04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 3121–3130
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 3121–3130
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वह उस वनका अनुसरण करता इधर- उधर दौड़ता तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें ढूँढ़ता फिरता था कि कहीं मुझे शरण मिले ॥ ६३ ॥
स तेषां छिद्रमन्विच्छन् प्रद्रुतो भयपीडितः ॥ ७ ॥
न च निर्याति वै दूरं न वा तैर्विप्रमोच्यते । वह उन हिंसक जन्तुओंका छिद्र देखता हुआ भयसे पीड़ित हो भागने लगा; परंतु न तो वहाँसे दूर निकल पाता था और न वे ही उसका पीछा छोड़ते थे ॥ ७३ ॥
अथापश्यद् वनं घोरं समन्ताद् वागुरावृतम् ॥ ८ ॥
बाहुभ्यां सम्परिक्षिप्तं स्त्रिया परमघोरया । इतनेहीमें उसने देखा कि वह भयानक वन चारों ओरसे जालसे घिरा हुआ है और एक बड़ी भयानक स्त्रीने अपनी दोनों भुजाओंसे उसको आवेष्टित कर रखा है ॥ पञ्चशीर्षधरैर्नागैः शैलैरिव समुन्नतैः ॥ ९ ॥
नभःस्पृशैर्महावृक्षैः परिक्षिप्तं महावनम् । पर्वतोंके समान ऊँचे और पाँच सिरवाले नागों तथा बड़े -बड़े गगनचुम्बी वृक्षोंसे वह विशाल वन व्याप्त हो रहा है ॥ ९ ३ ॥ वनमध्ये च तत्राभूदुदपानः समावृतः ॥ १० ॥
वल्लीभिस्तृणछन्नाभिर्दृढाभिरभिसंवृतः । उस वनके भीतर एक कुआँ था, जो घासोंसे ढकी हुई सुदृढ़ लताओंके द्वारा सब ओरसे आच्छादित हो गया था ॥ पपात स द्विजस्तत्र निगूढे सलिलाशये ॥ ११ ॥
विलग्नश्चाभवत् तस्मिन् लतासंतानसंकुले । वह ब्राह्मण उस छिपे हुए कुएँमें गिर पड़ा; परंतु लतावेलोंसे व्याप्त होनेके कारण वह उसमें फँसकर नीचे नहीं गिरा, ऊपर ही लटका रह गया ॥ ११३ ॥
पनसस्य यथा जातं वृन्तबद्धं महाफलम् ॥ १२ ॥
स तथा लम्बते तत्र ह्यूर्ध्वपादो ह्यधः शिराः । जैसे कटहलका विशाल फल वृन्तमें बँधा हुआ लटकता रहता है, उसी प्रकार वह ब्राह्मण ऊपरको पैर और नीचेको सिर किये उस कुएँमें लटक गया ॥ १२३ ॥
अथ तत्रापि चान्योऽस्य भूयो जात उपद्रवः ॥ १३ ॥
कूपमध्ये महानागमपश्यत महाबलम् ।
कूपवीनाहवेलायामपश्यत महागजम् ॥ १४ ॥
षड्वक्त्रं कृष्णशुक्लं च द्विषट्कपदचारिणम् ।
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वहाँ भी उसके सामने पुनः दूसरा उपद्रव खड़ा हो गया । उसने कूपके भीतर एक महाबली महानाग बैठा हुआ देखा तथा कुएँके ऊपरी तटपर उसके मुखबन्धके पास एक विशाल हाथीको खड़ा देखा, जिनके छः मुँह थे । वह सफेद और काले रंगका था तथा बारह पैरोंसे चला करता था ॥ १३-१४ ॥ क्रमेण परिसर्पन्तं वल्लीवृक्षसमावृतम् ॥ १५ ॥
तस्य चापि प्रशाखासु वृक्षशाखावलम्बिनः ।
नानारूपा मधुकरा घोररूपा भयावहाः ॥ १६ ॥
