04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 781–790

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790

पृष्ठ 781

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जैसे दो सूर्य पृथक् - पृथक् अपनी किरणोंका विस्तार करते हों, उसी प्रकार वे दोनों वीर अपने श्रेष्ठ धनुष हिलाते और उनपर सैकड़ों बाणोंका संधान करके छोड़ते थे ॥

तापयन्तौ शरैस्तीक्ष्णैरन्योन्यं तौ महारथौ ।

युगान्तप्रतिमौ वीरौ रेजतुर्भास्कराविव ॥ ९ ३ ॥

अपने पैने बाणोंद्वारा एक-दूसरेको संताप देते हुए वे दोनों महारथी वीर प्रलयकालके दो सूर्योंके समान शोभा पा रहे थे ॥ ९ ३ ॥

कृतवर्मा च समरे याज्ञसेनिं महारथम् ।

विद्ध्वेषुभिस्त्रिसप्तत्या पुनर्विव्याध सप्तभिः ॥ ९ ४ ॥

कृतवर्माने समरांगणमें महारथी शिखण्डीको पहले तिहत्तर बाणोंसे घायल करके फिर सात बाणों से क्षत -विक्षत कर दिया ॥ ९ ४ ॥

स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् ।

विसृज्य सशरं चापं मूर्च्छयाभिपरिप्लुतः ॥ ९ ५ ॥

उन बाणोंकी गहरी चोट खाकर शिखण्डी व्यथित एवं मूर्च्छित हो धनुष - बाण त्यागकर रथकी बैठकमें बैठ गया ॥ ९ ५ ॥ तं विषण्णं रणे दृष्ट्वा तावकाः पुरुषर्षभ हार्दिक्यं पूजयामासुर्वासांस्यादुधुवुश्च ह ॥ ९ ६ ॥ नरश्रेष्ठ! रणक्षेत्रमें शिखण्डीको विषादग्रस्त देख आपके सैनिक कृतवर्माकी प्रशंसा करने और वस्त्र हिलाने लगे ॥ ९ ६ ॥

शिखण्डिनं तथा ज्ञात्वा हार्दिक्यशरपीडितम् ।

अपोवाह रणाद् यन्ता त्वरमाणो महारथम् ॥ ९ ७ ॥

महारथी शिखण्डीको कृतवर्माके बाणोंसे पीड़ित जान सारथि बड़ी उतावलीके साथ उसे रणभूमिसे बाहर ले गया ॥ ९ ७ ॥

सादितं तु रथोपस्थे दृष्ट्वा पार्थाः शिखण्डिनम् ।

परिवव्रू रथैस्तूर्णं कृतवर्माणमाहवे ॥ ९ ८ ॥

कुन्तीकुमारोंने शिखण्डीको रथके पिछले भागमें बेसुध होकर बैठा देख तुरंत ही कृतवर्माको रणभूमिमें अपने रथोंद्वारा चारों ओरसे घेर लिया ॥ ९ ८ ॥

तत्राद्भुतं परं चक्रे कृतवर्मा महारथः ।

यदेकः समरे पार्थान् वारयामास सानुगान् ॥ ९९ ॥

वहाँ महारथी कृतवर्माने अत्यन्त अद्भुत पराक्रम प्रकट किया । उसने अकेले होनेपर भी सेवकोंसहित समस्त पाण्डवोंका समरभूमिमें सामना किया ॥ ९९ ॥

पार्थान् जित्वाजयच्चेदीन् पञ्चालान् सृञ्जयानपि ।

केकयांश्च महावीर्यान् कृतवर्मा महारथः ॥ १०० ॥

पृष्ठ 782

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महारथी कृतवर्माने पाण्डवोंको जीतकर चेदिदेशीय सैनिकोंको परास्त किया, फिर पांचालों, सृ॑जयों और महापराक्रमी केकयोंको भी हरा दिया ॥ १०० ॥

ते वध्यमानाः समरे हार्दिक्येन स्म पाण्डवाः ।

इतश्चेतश्च धावन्तो नैव चक्रुर्धृतिं रणे ॥ १०१ ॥

समरांगणमें कृतवर्माके बाणोंकी मार खाकर पाण्डव- सैनिक इधर- उधर भागने लगे । वे रणभूमिमें कहीं भी स्थिर न हो सके ॥ १०१ ॥

