श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 3171–3180

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 3171–3180

पृष्ठ 3171

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 3171 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

समझती हूँ, समयके उलट - फेरसे प्रेरित होकर यह सम्पूर्ण जगत्का विनाश हुआ है, जो स्वभावसे ही रोमांचकारी है । यह काण्ड अवश्यम्भावी था, इसीलिये प्राप्त हुआ है । जब संधि करानेके विषयमें श्रीकृष्णकी अनुनय- विनय सफल नहीं हुई, उस समय परम बुद्धिमान् विदुरजीने जो महत्त्वपूर्ण बात कही थी, उसीके अनुसार यह सब कुछ सामने आया है ॥ ४०–४२३ ॥ तस्मिन्नपरिहार्येऽर्थे व्यतीते च विशेषतः ॥ ४३ ॥

मा शुचो न हि शोच्यास्ते संग्रामे निधनं गताः ।

यथैवाहं तथैव त्वं को नावाश्वासयिष्यति ।

ममैव ह्यपराधेन कुलमग्रयं विनाशितम् ॥ ४४ ॥

' जब यह विनाश किसी तरह टल नहीं सकता था, विशेषतः जब सब कुछ होकर समाप्त हो गया, तो अब तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये । वे सभी वीर संग्राममें मारे गये हैं, अतः शोक करनेके योग्य नहीं हैं । आज जैसी मैं हूँ, वैसी ही तुम भी हो । हम दोनोंको कौन धीरज बँधायेगा? मेरे ही अपराधसे इस श्रेष्ठ कुलका संहार हुआ है' ॥ ४३-४४ ॥ इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि पृथापुत्रदर्शने पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें कुन्तीको अपने पुत्रोंका दर्शनविषयक पंद्रहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

CORPO

पृष्ठ 3172

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 3172 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

(स्त्रीविलापपर्व) षोडशोऽध्यायः वेदव्यासजीके वरदानसे दिव्य दृष्टिसम्पन्न हुई गान्धारीका युद्धस्थलमें मारे गये योद्धाओं तथा रोती हुई बहुओंको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तु गान्धारी कुरूणामवकर्तनम् ।

अपश्यत्तत्र तिष्ठन्ती सर्वं दिव्येन चक्षुषा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर गान्धारी देवीने वहीं खड़ी रहकर अपनी दिव्य दृष्टिसे कौरवोंका वह सारा विनाशस्थल देखा ॥ १ ॥

पतिव्रता महाभागा समानव्रतचारिणी ।

उग्रेण तपसा युक्ता सततं सत्यवादिनी ॥ २ ॥

गान्धारी बड़ी ही पतिव्रता, परम सौभाग्यवती, पतिके समान व्रतका पालन करनेवाली, उग्र तपस्यासे युक्त तथा सदा सत्य बोलनेवाली थीं ॥ २ ॥

वरदानेन कृष्णस्य महर्षेः पुण्यकर्मणः ।

दिव्यज्ञानबलोपेता विविधं पर्यदेवयत् ॥ ३ ॥

पुण्यात्मा महर्षि व्यासके वरदानसे वे दिव्य ज्ञान-बलसे सम्पन्न हो गयी थीं; अतः रणभूमिका दृश्य देखकर अनेक प्रकारसे विलाप करने लगीं ॥ ३ ॥

ददर्श सा बुद्धिमती दूरादपि यथान्तिके ।

रणाजिरं नृवीराणामद्भुतं लोमहर्षणम् ॥ ४ ॥

बुद्धिमती गान्धारीने नरवीरोंके उस अद्भुत एवं रोमांचकारी समरांगणको दूरसे भी उसी तरह देखा, जैसे निकटसे देखा जाता है ॥ ४ ॥

अस्थिकेशवसाकीर्णं शोणितौघपरिप्लुतम् ।

शरीरैर्बहुसाहस्रैर्विनिकीर्णं समन्ततः ॥ ५ ॥

वह रणक्षेत्र हड्डियों, केशों और चर्बियोंसे भरा था, रक्तके प्रवाहसे आप्लावित हो रहा था, कई हजार लाशें वहाँ चारों ओर बिखरी हुई थीं ॥ ५ ॥

गजाश्वरथयो धानामावृतं रुधिराविलैः ।

शरीरैरशिरस्कैश्च विदेहैश्च शिरोगणैः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 3173

