04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 731–740

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 731–740

पृष्ठ 731

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कौरवाश्च यथा हृष्टा विनदन्ति मुहुर्मुहुः । तब पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर मोहके वशीभूत होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगे —'जिस प्रकार शंखराज पांचजन्यकी ध्वनि हो रही है और जिस तरह कौरव -सैनिक बारंबार हर्षनाद कर रहे हैं, उससे जान पड़ता है, निश्चय ही अर्जुनकी कुशल नहीं है ' ॥ ३ ९ ¾ ॥ एवं स चिन्तयित्वा तु व्याकुलेनान्तरात्मना ॥ ४० ॥

अजातशत्रुः कौन्तेयः सात्वतं प्रत्यभाषत ।

बाष्पगद्गदया वाचा मुह्यमानो मुहुर्मुहुः ।

कृत्यस्यानन्तरापेक्षी शैनेयं शिनिपुङ्गवम् ॥ ४१ ॥

ऐसा विचारकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिरका हृदय व्याकुल हो उठा । वे चाहते थे कि जयद्रथवधका कार्य निर्विघ्न पूर्ण हो जाय; अतः बारंबार मोहित हो अश्रुगद्गद वाणीमें शिनिप्रवर सात्यकिको सम्बोधित करके बोले ॥ ४०-४१ ॥ युधिष्ठिर उवाच

यः स धर्मः पुरा दृष्टः सद्भिः शैनेय शाश्वतः ।

साम्पराये सुहृत्कृत्ये तस्य कालोऽयमागतः ॥ ४२ ॥

युधिष्ठिरने कहा - शैनेय! साधु पुरुषोंने पूर्वकालमें विपत्तिके समय एक सुहृद् कर्तव्यके विषयमें जिस सनातन धर्मका साक्षात्कार किया है, आज उसीके पालनका अवसर उपस्थित हुआ है ॥ ४२ ॥

सर्वेष्वपि च योधेषु चिन्तयन् शिनिपुङ्गव ।

त्वत्तः सुहृत्तमं कञ्चिन्नाभिजानामि सात्यके ॥ ४३ ॥

शिनिप्रवर सात्यके! इस दृष्टिसे विचार करनेपर मैं समस्त योद्धाओं में किसीको भी तुमसे बढ़कर अपना अतिशय सुहृत् नहीं समझ पाता हूँ ॥ ४३ ॥

यो हि प्रीतमना नित्यं यश्च नित्यमनुव्रतः ।

स कार्ये साम्पराये तु नियोज्य इति मे मतिः ॥ ४४ ॥

जो सदा प्रसन्नचित्त रहता हो तथा जो नित्य- निरन्तर अपने प्रति अनुराग रखता हो, उसीको संकटकालमें किसी महत्त्वपूर्ण कार्यका सम्पादन करनेके लिये नियुक्त करना चाहिये, ऐसा मेरा मत है ॥ ४४ ॥

यथा च केशवो नित्यं पाण्डवानां परायणम् ।

तथा त्वमपि वार्ष्णेय कृष्णतुल्यपराक्रमः ॥ ४५ ॥

वार्ष्णेय! जैसे भगवान् श्रीकृष्ण सदा पाण्डवोंके परम आश्रय हैं, उसी प्रकार तुम भी हो । तुम्हारा पराक्रम भी श्रीकृष्णके समान ही है ॥ ४५ ॥

सोऽहं भारं समाधास्ये त्वयि तं वोढुमर्हसि ।

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अभिप्रायं च मे नित्यं न वृथा कर्तुमर्हसि ॥ ४६ ॥

अतः मैं तुमपर जो कार्यभार रख रहा हूँ, उसका तुम्हें निर्वाह करना चाहिये । मेरे मनोरथको सदा सफल बनानेकी ही तुम्हें चेष्टा करनी चाहिये ॥ ४६ ॥

स त्वं भ्रातुर्वयस्यस्य गुरोरपि च संयुगे ।

कुरु कृच्छ्रे सहायार्थमर्जुनस्य नरर्षभ ॥ ४७ ॥

नरश्रेष्ठ! अर्जुन तुम्हारा भाई, मित्र और गुरु है । वह युद्धके मैदानमें संकटमें पड़ा हुआ है । अतः तुम उसकी सहायताके लिये प्रयत्न करो ॥ ४७ ॥

