04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 771–780

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780

पृष्ठ 771

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 771 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्रासझषाकुलम् ॥ १३ ॥

ध्वजभूषणसम्बाधरत्नोपलसुसंचितम् ।

वाहनैरभिधावद्भिर्वायुवेगविकम्पितम् ॥ १४ ॥

द्रोणगम्भीरपातालं कृतवर्ममहाह्रदम् ।

जलसंधमहाग्राहं कर्णचन्द्रोदयोद्धतम् ॥ १५ ॥

संजय! मेरी सेना भयंकर समुद्रके समान जान पड़ती है । योद्धा ही इसके अक्षय जल हैं, वाहन ही इसकी तरंगमालाएँ हैं, क्षेपणीय, खड्ग, गदा, शक्ति, बाण और प्रास आदि अस्त्र- शस्त्र इसमें मछलियोंके समान भरे हुए हैं। ध्वजा और आभूषणोंके समुदाय इसके भीतर रत्नोंके समान संचित हैं । दौड़ते हुए वाहन ही वायुके वेग हैं, जिनसे यह सैन्यसमुद्र कम्पित एवं क्षुब्ध - सा जान पड़ता है । द्रोणाचार्य ही इसकी पातालतक फैली हुई गहराई है । कृतवर्मा इसमें महान् ह्रदके समान है, जलसंध विशाल ग्राह है और कर्णरूपी चन्द्रमाके उदयसे यह सदा उद्वेलित होता रहता है ॥ १३–१५ ॥

गते सैन्यार्णवं भित्त्वा तरसा पाण्डवर्षभे ।

संजयैकरथेनैव युयुधाने च मामकम् ॥ १६ ॥

तत्र शेषं न पश्यामि प्रविष्टे सव्यसाचिनि ।

सात्वते च रथोदारे मम सैन्यस्य संजय ॥ १७ ॥

संजय! ऐसे मेरे सैन्यरूपी महासागरका वेगपूर्वक भेदन करके जब पाण्डवश्रेष्ठ सव्यसाची अर्जुन तथा सात्वतवंशी उदार महारथी युयुधान एकमात्र रथकी सहायतासे इसके भीतर घुस गये, तब मैं अपनी सेनाके शेष रहनेकी आशा नहीं देखता हूँ ॥ १६-१७ ॥

तौ तत्र समतिक्रान्तौ दृष्ट्वातीव तरस्विनौ ।

सिन्धुराजं तु सम्प्रेक्ष्य गाण्डीवस्येषुगोचरे ॥ १८ ॥

किं नु वा कुरवः कृत्यं विदधुः कालचोदिताः ।

दारुणैकायने काले कथं वा प्रतिपेदिरे ॥ १ ९ ॥

उन दोनों अत्यन्त वेगशाली वीरोंको वहाँ सबका उल्लंघन करके घुसे हुए देख तथा सिन्धुराज जयद्रथको गाण्डीवसे छूटे हुए बाणोंकी सीमामें उपस्थित पाकर कालप्रेरित कौरवोंने वहाँ कौन - सा कार्य किया? उस दारुण संहारके समय, जहाँ मृत्युके सिवा दूसरी कोई गति नहीं थी, किस प्रकार उन्होंने कर्तव्यका निश्चय किया? ॥ १८-१९ ॥

ग्रस्तान् हि कौरवान् मन्ये मृत्युना तात संगतान् ।

विक्रमोऽपि रणे तेषां न तथा दृश्यते हि वै ॥ २० ॥

तात! मैं युद्धस्थलमें एकत्र हुए कौरवोंको कालका ग्रास ही मानता हूँ; क्योंकि रणक्षेत्रमें उनका पराक्रम भी पहले जैसा नहीं दिखायी देता है ॥ २० ॥

अक्षतौ संयुगे तत्र प्रविष्टौ कृष्णपाण्डवौ ।

पृष्ठ 772

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 772 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

न च वारयिता कश्चित् तयोरस्तीह संजय ॥ २१ ॥

संजय! श्रीकृष्ण और अर्जुन बिना कोई क्षति उठाये युद्धस्थलमें मेरी सेनाके भीतर घुस गये; परंतु इसमें कोई भी वीर उन दोनोंको रोकनेवाला न निकला ॥ २१ ॥