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 3173 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

हाथीसवार, घुड़सवार तथा रथी योद्धाओंके रक्तसे मलिन हुए बिना सिरके अगणित हुए थेधड़ और बिना धड़के असंख्य मस्तक उस रणभूमिको ढँके ॥ ६ ॥ गजाश्वनरनारीणां निःस्वनैरभिसंवृतम् ।

शृगालबककाकोलकङ्ककाकनिषेवितम् ॥ ७ ॥

हाथियों, घोड़ों, मनुष्यों और स्त्रियोंके आर्तनादसे वह सारा युद्धस्थल गूँज रहा था । सियार, बगुले, काले कौए, कंक और काक उस भूमिका सेवन करते थे ॥ ७ ॥

रक्षसां पुरुषादानां मोदनं कुरराकुलम् ।

अशिवाभिः शिवाभिश्च नादितं गृध्रसेवितम् ॥ ८ ॥

वह स्थान नरभक्षी राक्षसोंको आनन्द दे रहा था । वहाँ सब ओर कुरर पक्षी छा रहे थे ।

अमंगलमयी गीदड़ियाँ अपनी बोली बोल रही थीं, गीध सब ओर बैठे हुए थे ॥

ततो व्यासाभ्यनुज्ञातो धृतराष्ट्रो महीपतिः ।

पाण्डुपुत्राश्च'तेते सर्वे युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥ ९ ॥

उस समय भगवान् व्यासकी आज्ञा पाकर राजा धृतराष्ट्र तथा युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डव रणभूमिकी ओर चले ॥ ९ ॥

वासुदेवं पुरस्कृत्य हतबन्धुं च पार्थिवम् ।

कुरुस्त्रियः समासाद्य जग्मुरायोधनं प्रति ॥ १० ॥

जिनके बन्धु - बान्धव मारे गये थे, उन राजा धृतराष्ट्र तथा भगवान् श्रीकृष्णको आगे करके कुरुकुलकी स्त्रियोंको साथ ले वे सब लोग युद्धस्थलमें गये ॥ १० ॥

समासाद्य कुरुक्षेत्रं ताः स्त्रियो निहतेश्वराः ।

अपश्यन्त हतांस्तत्र पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄन् पतीन् ॥ ११ ॥

क्रव्यादैर्भक्ष्यमाणान् वै गोमायुबलवायसैः ।

भूतैः पिशाचै रक्षोभिर्विविधैश्च निशाचरैः ॥ १२ ॥

कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर उन अनाथ स्त्रियोंने वहाँ मारे गये अपने पुत्रों, भाइयों, पिताओं तथा पतियोंके शरीरोंको देखा, जिन्हें मांसभक्षी जीव-जन्तु, गीदड़समूह, कौए, भूत, पिशाच, राक्षस और नाना प्रकारके निशाचर नोच - नोचकर खा रहे थे ॥ ११-१२ ॥

रुद्राक्रीडनिभं दृष्ट्वा तदा विशसनं स्त्रियः ।

महार्हेभ्योऽथ यानेभ्यो विक्रोशन्त्यो निपेतिरे ॥ १३ ॥

रुद्रकी क्रीडास्थलीके समान उस रणभूमिको देखकर वे स्त्रियाँ अपने बहुमूल्य रथोंसे क्रन्दन करती हुई नीचे गिर पड़ीं ॥ १३ ॥

अदृष्टपूर्वं पश्यन्त्यो दुःखार्ता भरतस्त्रियः ।

शरीरेष्वस्खलन्नन्याः पतन्त्यश्चापरा भुवि ॥ १४ ॥

जिसे कभी देखा नहीं था, उस अद्भुत रणक्षेत्रको देखकर भरतकुलकी कुछ स्त्रियाँ दुःखसे आतुर हो लाशोंपर गिर पड़ीं और दूसरी बहुत- सी स्त्रियाँ धरतीपर गिर

पृष्ठ 3174

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 3174 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गयीं ॥ १४ ॥

श्रान्तानां चाप्यनाथानां नासीत् काचन चेतना ।

पाञ्चालकुरुयोषाणां कृपणं तदभून्महत् ॥ १५ ॥

उन थकी - माँदी और अनाथ हुई पांचालों तथा कौरवोंकी स्त्रियोंको वहाँ चेत नहीं रह गया था । उन सबकी बड़ी दयनीय दशा हो गयी थी ॥ १५ ॥

