04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 721–730

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

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इस प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए वे दोनों महाबली राक्षसराज परस्पर मायाओंको प्रयोग करते हुए समानरूपसे युद्ध करने लगे ॥ ६३ ॥

मायाशतसृजौ नित्यं मोहयन्तौ परस्परम् ॥ ७ ॥

मायायुद्धेषु कुशलौ मायायुद्धमयुध्यताम् । वे प्रतिदिन सैकड़ों मायाओंकी सृष्टि करनेवाले थे और दोनों ही मायायुद्धमें कुशल थे । अतः एक- दूसरेको मोहित करते हुए मायाद्वारा ही युद्ध करने लगे ॥ ७३ ॥

यां यां घटोत्कचो युद्धे मायां दर्शयते नृप ॥ ८ ॥

तां तामलम्बुषो राजन् माययैव निजघ्निवान् । नरेश्वर! घटोत्कच युद्धस्थलमें जो - जो माया दिखाता, उसे अलम्बुष अपनी मायाद्वारा ही नष्ट कर देता था ॥ तं तथा युध्यमानं तु मायायुद्धविशारदम् ॥ ९ ॥

अलम्बुषं राक्षसेन्द्रं दृष्ट्वाक्रुध्यन्त पाण्डवाः । मायायुद्धविशारद राक्षसराज अलम्बुषको इस प्रकार युद्ध करते देख समस्त पाण्डव कुपित हो उठे ॥ ९ ३ ॥ त एनं भृशसंविग्नाः सर्वतः प्रवरा रथैः ॥ १० ॥

अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धा भीमसेनादयो नृप । राजन्! वे अत्यन्त उद्विग्न हुए भीमसेन आदि श्रेष्ठ वीर क्रोधमें भरकर रथोंद्वारा सब ओरसे अलम्बुषपर टूट पड़े ॥ १०३ ॥

त एनं कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष ॥ ११ ॥

सर्वतो व्यकिरन् बाणैरुल्काभिरिव कुञ्जरम् । माननीय नरेश! जैसे जलती हुई उल्काओंद्वारा चारों ओरसे घेरकर हाथीपर प्रहार किया जाता है, उसी प्रकार रथसमूहके द्वारा अलम्बुषको कोष्ठबद्ध करके वे सब लोग चारों ओरसे उसपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ स तेषामस्त्रवेगं तं प्रतिहत्यास्त्रमायया ॥ १२ ॥

तस्माद् रथव्रजान्मुक्तो वनदाहादिव द्विपः । उस समय अलम्बुष अपने अस्त्रोंकी मायासे उनके उस महान् अस्त्रवेगको दबाकर रथसमूहके उस घेरेसे मुक्त हो गया, मानो कोई गजराज दावानलके घेरेसे बाहर हो गया हो ॥ १२३ ॥

स विस्फार्य धनुर्घोरमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥ १३ ॥

मारुतिं पञ्चविंशत्या भैमसेनिं च पञ्चभिः । उसने इन्द्रके वज्रकी भाँति घोर टंकार करनेवाले अपने भयंकर धनुषको तानकर भीमसेनको पचीस और उनके पुत्र घटोत्कचको पाँच बाण मारे ॥ १३३ ॥

पृष्ठ 722

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युधिष्ठिरं त्रिभिर्विद्ध्वा सहदेवं च सप्तभिः ॥ १४ ॥

नकुलं च त्रिसप्तत्या द्रौपदेयांश्च मारिष ।

पञ्चभिः पञ्चभिर्विद्ध्वा घोरं नादं ननाद ह ॥ १५ ॥

आर्य! उसने युधिष्ठिरको तीन, सहदेवको सात, नकुलको तिहत्तर और द्रौपदीपुत्रोंको पाँच - पाँच बाणोंसे घायल करके घोर गर्जना की ॥ १४-१५ ॥