भृताश्च बहवो योधाः परीक्ष्यैव महारथाः ।

वेतनेन यथायोगं प्रियवादेन चापरे ॥ २२ ॥

हमने दूसरे बहुत - से महारथी योद्धाओंकी परीक्षा करके ही उन्हें सेनामें भर्ती किया है और यथायोग्य वेतन देकर तथा प्रिय वचन बोलकर उनका सत्कार किया है ॥ २२ ॥

असत्कारभृतस्तात मम सैन्ये न विद्यते ।

कर्मणा ह्यनुरूपेण लभ्यते भक्तवेतनम् ॥ २३ ॥

तात! मेरी सेनामें कोई भी ऐसा नहीं है, जिसे अनादरपूर्वक रखा गया हो । सबको उनके कार्यके अनुरूप ही भोजन और वेतन प्राप्त होता है ॥ २३ ॥

न चायोधोऽभवत् कश्चिन्मम सैन्ये तु संजय ।

अल्पदानभृतस्तात तथा चाभृतको नरः ॥ २४ ॥

तात संजय! मेरी सेनामें ऐसा एक भी योद्धा नहीं रहा होगा जिसे थोड़ा वेतन दिया जाता हो अथवा बिना वेतनके ही रखा गया हो ॥ २४ ॥

पूजितो हि यथाशक्त्या दानमानासनैर्मया ।

तथा पुत्रैश्च मे तात ज्ञातिभिश्च सबान्धवैः ॥ २५ ॥

तात! मैंने, मेरे पुत्रोंने तथा कुटुम्बीजनों एवं बन्धु बान्धवोंने भी सभी सैनिकोंका यथाशक्ति दान, मान और आसन आदि देकर सत्कार किया है ॥ २५ ॥

ते च प्राप्यैव संग्रामे निर्जिताः सव्यसाचिना ।

शैनेयेन परामृष्टाः किमन्यद् भागधेयतः ॥ २६ ॥

तथापि सव्यसाची अर्जुनने संग्रामभूमिमें पहुँचते ही उन सबको पराजित कर दिया है और सात्यकिने भी उन्हें कुचल डाला है । इसे भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है? ॥ २६ ॥

रक्ष्यते यश्च संग्रामे ये च संजय रक्षिणः ।

एकः साधारणः पन्था रक्ष्यस्य सह रक्षिभिः ॥ २७ ॥

संजय! संग्राममें जिसकी रक्षा की जाती है और जो लोग रक्षक हैं, उन रक्षकोंसहित रक्षणीय पुरुषके लिये एकमात्र साधारण मार्ग रह गया है पराजय ॥ २७ ॥

अर्जुनं समरे दृष्ट्वा सैन्धवस्याग्रतः स्थितम् ।

पुत्रो मम भृशं मूढः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ॥ २८ ॥

अर्जुनको समरांगणमें सिन्धुराजके सामने खड़ा देख अत्यन्त मोहग्रस्त हुए मेरे पुत्रने कौन-- सा कर्तव्य निश्चित किया? ॥ २८ ॥

सात्यकिं च रणे दृष्ट्वा प्रविशन्तमभीतवत् ।

पृष्ठ 773

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 773 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

किं नु दुर्योधनः कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ॥ २ ९ ॥ सात्यकिको रणक्षेत्रमें निर्भय- सा प्रवेश करते देख दुर्योधनने उस समयके लिये कौन-सा कर्तव्य उचित माना? ॥ २ ९ ॥

सर्वशस्त्रातिगौ सेनां प्रविष्टौ रथिसत्तमौ ।

दृष्ट्वा कां वै धृतिं युद्धे प्रत्यपद्यन्त मामकाः ॥ ३० ॥

सम्पूर्ण शस्त्रोंकी पहुँचसे परे होकर जब रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकि और अर्जुन मेरी सेनामें प्रविष्ट हो गये, तब उन्हें देखकर मेरे पुत्रोंने युद्धस्थलमें किस प्रकार धैर्य धारण किया? ॥ ३० ॥

दृष्ट्वा कृष्णं तु दाशार्हमर्जुनार्थे व्यवस्थितम् ।

शिनीनामृषभं चैव मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३१ ॥

मैं समझता हूँ कि अर्जुनके लिये रथपर बैठे हुए दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको तथा शिनिप्रवर सात्यकिको देखकर मेरे पुत्र शोकमग्न हो गये होंगे ॥ ३१ ॥