दुःखोपहतचित्ताभिः समन्तादनुनादितम् ।

दृष्ट्वाऽऽयोधनमत्युग्रं धर्मज्ञा सुबलात्मजा ॥ १६ ॥

ततः सा पुण्डरीकाक्षमामन्त्र्य पुरुषोत्तमम् ।

कुरूणां वैशसं दृष्ट्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥

दुःखसे व्याकुलचित्त हुई युवतियोंके करुण-क्रन्दनसे वह अत्यन्त भयंकर युद्धस्थल सब ओरसे गूँज उठा । यह देखकर धर्मको जाननेवाली सुबलपुत्री गान्धारीने कमलनयन श्रीकृष्णको सम्बोधित करके कौरवोंके उस विनाशपर दृष्टिपात करते हुए कहा — ॥ १६-१७ ॥

पश्यैताः पुण्डरीकाक्ष स्नुषा मे निहतेश्वराः ।

प्रकीर्णकेशाः क्रोशन्तीः कुररीरिव माधव ॥ १८ ॥

‘ कमलनयन माधव! मेरी इन विधवा पुत्रवधुओंकी ओर देखो, जो केश बिखराये कुररीकी भाँति विलाप कर रही हैं ॥ १८ ॥

अमूस्त्वभिसमागम्य स्मरन्त्यो भर्तृजान् गुणान् ।

पृथगेवाभ्यधावन्त्यः पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄन् पतीन् ॥ १ ९ ॥

‘ वे अपने पतियोंके गुणोंका स्मरण करती हुई उनकी लाशोंके पास जा रही हैं और पतियों, भाइयों, पिताओं तथा पुत्रोंके शरीरोंकी ओर पृथक् - पृथक् दौड़ रही हैं ॥ १ ९ ॥

वीरसूभिर्महाराज हतपुत्राभिरावृतम् ।

क्वचिच्च वीरपत्नीभिर्हतवीराभिरावृतम् ॥ २० ॥

'महाराज! कहीं तो जिनके पुत्र मारे गये हैं उन वीरप्रसविनी माताओंसे और कहीं जिनके पति वीरगतिको प्राप्त हो गये हैं, उन वीरपत्नियोंसे यह युद्धस्थल घिर गया है ॥ २० ॥

शोभितं पुरुषव्याघ्रैः कर्णभीष्माभिमन्युभिः ।

द्रोणद्रुपदशल्यैश्च ज्वलद्भिरिव पावकैः ॥ २१ ॥

‘ पुरुषसिंह कर्ण, भीष्म, अभिमन्यु, द्रोण, द्रुपद और शल्य-जैसे वीरोंसे, जो प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी थे, यह रणभूमि सुशोभित है ॥ २१ ॥

काञ्चनैः कवचैर्निष्कैर्मणिभिश्च महात्मनाम् ।

अङ्गदैर्हस्तकेयूरैः स्रग्भिश्च समलङ्कृतम् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 3175

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 3175 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' उन महामनस्वी वीरोंके सुवर्णमय कवचों, निष्कों, मणियों, अंगदों, केयूरों और हारोंसे समरांगण विभूषित दिखायी देता है ॥ २२ ॥

वीरबाहुविसृष्टाभिः शक्तिभिः परिघैरपि ।

खड्गैश्च विविधैस्तीक्ष्णैः सशरैश्च शरासनैः ॥ २३ ॥

क्रव्यादसंघैर्मुदितैस्तिष्ठद्भिः सहितैः क्वचित् ।

क्वचिदाक्रीडमानैश्च शयानैश्चापरैः क्वचित् ॥ २४ ॥

एतदेवंविधं वीर सम्पश्यायोधनं विभो ।

पश्यमाना हि दह्यामि शोकेनाहं जनार्दन ॥ २५ ॥

‘ कहीं वीरोंकी भुजाओंसे छोड़ी गयी शक्तियाँ पड़ी हैं, कहीं परिघ, नाना प्रकारके तीखे खड्ग और बाणसहित घनुष गिरे हुए हैं। कहीं झुंड के झुंड मांसभक्षी जीव-जन्तु आनन्दमग्न होकर एक साथ खड़े हैं, कहीं वे खेल रहे हैं और कहीं दूसरे - दूसरे जन्तु सोये पड़े हैं । वीर! प्रभो! इस प्रकार इन सबसे भरे हुए युद्धस्थलको देखो । जनार्दन! मैं तो इसे देखकर शोकसे दग्ध हुई जाती हूँ ॥ २३–२५ ॥

