतउवाच
द्रौपदेया हता राजन् द्रुपदस्यात्मजैः सह ।
प्रमत्ता निशि विश्वस्ताः स्वपन्तः शिबिरे स्वके ॥ २ ॥
सारथि बोला - राजन्! द्रुपदके पुत्रोंसहित द्रौपदी देवीके भी सारे पुत्र मारे गये । वे रातको अपने शिबिरमें निश्चिन्त एवं असावधान होकर सो रहे थे ॥ २ ॥
कृतवर्मणा नृशंसेन गौतमेन कृपेण च ।
अश्वत्थाम्ना च पापेन हतं वः शिबिरं निशि ॥ ३ ॥
उसी समय क्रूर कृतवर्मा, गौतमवंशी कृपाचार्य तथा पापी अश्वत्थामाने आक्रमण करके आपके सारे शिबिरका विनाश कर डाला ॥ ३ ॥
एतैर्नरगजाश्वानां प्रासशक्तिपरश्वधैः ।
सहस्राणि निकृन्तद्भिर्निःशेषं ते बलं कृतम् ॥ ४ ॥
इन तीनोंने प्रास, शक्ति और फरसोंद्वारा सहस्रों मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको काट-काटकर आपकी सारी सेनाको समाप्त कर दिया है ॥ ४ ॥
छिद्यमानस्य महतो वनस्येव परश्वधैः ।
शुश्रुवे सुमहान् शब्दो बलस्य तव भारत ॥ ५ ॥
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भारत! जैसे फरसोंसे विशाल जंगल काटा जा रहा हो, उसी प्रकार उनके द्वारा छिन्न- भिन्न की जाती हुई आपकी विशाल वाहिनीका महान् आर्तनाद सुनायी पड़ता था ॥ ५ ॥
अहमेकोऽवशिष्टस्तु तस्मात् सैन्यान्महामते ।
मुक्तः कथंचिद् धर्मात्मन् व्यग्राच्च कृतवर्मणः ॥ ६ ॥
महामते! धर्मात्मन्! उस विशाल सेनासे अकेला मैं ही किसी प्रकार बचकर निकल आया हूँ । कृतवर्मा दूसरोंको मारनेमें लगा हुआ था; इसीलिये मैं उस संकटसे मुक्त हो सका हूँ ॥ ६ ॥
तच्छ्रुत्वा वाक्यमशिवं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
पपात मह्यां दुर्धर्षः पुत्रशोकसमन्वितः ॥ ७ ॥
वह अमंगलमय वचन सुनकर दुर्धर्ष राजा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर पुत्रशोकसे संतप्त हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ७ ॥
पतन्तं तमतिक्रम्य परिजग्राह सात्यकिः ।
भीमसेनोऽर्जुनश्चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ८ ॥
गिरते समय आगे बढ़कर सात्यकिने उन्हें थाम लिया । भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल- सहदेवने भी उन्हें पकड़ लिया ॥ ८ ॥
लब्धचेतास्तु कौन्तेयः शोकविह्वलया गिरा ।
जित्वा शत्रून् जितः पश्चात् पर्यदेवयदार्तवत् ॥ ९ ॥
फिर होशमें आनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर शोकाकुल वाणीद्वारा आर्तकी भाँति विलाप करने लगे — ' हाय! मैं शत्रुओंको पहले जीतकर पीछे पराजित हो गया ॥ ९ ॥
दुर्विदा गतिरर्थानामपि ये दिव्यचक्षुषः ।
जीयमाना जयन्त्यन्ये जयमाना वयं जिताः ॥ १० ॥
‘ जो लोग दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न हैं, उनके लिये भी पदार्थोंकी गतिको समझना अत्यन्त दुष्कर है । हाय! दूसरे लोग तो हारकर जीतते हैं; किंतु हमलोग जीतकर हार गये हैं! ॥ १० ॥
हत्वा भ्रातॄन् वयस्यांश्च पितॄन् पुत्रान् सुहृद्गणान् ।
बन्धूनमात्यान् पौत्रांश्च जित्वा सर्वाञ्जिता वयम् ॥ ११ ॥
