04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 761–770
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770
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ऊरुभिः पृथिवी च्छन्ना मनुजानां नराधिप । माननीय नरेश! सारे कौरव- सैनिक सात्यकिके तेजसे मोहित हो अकेले होनेपर भी उन्हें अनेक रूपोंमें देखने लगे । वहाँ बहुसंख्यक रथ चूर- चूर हो गये थे । उनकी बैठकें टूट- फूट गयी थीं । पहियोंके टुकड़े - टुकड़े हो गये थे । छत्र और ध्वज छिन्न - भिन्न होकर धरतीपर पड़े थे । अनुकर्ष, पताका, शिरस्त्राण, सुवर्णभूषित अंगदयुक्त चन्दनचर्चित भुजाएँ, हाथीकी सूँड़ तथा सर्पोंके शरीरके समान मोटे - मोटे ऊरु सब ओर बिखरे पड़े थे । नरेश्वर! मनुष्योंके विभिन्न अंगों तथा रथके पूर्वोक्त अवयवोंसे वहाँकी भूमि आच्छादित हो गयी थी ॥ १३– १५३ ॥ शशाङ्कसंनिभैश्चैव वदनैश्चारुकुण्डलैः ॥ १६ ॥
पतितैर्ऋषभाक्षाणां सा बभावति मेदिनी । वृषभके समान बड़े - बड़े नेत्रोंवाले वीरोंके सीरे हुए मनोहर कुण्डलमण्डित चन्द्रमा - जैसे मुखोंसे वहाँकी भूमि अत्यन्त शोभा पा रही थी ॥ १६३ ॥
गजैश्च बहुधा छिन्नैः शयानैः पर्वतोपमैः ॥ १७ ॥
जातिभृशं भूमिर्विकीर्णेरिव पर्वतैः । अनेकों टुकड़ोंमें कटकर धराशायी हुए पर्वताकार गजराजोंसे वहाँकी भूमि इस प्रकार अत्यन्त शोभासम्पन्न हो रही थी, मानो वहाँ बहुत से पर्वत बिखरे हुए हों ॥ तपनीयमयैर्योक्त्रैर्मुक्ताजालविभूषितैः ॥ १८ ॥
उरश्छदैर्विचित्रैश्च व्यशोभन्त तुरङ्गमाः ।
गतसत्त्वा महीं प्राप्य प्रमृष्टा दीर्घबाहुना ॥ १ ९ ॥
कितने ही घोड़े सुनहरी रस्सियों तथा मोतीकी जालियोंसे विभूषित विचित्र आच्छादन वस्त्रोंसे विशेष शोभायमान हो रहे थे । महाबाहु सात्यकिके द्वारा रौंदे जाकर वे धरतीपर पड़े थे और उनके प्राण - पखेरू उड़ गये ॥ १८-१९ ॥
नानाविधानि सैन्यानि तव हत्वा तु सात्वतः ।
प्रविष्टस्तावकं सैन्यं द्रावयित्वा चमूं भृशम् ॥ २० ॥
इस प्रकार आपकी नाना प्रकारकी सेनाओंका संहार करके तथा बहुत- से सैनिकोंको भगाकर सात्यकि आपकी सेनाके भीतर घुस गये ॥ २० ॥
ततस्तेनैव मार्गेण येन यातो धनंजयः ।
इयेष सात्यकिर्गन्तुं ततो द्रोणेन वारितः ॥ २१ ॥
तदनन्तर जिस मार्गसे अर्जुन गये, उसीसे सात्यकिने भी जानेका विचार किया; परंतु द्रोणाचार्यने उन्हें रोक दिया ॥ २१ ॥
भारद्वाजं समासाद्य युयुधानश्च सात्यकिः ।
न न्यवर्तत संक्रुद्धो वेलामिव जलाशयः ॥ २२ ॥
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अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए सत्यकनन्दन युयुधान द्रोणाचार्यके पास पहुँचकर रुक तो गये; परंतु पीछे नहीं लौटे । जैसे क्षुब्ध जलाशय अपनी तटभूमितक पहुँचकर फिर पीछे नहीं लौटता है ॥ २२ ॥
निवार्य तु रणे द्रोणो युयुधानं महारथम् ।
विव्याध निशितैर्बाणैः पञ्चभिर्मर्मभेदिभिः ॥ २३ ॥