जित्वा पाण्डुसुतान् युद्धे भीमसेनपुरोगमान् ।

हार्दिक्यः समरेऽतिष्ठद् विधूम इव पावकः ॥ १०२ ॥

युद्धमें भीमसेन आदि पाण्डवोंको जीतकर कृतवर्मा उस रणक्षेत्रमें धूमरहित अग्निके समान शोभा पाता हुआ खड़ा था ॥ १०२ ॥

ते द्राव्यमाणाः समरे हार्दिक्येन महारथाः ।

विमुखाः समपद्यन्त शरवृष्टिभिरार्दिताः ॥ १०३ ॥

समरांगणमें कृतवर्माके द्वारा खदेड़े गये और उसकी बाण- वर्षासे पीड़ित हुए पूर्वोक्त सभी महारथियोंने युद्धसे मुँह मोड़ लिया ॥ १०३ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे कृतवर्मपराक्रमे चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका कौरव- सेनामें प्रवेश तथा कृतवर्माका पराक्रमविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥

पृष्ठ 783

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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः सात्यकिके द्वारा कृतवर्माकी पराजय, त्रिगर्तोंकी गजसेनाका संहार और जलसंधका वध संजय उवाच

शृणुष्वैकमना राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।

द्राव्यमाणे बले तस्मिन् हार्दिक्येन महात्मना ॥ १ ॥

लज्जयावनते चापि प्रहृष्टैश्चापि तावकैः ।

द्वीपो य आसीत् पाण्डूनामगाधे गाधमिच्छताम् ॥ २ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! आप मुझसे जो कुछ पूछ रहे हैं, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनिये । महामना कृतवर्माके द्वारा खदेड़ी जानेके कारण जब पाण्डव-सेना लज्जासे नतमस्तक हो गयी और आपके सैनिक हर्षसे उल्लसित हो उठे, उस समय अथाह सैन्य- समुद्रमें थाह पानेकी इच्छावाले पाण्डव - सैनिकोंके लिये जो द्वीप बनकर आश्रयदाता हुआ ( उस सात्यकिका पराक्रम श्रवण कीजिये ) ॥ १-२ ॥

श्रुत्वा स निनदं भीमं तावकानां महाहवे ।

शैनेयस्त्वरितो राजन् कृतवर्माणमभ्ययात् ॥ ३ ॥

राजन्! उस महासमरमें आपके सैनिकोंका भयंकर सिंहनाद सुनकर सात्यकिने तुरंत ही कृतवर्मापर आक्रमण किया ॥ ३ ॥

उवाच सारथिं तत्र क्रोधामर्षसमन्वितः ।

हार्दिक्याभिमुखं सूत कुरु मे रथमुत्तमम् ॥ ४ ॥

उन्होंने क्रोध और अमर्षमें भरकर वहाँ सारथिसे कहा - ' सूत! तुम मेरे उत्तम रथको कृतवर्माके सामने ले चलो ॥ ४ ॥

कुरुते कदनं पश्य पाण्डुसैन्ये ह्यमर्षितः ।

एनं जित्वा पुनः सूत यास्यामि विजयं प्रति ॥ ५ ॥

' देखो, वह अमर्षयुक्त होकर पाण्डव - सेनामें संहार मचा रहा है । सारथे! इसे जीतकर मैं पुनः अर्जुनके पास चलूँगा' ॥ ५ ॥

एवमुक्ते तु वचने सूतस्तस्य महामते ।

निमेषान्तरमात्रेण कृतवर्माणमभ्ययात् ॥ ६ ॥

महामते! सात्यकिके ऐसा कहनेपर सारथि पलक गिरते- गिरते रथ लेकर कृतवर्माके पास जा पहुँचा ॥ ६ ॥

कृतवर्मा तु हार्दिक्यः शैनेयं निशितैः शरैः ।

पृष्ठ 784

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अवाकिरत् सुसंक्रुद्धस्ततोऽक्रुद्धयत् स सात्यकिः ॥ ७ ॥

हृदिकपुत्र कृतवर्माने अत्यन्त कुपित हो सात्यकिपर पैने बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी । इससे सात्यकिका क्रोध भी बहुत बढ़ गया ॥ ७ ॥