' हमने भाइयों, समवयस्क मित्रों, पितृतुल्य पुरुषों, पुत्रों, सुहृद्गणों, बन्धुओं, मन्त्रियों तथा पौत्रोंकी हत्या करके उन सबको जीतकर विजय प्राप्त की थी; परंतु अब शत्रुओंद्वारा हम ही पराजित हो गये ॥ ११ ॥
अनर्थो ह्यर्थसंकाशस्तथानर्थोऽर्थदर्शनः ।
जयोऽयमजयाकारो जयस्तस्मात् पराजयः ॥ १२ ॥
‘ कभी - कभी अनर्थ भी अर्थ- सा हो जाता है और अर्थके रूपमें दिखायी देनेवाली वस्तु भी अनर्थके रूपमें परिणत हो जाती है, इसी प्रकार हमारी यह विजय भी पराजयका ही
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रूप धारण करके आयी थी, इसलिये जय भी पराजय बन गयी ॥ १२ ॥
यज्जित्वा तप्यते पश्चादापन्न इव दुर्मतिः ।
कथं मन्येत विजयं ततो जिततरः परैः ॥ १३ ॥
' दुर्बुद्धि मनुष्य यदि विजय- लाभके पश्चात् विपत्तिमें पड़े हुए पुरुषकी भाँति अनुताप करता है तो वह अपनी उस जीतको जीत कैसे मान सकता है? क्योंकि उस दशामें तो वह शत्रुओंद्वारा पूर्णतः पराजित हो चुका है ॥ १३ ॥
येषामर्थाय पापं स्याद् विजयस्य सुहृद्वधैः ।
निर्जितैरप्रमत्तैर्हि विजिता जितकाशिनः ॥ १४ ॥
‘ जिन्हें विजयके लिये सुहृदोंके वधका पाप करना पड़ता है, वे एक बार विजयलक्ष्मीसे उल्लसित भले ही हो जायँ, अन्तमें पराजित होकर सतत सावधान रहनेवाले शत्रुओंके हाथसे उन्हें पराजित होना ही पड़ता है ॥ १४ ॥
कर्णिनालीकदंष्ट्रस्य खड्गजिह्वस्य संयुगे ।
चापव्यात्तस्य रौद्रस्य ज्यातलस्वननादिनः ॥ १५ ॥
क्रुद्धस्य नरसिंहस्य संग्रामेष्वपलायिनः ।
ये व्यमुञ्चन्त कर्णस्य प्रमादात् त इमे हताः ॥ १६ ॥
'क्रोधमें भरा हुआ कर्ण मनुष्योंमें सिंहके समान था । कर्णि और नालीक नामक बाण उसकी दाँढ़ें तथा युद्धमें उठी हुई तलवार उसकी जिह्वा थी । धनुषका खींचना ही उसका मुँह फैलाना था । प्रत्यंचाकी टंकार ही उसके लिये दहाड़नेके समान थी । युद्धोंमें कभी पीठ न दिखानेवाले उस भयंकर पुरुषसिंहके हाथसे जो जीवित छूट गये, वे ही ये मेरे सगे - सम्बन्धी अपनी असावधानीके कारण मार डाले गये हैं ॥ १५-१६ ॥ रथह्रदं शरवर्षोर्मिमन्तं रत्नाचितं वाहनवाजियुक्तम् । शक्त्यृष्टिमीनध्वजनागनक्रं शरासनावर्तमहेषुफेनम् ॥ १७ ॥
संग्रामचन्द्रोदयवेगवेलं द्रोणार्णवं ज्यातलनेमिघोषम् । ये तेरुरुच्चावचशस्त्रनौभि- स्ते राजपुत्रा निहताः प्रमादात् ॥ १८ ॥
‘ द्रोणाचार्य महासागरके समान थे, रथ ही पानीका कुण्ड था, बाणोंकी वर्षा ही लहरोंके समान ऊपर उठती थी, रत्नमय आभूषण ही उस द्रोणरूपी समुद्रके रत्न थे, रथके घोड़े ही समुद्री घोड़ोंके समान जान पड़ते थे, शक्ति और ऋष्टि मत्स्यके समान तथा ध्वज नाग एवं मगरके तुल्य थे, धनुष ही भँवर तथा बड़े- बड़े बाण ही फेन थे, संग्राम ही चन्द्रोदय बनकर उस समुद्रके वेगको चरम सीमातक पहुँचा देता था, प्रत्यंचा और पहियोंकी ध्वनि ही उस