दृष्ट्वा सेनां व्यतिक्रान्तां सात्वतेनार्जुनेन च ।

पलायमानांश्च कुरून् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३२ ॥

सात्यकि और अर्जुनको सेना लाँघकर जाते और कौरव- सैनिकोंको युद्धस्थलसे भागते देखकर मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोकमें डूब गये होंगे ॥ ३२ ॥

विद्रुतान् रथिनो दृष्ट्वा निरुत्साहान् द्विषज्जये ।

पलायनकृतोत्साहान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३३ ॥

मेरे मनमें यह बात आती है कि अपने रथियोंको शत्रु - विजयकी ओरसे उत्साहशून्य होकर भागते और भागनेमें ही बहादुरी दिखाते देख मेरे पुत्र शोक कर रहे होंगे ॥ ३३ ॥

शून्यान् कृतान् रथोपस्थान् सात्वतेनार्जुनेन च ।

हतांश्च योधान् संदृश्य मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३४ ॥

सात्यकि और अर्जुनने हमारी रथोंकी बैठकें सूनी कर दी हैं और योद्धाओंको मार गिराया है, यह देखकर मैं सोचता हूँ कि मेरे पुत्र बहुत दुःखी हो गये होंगे ॥ ३४ ॥

व्यश्वनागरथान् दृष्ट्वा तत्र वीरान् सहस्रशः ।

धावमानान् रणे व्यग्रान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३५ ॥

सहस्रों वीरोंको वहाँ युद्धके मैदानमें घोड़े, रथ और हाथियोंसे रहित एवं उद्विग्न होकर भागते देखकर मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र शोकमग्न हो गये होंगे ॥ ३५ ॥

महानागान् विद्रवतो दृष्ट्वार्जुनशराहतान् ।

पतितान् पततश्चान्यान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३६ ॥

अर्जुनके बाणोंसे आहत होकर बड़े - बड़े गजराजोंको भागते, गिरते और गिरे हुए देखकर मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे होंगे ॥ ३६ ॥

विहीनांश्च कृतानश्वान् विरथांश्च कृतान् नरान् ।

पृष्ठ 774

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 774 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तत्र सात्यकिपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३७ ॥

सात्यकि और अर्जुनने घोड़ोंको सवारोंसे हीन और मनुष्योंको रथसे वंचित कर दिया है । यह देख - सुनकर मेरे पुत्र शोकमें डूब रहे होंगे ॥ ३७ ॥

हयौघान् निहतान् दृष्ट्वा द्रवमाणांस्ततस्ततः ।

रणे माधवपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३८ ॥

रणक्षेत्रमें सात्यकि और अर्जुनद्वारा मारे गये तथा इधर- उधर भागते हुए अश्वसमूहोंको देखकर मैं मानता हूँ कि मेरे पुत्र शोकदग्ध हो रहे होंगे ॥ ३८ ॥

पत्तिसंघान् रणे दृष्ट्वा धावमानांश्च सर्वशः ।

निराशा विजये सर्वे मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ३ ९ ॥

पैदल सिपाहियोंको रणक्षेत्रमें सब ओर भागते देख मैं समझता हूँ, मेरे सभी पुत्र विजयसे निराश हो शोक कर रहे होंगे ॥ ३ ९ ॥

द्रोणस्य समतिक्रान्तावनीकमपराजितौ ।

क्षणेन दृष्ट्वा तौ वीरौ मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥ ४० ॥

मेरे मनमें यह बात आती है कि किसीसे पराजित न होनेवाले दोनों वीर अर्जुन और सात्यकिको क्षणभरमें द्रोणाचार्यकी सेनाका उल्लंघन करते देख मेरे पुत्र शोकाकुल हो गये होंगे ॥ ४० ॥

सम्मूढोऽस्मि भृशं तात श्रुत्वा कृष्णधनंजयौ ।

प्रविष्टौ मामकं सैन्यं सात्वतेन सहाच्युतौ ॥ ४१ ॥

तात! अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीकृष्ण और अर्जुनके सात्यकिसहित अपनी सेनामें घुसनेका समाचार सुनकर मैं अत्यन्त मोहित हो रहा हूँ ॥ ४१ ॥

