04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 91–100

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100

पृष्ठ 91

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नवमोऽध्यायः द्रोणाचार्यकी मृत्युका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका शोक करना धृतराष्ट्रउवाच

किं कुर्वाणं रणे द्रोणं जघ्नुः पाण्डवसृजयाः ।

तथा निपुणमस्त्रेषु सर्वशस्त्रभृतामपि ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले- संजय! रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्य क्या कर रहे थे कि पाण्डव तथा सृजय उनपर चोट कर सके? वे तो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और अस्त्र- विद्यामें निपुण थे ॥ १ ॥

रथभङ्गो बभूवास्य धनुर्वाशीर्यतास्यतः ।

प्रमत्तो वाभवद् द्रोणस्ततो मृत्युमुपेयिवान् ॥ २ ॥

उनका रथ टूट गया था या बाणोंका प्रहार करते समय धनुष ही खण्डित हो गया था अथवा द्रोणाचार्य असावधान थे, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी? ॥ २ ॥

कथं नु पार्षतस्तात शत्रुभिर्दुष्प्रधर्षणम् ।

किरन्तमिषुसंघातान् रुक्मपुङ्खाननेकशः ॥ ३ ॥

क्षिप्रहस्तं द्विजश्रेष्ठं कृतिनं चित्रयोधिनम् ।

दूरेषुपातिनं दान्तमस्त्रयुद्धेषु पारगम् ॥ ४ ॥

पाञ्चालपुत्रो न्यवधीद् दिव्यास्त्रधरमच्युतम् ।

कुर्वाणं दारुणं कर्म रणे यत्तं महारथम् ॥ ५ ॥

तात! द्रोणाचार्य तो शत्रुओंके लिये सर्वथा दुर्जय थे । वे सुवर्णमय पंखवाले बाणसमूहोंकी बारंबार वर्षा करते थे । उनके हाथोंमें फुर्ती थी । वे विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले और विद्वान् थे । दूरतक बाण मारनेवाले और अस्त्र युद्धमें पारंगत थे । फिर उन जितेन्द्रिय दिव्यास्त्रधारी और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यको पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने कैसे मार दिया? वे तो रणक्षेत्रमें कठोर कर्म करनेवाले, विजयके लिये प्रयत्नशील और महारथी वीर थे ॥ ३–५ ॥

व्यक्तं हि दैवं बलवत् पौरुषादिति मे मतिः ।

यद् द्रोणो निहतः शूरः पार्षतेन महात्मना ॥ ६ ॥

निश्चय ही पुरुषार्थकी अपेक्षा दैव ही प्रबल है, ऐसा मेरा विश्वास है; क्योंकि द्रोणाचार्य-जैसे शूरवीर महामना धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये ॥ ६ ॥

अस्त्रं चतुर्विधं वीरे यस्मिन्नासीत् प्रतिष्ठितम् ।

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तमिष्वस्त्रधराचार्यं द्रोणं शंससि मे हतम् ॥ ७ ॥

जिन वीर सेनापतिमें चार प्रकारके अस्त्र प्रतिष्ठित थे, उन धनुर्धरोंके आचार्य द्रोणको तुम मुझे मारा गया बता रहे हो ॥ ७ ॥

श्रुत्वा हतं रुक्मरथं वैयाघ्रपरिवारितम् ।

जातरूपशिरस्त्राणं नाद्य शोकमपानुदे ॥ ८ ॥

व्याघ्रचर्मसे आच्छादित सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो सुनहरा शिरस्त्राण ( टोप या पगड़ी) धारण करनेवाले द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर आज मैं अपने शोकको किसी प्रकार दूर नहीं कर पाता हूँ ॥ ८ ॥

न नूनं परदुःखेन म्रियते कोऽपि संजय ।

यत्र द्रोणमहं श्रुत्वा हतं जीवामि मन्दधीः ॥ ९ ॥

संजय! निश्चय ही कोई भी दूसरेके दुःखसे नहीं मरता है, तभी तो मैं मन्दबुद्धि मनुष्य द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर भी जी रहा हूँ ॥ ९ ॥

