श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1151–1160
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1151–1160
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करेगा? ॥ २० ॥
अहो नु मम बालिश्यं योऽहं क्रीडनकस्तव ।
किं नैवं जातु पुरुषः परेषां प्रेष्यतामियात् ॥ २१ ॥
‘ अहो! यह मेरी कैसी नादानी है? जो मैं तेरे हाथका खिलौना बना हुआ हूँ। यदि ऐसी बात न होती तो क्या कोई समझदार पुरुष कभी दूसरोंकी दासता स्वीकार कर सकता है? ॥ २१ ॥
न पूर्वे नापरे जातु कामानामन्तमाप्नुवन् ।
त्यक्त्वा सर्वसमारम्भान् प्रतिबुद्धोऽस्मि जागृमि ॥ २२ ॥
‘ पूर्वकालके तथा पीछेके मनुष्य भी कभी कामनाओंका अन्त नहीं पा सके हैं, अतः मैं समस्त कर्मोंका आयोजन त्यागकर सावधान हो गया हूँ और मैं पूर्णतः जग गया हूँ ॥ २२ ॥
नूनं ते हृदयं काम वज्रसारमयं दृढम् ।
यदनर्थशताविष्टं शतधा न विदीर्यते ॥ २३ ॥
‘ काम! निश्चय ही तेरा हृदय फौलादका बना हुआ हैः अतएव अत्यन्त सुदृढ़ है । यही कारण है कि सैकड़ों अनर्थोंसे व्याप्त होनेपर भी इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते ॥ २३ ॥
जानामि काम त्वां चैव यच्च किंचित् प्रियं तव ।
तवाहं प्रियमन्विच्छन्नात्मन्युपलभे सुखम् ॥ २४ ॥
' काम! मैं तुझे अच्छी तरह जानता हूँ और जो कुछ तुझे प्रिय लगता है, उससे भी परिचित हूँ । चिरकालसे तेरा प्रिय करनेकी चेष्टा करता चला आ रहा हूँ; परंतु कभी मेरे मनमें सुखका अनुभव नहीं हुआ ॥ २४ ॥
काम जानामि ते मूलं संकल्पात् किल जायसे ।
न त्वां संकल्पयिष्यामि समूलो न भविष्यसि ॥ २५ ॥
‘ काम! मैं तेरी जड़को जानता हूँ। निश्चय ही तू संकल्पसे उत्पन्न होता है । अब मैं तेरा संकल्प ही नहीं करूँगा, जिससे तू समूल नष्ट हो जायगा ॥ २५ ॥
ईहा धनस्य न सुखा लब्ध्वा चिन्ता च भूयसी ।
लब्धनाशे यथा मृत्युर्लब्धं भवति वा न वा ॥ २६ ॥
“ धनकी इच्छा अथवा चेष्टा सुखदायिनी नहीं है । यदि धन मिल भी जाय तो उसकी रक्षा आदिके लिये बड़ी भारी चिन्ता बढ़ जाती है और यदि एक बार मिलकर वह नष्ट हो जाय, तब तो मृत्युके समान ही भयंकर कष्ट होता है और उद्योग करनेपर भी धन मिलेगा या नहीं, यह निश्चय नहीं होता ॥ २६ ॥
परित्यागे न लभते ततो दुःखतरं नु किम् ।
न च तुष्यति लब्धेन भूय एव च मार्गति ॥ २७ ॥
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‘ शरीरको निछावर कर देनेपर भी मनुष्य जब धन नहीं पाता है तो उसके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या हो सकता है? यदि धनकी उपलब्धि हो भी जाय तो उतनेसे ही वह संतुष्ट नहीं होता है अपितु अधिक धनकी तलाश करने लग जाता है ॥ २७ ॥
अनुतर्षुल एकार्थः स्वादु गाङ्गमिवोदकम् ।
मद्विलापनमेतत्तु प्रतिबुद्धोऽस्मि संत्यज ॥ २८ ॥
‘ काम! स्वादिष्ट गङ्गाजलके समान यह धन तृष्णाकी ही वृद्धि करनेवाला है । मैं अच्छी तरह जान गया हूँ कि यह तृष्णाकी वृद्धि मेरे विनाशका कारण है; अतः तू मेरा पिण्ड छोड़ दे ॥ २८ ॥
