04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 81–90
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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एवं तौ सुमहात्मानौ बलसेनाग्रगावुभौ ॥ ३१ ॥
श्वेत घोड़ोंसे सुशोभित वह रथ इन चार तेजोंको धारण करता हुआ शत्रुओंके सामने उठे हुए कालचक्रके समान खड़ा हुआ । इस प्रकार वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन अपनी सेनाके अग्रभागमें सुशोभित हो रहे थे ॥ ३०-३१ ॥
तावकानां मुखे कर्णः परेषां च धनंजयः ।
ततो जयाभिसंरब्धौ परस्परवधैषिणौ ॥ ३२ ॥
अवेक्षेतां तदान्योन्यं समरे कर्णपाण्डवौ । राजन्! आपकी सेनाके प्रमुख भागमें कर्ण और शत्रुओंकी सेनाके अग्रभागमें अर्जुन खड़े थे । वे दोनों उस समय विजयके लिये रोषावेशमें भरकर एक- दूसरेका वध करनेकी इच्छासे रणक्षेत्रमें परस्पर दृष्टिपात करने लगे ॥ ३२ ॥
ततः प्रयाते सहसा भारद्वाजे महारथे ॥ ३३ ॥
आर्तनादेन घोरेण वसुधा समकम्पत । तदनन्तर सहसा महारथी द्रोणाचार्य आगे बढ़े । फिर तो भयंकर आर्तनादके साथ सारी पृथ्वी काँप उठी ॥ ततस्तुमुलमाकाशमावृणोत् सदिवाकरम् ॥ ३४ ॥
वातोद्धूतं रजस्तीव्रं कौशेयनिकरोपमम् ।
ववर्ष द्यौरनभ्रापि मांसास्थिरुधिराण्युत ॥ ३५ ॥
इसके बाद प्रचण्ड वायुके वेगसे बड़े जोरकी धूल उठी, जो रेशमी वस्त्रोंके समुदाय - सी प्रतीत होती थी । उस तीव्र एवं भयंकर धूलने सूर्यसहित समूचे आकाशको ढक लिया । आकाशमें मेघोंकी घटा नहीं थी, तो भी वहाँसे मांस, रक्त तथा हड्डियोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३४-३५ ॥
गृध्राः श्येना बकाः कङ्का वायसाश्च सहस्रशः ।
उपर्युपरि सेनां ते तदा पर्यपतन् नृप ॥ ३६ ॥
नरेश्वर! उस समय गीध, बाज, बगले, कंक और हजारों कौवे आपकी सेनाके ऊपर-ऊपर उड़ने लगे ॥
गोमायवश्च प्राक्रोशन् भयदान् दारुणान् रवान् ।
अकार्षुरपसव्यं च बहुशः पृतनां तव ॥ ३७ ॥
चिखादिषन्तो मांसानि पिपासन्तश्च शोणितम् । गीदड़ जोर- जोरसे दारुण एवं भयदायक बोली बोलने लगे और मांस खाने तथा रक्त पीनेकी इच्छासे बारंबार आपकी सेनाको दाहिने करके घूमने लगे ॥ ३७३ ॥
अपतद् दीप्यमाना च सनिर्घाता सकम्पना ॥ ३८ ॥
उल्का ज्वलन्ती संग्रामे पुच्छेनावृत्य सर्वशः ।
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उस समय एक प्रज्वलित एवं देदीप्यमान उल्का युद्धस्थलमें अपने पुच्छभागद्वारा सबको घेरकर भारी गर्जना और कम्पनके साथ पृथ्वीपर गिरी ॥ ३८३ ॥
परिवेषो महांश्चापि सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ॥ ३ ९ ॥ भास्करस्याभवद् राजन् प्रयाते वाहिनीपतौ । राजन्! सेनापति द्रोणके युद्धके लिये प्रस्थान करते ही सूर्यके चारों ओर बहुत बड़ा घेरा पड़ गया और बिजली चमकनेके साथ ही मेघ गर्जना सुनायी देने लगी ॥ ३ ९ ३ ॥ एते चान्ये च बहवः प्रादुरासन् सुदारुणाः ॥ ४० ॥
