05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1141–1150

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1141–1150

पृष्ठ 1141

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कोई दुर्बल हो या बलवान्, शूरवीर हो या डरपोक तथा मूर्ख हो या विद्वान्, मृत्यु उसकी समस्त कामनाओंके पूर्ण होनेसे पहले ही उसे उठा ले जाती है ॥ २२ ॥

मृत्युर्जरा च व्याधिश्च दुःखं चानेककारणम् ।

अनुषक्तं यदा देहे किं स्वस्थ इव तिष्ठसि ॥ २३ ॥

पिताजी! जब इस शरीरमें मृत्यु, जरा, व्याधि और अनेक कारणोंसे होनेवाले दुःखोंका आक्रमण होता ही रहता है, तब आप स्वस्थ - से होकर क्यों बैठे हैं? ॥ २३ ॥

जातमेवान्तकोऽन्ताय जरा चान्वेति देहिनम् ।

अनुषक्ता द्वयेनैते भावाः स्थावरजङ्गमाः ॥ २४ ॥

देहधारी जीवके जन्म लेते ही अन्त करनेके लिये मौत और बुढ़ापा उसके पीछे लग जाते हैं । ये समस्त चराचर प्राणी इन दोनोंसे बँधे हुए हैं ॥ २४ ॥

मृत्योर्वा मुखमेतद् वै या ग्रामे वसतो रतिः ।

देवानामेष वै गोष्ठो यदरण्यमिति श्रुतिः ॥ २५ ॥

ग्राम या नगरमें रहकर जो स्त्री- पुत्र आदिमें आसक्ति बढ़ायी जाती है, यह मृत्युका मुख ही है और जो वनका आश्रय लेता है, यह इन्द्रियरूपी गौओंको बाँधनेके लिये गोशालाके समान है, यह श्रुतिका कथन है ॥

निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः ।

छित्त्वैतां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृतः ॥ २६ ॥

ग्राममें रहनेपर वहाँके स्त्री- पुत्र आदि विषयोंमें जो आसक्ति होती है, यह जीवको बाँधनेवाली रस्सीके समान है । पुण्यात्मा पुरुष ही इसे काटकर निकल पाते हैं । पापी पुरुष इसे नहीं काट पाते हैं ॥ २६ ॥

न हिंसयति यो जन्तून् मनोवाक्कायहेतुभिः ।

जीवितार्थापनयनैः प्राणिभिर्न स हिंस्यते ॥ २७ ॥

जो मनुष्य मन, वाणी और शरीररूपी साधनोंद्वारा प्राणियोंकी हिंसा नहीं करता, उसकी भी जीवन और अर्थका नाश करनेवाले हिंसक प्राणी हिंसा नहीं करते हैं ॥ २७ ॥

न मृत्युसेनामायान्तीं जातु कश्चित् प्रबाधते ।

ऋते सत्यमसत् त्याज्यं सत्ये ह्यमृतमाश्रितम् ॥ २८ ॥

सत्यके बिना कोई भी मनुष्य सामने आते हुए मृत्युकी सेनाका कभी सामना नहीं कर सकता; इसलिये असत्यको त्याग देना चाहिये । क्योंकि अमृतत्व सत्यमें ही स्थित है ॥ २८ ॥

तस्मात् सत्यव्रताचारः सत्ययोगपरायणः ।

सत्यागमः सदा दान्तः सत्येनैवान्तकं जयेत् ॥ २ ९ ॥

अतः मनुष्यको सत्यव्रतका आचरण करना चाहिये । सत्ययोगमें तत्पर रहना और शास्त्रकी बातोंको सत्य मानकर श्रद्धापूर्वक सदा मन और इन्द्रियोंका संयम करना चाहिये ।

पृष्ठ 1142

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इस प्रकार सत्यके द्वारा ही मनुष्य मृत्युपर विजय पा सकता है ॥ २ ९ ॥

अमृतं चैव मृत्युश्च द्वयं देहे प्रतिष्ठितम् ।

मृत्युमापद्यते मोहात् सत्येनापद्यतेऽमृतम् ॥ ३० ॥

अमृत और मृत्यु दोनों इस शरीरमें ही स्थित हैं । मनुष्य मोहसे मृत्युको और सत्यसे अमृतको प्राप्त होता है ॥ ३० ॥