तं भीमसेनो नवभिः सहदेवस्तु पञ्चभिः ।

युधिष्ठिरः शतेनैव राक्षसं प्रत्यविध्यत ॥ १६ ॥

तब भीमसेनने नौ, सहदेवने पाँच और युधिष्ठिरने सौ बाणोंसे राक्षस अलम्बुषको घायल कर दिया ॥ १६ । |

नकुलस्तु चतुःषष्ट्या द्रौपदेयास्त्रिभिस्त्रिभिः ।

हैडिम्बो राक्षसं विद्ध्वा युद्धे पञ्चाशता शरैः ॥ १७ ॥

पुनर्विव्याध सप्तत्या ननाद च महाबलः । तत्पश्चात् नकुलने चौंसठ और द्रौपदीकुमारोंने तीन- तीन बाणोंसे अलम्बुषको बींध डाला । तदनन्तर महाबली हिडिम्बाकुमारने युद्धस्थलमें उस राक्षसको पचास बाणोंसे घायल करके पुनः सत्तर बाणोंद्वारा बींध डाला और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १७ ॥

तस्य नादेन महता कम्पितेयं वसुंधरा ॥ १८ ॥

सपर्वतवना राजन् सपादपजलाशया । राजन्! उसके महान् सिंहनादसे वृक्षों, जलाशयों, पर्वतों और वनोंसहित यह सारी पृथ्वी काँप उठी ॥ सोऽतिविद्धो महेष्वासैः सर्वतस्तैर्महारथैः ॥ १ ९ ॥ प्रतिविव्याध तान् सर्वान् पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः । उन महाधनुर्धर महारथियोंद्वारा सब ओरसे अत्यन्त घायल होकर बदलेमें अलम्बुषने भी पाँच - पाँच बाणोंसे उन सबको वेध दिया ॥ १ ९ ३ ॥ तं क्रुद्धं राक्षसं युद्धे प्रतिक्रुद्धस्तु राक्षसः ॥ २० ॥

हैडिम्बो भरतश्रेष्ठ शरैर्विव्याध सप्तभिः । भरतश्रेष्ठ! उस युद्धस्थलमें कुपित हुए राक्षस अलम्बुषको क्रोधमें भरे हुए निशाचर घटोत्कचने सात बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २०३३ ॥

सोऽतिविद्धो बलवता राक्षसेन्द्रो महाबलः ॥ २१ ॥

व्यसृजत् सायकांस्तूर्णं रुक्मपुङ्खान् शिलाशितान् । बलवान् घटोत्कचद्वारा अत्यन्त क्षत - विक्षत होकर उस महाबली राक्षसराजने तुरंत ही सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २१३ || ते शरा नतपर्वाणो विविशू राक्षसं तदा ॥ २२ ॥

पृष्ठ 723

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रुषिताः पन्नगा यद्वद् गिरिशृङ्गं महाबलाः । जैसे रोषमें भरे हुए महाबली सर्प पर्वतसे शिखरपर चढ़ जाते हैं, उसी प्रकार अलम्बुषके वे झुकी हुई गाँठवाले बाण उस समय घटोत्कचके शरीरमें घुस गये ॥ २२ ॥

ततस्ते पाण्डवा राजन् समन्तान्निशितान् शरान् ॥ २३ ॥

प्रेषयामासुरुद्विग्ना हैडिम्बश्च घटोत्कचः । राजन्! तदनन्तर पाण्डव तथा हिडिम्बाकुमार घटोत्कच - सबने उद्विग्न होकर सब ओरसे अलम्बुषपर पैने बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ २३ ॥

स विध्यमानः समरे पाण्डवैर्जितकाशिभिः ॥ २४ ॥

मर्त्यधर्ममनुप्राप्तः कर्तव्यं नान्वपद्यत । विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंद्वारा समरभूमिमें विद्ध होकर मर्त्यधर्मको प्राप्त हुए अलम्बुषसे कुछ भी करते न बना ॥ २४ ॥

ततः समरशौण्डो वै भैमसेनिर्महाबलः ॥ २५ ॥

समीक्ष्य तदवस्थं तं वधायास्य मनो दधे । तब समरकुशल महाबली भीमसेनकुमारने अलम्बुषको उस अवस्थामें देखकर मन- ही-मन उसके वधका निश्चय किया ॥ २५३ ॥