त्वं हि सत्यव्रतः शूरो मित्राणामभयङ्करः ।

लोके विख्यायसे वीर कर्मभिः सत्यवागिति ॥ ४८ ॥

तुम सत्यव्रती, शूरवीर तथा मित्रोंको अभय देनेवाले हो । वीर! तुम अपने कर्मोंद्वारा संसारमें सत्यवादीके रूपमें विख्यात हो ॥ ४८ ॥

यो हि शैनेय मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत् तनुम् ।

पृथिवीं च द्विजातिभ्यो यो दद्यात् स समो भवेत् ॥ ४ ९ ॥

शैनेय! जो मित्रके लिये युद्ध करते हुए शरीरका त्याग करता है तथा जो ब्राह्मणोंको समूची पृथ्वीका दान कर देता है, वे दोनों समान पुण्यके भागी होते हैं ॥ ४ ९ ॥

श्रुताश्च बहवोऽस्माभी राजानो ये दिवं गताः ।

दत्त्वेमां पृथिवीं कृत्स्नां ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ॥ ५० ॥

हमने सुना है कि बहुत - से राजा ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक इस समूची पृथ्वीका दान करके स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ ५० ॥

एवं त्वामपि धर्मात्मन् प्रयाचेऽहं कृताञ्जलिः ।

पृथिवीदानतुल्यं स्यादधिकं वा फलं विभो ॥ ५१ ॥

धर्मात्मन्! इसी प्रकार तुमसे भी मैं अर्जुनकी सहायताके लिये हाथ जोड़कर याचना करता हूँ। प्रभो! ऐसा करनेसे तुम्हें पृथ्वीदानके समान अथवा उससे भी अधिक फल प्राप्त होगा ॥ ५१ ॥

एक एव सदा कृष्णो मित्राणामभयङ्करः ।

रणे संत्यजति प्राणान् द्वितीयस्त्वं च सात्यके ॥ ५२ ॥

सात्यके! मित्रोंको अभय प्रदान करनेवाले एक तो भगवान् श्रीकृष्ण ही सदा हमारे लिये युद्धमें अपने प्राणोंका परित्याग करनेके लिये उद्यत रहते हैं और दूसरे तुम ॥ ५२ ॥

विक्रान्तस्य च वीरस्य युद्धे प्रार्थयतो यशः ।

शूर एव सहायः स्यान्नेतरः प्राकृतो जनः ॥ ५३ ॥

युद्धमें सुयश पानेकी इच्छा रखकर पराक्रम करनेवाले वीर पुरुषकी सहायता कोई शूरवीर पुरुष ही कर सकता है। दूसरा कोई निम्न कोटिका मनुष्य उसका सहायक नहीं हो सकता ॥ ५३ ॥

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महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 733 का मूल पृष्ठ
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ईदृशे तु परामर्दे वर्तमानस्य माधव ।

त्वदन्यो हि रणे गोप्ता विजयस्य न विद्यते ॥ ५४ ॥

माधव! ऐसे घोर युद्धमें लगे हुए रणक्षेत्रमें अर्जुनका सहायक एवं संरक्षक होनेयोग्य तुम्हारे सिवा दूसरा कोई नहीं है ॥ ५४ ॥

श्लाघन्नेव हि कर्माणि शतशस्तव पाण्डवः ।

मम संजनयन् हर्षं पुनः पुनरकीर्तयत् ॥ ५५ ॥

पाण्डुपुत्र अर्जुनने तुम्हारे सैकड़ों कार्योंकी प्रशंसा करते और मेरा हर्ष बढ़ाते हुए बारंबार तुम्हारे गुणोंका वर्णन किया था ॥ ५५ ॥

लघुहस्तश्चित्रयोधी तथा लघुपराक्रमः ।

प्राज्ञः सर्वास्त्रविच्छूरो मुह्यते न च संयुगे ॥ ५६ ॥

वह कहता था — ‘ सात्यकिके हाथोंमें बड़ी फुर्ती है । वह विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाला और शीघ्रतापूर्वक पराक्रम दिखानेवाला है । सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञाता, विद्वान् एवं शूरवीर सात्यकि युद्धस्थलमें कभी मोहित नहीं होता है ॥ ५६ ॥