पञ्चालानां कुरूणां च विनाशे मधुसूदन ।

पञ्चानामपि भूतानामहं वधमचिन्तयम् ॥ २६ ॥

‘ मधुसूदन! इन पांचाल और कौरववीरोंके मारे जानेसे तो मेरे मनमें यह धारणा हो रही कि पाँचों भूतोंका ही विनाश हो गया ॥ २६ ॥

तान् सुपर्णाश्च गृध्राश्च कर्षयन्त्यसृगुक्षिताः ।

विगृह्य चरणैर्गृध्रा भक्षयन्ति सहस्रशः ॥ २७ ॥

‘ उन वीरोंको खूनसे भीगे हुए गरुड़ और गीध इधर- उधर खींच रहे हैं । सहस्रों गीध उनके पैर पकड़ - पकड़कर खा रहे हैं ॥ २७ ॥

जयद्रथस्य कर्णस्य तथैव द्रोणभीष्मयोः ।

अभिमन्योर्विनाशं च कश्चिन्तयितुमर्हति ॥ २८ ॥

'इस युद्धमें जयद्रथ, कर्ण, द्रोणाचार्य, भीष्म और अभिमन्यु -जैसे वीरोंका विनाश हो जायगा, यह कौन सोच सकता था? ॥ २८ ॥

अवध्यकल्पान् निहतान् गतसत्त्वानचेतसः ।

गृध्रकङ्कवटश्येनश्वशृगालादनीकृतान् ॥ २ ९ ॥

‘ जो अवध्य समझे जाते थे, वे भी मारे गये और अचेत एवं प्राणशून्य होकर यहाँ पड़े हैं । गीध, कंक, बटेर, बाज, कुत्ते और सियार उन्हें अपना आहार बना रहे हैं ॥ २ ९ ॥

अमर्षवशमापन्नान् दुर्योधनवशे स्थितान् ।

पश्येमान् पुरुषव्याघ्रान् संशान्तान् पावकानिव ॥ ३० ॥

‘ दुर्योधनके अधीन रहकर अमर्षके वशीभूत हो ये पुरुषसिंह वीरगण बुझी हुई आगके

समान शान्त हो गये हैं । इनकी ओर दृष्टिपात तो करो ॥ ३० ॥

पृष्ठ 3176

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 3176 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शयाना ये पुरा सर्वे मृदूनि शयनानि च ।

विपन्नास्तेऽद्य वसुधां विवृतामधिशेरते ॥ ३१ ॥

‘ जो लोग पहले कोमल बिछौनोंपर सोया करते थे, वे सभी आज मरकर नंगी भूमिपर सो रहे हैं ॥ ३१ ॥

बन्दिभिः सततं काले स्तुवद्भिरभिनन्दिताः ।

शिवानामशिवा घोराः शृण्वन्ति विविधा गिरः ॥ ३२ ॥

' जिन्हें सदा ही समय - समयपर स्तुति करनेवाले बन्दीजन अपने वचनोंद्वारा आनन्दित करते थे, वे ही अब सियारिनोंकी अमंगलसूचक भाँति- भाँतिकी बोलियाँ सुन रहे हैं ॥ ३२ ॥

ये पुरा शेरते वीराः शयनेषु यशस्विनः ।

चन्दनागुरुदिग्धाङ्गास्तेऽद्य पांसुषु शेरते ॥ ३३ ॥

' जो यशस्वी वीर पहले अपने अंगोंमें चन्दन और अगुरुचूर्णसे चर्चित हो सुखदायिनी शय्याओंपर सोते थे, वे ही आज धूलमें लोट रहे हैं ॥ ३३ ॥

तेषामाभरणान्येते गृध्रगोमायुवायसाः ।

आक्षिपन्ति शिवा घोरा विनदन्त्यः पुनः पुनः ॥ ३४ ॥

‘ उनके आभूषणोंको ये गीध, गीदड़, कौए और भयानक गीदड़ियाँ बारंबार चिल्लाती हुई इधर- उधर फेंकती हैं ॥ ३४ ॥