तस्मिन् प्रविष्टे पृतनां शिनीनां प्रवरे रथे ।

भोजानीकं व्यतिक्रान्ते किमकुर्वत कौरवाः ॥ ४२ ॥

शिनिप्रवर महारथी सात्यकि जब कृतवर्माकी सेनाको लाँघकर कौरवी सेनामें प्रविष्ट हो गये तब कौरवोंने क्या किया? ॥ ४२ ॥

तथा द्रोणेन समरे निगृहीतेषु पाण्डुषु ।

कथं युद्धमभूत् तत्र तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ४३ ॥

संजय! जब द्रोणाचार्यने समरभूमिमें पूर्वोक्त प्रकारसे पाण्डवोंको रोक दिया, तब वहाँ किस प्रकार युद्ध हुआ? यह सब मुझे बताओ ॥ ४३ ॥

द्रोणो हि बलवान् श्रेष्ठः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः ।

पञ्चालास्ते महेष्वासं प्रत्यविध्यन् कथं रणे ॥ ४४ ॥

बद्धवैरास्ततो द्रोणे धनंजयजयैषिणः ।

पृष्ठ 775

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 775 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्रोणाचार्य अस्त्रविद्यामें निपुण, युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले, बलवान् एवं श्रेष्ठ वीर हैं । पांचाल - सैनिकोंने उस समय रणक्षेत्रमें महाधनुर्धर द्रोणको किस प्रकार घायल किया? क्योंकि वे द्रोणाचार्यसे वैर बाँधकर अर्जुनकी विजयकी अभिलाषा रखते थे ॥ ४४३ ॥

भारद्वाजसुतस्तेषु दृढवैरो महारथः ॥ ४५ ॥

अर्जुनश्चापि यच्चक्रे सिन्धुराजवधं प्रति ।

तन्मे सर्वं समाचक्ष्व कुशलो ह्यसि संजय ॥। ४६ ॥

संजय! भरद्वाजके पुत्र महारथी अश्वत्थामा भी पांचालोंसे दृढ़तापूर्वक वैर बाँधे हुए थे । अर्जुनने सिन्धुराज जयद्रथका वध करनेके लिये जो - जो उपाय किया, वह सब मुझसे कहो; क्योंकि तुम कथा कहनेमें कुशल हो ॥ संजय उवाच

आत्मापराधात् सम्भूतं व्यसनं भरतर्षभ ।

प्राप्य प्राकृतवद् वीर न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ४७ ॥

संजयने कहा — भरतश्रेष्ठ! यह सारी विपत्ति आपको अपने ही अपराधसे प्राप्त हुई है । वीर! इसे पाकर निम्न कोटिके मनुष्योंकी भाँति शोक न कीजिये ॥ ४७ ॥

पुरा यदुच्यसे प्राज्ञैः सुहृद्भिर्विदुरादिभिः ।

मा हार्षीः पाण्डवान् राजन्निति तन्न त्वया श्रुतम् ॥ ४८ ॥

पहले जब आपके बुद्धिमान् सुहृद् विदुर आदिने आपसे कहा था कि राजन्! आप पाण्डवोंके राज्यका अपहरण न कीजिये, तब आपने उनकी यह बात नहीं सुनी थी ॥ ४८ ॥

सुहृदां हितकामानां वाक्यं यो न शृणोति ह ।

स महद् व्यसनं प्राप्य शोचते वै यथा भवान् ॥ ४ ९ ॥

जो हितैषी सुहृदोंकी बात नहीं सुनता है, वह भारी संकटमें पड़कर आपके ही समान शोक करता है ॥ ४ ९ ॥

याचितोऽसि पुरा राजन् दाशार्हेण शमं प्रति ।

न च तं लब्धवान् कामं त्वत्तः कृष्णो महायशाः ॥ ५० ॥

राजन्! दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने पहले आपसे शान्तिके लिये याचना की थी; परंतु आपकी ओरसे उन महायशस्वी श्रीकृष्णकी वह इच्छा पूरी नहीं की गयी ॥ ५० ॥

