04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 371–380

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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पिशाचसंघाश्च सुदारुणा रणे ॥ ९ ॥

कुत्ते, सियार, कौए, बगुले, गरुड़, भेड़िये, तेंदुए, रक्त पीनेवाले पक्षी, राक्षसोंके समुदाय तथा अत्यन्त भयंकर पिशाचगण उस रणभूमिमें बहुत प्रसन्न हो रहे थे ॥ ९ ॥

त्वचो विनिर्भिद्य पिबन् वसामसृक् तथैव मज्जाः पिशितानि चाश्नुवन् । वपां विलुम्पन्ति हसन्ति गान्ति च प्रकर्षमाणाः कुणपान्यनेकशः ॥ १० ॥

वे मृतकोंकी त्वचा विदीर्ण करके उनके वसा तथा रक्तको पी रहे थे, मज्जा और मांस खा रहे थे, चर्बियोंको काटकर चबा लेते थे तथा बहुत से मृतकोंको इधर- उधर खींचते हुए वे हँसते और गीत गाते थे ॥ १० ॥

शरीरसंघातवहा ह्यसृग्जला रथोडुपा कुञ्जरशैलसङ्कटा । मनुष्यशीर्षोपलमांसकर्दमा प्रविद्धनानाविधशस्त्रमालिनी ॥ ११ ॥

भयावहा वैतरणीव दुस्तरा प्रवर्तिता योधवरैस्तदा नदी । उवाह मध्येन रणाजिरे भृशं भयावहा जीवमृतप्रवाहिनी ॥ १२ ॥

उस समय श्रेष्ठ योद्धाओंने रणभूमिमें रक्तकी नदी बहा दी, जो वैतरणीके समान दुष्कर एवं भयंकर प्रतीत होती थी । उसमें जलकी जगह रक्तकी ही धारा बहती थी । ढेर- के -ढेर शरीर उसमें बह रहे थे । उसमें तैरते हुए रथ नावके समान जान पड़ते थे । हाथियोंके शरीर वहाँ पर्वतकी चट्टानोंके समान व्याप्त हो रहे थे । मनुष्योंकी खोपड़ियाँ प्रस्तरखण्डोंके समान और मांस कीचड़के समान जान पड़ते थे । वहाँ टूटे - फूटे पड़े हुए नाना प्रकारके शस्त्रसमूह मालाओंके समान प्रतीत होते थे । वह अत्यन्त भयंकर नदी रणक्षेत्रके मध्यभागमें बहती और मृतकों तथा जीवितोंको भी बहा ले जाती थी ॥ ११-१२ ॥ पिबन्ति चाश्नन्ति च यत्र दुर्दृशाः पिशाचसंघास्तु नदन्ति भैरवाः । सुनन्दिताः प्राणभृतां क्षयङ्कराः समानभक्षाः श्वशृगालपक्षिणः ॥ १३ ॥

जिनकी ओर देखना भी कठिन था, ऐसे भयंकर पिशाचसमूह वहाँ खाते - पीते और गर्जना करते थे । समस्त प्राणियोंका विनाश करनेवाले वे पिशाच बहुत ही प्रसन्न थे । कुत्तों, सियारों और पक्षियोंको भी समानरूपसे भोजनसामग्री प्राप्त हुई थी ॥ १३ ॥

तथा तदायोधनमुग्रदर्शनं

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निशामुखे पितृपतिराष्ट्रवर्धनम् । निरीक्षमाणाः शनकैर्जहुर्नराः समुत्थिता नृत्तकबन्धसंकुलम् ॥ १४ ॥

प्रदोषकालमें यमराजके राज्यकी वृद्धि करनेवाली वह युद्धभूमि बड़ी भयंकर दिखायी देती थी । वहाँ सब ओर नाचते हुए कबन्ध ( धड़ ) व्याप्त हो रहे थे । यह सब देखते हुए उभय पक्षके योद्धाओंने वहाँसे धीरे - धीरे चलकर उस युद्धस्थलको त्याग दिया ॥ १४ ॥