बाणान् विनिशितान् पीतान् निस्त्रिंशान् विमला गदाः ।

युद्धाभिमानिनः सर्वे जीवन्त इव बिभ्रति ॥ ३५ ॥

‘ ये सभी युद्धाभिमानी वीर जीवित पुरुषोंकी भाँति इस समय भी तीखे बाण, पानीदार तलवार और चमकीली गदाएँ हाथोंमें लिये हुए हैं ॥ ३५ ॥

सुरूपवर्णा बहवः क्रव्यादैरवघट्टिताः ।

ऋषभप्रतिरूपाश्च शेरते हरितस्रजः ॥ ३६ ॥

' सुन्दर रूप और कान्तिवाले, साँड़ोंके समान हृष्ट- पुष्ट तथा हरे रंगके हार पहने हुए बहुत - से योद्धा यहाँ सोये पड़े हैं और मांसभक्षी जन्तु इन्हें उलट - पलट रहे हैं ॥ ३६ ॥

अपरे पुनरालिङ्ग्य गदाः परिघबाहवः ।

शेरतेऽभिमुखाः शूरा दयिता इव योषितः ॥ ३७ ॥

‘ परिघके समान मोटी बाँहोंवाले दूसरे शूरवीर प्रेयसी युवतियोंकी भाँति गदाओंका आलिंगन करके सम्मुख सो रहे हैं ॥ ३७ ॥

बिभ्रतः कवचान्यन्ये विमलान्यायुधानि च ।

न धर्षयन्ति क्रव्यादा जीवन्तीति जनार्दन ॥ ३८ ॥

' जनार्दन! बहुत - से योद्धा चमकीले कवच और आयुध धारण किये हुए हैं, जिससे उन्हें जीवित समझकर मांसभक्षी जन्तु उनपर आक्रमण नहीं करते हैं ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 3177

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 3177 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

क्रव्यादैः कृष्यमाणानामपरेषां महात्मनाम् ।

शातकौम्भ्यः स्रजश्चित्रा विप्रकीर्णाः समन्ततः ॥ ३ ९ ॥

' दूसरे महामनस्वी वीरोंको मांसाहारी जीव इधर - उधर खींच रहे हैं, जिससे सोनेकी बनी हुई उनकी विचित्र मालाएँ सब ओर बिखर गयी हैं ॥ ३ ९ ॥

एते गोमायवो भीमा निहतानां यशस्विनाम् ।

कण्ठान्तरगतान् हारानाक्षिपन्ति सहस्रशः ॥ ४० ॥

‘ यहाँ मारे गये यशस्वी वीरोंके कण्ठमें पड़े हुए हारोंको ये सहस्रों भयानक गीदड़ खींचते और झटकते हैं ॥ ४० ॥

सर्वेष्वपररात्रेषु याननन्दन्त बन्दिनः ।

स्तुतिभिश्च परार्घ्याभिरुपचारैश्च शिक्षिताः ॥ ४१ ॥

तानिमाः परिदेवन्ति दुःखार्ताः परमाङ्गनाः ।

कृपणं वृष्णिशार्दूल दुःखशोकार्दिता भृशम् ॥ ४२ ॥

‘ वृष्णिसिंह! प्रायः प्रत्येक रात्रिके पिछले पहर में सुशिक्षित बन्दीजन उत्तम स्तुतियों और उपचारोंद्वारा जिन्हें आनन्दित करते थे, उन्हींके पास आज ये दुःख और शोकसे अत्यन्त पीड़ित हुई सुन्दरी युवतियाँ करुण विलाप कर रही हैं ॥ ४१-४२ ॥

रक्तोत्पलवनानीव विभान्ति रुचिराणि च ।

मुखानि परमस्त्रीणां परिशुष्काणि केशव ॥ ४३ ॥

‘ केशव! इन सुन्दरियोंके सूखे हुए सुन्दर मुख लाल कमलोंके समूहकी भाँति शोभा पा रहे हैं ॥ ४३ ॥

रुदिताद् विरता ह्योता ध्यायन्त्यः सपरिच्छदाः ।

कुरुस्त्रियोऽभिगच्छन्ति तेन तेनैव दुःखिताः ॥ ४४ ॥

'ये कुरुकुलकी स्त्रियाँ रोना बंद करके स्वजनोंका चिन्तन करती हुई परिजनोंसहित उन्हींकी खोजमें जाती और दुःखी होकर उन- उन व्यक्तियोंसे मिल रही हैं ॥ ४४ ॥