अथाशु निशितं भल्लं शैनेयः कृतवर्मणः ।

प्रेषयामास समरे शरांश्च चतुरोऽपरान् ॥ ८ ॥

उन्होंने तुरंत ही कृतवर्मापर समरभूमिमें एक तीखे भल्लका प्रहार किया । फिर चार बाण और मारे ॥ ८ ॥

ते तस्य जघ्निरे वाहान् भल्लेनास्याच्छिनद् धनुः ।

पृष्ठरक्षं तथा सूतमविध्यन्निशितैः शरैः ॥ ९ ॥

उन चारों बाणोंने कृतवर्माके चारों घोड़ोंको मार डाला । सात्यकिने भल्ल से उसके धनुषको काट दिया । फिर पैने बाणोंद्वारा उसके पृष्ठरक्षक और सारथिको भी क्षत - विक्षत कर दिया ॥ ९ ॥

ततस्तं विरथं कृत्वा सात्यकिः सत्यविक्रमः ।

सेनामस्यार्दयामास शरैः संनतपर्वभिः ॥ १० ॥

तदनन्तर सत्यपराक्रमी सात्यकिने कृतवर्माको रथहीन करके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसकी सेनाको पीड़ित करना आरम्भ किया ॥ १० ॥

अभज्यताथ पृतना शैनेयशरपीडिता ।

ततः प्रायात् स त्वरितः सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥ ११ ॥

सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो कृतवर्माकी सेना भाग खड़ी हुई । तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी सात्यकि तुरंत आगे बढ़ गये ॥ ११ ॥

शृणु राजन् यदकरोत् तव सैन्येषु वीर्यवान् ।

अतीत्य स महाराज द्रोणानीकमहार्णवम् ॥ १२ ॥

महाराज! पराक्रमी सात्यकिने द्रोणाचार्यके सैन्य- समुद्रको लाँघकर आपकी सेनाओंमें जो पराक्रम किया, उसका वर्णन सुनिये ॥ १२ ॥

पराजित्य तु संहृष्टः कृतवर्माणमाहवे ।

यन्तारमब्रवीच्छूरः शनैर्याहीत्यसम्भ्रमम् ॥ १३ ॥

उस महासमरमें कृतवर्माको पराजित करके हर्षमें भरे हुए शूरवीर सात्यकि बिना किसी घबराहटके सारथिसे बोले - ' सूत! धीरे - धीरे चलो' ॥ १३ ॥

दृष्ट्वा तु तव तत् सैन्यं रथाश्वद्विपसंकुलम् ।

पदातिजनसम्पूर्णमब्रवीत् सारथिं पुनः ॥ १४ ॥

रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंसे भरी हुई आपकी सेनाको देखकर सात्यकिने पुनः सारथिसे कहा- ॥ १४ ॥

यदेतन्मेघसंकाशं द्रोणानीकस्य सव्यतः ।

पृष्ठ 785

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सुमहत् कुञ्जरानीकं यस्य रुक्मरथो मुखम् ॥ १५ ॥

एते हि बहवः सूत दुर्निवाराश्च संयुगे ।

दुर्योधनसमादिष्टा मदर्थे त्यक्तजीविताः ॥ १६ ॥

' सूत! द्रोणाचार्यकी सेनाके बायें भागमें जो यह मेघोंकी घटाके समान विशाल गजसेना दिखायी देती है, इसके मुहानेपर रुक्मरथ खड़ा है । इसमें बहुत से ऐसे शूरवीर हैं, जिन्हें युद्धमें रोकना अत्यन्त कठिन है । ये दुर्योधनकी आज्ञासे प्राणोंका मोह छोड़कर मेरे साथ युद्ध करनेके लिये खड़े हैं ॥ १५-१६ ॥

(न चाजित्वा रणे ह्येतान् शक्यः प्राप्तुं जयद्रथः ।

नापि पार्थो मया सूत शक्यः प्राप्तुं कथंचन ॥

एते तिष्ठन्ति सहिताः सर्वविद्यासु निष्ठिताः ॥ ) ‘ सूत! इन्हें रणमें परास्त किये बिना न तो जयद्रथको प्राप्त किया जा सकता है और न किसी प्रकार अर्जुन ही मुझे मिल सकते हैं । ये समस्त विद्याओंमें प्रवीण योद्धा एक साथ संगठित होकर खड़े हैं ।

