05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1121–1130

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1121–1130

पृष्ठ 1121

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महाराज! उन निशाचरोंने राक्षसराजसे कहा — ' प्रभो! इस नराधमका मांस दस्युओंको दे दिया जाय, आप हमें इसका पाप खानेके लिये न दें ' इस प्रकार समस्त राक्षसोंने राक्षसराजके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रार्थना की ॥ २०-२१३ ॥ एवमस्त्विति तानाह राक्षसेन्द्रो निशाचरान् ॥ २२ ॥

दस्यूनां दीयतामेष कृतघ्नोऽद्यैव राक्षसाः । यह सुनकर राक्षसराजने उन निशाचरोंसे कहा – ' राक्षसो! ऐसा ही सही, इस कृतघ्नको आज ही डाकुओंके हवाले कर दो ' ॥ २२३ ॥

इत्युक्ता राक्षसास्तेन शूलपट्टिशपाणयः ॥ २३ ॥

कृत्वा तं खण्डशः पापं दस्युभ्यः प्रददुस्तदा । राजाकी ऐसी आज्ञा पाकर हाथमें शूल और पट्टिश धारण किये राक्षसोंने पापी गौतमके टुकड़े - टुकड़े करके उसे दस्युओंको सौंप दिया ॥ २३३ ॥

दस्यवश्चापि नैच्छन्त तमत्तुं पापकारिणम् ।

क्रव्यादा अपि राजेन्द्र कृतघ्नं नोपभुञ्जते ॥ २४ ॥

राजेन्द्र! उन दस्युओंने भी उस पापाचारीका मांस खानेकी इच्छा नहीं की । मांसाहारी जीव- जन्तु भी कृतघ्नका मांस काममें नहीं लेते हैं ॥ २४ ॥

ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा ।

निष्कृतिर्विहिता राजन् कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ २५ ॥

राजन्! ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा व्रतभङ्ग करने वालोंके लिये शास्त्रमें प्रायश्चित्तका विधान है; परंतु कृतघ्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं बताया गया है ॥

मित्रद्रोही नृशंसश्च कृतघ्नश्च नराधमः ।

क्रव्यादैः कृमिभिश्चैव न भुज्यन्ते हि तादृशाः ॥ २६ ॥

मित्रद्रोही, नृशंस, नराधम तथा कृतघ्न – ऐसे मनुष्योंका मांस मांसभक्षी जीव-जन्तु तथा कीड़े भी नहीं खाते हैं ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २७ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1122

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त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः राजधर्मा और गौतमका पुनः जीवित होना भीष्म उवाच

ततश्चितां बकपतेः कारयामास राक्षसः ।

रत्नैर्गन्धैश्च बहुभिर्वस्त्रैश्च समलंकृताम् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर विरूपाक्षने बकराजके लिये एक चिता तैयार करायी । उसे बहुत से रत्नों, सुगन्धित चन्दनों तथा वस्त्रोंसे खूब सजाया गया था ॥ १ ॥

ततः प्रज्वाल्य नृपतिर्बकराजं प्रतापवान् ।

प्रेतकार्याणि विधिवद् राक्षसेन्द्रश्चकार ह ॥ २ ॥

तत्पश्चात् बकराजके शवको उसके ऊपर रखकर प्रतापी राक्षसराजने उसमें आग लगायी और विधिपूर्वक मित्रका दाह - कर्म सम्पन्न किया ॥ २ ॥

तस्मिन् काले च सुरभिर्देवी दाक्षायणी शुभा ।

उपरिष्टात् ततस्तस्य सा बभूव पयस्विनी ॥ ३ ॥

उसी समय दिव्य- धेनु दक्षकन्या सुरभिदेवी वहाँ आकर आकाशमें ठीक चिताके ऊपर खड़ी हो गयीं ॥