तव निर्गुणतां ज्ञात्वा पक्षपातं सुतेषु च ।

द्वैधीभावं तथा धर्मे पाण्डवेषु च मत्सरम् ॥ ५१ ॥

तव जिह्ममभिप्रायं विदित्वा पाण्डवान् प्रति ।

आर्तप्रलापांश्च बहून् मनुजाधिपसत्तम ॥ ५२ ॥

सर्वलोकस्य तत्त्वज्ञः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।

पृष्ठ 776

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 776 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वासुदेवस्ततो युद्धं कुरूणामकरोन्महत् ॥ ५३ ॥

नृपश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंके तत्त्वज्ञ तथा सर्वलोकेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने जब यह जान लिया कि आप सर्वथा सद्गुणशून्य हैं, अपने पुत्रोंपर पक्षपात रखते हैं, धर्मके विषयमें आपके मनमें दुविधा बनी हुई है, पाण्डवोंके प्रति आपके हृदयमें डाह है, आप उनके प्रति कुटिलतापूर्ण मनसूबे बाँधते रहते हैं और व्यर्थ ही आर्त मनुष्योंके समान बहुत- सी बातें बनाते हैं, तब उन्होंने कौरव- पाण्डवोंके महान् युद्धका आयोजन किया ॥ ५१–५३ ॥

आत्मापराधात् सुमहान् प्राप्तस्ते विपुलः क्षयः ।

नैनं दुर्योधने दोषं कर्तुमर्हसि मानद ॥ ५४ ॥

मानद! अपने ही अपराधसे आपके सामने यह महान् जनसंहार प्राप्त हुआ है । आपको यह सारा दोष दुर्योधनपर नहीं मढ़ना चाहिये ॥ ५४ ॥

न हि ते सुकृतं किंचिदादौ मध्ये च भारत ।

दृश्यते पृष्ठतश्चैव त्वन्मूलो हि पराजयः ॥ ५५ ॥

भारत! मुझे तो आगे, पीछे या बीचमें आपका कोई भी शुभ कर्म नहीं दिखायी देता ।

इस पराजयकी जड़ आप ही हैं ॥ ५५ ॥

तस्मादवस्थितो भूत्वा ज्ञात्वा लोकस्य निर्णयम् ।

शृणु युद्धं यथावृत्तं घोरं देवासुरोपमम् ॥ ५६ ॥

इसलिये स्थिर होकर और लोकके नियत स्वभावको जानकर देवासुर संग्रामके समान भयंकर इस कौरव - पाण्डव - युद्धका यथार्थ वृत्तान्त सुनिये ॥ ५६ ॥

प्रविष्टे तव सैन्यं तु शैनेये सत्यविक्रमे ।

भीमसेनमुखाः पार्थाः प्रतीयुर्वाहिनीं तव ॥ ५७ ॥

जब सत्यपराक्रमी सात्यकि कौरव सेनामें प्रविष्ट हो गये, तब भीमसेन आदि कुन्तीकुमारोंने आपकी विशाल वाहिनीपर आक्रमण किया ॥ ५७ ॥

आगच्छतस्तान् सहसा क्रुद्धरूपान् सहानुगान् ।

दधारैको रणे पाण्डून् कृतवर्मा महारथः ॥ ५८ ॥

सेवकोंसहित कुपित होकर सहसा आक्रमण करनेवाले उन पाण्डववीरोंको रणक्षेत्रमें एकमात्र महारथी कृतवर्माने रोका ॥ ५८ ॥

यथोद्वृत्तं वारयते वेला वै सलिलार्णवम् ।

पाण्डुसैन्यं तथा संख्ये हार्दिक्यः समवारयत् ॥ ५ ९ ॥

जैसे उद्वेलित हुए महासागरको किनारेकी भूमि आगे बढ़नेसे रोकती है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें कृतवर्माने पाण्डव- सेनाको रोक दिया ॥ ५ ९ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम हार्दिक्यस्य पराक्रमम् ।

यदेनं सहिताः पार्था नातिचक्रमुराहवे ॥ ६० ॥

पृष्ठ 777

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 777 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वहाँ हमने कृतवर्माका अद्भुत पराक्रम देखा । सारे पाण्डव एक साथ मिलकर भी समरांगणमें उसे लाँघ न सके ॥ ६० ॥

