04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 381–390

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 381 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

व्यस्यन् बाणसहस्राणि योधेषु च गजेषु च ॥ २८ ॥

वह रणक्षेत्रमें शत्रुओंद्वारा घिर जानेपर शत्रुपक्षके योद्धाओं और गजारोहियोंपर बारंबार सहस्रों बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ २८ ॥

स कर्म दुष्करं कृत्वा संग्रामे शत्रुतापनः ।

शत्रुभिर्निहतः संख्ये पृतनायां युधिष्ठिर ॥ २ ९ ॥

युधिष्ठिर! वह शत्रुओंको संताप देनेवाला वीर राजकुमार संग्राममें दुष्कर पराक्रम दिखाकर अन्तमें शत्रुओंके हाथसे वहाँ सेनाके बीचमें मारा गया ॥ २९ ॥

स राजा प्रेतकृत्यानि तस्य कृत्वा शुचान्वितः ।

शोचन्नहनि रात्रौ च नालभत् सुखमात्मनः ॥ ३० ॥

राजा अकम्पनको बड़ा शोक हुआ । | वे पुत्रका अन्त्येष्टि संस्कार करके दिन - रात उसीके शोकमें मग्न रहने लगे । उनकी अन्तरात्माको ( थोड़ा - सा भी ) सुख नहीं मिला ॥ ३० ॥

तस्य शोकं विदित्वा तु पुत्रव्यसनसम्भवम् ।

आजगामाथ देवर्षिर्नारदोऽस्य समीपतः ॥ ३१ ॥

राजा अकम्पनको अपने पुत्रकी मृत्युसे महान् शोक हो रहा है, यह जानकर देवर्षि नारद उनके समीप आये ॥ ३१ ॥

स तु राजा महाभागो दृष्ट्वा देवर्षिसत्तमम् ।

पूजयित्वा यथान्यायं कथामकथयत् तदा ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 382

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 382 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

रुद्रदेवका ब्रह्माजीसे उनके क्रोधकी शान्तिके लिये वर माँगना

पृष्ठ 383

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 383 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उस समय महाभाग राजा अकम्पनने देवर्षिप्रवर नारदजीको आया देख उनकी यथायोग्य पूजा'करके उनसे अपने पुत्रकी मृत्युका वृत्तान्त कहा ॥ ३२ ॥

तस्य सर्वं समाचष्ट यथावृत्तं नरेश्वरः ।

शत्रुभिर्विजयं संख्ये पुत्रस्य च वधं तथा ॥ ३३ ॥

राजाने क्रमशः शत्रुओंकी विजय और युद्धस्थलमें अपने पुत्रके मारे जानेका सब समाचार उनसे ठीक - ठीक कह सुनाया ॥ ३३ ॥

मम पुत्रो महावीर्य इन्द्रविष्णुसमद्युतिः ।

शत्रुभिर्बहुभिः संख्ये पराक्रम्य हतो बली ॥ ३४ ॥

( वे बोले— ) ‘ देवर्षे! मेरा पुत्र इन्द्र और विष्णुके समान तेजस्वी, महापराक्रमी और बलवान् था; परंतु युद्धमें बहुत- से शत्रुओंने मिलकर एक साथ पराक्रम करके उसे मार डाला है ॥ ३४ ॥

क एष मृत्युर्भगवन् किंवीर्यबलपौरुषः ।

एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रोतुं मतिमतां वर ॥ ३५ ॥

' भगवन्! यह मृत्यु क्या है? इसका वीर्य, बल और पौरुष कैसा है? बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महर्षे! मैं यह सब यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ' ॥ ३५ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा नारदो वरदः प्रभुः ।

आख्यानमिदमाचष्ट पुत्रशोकापहं महत् ॥ ३६ ॥

राजाकी यह बात सुनकर वर देनेमें समर्थ एवं प्रभावशाली नारदजीने यह पुत्रशोकनाशक उत्तम उपाख्यान कहना आरम्भ किया ॥ ३६ ॥

नारद उवाच

शृणु राजन् महाबाहो आख्यानं बहुविस्तरम् ।

यथावृत्तं श्रुतं चैव मयापि वसुधाधिप ॥ ३७ ॥

नारदजी बोले – पृथ्वीपते! तुम्हारे पुत्रकी मृत्यु जिस प्रकार घटित हुई है, वह सब वृत्तान्त मैंने भी यथार्थरूपसे सुन लिया है । महाबाहु नरेश! अब मैं तुम्हारे सामने एक बहुत