दैवमेव परं मन्ये नन्वनर्थं हि पौरुषम् ।

अश्मसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम ॥ १० ॥

यच्छ्रुत्वा निहतं द्रोणं शतधा न विदीर्यते । मैं तो दैवको ही श्रेष्ठ मानता हूँ । पुरुषार्थ तो अनर्थका ही कारण है । निश्चय ही मेरा यह अत्यन्त सुदृढ़ हृदय लोहेका बना हुआ है, जिससे द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर भी इसके सौ टुकड़े नहीं हो जाते ॥ १०३ ॥

ब्राह्मे दैवे तथेष्वस्त्रे यमुपासन् गुणार्थिनः ॥ ११ ॥

ब्राह्मणा राजपुत्राश्च स कथं मृत्युना हृतः । गुणार्थी ब्राह्मण तथा राजकुमार ब्राह्म और दैव अस्त्रोंके लिये जिनकी उपासना करते थे, उन्हें मृत्यु कैसे हर ले गयी? ॥ ११३ ॥

शोषणं सागरस्येव मेरोरिव विसर्पणम् ॥ १२ ॥

पतनं भास्करस्येव न मृष्ये द्रोणपातनम् । द्रोणका रणभूमिमें गिराया जाना समुद्रके सूखने, मेरु पर्वतके चलने -फिरने और सूर्यके

आकाशसे टूटकर गिरनेके समान है । मैं इसे किसी प्रकार सहन नहीं कर पाता ॥ १२३ ॥

दुष्टानां प्रतिषेद्धाऽऽसीद् धार्मिकाणां च रक्षिता ॥ १३ ॥

यो s हासीत् कृपणस्यार्थे प्राणानपि परंतपः । शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य दुष्टोंको दण्ड देनेवाले और धार्मिकोंके रक्षक थे । उन्होंने मुझ कृपणके लिये अपने प्राणतक दे दिये ॥ १३३ ॥

मन्दानां मम पुत्राणां जयाशा यस्य विक्रमे ॥ १४ ॥

बृहस्पत्युशनस्तुल्यो बुद्धया स निहतः कथम् ।

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मेरे मूर्ख पुत्रोंको जिनके ही पराक्रमके भरोसे विजयकी आशा बनी हुई थी तथा जो बुद्धिमें बृहस्पति और शुक्राचार्यके समान थे, वे द्रोणाचार्य कैसे मारे गये? ॥ १४ ॥

तेच शोणा बृहन्तोऽश्वाश्छन्ना जालैर्हिरण्मयैः ॥ १५ ॥

रथे वातजवा युक्ताः सर्वशस्त्रातिगा रणे ।

बलिनो हेषिणो दान्ताः सैन्धवाः साधुवाहिनः ॥ १६ ॥

दृढाः संग्राममध्येषु कच्चिदासन्नविह्वलाः ।

करिणां बृंहतां युद्धे शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ॥ १७ ॥

ज्या क्षेपशरवर्षाणां शस्त्राणां च सहिष्णवः ।

आशंसन्तः पराञ्जेतुं जितश्वासा जितव्यथाः ॥ १८ ॥

जिनके रंग लाल थे, जो विशाल एवं दृढ़ शरीरवाले थे, जिन्हें सोनेकी जालियोंसे आच्छादित किया जाता था, जो रथमें जोते जानेपर वायुके समान वेगसे चलते थे, संग्राममें सब प्रकारके शस्त्रोंद्वारा किये जानेवाले प्रहारको बचा जाते थे, जो बलवान्, सुशिक्षित और रथको अच्छी तरह वहन करनेवाले थे, रणभूमिमें जो दृढ़तापूर्वक डटे रहते और जोर-जोरसे हिनहिनाते थे, धनुषोंकी टंकारके साथ होनेवाली बाणवर्षा तथा अस्त्र- शस्त्रोंके आघातको सहन करनेमें समर्थ एवं शत्रुओंको जीतनेका उत्साह रखनेवाले थे, जो पीड़ा तथा श्वासको जीत चुके थे, वे सिन्धुदेशीय घोड़े युद्ध -स्थलमें चिग्घाड़ते हुए हाथियों और शंखों एवं नगाड़ोंकी आवाजसे घबराये तो नहीं थे? ॥ १५–१८ ॥