अपेतविध्वस्तमहार्हभूषणं निपातितं शक्रसमं महाबलम् । रणेऽभिमन्युं ददृशुस्तदा जना व्यपोढहव्यं सदसीव पावकम् ॥ १५ ॥

उस समय लोगोंने देखा, इन्द्रके समान महाबली अभिमन्यु रणक्षेत्रमें गिरा दिया गया है । उसके बहुमूल्य आभूषण छिन्न - भिन्न होकर शरीरसे दूर जा पड़े हैं और वह यज्ञवेदीपर हविष्यरहित अग्निके समान निस्तेज हो गया है ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि तृतीयदिवसावहारे समरभूमिवर्णने पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें तीसरे दिनके युद्धमें सेनाके शिविरमें प्रस्थान करते समय समरभूमिका वर्णनविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥

Fara

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एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः युधिष्ठिरका विलाप संजय उवाच

हते तस्मिन् महावीर्ये सौभद्रे रथयूथपे ।

विमुक्तरथसंनाहाः सर्वे निक्षिप्तकार्मुकाः ॥ १ ॥

उपोपविष्टा राजानं परिवार्य युधिष्ठिरम् ।

तदेव युद्धं ध्यायन्तः सौभद्रगतमानसाः ॥ २ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! महापराक्रमी रथयूथपति सुभद्राकुमार अभिमन्युके मारे जानेपर समस्त पाण्डव महारथी रथ और कवचका त्याग कर और धनुषको नीचे डालकर राजा युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर उनके पास बैठ गये। उन सबका मन सुभद्राकुमार अभिमन्युमें ही लगा था और वे उसी युद्धका चिन्तन कर रहे थे ॥ १-२ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजा विललाप सुदुःखितः ।

अभिमन्यौ हते वीरे भ्रातुः पुत्रे महारथे ॥ ३ ॥

उस समय राजा युधिष्ठिर अपने भाईके वीर पुत्र महारथी अभिमन्युके मारे जानेके कारण अत्यन्त दुःखी हो विलाप करने लगे- ॥ ३ ॥

(एष जित्वा कृपं शल्यं राजानं च सुयोधनम् । द्रोणं द्रौणिं महेष्वासं तथैवान्यान् महारथान् ॥ ) द्रोणानीकमसम्बाधं मम प्रियचिकीर्षया ।

(हत्वा शत्रुगणान् वीरानेष शेते निपातितः ।

कृतास्त्रान् युद्धकुशलान् महेष्वासान् महारथान् ॥

कुलशीलगुणैर्युक्ताञ्छूरान् विख्यातपौरुषान् ।

द्रोणेन विहितं व्यूहमभेद्यममरैरपि ॥

अदृष्टपूर्वमस्माभिः चक्रं चक्रायुधप्रियः । ) भित्त्वा व्यूहं प्रविष्टोऽसौ गोमध्यमिव केसरी ॥ ४ ॥

‘ अहो! कृपाचार्य, शल्य, राजा दुर्योधन, द्रोणाचार्य, महाधनुर्धर अश्वत्थामा तथा अन्य महारथियोंको जीतकर, मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे द्रोणाचार्यके निर्बाध सैन्यव्यूहको विनष्ट करके वीर शत्रुसमूहोंका संहार करनेके पश्चात् यह पुत्र अभिमन्यु मार गिराया गया और अब रणक्षेत्रमें सो रहा है! जो अस्त्रविद्याके विद्वान्, युद्धकुशल, कुल- शील और गुणोंसे युक्त, शूरवीर तथा अपने पराक्रमके लिये प्रसिद्ध थे, उन महाधनुर्धर महारथियोंको परास्त करके देवताओंके लिये भी जिसका भेदन करना असम्भव है तथा हमने जिसे पहले कभी देखातक नहीं था, उस द्रोणनिर्मित चक्रव्यूहका भेदन करके चक्रधारी श्रीकृष्णका प्यारा

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भानजा वह अभिमन्यु उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश कर गया, जैसे सिंह गौओंके झुंडमें घुस जाता है ॥ ४ ॥

( विक्रीडितं रणे तेन निघ्नता वै परान् वरान् । )

यस्य शूरा महेष्वासाः प्रत्यनीकगता रणे ।

प्रभग्ना विनिवर्तन्ते कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ॥ ५ ॥