राजपुत्रा महेष्वासाः सर्वे विक्रान्तयोधिनः ।

त्रिगर्तानां रथोदाराः सुवर्णविकृतध्वजाः ॥ १७ ॥

‘ ये त्रिगर्तदेशके उदार महारथी राजकुमार महान् धनुर्धर हैं और सभी पराक्रमपूर्वक

युद्ध करनेवाले हैं । इन सबकी ध्वजा सुवर्णमयी है ॥ १७ ॥

मामेवाभिमुखावीरा योत्स्यमाना व्यवस्थिताः ।

अत्र मां प्रापय क्षिप्रमश्वांश्चोदय सारथे ॥ १८ ॥

त्रिगर्तैः सह योत्स्यामि भारद्वाजस्य पश्यतः । ‘ ये समस्त वीर मेरी ही ओर मुँह करके युद्ध करनेके लिये खड़े हैं। सारथे! घोड़ोंको हाँको और मुझे शीघ्र ही इनके पास पहुँचा दो । मैं द्रोणाचार्यके देखते- देखते त्रिगर्तोंके साथ युद्ध करूँगा' ॥ १८३ ॥

ततः प्रायाच्छनैः सूतः सात्वतस्य मते स्थितः ॥ १ ९ ॥ रथेनादित्यवर्णेन भास्वरेण पताकिना । तदनन्तर सात्यकिकी सम्मतिके अनुसार सारथि सूर्यके समान तेजस्वी तथा पताकाओंसे विभूषित रथके द्वारा धीरे- धीरे आगे बढ़ा ॥ १ ९ ३ ॥ तमूहः सारथेर्वश्या वल्गमाना हयोत्तमाः ॥ २० ॥

वायुवेगसमाः संख्ये कुन्देन्दुरजतप्रभाः । उस रथके उत्तम घोड़े कुन्द, चन्द्रमा और चाँदीके समान श्वेत रंगके थे; वे सारथिके अधीन रहनेवाले और वायुके समान वेगशाली थे तथा युद्धमें उछलते हुए उस रथका भार वहन करते थे ॥ २० ॥

आपतन्तं रणे तं तु शङ्खवर्णैर्हयोत्तमैः ॥ २१ ॥

पृष्ठ 786

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परिवव्रुस्ततः शूरा गजानीकेन सर्वतः ।

किरन्तो विविधांस्तीक्ष्णान् सायकाँल्लघुवेधिनः ॥ २२ ॥

शंखके समान श्वेत रंगवाले उन उत्तम घोड़ोंद्वारा रणभूमिमें आते हुए सात्यकिको त्रिगर्तदेशीय शूरवीरोंने सब ओरसे गजसेनाद्वारा घेर लिया । शीघ्रतापूर्वक लक्ष्य वेधनेवाले वे समस्त सैनिक नाना प्रकारके तीखे बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ २१-२२ ॥

सात्वतो निशितैर्बाणैर्गजानीकमयोधयत् ।

पर्वतानिव वर्षेण तपान्ते जलदो महान् ॥ २३ ॥

सात्यकिने भी पैने बाणोंद्वारा गजसेनाके साथ युद्ध प्रारम्भ किया, मानो वर्षाकालमें महान् मेघ पर्वतोंपर जलकी धारा बरसा रहा हो ॥ २३ ॥

वज्राशनिसमस्पर्शेर्वध्यमानाः शरैर्गजाः ।

प्राद्रवन् रणमुत्सृज्य शिनिवीरसमीरितैः ॥ २४ ॥

शिनिवंशके वीर सात्यकिद्वारा चलाये हुए वज्र और बिजलीके समान स्पर्शवाले उन बाणोंकी मार खाकर उस सेनाके हाथी युद्धका मैदान छोड़कर भागने लगे ॥

शीर्णदन्ता विरुधिरा भिन्नमस्तकपिण्डिकाः ।

विशीर्णकर्णास्यकरा विनियन्तृपताकिनः ॥ २५ ॥

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सम्भिन्नमर्मघण्टाश्च विनिकृत्तमहाध्वजाः ।