उत्पाता युधि वीराणां जीवितक्षयकारिणः । ये तथा और भी बहुत - से भयंकर उत्पात प्रकट हुए, जो युद्धमें वीरोंकी जीवन लीलाके विनाशकी सूचना देनेवाले थे ॥ ४० ॥
ततः प्रववृते युद्धं परस्परवधैषिणाम् ॥ ४१ ॥
कुरुपाण्डवसैन्यानां शब्देनापूरयज्जगत् । तदनन्तर एक- दूसरेके वधकी इच्छावाले कौरवों तथा पाण्डवोंकी सेनाओंमें भयंकर युद्ध होने लगा और उनके कोलाहलसे सारा जगत् व्याप्त हो गया ॥ ४१३ ते त्वन्योन्यं सुसंरब्धाः पाण्डवाः कौरवैः सह ॥ ४२ ॥
अभ्यघ्नन् निशितैः शस्त्रैर्जयगृद्धाः प्रहारिणः । क्रोधमें भरे हुए पाण्डव तथा कौरव विजयकी अभिलाषा लेकर एक- दूसरेको तीखे
अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा मारने लगे । वे सभी योद्धा प्रहार करनेमें कुशल थे ॥ ४२१३ ॥
स पाण्डवानां महतीं महेष्वासो महाद्युतिः ॥ ४३ ॥
वेगेनाभ्यद्रवत् सेनां किरञ्छरशतैः शितैः । महाधनुर्धर महातेजस्वी द्रोणाचार्यने पाण्डवोंकी विशाल सेनापर सैकड़ों पैने बाणोंकी वर्षा करते हुए बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥ ४३३ ॥
द्रोणमभ्युद्यतं दृष्ट्वा पाण्डवाः सह सृञ्जयैः ॥ ४४ ॥
प्रत्यगृह्णंस्तदा राजञ्छरवर्षैः पृथक् पृथक् । राजन्! उस समय द्रोणाचार्यको युद्धके लिये उद्यत देख सृजयोंसहित पाण्डवोंने पृथक् - पृथक् बाणोंकी वर्षा करते हुए उनका सामना किया ॥ ४४ ॥
विक्षोभ्यमाणा द्रोणेन भिद्यमाना महाचमूः ॥ ४५ ॥
व्यशीर्यत सपाञ्चाला वातेनेव बलाहकाः । जैसे वायु बादलोंको उड़ाकर छिन्न -भिन्न कर देती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके द्वारा क्षत - विक्षत हुई पांचालोंसहित पाण्डवोंकी विशाल सेना तितर- बितर हो गयी ॥ ४५३ ॥
बहूनीह विकुर्वाणो दिव्यान्यस्त्राणि संयुगे ॥ ४६ ॥
अपीडयत् क्षणेनैव द्रोणः पाण्डवसृञ्जयान् ।
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द्रोणने युद्धमें बहुत- से दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करके क्षणभरमें पाण्डवों तथा सृ॑जयोंको पीड़ित कर दिया ॥ ते वध्यमाना द्रोणेन वासवेनेव दानवाः ॥ ४७ ॥
पञ्चालाः समकम्पन्त धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । जैसे इन्द्र दानवोंको पीड़ा देते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यसे पीड़ित हो धृष्टद्युम्न आदि पांचाल योद्धा भयसे काँपने लगे ॥ ४७ ॥
ततो दिव्यास्त्रविच्छूरो याज्ञसेनिर्महारथः ॥ ४८ ॥
अभिनच्छरवर्षेण द्रोणानीकमनेकधा । तब दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता यज्ञसेनकुमार शूरवीर महारथी धृष्टद्युम्नने अपने बाणोंकी वर्षासे द्रोणाचार्यकी सेनाको बारंबार घायल किया ॥ ४८६३ ॥
द्रोणस्य शरवर्षाणि शरवर्षेण पार्षतः ॥ ४ ९ ॥ संनिवार्य ततः सर्वान् कुरूनप्यवधीद् बली । बलवान् द्रुपदपुत्रने अपने बाणोंकी वर्षासे द्रोणाचार्यकी बाणवृष्टिको रोककर समस्त कौरव सैनिकोंको मारना आरम्भ किया ॥ ४ ९ ३ ॥ संयम्य तु ततो द्रोणः समवस्थाप्य चाहवे ॥ ५० ॥