द्रोणाचार्यने रणक्षेत्रमें महारथी युयुधानको रोककर मर्मस्थलको विदीर्ण कर देनेवाले पाँच पैने बाणोंसे उन्हें घायल कर दिया ॥ २३ ॥
सात्यकिस्तु रणे द्रोणं राजन् विव्याध सप्तभिः ।
हेमपुङ्खैः शिलाधौतैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ॥ २४ ॥
राजन्! तब सात्यकिने भी समरांगणमें शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पाँखवाले तथा कंक और मोरकी पाँखोंसे संयुक्त हुए सात बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको क्षत-विक्षत कर डाला ॥ २४ ॥
तं षड्भिः सायकैर्द्रोणः साश्वयन्तारमार्दयत् ।
स तं न ममृषे द्रोणं युयुधानो महारथः ॥ २५ ॥
फिर द्रोणने छः बाण मारकर घोड़ों और सारथिसहित सात्यकिको पीड़ित कर दिया ।
द्रोणाचार्यके इस पराक्रमको महारथी युयुधान सहन न कर सके ॥ २५ ॥
सिंहनादं ततः कृत्वा द्रोणं विव्याध सात्यकिः ।
दशभिः सायकैश्चान्यैः षड्भिरष्टाभिरेव च ॥ २६ ॥
उन्होंने सिंहनाद करके लगातार दस, छः और आठ बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको गहरी चोट पहुँचायी ॥ २६ ॥
युयुधानः पुनर्द्रोणं विव्याध दशभिः शरैः ।
एकेन सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥ २७ ॥
ध्वजमेकेन बाणेन विव्याध युधि मारिष । माननीय नरेश! तदनन्तर युयुधानने पुनः दस बाण मारकर द्रोणाचार्यको घायल कर दिया । फिर एक बाणसे उनके सारथिको, चारसे चारों घोड़ोंको और एक बाणसे उनकी ध्वजाको युद्धस्थलमें बींध डाला ॥ २७ ॥
तं द्रोणः साश्वयन्तारं सरथध्वजमाशुगैः ॥ २८ ॥
त्वरन् प्राच्छादयद् बाणैः शलभानामिव व्रजैः । इसके बाद द्रोणाचार्यने उतावले होकर टिड्डीदलोंके समान अपने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा घोड़े, सारथि, रथ और ध्वजसहित सात्यकिको आच्छादित कर दिया ॥ २८३ ॥
तथैव युयुधानोऽपि द्रोणं बहुभिराशुगैः ॥ २ ९ ॥ आच्छादयदसम्भ्रान्तस्ततो द्रोण उवाच ह ।
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इसी प्रकार सात्यकिने भी बिना किसी घबराहटके बहुत से शीघ्रगामी बाणोंकी वर्षा
करके द्रोणाचार्यको ढक दिया । तब द्रोणाचार्य बोले – ॥ २ ९ ३ ॥
तवाचार्यो रणं हित्वा गतः कापुरुषो यथा ॥ ३० ॥
युध्यमानं च मां हित्वा प्रदक्षिणमवर्तत ।
त्वं हि मे युध्यतो नाद्य जीवन् यास्यसि माधव ॥ ३१ ॥
यदि मां त्वं रणे हित्वा न यास्याचार्यवद् द्रुतम् । ‘ माधव! तुम्हारे आचार्य अर्जुन तो कायरके समान युद्धका मैदान छोड़कर चले गये हैं । मैं युद्ध कर रहा था तो भी मुझे छोड़कर मेरी परिक्रमा करते हुए चल दिये । तुम भी अपने आचार्यके समान तुरंत ही समरांगणमें मुझे छोड़कर चले नहीं जाओगे तो युद्धमें तत्पर रहते हुए मेरे हाथसे आज जीवित बचकर नहीं जा सकोगे' ॥ ३०-३१३ ॥ सात्यकिरुवाच धनंजयस्य पदवीं धर्मराजस्य शासनात् ॥ ३२ ॥
गच्छामि स्वस्ति ते ब्रह्मन् न मे कालात्ययो भवेत् ।