हतारोहा दिशो राजन् भेजिरे भ्रष्टकम्बलाः ॥ २६ ॥

उन हाथियोंके दाँत टूट गये, सारे अंगोंसे खूनकी धाराएँ बहने लगीं, कुम्भस्थल और गण्डस्थल फट गये, कान, मुख और शुण्ड छिन्न -भिन्न हो गये, महावत मारे गये और ध्वजा-पताकाएँ टूटकर गिर गयीं । उनके मर्मस्थल विदीर्ण हो गये, घंटे टूट गये और विशाल ध्वज कटकर गिर पड़े । सवार मारे गये तथा झूल खिसककर गिर गये थे । राजन्! ऐसी अवस्थामें उन हाथियोंने भागकर विभिन्न दिशाओंकी शरण ली थी ॥ २५-२६ ॥

रुवन्तो विविधान् नादान् जलदोपमनिःस्वनाः ।

नाराचैर्वत्सदन्तैश्च भल्लैरञ्जलिकैस्तथा ॥ २७ ॥

क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च सात्वतेन विदारिताः ।

क्षरन्तोऽसृक् तथा मूत्रं पुरीषं च प्रदुद्रुवुः ॥ २८ ॥

उनके चिग्घाड़नेकी ध्वनि मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ती थी । वे सात्यकिके चलाये हुए नाराच, वत्सदन्त, भल्ल, अंजलिक, क्षुरप्र और अर्द्धचन्द्र नामक बाणोंसे विदीर्ण हो नाना प्रकारसे आर्तनाद करते, रक्त बहाते तथा मल- मूत्र छोड़ते हुए भाग रहे थे ॥ २७-२८ ॥

बभ्रमुश्च स्खलुश्चान्ये पेतुर्मम्लुस्तथापरे ।

एवं तत् कुञ्जरानीकं युयुधानेन पीडितम् ॥ २ ९ ॥

शरैरग्न्यर्कसंकाशैः प्रदुद्राव समन्ततः । उनमेंसे कुछ हाथी चक्कर काटने लगे, कुछ लड़खड़ाने लगे, कुछ धराशायी हो गये और कुछ पीड़ाके मारे अत्यन्त शिथिल हो गये थे । इस प्रकार युयुधानके अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा पीड़ित हुई हाथियोंकी वह सेना सब ओर भाग गयी ॥ २ ९ ३ ॥ तस्मिन् हते गजानीके जलसंधो महाबलः ॥ ३० ॥

यत्तः सम्प्रापयन्नागं रजताश्वरथं प्रति । उस गजसेनाके नष्ट होनेपर महाबली जलसंध युद्धके लिये उद्यत हो श्वेत घोड़ोंवाले सात्यकिके रथके समीप अपना हाथी ले आया ॥ ३०३ ॥

रुक्मवर्मधरः शूरस्तपनीयाङ्गदः शुचिः ॥ ३१ ॥

कुण्डली मुकुटी खड्गी रक्तचन्दनरूषितः ।

शिरसा धारयन् दीप्तां तपनीयमयीं स्रजम् ॥ ३२ ॥

उरसा धारयन् निष्कं कण्ठसूत्रं च भास्वरम् ।

पृष्ठ 788

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शूरवीर एवं पवित्र जलसंधने अपने शरीरमें सोनेका कवच धारण कर रखा था । उसकी दोनों भुजाओंमें सोनेके ही बाजूबंद शोभा पा रहे थे । दोनों कानोंमें कुण्डल और मस्तकपर किरीट चमक रहे थे । उसके हाथमें तलवार थी और सम्पूर्ण शरीरमें रक्त चन्दनका लेप लगा हुआ था। उसने अपने सिरपर सोनेकी बनी हुई चमकीली माला और वक्षःस्थलपर प्रकाशमान पदक एवं कण्ठहार धारण कर रखे थे ॥ ३१-३२३ ॥ चापं च रुक्मविकृतं विधुन्वन् गजमूर्धनि ॥ ३३ ॥

अशोभत महाराज सविद्युदिव तोयदः । महाराज! हाथीकी पीठपर बैठकर अपने सोनेके बने हुए धनुषको हिलाता हुआ जलसंध बिजलीसहित मेघके समान शोभा पा रहा था ॥ ३३ ॥