तस्या वक्त्राच्च्युतः फेनः क्षीरमिश्रस्तदानघ ।

सोऽपतद् वै ततस्तस्यां चितायां राजधर्मणः ॥ ४ ॥

अनघ! उनके मुखसे जो दूधमिश्रित फेन झरकर गिरा, वह राजधर्माकी उस चितापर पड़ा ॥ ४ ॥

ततः संजीवितस्तेन बकराजस्तदानघ ।

उत्पत्य च समीयाय विरूपाक्षं बकाधिपः ॥ ५ ॥

निष्पाप नरेश! उससे उस समय बकराज जी उठा और वह उड़कर विरूपाक्षसे जा मिला ॥ ५ ॥

ततोऽभ्ययाद् देवराजो विरूपाक्षपुरं तदा ।

प्राह चेदं विरूपाक्षं दिष्ट्या संजीवितस्त्वया ॥ ६ ॥

उसी समय देवराज इन्द्र विरूपाक्षके नगरमें आये और विरूपाक्षसे इस प्रकार बोले - ' बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारे द्वारा बकराजको जीवन मिला' ॥ ६ ॥

श्रावयामास चेन्द्रस्तं विरूपाक्षं पुरातनम् ।

यथा शापः पुरा दत्तो ब्रह्मणा राजधर्मणः ॥ ७ ॥

इन्द्रने विरूपाक्षको एक प्राचीन घटना सुनायी, जिसके अनुसार ब्रह्माजीने पहले राजधर्माको शाप दिया था ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1123

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यदा बकपती राजन् ब्रह्माणं नोपसर्पति ।

ततो रोषादिदं प्राह खगेन्द्राय पितामहः ॥ ८ ॥

राजन्! एक समय जब बकराज ब्रह्माजीकी सभामें नहीं पहुँच सके, तब पितामहने बड़े रोषमें भरकर इन पक्षिराजको शाप देते हुए कहा— ॥ ८ ॥

यस्मान्मूढो मम सभां नागतोऽसौ बकाधमः ।

तस्माद् वधं स दुष्टात्मा नचिरात् समवाप्स्यति ॥ ९ ॥

' वह मूर्ख और नीच बगला मेरी सभामें नहीं आया है; इसलिये शीघ्र ही उस दुष्टात्माको वधका कष्ट भोगना पड़ेगा' ॥ ९ ॥

तदयं तस्य वचनान्निहतो गौतमेन वै ।

तेनैवामृतसिक्तश्च पुनः संजीवितो बकः ॥ १० ॥

ब्रह्माजीके उस वचनसे ही गौतमने इनका वध किया और ब्रह्माजीने ही पुनः अमृत छिड़ककर राजधर्माको जीवन दान दिया है ॥ १० ॥

राजधर्मा बकः प्राह प्रणिपत्य पुरन्दरम् ।

यदि तेऽनुग्रहकृता मयि बुद्धिः सुरेश्वर ॥ ११ ॥

सखायं मे सुदयितं गौतमं जीवयेत्युत । तदनन्तर राजधर्मा बकने इन्द्रको प्रणाम करके कहा – ' सुरेश्वर! यदि आपकी मुझपर कृपा है तो मेरे प्रिय मित्र गौतमको भी जीवित कर दीजिये' ॥ ११३ ॥

तस्य वाक्यं समादाय वासवः पुरुषर्षभ ॥ १२ ॥

सिक्त्वामृतेन तं विप्रं गौतमं जीवयत् तदा । ' पुरुषप्रवर! उसके अनुरोधको स्वीकार करके इन्द्र- देवने गौतम ब्राह्मणको भी अमृत छिड़ककर जिला दिया ॥ सभाण्डोपस्करं राजंस्तमासाद्य बकाधिपः ॥ १३ ॥

सम्परिष्वज्य सुहृदं प्रीत्या परमया युतः । राजन्! बर्तन और सुवर्ण आदि सब सामग्रीसहित प्रिय सुहृद् गौतमको पाकर बकराजने बड़े प्रेमसे उसको हृदयसे लगा लिया ॥ १३३ ॥

अथ तं पापकर्माणं राजधर्मा बकाधिपः ॥ १४ ॥

विसर्जयित्वा सधनं प्रविवेश स्वमालयम् । फिर बकराज राजधर्माने उस पापाचारीको धनसहित विदा करके अपने घरमें प्रवेश किया ॥ १४ ॥