आसते मधु संवृत्य पूर्वमेव निकेतजाः । वह लताओं तथा वृक्षोंसे घिरे हुए उस कूपमें क्रमशः बढ़ा आ रहा था। वह ब्राह्मण, जिस वृक्षकी शाखापर लटका था, उसकी छोटी- छोटी टहनियोंपर पहलेसे ही मधुके छत्तोंसे पैदा हुई अनेक रूपवाली, घोर एवं भयंकर मधुमक्खियाँ मधुको घेरकर बैठी हुई थीं ॥ १५-१६ ॥ भूयो भूयः समीहन्ते मधूनि भरतर्षभ ॥ १७ ॥
स्वादनीयानि भूतानां यैर्बालो विप्रकृष्यते । भरतश्रेष्ठ! समस्त प्राणियोंको स्वादिष्ट प्रतीत होनेवाले उस मधुको, जिसपर बालक आकृष्ट हो जाते हैं, वे मक्खियाँ बारंबार पीना चाहती थीं ॥ १७३ ॥
तेषां मधूनां बहुधा धारा प्रस्रवते तदा ॥ १८ ॥
आलम्बमानः स पुमान् धारां पिबति सर्वदा । उस समय उस मधुकी अनेक धाराएँ वहाँ झर रही थीं और वह लटका हुआ पुरुष निरन्तर उस मधुधाराको पी रहा था ॥ १८३ ॥
न चास्य तृष्णा विरता पिबमानस्य संकटे ॥ १ ९ ॥ अभीप्सति तदा नित्यमतृप्तः स पुनः पुनः ।
यद्यपि वह संकटमें था तो भी उस मधुको पीते - पीते उसकी तृष्णा शान्त नहीं होती थी ।
वह सदा अतृप्त रहकर ही बारंबार उसे पीनेकी इच्छा रखता था ॥ १ ९ ३ ॥
न चास्य जीविते राजन् निर्वेदः समजायत ॥ २० ॥
तत्रैव च मनुष्यस्य जीविताशा प्रतिष्ठिता । राजन्! उसे अपने उस संकटपूर्ण जीवनसे वैराग्य नहीं हुआ है । उस मनुष्यके मनमें वहीं उसी दशासे जीवित रहकर मधु पीते रहनेकी आशा जड़ जमाये हुए है ॥ २०६३ ॥
कृष्णाः श्वेताश्च तं वृक्षं कुट्टयन्ति च मूषिकाः ॥ २१ ॥
व्यालैश्च वनदुर्गान्ते स्त्रिया च परमोग्रया ।
कूपाधस्ताच्च नागेन वीनाहे कुञ्जरेण च ॥ २२ ॥
वृक्षप्रपाताच्च भयं मूषिकेभ्यश्च पञ्चमम् ।
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मधुलोभान्मधुकरैः षष्ठमाहुर्महद् भयम् ॥ २३ ॥
जिस वृक्षके सहारे वह लटका हुआ है, उसे काले और सफेद चूहे निरन्तर काट रहे हैं । पहले तो उसे वनके दुर्गम प्रदेशके भीतर ही अनेक सर्पोंसे भय है, दूसरा भय सीमापर खड़ी हुई उस भयंकर स्त्रीसे है, तीसरा कुँएके नीचे बैठे हुए नागसे है, चौथा कुँएके मुखबन्धके पास खड़े हुए हाथीसे है और पाँचवाँ भय चूहोंके काट देनेपर उस वृक्षसे गिर जानेका है । इनके सिवा, मधुके लोभसे मधुमक्खियोंकी ओरसे जो उसको महान् भय प्राप्त होनेवाला है, वह छठा भय बताया गया है ॥ २१–२३ ॥
एवं स वसते तत्र क्षिप्तः संसारसागरे ।
न चैव जीविताशायां निर्वेदमुपगच्छति ॥ २४ ॥
इस प्रकार संसार- सागरमें गिरा हुआ वह मनुष्य इतने भयोंसे घिरकर वहाँ निवास करता है तो भी उसे जीवनकी आशा बनी हुई है और उसके मनमें वैराग्य नहीं उत्पन्न होता है ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
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षष्ठोऽध्यायः संसाररूपी वनके रूपकका स्पष्टीकरण धृतराष्ट्रउवाच