विस्तृत कथा आरम्भ करता हूँ । तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ३७ ॥

प्रजाः सृष्ट्वा तदा ब्रह्मा आदिसर्गे पितामहः ।

असंहृतं महातेजा दृष्ट्वा जगदिदं प्रभुः ॥ ३८ ॥

तस्य चिन्ता समुत्पन्ना संहारं प्रति पार्थिव ।

चिन्तयन्न ह्यसौ वेद संहारं वसुधाधिप ॥ ३ ९ ॥

आदिसृष्टिके समय महातेजस्वी एवं शक्तिशाली पितामह ब्रह्माने जब प्रजावर्गकी सृष्टि की थी, उस समय संहारकी कोई व्यवस्था नहीं की थी, अतः इस सम्पूर्ण जगत्को प्राणियोंसे परिपूर्ण एवं मृत्युरहित देख प्राणियोंके संहारके लिये चिन्तित हो उठे । राजन्!

पृष्ठ 384

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 384 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पृथ्वीपते! बहुत सोचने - विचारनेपर भी ब्रह्माजीको प्राणियों के संहारका कोई उपाय नहीं ज्ञात हो सका ॥ ३८-३९ ॥

तस्य रोषान्महाराज खेभ्योऽग्निरुदतिष्ठत ।

तेन सर्वा दिशो व्याप्ताः सान्तर्देशा दिधक्षता ॥ ४० ॥

महाराज! उस समय क्रोधवश ब्रह्माजीके श्रवण - नेत्र आदि इन्द्रियोंसे अग्नि प्रकट हो गयी । वह अग्नि इस जगत्‌को दग्ध करनेकी इच्छासे सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओं ( कोणों ) में फैल गयी ॥ ४० ॥

ततो दिवं भुवं चैव ज्वालामालासमाकुलम् ।

चराचरं जगत् सर्वं ददाह भगवान् प्रभुः ॥ ४१ ॥

ततो हतानि भूतानि चराणि स्थावराणि च ।

महता क्रोधवेगेन त्रासयन्निव वीर्यवान् ॥ ४२ ॥

तदनन्तर आकाश और पृथ्वीमें सब ओर आगकी प्रचण्ड लपटें व्याप्त हो गयीं । दाह करनेमें समर्थ एवं अत्यन्त शक्तिशाली भगवान् अग्निदेव महान् क्रोधके वेगसे सबको त्रस्त- से करते हुए सम्पूर्ण चराचर जगत्को दग्ध करने लगे । इससे बहुत- से स्थावर- जंगम प्राणी नष्ट हो गये ॥ ४१-४२ ॥

ततो रुद्रो जटी स्थाणुर्निशाचरपतिर्हरः ।

जगाम शरणं देवं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ॥ ४३ ॥

तत्पश्चात् राक्षसोंके स्वामी जटाधारी दुःखहारी स्थाणु नामधारी भगवान् रुद्र परमेष्ठी भगवान् ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ ४३ ॥

तस्मिन्नापतिते स्थाणौ प्रजानां हितकाम्यया ।

अब्रवीत् परमो देवो ज्वलन्निव महामुनिः ॥ ४४ ॥

प्रजावर्गके हितकी इच्छासे भगवान् रुद्रके आनेपर परमदेव महामुनि ब्रह्माजी अपने तेजसे प्रज्वलित होते हुए - से इस प्रकार बोले— ॥ ४४ ॥

किं कुर्मः कामं कामार्ह कामाज्जातोऽसि पुत्रक ।

करिष्यामि प्रियं सर्वं ब्रूहि स्थाणो यदिच्छसि ॥ ४५ ॥

‘ अपने अभीष्ट मनोरथको प्राप्त करनेयोग्य पुत्र! तुम मेरे मानसिक संकल्पसे उत्पन्न हुए हो । मैं तुम्हारी कौन- सी कामना पूर्ण करूँ? स्थाणो! तुम जो कुछ चाहते हो, बतलाओ । मैं तुम्हारा सम्पूर्ण प्रिय कार्य करूँगा ' ॥ ४५ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

Fara

पृष्ठ 385

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 385 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः शंकर और ब्रह्माका संवाद, मृत्युकी उत्पत्ति तथा उसे समस्त प्रजाके संहारका कार्य सौंपा जाना स्थाणुरुवाच

प्रजासर्गनिमित्तं हि कृतो यत्नस्त्वया विभो ।

त्वया सृष्टाश्च वृद्धाश्च भूतग्रामाः पृथग्विधाः ॥ १ ॥

स्थाणु ( रुद्रदेव) ने कहा - प्रभो! आपने प्रजाकी सृष्टिके लिये स्वयं ही यत्न किया है । आपने ही नाना प्रकारके प्राणिसमुदायकी सृष्टि एवं वृद्धि की है ॥ १ ॥