य इमं मामकं देहं भूतग्रामः समाश्रितः ।
स यात्वितो यथाकामं वसतां वा यथासुखम् ॥ २ ९ ॥
‘ मेरे इस शरीरका आश्रय लेकर जो पाँचों भूतोंका समुदाय स्थित है, वह इसमेंसे अपनी इच्छाके अनुसार सुखपूर्वक चला जाय या इसमें रहे, इसकी मुझे परवा नहीं है ॥ २ ९ ॥
न युष्मास्विह मे प्रीतिः कामलोभानुसारिषु ।
तस्मादुत्सृज्य कामान् वै सत्त्वमेवाश्रयाम्यहम् ॥ ३० ॥
‘ पंचभूतगण! अहंकार आदिके साथ तुम सब लोग काम और लोभके पीछे लगे रहनेवाले हो । अतः तुमपर यहाँ मेरा रत्तीभर भी स्नेह नहीं है । इसलिये मैं समस्त कामनाओंको छोड़कर केवल अब सत्त्वगुणका आश्रय ले रहा हूँ ॥ ३० ॥
सर्वभूतान्यहं देहे पश्यन् मनसि चात्मनः ।
योगे बुद्धिं श्रुते सत्त्वं मनो ब्रह्मणि धारयन् ॥ ३१ ॥
विहरिष्याम्यनासक्तः सुखी लोकान् निरामयः ।
यया मां त्वं पुनर्नैवं दुःखेषु प्रणिधास्यसि ॥ ३२ ॥
' मैं अपने शरीरमें मनके अंदर सम्पूर्ण भूतोंको देखता हुआ बुद्धिको योगमें, एकाग्रचितको श्रवण- मनन आदि साधनोंमें और मनको परब्रह्म परमात्मामें लगाकर रोग-शोकसे रहित एवं सुखी हो सम्पूर्ण लोकोंमें अनासक्त भावसे विचरूँगा, जिससे तू फिर मुझे इस प्रकार दुःखोंमें न डाल सकेगा ॥ ३१-३२ ॥
त्वया हि मे प्रणुन्नस्य गतिरन्या न विद्यते ।
तृष्णाशोकश्रमाणां हि त्वं काम प्रभवः सदा ॥ ३३ ॥
' काम! तृष्णा, शोक और परिश्रम- इनका उत्पत्तिस्थान सदा तू ही है । जबतक तू मुझे प्रेरित करके इधर - उधर भटकता रहेगा तबतक मेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ॥ ३३ ॥
धननाशेऽधिकं दुःखं मन्ये सर्वमहत्तरम् ।
ज्ञातयो ह्यवमन्यन्ते मित्राणि च धनाच्च्युतम् ॥ ३४ ॥
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‘ मैं तो समझता हूँ कि धनका नाश होनेपर जो अत्यन्त दुःख होता है, वही सबसे बढ़कर है; क्योंकि जो धनसे वञ्चित हो जाता है, उसे अपने भाई-बन्धु और मित्र भी अपमानित करने लगते हैं ॥ ३४ ॥
अवज्ञानसहस्रैस्तु दोषाः कष्टतराऽधने ।
धने सुखकला या तु सापि दुःखैर्विधीयते ॥ ३५ ॥
'दरिद्रको सहस्र- सहस्र तिरस्कार सहने पड़ते हैं; अतः निर्धन अवस्थामें बहुत- से कष्टदायक दोष हैं; और धनमें जो सुखका लेश प्रतीत होता है, वह भी दुःखोंसे ही सम्पादित होता है ॥ ३५ ॥
धनमस्येति पुरुषं पुरो निघ्नन्ति दस्यवः ।
क्लिश्यन्ति विविधैर्दण्डैर्नित्यमुद्वेजयन्ति च ॥ ३६ ॥
‘ जिस पुरुषके पास धन होनेका संदेह होता है, उसे उसका धन लूटनेके लिये लुटेरे मार डालते हैं अथवा उसे तरह- तरहकी पीड़ाएँ देकर सताते और सदा उद्वेगमें डाले रहते हैं ॥ ३६ ॥
अर्थलोलुपता दुःखमिति बुद्धं चिरान्मया ।
यद् यदालम्बसे काम तत्तदेवानुरुध्यसे ॥ ३७ ॥
‘ धनलोलुपता दुःखका कारण है, यह बात बहुत देरके बाद मेरी समझमें आयी है ।
काम! तू जिस - जिसका आश्रय लेता है, उसी उसीके पीछे पड़ जाता है ॥ ३७ ॥
अतत्त्वज्ञोऽसि बालश्च दुस्तोषोऽपूरणोऽनलः ।
नैव त्वं वेत्थ सुलभं नैव त्वं वेत्थ दुर्लभम् ॥ ३८ ॥