अहो खलु महद् दुःखं कृच्छ्रवासश्च तस्य ह ।
कथं तस्य रतिस्तत्र तुष्टिर्वा वदतां वर ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले- वक्ताओंमें श्रेष्ठ विदुर! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! उस ब्राह्मणको तो महान् दुःख प्राप्त हुआ था । वह बड़े कष्टसे वहाँ रह रहा था तो भी वहाँ कैसे उसका मन लगता था और कैसे उसे संतोष होता था? ॥ १ ॥
स देशः क्व नु यत्रासौ वसते धर्मसंकटे ।
कथं वा स विमुच्येत नरस्तस्मान्महाभयात् ॥ २ ॥
कहाँ है वह देश, जहाँ बेचारा ब्राह्मण ऐसे धर्मसंकटमें रहता है? उस महान् भयसे उसका छुटकारा किस प्रकार हो सकता है? ॥ २ ॥
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व साधु चेष्टामहे तदा ।
कृपा मे महती जाता तस्याभ्युद्धरणेन हि ॥ ३ ॥
यह सब मुझे बताओ; फिर हम सब लोग उसे वहाँसे निकालनेकी पूरी चेष्टा करेंगे ।
उसके उद्धारके लिये मुझे बड़ी दया आ रही है ॥ ३ ॥
विदुर उवाच
उपमानमिदं राजन् मोक्षविद्भिरुदाहृतम् ।
सुकृतं विन्दते येन परलोकेषु मानवः ॥ ४ ॥
विदुरजीने कहा- राजन्! मोक्षतत्त्वके विद्वानोंद्वारा बताया गया यह एक दृष्टान्त है, जिसे समझकर वैराग्य धारण करनेसे मनुष्य परलोकमें पुण्यका फल पाता है ॥
उच्यते यत् तु कान्तारं महासंसार एव सः ।
वन दुर्गं हि यच्चैतत् संसारगहनं हि तत् ॥ ५ ॥
जिसे दुर्गम स्थान बताया गया है, वह महासंसार ही है और जो यह दुर्गम वन कहा गया है, यह संसारका ही गहन स्वरूप है ॥ ५ ॥
ये च ते कथिता व्याला व्याधयस्ते प्रकीर्तिताः ।
या सा नारी बृहत्काया अध्यतिष्ठत तत्र वै ॥ ६ ॥
तामाहुस्तु जरां प्राज्ञा रूपवर्णविनाशिनीम् ।
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जो सर्प कहे गये हैं, वे नाना प्रकारके रोग हैं । उस वनकी सीमापर जो विशालकाय नारी खड़ी थी, उसे विद्वान् पुरुष रूप और कान्तिका विनाश करनेवाली वृद्धावस्था बताते हैं ॥ ६३ ॥
यस्तत्र कूपो नृपते स तु देहः शरीरिणाम् ॥ ७ ॥
यस्तत्र वसतेऽधस्तान्महाहिः काल एव सः ।
अन्तकः सर्वभूतानां देहिनां सर्वहार्यसौ ॥ ८ ॥
नरेश्वर! उस वनमें जो कुआँ कहा गया है, वह देहधारियोंका शरीर है । उसमें नीचे जो विशाल नाग रहता है, वह काल ही है । वही सम्पूर्ण प्राणियोंका अन्त करनेवाला और देहधारियोंका सर्वस्व हर लेनेवाला है ॥ ७-८ ॥
कूपमध्ये च या जाता वल्ली यत्र स मानवः ।
प्रताने लम्बते लग्नो जीविताशा शरीरिणाम् ॥ ९ ॥
कुँएके मध्यभागमें जो लता उत्पन्न हुई बतायी गयी है, जिसको पकड़कर वह मनुष्य लटक रहा है, वह देहधारियोंके जीवनकी आशा ही है ॥ ९ ॥
स यस्तु कूपवीनाहे तं वृक्षं परिसर्पति ।