हयाः पराजिताः शीघ्रा भारद्वाजरथोद्वहाः ।

ते स्म रुक्मरथे युक्ता नरवीरसमास्थिताः ॥ १९ ॥

कथं नाभ्यतरंस्तात पाण्डवानामनीकिनीम् । क्या द्रोणाचार्यके रथको वहन करनेवाले वे शीघ्रगामी अश्व पराजित हो गये थे? तात! द्रोणाचार्यके सुवर्णमय रथमें जुते हुए और उन्हीं नरवीर आचार्यकी सवारीमें काम आनेवाले वे घोड़े पाण्डव- सेनाको पार कैसे नहीं कर सके? ॥ १ ९ ३ ॥ जातरूपपरिष्कारमास्थाय रथमुत्तमम् ॥ २० ॥

भारद्वाजः किमकरोद् युधि सत्यपराक्रमः । उस सुवर्णभूषित उत्तम रथपर आरूढ़ हो सत्यपराक्रमी द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें क्या किया? ॥ २० ॥

विद्यां यस्योपजीवन्ति सर्वलोकधनुर्धराः ॥ २१ ॥

स सत्यसंधो बलवान् द्रोणः किमकरोद् युधि । उन समस्त जगत्के धनुर्धर जिनकी विद्याका आश्रय लेकर जीवननिर्वाह करते हैं, सत्यपराक्रमी बलवान् द्रोणाचार्यने युद्धमें क्या किया? ॥ २१ ॥

दिवि शक्रमिव श्रेष्ठं महामात्रं धनुर्भृताम् ॥ २२ ॥

के नु तं रौद्रकर्माणं युद्धे प्रत्युद्ययू रथाः ।

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स्वर्गमें देवराज इन्द्रके समान जो इस लोकमें श्रेष्ठ और समस्त धनुर्धरोंमें महान् थे, उन भयंकर कर्म करनेवाले द्रोणाचार्यका सामना करनेके लिये उस रणक्षेत्रमें कौन - कौनसे रथी गये थे? ॥ २२ ॥

ननु रुक्मरथं दृष्ट्वा प्राद्रवन्ति स्म पाण्डवाः ॥ २३ ॥

दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं रणे तस्मिन् महाबलम् । उस समरांगणमें दिव्य अस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले तथा सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हुए महाबली द्रोणाचार्यको देखकर तो समस्त पाण्डव- योद्धा भाग खड़े होते थे ॥ उताहो सर्वसैन्येन धर्मराजः सहानुजः ॥ २४ ॥

पाञ्चाल्यप्रग्रहो द्रोणं सर्वतः समवारयत् । भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने अपनी सारी सेनाके साथ जाकर धृष्टद्युम्नरूपी डोरीकी सहायतासे द्रोणाचार्यको घेर तो नहीं लिया था? ॥ २४३ ॥

नूनमावारयत् पार्थो रथिनोऽन्यानजिह्मगैः ॥ २५ ॥

ततो द्रोणं समारोहत् पार्षतः पापकर्मकृत् । निश्चय ही अर्जुनने अपने सीधे जानेवाले बाणोंके द्वारा अन्य रथियोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया था । इसीलिये पापकर्मा धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यपर चढ़ाई कर सका ॥ २५३ ॥