‘ तू तत्त्वज्ञानसे रहित और बालकके समान मूढ है, तुझे संतोष देना कठिन है । आगके समान तेरा पेट भरना असम्भव है । तू यह नहीं जानता कि कौन- सी वस्तु सुलभ है और कौन- सी दुर्लभ ॥ ३८ ॥
पाताल इव दुष्पूरो मां दुःखैर्योक्तुमिच्छसि ।
नाहमद्य समावेष्टुं शक्यः काम पुनस्त्वया ॥ ३ ९ ॥
‘ काम! पातालके समान तुझे भरना कठिन है । तू मुझे दुःखोंमें फँसाना चाहता है; किंतु अब तू फिर मेरे भीतर प्रवेश नहीं कर सकता ॥ ३ ९ ॥
निर्वेदमहमासाद्य द्रव्यनाशाद् यदृच्छया ।
निर्वृत्तिं परमां प्राप्य नाद्य कामान् विचिन्तये ॥ ४० ॥
‘ अकस्मात् धनका नाश हो जानेसे वैराग्यको प्राप्त होकर मुझे परम सुख मिल गया है ।
अब मैं भोगोंका चिन्तन नहीं करूँगा ॥ ४० ॥
अतिक्लेशान् सहामीह नाहं बुद्धयाम्यबुद्धिमान् ।
निकृतो धननाशेन शये सर्वाङ्गविज्वरः ॥ ४१ ॥
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' पहले मैं बड़े -बड़े क्लेश सहता था, परंतु ऐसा बुद्धिहीन हो गया था कि ' धनकी कामनामें कष्ट है, ' इस बातको समझ ही नहीं पाता था । परंतु अब धनका नाश होनेसे उससे वंचित होकर मैं सम्पूर्ण अङ्गोंमें क्लेश और चिन्ताओंसे मुक्त होकर सुखसे सोता हूँ ॥ ४१ ॥
परित्यजामि काम त्वां हित्वा सर्वमनोगतीः ।
न त्वं मया पुनः काम वत्स्यसे न च रंस्यसे ॥ ४२ ॥
‘ काम! मैं अपनी सम्पूर्ण मनोवृत्तियोंको दूर हटाकर तेरा परित्याग कर रहा हूँ । अब तू फिर मेरे साथ न तो रह सकेगा और न मौज ही कर सकेगा ॥ ४२ ॥
क्षमिष्ये क्षिपमाणानां न हिंसिष्ये विहिंसितः ।
द्वेष्ययुक्तः प्रियं वक्ष्याम्यनादृत्य तदप्रियम् ॥ ४३ ॥
‘ अब जो लोग मुझपर आक्षेप या मेरा तिरस्कार करेंगे, उनके उस बर्तावको मैं चुपचाप सह लूँगा । जो लोग मुझे मारे- पीटेंगे या कष्ट देंगे, उनके साथ भी मैं बदलेमें वैसा बर्ताव नहीं करूँगा । द्वेषके योग्य पुरुषका भी यदि साथ हो जाय और वह मुझे अप्रिय वचन कहने लगे तो मैं उसपर ध्यान न देकर उससे अप्रिय वचन नहीं बोलूँगा ॥ ४३ ॥
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं यथालब्धेन वर्तयन् ।
नसकामं करिष्यामि त्वामहं शत्रुमात्मनः ॥ ४४ ॥
‘ मैं सदा संतुष्ट एवं स्वस्थ इन्द्रियोंसे सम्पन्न रहकर भाग्यवश जो कुछ मिल जाय, उसीसे जीवन - निर्वाह करता रहूँगा; परंतु तुझे कभी सफल न होने दूँगा; क्योंकि तू मेरा शत्रु ॥ ४४ ॥
निर्वेदं निर्वृतिं तृप्तिं शान्तिं सत्यं दमं क्षमाम् ।
सर्वभूतदयां चैव विद्धि मां समुपागतम् ॥ ४५ ॥
'तू यह अच्छी तरह समझ ले कि मुझे वैराग्य, सुख, तृप्ति, शान्ति, सत्य, दम, क्षमा और समस्त प्राणियोंके प्रति दयाभाव - ये सभी सद्गुण प्राप्त हो गये हैं ॥ ४५ ॥
तस्मात् कामश्च लोभश्च तृष्णा कार्पण्यमेव च ।
त्यजन्तु मां प्रतिष्ठन्तं सत्त्वस्थो ह्यस्मि साम्प्रतम् ॥ ४६ ॥
‘ अतः काम, लोभ, तृष्णा और कृपणताको चाहिये कि वे मोक्षकी ओर प्रस्थान करनेवाले मुझ साधकको छोड़कर चले जायँ । अब मैं सत्त्वगुणमें स्थित हो गया हूँ ॥ ४६ ॥