यथोचितं च स बको ययौ ब्रह्मसदस्तथा ॥ १५ ॥

ब्रह्मा चैनं महात्मानमातिथ्येनाभ्यपूजयत् । तदनन्तर बकराज यथोचित रीतिसे ब्रह्माजीकी सभामें गया और ब्रह्माजीने उस महात्माका आतिथ्य - सत्कार किया ॥ १५३ ॥

पृष्ठ 1124

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गौतमश्चापि सम्प्राप्य पुनस्तं शबरालयम् ।

शूद्रायां जनयामास पुत्रान् दुष्कृतकारिणः ॥ १६ ॥

गौतम भी पुनः भीलोंके ही गाँवमें जाकर रहने लगा । वहाँ उसने उस शूद्रजातिकी स्त्रीके पेटसे ही अनेक पापाचारी पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ १६ ॥

शापश्च सुमहांस्तस्य दत्तः सुरगणैस्तदा ।

कुक्षौ पुनर्ध्वाः पापोऽयं जनयित्वा चिरात् सुतान् ॥ १७ ॥

निरयं प्राप्स्यति महत् कृतघ्नोऽयमिति प्रभो । तब देवताओंने गौतमको महान् शाप देते हुए कहा–' यह पापी कृतघ्न है और दूसरा पति स्वीकार करनेवाली शूद्रजातीय स्त्रीके पेटसे बहुत दिनोंसे संतान पैदा करता आ रहा है । इस पापके कारण यह घोर नरकमें पड़ेगा ' ॥ एतत् प्राह पुरा सर्वं नारदो मम भारत ॥ १८ ॥

संस्मृत्य चापि सुमहदाख्यानं भरतर्षभ ।

मयापि भवते सर्वं यथावदनुवर्णितम् ॥ १ ९ ॥

भारत! यह सारा प्रसङ्ग पूर्वकालमें मुझसे महर्षि नारदने कहा था । भरतश्रेष्ठ! इस महान् आख्यानको याद करके मैंने तुम्हारे समक्ष सब यथार्थरूपसे कहा है ॥

कुतः कृतघ्नस्य यशः कुतः स्थानं कुतः सुखम् ।

अश्रद्धेयः कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ २० ॥

कृतघ्नको कैसे यश प्राप्त हो सकता है? उसे कैसे स्थान और सुखकी उपलब्धि हो सकती है? कृतघ्न विश्वासके योग्य नहीं होता । कृतघ्नके उद्धारके लिये शास्त्रोंमें कोई प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है ॥

मित्रद्रोहो न कर्तव्यः पुरुषेण विशेषतः ।

मित्रध्रुङ् नरकं घोरमनन्तं प्रतिपद्यते ॥ २१ ॥

मनुष्यको विशेष ध्यान देकर मित्रद्रोहके पापसे बचना चाहिये । मित्रद्रोही मनुष्य अनन्तकालके लिये घोर नरकमें पड़ता है ॥ २१ ॥

कृतज्ञेन सदा भाव्यं मित्रकामेन चैव ह ।

मित्राच्च लभते सर्वं मित्रात् पूजां लभेत च ॥ २२ ॥

प्रत्येक मनुष्यको सदा कृतज्ञ होना चाहिये और मित्रकी इच्छा रखनी चाहिये; क्योंकि

मित्रसे सब कुछ प्राप्त होता है । मित्रके सहयोगसे सदा सम्मानकी प्राप्ति होती है ॥

मित्राद् भोगांश्च भुञ्जीत मित्रेणापत्सु मुच्यते ।

सत्कारैरुत्तमैर्मित्रं पूजयेत विचक्षणः ॥ २३ ॥

मित्रकी सहायतासे भोगोंकी भी उपलब्धि होती है और मित्रद्वारा मनुष्य आपत्तियोंसे छुटकारा पा जाता है, अतः बुद्धिमान् पुरुष उत्तम सत्कारोंद्वारा मित्रका पूजन करे ॥ परित्याज्यो बुधैः पापः कृतघ्नो निरपत्रपः ।