न ह्यहं परिपश्यामि वधे कञ्चन शुष्मिणः ॥ २६ ॥

धृष्टद्युम्नादृते रौद्रात् पाल्यमानात् किरीटिना । किरीटधारी अर्जुनके द्वारा सुरक्षित भयंकर स्वभाववाले धृष्टद्युम्नको छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो अत्यन्त तेजस्वी द्रोणाचार्यके वधमें समर्थ हो ॥ २६३ ॥

तैर्वृतः सर्वतः शूरः पाञ्चाल्यापसदस्ततः ॥ २७ ॥

केकयैश्चेदिकारूषैर्मत्स्यैरन्यैश्च भूमिपैः ।

व्याकुलीकृतमाचार्यं पिपीलैरुरगं यथा ॥ २८ ॥

कर्मण्यसुकरे सक्तं जघानेति मतिर्मम । केकय, चेदि, कारूष, मत्स्यदेशीय सैनिकों तथा अन्य भूमिपालोंने आचार्यको उसी प्रकार व्याकुल कर दिया होगा, जैसे बहुत - सी चींटियाँ सर्पको विह्वल कर देती हैं; उसी अवस्थामें उन पाण्डव सैनिकोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए नीच धृष्टद्युम्नने दुष्कर कर्ममें लगे हुए द्रोणाचार्यको मार डाला होगा, यही बात मेरे मनमें आती है ॥ २७-२८३ ॥ योऽधीत्य चतुरो वेदान् साङ्गानाख्यानपञ्चमान् ॥ २ ९ ॥

ब्राह्मणानां प्रतिष्ठाऽऽसीत् स्रोतसामिव सागरः ।

क्षत्रं च ब्रह्म चैवेह योऽभ्यतिष्ठत् परंतपः ॥ ३० ॥

स कथं ब्राह्मणो वृद्धः शस्त्रेण वधमाप्तवान् ।

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जो छहों अंगों तथा पंचम वेदस्थानीय इतिहास-पुराणोंसहित चारों वेदोंका अध्ययन करके ब्राह्मणोंके लिये उसी प्रकार आश्रय बने हुए थे, जैसे नदियोंके लिये समुद्र हैं । जो शत्रुओंको संताप देनेवाले तथा ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनोंके धर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले थे, वे वृद्ध ब्राह्मण द्रोणाचार्य शस्त्रद्वारा कैसे मारे गये? ॥ अमर्षिणा मर्षितवान् क्लिश्यमानान् सदा मया ॥ ३१ ॥

अनर्हमाणान् कौन्तेयान् कर्मणस्तस्य तत् फलम् । मैंने अमर्षमें भरकर सदा कष्ट भोगनेके अयोग्य कुन्तीकुमारोंको क्लेश ही दिया है; परंतु मेरे इस बर्तावको द्रोणाचार्यने चुपचाप सह लिया था । उनके उसी कर्मका यह वधरूपी फल प्राप्त हुआ है ॥ ३१३ ॥

यस्य कर्मानुजीवन्ति लोके सर्वधनुर्भृतः ॥ ३२ ॥

स सत्यसंधः सुकृती श्रीकामैर्निहतः कथम् । जगत्के सम्पूर्ण धनुर्धर जिनके शिक्षणरूपी कर्मका आश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते हैं, उन सत्यप्रतिज्ञ पुण्यात्मा द्रोणाचार्यको राजलक्ष्मीके लोभियोंने कैसे मार डाला? ॥ ३२ दिवि शक्र इव श्रेष्ठो महासत्त्वो महाबलः ॥ ३३ ॥

स कथं निहतः पार्थैः क्षुद्रमत्स्यैर्यथा तिमिः । स्वर्गलोकमें इन्द्रके समान जो इस लोकमें सबसे श्रेष्ठ थे, उन महान् सत्त्वशाली, महाबली द्रोणाचार्यको कुन्तीके पुत्रोंने उसी प्रकार मार डाला, जैसे छोटे मत्स्योंने मिलकर