स्वमनीकं महेष्वासः पार्षतं समुपाद्रवत् । तब महाधनुर्धर द्रोणाचार्यने अपनी सेनाको काबूमें करके उसे युद्धस्थलमें स्थिरभावसे खड़ा कर दिया और द्रुपदकुमारपर धावा किया ॥ ५० ॥
स बाणवर्षं सुमहदसृजत् पार्षतं प्रति ॥ ५१ ॥
मघवान् समभिक्रुद्धः सहसा दानवानिव । जैसे क्रोधमें भरे हुए इन्द्र सहसा दानवोंपर बाणोंकी बौछार करते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नपर बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ५१ ॥
ते कम्प्यमाना द्रोणेन बाणैः पाण्डवसृञ्जयाः ॥ ५२ ॥
पुनः पुनरभज्यन्त सिंहेनेवेतरे मृगाः । जैसे सिंह दूसरे मृगोंको भगा देता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके बाणोंसे विकम्पित हुए पाण्डव तथा सृंजय बारंबार युद्धका मैदान छोड़कर भागने लगे ॥ ५२ ॥
तथा पर्यचरद् द्रोणः पाण्डवानां बले बली ।
अलातचक्रवद् राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ५३ ॥
राजन्! बलवान् द्रोणाचार्य पाण्डवोंकी सेनामें अलातचक्रकी भाँति चारों ओर चक्कर लगाने लगे । यह एक अद्भुत- सी बात हुई ॥ ५३ ॥
खचरनगरकल्पं कल्पितं शास्त्रदृष्टया चलदनिलपताकं ह्लादनं वल्गिताश्वम् ।
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स्फटिकविमलकेतुं त्रासनं शात्रवाणां रथवरमधिरूढः संजहारारिसेनाम् ॥ ५४ ॥
शास्त्रोक्त विधिसे निर्मित हुआ आचार्य द्रोणका वह श्रेष्ठ रथ आकाशचारी गन्धर्वनगरके समान जान पड़ता था। वायुके वेगसे उसकी पताका फहरा रही थी । वह रथीके मनको आह्लाद प्रदान करनेवाला था । उसके घोड़े उछल - उछलकर चल रहे थे । उसका ध्वज - दण्ड
स्फटिक मणिके समान स्वच्छ एवं उज्ज्वल था । वह शत्रुओंको भयभीत करनेवाला था ।
उस श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ होकर द्रोणाचार्य शत्रुसेनाका संहार कर रहे थे ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि द्रोणपराक्रमे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें द्रोणपराक्रमविषयक सातवाँ अध्याय पूराहुआ ॥७ ॥
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अष्टमोऽध्यायः द्रोणाचार्यके पराक्रम और वधका संक्षिप्त समाचार संजय उवाच
तथा द्रोणमभिघ्नन्तं साश्वसूतरथद्विपान् ।
व्यथिताः पाण्डवा दृष्ट्वा न चैनं पर्यवारयन् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - महाराज! द्रोणाचार्यको इस प्रकार घोड़े, सारथि, रथ और हाथियोंका संहार करते देखकर भी व्यथित हुए पाण्डव- सैनिक उन्हें रोक न सके ॥ १ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा धृष्टद्युम्नधनंजयी ।
अब्रवीत् सर्वतो यत्तैः कुम्भयोनिर्निवार्यताम् ॥ २ ॥