वेगं चक्रे महान्तं च राक्षसेन्द्ररथं प्रति ॥ २६ ॥

दग्धाद्रिकूटशृङ्गाभं भिन्नाञ्जनचयोपमम् । उसने जले हुए पर्वतशिखर तथा कटे -छटे कोयलेके पहाड़के समान प्रतीत होनेवाले राक्षसराज अलम्बुषके रथपर पहुँचनेके लिये महान् वेग प्रकट किया ॥ २६३ ॥

रथाद् रथमभिद्रुत्य क्रुद्धो हैडिम्बिराक्षिपत् ॥ २७ ॥

उद्बबर्ह रथाच्चापि पन्नगं गरुडो यथा । क्रोधमें भरे हुए हिडिम्बाकुमारने अपने रथसे अलम्बुषके रथपर कूदकर उसे पकड़ लिया और जैसे गरुड़ सर्पको टाँग लेता है, उसी प्रकार उसने भी अलम्बुषको रथसे उठा लिया ॥ २७३ ॥

समुत्क्षिप्य च बाहुभ्यामाविध्य च पुनः पुनः ॥ २८ ॥

निष्पिपेष क्षितौ क्षिप्रं पूर्णकुम्भमिवाश्मनि । दोनों भुजाओंसे अलम्बुषको ऊपर उठाकर घटोत्कचने बारंबार घुमाया और जैसे जलसे भरे हुए घड़ेको पत्थरपर पटक दिया जाय, उसी प्रकार उसे शीघ्र ही पृथ्वीपर दे मारा ॥ २८३ ॥

बललाघवसम्पन्नः सम्पन्नो विक्रमेण च ॥ २ ९ ॥ भैमसेनी रणे क्रुद्धः सर्वसैन्यान्यभीषयत् ।

पृष्ठ 724

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घटोत्कचमें बल और फुर्ती दोनों विद्यमान थे । वह अद्भुत पराक्रमसे सम्पन्न था । उसने रणक्षेत्रमें कुपित होकर आपकी समस्त सेनाओंको भयभीत कर दिया ॥ २ ९ ॥ स विस्फारितसर्वाङ्गश्चूर्णितास्थिर्विभीषणः ॥ ३० ॥

घटोत्कचेन वीरेण हतः शालकटङ्कटः ।

वीर घटोत्कचके द्वारा मारे गये शालकटंकटाके पुत्र अलम्बुषके सारे अंग फट गये थे ।

उसकी हड्डियाँ चूर - चूर हो गयी थीं और वह बड़ा भयंकर दिखायी देता था ॥ ३० ॥

ततः सुमनसः पार्था हते तस्मिन् निशाचरे ॥ ३१ ॥

चुक्रुशुः सिंहनादांश्च वासांस्यादुधुवुश्च ह । उस निशाचर अलम्बुषके मारे जानेपर कुन्तीके सभी पुत्र प्रसन्नचित्त हो सिंहनाद करने और वस्त्र हिलाने लगे ॥ ३१३ ॥

तावकाश्च हतं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रं महाबलम् ॥ ३२ ॥

अलम्बुषं तथा शूरा विशीर्णमिव पर्वतम् ।

हाहाकारमकार्षुश्च सैन्यानि भरतर्षभ ॥ ३३ ॥

भरतश्रेष्ठ! टूट - फूटकर गिरे हुए पर्वतके समान महाबली राक्षसराज अलम्बुषको मारा गया देख आपके शूरवीर योद्धा तथा उनकी सारी सेनाएँ हाहाकार करने लगीं ॥ ३२-३३ ॥

जनाश्च तद् ददृशिरे रक्षः कौतूहलान्विताः ।

यदृच्छया निपतितं भूमावङ्गारकं यथा ॥ ३४ ॥

पृथ्वीपर अकस्मात् टूटकर गिरे हुए मंगल ग्रहके समान धराशायी हुए उस राक्षसको बहुत - से मनुष्य कौतूहलवश देखने लगे ॥ ३४ ॥