तिमि नामक महामत्स्यको मार डाला हो । यह कैसे सम्भव हुआ? ॥ ३३ ॥

क्षिप्रहस्तश्च बलवान् दृढधन्वारिमर्दनः ॥ ३४ ॥

न यस्य विजयाकाङ्क्षी विषयं प्राप्य जीवति ।

द्वौ न जहतः शब्दौ जीवमानं कदाचन ॥ ३५ ॥

ब्राह्मश्च वेदकामानां ज्याघोषश्च धनुष्मताम् । जो शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले, बलवान्, दृढधन्वा तथा शत्रुओंका मर्दन करनेवाले थे, कोई भी विजयाभिलाषी वीर जिनके बाणोंका लक्ष्य बन जानेपर जीवित नहीं रह सकता था, जिन्हें जीते-जी दो शब्दोंने कभी नहीं छोड़ा था-एक तो वेदाध्ययनकी इच्छावाले लोगोंके समक्ष वेदध्वनिका शब्द और दूसरा धनुर्धारियोंके बीचमें प्रत्यंचाकी टंकारका शब्द ॥ ३४-३५३ ॥ अदीनं पुरुषव्याघ्रं ह्रीमन्तमपराजितम् ॥ ३६ ॥

नाहं मृष्ये हतं द्रोणं सिंहद्विरदविक्रमम् । सिंह और हाथीके समान पराक्रमी, उदार, लज्जाशील और किसीसे पराजित न होनेवाले पुरुषसिंह द्रोणका वध मैं नहीं सहन कर सकता ॥ ३६३ ॥

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कथं संजय दुर्धर्षमनाधृष्यशोबलम् ॥ ३७ ॥

पश्यतां पुरुषेन्द्राणां समरे पार्षतोऽवधीत् । संजय! जिनके यश और बलका तिरस्कार होना असम्भव था, उन दुर्धर्ष वीर द्रोणाचार्यको समरभूमिमें सम्पूर्ण नरेशोंके देखते- देखते धृष्टद्युम्नने कैसे मार डाला? ॥ के पुरस्तादयुध्यन्त रक्षन्तो द्रोणमन्तिकात् ॥ ३८ ॥

के नु पश्चादवर्तन्त गच्छन्तो दुर्गमां गतिम् । कौन - कौनसे वीर उस समय निकटसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करते हुए उनके आगे रहकर युद्ध करते थे और कौन - कौन योद्धा दुर्गम मार्गपर पैर बढ़ाते हुए उनके पीछे रहकर रक्षा करते थे? ॥ ३८ ॥

केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं सव्यं के च महात्मनः ॥ ३ ९ ॥

पुरस्तात् के च वीरस्य युध्यमानस्य संयुगे ।

के च तस्मिंस्तनूंस्त्यक्त्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन् ॥ ४० ॥

कौन वीर उन महात्माके दाहिने पहियेकी और कौन बायें पहियेकी रक्षा करते थे? कौन उस युद्धस्थलमें युद्धपरायण वीरवर द्रोणाचार्यके आगे थे और किन लोगोंने अपने शरीरका मोह छोड़कर विपक्षियोंका सामना करते हुए उस रणक्षेत्रमें मृत्युका वरण किया था ॥ ३ ९ -४० ||

द्रोणस्य समरे वीराः केऽकुर्वन्त परां धृतिम् ।

कच्चिन्नैनं भयान्मन्दाः क्षत्रिया व्यजहन् रणे ॥ ४१ ॥

रक्षितारस्ततः शून्ये कच्चित् तैर्न हतः परैः । किन वीरोंने युद्धमें द्रोणाचार्यको उत्तम धैर्य प्रदान किया? उनकी रक्षा करनेवाले मूर्ख क्षत्रियोंने भयभीत होकर युद्धस्थलमें उन्हें अकेला तो नहीं छोड़ दिया? और इस प्रकार शत्रुओंने सूनेमें तो उन्हें नहीं मार डाला? ॥ ४१ ॥