ततो भीमस्त्रिभिर्विद्ध्वा कृतवर्माणमाशुगैः ।

शङ्खं दध्मौ महाबाहुर्हर्षयन् सर्वपाण्डवान् ॥ ६१ ॥

तदनन्तर महाबाहु भीमने तीन बाणोंद्वारा कृतवर्माको घायल करके समस्त पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाते हुए शंख बजाया ॥ ६१ ॥

सहदेवस्तु विंशत्या धर्मराजश्च पञ्चभिः ।

शतेन नकुलश्चापि हार्दिक्यं समविध्यत ॥ ६२ ॥

सहदेवने बीस, धर्मराजने पाँच और नकुलने सौ बाणोंसे कृतवर्माको बींध डाला ॥ ६२ ॥

द्रौपदेयास्त्रिसप्तत्या सप्तभिश्च घटोत्कचः ।

धृष्टद्युम्नस्त्रिभिश्चापि कृतवर्माणमार्दयत् ॥ ६३ ॥

द्रौपदीके पुत्रोंने तिहत्तर, घटोत्कचने सात और धृष्टद्युम्नने तीन बाणोंद्वारा उसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ६३ ॥

विराटो द्रुपदश्चैव याज्ञसेनिश्च पञ्चभिः ।

शिखण्डी चैव हार्दिक्यं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः ॥ ६४ ॥

पुनर्विव्याध विंशत्या सायकानां हसन्निव । विराट, द्रुपद और उनके पुत्र धृष्टद्युम्नने पाँच- पाँच बाणोंसे उसको घायल किया । फिर शिखण्डीने पहले पाँच बाणोंद्वारा चोट करके फिर हँसते हुए ही बीस बाणोंसे कृतवर्माको बींध डाला ॥ ६४ ॥

कृतवर्मा ततो राजन् सर्वतस्तान् महारथान् ॥ ६५ ॥

एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा भीमं विव्याध सप्तभिः ।

धनुर्ध्वजं चास्य तथा रथाद् भूमावपातयत् ॥ ६६ ॥

राजन्! उस समय कृतवर्माने चारों ओर बाण चलाकर उन महारथियोंमेंसे प्रत्येकको पाँच बाणोंद्वारा बींध डाला और भीमसेनको सात बाणोंसे घायल कर दिया । फिर तत्काल ही उनके धनुष और ध्वजको काटकर रथसे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ६५-६६ ॥

अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महारथः ।

आजघानोरसि क्रुद्धः सप्तत्या निशितैः शरैः ॥ ६७ ॥

भीमसेनका धनुष कट जानेपर महारथी कृतवर्माने कुपित हो बड़ी उतावलीके साथ सत्तर पैने बाणोंद्वारा उनकी छातीमें गहरा आघात किया ॥ ६७ ॥

स गाढविद्धो बलवान् हार्दिक्यस्य शरोत्तमैः ।

चचाल रथमध्यस्थः क्षितिकम्पे यथाचलः ॥ ६८ ॥

पृष्ठ 778

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 778 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कृतवर्माके श्रेष्ठ बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल हुए बलवान् भीमसेन रथके भीतर बैठे हुए ही भूकम्पके समय हिलनेवाले पर्वतके समान काँपने लगे ॥ ६८ ॥

भीमसेनं तथा दृष्ट्वा धर्मराजपुरोगमाः ।

विसृजन्तः शरान् राजन् कृतवर्माणमार्दयन् ॥ ६९ ॥

राजन्! भीमसेनको वैसी अवस्थामें देखकर धर्मराज आदि महारथियोंने बाणोंकी वर्षा करके कृतवर्माको बड़ी पीड़ा दी ॥ ६ ९ ॥

तं तथा कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष ।

विव्यधुः सायकैर्हृष्टा रक्षार्थं मारुतेर्मृधे ॥ ७० ॥

माननीय नरेश! हर्षमें भरे हुए पाण्डव- सैनिक भीमसेनकी रक्षाके लिये अपने रथसमूहद्वारा कृतवर्माको कोष्ठबद्ध- सा करके उसे युद्धस्थलमें अपने बाणोंका निशाना बनाने लगे ॥ ७० ॥

