श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1111–1120
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1111–1120
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गच्छ सौम्य पथानेन कृतकृत्यो भविष्यसि ॥। १४ ॥
इतस्त्रियोजनं गत्वा राक्षसाधिपतिर्महान् ।
विरूपाक्ष इति ख्यातः सखा मम महाबलः ॥ १५ ॥
तदनन्तर! जब प्रातःकाल हुआ तब राजधर्माने ब्राह्मणके सुखका उपाय सोचकर इस प्रकार कहा — ‘ सौम्य! इस मार्गसे जाइये, आपका कार्य सिद्ध हो जायगा । यहाँसे तीन योजन दूर जानेपर जो नगर मिलेगा, वहाँ महाबली राक्षसराज विरूपाक्ष रहते हैं, वे मेरे महान् मित्र हैं ॥
तं गच्छ द्विजमुख्य त्वं स मद्वाक्यप्रचोदितः ।
कामानभीप्सितांस्तुभ्यं दाता नास्त्यत्र संशयः ॥ १६ ॥
' द्विजश्रेष्ठ! आप उनके पास जाइये । वे मेरे कहनेसे आपको यथेष्ट धन देंगे और आपकी मनोवाञ्छित कामनाएँ पूर्ण करेंगे, इसमें संशय नहीं है ' ॥ १६ ॥
इत्युक्तः प्रययौ राजन् गौतमो विगतक्लमः ।
फलान्यमृतकल्पानि भक्षयन् स यथेष्टतः ॥ १७ ॥
चन्दनागुरुमुख्यानि त्वक्पत्राणां वनानि च ।
तस्मिन् पथि महाराज सेवमानो द्रुतं ययौ ॥ १८ ॥
राजन्! उसके ऐसा कहनेपर गौतम वहाँसे चल दिया । उसकी सारी थकावट दूर हो चुकी थी । महाराज! मार्गमें तेजपातोंके वनमें, जहाँ चन्दन और अगुरुके वृक्षोंकी प्रधानता थी, विश्राम करता और इच्छानुसार अमृतके समान मधुर फल खाता हुआ वह बड़ी तेजीसे आगे बढ़ता चला गया ॥ १७-१८ ॥
ततो मेरुव्रजं नाम नगरं शैलतोरणम् ।
शैलप्राकारवप्रं च शैलयन्त्राकुलं तथा ॥ १ ९ ॥
चलते - चलते वह मेरुव्रज नामक नगरमें जा पहुँचा, जिसके चारों ओर पर्वतोंके टीले और पर्वतोंकी ही चहारदीवारी थी । उसका सदर फाटक भी एक पर्वत ही था । नगरकी रक्षाके लिये सब ओर शिलाकी बड़ी- बड़ी चट्टानें और मशीनें थीं ॥ १ ९ ॥
विदितश्चाभवत् तस्य राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ।
प्रहितः सुहृदा राजन् प्रीयमाणः प्रियातिथिः ॥ २० ॥
परम बुद्धिमान् राक्षसराज विरूपाक्षको सेवकोंद्वारा यह सूचना दी गयी कि राजन्! आपके मित्रने अपने एक प्रिय अतिथिको आपके पास भेजा है, वह बहुत प्रसन्न है ॥ २० ॥
ततः स राक्षसेन्द्रः स्वान् प्रेष्यानाह युधिष्ठिर ।
गौतमो नगरद्वारात् शीघ्रमानीयतामिति ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर! यह समाचार पाते ही राक्षसराजने अपने सेवकोंसे कहा - ' गौतमको नगरद्वारसे शीघ्र यहाँ लाया जाय ' ॥ २१ ॥
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ततः पुरवरात् तस्मात् पुरुषाः श्येनचेष्टनाः ।