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महासागरकी गर्जना थी; ऐसे द्रोणरूपी सागरको जो छोटे - बड़े नाना प्रकारके शस्त्रोंकी नौका बनाकर पार गये, वे ही राजकुमार असावधानीसे मार डाले गये ॥ १७-१८ ॥ न हि प्रमादात् परमस्ति कश्चिद् वधो नराणामिह जीवलोके । प्रमत्तमर्था हि नरं समन्तात् त्यजन्त्यनर्थाश्च समाविशन्ति ॥ १ ९ ॥ ‘ प्रमादसे बढ़कर इस संसारमें मनुष्योंके लिये दूसरी कोई मृत्यु नहीं । प्रमादी मनुष्यको सारे अर्थ सब ओरसे त्याग देते हैं और अनर्थ बिना बुलाये ही उसके पास चले आते हैं ॥ १ ९ ॥ ध्वजोत्तमाग्रोच्छ्रितधूमकेतुं शरार्चिषं कोपमहासमीरम् । महाधनुर्ज्यातलनेमिघोषं तनुत्रनानाविधशस्त्रहोमम् ॥ २० ॥
महाचमूकक्षदवाभिपन्नं महाहवे भीष्ममयाग्निदाहम् । ये सेहुरात्तायुधतीक्ष्णवेगं ते राजपुत्रा निहताः प्रमादात् ॥ २१ ॥
' महासमरमें भीष्मरूपी अग्नि जब पाण्डव- सेनाको जला रही थी, उस समय ऊँची ध्वजाओंके शिखरपर फहराती हुई पताका ही धूमके समान जान पड़ती थी, बाण - वर्षा ही आगकी लपटें थीं, क्रोध ही प्रचण्ड वायु बनकर उस ज्वालाको बढ़ा रहा था, विशाल धनुषकी प्रत्यंचा, हथेली और रथके पहियोंका शब्द ही मानो उस अग्निदाहसे उठनेवाली चट- चट ध्वनि था, कवच और नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र उस आगकी आहुति बन रहे थे, विशाल सेनारूपी सूखे जंगलमें दावानलके समान वह आग लगी थी, हाथमें लिये हुए अस्त्र- शस्त्र ही उस अग्निके प्रचण्ड वेग थे, ऐसे अग्निदाहके कष्टको जिन्होंने सह लिया, वे ही राजपुत्र प्रमादवश मारे गये ॥ २०-२१ ॥ न हि प्रमत्तेन नरेण शक्यं विद्या तपः श्रीर्विपुलं यशो वा । पश्याप्रमादेन निहत्य शत्रून् सर्वान् महेन्द्रं सुखमेधमानम् ॥ २२ ॥
' प्रमादी मनुष्य कभी विद्या, तप, वैभव अथवा महान् यश नहीं प्राप्त कर सकता । देखो, देवराज इन्द्र प्रमाद छोड़ देनेके ही कारण अपने सारे शत्रुओंका संहार करके सुखपूर्वक उन्नति कर रहे हैं ॥ २२ ॥
इन्द्रोपमान् पार्थिवपुत्रपौत्रान्
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पश्याविशेषेण हतान् प्रमादात् । तीर्त्वा समुद्रं वणिजः समृद्धा मग्नाः कुनद्यामिव हेलमानाः ॥ २३ ॥
‘ देखो, प्रमादके ही कारण ये इन्द्रके समान पराक्रमी, राजाओंके पुत्र और पौत्र सामान्य रूपसे मार डाले गये, जैसे समृद्धिशाली व्यापारी समुद्रको पार करके प्रमादवश अवहेलना करनेके कारण छोटी - सी नदीमें डूब गये हों ॥ अमर्षितैर्ये निहताः शयाना निःसंशयं ते त्रिदिवं प्रपन्नाः । कृष्णां तु शोचामि कथं नु साध्वी शोकार्णवे साद्य विनङ्क्षयतीति ॥ २४ ॥
‘ शत्रुओंने अमर्षके वशीभूत होकर जिन्हें सोते समय ही मार डाला है वे तो निःसंदेह स्वर्गलोकमें पहुँच गये हैं । मुझे तो उस सती साध्वी कृष्णाके लिये चिन्ता हो रही है जो आज शोकके समुद्रमें डूबकर नष्ट हो जानेकी स्थितिमें पहुँच गयी है ॥ २४ ॥
भातॄंश्च पुत्रांश्च हतान् निशम्य पाञ्चालराजं पितरं च वृद्धम् । ध्रुवं विसंज्ञा पतिता पृथिव्यां सा शोष्यते शोककृशाङ्गयष्टिः ॥ २५ ॥
