04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 3131–3140
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 3131–3140
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फलकी प्राप्ति होगी ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं । ) OF FUTE
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अष्टमोऽध्यायः व्यासजीका संहारको अवश्यम्भावी बताकर धृतराष्ट्रको समझाना वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य तु तद् वाक्यं निशम्य कुरुसत्तमः ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तः पपात भुवि मूर्च्छितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! विदुरजीके ये वचन सुनकर कुरुश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्र पुत्रशोकसे संतप्त एवं मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १ ॥
तं तथा पतितं भूमौ निःसंज्ञं प्रेक्ष्य बान्धवाः ।
कृष्णद्वैपायनश्चैव क्षत्ता च विदुरस्तथा ॥ २ ॥
संजयः सुहृदश्चान्ये द्वाःस्था ये चास्य सम्मताः ।
जलेन सुखशीतेन तालवृन्तैश्च भारत ॥ ३ ॥
पस्पृशुश्च करैर्गात्रं वीजमानाश्च यत्नतः ।
अन्वासन् सुचिरं कालं धृतराष्ट्रं तथागतम् ॥ ४ ॥
उन्हें इस प्रकार अचेत होकर भूमिपर गिरा देख सभी भाई-बन्धु, व्यासजी, विदुर, संजय, सुहृद्गण तथा जो विश्वसनीय द्वारपाल थे, वे सभी शीतल जलके छींटे देकर ताड़के पंखोंसे हवा करने और उनके शरीरपर हाथ फेरने लगे । उस बेहोशीकी अवस्थामें वे बड़े यत्नके साथ धृतराष्ट्रको होशमें लानेके लिये देरतक आवश्यक उपचार करते रहे ॥ २– ४ ॥
अथ दीर्घस्य कालस्य लब्धसंज्ञो महीपतिः ।
विललाप चिरं कालं पुत्राधिभिरभिप्लुतः ॥ ५ ॥
तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् राजा धृतराष्ट्रको चेत हुआ और वे पुत्रोंकी चिन्तामें डूबकर बड़ी देरतक विलाप करते रहे ॥ ५ ॥
धिगस्तु खलु मानुष्यं मानुषेषु परिग्रहे ।
यतो मूलानि दुःखानि सम्भवन्ति मुहुर्मुहुः ॥ ६ ॥
वे बोले — ‘ इस मनुष्यजन्मको धिक्कार है! इसमें भी विवाह आदि करके परिवार बढ़ाना तो और भी बुरा है; क्योंकि उसीके कारण बारंबार नाना प्रकारके दुःख प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥
पुत्रनाशेऽर्थनाशे च ज्ञातिसम्बन्धिनामथ ।
प्राप्यते सुमहद् दुःखं विषाग्निप्रतिमं विभो ॥ ७ ॥
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'प्रभो! पुत्र, धन, कुटुम्ब और सम्बन्धियोंका नाश होनेपर तो विष पीने और आगमें चलनेके समान बड़ा भारी दुःख भोगना पड़ता है ॥ ७ ॥
येन ह्यन्ति गात्राणि येन प्रज्ञा विनश्यति ।
येनाभिभूतः पुरुषो मरणं बहु मन्यते ॥ ८ ॥
‘ उस दुःखसे सारा शरीर जलने लगता है, बुद्धि नष्ट हो जाती है और उस असह्य शोकसे पीड़ित हुआ पुरुष जीनेकी अपेक्षा मर जाना अधिक अच्छा समझता है ॥
तदिदं व्यसनं प्राप्तं मया भाग्यविपर्ययात् ।
तस्यान्तं नाधिगच्छामि ऋते प्राणविमोक्षणात् ॥ ९ ॥