गौतमेत्यभिभाषन्तः पुरद्वारमुपागमन् ॥ २२ ॥
यह आदेश प्राप्त होते ही राजसेवक गौतमको पुकारते हुए बाजकी तरह झपटकर उस श्रेष्ठ नगरके फाटकपर आये ॥ २२ ॥
तमूचुर्महाराज राजप्रेष्यास्तदा द्विजम् ।
त्वरस्व तूर्णमागच्छ राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ॥ २३ ॥
महाराज! राजाके उन सेवकोंने उस समय उस ब्राह्मणसे कहा- ' ब्रह्मन्! जल्दी
कीजिये । शीघ्र आइये । महाराज आपसे मिलना चाहते हैं ॥ २३ ॥
राक्षसाधिपतिर्वीरो विरूपाक्ष इति श्रुतः ।
स त्वां त्वरति वै द्रष्टुं तत् क्षिप्रं संविधीयताम् ॥ २४ ॥
‘ विरूपाक्ष नामसे प्रसिद्ध वीर राक्षसराज आपको देखनेके लिये उतावले हो रहे हैं; अतः आप शीघ्रता कीजिये ' ॥ २४ ॥
ततः स प्राद्रवद् विप्रो विस्मयाद् विगतक्लमः ।
गौतमः परमर्धिं तां पश्चन् परमविस्मितः ॥ २५ ॥
बुलावा सुनते ही गौतमकी थकावट दूर हो गयी । वह विस्मित होकर दौड़ पड़ा ।
राक्षसराजकी उस महा- समृद्धिको देखकर उसे बड़ा आश्चर्य होता था ॥ २५ ॥
तैरेव सहितो राज्ञो वेश्म तूर्णमुपाद्रवत् ।
दर्शनं राक्षसेन्द्रस्य कांक्षमाणो द्विजस्तदा ॥ २६ ॥
राक्षसराजके दर्शनकी इच्छा मनमें लिये वह ब्राह्मण उन सेवकोंके साथ शीघ्र ही राजमहलमें जा पहुँचा ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७० ॥
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एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः गौतमका राक्षसराजके यहाँसे सुवर्णराशि लेकर लौटना और अपने मित्र बकके वधका घृणित विचार मनमें लाना भीष्म उवाच
ततः स विदितो राज्ञः प्रविश्य गृहमुत्तमम् ।
पूजितो राक्षसेन्द्रेण निषसादासनोत्तमे ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर राजाको उसके आगमनकी सूचना दी गयी और
वह उनके उत्तम भवनमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ राक्षसराजने उसका विधिवत् पूजन किया ।
तत्पश्चात् वह एक उत्तम आसनपर विराजमान हुआ ॥ १ ॥
पृष्टश्च गोत्रचरणं स्वाध्यायं ब्रह्मचारिकम् ।
न तत्र व्याजहारान्यद् गोत्रमात्रादृते द्विजः ॥ २ ॥
विरूपाक्षने गौतमसे उसके गोत्र, शाखा और ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक किये गये स्वाध्यायके विषयमें प्रश्न किया; परंतु उसने गोत्र (जाति) के सिवा और कुछ नहीं बताया ॥ २ ॥
ब्रह्मवर्चसहीनस्य स्वाध्यायोपरतस्य च ।
गोत्रमात्रविदो राजा निवासं समपृच्छत ॥ ३ ॥
तब ब्राह्मणोचित तेजसे हीन, स्वाध्यायसे उपरत, केवल गोत्र अथवा जातिका नाम जाननेवाले उस ब्राह्मणसे राजाने उसका निवासस्थान पूछा ॥ ३ ॥