सोऽहं ह्यहिंस्रः सत्यार्थी कामक्रोधबहिष्कृतः ।

समदुःखसुखः क्षेमी मृत्युं हास्याम्यमर्त्यवत् ॥ ३१ ॥

अतः अब मैं हिंसासे दूर रहकर सत्यकी खोज करूँगा, काम और क्रोधको हृदयसे निकालकर दुःख और सुखमें समान भाव रखूँगा तथा सबके लिये कल्याणकारी बनकर देवताओंके समान मृत्युके भयसे मुक्त हो जाऊँगा ॥ ३१ ॥

शान्तियज्ञरतो दान्तो ब्रह्मयज्ञे स्थितो मुनिः ।

वाङ्मनःकर्मयज्ञश्च भविष्याम्युदगायने ॥ ३२ ॥

मैं निवृत्तिपरायण होकर शान्तिमय यज्ञमें तत्पर रहूँगा, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर ब्रह्मयज्ञ ( वेद - शास्त्रोंके स्वाध्याय) -में लग जाऊँगा और मुनिवृत्तिसे रहूँगा । उत्तरायणके मार्गसे जानेके लिये मैं जप और स्वाध्यायरूप वाग्यज्ञ, ध्यानरूप मनोयज्ञ और अग्निहोत्र एवं गुरुशुश्रूषादिरूप कर्मयज्ञका अनुष्ठान करूँगा ॥ ३२ ॥

पशुयज्ञैः कथं हिंस्रैर्मादृशो यष्टुमर्हति ।

अन्तवद्भिरिव प्राज्ञः क्षेत्रयज्ञैः पिशाचवत् ॥ ३३ ॥

मेरे - जैसा विद्वान् पुरुष नश्वर फल देनेवाले हिंसायुक्त पशुयज्ञ और पिशाचोंके समान अपने शरीरके ही रक्त - मांसद्वारा किये जानेवाले तामस यज्ञोंका अनुष्ठान कैसे कर सकता है? ॥ ३३ ॥

यस्य वाङ्मनसी स्यातां सम्यक् प्रणिहिते सदा ।

तपस्त्यागश्च सत्यं च स वै सर्वमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥

जिसकी वाणी और मन दोनों सदा भलीभाँति एकाग्र रहते हैं तथा जो त्याग, तपस्या और सत्यसे सम्पन्न होता है, वह निश्चय ही सब कुछ प्राप्त कर सकता है ॥ ३४ ॥

नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः ।

नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥ ३५ ॥

संसारमें विद्या ( ज्ञान ) - के समान कोई नेत्र नहीं है, सत्यके समान कोई तप नहीं है, आसक्ति एवं क्रोधके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागके समान कोई सुख नहीं ॥ ३५ ॥

आत्मन्येवात्मना जात आत्मनिष्ठोऽप्रजोऽपि वा ।

आत्मन्येव भविष्यामि न मां तारयति प्रजा ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 1143

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मैं संतानरहित होनेपर भी परमात्मामें ही परमात्मा द्वारा उत्पन्न हुआ हूँ, परमात्मामें ही

स्थित हूँ । आगे भी आत्मामें ही लीन होऊँगा । संतान मुझे पार नहीं उतारेगी ॥ ३६ ॥

नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं यथैकता समता सत्यता च । शीलं स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः ॥ ३७ ॥

परमात्माके साथ एकता तथा समता, सत्यभाषण, सदाचार, ब्रह्मनिष्ठा, दण्डका परित्याग ( अहिंसा ), सरलता तथा सब प्रकारके सकाम कर्मोंसे उपरति -इनके समान ब्राह्मणके लिये दूसरा कोई धन नहीं है ॥ किं ते धनैर्बान्धवैर्वापि किं ते किं ते दारैर्ब्राह्मण यो मरिष्यसि । आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं पितामहास्ते क्व गताः पिता च ॥ ३८ ॥

ब्राह्मणदेव पिताजी! जब आप एक दिन मर ही जायँगे तो आपको इस धनसे क्या लेना है अथवा भाई- बन्धुओंसे आपका क्या काम है तथा स्त्री आदिसे आपका कौन - सा प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है? आप अपने हृदयरूपी गुफामें स्थित हुए परमात्माको खोजिये । सोचिये तो सही, आपके पिता और पितामह कहाँ चले गये? ॥ ३८ ॥