न स पृष्ठमरेस्त्रासाद् रणे शौर्यात् प्रदर्शयेत् ॥ ४२ ॥

परामप्यापदं प्राप्य स कथं निहतः परैः । जो बड़ी - से - बड़ी आपत्ति पड़नेपर भी रणमें अपने शौर्यके कारण शत्रुको भयवश पीठ नहीं दिखा सकते थे, वे विपक्षियोंद्वारा किस प्रकार मारे गये? ॥ ४२ ॥

एतदार्येण कर्तव्यं कृच्छ्रास्वापत्सु संजय ॥ ४३ ॥

पराक्रमेद् यथाशक्त्या तच्च तस्मिन् प्रतिष्ठितम् । संजय! बड़े भारी संकटमें पड़नेपर श्रेष्ठ पुरुषको यही करना चाहिये कि वह यथाशक्ति पराक्रम दिखावे; यह बात द्रोणाचार्यमें पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित थी ॥ ४३३ ॥

मुह्यते मे मनस्तात कथा तावन्निवार्यताम् ।

भूयस्तु लब्धसंज्ञस्त्वां परिपृच्छामि संजय ॥ ४४ ॥

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तात! इस समय मेरा मन मोहित हो रहा है; अतः तुम यह कथा बंद करो! संजय! फिर होशमें आनेपर तुमसे यह समाचार पूछूंगा ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि धृतराष्ट्रशोके नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें धृतराष्ट्रका शोकविषयक नवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ९ ॥

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दशमोऽध्यायः राजा धृतराष्ट्रका शोकसे व्याकुल होना और संजयसे युद्धविषयक प्रश्न वैशम्पायन उवाच

एतत् पृष्ट्वा सूतपुत्रं हृच्छोकेनार्दितो भृशम् ।

जये निराशः पुत्राणां धृतराष्ट्रोऽपतत् क्षितौ ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! सूतपुत्र संजयसे इस प्रकार प्रश्न करते - करते हार्दिक शोकसे अत्यन्त पीड़ित हो अपने पुत्रोंकी विजयकी आशा टूट जानेके कारण राजा धृतराष्ट्र अचेत- से होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १ ॥

तं विसंज्ञं निपतितं सिषिचुः परिचारिकाः ।

जलेनात्यर्थशीतेन वीजन्त्यः पुण्यगन्धिना ॥ २ ॥

उस समय अचेत पड़े हुए राजा धृतराष्ट्रको उनकी दासियाँ पंखा झलने लगीं और उनके ऊपर परम सुगन्धित एवं अत्यन्त शीतल जल छिड़कने लगीं ॥ २ ॥

पतितं चैनमालोक्य समन्ताद् भरतस्त्रियः ।

परिवव्रुर्महाराजमस्पृशंश्चैव पाणिभिः ॥ ३ ॥

महाराजको गिरा देख धृतराष्ट्रकी बहुत सी स्त्रियाँ उन्हें चारों ओर से घेरकर बैठ गयीं और उन्हें हाथोंसे सहलाने लगीं ॥ ३ ॥

उत्थाप्य चैनं शनकै राजानं पृथिवीतलात् ।

आसनं प्रापयामासुर्बाष्पकण्ठ्यो वराननाः ॥ ४ ॥

फिर उन सुमुखी स्त्रियोंने राजाको धीरे - धीरे धरतीसे उठाकर सिंहासनपर बिठाया । उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे और कण्ठ गद्गद हो रहे थे ॥ ४ ॥

आसनं प्राप्य राजा तु मूर्च्छयाभिपरिप्लुतः ।

निश्चेष्टोऽतिष्ठत तदा वीज्यमानः समन्ततः ॥ ५ ॥

सिंहासनपर पहुँचकर भी राजा धृतराष्ट्र मूर्च्छासे पीड़ित हो निश्चेष्ट हो गये । उस समय सब ओरसे उनके ऊपर व्यजन डुलाया जा रहा था ॥ ५ ॥