राक्षस उवाच
क्व ते निवासः कल्याण किंगोत्रा ब्राह्मणी च ते ।
तत्त्वं ब्रूहि न भीः कार्या विश्वसस्व यथासुखम् ॥ ४ ॥
राक्षसराज बोले- भद्र! तुम्हारा निवास कहाँ है? तुम्हारी पत्नी किस गोत्रकी कन्या है? यह सब ठीक-ठीक बताओ । भय न करो । मुझपर विश्वास करो और सुखसे रहो ॥ ४ ॥
गौतम उवाच
मध्यदेशप्रसूतोऽहं वासो मे शबरालये ।
शूद्रा पुनर्भूर्भार्या मे सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ५ ॥
गौतमने कहा— राक्षसराज! मेरा जन्म तो हुआ है मध्यदेशमें, किंतु मैं एक भीलके घरमें रहता हूँ । मेरी स्त्री शूद्र जातिकी है और मुझसे पहले दूसरेकी पत्नी रह चुकी है । यह बात मैं आपसे सत्य ही कहता हूँ ॥ ५ ॥
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भीष्म उवाच
ततो राजा विममृशे कथं कार्यमिदं भवेत् ।
कथं वा सुकृतं मे स्यादिति बुद्धयान्वचिन्तयत् ॥ ६ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! यह सुनकर राक्षसराज मन- ही- मन विचार करने लगे कि अब किस तरह काम करना चाहिये? कैसे मुझे पुण्य प्राप्त हो सकता है? इस प्रकार उन्होंने बारंबार बुद्धि लगाकर सोचा और विचारा ॥ ६ ॥
अयं वै जन्मना विप्रः सुहृत् तस्य महात्मनः ।
सम्प्रेषितश्च तेनायं काश्यपेन ममान्तिकम् ॥ ७ ॥
तस्य प्रियं करिष्यामि स हि मामाश्रितः सदा ।
भ्राता मे बान्धवश्चासौ सखा च हृदयङ्गमः ॥ ८ ॥
वे मन ही मन कहने लगे, ' यह केवल जन्मसे ही ब्राह्मण है; परंतु महात्मा राजधर्माका सुहृद् है । उन कश्यपकुमारने ही इसे यहाँ मेरे पास भेजा है; अतः उनका प्रिय कार्य अवश्य करूँगा । वह सदा मुझपर भरोसा रखता है और मेरा भाई, बान्धव तथा हार्दिक मित्र भी है ॥ ७-८ ॥
कार्तिक्यामद्य भोक्तारः सहस्रं मे द्विजोत्तमाः ।
तत्रायमपि भोक्ता च देयमस्मै च मे धनम् ॥ ९ ॥
स चाद्य दिवसः पुण्यो ह्यतिथिश्चायमागतः ।
संकल्पितं चैव धनं किं विचार्यमतः परम् ॥ १० ॥
' आज कार्तिककी पूर्णिमा है । आजके दिन सहस्रों श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे यहाँ भोजन करेंगे । उन्हींमें यह भी भोजन कर लेगा, उन्हींके साथ इसे भी धन देना चाहिये । आज पुण्य दिवस है, यह ब्राह्मण अतिथिरूपसे यहाँ आया है और मैंने धन दान करनेका संकल्प कर ही रक्खा है । अब इसके बाद क्या विचार करना है? ' ॥
ततः सहस्रं विप्राणां विदुषां समलंकृतम् ।
स्नातानामनुसम्प्राप्तं सुमहत् क्षौमवाससाम् ॥ ११ ॥
तदनन्तर भोजनके समय हजारों विद्वान् ब्राह्मण स्नान करके रेशमी वस्त्र और अलंकार धारण किये वहाँ आ पहुँचे ॥ ११ ॥
तानागतान् द्विजश्रेष्ठान् विरूपाक्षो विशाम्पते ।