महास्कन्धो महोरस्को महाबाहुर्महाहनुः ।

महाबलो महावीर्यः स महात्मा महारथः ॥ ५७ ॥

‘ उसके कंधे महान्, छाती चौड़ी, भुजाएँ बड़ी - बड़ी और ठोढ़ी विशाल एवं हृष्ट - पुष्ट हैं। वह महाबली, महापराक्रमी, महामनस्वी और महारथी है ॥ ५७ ॥

शिष्यो मम सखा चैव प्रियो s स्याहं प्रियश्च मे ।

युयुधानः सहायो मे प्रमथिष्यति कौरवान् ॥ ५८ ॥

‘ सात्यकि मेरा शिष्य और सखा है । मैं उसको प्रिय हूँ और वह मुझे । युयुधान मेरा सहायक होकर मेरे विपक्षी कौरवोंका संहार कर डालेगा ॥ ५८ ॥

अस्मदर्थं च राजेन्द्र संनह्येद् यदि केशवः ।

रामो वाप्यनिरुद्धो वा प्रद्युम्नो वा महारथः ॥ ५ ९ ॥

गदो वा सारणो वापि साम्बो वा सह वृष्णिभिः ।

सहायार्थं महाराज संग्रामोत्तममूर्धनि ॥ ६० ॥

तथाप्यहं नरव्याघ्रं शैनेयं सत्यविक्रमम् ।

साहाय्ये विनियोक्ष्यामि नास्ति मेऽन्यो हि तत्समः ॥ ६१ ॥

‘ राजेन्द्र! महाराज! यदि युद्धके श्रेष्ठ मुहानेपर हमारी सहायताके लिये भगवान् श्रीकृष्ण, बलराम, अनिरुद्ध, महारथी प्रद्युम्न, गद, सारण अथवा वृष्णिवंशियोंसहित साम्ब कवच धारण करके तैयार होंगे, तो भी मैं पुरुषसिंह सत्यपराक्रमी शिनिपौत्र सात्यकिको अवश्य ही अपनी सहायताके कार्यमें नियुक्त करूँगा; क्योंकि मेरी दृष्टिमें दूसरा कोई सात्यकिके समान नहीं है ' ॥ ५ ९ –६१ ॥ इति द्वैतवने तात मामुवाच धनंजयः ।

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परोक्षे त्वद्गुणांस्तथ्यान् कथयन्नार्यसंसदि ॥ ६२ ॥

तात! इस प्रकार अर्जुनने द्वैतवनमें श्रेष्ठ पुरुषोंकी सभामें तुम्हारे यथार्थ गुणोंका वर्णन करते हुए परोक्षमें मुझसे उपर्युक्त बातें कही थीं ॥ ६२ ॥

तस्य त्वमेवं संकल्पं न वृथा कर्तुमर्हसि ।

धनंजयस्य वार्ष्णेय मम भीमस्य चोभयोः ॥ ६३ ॥

वार्ष्णेय! अर्जुनका, मेरा, भीमसेनका तथा दोनों माद्रीकुमारोंका तुम्हारे विषयमें जो वैसा संकल्प है, उसे तुम्हें व्यर्थ नहीं करना चाहिये ॥ ६३ ॥

यच्चापि तीर्थानि चरन्नगच्छं द्वारकां प्रति ।

तत्राहमपि ते भक्तिमर्जुनं प्रति दृष्टवान् ॥ ६४ ॥

जब मैं तीर्थोंमें विचरता हुआ द्वारकामें गया था, वहाँ भी अर्जुनके प्रति जो तुम्हारा भक्तिभाव है, उसे मैंने प्रत्यक्ष देखा था ॥ ६४ ॥

न तत् सौहृदमन्येषु मया शैनेय लक्षितम् ।

यथा त्वमस्मान् भजसे वर्तमानानुपप्लवे ॥ ६५ ॥

शैनेय! इस विनाशकारी संकटमें पड़े हुए हमलोगोंकी तुम जिस प्रकार सेवा एवं सहायता कर रहे हो, वैसा सौहार्द मैंने तुम्हारे सिवा दूसरोंमें नहीं देखा है ॥ ६५ ॥