'उसने रणक्षेत्रमें प्रमुख-प्रमुख शत्रुवीरोंका वध करते हुए अद्भुत रणक्रीडा की थी । युद्धमें उसके सामने जानेपर शत्रुपक्षके अस्त्रविद्याविशारद युद्धदुर्मद और महान् धनुर्धर शूरवीर भी हतोत्साह हो भाग खड़े होते थे ॥ ५ ॥

अत्यन्तशत्रुरस्माकं येन दुःशासनः शरैः ।

क्षिप्रं ह्यभिमुखः संख्ये विसंज्ञो विमुखीकृतः ॥ ६ ॥

स तीर्त्वा दुस्तरं वीरो द्रोणानीकमहार्णवम् ।

प्राप्य दौःशासनिं कार्ष्णिः प्राप्तो वैवस्वतक्षयम् ॥ ७ ॥

‘ जिस वीर अर्जुनकुमारने युद्धस्थलमें हमारे अत्यन्त शत्रु दुःशासनको सामने आनेपर शीघ्र ही अपने बाणोंसे अचेत करके भगा दिया, वही महासागरके समान दुस्तर द्रोणसेनाको पार करके भी दुःशासनपुत्रके पास जाकर यमलोकमें पहुँच गया ॥ ६-७ ॥

कथं द्रक्ष्यामि कौन्तेयं सौभद्रे निहतेऽर्जुनम् ।

सुभद्रां वा महाभागां प्रियं पुत्रमपश्यतीम् ॥ ८ ॥

' सुभद्राकुमार अभिमन्युके मार दिये जानेपर अब मैं कुन्तीकुमार अर्जुनकी ओर आँख उठाकर कैसे देखूँगा? अथवा अपने प्रियपुत्रको अब नहीं देख पानेवाली महाभागा सुभद्राके सामने कैसे जाऊँगा? ॥ ८ ॥

किंस्विद् वयमपेतार्थमश्लिष्टमसमञ्जसम् ।

तावुभौ प्रतिवक्ष्यामो हृषीकेशधनंजयौ ॥ ९ ॥

'हाय! हमलोग भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंके सामने किस प्रकार यह अनर्थपूर्ण, असंगत और अनुचित वृत्तान्त कह सकेंगे ॥ ९ ॥

अहमेव सुभद्रायाः केशवार्जुनयोरपि ।

प्रियकामो जयाकाङ्क्षी कृतवानिदमप्रियम् ॥ १० ॥

‘ मैंने ही अपने प्रिय कार्यकी इच्छा, विजयकी अभिलाषा रखकर सुभद्रा, श्रीकृष्ण और अर्जुनका यह अप्रिय कार्य किया है ॥ १० ॥

न लुब्धो बुध्यते दोषाँल्लोभान्मोहात् प्रवर्तते ।

मधुलिप्सुर्हि नापश्यं प्रपातमहमीदृशम् ॥ ११ ॥

'लोभी मनुष्य किसी कार्यके दोषको नहीं समझता। ' वह लोभ और मोहके वशीभूत होकर उसमें प्रवृत्त हो जाता है । मैंने मधुके समान मधुर लगनेवाले राज्यको पानेकी लालसा रखकर यह नहीं देखा कि इसमें ऐसे भयंकर पतनका भय है ॥ ११ ॥

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यो हि भोज्ये पुरस्कार्यो यानेषु शयनेषु च ।

भूषणेषु च सोऽस्माभिर्बालो युधि पुरस्कृतः ॥ १२ ॥

‘ हाय! जिस सुकुमार बालकको भोजन और शयन करने, सवारीपर चलने तथा भूषण, वस्त्र पहननेमें आगे रखना चाहिये था, उसे हमलोगोंने युद्धमें आगे कर दिया ॥

कथं हि बालस्तरुणो युद्धानामविशारदः ।

सदश्व इव सम्बाधे विषमे क्षेममर्हति ॥ १३ ॥

‘वह तरुणकुमार अभी बालक था । युद्धकी कलामें पूरा प्रवीण नहीं हुआ था । फिर गहन वनमें फँसे हुए सुन्दर अश्वकी भाँति वह उस विषम संग्राममें कैसे सकुशल रह सकता था? ॥ १३ ॥