यथार्हं प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १२ ॥
प्रजानाथ! विरूपाक्षने वहाँ पधारे हुए उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका शास्त्रीय विधिके अनुसार यथायोग्य स्वागत - सत्कार किया ॥ १२ ॥
बृस्यस्तेषां तु संन्यस्ता राक्षसेन्द्रस्य शासनात् ।
भूमौ वरकुशाः स्तीर्णाः प्रेष्यैर्भरतसत्तम ॥ १३ ॥
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भरतश्रेष्ठ! राक्षसराजकी आज्ञासे सेवकोंने जमीनपर उनके लिये कुशके सुन्दर आसन बिछा दिये ॥ १३ ॥
तासु ते पूजिता राज्ञा निषण्णा द्विजसत्तमाः ।
तिलदर्भोदकेनाथ अर्चिता विधिवद् द्विजाः ॥ १४ ॥
राजाके द्वारा सम्मानित वे श्रेष्ठ ब्राह्मण जब उन आसनोंपर विराजमान हो गये तब विरूपाक्षने तिल, कुश और जल लेकर उनका विधिवत् पूजन किया ॥ १४ ॥
विश्वेदेवाः सपितरः साग्नयश्चोपकल्पिताः ।
विलिप्ताः पुष्पवन्तश्च सुप्रचाराः सुपूजिताः ।
व्यराजन्त महाराज नक्षत्रपतयो यथा ॥ १५ ॥
उनमें विश्वेदेवों, पितरों तथा अग्निदेवकी भावना करके उन सबको चन्दन लगाया, फूलोंकी मालाएँ पहनायीं और सुन्दर रीतिसे उनकी पूजा की । महाराज! उन आसनोंपर बैठकर वे ब्राह्मण चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ १५ ॥
ततो जाम्बूनदीः पात्रीर्वज्राङ्का विमलाः शुभाः ।
वरान्नपूर्णा विप्रेभ्यः प्रादान्मधुघृतप्लुताः ॥ १६ ॥
तत्पश्चात् उसने हीरोंसे जड़ी हुई सोनेकी स्वच्छ सुन्दर थालियोंमें घीसे बने हुए मीठे पकवान परोसकर उन ब्राह्मणोंके आगे रख दिये ॥ १६ ॥
तस्य नित्यं सदाऽऽषाढ्यां माघ्यां च बहवो द्विजाः ।
ईप्सितं भोजनवरं लभन्ते सत्कृतं सदा ॥ १७ ॥
उसके यहाँ आषाढ़ और माघकी पूर्णिमाको सदा बहुत - से ब्राह्मण सत्कारपूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार उत्तम भोजन पाते थे ॥ १७ ॥
विशेषतस्तु कार्तिक्यां द्विजेभ्यः सम्प्रयच्छति ।
शरद् व्यपाये रत्नानि पौर्णमास्यामिति श्रुतिः ॥ १८ ॥
विशेषतः कार्तिककी पूर्णिमाको, जब कि शरद्ऋतुकी समाप्ति होती है, वह ब्राह्मणोंको रत्नोंका दान करता था; ऐसा सुननेमें आया है ॥ १८ ॥
सुवर्णं रजतं चैव मणीनथ च मौक्तिकान् ॥ १ ९ ॥
वज्रान् महाधनांश्चैव वैदूर्याजिनराङ्कवान् ।
रत्नराशीन् विनिक्षिप्य दक्षिणार्थे स भारत ॥ २० ॥
ततः प्राह द्विजश्रेष्ठान् विरूपाक्षो महाबलः ।
गृह्णीत रत्नान्येतानि यथोत्साहं यथेष्टतः ॥ २९ ॥
येषु येषु च भाण्डेषु भुक्तं वो द्विजसत्तमाः ।
तान्येवादाय गच्छध्वं स्ववेश्मानीति भारत ॥ २२ ॥