घटोत्कचस्तु तद्धत्वा रक्षो बलवतां वरम् ।

मुमोच बलवन्नादं बलं हत्वेव वासवः ॥ ३५ ॥

जैसे इन्द्रने बलासुरका वध करके महान् सिंहनाद किया था, उसी प्रकार घटोत्कचने उस बलवानोंमें श्रेष्ठ अलम्बुषको मारकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ३५ ॥

( ततोऽभिगम्य राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।

स्वकर्मावेदयन्मूर्ध्ना साञ्जलिर्निपपात ह ॥

मूर्व्युपाघ्राय तं ज्येष्ठः परिष्वज्य च पाण्डवः ।

प्रीतोऽस्मीत्यब्रवीद् राजन् हर्षादुत्फुल्ललोचनः ॥

घटोत्कचेन निष्पिष्टे मृते शालकटङ्कटे । बभूवुर्मुदिताः सर्वे हते तस्मिन् निशाचरे ॥ ) तदनन्तर घटोत्कच धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके पास जाकर हाथ जोड़ मस्तक नवाकर अपना कर्म निवेदन करता हुआ उनके चरणोंमें गिर पड़ा । राजन्! तब ज्येष्ठ पाण्डवने उसका मस्तक सूँघकर उसे हृदयसे लगा लिया और कहा -' वत्स! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न

पृष्ठ 725

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हूँ। ' उस समय युधिष्ठिरके नेत्र हर्षसे खिल उठे थे । शालकटंकटाके पुत्र राक्षस अलम्बुषको जब घटोत्कचने पृथ्वीपर रगड़कर मार डाला, तब सब लोग बहुत प्रसन्न हुए । स पूज्यमानः पितृभिः सबान्धवै- र्घटोत्कचः कर्मणि दुष्करे कृते । रिपुं निहत्याभिननन्द वै तदा ह्यलम्बुषं पक्वमलम्बुषं यथा ॥ ३६ ॥

पके हुए अलम्बुष ( मुंडीर) फलके समान अपने शत्रु अलम्बुषको मारकर घटोत्कच वह दुष्कर पराक्रम करनेके कारण अपने पिता पाण्डवों तथा बन्धु बान्धवोंसे सम्मानित एवं प्रशंसित हो उस समय बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करने लगा ॥ ३६ ॥

ततो निनादः सुमहान् समुत्थितः

सशङ्खनानाविधबाणघोषवान् ।

निशम्य तं प्रत्यनदंस्तु पाण्डवा- स्ततो ध्वनिर्भुवनमथास्पृशद् भृशम् ॥ ३७ ॥

तत्पश्चात् पाण्डवपक्षमें शंखध्वनि तथा नाना प्रकारके बाणोंकी सनसनाहटके शब्दसे मिला हुआ बड़ा भारी आनन्द -कोलाहल प्रकट हुआ । उसे सुनकर समस्त पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए । वह आनन्दध्वनि जगत् में बहुत दूरतक फैल गयी ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि अलम्बुषवधे नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें अलम्बुषवधविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०९ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं ) Fard

पृष्ठ 726

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दशाधिकशततमोऽध्यायः द्रोणाचार्य और सात्यकिका युद्ध तथा युधिष्ठिरका सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए उसे अर्जुनकी सहायताके लिये कौरव - सेनामें प्रवेश करनेका आदेश धृतराष्ट्रउवाच

भारद्वाजं कथं युद्धे युयुधानो न्यवारयत् ।

संजयाचक्ष्व तत्त्वेन परं कौतूहलं हि मे ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा- संजय! सात्यकिने युद्धमें द्रोणाचार्यको किस प्रकार रोका? यह यथार्थरूपसे बताओ । इसे सुननेके लिये मेरे मनमें महान् कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥

संजय उवाच

शृणु राजन् महाप्राज्ञ संग्रामं लोमहर्षणम् ।

द्रोणस्य पाण्डवैः सार्धं युयुधानपुरोगमैः ॥ २ ॥

संजयने कहा — राजन्! महामते! द्रोणाचार्यका सात्यकि आदि पाण्डव- योद्धाओंके साथ जो रोमांचकारी संग्राम हुआ था, उसका वर्णन सुनिये ॥ २ ॥

वध्यमानं बलं दृष्ट्वा युयुधानेन मारिष ।

अभ्यद्रवत् स्वयं द्रोणः सात्यकिं सत्यविक्रमम् ॥ ३ ॥

माननीय नरेश! द्रोणाचार्यने जब अपनी सेनाको युयुधानके द्वारा पीड़ित होते देखा, तब वे सत्यपराक्रमी सात्यकिपर स्वयं ही टूट पड़े ॥ ३ ॥

तमापतन्तं सहसा भारद्वाजं महारथम् ।

सात्यकिः पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् ॥ ४ ॥

उस समय सहसा आते हुए महारथी द्रोणाचार्यको सात्यकिने पचीस बाण मारे ॥ ४ ॥

द्रोणोऽपि युधि विक्रान्तो युयुधानं समाहितः ।

अविध्यत् पञ्चभिस्तूर्णं हेमपुङ्खैः शरैः शितैः ॥ ५ ॥

तब पराक्रमी द्रोणाचार्यने भी युद्धस्थलमें एकाग्रचित्त हो तुरंत ही सोनेके पंखवाले पाँच पैने बाणोंद्वारा युयुधानको घायल कर दिया ॥ ५ ॥

ते वर्म भित्त्वा सुदृढं द्विषत्पिशितभोजनाः ।

अभ्ययुर्धरणीं राजन् श्वसन्त इव पन्नगाः ॥ ६ ॥

राजन्! द्रोणाचार्यके बाण शत्रुओंके मांस खानेवाले थे । वे सात्यकिके सुदृढ़ कवचको छिन्न- भिन्न करके फुफकारते हुए सर्पोंके समान धरतीमें समा गये ॥ ६ ॥

दीर्घबाहुरभिक्रुद्धस्तोत्रार्दित इव द्विपः ।

पृष्ठ 727

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द्रोणं पञ्चाशताविध्यन्नाराचैरग्निसंनिभैः ॥ ७ ॥

तब अंकुशकी मार खाये हुए गजराजके समान अत्यन्त कुपित हुए महाबाहु सात्यकिने अग्निके समान तेजस्वी पचास नाराचोंद्वारा द्रोणाचार्यको वेध दिया ॥

भारद्वाजो रणे विद्धो युयुधानेन सत्वरम् ।

सात्यकिं बहुभिर्बाणैर्यतमानमविध्यत ॥ ८ ॥

सात्यकिके द्वारा समरांगणमें घायल हो द्रोणाचार्यने शीघ्र ही बहुत - से बाण मारकर विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले सात्यकिको क्षत- विक्षत कर दिया ॥ ८ ॥

ततः क्रुद्धो महेष्वासो भूय एव महाबलः ।

सात्वतं पीडयामास शरेणानतपर्वणा ॥ ९ ॥

तदनन्तर महाधनुर्धर महाबली द्रोणने पुनः कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले एक बाणद्वारा सात्यकिको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ९ ॥

स वध्यमानः समरे भारद्वाजेन सात्यकिः ।

नान्वपद्यत कर्तव्यं किञ्चिदेव विशाम्पते ॥ १० ॥

प्रजानाथ! समरभूमिमें द्रोणाचार्यके द्वारा क्षत - विक्षत होकर सात्यकिसे कुछ भी करते नहीं बना ॥ १० ॥

विषण्णवदनश्चापि युयुधानोऽभवन्नृप ।

भारद्वाजं रणे दृष्ट्वा विसृजन्तं शितान् शरान् ॥ ११ ॥

नरेश्वर! रणक्षेत्रमें पैने बाणोंकी वर्षा करते हुए द्रोणाचार्यको देखकर युयुधानके मुखपर विषाद छा गया ॥