आचार्यानुगतो मार्गः शिष्यैरन्वास्यते सदा ॥ ३३ ॥
तस्मादेव व्रजाम्याशु यथा मे स गुरुर्गतः । सात्यकिने कहा— ब्रह्मन्! आपका कल्याण हो । मैं धर्मराजकी आज्ञासे धनंजयके मार्गपर जा रहा हूँ । आप ऐसा करें, जिससे मुझे विलम्ब न हो। शिष्यगण तो सदासे ही अपने आचार्यके मार्गका ही अनुसरण करते आये हैं । अतः जिस प्रकार मेरे गुरुजी गये हैं, उसी प्रकार मैं भी शीघ्र ही चला जाता हूँ ॥ ३२-३३ ॥ संजय उवाच एतावदुक्त्वा शैनेय आचार्यं परिवर्जयन् ॥ ३४ ॥
प्रयातः सहसा राजन् सारथिं चेदमब्रवीत् । संजय कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर सात्यकि सहसा द्रोणाचार्यको छोड़कर चल दिये और सारथिसे इस प्रकार बोले - ॥ ३४३ ॥
द्रोणः करिष्यते यत्नं सर्वथा मम वारणे ॥ ३५ ॥
यत्तो याहि रणे सूत शृणु चेदं वचः परम् । ‘ सूत! द्रोणाचार्य मुझे रोकनेके लिये सब प्रकारसे प्रयत्न करेंगे, अतः तुम रणक्षेत्रमें सावधान होकर चलो और मेरी यह दूसरी बात भी सुन लो ॥ ३५३ ॥
एतदालोक्यते सैन्यमावन्त्यानां महाप्रभम् ॥ ३६ ॥
अस्यानन्तरतस्त्वेतद् दाक्षिणात्यं महद् बलम् ।
तदनन्तरमेतच्च बाह्निकानां महद् बलम् ॥ ३७ ॥
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‘ यह अवन्तिनिवासियोंकी अत्यन्त तेजस्विनी सेना दिखायी देती है । इसके बाद यह दाक्षिणात्योंकी विशाल सेना है। उसके पश्चात् यह बाह्लिकोंकी विशाल वाहिनी है ॥ ३६-३७ ॥
बाह्लिकाभ्याशतो युक्तं कर्णस्य च महद् बलम् ।
अन्योन्येन हि सैन्यानि भिन्नान्येतानि सारथे ॥ ३८ ॥
‘ बाह्लिकोंके पास ही उनसे जुड़ी हुई कर्णकी बड़ी भारी सेना खड़ी है । सारथे! ये सारी सेनाएँ एक- दूसरीसे भिन्न हैं ॥ ३८ ॥
अन्योन्यं समुपाश्रित्य न त्यक्ष्यन्ति रणाजिरम् ।
एतदन्तरमासाद्य चोदयाश्वान् प्रहृष्टवत् ॥ ३ ९ ॥
' ये सब - की- सब एक- दूसरीका सहारा लेकर युद्धके लिये डटी हुई हैं । ये कभी भी समरांगणका परित्याग नहीं करेंगी । तुम इन्हींके बीचमें होकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घोड़ोंको आगे बढ़ाओ ॥ ३ ९ ॥
मध्यमं जवमास्थाय वह मामत्र सारथे ।
बाह्लिका यत्र दृश्यन्ते नानाप्रहरणोद्यताः ॥ ४० ॥
‘ सारथे! मध्यम वेगका आश्रय लेकर तुम मुझे वहाँ ले चलो, जहाँ नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्र लिये युद्धके लिये उद्यत हुए बाह्लिकदेशीय सैनिक दिखायी देते हैं ॥
दाक्षिणात्याश्च बहवः सूतपुत्रपुरोगमाः ।
हस्त्यश्वरथसम्बाधं यच्चानीकं विलोक्यते ॥ ४१ ॥
नानादेशसमुत्थैश्च पदातिभिरधिष्ठितम् । ‘जहाँ सूतपुत्र कर्णको आगे करके बहुत - से दाक्षिणात्य योद्धा खड़े हैं, हाथी, घोड़ों और रथोंसे भरी हुई जो वह सेना दृष्टिगोचर हो रही है, उसमें अनेक देशोंके पैदल सैनिक मौजूद हैं; तुम वहाँ भी मेरे रथको ले चलो' ॥ ४१३ ॥
एतावदुक्त्वा यन्तारं ब्राह्मणं परिवर्जयन् ॥ ४२ ॥