सोऽभिजात्या च भक्त्या च सख्यस्याचार्यकस्य च ।

सौहृदस्य च वीर्यस्य कुलीनत्वस्य माधव ॥ ६६ ॥

सत्यस्य च महाबाहो अनुकम्पार्थमेव च ।

अनुरूपं महेष्वास कर्म त्वं कर्तुमर्हसि ॥ ६७ ॥

महाबाहु महाधनुर्धर माधव! वही तुम हमलोगोंपर कृपा करनेके लिये ही उत्तम कुलमें जन्म-ग्रहण, अर्जुनके प्रति भक्तिभाव, मैत्री, गुरुभाव, सौहार्द, पराक्रम, कुलीनता और सत्यके अनुरूप कर्म करो ॥ ६६-६७ ॥

सुयोधनो हि सहसा गतो द्रोणेन दंशितः ।

पूर्वमेवानुयातास्ते कौरवाणां महारथाः ॥ ६८ ॥

द्रोणाचार्यद्वारा दी गयी कवचधारणासे सुरक्षित हो दुर्योधन सहसा अर्जुनका सामना करनेके लिये गया है । बहुतेरे कौरव महारथियोंने पहलेसे ही उसका पीछा किया था ॥ ६८ ॥

सुमहान् निनदश्चैव श्रूयते विजयं प्रति ।

स शैनेय जवेनाशु गन्तुमर्हसि मानद ॥ ६ ९ ॥

जहाँ अर्जुन हैं, उस ओर बड़े जोरकी गर्जना सुनायी दे रही है । अतः दूसरोंको मान देनेवाले शैनेय! तुम्हें शीघ्रतापूर्वक बड़े वेगसे वहाँ जाना चाहिये ॥ ६ ९ ॥

भीमसेनो वयं चैव संयत्ताः सहसैनिकाः ।

द्रोणमावारयिष्यामो यदि त्वां प्रति यास्यति ॥ ७० ॥

पृष्ठ 735

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भीमसेन और हमलोग अपने सैनिकोंके साथ सब प्रकारसे सावधान हैं । यदि द्रोणाचार्य तुम्हारा पीछा करेंगे तो हम सब लोग उन्हें रोकेंगे ॥ ७० ॥

पश्य शैनेय सैन्यानि द्रवमाणानि संयुगे ।

महान्तं च रणे शब्दं दीर्यमाणां च भारतीम् ॥ ७१ ॥

शैनेय! वह देखो, उधर युद्धस्थलमें सेनाएँ भाग रही हैं । रणक्षेत्रमें महान् कोलाहल हो रहा है और मोरचेबंदी करके खड़ी हुई कौरवी सेनामें दरारें पड़ रही हैं ॥ ७१ ॥

महामारुतवेगेन समुद्रमिव पर्वसु ।

धार्तराष्ट्रबलं तात विक्षिप्तं सव्यसाचिना ॥ ७२ ॥

तात! पूर्णिमाके दिन प्रचण्ड वायुके वेगसे विक्षुब्ध हुए समुद्रके समान सव्यसाची अर्जुनके द्वारा पीड़ित हुई दुर्योधनकी सेनामें हलचल मच गयी है ॥ ७२ ॥

रथैर्विपरिधावद्भिर्मनुष्यैश्च हयैश्च ह ।

सैन्यं रजः समुद्धूतमेतत् सम्परिवर्तते ॥ ७३ ॥

इधर- उधर भागते हुए रथों, मनुष्यों और घोड़ोंके द्वारा उड़ी हुई धूलसे आच्छादित हुई यह सारी सेना चक्कर काट रही है ॥ ७३ ॥

संवृतः सिन्धुसौवीरैर्नखरप्रासयोधिभिः ।

अत्यन्तोपचितैः शूरैः फाल्गुनः परवीरहा ॥ ७४ ॥

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला अर्जुन, नखर (बघनखे ) और प्रासोंद्वारा युद्ध करनेवाले तथा अधिक संख्यामें एकत्र हुए सिन्धु- सौवीर देशके शूरवीर सैनिकोंसे घिर गया है ॥ ७४ ॥