तं तु सम्प्रेक्ष्य ते पुत्राः सैनिकाश्च विशाम्पते ।

प्रहृष्टमनसो भूत्वा सिंहवद् व्यनदन् मुहुः ॥ १२ ॥

प्रजापालक नरेश! उन्हें उस अवस्थामें देखकर आपके पुत्र और सैनिक प्रसन्नचित्त होकर बारंबार सिंहनाद करने लगे ॥ १२ ॥

तं श्रुत्वा निनदं घोरं पीड्यमानं च माधवम् ।

युधिष्ठिरोऽब्रवीद् राजा सर्वसैन्यानि भारत ॥ १३ ॥

भारत! उनकी वह घोर गर्जना सुनकर और सात्यकिको पीड़ित देखकर राजा युधिष्ठिरने अपने समस्त सैनिकोंसे कहा- ॥ १३ ॥

एष वृष्णिवरो वीरः सात्यकिः सत्यविक्रमः ।

ग्रस्यते युधि वीरेण भानुमानिव राहुणा ॥ १४ ॥

अभिद्रवत गच्छध्वं सात्यकिर्यत्र युध्यते । ' योद्धाओ! जैसे राहु सूर्यको ग्रस लेता है, उसी प्रकार यह वृष्णिवंशका श्रेष्ठ वीर सत्यपराक्रमी सात्यकि युद्धस्थलमें वीर द्रोणाचार्यके द्वारा कालके गालमें जाना चाहता है । अतः तुमलोग दौड़ी और वहीं जाओ, जहाँ सात्यकि युद्ध करता है ' ॥ १४ ॥

पृष्ठ 728

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धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यमिदमाह जनाधिपः ॥ १५ ॥

अभिद्रव द्रुतं द्रोणं किमु तिष्ठसि पार्षत ।

न पश्यसि भयं द्रोणाद् घोरं नः समुपस्थितम् ॥ १६ ॥

इसके बाद राजाने पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नसे इस प्रकार कहा -' द्रुपदनन्दन! खड़े क्यों हो? तुरंत ही द्रोणाचार्यपर धावा करो । क्या तुम नहीं देखते कि द्रोणकी ओरसे हमलोगोंपर घोर भय उपस्थित हो गया है? ॥ १५-१६ ॥

असौ द्रोणो महेष्वासो युयुधानेन संयुगे ।

क्रीडते सूत्रबद्धेन पक्षिणा बालको यथा ॥ १७ ॥

‘ जैसे कोई बालक डोरमें बँधे हुए पक्षीके साथ खेलता है, उसी प्रकार ये महाधनुर्धर द्रोण युद्धस्थलमें युयुधानके साथ क्रीड़ा करते हैं ॥ १७ ॥

तत्रैव सर्वे गच्छन्तु भीमसेनपुरोगमाः ।

त्वयैव सहिताः सर्वे युयुधानरथं प्रति ॥ १८ ॥

‘ अतः तुम्हारे साथ भीमसेन आदि सभी महारथी वहीं युयुधानके रथके समीप जायँ ॥ १८ ॥

पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि त्वामहं सहसैनिकः ।

सात्यकिं मोक्षयस्वाद्य यमदंष्ट्रान्तरं गतम् ॥ १ ९ ॥

' फिर मैं भी सम्पूर्ण सैनिकोंके साथ तुम्हारे पीछे - पीछे आऊँगा । इस समय यमराजकी दाढ़ोंमें पहुँचे हुए सात्यकिको छुड़ाओ ' ॥ १ ९ ॥

एवमुक्त्वा ततो राजा सर्वसैन्येन भारत ।

अभ्यद्रवद् रणे द्रोणं युयुधानस्य कारणात् ॥ २० ॥

' भारत! ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिरने उस समय रणक्षेत्रमें युयुधानकी रक्षाके लिये अपनी सारी सेनाके साथ द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया ॥ २० ॥