स व्यतीयाय यत्रोग्रं कर्णस्य च महद् बलम् । सारथिसे ऐसा कहकर सात्यकि ब्राह्मण द्रोणाचार्यको छोड़ते हुए सबको लाँघकर उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ कर्णकी भयंकर एवं विशाल सेना खड़ी थी ॥ ४२ ॥
तं द्रोणोऽनुययौ क्रुद्धो विकिरन् विशिखान् बहून् ॥ ४३ ॥
युयुधानं महाभागं गच्छन्तमनिवर्तिनम् । युद्धसे पीछे न हटनेवाले महाभाग युयुधानको आगे बढ़ते देख द्रोणाचार्य कुपित हो उठे और वे बहुत - से बाणोंकी वर्षा करते हुए कुछ दूरतक उनके पीछे- पीछे दौड़े ॥ ४३३३ ॥
कर्णस्य सैन्यं सुमहदभिहत्य शितैः शरैः ॥ ४४ ॥
प्राविशद् भारतीं सेनामपर्यन्तां च सात्यकिः ।
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सात्यकि कर्णकी विशाल वाहिनीको अपने पैने बाणोंद्वारा घायल करके अपार कौरवी सेनामें घुस गये ॥ प्रविष्टे युयुधाने तु सैनिकेषु द्रुतेषु च ॥ ४५ ॥
अमर्षी कृतवर्मा तु सात्यकिं पर्यवारयत् । सात्यकिके प्रवेश करते ही सारे कौरव-सैनिक भागने लगे । तब क्रोधमें भरे हुए कृतवर्माने उन्हें आ घेरा ॥ तमापतन्तं विशिखैः षड्भिराहत्य सात्यकिः ॥ ४६ ॥
चतुर्भिश्चतुरोऽस्याश्वानाजघानाशु वीर्यवान् । उसे आते देख पराक्रमी सात्यकिने छः बाणोंद्वारा उसे चोट पहुँचाकर चार बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको शीघ्र ही घायल कर दिया ॥ ४६३ ॥
ततः पुनः षोडशभिर्नतपर्वभिराशुगैः ॥ ४७ ॥
सात्यकिः कृतवर्माणं प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । तदनन्तर पुनः झुकी हुई गाँठवाले सोलह बाण मारकर सात्यकिने कृतवर्माकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४७३ ॥
स ताड्यमानो विशिखैर्बहुभिस्तिग्मतेजनैः ॥ ४८ ॥
सात्वतेन महाराज कृतवर्मा न चक्षमे । महाराज! सात्यकिके प्रचण्ड तेजवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा घायल होनेपर कृतवर्मा सहन न कर सका ॥ स वत्सदन्तं संधाय जिह्मगानलसंनिभम् ॥ ४ ९ ॥ आकृष्य राजन्नाकर्णाद् विव्याधोरसि सात्यकिम् । राजन्! वक्रगतिसे चलनेवाले अग्निके समान तेजस्वी वत्सदन्त नामक बाणको धनुषपर रखकर कृतवर्माने उसे कानतक खींचा और उसके द्वारा सात्यकिकी छातीमें प्रहार किया ॥ ४ ९ ॥ स तस्य देहावरणं भित्त्वा देहं च सायकः ॥ ५० ॥
सपुङ्खपत्रः पृथिवीं विवेश रुधिरोक्षितः । वह बाण सात्यकिके शरीर और कवच दोनोंको विदीर्ण करके खूनसे लथपथ हो पंख एवं पत्रसहित धरतीमें समा गया ॥ ५० ॥
अथास्य बहुभिर्बाणैरच्छिनत् परमास्त्रवित् ॥ ५१ ॥
समार्गणगणं राजन् कृतवर्मा शरासनम् । राजन्! कृतवर्मा उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता है। उसने बहुत-से बाण चलाकर बाणसमूहोंसहित सात्यकिके शरासनको काट दिया ॥ ५१३ ॥
विव्याध च रणे राजन् सात्यकिं सत्यविक्रमम् ॥ ५२ ॥
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दशभिर्विशिखैस्तीक्ष्णैरभिक्रुद्धः स्तनान्तरे । नरेश्वर! इसके बाद क्रोधमें भरे हुए कृतवर्माने सत्यपराक्रमी सात्यकिकी छातीमें पुनः दस पैने बाणोंद्वारा गहरा आघात किया ॥ ५२३ ॥