पृष्ठ 1125

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मित्रद्रोही कुलाङ्गारः पापकर्मा नराधमः ॥ २४ ॥

जो पापी, कृतघ्न, निर्लज्ज, मित्रद्रोही, कुलाङ्गार और पापाचारी हो, ऐसे अधम मनुष्यका विद्वान् पुरुष सदा त्याग करे ॥ २४ ॥

एष धर्मभृतां श्रेष्ठ प्रोक्तः पापो मया तव ।

मित्रद्रोही कृतघ्नो वै किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २५ ॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इस प्रकार यह मैंने तुम्हें पापी, मित्रद्रोही और कृतघ्न

पुरुषका परिचय दिया है । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा तदा वाक्यं भीष्मेणोक्तं महात्मना ।

युधिष्ठिरः प्रीतमना बभूव जनमेजय ॥ २६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! महात्मा भीष्मका यह वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७३ ॥

पृष्ठ 1126

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(मोक्षधर्मपर्व ) चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः शोकाकुल चित्तकी शान्तिके लिये राजा सेनजित् और ब्राह्मणके संवादका वर्णन युधिष्ठिर उवाच

धर्माः पितामहेनोक्ता राजधर्माश्रिताः शुभाः ।

धर्ममाश्रमिणां श्रेष्ठं वक्तुमर्हसि पार्थिव ॥ १ ॥

राजा युधिष्ठिरने कहा - पितामह! यहाँ तक आपने राजधर्मसम्बन्धी श्रेष्ठ धर्मोंका उपदेश दिया । पृथ्वीनाथ! अब आप आश्रमियोंके उत्तम धर्मका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

भीष्मउवाच

सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्ग्यः सत्यफलं तपः ।

बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥ २ ॥

भीष्मजी बोले- युधिष्ठिर! वेदोंमें सर्वत्र सभी आश्रमोंके लिये स्वर्गसाधक यथार्थ फलकी प्राप्ति करानेवाली तपस्याका उल्लेख है । धर्मके बहुत - से द्वार हैं । संसारमें कोई ऐसी क्रिया नहीं है, जिसका कोई फल न हो ॥ २ ॥

यस्मिन् यस्मिंस्तु विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।

स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ॥ ३ ॥

भरतश्रेष्ठ! जो - जो पुरुष जिस-जिस विषयमें पूर्ण निश्चयको पहुँच जाता है ( जिसके द्वारा उसे अभीष्ट सिद्धिका विश्वास हो जाता है ), उसीको वह कर्तव्य समझता है । दूसरे विषयको नहीं ॥ ३ ॥

यथा यथा च पर्येति लोकतन्त्रमसारवत् ।

तथा तथा विरागोऽत्र जायते नात्र संशयः ॥ ४ ॥

मनुष्य जैसे - जैसे संसारके पदार्थोंको सारहीन समझता है, वैसे ही वैसे इनमें उसका वैराग्य होता जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४ ॥

एवं व्यवसिते लोके बहुदोषे युधिष्ठिर ।

आत्ममोक्षनिमित्तं वै यतेत मतिमान् नरः ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1127

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युधिष्ठिर! इस प्रकार यह जगत् अनेक दोषोंसे परिपूर्ण है, ऐसा निश्चय करके बुद्धिमान् पुरुष अपने मोक्षके लिये प्रयत्न करे ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरउवाच

नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।

यया बुद्धया नुदेच्छोकं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ६ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- दादाजी! धनके नष्ट हो जानेपर अथवा स्त्री, पुत्र या पिताके मर जानेपर किस बुद्धिसे मनुष्य अपने शोकका निवारण करे? यह मुझे बताइये ॥ ६ ॥

भीष्म उवाच

नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।

अहो दुःखमिति ध्यायन् शोकस्यापचितिं चरेत् ॥ ७ ॥

भीष्मजीने कहा - वत्स! जब धन नष्ट हो जाय अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु हो जाय, तब ‘ ओह! संसार कैसा दुःखमय है ' यह सोचकर मनुष्य शोकको दूर करनेवाले शम-दम आदि साधनोंका अनुष्ठान करे ॥ ७ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