षड्वक्त्रः कुञ्जरो राजन् स तु संवत्सरः स्मृतः ॥ १० ॥
राजन्! जो कुएँके मुखबन्धके समीप छः मुखों वाला हाथी उस वृक्षकी ओर बढ़ रहा है, उसे संवत्सर माना गया है ॥ १० ॥
मुखानि ऋतवो मासाः पादा द्वादश कीर्तिताः ।
ये तु वृक्षं निकृन्तन्ति मूषिकाः सततोत्थिताः ॥ ११ ॥
रात्र्यहानि तु तान्याहुर्भूतानां परिचिन्तकाः । छः ऋतुएँ ही उसके छः मुख हैं और बारह महीने ही बारह पैर बताये गये हैं । जो चूहे सदा उद्यत रहकर उस वृक्षको काटते हैं, उन चूहोंको विचारशील विद्वान् प्राणियोंके दिन और रात बताते हैं ॥ ११३ ॥
ये ते मधुकरास्तत्र कामास्ते परिकीर्तिताः ॥ १२ ॥
यास्तु ता बहुशो धाराः स्रवन्ति मधुनिस्रवम् ।
तांस्तु कामरसान् विद्याद् यत्र मज्जन्ति मानवाः ॥ १३ ॥
और जो- जो वहाँ मधुमक्खियाँ कही गयी हैं, वे सब कामनाएँ हैं। जो बहुत - सी धाराएँ मधुके झरने झरती रहती हैं, उन्हें कामरस जानना चाहिये, जहाँ सभी मानव डूब जाते हैं ॥ १२-१३ ॥
एवं संसारचक्रस्य परिवृत्तिं विदुर्बुधाः ।
येन संसारचक्रस्य पाशांश्छिन्दन्ति वै बुधाः ॥ १४ ॥
विद्वान् पुरुष इस प्रकार संसारचक्रकी गतिको जानते हैं, इसीलिये वे वैराग्यरूपी शस्त्रसे इसके सारे बन्धनोंको काट देते हैं ॥ १४ ॥
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इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे षष्ठोऽध्यायः ॥६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
Fard
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सप्तमोऽध्यायः संसारचक्रका वर्णन और रथके रूपकसे संयम और ज्ञान आदिको मुक्तिका उपाय बताना धृतराष्ट्रउवाच
अहोऽभिहितमाख्यानं भवता तत्त्वदर्शिना ।
भूय एव तु मे हर्षः श्रुत्वा वागमृतं तव ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – विदुर! तुमने अद्भुत आख्यान सुनाया । वास्तवमें तुम तत्त्वदर्शी हो । पुनः तुम्हारी अमृतमयी वाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष होगा ॥ १ ॥
विदुर उवाच
शृणु भूयः प्रवक्ष्यामि मार्गस्यैतस्य विस्तरम् ।
यच्छ्रुत्वा विप्रमुच्यन्ते संसारेभ्यो विचक्षणाः ॥ २ ॥
विदुरजीने कहा- राजन्! सुनिये। मैं पुनः विस्तार- पूर्वक इस मार्गका वर्णन करता हूँ, जिसे सुनकर बुद्धिमान् पुरुष संसार- बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ॥ २ ॥
यथा तु पुरुषो राजन् दीर्घमध्वानमास्थितः ।
क्वचित् क्वचिच्छ्रमाच्छ्रान्तः कुरुते वासमेव वा ॥ ३ ॥
एवं संसारपर्याये गर्भवासेषु भारत ।
कुर्वन्ति दुर्बुधा वासं मुच्यन्ते तत्र पण्डिताः ॥ ४ ॥