भारत! भोजनके पश्चात् ब्राह्मणोंके समक्ष बहुत- से सोने, चाँदी, मणि, मोती, बहुमूल्य हीरे, वैदूर्यमणि, रंकुमृगके चर्म तथा रत्नोंके कई ढेर लगाकर महाबली विरूपाक्षने उन श्रेष्ठ
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ब्राह्मणोंसे कहा — ‘ द्विजवरो! आपलोग अपनी इच्छा और उत्साहके अनुसार इन रत्नोंको उठा ले जायँ और जिनमें आपलोगोंने भोजन किया है, उन पात्रोंको भी अपने घर लेते जायँ' ॥ १ ९ –२२ ॥
इत्युक्तवचने तस्मिन् राक्षसेन्द्रे महात्मनि ।
यथेष्टं तानि रत्नानि जगृहुर्ब्राह्मणर्षभाः ॥ २३ ॥
उन महात्मा राक्षसराजके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मणोंने इच्छानुसार उन सब रत्नोंको ले लिया ॥ २३ ॥
ततो महार्हैस्ते सर्वे रत्नैरभ्यर्चिताः शुभैः ।
ब्राह्मणा मृष्टवसनाः सुप्रीताः स्म ततोऽभवन् ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् उन सुन्दर एवं महामूल्यवान् रत्नोंद्वारा पूजित हुए वे सभी उज्ज्वल वस्त्रधारी ब्राह्मण बड़े प्रसन्न हुए ॥
ततस्तान् राक्षसेन्द्रश्च द्विजानाह पुनर्वचः ।
नानादेशगतान् राजन् राक्षसान् प्रतिषिध्य वै ॥ २५ ॥
अद्यैकं दिवसं विप्रा न वोऽस्तीह भयं क्वचित् ।
राक्षसेभ्यः प्रमोदध्वमिष्टतो यात माचिरम् ॥ २६ ॥
राजन्! इसके बाद राक्षसराज विरूपाक्षने नाना देशोंसे आये हुए राक्षसोंको हिंसा करनेसे रोककर उन ब्राह्मणोंसे कहा– ' विप्रगण! आज एक दिनके लिये आपलोगोंको राक्षसोंकी ओरसे कहीं कोई भय नहीं है; अतः आनन्द कीजिये और शीघ्र ही अपने अभीष्ट
स्थानको चले जाइये । विलम्ब न कीजिये ' ॥ २५-२६ ॥
ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे विप्रसंघाः समन्ततः ।
गौतमोऽपि सुवर्णस्य भारमादाय सत्वरः ॥ २७ ॥
कृच्छ्रात् समुद्धरन् भारं न्यग्रोधं समुपागमत् ।
न्यषीदच्च परिश्रान्तः क्लान्तश्च क्षुधितश्च सः ॥ २८ ॥
यह सुनकर सब ब्राह्मणसमुदाय चारों ओर भाग चले । गौतम भी सुवर्णका भारी भार लेकर बड़ी कठिनाईसे ढोता हुआ जल्दी-जल्दी चलकर बरगदके पास आया । वहाँ पहुँचते ही थककर बैठ गया । वह भूखसे पीड़ित और क्लान्त हो रहा था ॥ २७-२८ ॥
ततस्तमध्यगाद् राजन् राजधर्मा खगोत्तमः ।
स्वागतेनाभिनन्दंश्च गौतमं मित्रवत्सलः ॥ २९ ॥
राजन्! तत्पश्चात् पक्षियोंमें श्रेष्ठ मित्रवत्सल राजधर्मा गौतमके पास आया और स्वागतपूर्वक उसका अभिनन्दन किया ॥ २ ९ ॥
तस्य पक्षाग्रविक्षेपैः क्लमं व्यपनयत् खगः ।
पूजां चाप्यकरोद् धीमान् भोजनं चाप्यकल्पयत् ॥ ३० ॥
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उस बुद्धिमान् पक्षीने अपने पंखोंके अग्रभागका संचालन करके उसे हवा की और उसकी सारी थकावट दूर कर दी; फिर उसका पूजन किया तथा उसके लिये भोजनकी व्यवस्था की ॥ ३० ॥