तब राजा युधिष्ठिरने धृष्टद्युम्न और अर्जुनसे कहा- ' वीरो! मेरे सैनिकोंको सब ओरसे प्रयत्नशील होकर द्रोणाचार्यको रोकना चाहिये ' ॥ २ ॥
तत्रैनमर्जुनश्चैव पार्षतश्च सहानुगः ।
प्रत्यगृह्णात् ततः सर्वे समापेतुर्महारथाः ॥ ३ ॥
यह सुनकर वहाँ अर्जुन और सेवकोंसहित धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यको रोका । फिर तो सभी महारथी उनपर टूट पड़े ॥
केकया भीमसेनश्च सौभद्रोऽथ घटोत्कचः ।
युधिष्ठिरो यमौ मत्स्या द्रुपदस्यात्मजास्तथा ॥ ४ ॥
द्रौपदेयाश्च संहृष्टा धृष्टकेतुः ससात्यकिः ।
चेकितानश्च संक्रुद्धो युयुत्सुश्च महारथः ॥ ५ ॥
ये चान्ये पार्थिवा राजन् पाण्डवस्यानुयायिनः ।
कुलवीर्यानुरूपाणि चक्रुः कर्माण्यनेकशः ॥ ६ ॥
राजन्! केकयराजकुमार, भीमसेन, अभिमन्यु, घटोत्कच, युधिष्ठिर, नकुल- सहदेव, मत्स्यदेशीय सैनिक, द्रुपदके सभी पुत्र, हर्ष और उत्साहमें भरे हुए द्रौपदीके पाँचों पुत्र, धृष्टकेतु, सात्यकि, कुपित चेकितान और महारथी युयुत्सु —ये तथा और भी जो भूमिपाल पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके अनुयायी थे, वे सब अपने कुल और पराक्रमके अनुकूल अनेक प्रकारके वीरोचित कार्य करने लगे ॥ ४–६ ॥
संरक्ष्यमाणां तां दृष्ट्वा पाण्डवैर्वाहिनीं रणे ।
व्यावृत्य चक्षुषी कोपाद् भारद्वाजोऽन्ववैक्षत ॥ ७ ॥
उस रणक्षेत्रमें पाण्डवोंद्वारा सुरक्षित हुई उनकी सेनाकी ओर द्रोणाचार्यने क्रोधपूर्वक आँखें फाड़- फाड़कर देखा ॥ ७ ॥
स तीव्रं कोपमास्थाय रथे समरदुर्जयः ।
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व्यधमत् पाण्डवानीकमभ्राणीव सदागतिः ॥ ८ ॥
जैसे वायु बादलोंको छिन्न- भिन्न कर देती है, उसी प्रकार रथपर बैठे हुए रणदुर्जय वीर द्रोणाचार्य प्रचण्ड कोप धारण करके पाण्डव सेनाका संहार करने लगे ॥ ८ ॥
रथानश्वान् नरान् नागानभिधावन्नितस्ततः ।
चचारोन्मत्तवद् द्रोणो वृद्धोऽपि तरुणो यथा ॥ ९ ॥
वे बूढ़े होकर भी जवानके समान फुर्तीले थे । द्रोणाचार्य उन्मत्तकी भाँति युद्धस्थलमें इधर - उधर चारों ओर विचरते और रथों, घोड़ों, पैदल मनुष्यों तथा हाथियोंपर धावा करते थे ॥ ९ ॥
तस्य शोणितदिग्धाङ्गाः शोणास्ते वातरंहसः ।
आजानेया हया राजन्नविश्रान्ता ध्रुवं ययुः ॥ १० ॥
उनके घोड़े स्वभावतः लाल रंगके थे । उसपर भी उनके सारे अंग खूनसे लथपथ होनेके कारण वे और भी लाल दिखायी देते थे । उनका वेग वायुके समान तीव्र था । राजन्! उन घोड़ोंकी नस्ल अच्छी थी और वे बिना विश्राम किये निरन्तर दौड़ लगाते रहते थे ॥ १० ॥
तमन्तकमिव क्रुद्धमापतन्तं यतव्रतम् । दृष्ट्वा सम्प्राद्रवन् योधाः पाण्डवस्य ततस्ततः ॥ ११ ॥भरे कालके नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले द्रोणाचार्यको क्रोधमें हुए समान आतेदेख पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके सारे सैनिक इधर- उधर भाग चले ॥ ११ ॥
तेषां प्राद्रवतां भीमः पुनरावर्ततामपि ।