' एक तो पहलेसे ही शोकके कारण क्षीण होकर उसकी देह सूखी लकड़ीके समान हो गयी है? दूसरे फिर जब वह अपने भाइयों, पुत्रों तथा बूढ़े पिता पांचालराज द्रुपदकी मृत्युका समाचार सुनेगी तब और भी सूख जायगी तथा अवश्य ही अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ेगी ॥ २५ ॥
तच्छोकजं दुःखमपारयन्ती कथं भविष्यत्युचिता सुखानाम् । पुत्रक्षयभ्रातृवधप्रणुन्ना प्रदह्यमानेन हुताशनेन ॥ २६ ॥
'जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य है, वह उस शोकजनित दुःखको न सह सकनेके कारण न जाने कैसी दशाको पहुँच जायगी? पुत्रों और भाइयोंके विनाशसे व्यथित हो उसके हृदयमें जो शोककी आग जल उठेगी, उससे उसकी बड़ी शोचनीय दशा हो जायगी ' ॥ २६ ॥
इत्येवमार्तः परिदेवयन् स राजा कुरूणां नकुलं बभाषे । गच्छानयैनामिह मन्दभाग्यां समातृपक्षामिति राजपुत्रीम् ॥ २७ ॥
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इस प्रकार आर्तस्वरसे विलाप करते हुए कुरुराज युधिष्ठिरने नकुलसे कहा — ‘ भाई! जाओ, मन्दभागिनी राजकुमारी द्रौपदीको उसके मातृपक्षकी स्त्रियोंके साथ यहाँ लिया लाओ ' ॥ २७ ॥
माद्रीसुतस्तत् परिगृह्य वाक्यं धर्मेण धर्मप्रतिमस्य राज्ञः । ययौ रथेनालयमाशु देव्याः पाञ्चालराजस्य च यत्र दाराः ॥ २८ ॥
माद्रीकुमार नकुलने धर्माचरणके द्वारा साक्षात् धर्मराजकी समानता करनेवाले राजा युधिष्ठिरकी आज्ञा शिरोधार्य करके रथके द्वारा तुरंत ही महारानी द्रौपदीके उस भवनकी ओर प्रस्थान किया, जहाँ पांचालराजके घरकी भी महिलाएँ रहती थीं ॥ २८ ॥
प्रस्थाप्य माद्रीसुतमाजमीढः
शोकार्दितस्तैः सहितः सुहृद्भिः ।
रोरूयमाणः प्रययौ सुताना- मायोधनं भूतगणानुकीर्णम् ॥ २ ९ ॥
माद्रीकुमारको वहाँ भेजकर अजमीढ़कुलनन्दन युधिष्ठिर शोकाकुल हो उन सभी सुहृदोंके साथ बारंबार रोते हुए पुत्रोंके उस युद्धस्थलमें गये, जो भूतगणोंसे भरा हुआ था ॥ २ ९ ॥ सतत् प्रविश्याशिवमुग्ररूपं ददर्श पुत्रान् सुहृदः सखींश्च । भूमौ शयानान् रुधिरार्द्रगात्रान् विभिन्नदेहान् प्रहृतोत्तमाङ्गान् ॥ ३० ॥
उस भयंकर एवं अमंगलमय स्थानमें प्रवेश करके उन्होंने अपने पुत्रों, सुहृदों और सखाओंको देखा, जो खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़े थे । उनके शरीर छिन्न - भिन्न हो गये थे और मस्तक कट गये थे ॥ ३० ॥
स तांस्तु दृष्ट्वा भृशमार्तरूपो युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः । उच्चैः प्रचुक्रोश च कौरवाग्रयः पपात चोर्व्यां सगणो विसंज्ञः ॥ ३१ ॥
उन्हें देखकर कुरुकुलशिरोमणि तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी हो गये और उच्चस्वरसे फूट- फूटकर रोने लगे । धीरे- धीरे उनकी संज्ञा लुप्त हो गयी और वे अपने साथियोंसहित पृथ्वीपर गिर पड़े ॥
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इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरशिविरप्रवेशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें युधिष्ठिरका शिविरमें प्रवेशविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