तत्रारावो महानासीद् द्रोणमेकं युयुत्सताम् ।

पाण्डवानां च भद्रं ते सृञ्जयानां च सर्वशः ॥ २१ ॥

राजन्! आपका भला हो । अकेले द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे आये हुए पाण्डवों और सृजयोंका वहाँ सब ओर महान् कोलाहल छा गया ॥ २१ ॥

ते समेत्य नरव्याघ्रा भारद्वाजं महारथम् ।

अभ्यवर्षन् शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ॥ २२ ॥

वे मनुष्योंमें व्याघ्रके समान पराक्रमी सैनिक महारथी द्रोणाचार्यके पास जाकर कंक और मोरके पंखोंसे युक्त तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २२ ॥

स्मयन्नेव तु तान् वीरान् द्रोणः प्रत्यग्रहीत् स्वयम् ।

अतिथीनागतान् यद्वत् सलिलेनासनेन च ॥ २३ ॥

तर्पितास्ते शरैस्तस्य भारद्वाजस्य धन्विनः ।

पृष्ठ 729

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आतिथेयं गृहं प्राप्य नृपतेऽतिथयो यथा ॥ २४ ॥

राजन्! जैसे घरपर आये हुए अतिथियोंका जल और आसन आदिके द्वारा सत्कार किया जाता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यने स्वयं उन समस्त आक्रमणकारी वीरोंकी मुसकराते हुए ही अगवानी की । जैसे अतिथिसत्कारमें निपुण गृहस्थके घर जाकर अतिथि तृप्त होते हैं, उसी प्रकार धनुर्धर द्रोणाचार्यके बाणोंसे उन सबकी यथेष्ट तृप्ति की गयी ॥ २३-२४ ॥

भारद्वाजं च ते सर्वे न शेकुः प्रतिवीक्षितुम् ।

मध्यंदिनमनुप्राप्तं सहस्रांशुमिव प्रभो ॥ २५ ॥

प्रभो! जैसे दोपहरके प्रचण्ड मार्तण्डकी ओर देखना कठिन होता है, उसी प्रकार वे समस्त योद्धा भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यकी ओर देखनेमें भी समर्थ न हो सके ॥ २५ ॥

तांस्तु सर्वान् महेष्वासान् द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ।

अतापयच्छरव्रातैर्गभस्तिभिरिवांशुमान् ॥ २६ ॥

शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य उन समस्त महाधनुर्धरोंको अपने बाणसमूहोंद्वारा उसी प्रकार संतप्त करने लगे, जैसे अंशुमाली सूर्य अपनी किरणोंसे जगत्को संताप देते हैं ॥ २६ ॥

वध्यमाना महाराज पाण्डवाः सृञ्जयास्तथा ।

त्रातारं नाध्यगच्छन्त पङ्कमग्ना इव द्विपाः ॥ २७ ॥

महाराज! उस समय द्रोणाचार्यकी मार खाते हुए पाण्डव और सृजय सैनिक कीचड़में फँसे हुए हाथियोंके समान कोई रक्षक न पा सके ॥ २७ ॥

द्रोणस्य च व्यदृश्यन्त विसर्पन्तो महाशराः ।

गभस्तय इवार्कस्य प्रतपन्तः समन्ततः ॥ २८ ॥

जैसे सूर्यकी किरणें सब ओर ताप प्रदान करती हुई फैल जाती हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके विशाल बाण सब ओर फैलते और शत्रुओंको संतप्त करते दिखायी देते थे ॥

तस्मिन् द्रोणेन निहताः पञ्चालाः पञ्चविंशतिः ।

महारथाः समाख्याता धृष्टद्युम्नस्य सम्मताः ॥ २ ९ ॥

उस युद्धमें द्रोणाचार्यके द्वारा पांचालोंके पचीस सुप्रसिद्ध महारथी मारे गये जो धृष्टद्युम्नको बहुत ही प्रिय थे ॥ २ ९ ॥