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां भीमसेनो महाबलः ।

शक्तिं जग्राह समरे हेमदण्डामयस्मयीम् ॥ ७१ ॥

इसी बीचमें महाबली भीमसेनने सचेत होकर समरांगणमें सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एक लोहेकी शक्ति हाथमें ले ली ॥ ७१ ॥

चिक्षेप च रथात् तूर्णं कृतवर्मरथं प्रति सा भीमभुजनिर्मुक्ता निर्मुक्तोरगसंनिभा ॥ ७२ ॥

कृतवर्माणमभितः प्रजज्वाल सुदारुणा । और शीघ्र ही उसे अपने रथसे कृतवर्माके रथपर चला दिया । भीमसेनके हाथोंसे छूटी हुई, केंचुलसे निकले हुए सर्पके समान वह भयंकर शक्ति कृतवर्माके समीप जाकर प्रज्वलित हो उठी ॥ ७२ ॥

तामापतन्तीं सहसा युगान्ताग्निसमप्रभाम् ॥ ७३ ॥

द्वाभ्यां शराभ्यां हार्दिक्यो निजघान द्विधा तदा । उस समय अपने ऊपर आती हुई प्रलयकालकी अग्निके समान उस शक्तिको सहसा दो बाण मारकर कृतवर्माने उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ७३३ ॥

सा छिन्ना पतिता भूमौ शक्तिः कनकभूषणा ॥ ७४ ॥

द्योतयन्ती दिशो राजन् महोल्केव नभश्च्युता । राजन्! सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करती हुई वह सुवर्णभूषित शक्ति कटकर आकाशसे गिरी हुई बड़ी भारी उल्काके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ७४ ॥

शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा भीमश्चक्रोध वै भृशम् ॥ ७५ ॥

ततोऽन्यद् धनुरादाय वेगवत् सुमहास्वनम् ।

भीमसेनो रणे क्रुद्धो हार्दिक्यं समवारयत् ॥ ७६ ॥

पृष्ठ 779

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 779 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अपनी शक्तिको कटी हुई देख भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ । उन्होंने बड़ी भारी टंकारध्वनि करनेवाले दूसरे वेगशाली धनुषको हाथमें लेकर समरांगणमें कुपित हो कृतवर्माका सामना किया ॥ ७५-७६ ॥

अथैनं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ।

भीमो भीमबलो राजंस्तव दुर्मन्त्रितेन च ॥ ७७ ॥

राजन्! आपकी ही कुमन्त्रणासे वहाँ भयंकर बलशाली भीमसेनने कृतवर्माकी छातीमें पाँच बाण मारे ॥ ७७ ||

भोजस्तु क्षतसर्वाङ्गो भीमसेनेन मारिष ।

रक्ताशोक इवोत्फुल्लो व्यभ्राजत रणाजिरे ॥ ७८ ॥

माननीय नरेश! भीमसेनने उन बाणोंद्वारा कृतवर्माके सम्पूर्ण अंगोंको क्षत-विक्षत कर दिया । वह रणांगणमें खूनसे लथपथ हो खिले हुए लाल फूलोंवाले अशोकवृक्षके समान सुशोभित होने लगा ॥ ७८ ॥

ततः क्रुद्धस्त्रिभिर्बाणैर्भीमसेनं हसन्निव ।

अभिहत्य दृढं युद्धे तान् सर्वान् प्रत्यविध्यत ॥ ७९ ॥

त्रिभिस्त्रिभिर्महेष्वासो यतमानान् महारथान् । तदनन्तर उस महाधनुर्धरने क्रोधमें भरकर हँसते हुए ही तीन बाणोंद्वारा भीमसेनको गहरी चोट पहुँचाकर युद्धमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सभी महारथियोंको तीन-तीन बाणोंसे बींध डाला ॥ ७ ९ १३ ॥ तेऽपि तं प्रत्यविध्यन्त सप्तभिः सप्तभिः शरैः ॥ ८० ॥

शिखण्डिनस्ततः क्रुद्धः क्षुरप्रेण महारथः ।

धनुश्चिच्छेद समरे प्रहसन्निव सात्वतः ॥ ८१ ॥

तब उन महारथियोंने भी कृतवर्माको सात - सात बाण मारे। उस समय क्रोधमें भरे हुए महारथी कृतवर्माने हँसते हुए ही समरांगणमें एक क्षुरप्रद्वारा शिखण्डीका धनुष काट डाला ॥ ८०-८१ ॥