नो चेद्धि वयमप्येनं महीमनु शयीमहि ।

बीभत्सोः कोपदीप्तस्य दग्धाः कृपणचक्षुषा ॥ १४ ॥

‘ यदि हमलोग अभिमन्युके साथ ही उस रण- क्षेत्रमें शयन न कर सके तो अब क्रोधसे उत्तेजित हुए अर्जुनके शोकाकुल नेत्रोंसे हमें अवश्य दग्ध होना पड़ेगा ॥ १४ ॥

अलुब्धो मतिमान् ह्रीमान् क्षमावान् रूपवान् बली ।

वपुष्मान् मानकृद् वीरः प्रियः सत्यपराक्रमः ॥ १५ ॥

यस्य श्लाघन्ति विबुधाः कर्माण्यूर्जितकर्मणः ।

निवातकवचाञ्जघ्ने कालकेयांश्च वीर्यवान् ॥ १६ ॥

महेन्द्रशत्रवो येन हिरण्यपुरवासिनः ।

अक्ष्णोर्निमेषमात्रेण पौलोमाः सगणा हताः ॥ १७ ॥

परेभ्योऽप्यभयार्थिभ्यो यो ददात्यभयं विभुः ।

तस्यास्माभिर्न शकितस्त्रातुमप्यात्मजो बली ॥ १८ ॥

' जो लोभरहित, बुद्धिमान्, लज्जाशील, क्षमावान्, रूपवान्, बलवान्, सुन्दर शरीरधारी, दूसरोंको मान देनेवाले, प्रीतिपात्र, वीर तथा सत्यपराक्रमी हैं, जिनके कर्मोंकी देवतालोग भी प्रशंसा करते हैं, जिनके कर्म सबल एवं महान् हैं, जिन पराक्रमी वीरने निवातकवचों तथा कालकेय नामक दैत्योंका विनाश किया था, जिन्होंने आँखोंकी पलक मारते - मारते हिरण्यपुरनिवासी इन्द्रशत्रु पौलोम नामक दानवोंका उनके गणोंसहित संहार कर डाला था तथा जो सामर्थ्यशाली अर्जुन अभयकी इच्छा रखनेवाले शत्रुओंको भी अभयदान देते हैं, उन्हींके बलवान् पुत्रकी भी हमलोग रक्षा नहीं कर सके ॥ १५–१८ ॥

भयं तु सुमहत् प्राप्तं धार्तराष्ट्रान् महाबलान् ।

पार्थः पुत्रवधात् क्रुद्धः कौरवाञ्शोषयिष्यति ॥ १ ९ ॥

‘ अहो! महाबली धृतराष्ट्रपुत्रोंपर बड़ा भारी भय आ पहुँचा है; क्योंकि अपने पुत्रके वधसे कुपित हुए कुन्तीकुमार अर्जुन कौरवोंको सोख लेंगे —उनका मूलोच्छेद कर डालेंगे ॥ १ ९ ॥

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क्षुद्रः क्षुद्रसहायश्च स्वपक्षक्षयमातुरः ।

व्यक्तं दुर्योधनो दृष्ट्वा शोचन् हास्यति जीवितम् ॥ २० ॥

' दुर्योधन नीच है । उसके सहायक भी ओछे स्वभावके हैं, अतः वह निश्चय ही ( अर्जुनके हाथों) अपने पक्षका विनाश देखकर शोकसे व्याकुल हो जीवनका परित्याग कर देगा ॥ २० ॥

न मे जयः प्रीतिकरो न राज्यं न चामरत्वं न सुरैः सलोकता । इमं समीक्ष्याप्रतिवीर्यपौरुषं निपातितं देववरात्मजात्मजम् ॥ २१ ॥

‘ जिसके बल और पुरुषार्थकी कहीं तुलना नहीं थी, देवेन्द्रकुमार अर्जुनके पुत्र इस अभिमन्युको रणक्षेत्रमें मारा गया देख अब मुझे विजय, राज्य, अमरत्व तथा देवलोककी प्राप्ति भी प्रसन्न नहीं कर सकती' ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि युधिष्ठिरप्रलापे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें युधिष्ठिरप्रलापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं )

पृष्ठ 377

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द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः विलाप करते हुए युधिष्ठिरके पास व्यासजीका आगमन और अकम्पन -नारद - संवादकी प्रस्तावना करते हुए मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग आरम्भ करना संजय उवाच

अथैनं विलपन्तं तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।

कृष्णद्वैपायनस्तत्र आजगाम महानृषिः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार विलाप करते हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके पास वहाँ महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी आये ॥ १ ॥

अर्चयित्वा यथान्यायमुपविष्टं युधिष्ठिरः ।

अब्रवीच्छोकसंतप्तो भ्रातुः पुत्रवधेन च ॥ २ ॥

उस समय युधिष्ठिरने उनकी यथायोग्य पूजा की और जब वे बैठ गये, तब भतीजेके वधसे शोकसंतप्त हो युधिष्ठिर उनसे इस प्रकार बोले- ॥ २ ॥

अधर्मयुक्तैर्बहुभिः परिवार्य महारथैः ।

युध्यमानो महेष्वासैः सौभद्रो निहतो रणे ॥ ३ ॥

'मुने! बहुत -से अधर्मपरायण महाधनुर्धर महारथियोंने चारों ओरसे घेरकर रणक्षेत्रमें युद्ध करते हुए सुभद्राकुमार अभिमन्युको असहायावस्थामें मार डाला है ॥ ३ ॥

बालश्च बालबुद्धिश्च सौभद्रः परवीरहा ।

अनुपायेन संग्रामे युध्यमानो विशेषतः ॥ ४ ॥

‘ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला अभिमन्यु अभी बालक था; बालोचित बुद्धिसे युक्त था ।

विशेषतः संग्राममें वह उपयुक्त साधनोंसे रहित होकर युद्ध कर रहा था ॥ ४ ॥

मया प्रोक्तः स संग्रामे द्वारं संजनयस्व नः ।

प्रविष्टेऽभ्यन्तरे तस्मिन् सैन्धवेन निवारिताः ॥ ५ ॥

‘ मैंने युद्धस्थलमें उससे कहा था कि तुम व्यूहमें हमारे प्रवेशके लिये द्वार बना दो । तब वह द्वार बनाकर भीतर प्रविष्ट हो गया और जब हमलोग उसी द्वारसे व्यूहमें प्रवेश करने लगे, उस समय सिंधुराज जयद्रथने हमें रोक दिया ॥

ननु नाम समं युद्धमेष्टव्यं युद्धजीविभिः ।

इदं चैवासमं युद्धमीदृशं यत् कृतं परैः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 378

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' युद्धजीवी क्षत्रियोंको अपने समान साधनसम्पन्न वीरके साथ युद्ध करनेकी इच्छा करनी चाहिये । शत्रुओंने जो अभिमन्युके साथ इस प्रकार युद्ध किया है, यह कदापि समान नहीं है ॥ ६ ॥

तेनास्मि भृशसंतप्तः शोकबाष्पसमाकुलः ।

शमं नैवाधिगच्छामि चिन्तयानः पुनः पुनः ॥ ७ ॥

‘ इसीलिये मैं अत्यन्त संतप्त हूँ, शोकाश्रुओंसे मेरे नेत्र भरे हुए हैं । मैं बारंबार चिन्तामग्न होकर शान्ति नहीं पा रहा हूँ' ॥ ७ ॥

संजय उवाच

तं तथा विलपन्तं वै शोकव्याकुलमानसम् ।

उवाच भगवान् व्यासो युधिष्ठिरमिदं वचः ॥ ८ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! इस प्रकार शोकसे व्याकुलचित्त होकर विलाप करते हुए राजा युधिष्ठिरसे भगवान् वेदव्यासने इस प्रकार कहा ॥ ८ ॥