तमापतन्तं सहसा मागधस्य गजोत्तमम् ॥ ३४ ॥

सात्यकिर्वारयामास वेलेव मकरालयम् । सहसा अपनी ओर आते हुए मगधराजके उस गजराजको सात्यकिने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे तटकी भूमि समुद्रको रोक देती है ॥ ३४ ॥

नागं निवारितं दृष्ट्वा शैनेयस्य शरोत्तमैः ॥ ३५ ॥

अक्रुद्धयत रणे राजन् जलसंधो महाबलः । राजन्! सात्यकिके उत्तम बाणोंसे उस हाथीको अवरुद्ध हुआ देख महाबली जलसंध रणक्षेत्रमें कुपित हो उठा ॥ ३५३ ॥

ततः क्रुद्धो महाराज मार्गणैर्भारसाधनैः ॥ ३६ ॥

अविध्यत शिनेः पौत्रं जलसंधो महोरसि । महाराज! क्रोधमें भरे हुए जलसंधने भार सहन करनेमें समर्थ बाणोंद्वारा शिनिपौत्र सात्यकिकी विशाल छातीपर गहरा आघात किया ॥ ३६३ ॥

ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च ॥ ३७ ॥

अस्यतो वृष्णिवीरस्य निचकर्त शरासनम् । तत्पश्चात् दूसरे तीखे, पैने और पानीदार भल्लसे उसने बाण फेंकते हुए वृष्णिवीर सात्यकिके धनुषको काट डाला ॥ ३७३ ॥

सात्यकिं छिन्नधन्वानं प्रहसन्निव भारत ॥ ३८ ॥

अविध्यन्मागधो वीरः पञ्चभिर्निशितैः शरैः । भारत! धनुष काटनेके पश्चात् सात्यकिको उस मागध वीरने हँसते हुए ही पाँच तीखे बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ३८३ ॥

स विद्धो बहुभिर्बाणैर्जलसंधेन वीर्यवान् ॥ ३ ९ ॥ नाकम्पत महाबाहुस्तदद्भुतमिवाभवत् ।

पृष्ठ 789

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जलसंधके बहुत - से बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत होनेपर भी पराक्रमी महाबाहु सात्यकि

कम्पित नहीं हुए । यह अद्भुत- सी बात थी ॥ ३ ९ ३ ॥

अचिन्तयन् वै स शरान्नात्यर्थं सम्भ्रमाद् बली ॥ ४० ॥

धनुरन्यत् समादाय तिष्ठ तिष्ठेत्युवाच ह । बलवान् सात्यकिने उसके बाणोंको कुछ भी न गिनते हुए अधिक संभ्रममें न पड़कर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और कहा– ' अरे! खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ ४०३३ ॥

एतावदुक्त्वा शैनेयो जलसंधं महोरसि ॥ ४१ ॥

विव्याध षष्ट्या सुभृशं शराणां प्रहसन्निव । ऐसा कहकर सात्यकिने हँसते हुए ही साठ बाणोंद्वारा जलसंधकी चौड़ी छातीपर गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४१ ॥

क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन मुष्टिदेशे महद् धनुः ॥ ४२ ॥

जलसंधस्य चिच्छेद विव्याध च त्रिभिः शरैः । फिर अत्यन्त तीखे क्षुरप्रसे जलसंधके विशाल धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट दिया और तीन बाण मारकर उसे घायल भी कर दिया ॥ ४२३ ॥

जलसंधस्तु तत् त्यक्त्वा सशरं वै शरासनम् ॥ ४३ ॥

तोमरं व्यसृजत् तूर्णं सात्यकिं प्रति मारिष । माननीय नरेश! जलसंधने बाणसहित उस धनुषको त्यागकर सात्यकिपर तुरंत ही तोमरका प्रहार किया ॥ ४३३ ॥

स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महारणे ॥ ४४ ॥

अभ्यगाद् धरणीं घोरः श्वसन्निव महोरगः । फुफकारते हुए महान् सर्पके समान वह भयंकर तोमर उस महासमरमें सात्यकिकी बायीं भुजाको विदीर्ण करता हुआ धरतीमें समा गया ॥ ४४ ॥

निर्भिन्ने तु भुजे सव्ये सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥ ४५ ॥