‘ आज भाग्यके फेरसे वही यह स्वजनोंके विनाशका महान् दुःख मुझे प्राप्त हुआ है । अब प्राण त्याग देनेके सिवा और किसी उपायद्वारा मैं इस दुःखसे पार नहीं पा सकता ॥ ९ ॥
तथैवाहं करिष्यामि अद्यैव द्विजसत्तम ।
इत्युक्त्वा तु महात्मानं पितरं ब्रह्मवित्तमम् ॥ १० ॥
धृतराष्ट्रोऽभवन्मूढः स शोकं परमं गतः ।
अभूच्च तूष्णीं राजासौ ध्यायमानो महीपते ॥ ११ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! इसलिये आज ही मैं अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा । ' अपने ब्रह्मवेत्ता पिता महात्मा व्यासजीसे ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र अत्यन्त शोकमें डूब गये और सुध- बुध खो बैठे । राजन्! पुत्रोंका ही चिन्तन करते हुए वे बूढ़े नरेश वहाँ मौन होकर बैठे रह गये ॥ १०-११ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तं पुत्रं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥
उनकी बात सुनकर शक्तिशाली महात्मा श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास पुत्रशोकसे संतप्त हुए अपने बेटेसे इस प्रकार बोले-- ॥ १२ ॥
व्यास उवाच
धृतराष्ट्र महाबाहो यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ।
श्रुतवानसि मेधावी धर्मार्थकुशलः प्रभो ॥ १३ ॥
व्यासजीने कहा – महाबाहु धृतराष्ट्र! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो । प्रभो! तुम वेदशास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न, मेधावी तथा धर्म और अर्थके साधनमें कुशल हो ॥ १३ ॥
न तेऽस्त्यविदितं किंचिद् वेदितव्यं परंतप ।
अनित्यतां हि मर्त्यानां विजानासि न संशयः ॥ १४ ॥
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शत्रुसंतापी नरेश! जाननेयोग्य जो कोई भी तत्त्व है, वह तुमसे अज्ञात नहीं है । तुम मानव- जीवनकी अनित्यताको अच्छी तरह जानते हो, इसमें संशय नहीं है ॥ १४ ॥
अध्रुवे जीवलोके च स्थाने वा शाश्वते सति ।
जीविते मरणान्ते च कस्माच्छोचसि भारत ॥ १५ ॥
भरतनन्दन! जब जीव जगत् अनित्य है, सनातन परम पद नित्य है और इस जीवनका अन्त मृत्युमें ही है, तब तुम इसके लिये शोक क्यों करते हो? ॥ १५ ॥
प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र वैरस्यास्य समुद्भवः ।
पुत्रं ते कारणं कृत्वा कालयोगेन कारितः ॥ १६ ॥
राजेन्द्र! तुम्हारे पुत्रको निमित्त बनाकर कालकी प्रेरणासे इस वैरकी उत्पत्ति तो तुम्हारे सामने ही हुई थी ॥
अवश्यं भवितव्ये च कुरूणां वैशसे नृप ।
कस्माच्छोचसि तान् शूरान् गतान् परमिकां गतिम् ॥ १७ ॥
नरेश्वर! जब कौरवोंका यह विनाश अवश्यम्भावी था, तब परम गतिको प्राप्त हुए शूरवीरोंके लिये तुम क्यों शोक कर रहे हो? ॥ १७ ॥
जानता च महाबाहो विदुरेण महात्मना ।
यतितं सर्वयत्नेन शमं प्रति जनेश्वर ॥ १८ ॥
महाबाहु नरेश्वर! महात्मा विदुर इस भावी परिणामको जानते थे, इसीलिये इन्होंने सारी शक्ति लगाकर संधिके लिये प्रयत्न किया था ॥ १८ ॥