एतान्यादित्यवर्णानि तपनीयनिभानि च ।

रोषरोदनताम्राणि वक्त्राणि कुरुयोषिताम् ॥ ४५ ॥

‘ कौरववंशकी युवतियोंके ये सूर्य और सुवर्णके समान कान्तिमान् मुख रोष और रोदनसे ताम्रवर्णके हो गये हैं ॥

श्यामानां वरवर्णानां गौरीणामेकवाससाम् ।

दुर्योधनवरस्त्रीणां पश्य वृन्दानि केशव ॥ ४६ ॥

‘ केशव! सुन्दर कान्तिसे सम्पन्न, एकवस्त्रधारिणी तथा श्याम--गौरवर्णवाली दुर्योधनकी इन सुन्दरी स्त्रियोंकी टोलियोंको देखो ॥ ४६ ॥

आसामपरिपूर्णार्थं निशम्य परिदेवितम् ।

इतरेतरसंक्रन्दान्न विजानन्ति योषितः ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 3178

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 3178 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ एक- दूसरीकी रोदन- ध्वनिसे मिल जानेके कारण इनके विलापका अर्थ पूर्णरूपसे समझमें नहीं आता, उसे सुनकर अन्य स्त्रियाँ भी कुछ नहीं समझ पाती हैं ॥

एता दीर्घमिवोच्छ्वस्य विक्रुश्य च विलप्य च ।

विस्पन्दमाना दुःखेन वीरा जहति जीवितम् ॥ ४८ ॥

‘ ये वीर वनिताएँ लंबी साँस खींचकर स्वजनोंको पुकार- पुकारकर करुण विलाप करके दुःखसे छटपटाती हुई अपने प्राण त्याग देना चाहती हैं ॥ ४८ ॥

बह्वयो दृष्ट्वा शरीराणि क्रोशन्ति विलपन्ति च ।

पाणिभिश्चापरा घ्नन्ति शिरांसि मृदुपाणयः ॥ ४९ ॥

‘ बहुत- सी स्त्रियाँ स्वजनोंकी लाशोंको देखकर रोती, चिल्लाती और विलाप करती हैं ।

कितनी ही कोमल हाथोंवाली कामिनियाँ अपने हाथोंसे सिर पीट रही हैं ॥

शिरोभिः पतितैर्हस्तैः सर्वाङ्गैर्यथशः कृतैः ।

इतरेतरसम्पृक्तैराकीर्णा भाति मेदिनी ॥ ५० ॥

‘ कटकर गिरे हुए मस्तकों, हाथों और सम्पूर्ण अंगोंके ढेर लगे हैं । वे सभी एकके ऊपर एक करके पड़े हैं । उनसे यहाँकी सारी पृथ्वी ढँकी हुई जान पड़ती है ॥

विशिरस्कानथो कायान् दृष्ट्वा ह्येताननिन्दितान् ।

मुह्यन्त्यनुगता नार्यो विदेहानि शिरांसि च ॥ ५१ ॥

' इन बिना मस्तकके सुन्दर धड़ों और बिना धड़के मस्तकोंको देख - देखकर ये अनुगामिनी स्त्रियाँ मूर्छित सी हो रही हैं ॥ ५१ ॥

शिरः कायेन संधाय प्रेक्षमाणा विचेतसः ।

अपश्यन्त्योऽपरं तत्र नेदमस्येति दुःखिताः ॥ ५२ ॥

' कितनी ही अचेत - सी होकर स्वजनोंकी खोज करनेवाली स्त्रियाँ एक मस्तकको निकटवर्ती धड़के साथ जोड़ करके देखती हैं और जब वह मस्तक उससे नहीं जुड़ता तथा दूसरा कोई मस्तक वहाँ देखनेमें नहीं आता तो वे दुःखी होकर कहने लगती हैं कि यह तो उनका सिर नहीं है ॥ ५२ ॥