त्रिंशद्भिर्विशिखैस्तीक्ष्णैर्जलसंधमताडयत् । अपनी बायीं भुजाके घायल होनेपर सत्यपराक्रमी सात्यकिने तीस तीखे बाणोंद्वारा जलसंधको आहत कर दिया ॥ ४५३ ॥

प्रगृह्य तु ततः खड्गं जलसंधो महाबलः ॥ ४६ ॥

आर्षभं चर्म च महच्छतचन्द्रकसंकुलम् ।

आविध्य च ततः खड्गं सात्वतायोत्ससर्ज ह ॥ ४७ ॥

तब महाबली जलसंधने सौ चन्द्राकार चमकीले चिह्नोंसे युक्त वृषभ-चर्मकी बनी हुई विशाल ढाल और तलवार हाथमें ले ली तथा उस तलवारको घुमाकर सात्यकिपर छोड़ दिया ॥ ४६-४७ ॥

पृष्ठ 790

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शैनेयस्य धनुश्छित्त्वा स खड्गो न्यपतन्महीम् ।

अलातचक्रवच्चैव व्यरोचत महीं गतः ॥ ४८ ॥

वह खड्ग सात्यकिके धनुषको काटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । धरतीपर पहुँचकर वह अलातचक्रके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ ४८ ॥

अथान्यद् धनुरादाय सर्वकायावदारणम् ।

शालस्कन्धप्रतीकाशमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥ ४ ९ ॥

विस्फार्य विव्यधे क्रुद्धो जलसंधं शरेण ह । तब सात्यकिने साखूके तनेके समान विशाल, इन्द्रके वज्रकी भाँति घोर टंकार करनेवाले तथा सबके शरीरको विदीर्ण करनेमें समर्थ दूसरा धनुष हाथमें लेकर उसे कानतक खींचा और कुपित हो एक बाणसे जलसंधको बींध डाला ॥ ४ ९ ३ ॥ ततः साभरणौ बाहू क्षुराभ्यां माधवोत्तमः ॥ ५० ॥

सात्यकिर्जलसंधस्य चिच्छेद प्रहसन्निव । फिर मधुवंशशिरोमणि सात्यकिने हँसते हुए- से दो छुरोंका प्रहार करके जलसंधकी आभूषणभूषित दोनों भुजाओंको काट दिया ॥ ५० ॥

तौ बाहू परिघप्रख्य पेततुर्गजसत्तमात् ॥ ५१ ॥

वसुंधराधराद् भ्रष्टौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ । उसकी वे परिघके समान मोटी भुजाएँ उस गजराजकी पीठसे नीचे गिर पड़ीं, मानो पर्वतसे पाँच - पाँच मस्तकोंवाले दो नाग पृथ्वीपर गिरे हों ॥ ५१३ ॥

ततः सुदंष्ट्रं सुमहच्चारुकुण्डलमण्डितम् ॥ ५२ ॥

क्षुरेणास्य तृतीयेन शिरश्चिच्छेद सात्यकिः । तदनन्तर सात्यकिने तीसरे छुरेसे उसके सुन्दर दाँतोंवाले मनोहर कुण्डलमण्डित विशाल मस्तकको काट गिराया ॥ ५२ ॥

तत्पातितशिरोबाहुकबन्धं भीमदर्शनम् ॥ ५३ ॥

द्विरदं जलसंधस्य रुधिरेणाभ्यषिञ्चत । मस्तक और भुजाओंके गिर जानेसे अत्यन्त भयंकर दिखायी देनेवाले जलसंधके उस धड़ने अपने खूनसे उस हाथीको नहला दिया ॥ ५३ ३ ॥ जलसंधं निहत्याजौ त्वरमाणस्तु सात्वतः ॥ ५४ ॥

विमानं पातयामास गजस्कन्धाद् विशाम्पते । प्रजानाथ! युद्धस्थलमें जलसंधको मारकर फुर्ती करनेवाले सात्यकिने हाथीकी पीठसे उसके हौदेको भी गिरा दिया ॥ ५४३ ॥

रुधिरेणावसिक्ताङ्गो जलसंधस्य कुञ्जरः ॥ ५५ ॥

विलम्बमानमवहत् संश्लिष्टं परमासनम् ।