तास्तवेह पुनः क्रोधात् प्रजा दह्यन्ति सर्वशः ।

ता दृष्ट्त्वा मम कारुण्यं प्रसीद भगवन् प्रभो ॥ २ ॥

आपकी वे ही सारी प्रजाएँ पुनः आपके ही क्रोधसे यहाँ दग्ध हो रही हैं । इससे उनके प्रति मेरे हृदयमें करुणा भर आयी है । अतः भगवन्! प्रभो! आप उन प्रजाओंपर कृपादृष्टि करके प्रसन्न होइये ॥ २ ॥

ब्रह्मोवाच

संहर्तुं न च मे काम एतदेवं भवेदिति ।

पृथिव्या हितकामं तु ततो मां मन्युराविशत् ॥ ३ ॥

ब्रह्माजी बोले – रुद्र! मेरी इच्छा यह नहीं है कि इस प्रकार इस जगत्का संहार हो ।

वसुधाके हितके लिये ही मेरे मनमें क्रोधका आवेश हुआ था ॥ ३ ॥

इयं हि मां सहा देवी भारार्ता समचूचुदत् ।

संहारार्थं महादेव भारेणाभिहता सती ॥ ४ ॥

महादेव! इस पृथ्वीदेवीने भारसे पीड़ित होकर मुझे जगत्के संहारके लिये प्रेरित किया था । यह सती - साध्वी देवी महान् भारसे दबी हुई थी ॥ ४ ॥

ततोऽहं नाधिगच्छामि तथा बहुविधं तदा ।

संहारमप्रमेयस्य ततो मां मन्युराविशत् ॥ ५ ॥

मैंने अनेक प्रकारसे इस अनन्त जगत्के संहारके उपायपर विचार किया, परंतु मुझे

कोई उपाय सूझ न पड़ा । इसीलिये मुझमें क्रोधका आवेश हो गया ॥ ५ ॥

रुद्र उवाच

संहारार्थं प्रसीदस्व मा रुषो वसुधाधिप ।

मा प्रजाः स्थावराश्चैव जंगमाश्च व्यनीनशः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 386

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 386 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

रुद्रने कहा–वसुधाके स्वामी पितामह! आप रोष न कीजिये । जगत्का संहार बंद

करनेके लिये प्रसन्न होइये । इन स्थावर- जंगम प्राणियोंका विनाश न कीजिये ॥

तव प्रसादाद् भगवन्निदं वर्तेत् त्रिधा जगत् ।

अनागतमतीतं च यच्च सम्प्रति वर्तते ॥ ७ ॥

भगवन्! आपकी कृपासे यह जगत् भूत, भविष्य और वर्तमान- तीन रूपोंमें विभक्त हो जाय ॥ ७ ॥

भगवन् क्रोधसंदीप्तः क्रोधादग्निमवासृजत् ।

स दहत्यश्मकूटानि द्रुमांश्च सरितस्तथा ॥ ८ ॥

प्रभो! आपने क्रोधसे प्रज्वलित होकर क्रोधपूर्वक जिस अग्निकी सृष्टि की है, वह पर्वत-शिखरों, वृक्षों और सरिताओंको दग्ध कर रही है ॥ ८ ॥

पल्वलानि च सर्वाणि सर्वांश्चैव तृपोलपान् ।

स्थावरं जङ्गमं चैव निःशेषं कुरुते जगत् ॥ ९ ॥

तदेतद् भस्मसाद्भूतं जगत् स्थावरजङ्गमम् ।

प्रसीद भगवन् स त्वं रोषो न स्याद् वरो मम ॥ १० ॥

यह समस्त छोटे- छोटे जलाशयों, सब प्रकारके तृण और लताओं तथा स्थावर और जंगम जगत्को सम्पूर्णरूपसे नष्ट कर रही है । इस प्रकार यह सारा चराचर जगत् जलकर भस्म हो गया । भगवन्! आप प्रसन्न होइये । आपके मनमें रोष न हो, यही मेरे लिये आपकी ओरसे वर प्राप्त हो ॥ ९ -१० ॥