नैतद् बलमसंवार्य शक्यो जेतुं जयद्रथः ।

एते हि सैन्धवस्यार्थे सर्वे संत्यक्तजीविताः ॥ ७५ ॥

इस सेनाका निवारण किये बिना जयद्रथको जीतना असम्भव है । ये सभी सैनिक सिन्धुराजके लिये अपना जीवन न्यौछावर कर चुके हैं ॥ ७५ ॥

शरशक्तिध्वजवरं हयनागसमाकुलम् ।

पश्यैतद् धार्तराष्ट्राणामनीकं सुदुरासदम् ॥ ७६ ॥

बाण, शक्ति और ध्वजाओंसे सुशोभित तथा घोड़े और हाथियोंसे भरी हुई कौरवोंकी इस दुर्जय सेनाको देखो ॥ ७६ ॥

शृणु दुन्दुभिनिर्घोषं शङ्खशब्दांश्च पुष्कलान् ।

सिंहनादरवांश्चैव रथनेमिस्वनांस्तथा ॥ ७७ ॥

सुनो, डंकोंकी आवाज हो रही है, जोर- जोरसे शंख बज रहे हैं, वीरोंके सिंहनाद तथा रथोंके पहियोंकी घर्घराहटके शब्द सुनायी पड़ रहे हैं ॥ ७७ ॥

नागानां शृणु शब्दं च पत्तीनां च सहस्रशः ।

सादिनां द्रवतां चैव शृणु कम्पयतां महीम् ॥ ७८ ॥

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हाथियोंके चिग्घाड़नेकी आवाज सुनो । सहस्रों पैदल सिपाहियों तथा पृथ्वीको कम्पित करते हुए दौड़ लगानेवाले घुड़सवारोंके शब्द सुन लो ॥ ७८ ॥

पुरस्तात् सैन्धवानीकं द्रोणानीकं च पृष्ठतः ।

बहुत्वाद्धि नरव्याघ्र देवेन्द्रमपि पीडयेत् ॥ ७ ९ ॥

नरव्याघ्र! अर्जुनके सामने सिन्धुराजकी सेना है और पीछे द्रोणाचार्यकी । इसकी संख्या इतनी अधिक है कि यह देवराज इन्द्रको भी पीड़ित कर सकती है ॥ ७ ९ ॥

अपर्यन्ते बले मग्नो जह्यादपि च जीवितम् ।

तस्मिंश्च निहते युद्धे कथं जीवेत मादृशः ॥ ८० ॥

सर्वथाहमनुप्राप्तः सुकृच्छ्रं त्वयि जीवति । इस अनन्त सैन्यसमुद्रमें डूबकर अर्जुन अपने प्राणोंका भी परित्याग कर देगा । युद्धमें उसके मारे जानेपर मेरे जैसा मनुष्य कैसे जीवित रह सकता है? युयुधान! तुम्हारे जीते- जी मैं सब प्रकारसे बड़े भारी संकटमें पड़ गया हूँ ॥ ८०६३ ॥

श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयश्च पाण्डवः ॥ ८१ ॥

लघ्वस्त्रश्चित्रयोधी च प्रविष्टस्तात भारतीम् ।

सूर्योदये महाबाहुर्दिवसश्चातिवर्तते ॥ ८२ ॥

निद्राविजयी पाण्डुकुमार अर्जुन श्यामवर्णवाला दर्शनीय तरुण है । वह शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाता और विचित्र रीतिसे युद्ध करता है । तात! उस महाबाहु वीरने सूर्योदयके समय अकेले ही कौरवी - सेनामें प्रवेश किया था और अब दिन बीतता चला जा रहा है ॥ ८१-८२ ॥

तन्न जानामि वार्ष्णेय यदि जीवति वा नवा ।

कुरूणां चापि तत् सैन्यं सागरप्रतिमं महत् ॥ ८३ ॥

एक एव च बीभत्सुः प्रविष्टस्तात भारतीम् ।

अविषह्यां महाबाहुः सुरैरपि महाहवे ॥ ८४ ॥

वार्ष्णेय! पता नहीं, इस समयतक अर्जुन जीवित है या नहीं । महासमरमें जिसके वेगको सहन करना देवताओंके लिये भी असम्भव है, कौरवोंकी वह सेना समुद्रके समान विशाल है, तात! उस कौरवी- सेनामें महाबाहु अर्जुनने अकेले ही प्रवेश किया है ॥ ८३-८४ ॥