भीष्म उवाच

पुत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा यथाकार्षीत् पिता नृप ।

तथा त्वमपि वर्तस्व सत्यधर्मपरायणः ॥ ३ ९ ॥

भीष्मजी कहते हैं— नरेश्वर! पुत्रका यह वचन सुनकर पिताने जैसे सत्य - धर्मका अनुष्ठान किया था, उसी प्रकार तुम भी सत्य- धर्ममें तत्पर रहकर यथायोग्य बर्ताव करो ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पितापुत्रसंवादकथने पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पिता और पुत्रके संवादका कथनविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७५ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं ) Fara

पृष्ठ 1144

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षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः त्यागकी महिमाके विषयमें शम्पाक ब्राह्मणका उपदेश युधिष्ठिरउवाच

धनिनश्चाधना ये च वर्तयन्ते स्वतन्त्रिणः ।

सुखदुःखागमस्तेषां कः कथं वा पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! धनी और निर्धन दोनों स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार करते हैं; फिर उन्हें किस रूपमें और कैसे सुख और दुःखकी प्राप्ति होती है? ॥ भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

शम्पाकेनेह मुक्तेन गीतं शान्तिगतेन च ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इस पुरातन इतिहासका उदाहरण देते हैं, जिसे परम शान्त जीवन्मुक्त शम्पाकने यहाँ कहा था ॥ २ ॥

अब्रवीन्मां पुरा कश्चिद्ब्राह्मणस्त्यागमाश्रितः ।

क्लिश्यमानः कुदारेण कुचैलेन बुभुक्षया ॥ ३ ॥

पहलेकी बात है, फटे - पुराने वस्त्रों एवं अपनी दुष्टा स्त्रीके और भूखके कारण अत्यन्त कष्ट पानेवाले एक त्यागी ब्राह्मणने जिसका नाम शम्पाक था, मुझसे इस प्रकार कहा ॥ ३ ॥

उत्पन्नमिह लोके वै जन्मप्रभृति मानवम् ।

विविधान्युपवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥ ४ ॥

‘ इस संसारमें जो भी मनुष्य उत्पन्न होता है ( वह धनी हो या निर्धन ) उसे जन्मसे ही नाना प्रकारके सुख-दुःख प्राप्त होने लगते हैं ॥ ४ ॥

तयोरेकतरे मार्गे यदेनमभिसन्नयेत् ।

न सुखं प्राप्य संहृष्येन्नासुखं प्राप्य संज्वरेत् ॥ ५ ॥

‘ विधाता यदि उसे सुख और दुःख इन दोनोंमेंसे किसी एकके मार्गपर ले जाय तो वह न तो सुख पाकर प्रसन्न हो और न दुःखमें पड़कर परितप्त हो ॥ ५ ॥

न वै चरसि यच्छ्रेय आत्मनो वा यदीशिषे ।

अकामात्मापि हि सदा धुरमुद्यम्य चैव ह ॥ ६ ॥

' तुम जो कामनारहित होकर भी अपने कल्याणका साधन नहीं कर रहे हो और मनको वशमें नहीं कर रहे हो, इसका कारण यही है कि तुमने राज्यका बोझा अपनेपर उठा रखा है ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1145

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अकिंचनः परिपतन् सुखमास्वादयिष्यसि ।

अकिंचनः सुखं शेते समुत्तिष्ठति चैव ह ॥ ७ ॥

‘यदि तुम सब कुछ त्यागकर किसी वस्तुका संग्रह नहीं रखोगे तो सर्वत्र विचरते हुए सुखका ही अनुभव करोगे; क्योंकि जो अकिंचन होता है - जिसके पास कुछ नहीं रहता है, वह सुखसे सोता और जागता है ॥ ७ ॥

आकिंचन्यं सुखं लोके पथ्यं शिवमनामयम् ।

अनमित्रपथो ह्येष दुर्लभः सुलभो मतः ॥ ८ ॥

‘ संसारमें अकिंचनता ही सुख है । वही हितकारक, कल्याणकारी और निरापद है । इस मार्गमें किसी प्रकारके शत्रुका भी खटका नहीं है । यह दुर्लभ होनेपर भी सुलभ है ॥ ८ ॥