सर्वे हि सृष्टा नश्यन्ति तव देव कथंचन ।

तस्मान्निवर्ततां तेजस्त्वय्येवेदं प्रलीयताम् ॥ ११ ॥

देव! आपके रचे हुए समस्त प्राणी किसी - न- किसी रूपमें नष्ट होते चले जा रहे हैं; अतः आपका यह तेजस्वरूप क्रोध जगत्के संहारसे निवृत्त हो आपमें ही विलीन हो जाय ॥ ११ ॥

तत् पश्य देव सुभृशं प्रजानां हितकाम्यया ।

यथेमे प्राणिनः सर्वे निवर्तेरंस्तथा कुरु ॥ १२ ॥

प्रभो! आप प्रजावर्गके अत्यन्त हितकी इच्छासे इनकी ओर कृपापूर्ण दृष्टिसे देखिये, जिससे ये समस्त प्राणी नष्ट होनेसे बच जायँ, वैसा कीजिये ॥ १२ ॥

अभावं नेह गच्छेयुरुत्सन्नजननाः प्रजाः ।

आदिदेव नियुक्तोऽस्मि त्वया लोकेषु लोककृत् ॥ १३ ॥

संतानोंका नाश हो जानेसे इस जगत्के सम्पूर्ण प्राणियोंका अभाव न हो जाय ।

आदिदेव! आपने सम्पूर्ण लोकोंमें मुझे लोकस्रष्टाके पदपर नियुक्त किया है ॥

मा विनश्येज्जगन्नाथ जगत् स्थावरजङ्गमम् ।

प्रसादाभिमुखं देवं तस्मादेवं ब्रवीम्यहम् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 387

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 387 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जगन्नाथ! यह चराचर जगत् नष्ट न हो, इसीलिये सदा कृपा करनेको उद्यत रहनेवाले प्रभुके सामने मैं ऐसी प्रार्थना कर रहा हूँ ॥ १४ ॥

नारद उवाच

श्रुत्वा हि वचनं देवः प्रजानां हितकारणे ।

तेजः संधारयामास पुनरेवान्तरात्मनि ॥ १५ ॥

नारदजी कहते हैं - राजन्! प्रजाके हितके लिये महादेवका यह वचन सुनकर भगवान् ब्रह्माने पुनः अपनी अन्तरात्मामें ही उस तेज ( क्रोध ) - को धारण कर लिया ॥ १५ ॥

ततोऽग्निमुपसंहृत्य भगवाँल्लोकसत्कृतः ।

प्रवृत्तं च निवृत्तं च कथयामास वै प्रभुः ॥ १६ ॥

तब विश्ववन्दित भगवान् ब्रह्माने उस अग्निका उपसंहार करके मनुष्योंके लिये प्रवृत्ति ( कर्म) और निवृत्ति ( ज्ञान ) मार्गोंका उपदेश दिया ॥ १६ ॥

उपसंहरतस्तस्य तमग्निं रोषजं तथा ।

प्रादुर्बभूव विश्वेभ्यो गोभ्यो नारी महात्मनः ॥ १७ ॥

कृष्णरक्ता तथा पिङ्गरक्तजिह्वास्यलोचना ।

कुण्डलाभ्यां च राजेन्द्र तप्ताभ्यां तप्तभूषणा ॥ १८ ॥

उस क्रोधाग्निका उपसंहार करते समय महात्मा ब्रह्माजीकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे एक नारी प्रकट हुई, जो काले और लाल रंगकी थी । उसकी जिह्वा, मुख और नेत्र पीले और लाल रंगके थे । राजेन्द्र! वह तपाये हुए सोनेके कुण्डलोंसे सुशोभित थी और उसके सभी आभूषण तप्त सुवर्णके बने हुए थे ॥ १७-१८ ॥

सा निःसृत्य तथा खेभ्यो दक्षिणां दिशमाश्रिता ।

स्मयमाना च सावेक्ष्य देवौ विश्वेश्वरावुभौ ॥ १ ९ ॥

वह उनकी इन्द्रियोंसे निकलकर दक्षिण दिशामें खड़ी हुई और उन दोनों देवताओं एवं जगदीश्वरोंकी ओर देखकर मन्द मन्द मुसकराने लगी ॥ १ ९ ॥ तामाहूय तदा देवो लोकादिनिधनेश्वरः । ( उक्तवान् मधुरं वाक्यं सान्त्वयित्वा पुनः पुनः । ) मृत्यो इति महीपाल जहि चेमाः प्रजा इति ॥ २० ॥

महीपाल! उस समय सम्पूर्ण लोकोंके आदि और अन्तके स्वामी ब्रह्माजीने उस नारीको अपने पास बुलाकर उसे बारंबार सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें 'मृत्यो ' ( हे मृत्यु ) कह करके पुकारा और कहा- ' तू इन समस्त प्रजाओंका संहार कर ॥ २० ॥