बाहूरुचरणानन्यान् विशिखोन्मथितान् पृथक् ।

संदधत्योऽसुखाविष्टा मूर्च्छन्त्येताः पुनः पुनः ॥ ५३ ॥

‘ बाणोंसे कट- कटकर अलग हुई बाँहों, जाँघों और पैरोंको जोड़ती हुई ये दुःखी अबलाएँ बारंबार मूर्च्छित हो जाती हैं ॥ ५३ ॥

उत्कृत्तशिरसश्चान्यान् विजग्धान् मृगपक्षिभिः ।

दृष्ट्वा काश्चिन्न जानन्ति भर्तृन् भरतयोषितः ॥ ५४ ॥

' कितनी ही लाशोंके सिर कटकर गायब हो गये हैं, कितनोंको मांसभक्षी पशुओं और पक्षियोंने खा डाला है; अतः उनको देखकर भी ये हमारे ही पति हैं, इस रूपमें भरतकुलकी स्त्रियाँ पहचान नहीं पाती हैं ॥ ५४ ॥

पृष्ठ 3179

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 3179 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पाणिभिश्चापरा घ्नन्ति शिरांसि मधुसूदन ।

प्रेक्ष्य भ्रातॄन् पितॄन् पुत्रान् पतींश्च निहतान् परैः ॥ ५५ ॥

‘ मधुसूदन! देखो, बहुत- सी स्त्रियाँ शत्रुओंद्वारा मारे गये भाइयों, पिताओं, पुत्रों और पतियोंको देखकर अपने हाथोंसे सिर पीट रही हैं ॥ ५५ ॥

बाहुभिश्च सखड्गैश्च शिरोभिश्च सकुण्डलैः ।

अगम्यकल्पा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ॥ ५६ ॥

‘ खड्गयुक्त भुजाओं और कुण्डलोंसहित मस्तकोंसे ढँकी हुई इस पृथ्वीपर चलना-फिरना असम्भव हो गया है । यहाँ मांस और रक्तकी कीच जम गयी है ॥ ५६ ॥

न दुःखेषूचिताः पूर्वं दुःखं गाहन्त्यनिन्दिताः ।

भ्रातृभिः पतिभिः पुत्रैरुपाकीर्णा वसुंधरा ॥ ५७ ॥

‘ ये सती साध्वी सुन्दरी स्त्रियाँ पहले कभी ऐसे दुःखमें नहीं पड़ी थीं; किंतु आज दुःखके समुद्रमें डूब रही हैं । यह सारी पृथ्वी इनके भाइयों, पतियों और पुत्रोंसे ढँक गयी है ॥ ५७ ॥

यूथानीव किशोरीणां सुकेशीनां जनार्दन ।

स्नुषाणां धृतराष्ट्रस्य पश्य वृन्दान्यनेकशः ॥ ५८ ॥

‘ जनार्दन! देखो, महाराज धृतराष्ट्रकी सुन्दर केशोंवाली पुत्रवधुओंकी ये कई टोलियाँ बछेड़ियोंके झुंडके समान दिखायी दे रही हैं ॥ ५८ ॥

इतो दुःखतरं किं नु केशव प्रतिभाति मे ।

यदिमाः कुर्वते सर्वा रवमुच्चावचं स्त्रियः ॥ ५ ९ ॥

‘ केशव! मेरे लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा कि ये सारी बहुएँ यहाँ आकर अनेक प्रकारसे आर्तनाद कर रही हैं ॥ ५ ९ ॥

नूनमाचरितं पापं मया पूर्वेषु जन्मसु ।

या पश्यामि हतान् पुत्रान् पौत्रान् भ्रातॄंश्च माधव ॥ ६० ॥

' माधव! निश्चय ही मैंने पूर्वजन्मोंमें कोई बड़ा भारी पाप किया है, जिससे आज अपने पुत्रों, पौत्रों और भाइयोंको यहाँ मारा गया देख रही हूँ' ॥ ६० ॥

एवमार्ता विलपती समाभाष्य जनार्दनम् ।

गान्धारी पुत्रशोकार्ता ददर्श निहतं सुतम् ॥ ६१ ॥

भगवान् श्रीकृष्णको सम्बोधित करके पुत्रशोकसे व्याकुल हो इस प्रकार आर्तविलाप करती हुई गान्धारीने युद्धमें मारे गये अपने पुत्र दुर्योधनको देखा ॥ ६१ ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि आयोधनदर्शने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

पृष्ठ 3180

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 3180 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें युद्धदर्शनविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