अकिंचनस्य शुद्धस्य उपपन्नस्य सर्वतः ।

अवेक्षमाणस्त्रील्लोँकान् न तुल्यमिह लक्षये ॥ ९ ॥

' मैं तीनों लोकोंपर दृष्टि डालकर देखता हूँ तो मुझे अकिंचन, शुद्ध एवं सब ओरसे वैराग्यसम्पन्न पुरुषके समान दूसरा कोई नहीं दिखायी देता है ॥ ९ ॥

आकिंचन्यं च राज्यं च तुलया समतोलयम् ।

अत्यरिच्यत दारिद्रयं राज्यादपि गुणाधिकम् ॥ १० ॥

‘ मैंने अकिंचनता तथा राज्यको बुद्धिकी तराजूपर रखकर तौला तो गुणोंमें अधिक होनेके कारण राज्यसे भी अकिंचनताका ही पलड़ा भारी निकला ॥ १० ॥

आकिंचन्ये च राज्ये च विशेषः सुमहानयम् ।

नित्योद्विग्नो हि धनवान् मृत्योरास्यगतो यथा ॥ ११ ॥

‘ अकिंचनता तथा राज्यमें बड़ा भारी अन्तर यह है कि धनी राजा सदा इस प्रकार उद्विग्न रहता है, मानो मौतके मुखमें पड़ा हुआ हो ॥ ११ ॥

नैवास्याग्निर्न चारिष्टो न मृत्युर्न च दस्यवः ।

प्रभवन्ति धनत्यागाद् विमुक्तस्य निराशिषः ॥ १२ ॥

' परंतु जो मनुष्य धनको त्यागकर उसकी आसक्तिसे मुक्त हो गया है और मनमें किसी तरहकी कामना नहीं रखता, उसपर न अग्निका जोर चलता है, न अरिष्टकारी ग्रहोंका, न मृत्यु उसका कुछ बिगाड़ सकती है, न डाकू और लुटेरे ही ॥ १२ ॥

तं वै सदा कामचरमनुपस्तीर्णशायिनम् ।

बाहूपधानं शाम्यन्तं प्रशंसन्ति दिवौकसः ॥ १३ ॥

‘वह सदा दैव- इच्छाके अनुसार विचरता है । बिना बिछौनेके भूतलपर सोता है । बाँहोंकी ही तकिया लगाता है और सदा शान्तभावसे रहता है । देवतालोग भी उसकी भूरि- भूरि प्रशंसा करते हैं ॥ १३ ॥

धनवान् क्रोधलोभाभ्यामाविष्टो नष्टचेतनः ।

तिर्यगीक्षः शुष्कमुखः पापको भ्रुकुटीमुखः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1146

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'जो धनवान् है, वह क्रोध और लोभके आवेशमें आकर अपनी विचारशक्तिको खो बैठता है, टेढ़ी आँखोंसे देखता है, उसका मुँह सूखा रहता है, भौंहें चढ़ी होती हैं और वह पापमें ही मग्न रहा करता है ॥ १४ ॥

निर्दशन्नधरोष्ठं च क्रुद्धो दारुणभाषिता ।

कस्तमिच्छेत् परिद्रष्टुं दातुमिच्छति चेन्महीम् ॥ १५ ॥

'क्रोधके कारण वह ओठ चबाता रहता है और अत्यन्त कठोर वचन बोलता है । ऐसा मनुष्य सारी पृथ्वीका राज्य ही दे देना चाहता हो, तो भी उसकी ओर कौन देखना चाहेगा? ॥ १५ ॥

श्रिया ह्यभीक्ष्णं संवासो मोहयत्यविचक्षणम् ।

सा तस्य चित्तं हरति शारदाभ्रमिवानिलः ॥ १६ ॥

‘ सदा धन- सम्पत्तिका सहवास मूर्ख मनुष्यके चित्तको लुभाकर उसे मोहमें ही डाले रहता है । जैसे वायु शरद् ऋतुके बादलोंको उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार वह सम्पत्ति मनुष्यके मनको हर लेती है ॥ १६ ॥

अथैनं रूपमानश्च धनमानश्च विन्दति ।

अभिजातोऽस्मि सिद्धोऽस्मि नास्मि केवलमानुषः ॥ १७ ॥

‘ फिर उसके ऊपर रूपका अहंकार और धनका मद सवार हो जाता है और वह ऐसा मानने लगता है कि मैं बड़ा कुलीन हूँ, सिद्ध हूँ, कोई साधारण मनुष्य नहीं हूँ ॥ १७ ॥