यथा सेनजितं विप्रः कश्चिदेत्याब्रवीत् सुहृत् ॥ ८ ॥

इस विषयमें किसी हितैषी ब्राह्मणने राजा सेनजित्के पास आकर उन्हें जैसा उपदेश दिया था, उसी प्राचीन इतिहासको विज्ञ पुरुष दृष्टान्तके रूपमें प्रस्तुत किया करते हैं ॥ ८ ॥

पुत्रशोकाभिसंतप्तं राजानं शोकविह्वलम् ।

विषण्णमनसं दृष्ट्वा विप्रो वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥

राजा सेनजित्के पुत्रकी मृत्यु हो गयी थी । वे उसीके शोककी आगसे जल रहे थे । उनका मन विषादमें डूबा हुआ था । उन शोकविह्वल नरेशको देखकर ब्राह्मणने इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥

किं नु मुह्यसि मूढस्त्वं शोच्यः किमनुशोचसि ।

यदा त्वामपि शोचन्तः शोच्या यास्यन्ति तां गतिम् ॥ १० ॥

‘ राजन्! तुम मूढ मनुष्यकी भाँति क्यों मोहित हो रहे हो? शोकके योग्य तो तुम स्वयं ही हो, फिर दूसरोंके लिये क्यों शोक करते हो? अजी! एक दिन ऐसा आयेगा, जब कि दूसरे शोचनीय मनुष्य तुम्हारे लिये भी शोक करते हुए उसी गतिको प्राप्त होंगे ॥ १० ॥

त्वं चैवाहं च ये चान्ये त्वामुपासन्ति पार्थिव ।

सर्वे तत्र गमिष्यामो यत एवागता वयम् ॥ ११ ॥

' पृथ्वीनाथ! तुम, मैं और ये दूसरे लोग जो इस समय तुम्हारे पास बैठे हैं; सब वहीं जायँगे, जहाँसे हम आये हैं ' ॥ ११ ॥

पृष्ठ 1128

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सेनजिदुवाच

का बुद्धिः किं तपो विप्र कः समाधिस्तपोधन ।

किं ज्ञानं किं श्रुतं चैव यत् प्राप्य न विषीदसि ॥ १२ ॥

सेनजित्ने पूछा – तपस्याके धनी ब्राह्मणदेव! आपके पास ऐसी कौन - सी बुद्धि, कौन तप, कौन समाधि, कैसा ज्ञान और कौन-न- सा शास्त्र है, जिसे पाकर आपको किसी प्रकारका विषाद नहीं है ॥ १२ ॥

( हृष्यन्तमवसीदन्तं सुखदुःखविपर्यये । आत्मानमनुशोचामि ममैष हृदि संस्थितः ॥ ) सुख और दुःखका चक्र घूमता रहता है । मैं सुखमें हर्षसे फूल उठता हूँ और दुःखमें खिन्न हो जाता हूँ । ऐसी अवस्थामें पड़े हुए अपने - आपके लिये मुझे निरन्तर शोक होता है । यह शोक मेरे हृदयमें डेरा डाले बैठा है ॥ ब्राह्मणउवाच

पश्य भूतानि दुःखेन व्यतिषिक्तानि सर्वशः ।

उत्तमाधममध्यानि तेषु तेष्विह कर्मसु ॥ १३ ॥

ब्राह्मणने कहा — राजन्! देखो, इस संसारमें उत्तम, मध्यम और अधम सभी प्राणी भिन्न - भिन्न कर्मोंमें आसक्त हो दुःखसे ग्रस्त हो रहे हैं ॥ १३ ॥