न हि मे वर्तते बुद्धिरद्य युद्धे कथंचन ।

दोणोऽपि रभसो युद्धे मम पीडयते बलम् ॥ ८५ ॥

आज किसी प्रकार मेरी बुद्धि युद्धमें नहीं लग रही है । इधर द्रोणाचार्य भी युद्धस्थलमें बड़े वेगसे आक्रमण करके मेरी सेनाको पीड़ित कर रहे हैं ॥ ८५ ॥

प्रत्यक्षं ते महाबाहो यथासौ चरति द्विजः ।

युगपच्च समेतानां कार्याणां त्वं विचक्षणः ॥ ८६ ॥

पृष्ठ 737

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महाबाहो! विप्रवर द्रोणाचार्य जैसा कार्य कर रहे हैं, वह सब तुम्हारी आँखोंके सामने है । एक ही समय प्राप्त हुए अनेक कार्योंमेंसे किसका पालन आवश्यक है, इसका निर्णय करनेमें तुम कुशल हो ॥ ८६ ॥

महार्थं लघुसंयुक्तं कर्तुमर्हसि मानद ।

तस्य मे सर्वकार्येषु कार्यमेतन्मतं महत् ॥ ८७ ॥

अर्जुनस्य परित्राणं कर्तव्यमिति संयुगे । मानद! सबसे महान् प्रयोजनको तुम्हें शीघ्रतापूर्वक सम्पन्न करना चाहिये । मुझे तो सब कार्योंमें सबसे महान् कार्य यही जान पड़ता है कि युद्धस्थलमें अर्जुनकी रक्षा की जाय ॥ ८७ ॥

नाहं शोचामि दाशार्हं गोप्तारं जगतः पतिम् ॥ ८८ ॥

स हि शक्तो रणे तात त्रींल्लोकानपि संगतान् ।

विजेतुं पुरुषव्याघ्रः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ८९ ॥

किं पुनर्धार्तराष्ट्रस्य बलमेतत् सुदुर्बलम् । तात! मैं दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके लिये शोक नहीं करता । वे तो सम्पूर्ण जगत्के संरक्षक और स्वामी हैं । युद्धस्थलमें तीनों लोक संघटित होकर आ जायँ तो भी वे पुरुषसिंह श्रीकृष्ण उन सबको परास्त कर सकते हैं, यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ । फिर दुर्योधनकी इस अत्यन्त दुर्बल सेनाको जीतना उनके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ८८-८९ ३ ॥ अर्जुनस्त्वेष वार्ष्णेय पीडितो बहुभिर्युधि ॥ ९० ॥

प्रजह्यात् समरे प्राणांस्तस्माद् विन्दामि कश्मलम् । परंतु वार्ष्णेय! यह अर्जुन तो युद्धस्थलमें बहुसंख्यक सैनिकोंद्वारा पीड़ित होनेपर समरांगणमें अपने प्राणोंका परित्याग कर देगा । इसीलिये मैं शोक और दुःखमें डूबा जा रहा हूँ ॥ ९ ०३ ॥ तस्य त्वं पदवीं गच्छ गच्छेयुस्त्वादृशा यथा ॥ ९ १ ॥ तादृशस्येदृशे काले मादृशेनाभिनोदितः । अतः तुम मेरे - जैसे मनुष्यसे प्रेरित हो ऐसे संकटके समय अर्जुन- जैसे प्रिय सखाके पथका अनुसरण करो, जैसा कि तुम्हारे - जैसे वीर पुरुष किया करते हैं ॥ ९ १३ ॥ रणे वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथौ स्मृतौ ॥ ९ २ ॥ प्रद्युम्नश्च महाबाहुस्त्वं च सात्वत विश्रुतः । सात्वत! वृष्णिवंशी प्रमुख वीरोंमें रणक्षेत्रके लिये दो ही व्यक्ति अतिरथी माने गये हैं— एक तो महाबाहु प्रद्युम्न और दूसरे सुविख्यात वीर तुम ॥ ९ २ ॥ अस्त्रे नारायणसमः संकर्षणसमो बले ॥ ९ ३ ॥ वीरतायां नरव्याघ्र धनंजयसमो ह्यसि ।