इत्येभिः कारणैस्तस्य त्रिभिश्चित्तं प्रमाद्यति ।

सम्प्रसक्तमना भोगान् विसृज्य पितृसंचितान् ।

परिक्षीणः परस्वानामादानं साधु मन्यते ॥ १८ ॥

' रूप, धन और कुल— इन तीनोंके अभिमानके कारण उसके चित्तमें प्रमाद भर जाता है । वह भोगोंमें आसक्त होकर बाप- दादोंके जोड़े हुए पैसोंको खो बैठता है; और दरिद्र होकर दूसरोंके धनको हड़प लाना अच्छा मानने लगता है ॥ १८ ॥

तमतिक्रान्तमर्यादमाददानं ततस्ततः ।

प्रतिषेधन्ति राजानो लुब्धा मृगमिवेषुभिः ॥ १ ९ ॥

‘ इस तरह मर्यादाका उल्लंघन करके जब वह इधर- उधरसे लूट-खसोटकर धन ले आता है, तब राजा उसे उसी प्रकार कठोर दण्ड देकर रोकते हैं । जैसे व्याध बाणोंसे मारकर मृगोंकी गति रोक देते हैं ॥ १ ९ ॥

एवमेतानि दुःखानि तानि तानीह मानवम् ।

विविधान्युपपद्यन्ते गात्रसंस्पर्शजान्यपि ॥ २० ॥

'इस प्रकार मनको तप्त करनेवाले और शरीरके स्पर्शसे होनेवाले ये नाना प्रकारके दुःख मनुष्यको प्राप्त होते हैं ॥ २० ॥

तेषां परमदुःखानां बुद्धया भैषज्यमाचरेत् ।

पृष्ठ 1147

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लोकधर्ममवज्ञाय ध्रुवाणामध्रुवैः सह ॥ २१ ॥

‘ अतः अनित्य शरीरोंके साथ सदैव लगे रहनेवाले पुत्रैषणा आदि लोकधर्मोंकी अवहेलना करके अवश्य प्राप्त होनेवाले पूर्वोक्त महान् दुःखोंकी विचारपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिये ॥ २१ ॥

नात्यक्त्वा सुखमाप्नोति नात्यक्त्वा विन्दते परम् ।

नात्यक्त्वा चाभयः शेते त्यक्त्वा सर्वं सुखी भव ॥ २२ ॥

‘ कोई मनुष्य त्याग किये बिना सुख नहीं पाता, त्याग किये बिना परमात्माको नहीं पा सकता और त्याग किये बिना निर्भय सो नहीं सकता । इसलिये तुम भी सब कुछ त्यागकर सुखी हो जाओ ' ॥ २२ ॥

इत्येतद्धास्तिनपुरे ब्राह्मणेनोपवर्णितम् ।

शम्पाकेन पुरा मह्यं तस्मात् त्यागः परो मतः ॥ २३ ॥

इस प्रकार पूर्वकालमें शम्पाक नामक ब्राह्मणने हस्तिनापुरमें मुझसे त्यागकी महिमाका वर्णन किया था । अतः त्याग ही सबसे श्रेष्ठ माना गया है ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शम्पाकगीतायां षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७६ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शम्पाकगीताविषयक एक सौ छिहत्तरवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १७६ ॥

पृष्ठ 1148

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सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः मङ्किगीता - धनकी तृष्णासे दुःख और उसकी कामनाके त्यागसे परम सुखकी प्राप्ति युधिष्ठिर उवाच

ईहमानः समारम्भान् यदि नासादयेद् धनम् ।

धनतृष्णाभिभूतश्च किं कुर्वन् सुखमाप्नुयात् ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- दादाजी! यदि कोई मनुष्य धनकी तृष्णासे ग्रस्त होकर तरह - तरहके उद्योग करनेपर भी धन न पा सके तो वह क्या करे, जिससे उसे सुखकी प्राप्ति हो सके? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