शिखण्डी तु ततः क्रुद्धश्छिन्ने धनुषि सत्वरः ।

असिं जग्राह समरे शतचन्द्रं च भास्वरम् ॥ ८२ ॥

धनुष कट जानेपर शिखण्डीने तुरंत ही कुपित हो उस युद्धस्थलमें सौ चन्द्रमाओंके चिह्नसे युक्त चमकीली ढाल और तलवार हाथमें ले ली ॥ ८२ ॥

भ्रामयित्वा महच्चर्म चामीकरविभूषितम् ।

तमसिं प्रेषयामास कृतवर्मरथं प्रति ॥ ८३ ॥

उसने स्वर्णभूषित विशाल ढालको घुमाकर कृतवर्माके रथपर वह तलवार दे मारी ॥ ८३ ॥

स तस्य सशरं चापं छित्त्वा राजन् महानसिः ।

पृष्ठ 780

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 780 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अभ्यगाद् धरणीं राजंश्च्युतं ज्योतिरिवाम्बरात् ॥ ८४ ॥

राजन्! वह महान् खड्ग कृतवर्माके बाणसहित धनुषको काटकर आकाशसे टूटे हुए तारेके समान धरतीमें समा गया ॥ ८४ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु त्वरमाणं महारथाः ।

विव्यधुः सायकैर्गाढं कृतवर्माणमाहवे ॥ ८५ ॥

इसी समय पाण्डव महारथियोंने युद्धमें जल्दी- जल्दी हाथ चलानेवाले कृतवर्माको अपने बाणोंद्वारा भारी चोट पहुँचायी ॥ ८५ ॥

अथान्यद्धनुरादाय त्यक्त्वा तच्च महद् धनुः ।

विशीर्णं भरतश्रेष्ठः हार्दिक्यः परवीरहा ॥ ८६ ॥

विव्याध पाण्डवान् युद्धे त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ।

शिखण्डिनं च विव्याध त्रिभिः पञ्चभिरेव च ॥ ८७ ॥

भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कृतवर्माने टूटे हुए उस विशाल धनुषको त्यागकर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और युद्धमें पाण्डवोंको तीन- तीन बाण मारकर घायल कर दिया। साथ ही शिखण्डीको भी तीन और पाँच बाणोंसे बींध डाला ॥ ८६-८७ ॥

धनुरन्यत् समादाय शिखण्डी तु महायशाः ।

अवारयन् कूर्मनखैराशुगैर्हृदिकात्मजम् ॥ ८८ ॥

तत्पश्चात् महायशस्वी शिखण्डीने भी दूसरा धनुष लेकर कछुओंके नखोंके समान धारवाले बाणोंद्वारा कृतवर्माका सामना किया ॥ ८८ ॥

ततः क्रुद्धो रणे राजन् हृदिकस्यात्मसम्भवः ।

अभिदुद्राव वेगेन याज्ञसेनिं महारथम् ॥ ८ ९ ॥

भीष्मस्य समरे राजन् मृत्योर्हेतुं महात्मनः ।

विदर्शयन् बलं शूरः शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥ ९० ॥

राजन्! जैसे सिंह हाथीपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उस रणक्षेत्रमें कुपित हुए शूरवीर कृतवर्माने समरांगणमें महात्मा भीष्मकी मृत्युका कारण बने हुए महारथी शिखण्डीपर अपने बलका प्रदर्शन करते हुए बड़े वेगसे धावा किया ॥ ८ ९- ९ ० ॥

तौ दिशां गजसंकाशौ ज्वलिताविव पावकौ ।

समापेततुरन्योन्यं शरसङ्घैररिंदमौ ॥ ९ १ ॥

प्रज्वलित अग्नियोंके समान तेजस्वी तथा शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर अपने बाणसमूहोंद्वारा दो दिग्गजोंके समान एक- दूसरेपर टूट पड़े ॥ ९ १ ॥

विधुन्वानौ धनुःश्रेष्ठे संदधानौ च सायकान् ।

विसृजन्तौ च शतशो गभस्तीनिव भास्वरौ ॥ ९ २ ॥