स लब्ध्वा शनकैः संज्ञां वेपमानो महीपतिः ।

पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छद् यथातथम् ॥ ६ ॥

फिर धीरे - धीरे होशमें आनेपर काँपते हुए राजा धृतराष्ट्रने पुनः सूतजातीय संजयसे युद्धका यथावत् समाचार पूछा ॥ ६ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

पृष्ठ 99

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यः स उद्यन्निवादित्यो ज्योतिषा प्रणुदंस्तमः ।

अजातशत्रुमायान्तं कस्तं द्रोणादवारयत् ॥ ७ ॥

धृतराष्ट्र बोले- जो उगते हुए सूर्यकी भाँति अपनी प्रभासे अन्धकार दूर कर देते हैं, उन अजातशत्रु युधिष्ठिरको द्रोणके समीप आनेसे किसने रोका था? ॥ ७ ॥

प्रभिन्नमिव मातङ्गं यथा क्रुद्धं तरस्विनम् ।

प्रसन्नवदनं दृष्ट्वा प्रतिद्विरदगामिनम् ॥ ८ ॥

वासितासंगमे यद्वदजय्यं प्रति यूथपैः ।

निजघान रणे वीरान् वीरः पुरुषसत्तमः ॥ ९ ॥

यो ह्येको हि महावीर्यो निर्दहेद् घोरचक्षुषा ।

कृत्स्नं दुर्योधनबलं धृतिमान् सत्यसंगरः ॥ १० ॥

चक्षुर्हणं जये सक्तमिष्वासधरमच्युतम् ।

दान्तं बहुमतं लोके के शूराः पर्यवारयन् ॥ ११ ॥

जो मदकी धारा बहानेवाले, हथिनीके साथ समागमके समय आये हुए विपक्षी हाथीपर आक्रमण करनेवाले तथा गजयूथपतियोंके लिये अजेय मतवाले गजराजके समान वेगशाली और पराक्रमी हैं, कौरवोंके प्रति जिनका क्रोध बढ़ा हुआ है, जिन पुरुषप्रवर वीरने रणक्षेत्र में बहुत - से वीरोंका संहार किया है, जो महापराक्रमी, धैर्यवान् एवं सत्यप्रतिज्ञ हैं और अपनी भयंकर दृष्टिसे अकेले ही दुर्योधनकी सम्पूर्ण सेनाको भस्म कर सकते हैं, जो क्रोधभरी दृष्टिसे ही शत्रुका संहार करनेमें समर्थ हैं, विजयके लिये प्रयत्नशील, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले, जितेन्द्रिय तथा लोकमें विशेष सम्मानित हैं, उन प्रसन्नवदन धनुर्धर युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यके सामने आते देख मेरे पक्षके किन शूरवीरोंने रोका था? ॥ ८-११ ॥

के दुष्प्रधर्षं राजानमिष्वासधरमच्युतम् ।

समासेदुर्नरव्याघ्रं कौन्तेयं तत्र मामकाः ॥ १२ ॥

जो धर्मसे कभी विचलित नहीं होते हैं, उन महाधनुर्धर दुर्धर्ष वीर पुरुषसिंह कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरपर मेरे किन योद्धाओंने आक्रमण किया था? ॥ १२ ॥

तरसैवाभिपद्याथ यो वै द्रोणमुपाद्रवत् ।

यः करोति महत् कर्म शत्रूणां वै महाबलः ॥ १३ ॥

महाकायो महोत्साहो नागायुतसमो बले ।

तं भीमसेनमायान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥ १४ ॥

जिन्होंने वेगसे ही पहुँचकर द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया था, जो शत्रुके समक्ष महान् पराक्रम प्रकट करते हैं, जो महाबली, महाकाय और महान् उत्साही हैं तथा जिनमें दस हजार हाथियोंके समान बल है, उन भीमसेनको आते देख किन वीरोंने रोका था? ॥ १३-१४ ॥