सर्वसाम्यमनायासं सत्यवाक्यं च भारत ।

निर्वेदश्चाविधित्सा च यस्य स्यात् स सुखी नरः ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- भारत! सबमें समताका भाव, व्यर्थ परिश्रमका अभाव, सत्यभाषण, संसारसे वैराग्य और कर्मासक्तिका अभाव- ये पाँचों जिस मनुष्यमें होते हैं, वह सुखी होता है ॥ २ ॥

एतान्येव पदान्याहुः पञ्च वृद्धाः प्रशान्तये ।

एष स्वर्गश्च धर्मश्च सुखं चानुत्तमं मतम् ॥३ ॥

ज्ञानवृद्ध पुरुष इन्हीं पाँच वस्तुओंको शान्तिका कारण बताते हैं । यही स्वर्ग है, यही धर्म है और यही परम उत्तम सुख माना गया है ॥ ३ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

निर्वेदान्मङ्किना गीतं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार पुरुष एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं । मङ्कि नामक मुनिने भोगोंसे विरक्त होकर जो उद्गार प्रकट किया था, वही इस

इतिहासमें वर्णित है । उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥

ईहमानो धनं मङ्किर्भग्नेहश्च पुनः पुनः ।

केनचिद् धनशेषेण क्रीतवान् दम्यगोयुगम् ॥ ५ ॥

मङ्कि धनके लिये अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करते थे; परंतु हर बार उनका प्रयत्न व्यर्थ हो जाता था । अन्तमें जब बहुत थोड़ा धन शेष रह गया तो उसे देकर उन्होंने दो नये बछड़े खरीदे ॥ ५ ॥

सुसम्बद्धौ तु तौ दम्यौ दमनायाभिनिःसृतौ ।

पृष्ठ 1149

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आसीनमुष्ट्रं मध्येन सहसैवाभ्यधावताम् ॥ ६ ॥

एक दिन उन दोनों बछड़ोंको परस्पर जोड़कर वे हल चलानेकी शिक्षा देनेके लिये ले जा रहे थे । जब वे दोनों बछड़े गाँवसे बाहर निकले तो बैठे हुए एक ऊँटको बीचमें करके सहसा दौड़ पड़े ॥ ६ ॥

तयोः सम्प्राप्तयोरुष्ट्रः स्कन्धदेशममर्षणः ।

उत्थायोत्क्षिप्य तौ दम्यौ प्रससार महाजवः ॥ ७ ॥

जब वे उसकी गर्दनके पास पहुँचे तो ऊँटके लिये यह असह्य हो उठा । वह रोषमें भरकर खड़ा हो गया और उन दोनों बछड़ोंको ऊपर लटकाये बड़े जोरसे भागने लगा ॥ ७ ॥

ह्रियमाणौ तु तौ दम्यौ तेनोष्ट्रेण प्रमाथिना ।

म्रियमाणौ च सम्प्रेक्ष्य मङ्किस्तत्राब्रवीदिदम् ॥ ८ ॥

बलपूर्वक अपहरण करनेवाले उस ऊँटके द्वारा उन दोनों बछड़ोंको अपहृत होते और मरते देख मङ्किने इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥

न चैवाविहितं शक्यं दक्षेणापीहितुं धनम् ।

युक्तेन श्रद्धया सम्यगीहां समनुतिष्ठता ॥ ९ ॥

' मनुष्य कैसा ही चतुर क्यों न हो, जो उसके भाग्यमें नहीं है, उस धनको वह श्रद्धापूर्वक भलीभाँति प्रयत्न करके भी नहीं पा सकता ॥ ९ ॥

कृतस्य पूर्वं चानर्थैर्युक्तस्याप्यनुतिष्ठतः ।

इमं पश्यत संगत्या मम दैवमुपप्लवम् ॥ १० ॥

' पहले मैंने जो प्रयत्न किया था उसमें अनेक प्रकारके अनर्थ खड़े हो गये थे । उन अनर्थोंसे युक्त होनेपर भी मैं धनोपार्जनकी ही चेष्टामें लगा रहा; परंतु देखो, आज इन बछड़ोंकी सङ्गतिसे मुझपर कैसा दैवी उपद्रव आ गया? ॥ १० ॥