ततः प्रशीर्णे धनुषि शक्त्या शक्तिमतां वरः ॥ ५३ ॥
जघान दक्षिणं बाहुं सात्यकिः कृतवर्मणः । धनुष कट जानेपर शक्तिशाली शूरवीरोंमें श्रेष्ठ सात्यकिने कृतवर्माकी दाहिनी भुजापर शक्तिद्वारा ही प्रहार किया ॥ ५३३ ॥
ततोऽन्यत् सुदृढं चापं पूर्णमायम्य सात्यकिः ॥ ५४ ॥
व्यसृजद् विशिखांस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः ।
सरथं कृतवर्माणं समन्तात् पर्यवारयत् ॥ ५५ ॥
तदनन्तर दूसरे सुदृढ़ धनुषको अच्छी तरह खींचकर सात्यकिने तुरंत ही सैकड़ों और हजारों बाणोंकी वर्षा की और रथसहित कृतवर्माको सब ओरसे ढक दिया ॥ ५५ ॥
छादयित्वा रणे राजन् हार्दिक्यं स तु सात्यकिः ।
अथास्य भल्लेन शिरः सारथेः समकृन्तत ॥ ५६ ॥
राजन्! रणक्षेत्रमें इस प्रकार कृतवर्माको आच्छादित करके सात्यकिने एक भल्ल द्वारा उसके सारथिका सिर काट दिया ॥ ५६ ॥
स पपात हतः सूतो हार्दिक्यस्य महारथात् ।
ततस्ते यन्तृरहिताः प्राद्रवंस्तुरगा भृशम् ॥ ५७ ॥
उनके द्वारा मारा गया सारथि कृतवर्माके विशाल रथसे नीचे गिर पड़ा । फिर तो सारथिके बिना उसके घोड़े बड़े जोरसे भागने लगे ॥ ५७ ॥
अथ भोजस्तु सम्भ्रान्तो निगृह्य तुरगान् स्वयम् तस्थौ वीरो धनुष्पाणिस्तत् सैन्यान्यभ्यपूजयन् ॥ ५८ ॥
इससे कृतवर्माको बड़ी घबराहट हुई; परंतु वह वीर स्वयं ही घोड़ोंको काबूमें करके हाथमें धनुष ले युद्धके लिये डट गया । उसके इस कर्मकी सभी सैनिकोंने भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥ ५८ ॥
स मुहूर्तमिवाश्वस्य सदश्वान् समनोदयत् ।
व्यपेतभीरमित्राणामावहत् सुमहद् भयम् ॥ ५ ९ ॥
उसने थोड़ी ही देरमें आश्वस्त होकर अपने उत्तम घोड़ोंको आगे बढ़ाया तथा स्वयं निर्भय रहकर शत्रुओंके हृदयमें महान् भय उत्पन्न कर दिया ॥ ५ ९ ॥
सात्यकिश्चाभ्यगात् तस्मात् स तु भीममुपाद्रवत् ।
युयुधानोऽपि राजेन्द्र भोजानीकाद् विनिःसृतः ॥ ६० ॥
प्रययौ त्वरितस्तूर्णं काम्बोजानां महाचमूम् ।
स तत्र बहुभिः शूरैः संनिरुद्धो महारथैः ॥ ६१ ॥
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न चचाल तदा राजन् सात्यकिः सत्यविक्रमः । राजेन्द्र! यही अवसर पाकर सात्यकि वहाँसे आगे निकल गये। तब कृतवर्माने भीमसेनपर धावा किया । कृतवर्माकी सेनासे निकलकर युयुधान तुरंत ही काम्बोजोंकी विशाल वाहिनीके पास आ पहुँचे । वहाँ बहुत - से शूरवीर महारथियोंने उन्हें आगे बढ़नेसे रोक दिया । महाराज! तो भी उस समय सत्यपराक्रमी सात्यकि विचलित नहीं हुए ॥ ६०-६१३ ॥ संधाय च चमूं द्रोणो भोजे भारं निवेश्य च ॥ ६२ ॥
अभ्यधावद् रणे यत्तो युयुधानं युयुत्सया । द्रोणाचार्यने अपनी बिखरी हुई सेनाको एकत्र करके उसकी रक्षाका भार कृतवर्माको सौंपकर समरांगणमें सात्यकिके साथ युद्ध करनेकी इच्छासे उद्यत हो उनके पीछे - पीछे दौड़े ॥ ६२ ॥