( अहमेको न मे कश्चिन्नाहमन्यस्य कस्यचित् । न तं पश्यामि यस्याहं तं न पश्यामि यो मम ॥ ) मैं तो अकेला हूँ । न तो दूसरा कोई मेरा है और न मैं किसी दूसरेका हूँ। मैं उस पुरुषको नहीं देखता, जिसका मैं होऊँ तथा उसको भी नहीं देखता, जो मेरा हो (न मुझपर किसीकी ममता है, न मेरा ही किसीपर ममत्व) ॥ आत्मापि चायं न मम सर्वा वा पृथिवी मम ।

यथा मम तथाऽन्येषामिति चिन्त्य न मे व्यथा ।

एतां बुद्धिमहं प्राप्य न प्रहृष्ये न च व्यथे ॥ १४ ॥

यह शरीर भी मेरा नहीं अथवा सारी पृथ्वी भी मेरी नहीं है । ये सब वस्तुएँ जैसी मेरी हैं, वैसी ही दूसरोंकी भी हैं । ऐसा सोचकर इनके लिये मेरे मनमें कोई व्यथा नहीं होती । इसी बुद्धिको पाकर न मुझे हर्ष होता है, न शोक ॥

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।

समेत्य च व्यपेयातां तद्वद्भूतसमागमः ॥ १५ ॥

जिस प्रकार समुद्रमें बहते हुए दो काष्ठ कभी- कभी एक- दूसरेसे मिल जाते हैं और मिलकर फिर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार इस लोकमें प्राणियोंका समागम होता है ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1129

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1129 का मूल पृष्ठ
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एवं पुत्राश्च पौत्राश्च ज्ञातयो बान्धवास्तथा ।

तेषां स्नेहो न कर्तव्यो विप्रयोगो ध्रुवो हि तैः ॥ १६ ॥

इसी तरह पुत्र, पौत्र, जाति- बान्धव और सम्बन्धी भी मिल जाते हैं । उनके प्रति कभी आसक्ति नहीं बढ़ानी चाहिये; क्योंकि एक दिन उनसे बिछोह होना निश्चित है ॥ १६ ॥

अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः ।

न त्वासौ वेद न त्वं तं कः सन् किमनुशोचसि ॥ १७ ॥

तुम्हारा पुत्र किसी अज्ञात स्थितिसे आया था और अब अज्ञात स्थितिमें ही चला गया है । न तो वह तुम्हें जानता था और न तुम उसे जानते थे; फिर तुम उसके कौन होकर किसलिये शोक करते हो? ॥ १७ ॥

तृष्णार्तिप्रभवं दुःखं दुःखार्तिप्रभवं सुखम् ।

सुखात् संजायते दुःखं दुःखमेवं पुनः पुनः ॥ १८ ॥

संसारमें विषयोंकी तृष्णासे जो व्याकुलता होती है, उसीका नाम दुःख है और उस दुःखका विनाश ही सुख है । उस सुखके बाद ( पुनः कामनाजनित) दुःख होता है । इस प्रकार बारंबार दुःख ही होता रहता है ॥ १८ ॥

सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् सुखदुःखे मनुष्याणां चक्रवत् परिवर्ततः ॥ १ ९ ॥ सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता है । मनुष्योंके सुख और दुःख चक्रकी भाँति घूमते रहते हैं ॥ १ ९ ॥

सुखात् त्वं दुःखमापन्नः पुनरापत्स्यसे सुखम् ।

न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ॥ २० ॥

इस समय तुम सुखसे दुःखमें आ पड़े हो । अब फिर तुम्हें सुखकी प्राप्ति होगी । यहाँ किसी भी प्राणीको न तो सदा सुख ही प्राप्त होता है और न सदा दुःख ही ॥ शरीरमेवायतनं सुखस्य दुःखस्य चाप्यायतनं शरीरम् । यद्यच्छरीरेण करोति कर्म तेनैव देही समुपाश्नुते तत् ॥ २१ ॥

यह शरीर ही सुखका आधार है और यही दुःखका भी आधार है । देहाभिमानी पुरुष शरीरसे जो -जो कर्म करता है, उसीके अनुसार वह सुख एवं दुःखरूप फल भोगता है ॥ २१ ॥