स भुक्तवान् सुविश्रान्तो गौतमोऽचिन्तयत् तदा ।
हाटकस्याभिरूपस्य भारोऽयं सुमहान् मया ॥ ३१ ॥
गृहीतो लोभमोहाभ्यां दूरं च गमनं मम ।
न चास्ति पथि भोक्तव्यं प्राणसंधारणं मम ॥ ३२ ॥
भोजन करके विश्राम कर लेनेपर गौतम इस प्रकार चिन्ता करने लगा — ' अहो! मैंने लोभ और मोहसे प्रेरित होकर सुन्दर सुवर्णका यह महान् भार ले लिया है । अभी मुझे बहुत दूर जाना है । रास्तेमें खानेके लिये कुछ भी नहीं है, जिससे मेरे प्राणोंकी रक्षा हो सके ॥
किं कृत्वा धारयेयं वै प्राणानित्यभ्यचिन्तयत् ।
ततः स पथि भोक्तव्यं प्रेक्षमाणो न किंचन ॥ ३३ ॥
कृतघ्नः पुरुषव्याघ्र मनसेदमचिन्तयत् ।
अयं बकपतिः पार्श्वे मांसराशिः स्थितो महान् ॥ ३४ ॥
इमं हत्वा गृहीत्वा च यास्येऽहं समभिद्रुतम् ॥ ३५ ॥
' अब मैं कौन- सा उपाय करके अपने प्राणोंको धारण कर सकूँगा? ' इस प्रकारकी चिन्तामें वह मग्न हो गया । पुरुषसिंह! तदनन्तर मार्गमें भोजनके लिये कुछ भी न देखकर उस कृतघ्नने मन- ही- मन इस प्रकार विचार किया — ' यह बगुलोंका राजा राजधर्मा मेरे पास ही तो है । यह मांसका एक बहुत बड़ा ढेर है। इसीको मारकर ले लूँ और शीघ्रतापूर्वक यहाँसे चल दूँ' ॥ ३३–३५ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७१ ॥
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द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः कृतघ्न गौतमद्वारा मित्र राजधर्माका वध तथा राक्षसोंद्वारा उसकी हत्या और कृतघ्नके मांसको अभक्ष्य बताना भीष्म उवाच
अथ तत्र महार्चिष्माननलो वातसारथिः ।
तस्याविदूरे रक्षार्थं खगेन्द्रेण कृतोऽभवत् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! पक्षिराज राजधर्माने अपने मित्र गौतमकी रक्षाके लिये उससे थोड़ी दूरपर आग प्रज्वलित कर दी थी, जिससे हवाका सहारा पाकर बड़ी -बड़ी लपटें उठ रही थीं ॥ १ ॥
स चापि पार्श्वे सुष्वाप विश्वस्तो बकराट् तदा ।
कृतघ्नस्तु स दुष्टात्मा तं जिघांसुरथाग्रतः ॥ २ ॥
ततोऽलातेन दीप्तेन विश्वस्तं निजघान तम् ।
निहत्य च मुदा युक्तः सोऽनुबन्धं न दृष्टवान् ॥ ३ ॥
बकराजको भी मित्रपर विश्वास था; इसलिये उस समय उसके पास ही सो गया । इधर वह दुष्टात्मा कृतघ्न उसका वध करनेकी इच्छासे उठा और विश्वासपूर्वक सोये हुए राजधर्माको सामनेसे जलती हुई लकड़ी लेकर उसके द्वारा मार डाला । उसे मारकर वह बहुत प्रसन्न हुआ, मित्रके वधसे जो पाप लगता है, उसकी ओर उसकी दृष्टि नहीं गयी ॥ २-३ ॥