नरेश्वर! जिस प्रकार किसी लंबे रास्तेपर चलने वाला पुरुष परिश्रमसे थककर बीचमें कहीं- कहीं विश्रामके लिये ठहर जाता है, उसी प्रकार इस संसारयात्रामें चलते हु अज्ञानी पुरुष विश्रामके लिये गर्भवास किया करते हैं । भारत! किंतु विद्वान् पुरुष इस संसारसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ३-४ ॥
तस्मादध्वानमेवैतमाहुः शास्त्रविदो जनाः ।
यत्तु संसारगहनं वनमाहुर्मनीषिणः ॥ ५ ॥
इसीलिये शास्त्रज्ञ पुरुषोंने गर्भवासको मार्गका ही रूपक दिया है और गहन संसारको मनीषी पुरुष वन कहा करते हैं ॥ ५ ॥
सोऽयं लोकसमावर्तो मर्त्यानां भरतर्षभ ।
चराणां स्थावराणां च न गृध्येत् तत्र पण्डितः ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! यही मनुष्यों तथा स्थावर- जंगम प्राणियोंका संसारचक्र है । विवेकी पुरुषको इसमें आसक्त नहीं होना चाहिये ॥ ६ ॥
शारीरा मानसाश्चैव मर्त्यानां ये तु व्याधयः ।
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प्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च ते व्यालाः कथिता बुधैः ॥ ७ ॥
मनुष्योंकी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शारीरिक और मानसिक व्याधियाँ हैं, उन्हींको विद्वानोंने सर्प एवं हिंसक जीव बताया है ॥ ७ ॥
क्लिश्यमानाश्च तैर्नित्यं वार्यमाणाश्च भारत ।
स्वकर्मभिर्महाव्यालैर्नोद्विजन्त्यल्पबुद्धयः ॥ ८ ॥
भरतनन्दन! अपने कर्मरूपी इन महान् हिंसक जन्तुओंसे सदा सताये तथा रोके जानेपर भी मन्दबुद्धि मानव संसारसे उद्विग्न या विरक्त नहीं होते हैं ॥ ८ ॥
अथापि तैर्विमुच्येत व्याधिभिः पुरुषो नृप ।
आवृणोत्येव तं पश्चाज्जरा रूपविनाशिनी ॥ ९ ॥
शब्दरूपरसस्पर्शैर्गन्धैश्च विविधैरपि ।
मज्जमांसमहापङ्के निरालम्बे समन्ततः ॥ १० ॥
नरेश्वर! यदि शब्द, स्पर्श, रूप, रस और नाना प्रकारकी गन्धोंसे युक्त, मज्जा और मांसरूपी बड़ी भारी कीचड़से भरे हुए एवं सब ओरसे अवलम्बशून्य इस शरीररूपी कूपमें रहनेवाला मनुष्य इन व्याधियोंसे किसी तरह मुक्त हो जाय तो भी अन्तमें रूप - सौन्दर्यका विनाश करनेवाली वृद्धावस्था तो उसे घेर ही लेती है ॥
संवत्सराश्च मासाश्च पक्षाहोरात्रसंधयः ।
क्रमेणास्योपयुञ्जन्ति रूपमायुस्तथैव च ॥ ११ ॥
एते कालस्य निधयो नैतान् जानन्ति दुर्बुधाः ।
धात्राभिलिखितान्याहुः सर्वभूतानि कर्मणा ॥ १२ ॥
वर्ष, मास, पक्ष, दिन - रात और संध्याएँ क्रमशः इसके रूप और आयुका शोषण करती ही रहती हैं । ये सब कालके प्रतिनिधि हैं । मूढ़ मनुष्य इन्हें इस रूपमें नहीं जानते हैं । श्रेष्ठ पुरुषोंका कथन है कि विधाताने सम्पूर्ण भूतोंके ललाटमें कर्मके अनुसार रेखा खींच दी है (प्रारब्धके अनुसार उनकी आयु और सुख-दुःखके भोग नियत कर दिये हैं ) ॥
रथः शरीरं भूतानां सत्त्वमाहुस्तु सारथिम् ।
इन्द्रियाणि हयानाहुः कर्मबुद्धिस्तु रश्मयः ॥ १३ ॥