उद्यम्योद्यम्य मे दम्यौ विषमेणैव गच्छतः ।

उत्क्षिप्य काकतालीयमुत्पथेनैव धावतः ॥ ११ ॥

मणी वोष्ट्रस्य लम्बेते प्रियौ वत्सतरौ मम ।

शुद्धं हि दैवमेवेदं हठेनैवास्ति पौरुषम् ॥ १२ ॥

'यह ऊँट मेरे बछड़ोंको उछाल-उछालकर विषम मार्गसे ही जा रहा है । काकतालीयन्यायसे * ( अर्थात् दैवसंयोगसे ) इन्हें गर्दनपर उठाकर बुरे मार्गसे ही दौड़ रहा है । इस ऊँटके गलेमें मेरे दोनों प्यारे बछड़े दो मणियोंके समान लटक रहे हैं । यह केवल दैवकी ही लीला है । हठपूर्वक किये हुए पुरुषार्थसे क्या होता है? ॥ ११-१२ ॥

यदि वाप्युपपद्येत पौरुषं नाम कर्हिचित् ।

अन्विष्यमाणं तदपि दैवमेवावतिष्ठते ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1150

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‘ यदि कभी कोई पुरुषार्थ सफल होता दिखायी देता है तो वहाँ भी खोज करनेपर दैवका ही सहयोग सिद्ध होता है ॥ १३ ॥

तस्मान्निर्वेद एवेह गन्तव्यः सुखमिच्छता ।

सुखं स्वपिति निर्विण्णो निराशश्चार्थसाधने ॥ १४ ॥

‘ अतः सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको धन आदिकी ओरसे वैराग्यका ही आश्रय लेना चाहिये । धनोपार्जनकी चेष्टासे निराश होकर जो विरक्त हो जाता है, वह सुखकी नींद सोता है ॥ १४ ॥

अहो सम्यक् शुकेनोक्तं सर्वतः परिमुच्यता ।

प्रतिष्ठता महारण्यं जनकस्य निवेशनात् ॥ १५ ॥

' अहा! शुकदेव मुनिने जनकके राजमहलसे विशाल वनकी ओर जाते समय सब ओरसे बन्धनमुक्त हो क्या ही अच्छा कहा था? ॥ १५ ॥

यः कामानाप्नुयात् सर्वान् यश्चैतान् केवलांस्त्यजेत् ।

प्रापणात् सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ॥ १६ ॥

“ जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओंको पा लेता है; तथा जो इन सबका केवल त्याग कर देता है — इन दोनोंके कार्योंमें समस्त कामनाओंको प्राप्त करनेकी अपेक्षा उनका त्याग ही श्रेष्ठ है ॥ १६ ॥

नान्तं सर्वविधित्सानां गतपूर्वोऽस्ति कश्चन ।

शरीरे जीविते चैव तृष्णा मन्दस्य वर्धते ॥ १७ ॥

' कोई भी पहले कभी धन आदिके लिये होनेवाली सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंका अन्त नहीं पा सका है । शरीर और जीवनके प्रति मूर्ख मनुष्यकी ही तृष्णा बढ़ती है ॥ १७ ॥

निवर्तस्व विधित्साभ्यः शाम्य निर्विद्य कामुक ।

असकृच्चासि निकृतो न च निर्विद्यसे ततः ॥ १८ ॥

‘ ओ कामनाओंके दास मन! तू सब प्रकारकी चेष्टाओंसे निवृत्त हो जा और वैराग्यपूर्वक शान्ति धारण कर । तू धनकी चेष्टा करके बारंबार ठगा गया है तो भी उसकी ओरसे वैराग्य नहीं होता है ॥ १८ ॥

यदि नाहं विनाश्यस्ते यद्येवं रमसे मया ।

मा मां योजय लोभेन वृथा त्वं वित्तकामुक ॥ १ ९ ॥

‘ ओ धनकी कामनावाले मन! यदि तुझे मेरा विनाश नहीं करना है, यदि तू इसी प्रकार मेरे साथ आनन्दपूर्वक रहना चाहता है तो मुझे व्यर्थ लोभमें न फँसा ॥ १ ९ ॥

संचितं संचितं द्रव्यं नष्टं तव पुनः पुनः ।

कदाचिन्मोक्ष्यसे मूढ धनेहां धनकामुक ॥ २० ॥

' तूने बार-बार द्रव्यका संचय किया और वह बारंबार नष्ट होता चला गया । धनकी इच्छा रखनेवाले मूढ! क्या कभी तू धनकी इस तृष्णा और चेष्टाका त्याग भी