तथा तमनुधावन्तं युयुधानस्य पृष्ठतः ॥ ६३ ॥
न्यवारयन्त संहृष्टाः पाण्डुसैन्ये बृहत्तमाः । इस प्रकार उन्हें युयुधानके पीछे दौड़ते देख पाण्डव सेनाके प्रमुख वीर हर्षमें भरकर द्रोणाचार्यको रोकनेका प्रयत्न करने लगे ॥ ६३ ॥
समासाद्य तु हार्दिक्यं रथानां प्रवरं रथम् ॥ ६४ ॥
पञ्चाला विगतोत्साहा भीमसेनपुरोगमाः । परंतु रथियोंमें श्रेष्ठ महारथी कृतवर्माके पास पहुँचकर भीमसेनको आगे करके आक्रमण करनेवाले पांचालोंका उत्साह नष्ट हो गया ॥ ६४३ ॥
विक्रम्य वारिता राजन् वीरेण कृतवर्मणा ॥ ६५ ॥
यतमानांश्च तान् सर्वानीषद्विगतचेतसः ।
अभितस्तान् शरौघेण क्लान्तवाहानकारयत् ॥ ६६ ॥
राजन्! वीर कृतवर्माने पराक्रम करके उनको रोक दिया । वे सभी वीर कुछ- कुछ शिथिल एवं अचेत - से हो रहे थे तो भी अपनी विजयके लिये प्रयत्नशील थे; परंतु कृतवर्माने सब ओरसे उनके ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करके उनके वाहनोंको व्याकुल कर दिया ॥ ६५-६६ ॥
निगृहीतास्तु भोजेन भोजानीकेप्सवो रणे ।
अतिष्ठन्नार्यवद् वीराः प्रार्थयन्तो महद्यशः ॥ ६७ ॥
कृतवर्माद्वारा रोके जानेपर वे पाण्डव वीर रणक्षेत्रमें महान् यशकी इच्छा करते हुए उसीकी सेनाके साथ युद्धकी अभिलाषा करके श्रेष्ठ पुरुषोंके समान डटकर खड़े हो गये ॥ ६७ ॥
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिप्रवेशविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६८ श्लोक हैं )
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चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्रका विषादयुक्त वचन, संजयका धृतराष्ट्रको ही दोषी बताना, कृतवर्माका भीमसेन और शिखण्डीके साथ युद्ध तथा पाण्डव - सेनाकी पराजय धृतराष्ट्रउवाच
एवं बहुगुणं सैन्यमेवं प्रविचितं बलम् ।
व्यूढमेवं यथान्यायमेवं बहु च संजय ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – संजय! मेरी सेना इस प्रकार अनेक गुणोंसे सम्पन्न है और इस तरह अधिक संख्यामें इसका संग्रह किया गया है । पाण्डव- सेनाकी अपेक्षा यह प्रबल भी है । इसकी व्यूह -रचना भी इस प्रकार शास्त्रीय विधिके अनुसार की जाती है और इस तरह बहुत - से योद्धाओंका समूह जुट गया है ॥ १ ॥
नित्यं पूजितमस्माभिरभिकामं च नः सदा ।
प्रौढमत्यद्भुताकारं पुरस्ताद् दृष्टविक्रमम् ॥ २ ॥
हमलोगोंने सदा अपनी सेनाका आदर- सत्कार किया है तथा वह हमारे प्रति सदासे ही अनुरक्त भी है । हमारे सैनिक युद्धकी कलामें बढ़े- चढ़े हैं। हमारा सैन्यसमुदाय देखने में अद्भुत जान पड़ता है तथा इस सेनामें वे ही लोग चुन - चुनकर रखे गये हैं जिनका पराक्रम पहलेसे ही देख लिया गया है ॥ २ ॥
नातिवृद्धमबालं च नाकृशं नातिपीवरम् ।
लघुवृत्तायतप्रायं सारगात्रमनामयम् ॥ ३ ॥
इसमें न तो कोई अधिक बूढ़ा है, न बालक है, न अधिक दुबला है और न बहुत ही मोटा है । उनका शरीर हलका, सुडौल तथा प्रायः लंबा है । शरीरका एक- एक अवयव सारवान् ( सबल ) तथा सभी सैनिक नीरोग एवं स्वस्थ हैं ॥ ३ ॥