पाण्डूनां सर्वसैन्येषु पञ्चालानां तथैव च ।

द्रोणं स्म ददृशुः शूरं विनिघ्नन्तं वरान् वरान् ॥ ३० ॥

लोगोंने देखा, पाण्डवों और पांचालोंकी समस्त सेनाओंमें जो मुख्य-मुख्य योद्धा हैं, उन्हें शूरवीर द्रोणाचार्य चुन- चुनकर मार रहे हैं ॥ ३० ॥

केकयानां शतं हत्वा विद्राव्य च समन्ततः ।

द्रोणस्तस्थौ महाराज व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 730

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महाराज! सौ केकययोद्धाओंको मारकर शेष सैनिकोंको चारों ओर खदेड़नेके पश्चात् द्रोणाचार्य मुँह बाये हुए यमराजके समान खड़े हो गये ॥ ३१ ॥

पञ्चालान् सृञ्जयान् मत्स्यान् केकयांश्च नराधिप ।

द्रोणोऽजयन्महाबाहुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३२ ॥

नरेश्वर! महाबाहु द्रोणाचार्यने पांचाल, संजय, मत्स्य और केकयोंके सैकड़ों तथा सहस्रों वीरोंको परास्त किया ॥ ३२ ॥

तेषां समभवच्छब्दो विद्धानां द्रोणसायकैः ।

वनौकसामिवारण्ये व्याप्तानां धूम्रकेतुना ॥ ३३ ॥

जैसे घोर जंगलमें दावानलसे व्याप्त हुए वनवासी जन्तुओंकी क्रन्दनध्वनि सुनायी पड़ती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके बाणोंसे घायल हुए उन विपक्षी योद्धाओंका आर्तनाद वहाँ श्रवणगोचर होता था ॥ ३३ ॥

तत्र देवाः सगन्धर्वाः पितरश्चाब्रुवन् नृप ।

एते द्रवन्ति पञ्चालाः पाण्डवाश्च ससैनिकाः ॥ ३४ ॥

नरेश्वर! उस समय वहाँ आकाशमें खड़े हुए देवता, पितर और गन्धर्व कहते थे, ये पांचाल और पाण्डव अपने सैनिकोंके साथ भागे जा रहे हैं ॥ ३४ ॥

तं तथा समरे द्रोणं निघ्नन्तं सोमकान् रणे ।

न चाप्यभिययुः केचिदपरे नैव विव्यधुः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार समरांगणमें सोमकोंका वध करते हुए द्रोणाचार्यके सामने न तो कोई जा सके और न कोई उन्हें चोट ही पहुँचा सके ॥ ३५ ॥

वर्तमाने तथा रौद्रे तस्मिन् वीरवरक्षये ।

अशृणोत् सहसा पार्थः पाञ्चजन्यस्य निःस्वनम् ॥ ३६ ॥

बड़े - बड़े वीरोंका संहार करनेवाला वह भयंकर संग्राम चल ही रहा था कि सहसा कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने पांचजन्यकी ध्वनि सुनी ॥ ३६ ॥

पूरितो वासुदेवेन शङ्खराट् स्वनते भृशम् ।

युध्यमानेषु वीरेषु सैन्धवस्याभिरक्षिषु ॥ ३७ ॥

नदत्सु धार्तराष्ट्रेषु विजयस्य रथं प्रति ।

गाण्डीवस्य च निर्घोषे विप्रणष्टे समन्ततः ॥ ३८ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके फूँकनेपर वह शंखराज पांचजन्य बड़े जोरसे अपनी ध्वनिका विस्तार कर रहा था । सिन्धुराज जयद्रथकी रक्षामें नियुक्त हुए वीरगण युद्धमें संलग्न थे । अर्जुनके रथके पास आपके पुत्र और सैनिक गरज रहे थे तथा गाण्डीव धनुषकी टंकार सब ओरसे दब गयी थी ॥ ३७-३८ ॥

कश्मलाभिहतो राजा चिन्तयामास पाण्डवः ।

न नूनं स्वस्ति पार्थाय यथा नदति शङ्खराट् ॥ ३ ९ ॥