पश्यतां तिष्ठतां चासीच्छब्दः परमदारुणः ॥ १२ ॥
वे कभी भागते, कभी पुन: लौटते और कभी चुपचाप खड़े होकर युद्ध देखते थे; इस प्रकारकी हलचलमें पड़े हुए उन योद्धाओंका अत्यन्त दारुण भयंकर कोलाहल चारों ओर गूँज उठा ॥ १२ ॥
शूराणां हर्षजननो भीरूणां भयवर्धनः ।
द्यावापृथिव्योर्विवरं पूरयामास सर्वतः ॥ १३ ॥
वह कोलाहल शूरवीरोंका हर्ष और कायरोंका भय बढ़ानेवाला था । वह आकाश और पृथ्वीके बीचमें सब ओर व्याप्त हो गया ॥ १३ ॥
ततः पुनरपि द्रोणो नाम विश्रावयन् युधि ।
अकरोद् रौद्रमात्मानं किरञ्छरशतैः परान् ॥ १४ ॥
तब द्रोणाचार्यने पुनः रणभूमिमें अपना नाम सुना-सुनाकर शत्रुओंपर सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करते हुए अपने भयंकर स्वरूपको प्रकट किया ॥ १४ ॥
स तथा तेष्वनीकेषु पाण्डुपुत्रस्य मारिष ।
कालवद् व्यचरद् द्रोणो युवेव स्थविरो बली ॥ १५ ॥
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आर्य! बलवान् द्रोणाचार्य वृद्ध होकर भी तरुणके समान फुर्ती दिखाते हुए पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी सेनाओंमें कालके समान विचरने लगे ॥ १५ ॥
उत्कृत्य च शिरांस्युग्रान् बाहूनपि सुभूषणान् ।
कृत्वा शून्यान् रथोपस्थानुदक्रोशन्महारथान् ॥ १६ ॥
वे योद्धाओंके मस्तकों और आभूषणोंसे भूषित भयंकर भुजाओंको भी काटकर रथकी बैठकोंको सूनी कर देते और महारथियोंकी ओर देख- देखकर दहाड़ते थे ॥
तस्य हर्षप्रणादेन बाणवेगेन वा विभो ।
प्राकम्पन्त रणे योधा गावः शीतार्दिता इव ॥ १७ ॥
प्रभो! उनके हर्षपूर्वक किये हुए सिंहनाद अथवा बाणोंके वेगसे उस रणक्षेत्रमें समस्त योद्धा सर्दीसे पीड़ित हुई गायोंकी भाँति थर- थर काँपने लगे ॥ १७ ॥
द्रोणस्य रथघोषेण मौर्वीनिष्पेषणेन च ।
धनुःशब्देन चाकाशे शब्दः समभवन्महान् ॥ १८ ॥
द्रोणाचार्यके रथकी घरघराहट, प्रत्यंचाको दबा - दबाकर खींचनेके शब्द और धनुषकी टंकारसे आकाशमें महान् कोलाहल होने लगा ॥ १८ ॥
अथास्य धनुषो बाणा निश्चरन्तः सहस्रशः ।
व्याप्य सर्वा दिशः पेतुर्नागाश्वरथपत्तिषु ॥ १ ९ ॥
द्रोणाचार्यके धनुषसे सहस्रों बाण निकलकर सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हो हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंपर बड़े वेगसे गिरने लगे ॥ १ ९ ॥
तं कार्मुकमहावेगमस्त्रज्वलितपावकम् ।
द्रोणमासादयांचक्रुः पञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥ २० ॥
द्रोणाचार्यके धनुषका वेग महान् था । उन्होंने अस्त्रोंद्वारा आग सी प्रज्वलित कर दी थी । पाण्डव और पांचाल सैनिक उनके पास पहुँचकर उन्हें रोकनेकी चेष्टा करने लगे ॥ २० ॥
तान् सकुञ्जरपत्त्यश्वान् प्राहिणोद् यमसादनम् ।
चक्रेऽचिरेण च द्रोणो महीं शोणितकर्दमाम् ॥ २१ ॥
द्रोणाचार्यने हाथी, घोड़े और पैदलोंसहित उन समस्त योद्धाओंको यमलोक पहुँचा दिया और थोड़ी ही देरमें भूतलपर रक्तकी कीच मचा दी ॥ २१ ॥