जीवितं च शरीरेण जात्यैव सह जायते ।

उभे सह विवर्तेते उभे सह विनश्यतः ॥ २२ ॥

यह जीवन स्वभावतः शरीरके साथ ही उत्पन्न होता है । दोनों साथ - साथ विविध रूपोंमें रहते हैं और साथ ही साथ नष्ट हो जाते हैं ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1130

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स्नेहपाशैर्बहुविधैराविष्टविषया जनाः ।

अकृतार्थाश्च सीदन्ते जलैः सैकतसेतवः ॥ २३ ॥

मनुष्य नाना प्रकारके स्नेह- बन्धनोंमें बँधे हुए हैं, अतः वे सदा विषयोंकी आसक्तिसे घिरे रहते हैं; इसीलिये जैसे बालूद्वारा बनाये हुए पुल जलके वेगसे बह जाते हैं, उसी प्रकार उन मनुष्योंकी विषयकामना सफल नहीं होती; जिससे वे दुःख पाते रहते हैं ॥ २३ ॥

स्नेहेन तिलवत् सर्वं सर्गचक्रे निपीड्यते ।

तिलपीडैरिवाक्रम्य क्लेशैरज्ञानसम्भवैः ॥ २४ ॥

तेलीलोग तेलके लिये जैसे तिलोंको कोल्हूमें पेरते हैं, उसी प्रकार स्नेहके कारण सब लोग अज्ञानजनित क्लेशोंद्वारा सृष्टिचक्रमें पिस रहे हैं ॥ २४ ॥

संचिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षया नरः ।

एकः क्लेशानवाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥ २५ ॥

मनुष्य स्त्री- पुत्र आदि कुटुम्बके लिये चोरी आदि पाप कर्मोंका संग्रह करता है; किंतु इस लोक और परलोकमें उसे अकेले ही उन समस्त कर्मोंका क्लेशमय फल भोगना पड़ता है ॥ २५ ॥

पुत्रदारकुटुम्बेषु प्रसक्ताः सर्वमानवाः ।

शोकपङ्कार्णवे मरना जीर्णा वनगजा इव ॥ २६ ॥

स्त्री, पुत्र और कुटुम्बमें आसक्त हुए सभी मनुष्य उसी प्रकार शोकके समुद्रमें डूब जाते हैं जैसे बूढ़े जंगली हाथी दलदलमें फँसकर नष्ट हो जाते हैं ॥ २६ ॥

पुत्रनाशे वित्तनाशे ज्ञातिसम्बन्धिनामपि ।

प्राप्यते सुमहद् दुखं दावाग्निप्रतिमं विभो ।

दैवायत्तमिदं सर्वं सुखदुःखे भवाभवौ ॥ २७ ॥

प्रभो! यहाँ सब लोगोंको पुत्र, धन, कुटुम्बी तथा सम्बन्धियोंका नाश होनेपर दावानलके समान दाह उत्पन्न करनेवाला महान् दुःख प्राप्त होता है; परंतु सुख-दुःख और जन्म- मृत्यु आदि यह सब कुछ प्रारब्धके ही अधीन है ॥

असुहृत् ससुहृच्चापि सशत्रुर्मित्रवानपि ।

सप्रज्ञः प्रज्ञया हीनो दैवेन लभते सुखम् ॥ २८ ॥

मनुष्य हितैषी सुहृदोंसे युक्त हो या न हो, वह शत्रुके साथ हो या मित्रके, बुद्धिमान् हो या बुद्धिहीन, दैवकी अनुकूलता होनेपर ही सुख पाता है ॥ २८ ॥

नालं सुखाय सुहृदो नालं दुःखाय शत्रवः ।

न च प्रज्ञालमर्थानां न सुखानामलं धनम् ॥ २ ९ ॥

अन्यथा न तो सुहृद् सुख देनेमें समर्थ हैं, न शत्रु दुःख देनेमें समर्थ हैं, न तो बुद्धि धन देनेकी शक्ति रखती है और न धन ही सुख देनेमें समर्थ होता है ॥ बुद्धिर्धनलाभाय न जाड्यबमसमृद्धये ।