आत्तसंनाहसंछन्नं बहुशस्त्रपरिच्छदम् ।
शस्त्रग्रहणविद्यासु बह्वीषु परिनिष्ठितम् ॥ ४ ॥
इन सैनिकोंका शरीर बँधे हुए कवचसे आच्छादित है । इनके पास शस्त्र आदि आवश्यक सामग्रियोंकी बहुतायत है । ये सभी सैनिक शस्त्रग्रहणसम्बन्धी बहुत - सी विद्याओंमें प्रवीण हैं ॥ ४ ॥
आरोहे पर्यवस्कन्दे सरणे सान्तरप्लुते ।
सम्यक्प्रहरणे याने व्यपयाने च कोविदम् ॥ ५ ॥
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चढ़ने, उतरने, फैलने, कूद- कूदकर चलने, भली- भाँति प्रहार करने, युद्धके लिये जाने और अवसर देखकर पलायन करनेमें भी कुशल हैं ॥ ५ ॥
नागेष्वश्वेषु बहुशो रथेषु च परीक्षितम् ।
परीक्ष्य च यथान्यायं वेतनेनोपपादितम् ॥ ६ ॥
हाथियों, घोड़ों तथा रथोंपर बैठकर युद्ध करनेकी कलामें सब लोगोंकी परीक्षा ली जा चुकी है और परीक्षा लेनेके पश्चात् उन्हें यथायोग्य वेतन दिया गया है ॥ ६ ॥
न गोष्ठया नोपकारेण न सम्बन्धनिमित्ततः ।
नानाहूतं नाप्यभृतं मम सैन्यं बभूव ह ॥ ७ ॥
हमने किसीको भी गोष्ठीद्वारा बहकाकर, उपकार करके अथवा किसी सम्बन्धके कारण सेनामें भर्ती नहीं किया है । इनमें ऐसा भी कोई नहीं है जिसे बुलाया न गया हो
अथवा जिसे बेगारमें पकड़कर लाया गया हो । मेरी सारी सेनाकी यही स्थिति है ॥ ७ ॥
कुलीनार्यजनोपेतं तुष्टपुष्टमनुद्धतम् ।
कृतमानोपचारं च यशस्वि च मनस्वि च ॥ ८ ॥
इसमें सभी लोग कुलीन, श्रेष्ठ, हृष्ट-पुष्ट, उद्दण्डताशून्य, पहलेसे सम्मानित, यशस्वी तथा मनस्वी हैं ॥
सचिवैश्चापरैर्मुख्यैर्बहुभिः पुण्यकर्मभिः ।
लोकपालोपमैस्तात पालितं नरसत्तमैः ॥ ९ ॥
तात! हमारे मन्त्री तथा अन्य बहुतेरे प्रमुख कार्यकर्ता जो पुण्यात्मा, लोकपालोंके समान पराक्रमी और मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं, सदा इस सेनाका पालन करते आये हैं ॥ ९ ॥
बहुभिः पार्थिवैर्गुप्तमस्मत्प्रियचिकीर्षुभिः ।
अस्मानभिसृतैः कामात् सबलैः सपदानुगैः ॥ १० ॥
हमारा प्रिय करनेकी इच्छावाले तथा सेना और अनुचरोंसहित स्वेच्छासे ही हमारे पक्षमें आये हुए बहुत- से भूपालगण भी इसकी रक्षामें तत्पर रहते हैं ॥
महोदधिमिवापूर्णमापगाभिः समन्ततः ।
अपक्षैः पक्षिसंकाशै रथैरश्वैश्च संवृतम् ॥ ११ ॥
सम्पूर्ण दिशाओंसे बहकर आयी हुई नदियोंसे परिपूर्ण होनेवाले महासागरके समान हमारी यह सेना अगाध और अपार है । पक्षरहित एवं पक्षियोंके समान तीव्र वेगसे चलनेवाले रथों और घोड़ोंसे यह भरी हुई है ॥ ११ ॥
प्रभिन्नकरटैश्चैव द्विरदैरावृतं महत् ।
यदहन्यत मे सैन्यं किमन्यद् भागधेयतः ॥ १२ ॥
गण्डस्थलसे मद बहानेवाले गजराजोंद्वारा आवृत यह मेरी विशाल वाहिनी यदि शत्रुओंद्वारा मारी गयी है तो इसमें भाग्यके सिवा दूसरा क्या कारण हो सकता है? ॥ १२ ॥
योधाक्षय्यजलं भीमं वाहनोर्मितरङ्गिणम् ।