पृष्ठ 738

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 738 का मूल पृष्ठ
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नरव्याघ्र! तुम अस्त्रविद्याके ज्ञानमें भगवान् श्रीकृष्णके समान, बलमें बलरामजीके तुल्य और वीरतामें धनंजयके समान हो ॥ ९ ३३ ॥ भीष्मद्रोणावतिक्रम्य सर्वयुद्धविशारदम् ॥ ९ ४ ॥ त्वामेव पुरुषव्याघ्रं लोके सन्तः प्रचक्षते । इस जगत्में भीष्म और द्रोणके बाद तुझ पुरुषसिंह सात्यकिको ही श्रेष्ठ पुरुष सम्पूर्ण युद्धकलामें निपुण बताते हैं ॥ ९ ४ ॥ ( सदेवासुरगन्धर्वान् सकिन्नरमहोरगान् । योधयेत् स जगत् सर्वं विजयेत रिपून् बहुन् । इति ब्रुवन्ति लोकेषु जनास्तव गुणान् सदा । समागमेषु जल्पन्ति पृथगेव च सर्वदा ॥ ) जब अच्छे पुरुषोंका समाज जुटता है, उस समय उसमें आये हुए सब लोग संसारमें तुम्हारे गुणोंको सदा- सर्वदा सबसे विलक्षण ही बतलाते हैं । उनका कहना है कि सात्यकि देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर तथा बड़े-बड़े नागोंसहित बहुसंख्यक शत्रुओंपर विजय पा

सकते हैं । सम्पूर्ण जगत्से अकेले ही युद्ध कर सकते हैं ।

नाशक्यं विद्यते लोके सात्यकेरिति माधव ॥ ९ ५ ॥

तत् त्वां यदभिवक्ष्यामि तत् कुरुष्व महाबल ।

सम्भावना हि लोकस्य मम पार्थस्य चोभयोः ॥ ९ ६ ॥

नान्यथा तां महाबाहो सम्प्रकर्तुमिहार्हसि ।

परित्यज्य प्रियान् प्राणान् रणे चर विभीतवत् ॥ ९ ७ ॥

माधव! लोग कहते हैं कि संसारमें सात्यकिके लिये कोई कार्य असाध्य नहीं है । महाबली वीर! सब लोगोंकी तथा मेरी और अर्जुनकी— दोनों भाइयोंकी तुम्हारे विषयमें बड़ी उत्तम भावना है । अतः मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसका पालन करो । महाबाहो! तुम हमारी पूर्वोक्त धारणाको बदल न देना । समरांगणमें प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर निर्भयके समान विचरो ॥ ९ ५ – ९ ७ ॥

न हि शैनेय दाशार्हा रणे रक्षन्ति जीवितम् ।

अयुद्धमनवस्थानं संग्रामे च पलायनम् ॥ ९ ८ ॥

भीरूणामसतां मार्गो नैष दाशार्हसेवितः । शैनेय! दशार्हकुलके वीर पुरुष रणक्षेत्रमें अपने प्राण बचानेकी चेष्टा नहीं करते हैं । युद्धसे मुँह मोड़ना, युद्धस्थलमें डटे न रहना और संग्रामभूमिमें पीठ दिखाकर भागना यह कायरों और अधम पुरुषोंका मार्ग है । दशार्हकुलके वीर पुरुष इससे दूर रहते हैं ॥ ९ ८६३ ॥ तवार्जुनो गुरुस्तात धर्मात्मा शिनिपुङ्गव ॥ ९९ ॥

वासुदेवो गुरुश्चापि तव पार्थस्य धीमतः ।

पृष्ठ 739

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 739 का मूल पृष्ठ
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तात! शिनिप्रवर! धर्मात्मा अर्जुन तुम्हारा गुरु है तथा भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे और बुद्धिमान् अर्जुनके भी गुरु हैं ॥ ९९ ३ ॥ कारणद्वयमेतद्धि जानंस्त्वामहमब्रुवम् ॥ १०० ॥

मावमंस्था वचो मह्यं गुरुस्तव गुरोर्ह्यहम् । इन दोनों कारणोंको जानकर मैं तुमसे इस कार्यके लिये कह रहा हूँ। तुम मेरी बातकी अवहेलना न करो; क्योंकि मैं तुम्हारे गुरुका भी गुरु हूँ ॥ १००३ ॥