तन्वता परमास्त्राणि शरान् सततमस्यता ।
द्रोणेन विहितं दिक्षु शरजालमदृश्यत ॥ २२ ॥
द्रोणाचार्यने निरन्तर बाणोंकी वर्षा और उत्तम अस्त्रोंका विस्तार करके सम्पूर्ण दिशाओंमें बाणोंका जाल- सा बुन दिया, जो स्पष्ट दिखलायी दे रहा था ॥ २२ ॥
पदातिषु रथाश्वेषु वारणेषु च सर्वशः ।
तस्य विद्युदिवाभ्रेषु चरन् केतुरदृश्यत ॥ २३ ॥
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पैदल सैनिकों, रथियों, घुड़सवारों तथा हाथीसवारोंमें सब ओर विचरता हुआ उनका ध्वज बादलोंमें विद्युत्- सा दृष्टिगोचर हो रहा था ॥ २३ ॥
स केकयानां प्रवरांश्च पञ्च पञ्चालराजं च शरैः प्रमथ्य । युधिष्ठिरानीकमदीनसत्त्वो द्रोणोऽभ्ययात् कार्मुकबाणपाणिः ॥ २४ ॥
पाँचों श्रेष्ठ केकयराजकुमारों तथा पांचालराज द्रुपदको अपने बाणोंसे मथकर उदार हृदयवाले द्रोणाचार्यने हाथोंमें धनुष- बाण लेकर युधिष्ठिरकी सेनापर आक्रमण किया ॥ २४ ॥
तं भीमसेनश्च धनंजयश्च शिनेश्च नप्ता द्रुपदात्मजश्च । शैब्यात्मजः काशिपतिः शिबिश्च दृष्ट्वा नदन्तो व्यकिरञ्छरौघैः ॥ २५ ॥
यह देख भीमसेन, अर्जुन, सात्यकि, धृष्टद्युम्न, शैब्यकुमार, काशिराज तथा शिबि गर्जना करते हुए उनके ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ २५ ॥
( तेषां शरा द्रोणशरैर्निकृत्ता भूमावदृश्यन्त विवर्तमानाः । श्रेणीकृताः संयति मोघवेगा द्वीपे नदीनामिव काशरोहाः ॥ ) इन सबके बाण द्रोणाचार्यके सायकोंद्वारा छिन्न- भिन्न एवं निष्फल हो युद्धस्थलमें धरतीपर लोटते दिखायी देने लगे, मानो नदियोंके द्वीपमें ढेर- के - ढेर कास अथवा सरकण्डे काटकर बिछा दिये गये हों । तेषामथ द्रोणधनुर्विमुक्ताः पतत्रिणः काञ्चनचित्रपुङ्खाः । भित्त्वा शरीराणि गजाश्वयूनां जग्मुर्महीं शोणितदिग्धवाजाः ॥ २६ ॥
द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए सुवर्णमय विचित्र पंखोंसे युक्त बाण हाथी, घोड़े और युवकोंके शरीरोंको छेदकर धरतीमें घुस गये । उस समय उनके पंख रक्तसे रँग गये थे ॥ २६ ॥
सा योधसंघैश्च रथैश्च भूमिः शरैर्विभिन्नैर्गजवाजिभिश्च । प्रच्छाद्यमाना पतितैर्बभूव समावृता द्यौरिव कालमेघैः ॥ २७ ॥
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जैसे वर्षाकालके मेघोंकी घटासे आकाश आच्छादित हो जाता है, उसी प्रकार वहाँ बाणोंसे विदीर्ण होकर गिरे हुए योद्धाओंके समूहों, रथों, हाथियों और घोड़ोंसे सारी रणभूमि पट गयी थी ॥ २७ ॥
शैनेयभीमार्जुनवाहिनीशं सौभद्रपाञ्चालसकाशिराजम् । अन्यांश्च वीरान् समरे ममर्द द्रोणः सुतानां तव भूतिकामः ॥ २८ ॥
सात्यकि, भीमसेन और अर्जुन जिसमें सेनापति थे तथा जिसके भीतर अभिमन्यु, द्रुपद एवं काशिराज- जैसे योद्धा मौजूद थे, उस सेनाको तथा अन्यान्य महावीरोंको भी द्रोणाचार्यने समरांगणमें रौंद डाला; क्योंकि वे आपके पुत्रोंको ऐश्वर्यकी प्राप्ति कराना चाहते थे ॥ २८ ॥