प्रहाय कामं लोभं च सुखं प्राप्तोऽस्मि साम्प्रतम् ।
नाद्य लोभवशं प्राप्तो दुःखं प्राप्स्याम्यनात्मवान् ॥ ४७ ॥
' इस समय काम और लोभका त्याग करके मैं प्रत्यक्ष ही सुखी हो गया हूँ; अतः अजितेन्द्रिय पुरुषकी भाँति अब लोभमें फँसकर दुःख नहीं उठाऊँगा ॥ ४७ ॥
यद् यत् त्यजति कामानां तत् सुखस्याभिपूर्यते ।
कामस्य वशगो नित्यं दुःखमेव प्रपद्यते ॥ ४८ ॥
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' मनुष्य जिस - जिस कामनाको छोड़ देता है, उस- उसकी ओरसे सुखी हो जाता है ।
कामनाके वशीभूत होकर तो वह सर्वदा दुःख ही पाता है ॥ ४८ ॥
कामानुबन्धं नुदते यत् किंचित् पुरुषो रजः ।
कामक्रोधोद्भवं दुःखमह्रीररतिरेव च ॥ ४ ९ ॥
‘ मनुष्य कामसे सम्बन्ध रखनेवाला जो कुछ भी रजोगुण हो, उसे दूर कर दे । दुःख, निर्लज्जता और असंतोष– ये काम और क्रोधसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं ॥ ४ ९ ॥
एष ब्रह्मप्रतिष्ठोऽहं ग्रीष्मे शीतमिव ह्रदम् ।
शाम्यामि परिनिर्वामि सुखं मामेति केवलम् ॥ ५० ॥
'जैसे ग्रीष्म ऋतुमें लोग शीतल जलवाले सरोवरमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार अब मैं परब्रह्ममें प्रतिष्ठित हो गया हूँ, अतः शान्त हूँ, सब ओरसे निर्वाणको प्राप्त हो गया हूँ । अब मुझे केवल सुख- ही- सुख मिल रहा है ॥ ५० ॥
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् ।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ ५१ ॥
‘ इस लोकमें जो विषयोंका सुख है तथा परलोकमें जो दिव्य एवं महान् सुख है, ये दोनों प्रकारके सुख तृष्णाके क्षयसे होनेवाले सुखकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं ॥ ५१ ॥
आत्मना सप्तमं कामं हत्वा शत्रुमिवोत्तमम् ।
प्राप्यावध्यं ब्रह्मपुरं राजेव स्यामहं सुखी ॥ ५२ ॥
- ' काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य और ममता – ये देहधारियोंके सात शत्रु हैं । इनमें सातवाँ कामरूप शत्रु सबसे प्रबल है । उन सबके साथ इस महान् शत्रु कामका नाश करके मैं अविनाशी ब्रह्मपुरमें स्थित हो राजाके समान सुखी होऊँगा ' ॥ ५२ ॥
एतां बुद्धिं समास्थाय मंङ्किर्निर्वेदमागतः ।
सर्वान् कामान् परित्यज्य प्राप्य ब्रह्म महत्सुखम् ॥ ५३ ॥
राजन्! इसी बुद्धिका आश्रय लेकर मङ्कि धन और भोगोंसे विरक्त हो गये और समस्त कामनाओंका परित्याग करके उन्होंने परमानन्दस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त कर लिया ॥ ५३ ॥
दम्यनाशकृते मङ्किरमृतत्वं किलागमत् ।
अच्छिनत् काममूलं स तेन प्राप महत्सुखम् ॥ ५४ ॥
बछड़ोंके नाशको निमित्त बनाकर ही मङ्कि अमृतत्वको प्राप्त हो गये । उन्होंने कामकी जड़ काट डाली; इसीलिये महान् सुख प्राप्त कर लिया ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मङ्किगीतायां सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७७ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मङ्किगीताविषयक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७७ ॥