पृष्ठ 100

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यदाऽऽयाज्जलदप्रख्यो रथः परमवीर्यवान् ।

पर्जन्य इव बीभत्सुस्तुमुलामशनीं सृजन् ॥ १५ ॥

विसृजञ्छरजालानि वर्षाणि मघवानिव ।

अवस्फूर्जन् दिशः सर्वास्तलनेमिस्वनेन च ॥ १६ ॥

चापविद्युत्प्रभो घोरो रथगुल्मबलाहकः ।

स नेमिघोषस्तनितः शरशब्दातिबन्धुरः ॥ १७ ॥

रोषानिलसमुद्भूतो मनोऽभिप्रायशीघ्रगः ।

मर्मातिगो बाणधरस्तुमुलः शोणितोदकैः ॥ १८ ॥

सम्प्लावयन् दिशः सर्वा मानवैरास्तरन् महीम् । जो मेघके समान श्यामवर्णवाले परम पराक्रमी महारथी अर्जुन विद्युत्की उत्पत्ति करते हुए बादलोंके समान भयंकर वज्रास्त्रका प्रयोग करते हैं, जो जलकी वर्षा करनेवाले इन्द्रके समान बाणसमूहोंकी वृष्टि करते हैं तथा जो अपने धनुषकी टंकार और रथके पहियेकी घरघराहटसे सम्पूर्ण दिशाओंको शब्दायमान कर देते हैं, वे स्वयं भयंकर मेघस्वरूप जान पड़ते हैं । धनुष ही उनके समीप विद्युत्प्रभाके समान प्रकाशित होता है । रथियोंकी सेना उनकी फैली हुई घटाएँ जान पड़ती हैं। रथके पहियोंकी घरघराहट मेघ - गर्जनाके समान प्रतीत होती है । उनके बाणोंकी सनसनाहट वर्षाके शब्दकी भाँति अत्यन्त मनोहर लगती है । क्रोधरूपी वायु उन्हें आगे बढ़नेकी प्रेरणा देती है । वे मनोरथकी भाँति शीघ्रगामी और विपक्षियोंके मर्मस्थलोंको विदीर्ण कर डालनेवाले हैं । बाण धारण करके वे बड़े भयानक प्रतीत होते और रक्तरूपी जलसे सम्पूर्ण दिशाओंको आप्लावित करते हुए मनुष्योंकी लाशोंसे धरतीको पाट देते हैं ॥ १५–१८३ ॥ भीमनिःस्वनितो रौद्रो दुर्योधनपुरोगमान् ॥ १ ९ ॥

युद्धेऽभ्यषिञ्चद् विजयो गार्ध्रपत्रैः शिलाशितैः ।

गाण्डीवं धारयन् धीमान् कीदृशं वो मनस्तदा ॥ २० ॥

जिस समय भयंकर गर्जना करनेवाले रौद्ररूपधारी बुद्धिमान् अर्जुनने युद्धमें गाण्डीव धारण करके सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए गृध्रपंखयुक्त बाणोंद्वारा दुर्योधन आदि मेरे पुत्रों और सैनिकोंको घायल करना आरम्भ किया, उस समय तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हुई थी? ॥ १ ९ -२० ॥

इषुसम्बाधमाकाशं कुर्वन् कपिवरध्वजः ।

यदाऽऽयात् कथमासीत् तु तदा पार्थं समीक्षताम् ॥ २१ ॥

वानरके चिह्नसे युक्त श्रेष्ठ ध्वजावाले अर्जुन जब आकाशको अपने बाणोंसे ठसाठस भरते हुए तुमलोगोंपर चढ़ आये थे, उस समय उन्हें देखकर तुम्हारे मनकी कैसी दशा हुई थी? ॥ २१ ॥

कच्चिद् गाण्डीवशब्देन न प्रणश्यति वै बलम् ।