तेषां हयानां यो वेगं धावतामनुधावति ।
स तु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत् परिवर्तते ॥ १४ ॥
विद्वान् पुरुष कहते हैं कि प्राणियोंका शरीर रथके समान है, सत्त्व ( सत्त्वगुणप्रधान बुद्धि) सारथि है, इन्द्रियाँ घोड़े हैं और मन लगाम है । जो पुरुष स्वेच्छापूर्वक दौड़ते हुए उन घोड़ोंके वेगका अनुसरण करता है, वह तो इस संसारचक्रमें पहियेके समान घूमता रहता है ॥
यस्तान् संयमते बुद्धया संयतो न निवर्तते ।
ये तु संसारचक्रेऽस्मिंश्चक्रवत् परिवर्तिते ॥ १५ ॥
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भ्रममाणा न मुह्यन्ति संसारे न भ्रमन्ति ते । किंतु जो संयमशील होकर बुद्धिके द्वारा उन इन्द्रियरूपी अश्वोंको काबूमें रखते हैं, वे फिर इस संसारमें नहीं लौटते । जो लोग चक्रकी भाँति घूमनेवाले इस संसारचक्रमें घूमते हुए भी मोहके वशीभूत नहीं होते हैं, उन्हें फिर संसारमें नहीं भटकना पड़ता ॥ १५३ ॥
संसारे भ्रमतां राजन् दुःखमेतद्धि जायते ॥ १६ ॥
तस्मादस्य निवृत्त्यर्थं यत्नमेवाचरेद् बुधः ।
उपेक्षा नात्र कर्तव्या शतशाखः प्रवर्धते ॥ १७ ॥
राजन्! संसारमें भटकनेवालोंको यह दुःख प्राप्त होता ही है; अतः विज्ञ पुरुषको इस संसारबन्धनकी निवृत्तिके लिये अवश्य यत्न करना चाहिये । इस विषयमें कदापि उपेक्षा नहीं करनी चाहिये; नहीं तो यह संसार सैकड़ों शाखाओंमें फैलकर बहुत बड़ा हो जाता है ॥ १६-१७ ॥
यतेन्द्रियो नरो राजन् क्रोधलोभनिराकृतः ।
संतुष्टः सत्यवादी यः स शान्तिमधिगच्छति ॥ १८ ॥
राजन्! जो मनुष्य जितेन्द्रिय, क्रोध और लोभसे शून्य, संतोषी तथा सत्यवादी होता है, उसे शान्ति प्राप्त होती है ॥ १८ ॥
याम्यमाहू रथं ह्येनं मुह्यन्ते येन दुर्बुधाः ।
स चैतत्, प्राप्नुयाद् राजन् यत् त्वं प्राप्तो नराधिप ॥ १ ९ ॥
नरेश्वर! इस संसारको याम्य ( यमलोककी प्राप्ति करानेवाला) रथ कहते हैं, जिससे मूर्ख मनुष्य मोहित हो जाते हैं । राजन्! जो दुःख आपको प्राप्त हुआ है, वही प्रत्येक अज्ञानी पुरुषको उपलब्ध होता है ॥ १ ९ ॥
अनुतर्षुलमेवैतद् दुःखं भवति मारिष ।
राज्यनाशं सुहृन्नाशं सुतनाशं च भारत ॥ २० ॥
माननीय भारत! जिसकी तृष्णा बढ़ी हुई है, उसीको राज्य, सुहृद् और पुत्रोंका नाशरूपी यह महान् दुःख प्राप्त होता है ॥ २० ॥
साधुः परमदुःखानां दुःखभैषज्यमाचरेत् ।
ज्ञानौषधमवाप्येह दूरपारं महौषधम् ।
छिन्द्याद् दुःखमहाव्याधिं नरः संयतमानसः ॥ २१ ॥
साधु पुरुषको चाहिये कि वह अपने मनको वशमें करके ज्ञानरूपी महान् ओषधि प्राप्त करे, जो परम दुर्लभ है । उससे अपने बड़े -से- बड़े दुःखोंकी चिकित्सा करे । उस ज्ञानरूपी ओषधिसे दुःखरूपी महान् व्याधिका नाश कर डाले ॥ २१ ॥