न च दैवकृतो मार्गः शक्यो भूतेन केनचित् ।
घटतापि चिरं कालं नियन्तुमिति मे मतिः ॥ १ ९ ॥
मेरा तो ऐसा विश्वास है कि दीर्घ कालतक प्रयत्न करके भी कोई प्राणी दैवके विधानको रोक नहीं सकता ॥
देवतानां हि यत् कार्यं मया प्रत्यक्षतः श्रुतम् ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथा स्थैर्यं भवेत् तव ॥ २० ॥
देवताओंका जो कार्य मैंने प्रत्यक्ष अपने कानोंसे सुना है, वह तुम्हें बता रहा हूँ, जिससे तुम्हारा मन स्थिर हो सके ॥ २० ॥
पुराहं त्वरितो यातः सभामैन्द्रीं जितक्लमः ।
अपश्यं तत्र च तदा समवेतान् दिवौकसः ॥ २१ ॥
पूर्वकालकी बात है, एक बार मैं यहाँसे शीघ्रतापूर्वक इन्द्रकी सभामें गया । वहाँ जानेपर भी मुझे कोई थकावट नहीं हुई; क्योंकि मैं इन सबपर विजय पा चुका हूँ । वहाँ उस समय मैंने देखा कि इन्द्रकी सभामें सम्पूर्ण देवता एकत्र हुए हैं ॥ २१ ॥
नारदप्रमुखाश्चापि सर्वे देवर्षयोऽनघ ।
तत्र चापि मया दृष्टा पृथिवी पृथिवीपते ॥ २२ ॥
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कार्यार्थमुपसम्प्राप्ता देवतानां समीपतः । अनघ! वहाँ नारद आदि समस्त देवर्षि भी उपस्थित थे । पृथ्वीनाथ! मैंने वहीं इस पृथ्वीको भी देखा, जो किसी कार्यके लिये देवताओंके पास गयी थी ॥ २२ ॥
उपगम्य तदा धात्री देवानाह समागतान् ॥ २३ ॥
यत् कार्यं मम युष्माभिर्ब्रह्मणः सदने तदा ।
प्रतिज्ञातं महाभागास्तच्छीघ्रं संविधीयताम् ॥ २४ ॥
उस समय विश्वधारिणी पृथ्वीने वहाँ एकत्र हुए देवताओंके पास जाकर कहा —'महाभाग देवताओ! आपलोगोंने उस दिन ब्रह्माजीकी सभामें मेरे जिस कार्यको सिद्ध करनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसे शीघ्र पूर्ण कीजिये ' ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा विष्णुर्लोकनमस्कृतः ।
उवाच वाक्यं प्रहसन् पृथिवीं देवसंसदि ॥ २५ ॥
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां यस्तु ज्येष्ठः शतस्य वै ।
दुर्योधन इति ख्यातः स ते कार्यं करिष्यति ॥ २६ ॥
तं च प्राप्य महीपालं कृतकृत्या भविष्यसि । उसकी बात सुनकर विश्ववन्दित भगवान् विष्णुने देवसभामें पृथ्वीकी ओर देखकर हँसते हुए कहा — ' शुभे! धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंमें जो सबसे बड़ा और दुर्योधननामसे विख्यात है, वही तेरा कार्य सिद्ध करेगा । उसे राजाके रूपमें पाकर तू कृतार्थ हो जायगी ॥ २५-२६ तस्यार्थे पृथिवीपालाः कुरुक्षेत्रं समागताः ॥ २७ ॥
अन्योन्यं घातयिष्यन्ति दृढैः शस्त्रैः प्रहारिणः । ‘ उसके लिये सारे भूपाल कुरुक्षेत्रमें एकत्र होंगे और सुदृढ़ शस्त्रोंद्वारा परस्पर प्रहार करके एक - दूसरेका वध कर डालेंगे ॥ २७ ॥
ततस्ते भविता देवि भारस्य युधि नाशनम् ॥ २८ ॥
गच्छ शीघ्रं स्वकं स्थानं लोकान् धारय शोभने । ‘ देवि! इस प्रकार उस युद्धमें तेरे भारका नाश हो जायगा । शोभने! अब तू शीघ्र अपने स्थानपर जा और समस्त लोकोंको पूर्ववत् धारण कर' ॥ २८३ ॥