वासुदेवमतं चैव मम चैवार्जुनस्य च ॥ १०१ ॥

सत्यमेतन्मयोक्तं ते याहि यत्र धनंजयः । तुम्हारा वहाँ जाना भगवान् श्रीकृष्णको, मुझको तथा अर्जुनको भी प्रिय है । यह मैंने

तुमसे सच्ची बात कही है । अतः जहाँ अर्जुन है, वहाँ जाओ ॥ १०१ ॥

एतद् वचनमाज्ञाय मम सत्यपराक्रम ॥ १०२ ॥

प्रविशैतद् बलं तात धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । सत्यपराक्रमी वत्स! तुम मेरी इस बातको मानकर दुर्बुद्धि दुर्योधनकी इस सेनामें प्रवेश करो ॥ १०२ ॥

प्रविश्य च यथान्यायं संगम्य च महारथैः ।

यथार्हमात्मनः कर्म रणे सात्वत दर्शय ॥ १०३ ॥

सात्वत! इसमें प्रवेश करके यथायोग्य सब महारथियोंसे मिलकर युद्धमें अपने अनुरूप पराक्रम दिखाओ ॥ १०३ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक एक सौदसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १०५ श्लोक हैं )

पृष्ठ 740

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एकादशाधिकशततमोऽध्यायः सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद संजय उवाच

प्रीतियुक्तं च हृद्यं च मधुराक्षरमेव च ।

कालयुक्तं च चित्रं च न्याय्यं यच्चापि भाषितुम् ॥ १ ॥

धर्मराजस्य तद् वाक्यं निशम्य शिनिपुङ्गवः ।

सात्यकिर्भरतश्रेष्ठ प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥ २ ॥

संजय कहते हैं – राजन्! धर्मराजका वह वचन प्रेमपूर्ण, मनको प्रिय लगनेवाला, मधुर अक्षरोंसे युक्त, सामयिक, विचित्र, कहनेयोग्य तथा न्यायसंगत था । भरतश्रेष्ठ! उसे सुनकर शिनिप्रवर सात्यकिने युधिष्ठिरको इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १-२ ॥

श्रुतं ते गदतो वाक्यं सर्वमेतन्मयाच्युत ।

न्याययुक्तं च चित्रं च फाल्गुनार्थे यशस्करम् ॥ ३ ॥

‘ अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले नरेश! आपने अर्जुनकी सहायताके लिये जो-जो बातें कही हैं, वह सब मैंने सुन लीं । आपका कथन अद्भुत, न्यायसंगत और यशकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ३ ॥

एवंविधे तथा काले मादृशं प्रेक्ष्य सम्मतम् ।

वक्तुमर्हसि राजेन्द्र यथा पार्थं तथैव माम् ॥। ४ ॥

राजेन्द्र! ऐसे समयमें मेरे - जैसे प्रिय व्यक्तिको देखकर आप जैसी बात कह सकते हैं, वैसी ही कही है । आप अर्जुनसे जो कुछ कह सकते हैं, वही आपने मुझसे भी कहा है ॥ ४ ॥

न मे धनंजयस्यार्थे प्राणा रक्ष्याः कथंचन ।

त्वत्प्रयुक्तः पुनरहं किं न कुर्यां महाहवे ॥ ५ ॥

'महाराज! अर्जुनके हितके लिये मुझे किसी प्रकार भी अपने प्राणोंकी रक्षाकी चिन्ता नहीं करनी है; फिर आपका आदेश मिलनेपर मैं इस महायुद्धमें क्या नहीं कर सकता हूँ? ॥ ५ ॥

लोकत्रयं योधयेयं सदेवासुरमानुषम् ।

त्वत्प्रयुक्तो नरेन्द्रेह किमुतैतत् सुदुर्बलम् ॥ ६ ॥

‘ नरेन्द्र! आपकी आज्ञा हो तो देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसहित तीनों लोकोंके साथ मैं युद्ध कर सकता हूँ । फिर यहाँ इस अत्यन्त दुर्बल कौरवी सेनाका सामना करना कौन बड़ी बात है? ॥ ६ ॥

सुयोधनबलं त्वद्य योधयिष्ये समन्ततः ।