व्यास उवाच

युधिष्ठिर महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।

व्यसनेषु न मुह्यन्ति त्वादृशा भरतर्षभ ॥ ९ ॥

व्यासजी बोले – सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ, परम बुद्धिमान्, भरतकुलभूषण युधिष्ठिर! तुम्हारे - जैसे पुरुष संकटके समय मोहित नहीं होते हैं ॥ ९ ॥

स्वर्गमेष गतः शूरः शत्रून् हत्वा बहून् रणे ।

अबालसदृशं कर्म कृत्वा वै पुरुषोत्तमः ॥ १० ॥

यह पुरुषोत्तम अभिमन्यु शूरवीर था । इसने रणक्षेत्रमें अबालोचित पराक्रम करके बहुत - से शत्रुओंको मारकर स्वर्गलोककी यात्रा की है ॥ १० ॥

अनतिक्रमणीयो वै विधिरेष युधिष्ठिर ।

देवदानवगन्धर्वान् मृत्युर्हरति भारत ॥ ११ ॥

भरतनन्दन युधिष्ठिर! यह विधाताका विधान है । इसका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता । मृत्यु देवताओं, दानवों तथा गन्धर्वोंके भी प्राण हर लेती है ॥ युधिष्ठिर उवाच

इमे वै पृथिवीपालाः शेरते पृथिवीतले ।

निहताः पृतनामध्ये मृतसंज्ञा महाबलाः ॥ १२ ॥

युधिष्ठिर बोले- मुने! ये महाबली भूपालगण सेनाके मध्यमें मारे जाकर ' मृत' नाम धारण करके पृथ्वीपर सो रहे हैं ॥ १२ ॥

नागायुतबलाश्चान्ये वायुवेगबलास्तथा ।

पृष्ठ 379

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त एते निहताः संख्ये तुल्यरूपा नरैर्नराः ॥ १३ ॥

इनमेंसे कितने ही राजा दस हजार हाथियोंके समान बलवान् थे तथा कितनोंके वेग और बल वायुके समान थे । ये सब मनुष्य एक समान रूपवाले हैं, जो दूसरे मनुष्योंद्वारा युद्धमें मार डाले गये हैं ॥ १३ ॥

नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संयुगे क्वचित् ।

विक्रमेणोपसम्पन्नास्तपोबलसमन्विताः ॥ १४ ॥

इन प्राणशक्तिसम्पन्न वीरोंका युद्धमें कहीं कोई वध करनेवाला मुझे नहीं दिखायी देता था; क्योंकि ये सब - के - सब पराक्रमसे सम्पन्न और तपोबलसे संयुक्त थे ॥

जेतव्यमिति चान्योन्यं येषां नित्यं हृदि स्थितम् ।

अथ चेमे हताः प्राज्ञाः शेरते विगतायुषः ॥ १५ ॥

जिनके हृदयमें सदा एक- दूसरेको जीतनेकी अभिलाषा रहती थी, वे ही ये बुद्धिमान् नरेश आयु समाप्त होनेपर युद्धमें मारे जाकर धरतीपर सो रहे हैं ॥ १५ ॥

मृता इति च शब्दोऽयं वर्तते च ततोऽर्थवत् ।

इमे मृता महीपालाः प्रायशो भीमविक्रमाः १६ ॥

अतः इनके विषयमें ‘ मृत' शब्द सार्थक हो रहा है । ये भयंकर पराक्रमी भूमिपाल प्रायः ' मर गये ' कहे जाते हैं ॥

निश्चेष्टा निरभीमानाः शूराः शत्रुवशंगताः ।

राजपुत्राश्च संरब्धा वैश्वानरमुखं गताः ॥ १७ ॥

ये शूरवीर राजकुमार चेष्टा और अभिमानसे रहित हो शत्रुओंके अधीन हो गये थे । वे कुपित होकर बाणोंकी आगमें कूद पड़े थे ॥ १७ ॥

अत्र मे संशयः प्राप्तः कुतः संज्ञा मृता इति ।

कस्य मृत्युः कुतो मृत्युः केन मृत्युरिमाः प्रजाः ॥ १८ ॥

हरत्यमरसंकाश तन्मे ब्रूहि पितामह । मुझे संदेह होता है कि इन्हें ' मर गये ' ऐसा क्यों कहा जाता है? मृत्यु किसकी होती है? किस निमित्तसे होती है? तथा वह किसलिये इन प्रजाओं ( प्राणियों ) का अपहरण करती है? देवतुल्य पितामह! ये सब बातें आप मुझे बताइये ॥ १८३ ॥