य एष ते सुतो राजन् लोकसंहारकारणात् ॥ २ ९ ॥ कलेरंशः समुत्पन्नो गान्धार्या जठरे नृप अमर्षी चपलश्चापि क्रोधनो दुष्प्रसाधनः ॥ ३० ॥
राजन्! नरेश्वर! यह जो तुम्हारा पुत्र दुर्योधन था, वह सारे जगत्का संहार करनेके लिये कलिका मूर्तिमान् अंश ही गान्धारीके पेटसे पैदा हुआ था । वह अमर्षशील, क्रोधी, चंचल और कूटनीतिसे काम लेनेवाला था ॥ दैवयोगात् समुत्पन्ना भ्रातरश्चास्य तादृशाः ।
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शकुनिर्मातुलश्चैव कर्णश्च परमः सखा ॥ ३१ ॥
दैवयोगसे उसके भाई भी वैसे ही उत्पन्न हुए । मामा शकुनि और परम मित्र कर्ण भी उसी विचारके मिल गये ॥
समुत्पन्ना विनाशार्थं पृथिव्यां सहिता नृपाः ।
यादृशो जायते राजा तादृशोऽस्य जनो भवेत् ॥ ३२ ॥
ये सब नरेश शत्रुओंका विनाश करनेके लिये ही एक साथ इस भूमण्डलपर उत्पन्न हुए थे । जैसा राजा होता है, वैसे ही उसके स्वजन और सेवक भी होते हैं ॥ ३२ ॥
अधर्मो धर्मतां याति स्वामी चेद् धार्मिको भवेत् ।
स्वामिनो गुणदोषाभ्यां भृत्याः स्युर्नात्र संशयः ॥ ३३ ॥
यदि स्वामी धार्मिक हो तो अधर्मी सेवक भी धार्मिक बन जाते हैं । सेवक स्वामीके ही गुण- दोषोंसे युक्त होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ३३ ॥
दुष्टं राजानमासाद्य गतास्ते तनया नृप ।
एतमर्थं महाबाहो नारदो वेद तत्त्ववित् ॥ ३४ ॥
महाबाहु नरेश्वर! दुष्ट राजाको पाकर तुम्हारे सभी पुत्र उसीके साथ नष्ट हो गये । इस बातको तत्त्ववेत्ता नारदजी जानते हैं ॥ ३४ ॥
आत्मापराधात् पुत्रास्ते विनष्टाः पृथिवीपते ।
मा तान् शोचस्व राजेन्द्र न हि शोकेऽस्ति कारणम् ॥ ३५ ॥
पृथ्वीनाथ! आपके पुत्र अपने ही अपराधसे विनाशको प्राप्त हुए हैं। राजेन्द्र! उनके लिये शोक न करो; क्योंकि शोकके लिये कोई उपयुक्त कारण नहीं है ॥ ३५ ॥
न हि ते पाण्डवाः स्वल्पमपराध्यन्ति भारत ।
पुत्रास्तव दुरात्मानो यैरियं घातिता मही ॥ ३६ ॥
भारत! पाण्डवोंने तुम्हारा थोड़ा- सा भी अपराध नहीं किया है । तुम्हारे पुत्र ही दुष्ट थे, जिन्होंने इस भूमण्डलका नाश करा दिया ॥ ३६ ॥
नारदेन च भद्रं ते पूर्वमेव न संशयः ।
युधिष्ठिरस्य समितौ राजसूये निवेदितम् ॥ ३७ ॥
पाण्डवाः कौरवाः सर्वे समासाद्य परस्परम् ।
न भविष्यन्ति कौन्तेय यत् ते कृत्यं तदाचर ॥ ३८ ॥
राजन्! तुम्हारा कल्याण हो । राजसूय यज्ञके समय देवर्षि नारदने राजा युधिष्ठिरकी सभामें निःसंदेह पहले ही यह बात बता दी थी कि कौरव और पाण्डव सभी आपसमें लड़कर नष्ट हो जायँगे; अतः कुन्तीनन्दन! तुम्हारे लिये जो आवश्यक कर्तव्य हो, उसे करो ॥
नारदस्य वचः श्रुत्वा तदाशोचन्त पाण्डवाः ।
एवं ते सर्वमाख्यातं देवगुह्यं सनातनम् ॥ ३ ९ ॥
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कथं ते शोकनाशः स्यात् प्राणेषु च दया प्रभो ।
स्नेहश्च पाण्डुपुत्रेषु ज्ञात्वा दैवकृतं विधिम् ॥ ४० ॥