स तं विपक्षरोमाणं कृत्वाग्नावपचत् तदा ।
गृहीत्वा सुवर्णं च ययौ द्रुततरं द्विजः ॥ ४ ॥
उसने मरे हुए पक्षीके पंख और बाल नोचकर उसे आगमें पकाया और उसे साथमें ले सुवर्णका बोझ सिरपर उठाकर वह ब्राह्मण बड़ी तेजीके साथ वहाँसे चल दिया ॥ ४ ॥
( ततो दाक्षायणीपुत्रं नागतं तं तु भारत । विरूपाक्षश्चिन्तयन् वै हृदयेन विदूयता ॥ ) भारत! उस दिन दक्षकन्याका पुत्र राजधर्मा अपने मित्र विरूपाक्षके यहाँ न जा सका; इससे विरूपाक्ष व्याकुल हृदयसे उसके लिये चिन्ता करने लगा ॥
ततोऽन्यस्मिन् गते चाह्नि विरूपाक्षोऽब्रवीत् सुतम् ।
न प्रेक्षे राजधर्माणमद्य पुत्र खगोत्तमम् ॥ ५ ॥
तदनन्तर दूसरा दिन भी व्यतीत हो जानेपर विरूपाक्षने अपने पुत्रसे कहा — ' बेटा! मैं आज पक्षियोंमें श्रेष्ठ राजधर्माको नहीं देख रहा हूँ ॥ ५ ॥
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स पूर्वसंध्यां ब्रह्माणं वन्दितुं याति सर्वदा ।
मां वा दृष्ट्वा कदाचित् स न गच्छति गृहं खगः ॥ ६ ॥
‘ वे पक्षिप्रवर प्रतिदिन प्रातः काल ब्रह्माजीकी वन्दना करनेके लिये जाया करते थे और वहाँसे लौटनेपर मुझसे मिले बिना कभी अपने घर नहीं जाते थे ॥ ६ ॥
उभे द्विरात्रिसंध्ये वै नाभ्यगात् स ममालयम् ।
तस्मान्न शुद्धयते भावो मम स ज्ञायतां सुहृत् ॥ ७ ॥
‘ आज दो संध्याएँ व्यतीत हो गयीं; किंतु वह मेरे घरपर नहीं पधारे, अतः मेरे मनमें
संदेह पैदा हो गया है । तुम मेरे मित्रका पता लगाओ ॥ ७ ॥
स्वाध्यायेन वियुक्तो हि ब्रह्मवर्चसवर्जितः ।
तद्व्रतस्तत्र मे शंका हन्यात् तं स द्विजाधमः ॥ ८ ॥
‘ वह अधम ब्राह्मण गौतम स्वाध्यायरहित और ब्रह्मतेजसे शून्य था तथा हिंसक जान
पड़ता था । उसीपर मेरा संदेह है । कहीं वह मेरे मित्रको मार न डाले ॥ ८ ॥
दुराचारस्तु दुर्बुद्धिरिङ्गितैर्लक्षितो मया ।
निष्कृपो दारुणाकारो दुष्टो दस्युरिवाधमः ॥ ९ ॥
‘ उसकी चेष्टाओंसे मैंने लक्षित किया तो वह मुझे दुर्बुद्धि एवं दुराचारी तथा दयाहीन प्रतीत होता था । वह आकारसे ही बड़ा भयानक और दुष्ट दस्युके समान अधम जान पड़ता था ॥ ९ ॥
गौतमः स गतस्तत्र तेनोद्विग्नं मनो मम ।
पुत्र शीघ्रमितो गत्वा राजधर्मनिवेशनम् ॥ १० ॥
ज्ञायतां स विशुद्धात्मा यदि जीवति मा चिरम् । ' नीच गौतम यहाँसे लौटकर फिर उन्हींके निवास स्थानपर गया था; इसलिये मेरे मनमें उद्वेग हो रहा है । बेटा! तुम शीघ्र यहाँसे राजधर्माके घरपर जाओ और पता लगाओ कि वे
शुद्धात्मा पक्षिराज जीवित हैं या नहीं । इस कार्यमें विलम्ब न करो ' ॥ १०३ ॥
स एवमुक्तस्त्वरितो रक्षोभिः सहितो ययौ ॥ ११ ॥