न विक्रमो न चाप्यर्थो न मित्रं न सुहृज्जनः ।
तथोन्मोचयते दुःखाद् यथाऽऽत्मा स्थिरसंयमः ॥ २२ ॥
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पराक्रम, धन, मित्र और सुहृद् भी उस तरह दुःखसे छुटकारा नहीं दिला सकते, जैसा कि दृढ़तापूर्वक संयममें रहनेवाला अपना मन दिला सकता है ॥ २२ ॥
तस्मान्मैत्रं समास्थाय शीलमापद्य भारत ।
दमस्त्यागोऽप्रमादश्च ते त्रयो ब्रह्मणो हयाः ॥ २३ ॥
शीलरश्मिसमायुक्तः स्थितो यो मानसे रथे ।
त्यक्त्वा मृत्युभयं राजन् ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥ २४ ॥
भरतनन्दन! इसलिये सर्वत्र मैत्रीभाव रखते हुए शील प्राप्त करना चाहिये । दम, त्याग और अप्रमाद — ये तीन परमात्माके धाममें ले जानेवाले घोड़े हैं । जो मनुष्य शीलरूपी लगामको पकड़कर इन तीनों घोड़ोंसे जुते हुए मनरूपी रथपर सवार होता है, वह मृत्युका भय छोड़कर ब्रह्मलोकमें चला जाता है ॥ २३-२४ ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो यो ददाति महीपते ।
स गच्छति परं स्थानं विष्णोः पदमनामयम् ॥ २५ ॥
भूपाल! जो सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान देता है, वह भगवान् विष्णुके अविनाशी परमधाममें चला जाता है ॥ २५ ॥
न तत् क्रतुसहस्रेण नोपवासैश्च नित्यशः ।
अभयस्य च दानेन यत् फलं प्राप्नुयान्नरः ॥ २६ ॥
अभयदानसे मनुष्य जिस फलको पाता है, वह उसे सहस्रों यज्ञ और नित्यप्रति उपवास करनेसे भी नहीं मिल सकता है ॥ २६ ॥
न ह्यात्मनः प्रियतरं किंचिद् भूतेषु निश्चितम् ।
अनिष्टं सर्वभूतानां मरणं नाम भारत ॥ २७ ॥
तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दया कार्या विपश्चिता । भारत! यह बात निश्चितरूपसे कही जा सकती है कि प्राणियोंको अपने आत्मासे अधिक प्रिय कोई भी वस्तु नहीं है; इसीलिये मरना किसी भी प्राणीको अच्छा नहीं लगता; अतः विद्वान् पुरुषको सभी प्राणियोंपर दया करनी चाहिये ॥ २७ ॥
नानामोहसमायुक्ता बुद्धिजालेन संवृताः ॥ २८ ॥
असूक्ष्मदृष्टयो मन्दा भ्राम्यन्ते तत्र तत्र ह । जो मूढ़ नाना प्रकारके मोहमें डूबे हुए हैं, जिन्हें बुद्धिके जालने बाँध रखा है और जिनकी दृष्टि स्थूल है, वे भिन्न- भिन्न योनियोंमें भटकते रहते हैं ॥ २८३ ॥
सुसूक्ष्मदृष्टयो राजन् व्रजन्ति ब्रह्म शाश्वतम् ॥ २ ९ ॥ (एवं ज्ञात्वा महाप्राज्ञ स तेषामौर्ध्वदैहिकम् । कर्तुमर्हति तेनैव फलं प्राप्स्यति वै भवान् ॥ ) राजन्! महाप्राज्ञ! सूक्ष्मदर्शी ज्ञानी पुरुष सनातन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं, ऐसा जानकर आप अपने मरे हुए सगे- सम्बन्धियोंका और्ध्वदैहिक संस्कार कीजिये । इसीसे आपको उत्तम