प्रभो! नारदजीकी वह बात सुनकर उस समय पाण्डव बहुत चिन्तित हो गये थे । इस प्रकार मैंने तुमसे देवताओंका यह सारा सनातन रहस्य बताया है, जिससे किसी तरह तुम्हारे शोकका नाश हो । तुम अपने प्राणोंपर दया कर सको और देवताओंका विधान समझकर पाण्डुके पुत्रोंपर भी तुम्हारा स्नेह बना रहे ॥ ३ ९ -४० ॥
एष चार्थो महाबाहो पूर्वमेव मया श्रुतः ।
कथितो धर्मराजस्य राजसूये क्रतूत्तमे ॥ ४१ ॥
महाबाहो! यह बात मैंने बहुत पहले ही सुन रखी थी और क्रतुश्रेष्ठ राजसूयमें धर्मराज युधिष्ठिरको बता भी दी थी ॥ ४१ ॥
यतितं धर्मपुत्रेण मया गुह्ये निवेदिते ।
अविग्रहे कौरवाणां दैवं तु बलवत्तरम् ॥ ४२ ॥
मेरे द्वारा उस गुप्त रहस्यके बता दिये जानेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने बहुत प्रयत्न किया कि कौरवोंमें परस्पर कलह न हो; परंतु दैवका विधान बड़ा प्रबल होता है ॥
अनतिक्रमणीयो हि विधी राजन् कथंचन ।
कृतान्तस्य तु भूतेन स्थावरेण चरेण च ॥ ४३ ॥
राजन्! दैव अथवा कालके विधानको चराचर प्राणियोंमें से कोई भी किसी तरह लाँघ नहीं सकता ॥ ४३ ॥
भवान् धर्मपरो यत्र बुद्धिश्रेष्ठश्च भारत ।
मुह्यते प्राणिनां ज्ञात्वा गतिं चागतिमेव च ॥ ४४ ॥
भरतनन्दन! तुम धर्मपरायण और बुद्धिमें श्रेष्ठ हो । तुम्हें प्राणियोंके आवागमनका रहस्य भी ज्ञात है, तो भी क्यों मोहके वशीभूत हो रहे हो? ॥ ४४ ॥
त्वां तु शोकेन संतप्तं मुह्यमानं मुहुर्मुहुः ।
ज्ञात्वा युधिष्ठिरो राजा प्राणानपि परित्यजेत् ॥ ४५ ॥
तुम्हें बारंबार शोकसे संतप्त और मोहित होते जानकर राजा युधिष्ठिर अपने प्राणोंका भी परित्याग कर देंगे ॥
कृपालुर्नित्यशो वीरस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि ।
स कथं त्वयि राजेन्द्र कृपां नैव करिष्यति ॥ ४६ ॥
राजेन्द्र! वीर युधिष्ठिर पशु- पक्षी आदि योनिके प्राणियोंपर भी सदा दयाभाव बनाये रखते हैं; फिर तुमपर वे कैसे दया नहीं करेंगे? ॥ ४६ ॥
मम चैव नियोगेन विधेश्चाप्यनिवर्तनात् ।
पाण्डवानां च कारुण्यात् प्राणान् धारय भारत ॥ ४७ ॥
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अतः भारत! मेरी आज्ञा मानकर, विधाताका विधान टल नहीं सकता, ऐसा समझकर तथा पाण्डवोंपर करुणा करके तुम अपने प्राण धारण करो ॥ ४७ ॥
एवं ते वर्तमानस्य लोके कीर्तिर्भविष्यति ।
धर्मार्थः सुमहांस्तात तप्तं स्याच्च तपश्चिरात् ॥ ४८ ॥
तात! ऐसा बर्ताव करनेसे संसारमें तुम्हारी कीर्ति बढ़ेगी, महान् धर्म और अर्थकी सिद्धि होगी तथा दीर्घ कालतक तपस्या करनेका तुम्हें फल प्राप्त होगा ॥ ४८ ॥
पुत्रशोकं समुत्पन्नं हुताशं ज्वलितं यथा ।
प्रज्ञाम्भसा महाभाग निर्वापय सदा सदा ॥ ४ ९ ॥
महाभाग! प्रज्वलित आगके समान जो तुम्हें यह पुत्रशोक प्राप्त हुआ है, इसे विचाररूपी जलके द्वारा सदाके लिये बुझा दो ॥ ४ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा तस्य वचनं व्यासस्यामिततेजसः ।