पृष्ठ 388

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 388 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

MilFa

त्वं हि संहारबुद्ध्याथ प्रादुर्भूता रुषो मम ।

तस्मात् संहर सर्वांस्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ॥ २१ ॥

मम त्वं हि नियोगेन ततः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि । 'देवि! तू संहारबुद्धिसे मेरे रोषद्वारा प्रकट हुई है, इसलिये मूर्ख और पण्डित सभी प्रजाओंका संहार करती रह, मेरी आज्ञासे तुझे यह कार्य करना होगा । इससे तू कल्याण प्राप्त करेगी ' ॥ २१३ ॥

एवमुक्ता तु सा तेन मृत्युः कमललोचना ॥ २२ ॥

दध्यौ चात्यर्थमबला प्ररुरोद च सुस्वरम् । ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वह मृत्युनामवाली कमललोचना अबला अत्यन्त चिन्तामग्न हो गयी और फूट- फूटकर रोने लगी ॥ २२३ ॥

पाणिभ्यां प्रतिजग्राह तान्यश्रूणि पितामहः ।

सर्वभूतहितार्थाय तां चाप्यनुनयत् तदा ॥ २३ ॥

पृष्ठ 389

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 389 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पितामह ब्रह्माने उसके उन आँसुओंको समस्त प्राणियोंके हितके लिये अपने हाथोंमें ले लिया और उस नारीको भी अनुनयसे प्रसन्न किया ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि मृत्युकथने त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें मृत्युवर्णनविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल २३३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 390

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 390 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः मृत्युकी घोर तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उसे वरकी प्राप्ति तथा नारद - अकम्पन -संवादका उपसंहार नारद उवाच

विनीय दुःखमबला आत्मन्येव प्रजापतिम् ।

उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा लतेवावर्जिता पुनः ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर वह अबला अपने भीतर ही उस दुःखको दबाकर झुकायी हुई लताके समान विनम्र हो हाथ जोड़कर ब्रह्माजीसे बोली ॥ मृत्युरुवाच

त्वया सृष्टा कथं नारी ईदृशी वदतां वर ।

क्रूरं कर्माहितं कुर्यां तदेव किमु जानती ॥ २ ॥

मृत्युने कहा —वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रजापते! आपने मुझे ऐसी नारीके रूपमें क्यों उत्पन्न किया? मैं जान - बूझकर वही क्रूरतापूर्ण अहितकर कर्म कैसे करूँ? ॥ २ ॥

बिभेम्यहमधर्माद्धि प्रसीद भगवन् प्रभो ।

प्रियान् पुत्रान् वयस्यांश्च भ्रातॄन् मातॄः पितॄन् पतीन् ॥ ३ ॥

अपध्यास्यन्ति मे देव मृतेष्वेभ्यो बिभेम्यहम् । भगवन्! मैं पापसे डरती हूँ । प्रभो! मुझपर प्रसन्न होइये । जब मैं लोगोंके प्यारे पुत्रों, मित्रों, भाइयों, माताओं, पिताओं तथा पतियोंको मारने लगूँगी, देव! उस समय उनके सम्बन्धी इन लोगोंके मेरे द्वारा मारे जानेपर सदा मेरा अनिष्ट चिन्तन करेंगे । अतः मैं इन सबसे बहुत डरती हूँ ॥ ३३ ॥

कृपणानां हि रुदतां ये पतन्त्यश्रुबिन्दवः ॥ ४ ॥

तेभ्योऽहं भगवन् भीता शरणं त्वाहमागता । भगवन्! रोते हुए दीन-दुःखी प्राणियोंके नेत्रोंसे जो आँसुओंकी बूँदें गिरती हैं, उनसे भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें आयी हूँ ॥ ४३ ॥

यमस्य भवनं देव गच्छेयं न सुरोत्तम ॥ ५ ॥

कायेन विनयोपेता मूर्ध्वोदग्रनखेन च ।

एतदिच्छाम्यहं कामं त्वत्तो लोकपितामह ॥ ६ ॥

देव! सुरश्रेष्ठ! लोकपितामह! मैं शरीर और मस्तकको झुकाकर हाथ जोड़कर विनीतभावसे आपकी शरणागत होकर केवल इसी अभिलाषाकी पूर्ति चाहती हूँ कि मुझे यमराजके भवनमें न जाना पड़े ॥ ५-६ ॥