एतानि चान्यानि च कौरवेन्द्र कर्माणि कृत्वा समरे महात्मा । प्रताप्य लोकानिव कालसूर्यो द्रोणो गतः स्वर्गमितो हि राजन् ॥ २ ९ ॥ राजन्! कौरवेन्द्र! युद्धस्थलमें ये तथा और भी बहुत- से वीरोचित कर्म करके महात्मा द्रोणाचार्य प्रलयकालके सूर्यकी भाँति सम्पूर्ण लोकोंको तपाकर यहाँसे स्वर्गमें चले गये ॥ २ ९ ॥
एवं रुक्मरथः शूरो हत्वा शतसहस्रशः ।
पाण्डवानां रणे योधान् पार्षतेन निपातितः ॥ ३० ॥
इस प्रकार सुवर्णमय रथवाले शूरवीर द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें पाण्डवपक्षके लाखों योद्धाओंका संहार करके अन्तमें धृष्टद्युम्नके द्वारा मार गिराये गये ॥ ३० ॥
अक्षौहिणीमभ्यधिकां शूराणामनिवर्तिनाम् ।
निहत्य पश्चाद् धृतिमानगच्छत् परमां गतिम् ॥ ३१ ॥
धैर्यशाली द्रोणाचार्यने युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीरोंकी एक अक्षौहिणीसे भी अधिक सेनाका संहार करके पीछे स्वयं भी परमगति प्राप्त कर ली ॥ ३१ ॥
पाण्डवैः सह पञ्चालैरशिवैः क्रूरकर्मभिः ।
हतो रुक्मरथो राजन् कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ३२ ॥
राजन्! सुवर्णमय रथवाले द्रोणाचार्य अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके अन्तमें पाण्डवोंसहित अमंगलकारी क्रूरकर्मा पांचालोंके हाथसे मारे गये ॥ ३२ ॥
ततो निनादो भूतानामाकाशे समजायत ।
सैन्यानां च ततो राजन्नाचार्ये निहते युधि ॥ ३३ ॥
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नरेश्वर! युद्धस्थलमें आचार्य द्रोणके मारे जानेपर आकाशमें स्थित अदृश्य भूतोंका तथा कौरव- सैनिकोंका आर्तनाद सुनायी देने लगा ॥ ३३ ॥
द्यां धरां खं दिशो वापि प्रदिशश्चानुनादयन् ।
अहो धिगिति भूतानां शब्दः समभवद् भृशम् ॥ ३४ ॥
उस समय स्वर्गलोक, भूलोक, अन्तरिक्षलोक, दिशाओं तथा विदिशाओंको भी प्रतिध्वनित करता हुआ समस्त प्राणियोंका ' अहो! धिक्कार है! ' यह शब्द वहाँ जोर- जोरसे गूँजने लगा ॥ ३४ ॥
देवताः पितरश्चैव पूर्वे ये चास्य बान्धवाः ।
ददृशुर्निहतं तत्र भारद्वाजं महारथम् ॥ ३५ ॥
देवता, पितर तथा जो इनके पूर्ववर्ती भाई- बन्धु थे, उन्होंने भी वहाँ भरद्वाजनन्दन महारथी द्रोणाचार्यको मारा गया देखा ॥ ३५ ॥
पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा सिंहनादान् प्रचक्रिरे ।
सिंहनादेन महता समकम्पत मेदिनी ॥ ३६ ॥
पाण्डव विजय पाकर सिंहनाद करने लगे । उनके उस महान् सिंहनादसे पृथ्वी काँप उठी ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि द्रोणवधश्रवणे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ || इसप्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें द्रोणवधश्रवणविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३७ श्लोक हैं । )