मुहूर्तं समनुध्यायन् धृतराष्ट्रोऽभ्यभाषत ॥ ५० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! अमित तेजस्वी व्यासजीका यह वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र दो घड़ीतक कुछ सोच - विचार करते रहे; फिर इस प्रकार बोले— ॥ ५० ॥
महता शोकजालेन प्रणुन्नोऽस्मि द्विजोत्तम ।
नात्मानमवबुध्यामि मुह्यमानो मुहुर्मुहुः ॥ ५१ ॥
‘विप्रवर! मुझे महान् शोकजालने सब ओरसे जकड़ रखा है । मैं अपने - आपको ही नहीं समझ पा रहा हूँ। मुझे बारंबार मूर्च्छा आ जाती है ॥ ५१ ॥
इदं तु वचनं श्रुत्वा तव देवनियोगजम् ।
धारयिष्याम्यहं प्राणान् घटिष्ये न तु शोचितुम् ॥ ५२ ॥
‘ अब आपका यह वचन सुनकर कि सब कुछ देवताओंकी प्रेरणासे हुआ है, मैं अपने प्राण धारण करूँगा और यथाशक्ति इस बातके लिये भी प्रयत्न करूँगा कि मुझे शोक न हो' ॥ ५२ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यासः सत्यवतीसुतः ।
धृतराष्ट्रस्य राजेन्द्र तत्रैवान्तरधीयत ॥ ५३ ॥
राजेन्द्र! धृतराष्ट्रका यह वचन सुनकर सत्यवतीनन्दन व्यास वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
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नवमोऽध्यायः धृतराष्ट्रका शोकातुर हो जाना और विदुरजीका उन्हें पुनः शोकनिवारणके लिये उपदेश जनमेजय उवाच
गते भगवति व्यासे धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
किमचेष्टत विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा – विप्रर्षे! भगवान् व्यासके चले जानेपर राजा धृतराष्ट्रने क्या किया? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
तथैव कौरवो राजा धर्मपुत्रो महामनाः ।
कृपप्रभृतयश्चैव किमकुर्वत ते त्रयः ॥ २ ॥
इसी प्रकार कुरुवंशी राजा महामनस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने तथा कृप आदि तीनों महारथियोंने क्या किया? ॥
अश्वत्थाम्नः श्रुतं कर्म शापश्चान्योन्यकारितः ।
वृत्तान्तमुत्तरं ब्रूहि यदभाषत संजयः ॥ ३ ॥
अश्वत्थामाका कर्म तो मैंने सुन लिया, परस्पर जो शाप दिये गये, उनका हाल भी मालूम हो गया । अब आगेका वृत्तान्त बताइये, जिसे संजयने धृतराष्ट्रको सुनाया हो ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
हते दुर्योधने चैव हते सैन्ये च सर्वशः ।
संजयो विगतप्रज्ञो धृतराष्ट्रमुपस्थितः ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! दुर्योधन तथा उसकी सारी सेनाओंके मारे जानेपर संजयकी दिव्य दृष्टि चली गयी और वह धृतराष्ट्रकी सभामें उपस्थित हुआ ॥ ४ ॥
संजय उवाच
आगम्य नानादेशेभ्यो नानाजनपदेश्वराः ।
पितृलोकं गता राजन् सर्वे तव सुतैः सह ॥ ५ ॥
संजय बोला – राजन्! नाना जनपदोंके स्वामी विभिन्न देशोंसे आकर सब-ब-के - सब आपके पुत्रोंके साथ पितृलोकके पथिक बन गये ॥ ५ ॥
याच्यमानेन सततं तव पुत्रेण भारत ।
घातिता पृथिवी सर्वा वैरस्यान्तं विधित्सता ॥ ६ ॥
भारत! आपके पुत्रसे सब लोगोंने सदा शान्तिके लिये याचना की, तो भी उसने वैरका अन्त करनेकी इच्छासे सारे भूमण्डलका विनाश करा दिया ॥ ६ ॥