संजय उवाच

तं तथा परिपृच्छन्तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।

आश्वासनमिदं वाक्यमुवाच भगवानृषिः ॥ १ ९ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! इस प्रकार पूछते हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे मुनिवर भगवान् व्यासने यह आश्वासनजनक वचन कहा ॥ १ ९ ॥ व्यास उवाच

पृष्ठ 380

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अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

अकम्पनस्य कथितं नारदेन पुरा नृप ॥ २० ॥

व्यासजी बोले – नरेश्वर! जानकार लोग इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया करते हैं । वह इतिहास पूर्वकालमें नारदजीने राजा अकम्पनसे कहा था ॥ २० ॥

स चापि राजा राजेन्द्र पुत्रव्यसनमुत्तमम् ।

अप्रसह्यतमं लोके प्राप्तवानिति मे मतिः ॥ २१ ॥

राजेन्द्र! राजा अकम्पनको भी अपने पुत्रकी मृत्युका बड़ा भारी शोक प्राप्त हुआ था, जो मेरे विचारमें सबसे अधिक असह्य दुःख है ॥ २१ ॥

तदहं सम्प्रवक्ष्यामि मृत्योः प्रभवमुत्तमम् ।

ततस्त्वं मोक्ष्यसे दुःखात् स्नेहबन्धनसंश्रयात् ॥ २२ ॥

इसलिये मैं तुम्हें मृत्युकी उत्पत्तिका उत्तम वृत्तान्त बताऊँगा, उसे सुनकर तुम स्नेह-बन्धनके कारण होनेवाले दुःखसे छूट जाओगे ॥ २२ ॥

समस्तपापराशिघ्नं शृणु कीर्तयतो मम ।

धन्यमाख्यानमायुष्यं शोकघ्नं पुष्टिवर्धनम् ॥ २३ ॥

पवित्रमरिसंघघ्नं मङ्गलानां च मङ्गलम् ।

यथैव वेदाध्ययनमुपाख्यानमिदं तथा ॥ २४ ॥

यह उपाख्यान समस्त पापराशिका नाश करने वाला है । मैं इसका वर्णन करता हूँ, सुनो । यह धन और आयुको बढ़ानेवाला, शोकनाशक, पुष्टिवर्धक, पवित्र, शत्रुसमूहका निवारक और मंगलकारी कार्योंमें सबसे अधिक मंगलकारक है । जैसे वेदोंका स्वाध्याय पुण्यदायक होता है, उसी प्रकार यह उपाख्यान भी है ॥

श्रवणीयं महाराज प्रातर्नित्यं नृपोत्तमैः ।

पुत्रानायुष्मतो राज्यमीहमानैः श्रियं तथा ॥ २५ ॥

महाराज! दीर्घायु पुत्र, राज्य और धन सम्पत्ति चाहनेवाले श्रेष्ठ राजाओंको प्रतिदिन प्रातःकाल इस इतिहासका श्रवण करना चाहिये ॥ २५ ॥

पुरा कृतयुगे तात आसीद् राजा ह्यकम्पनः ।

स शत्रुवशमापन्नो मध्ये संग्राममूर्धनि ॥ २६ ॥

तात! प्राचीनकालकी बात है, सत्ययुगमें अकम्पन नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे । वे युद्धमें शत्रुओंके वशमें पड़ गये ॥ २६ ॥

तस्य पुत्रो हरिर्नाम नारायणसमो बले ।

श्रीमान् कृतास्त्रो मेधावी युधि शक्रोपमो बली ॥ २७ ॥

राजाके एक पुत्र था, जिसका नाम था हरि । वह बलमें भगवान् नारायणके समान था । वह अस्त्रविद्यामें पारंगत, मेधावी, श्रीसम्पन्न तथा युद्धमें इन्द्रके तुल्य पराक्रमी था ॥ स शत्रुभिः परिवृतो बहुधा रणमूर्धनि ।