न्यग्रोधं तत्र चापश्यत् कङ्कालं राजधर्मणः । पिताकी ऐसी आज्ञा पाकर वह तुरंत ही राक्षसोंके साथ उस वटवृक्षके पास गया । वहाँ उसे राजधर्माका कंकाल अर्थात् उसके पंख, हड्डियों और पैरोंका समूह दिखायी दिया ॥ ११३ ॥
स रुदन्नगमत् पुत्रो राक्षसेन्द्रस्य धीमतः ॥ १२ ॥
त्वरमाणः परं शक्त्या गौतमग्रहणाय वै । बुद्धिमान् राक्षसराजका पुत्र राजधर्माकी यह दशा देखकर रो पड़ा और उसने पूरी शक्ति लगाकर गौतमको शीघ्र पकड़नेकी चेष्टा की ॥ १२३ ॥
ततोऽविदूरे जगृहुर्गौतमं राक्षसास्तदा ॥ १३ ॥
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राजधर्मशरीरं च पक्षास्थिचरणोज्झितम् । तदनन्तर कुछ ही दूर जानेपर राक्षसोंने गौतमको पकड़ लिया। साथ ही उन्हें पंख, पैर और हड्डियोंसे रहित राजधर्माकी लाश भी मिल गयी ॥ १३३ ॥
तमादायाथ रक्षांसि द्रुतं मेरुव्रजं ययुः ॥ १४ ॥
राज्ञश्च दर्शयामासुः शरीरं राजधर्मणः ।
कृतघ्नं परुषं तं च गौतमं पापकारिणम् ॥ १५ ॥
गौतमको लेकर वे राक्षस शीघ्र ही मेरुव्रजमें गये । वहाँ उन्होंने राजाको राजधर्माका मृत शरीर दिखाया और पापाचारी कृतघ्न गौतमको भी सामने खड़ा कर दिया ॥
रुरोद राजा तं दृष्ट्वा सामात्यः सपुरोहितः ।
आर्तनादश्च सुमहानभूत् तस्य निवेशने ॥ १६ ॥
सस्त्रीकुमारं च पुरं बभूवास्वस्थमानसम् । अपने मित्रको इस दशामें देखकर मन्त्री और पुरोहितोंके साथ राजा विरूपाक्ष फूट-फूटकर रोने लगे । उनके महलमें महान् आर्तनाद गूँजने लगा । स्त्री और बच्चोंसहित सारे
नगरमें शोक छा गया । किसीका भी मन स्वस्थ न रहा ॥
अथाब्रवीन्नृपः पुत्रं पापोऽयं वध्यतामिति ॥ १७ ॥
अस्य मांसैरिमे सर्वे विहरन्तु यथेष्टतः । तब राजाने अपने पुत्रको आज्ञा दी - ' बेटा! इस पापीको मार डालो । ये समस्त राक्षस इसके मांसका यथेष्ट उपयोग करें ॥ १७३ ॥
पापाचारः पापकर्मा पापात्मा पापसाधनः ॥ १८ ॥
हन्तव्योऽयं मम मतिर्भवद्भिरिति राक्षसाः । ‘ राक्षसो! यह पापाचारी, पापकर्मा और पापात्मा है । इसके सारे साधन पापमय हैं; अतः तुम्हें इसका वध कर देना चाहिये, यही मेरा मत है ' ॥ १८३ ॥
इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसा घोरविक्रमाः ॥ १ ९ ॥ नैच्छन्त तं भक्षयितुं पापकर्माणमित्युत । राक्षसराजके इस प्रकार आदेश देनेपर भी भयानक पराक्रमी राक्षसोंने गौतमको खानेकी इच्छा नहीं की; क्योंकि वह घोर पापाचारी था ॥ १ ९ ३ ॥ दस्यूनां दीयतामेष साध्वद्य पुरुषाधमः ॥ २० ॥
इत्यूचुस्ते महाराज राक्षसेन्द्रं निशाचराः ।
शिरोभिः प्रणताः सर्वे व्याहरन् राक्षसाधिपम् ॥ २१ ॥
न दातुमर्हसि त्वं नो भक्षणायास्य किल्विषम् ।