*• एक ताड़के वृक्षके नीचे एक बटोही बैठा था । उसी वृक्षके ऊपर एक काक भी आ बैठा । काकके आते ही ताड़का एक पका हुआ फल नीचे गिरा । यद्यपि फल पककर आप से- आप ही गिरा था, पर पथिक दोनों बातोंको साथ होते देख, यही समझ गया कि कौवेके आनेसे ही ताड़का फल गिरा है; अतः जहाँ संयोगवश अचानक कोई घटना घटित हो जाय, वहाँ उसे काकतालीयन्यायसे घटित हुई बताया जाता है । यहाँ बछड़ोंका आना और ऊँटका रास्तेमें बैठे रहना - ये बातें संयोगवश हो गयी थीं ।
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अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः जनककी उक्ति तथा राजा नहुषके प्रश्नोंके उत्तरमें बोध्यगीता भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गीतं विदेहराजेन जनकेन प्रशाम्यता ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! इसी विषयमें शान्तभावको प्राप्त हुए विदेहराज जनकने जो उद्गार प्रकट किया था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १ ॥
अनन्तमिव मे वित्तं यस्य मे नास्ति किञ्चन ।
मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किञ्चन ॥ २ ॥
[जनक बोले— ] मेरे पास अनन्त सा धन- वैभव है; फिर भी मेरा कुछ नहीं है । इस मिथिलापुरीमें आग लग जाय तो भी मेरा कुछ नहीं जलता ॥ २ ॥
अत्रैवोदाहरन्तीमं बोध्यस्य पदसंचयम् ।
निर्वेदं प्रति विन्यस्तं तं निबोध युधिष्ठिर ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर! इसी प्रसंगमें वैराग्यको लक्ष्य करके बोध्य मुनिने जो वचन कहे हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
बोध्यं शान्तमृषिं राजा नाहुषः पर्यपृच्छत ।
निर्वेदाच्छान्तिमापन्नं शास्त्रप्रज्ञानतर्पितम् ॥ ४ ॥
कहते हैं, किसी समय नहुषनन्दन राजा ययातिने वैराग्यसे शान्तभावको प्राप्त हुए शास्त्रके उत्कृष्ट ज्ञानसे परितृप्त परम शान्त बोध्य ऋषिसे पूछा— ॥ ४ ॥
उपदेशं महाप्राज्ञ शमस्योपदिशस्व मे ।
कां बुद्धिं समनुध्याय शान्तश्चरसि निर्वृतः ॥ ५ ॥
‘ महाप्राज्ञ! आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे मुझे शान्ति मिले । कौन - सी ऐसी बुद्धि है, जिसका आश्रय लेकर आप शान्ति और संतोषके साथ विचरते हैं? ' ॥ ५ ॥
बोध्य उवाच
उपदेशेन वर्तामि नानुशास्मीह कंचन ।
लक्षणं तस्य बक्ष्येऽहं तत् स्वयं परिमृश्यताम् ॥ ६ ॥
बोध्यने कहा— राजन्! मैं किसीको उपदेश नहीं देता, बल्कि स्वयं दूसरोंसे प्राप्त हुए उपदेशके अनुसार आचरण करता हूँ। मैं अपनेको मिले हुए उपदेशका लक्षण बता रहा हूँ
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(जिनसे उपदेश मिला है, उन गुरुओंका संकेतमात्र कर रहा हूँ), उसपर तुम स्वयं विचार करो ॥ ६ ॥
पिङ्गला कुररः सर्पः सारङ्गान्वेषणं वने ।
इषुकारः कुमारी च षडेते गुरवो मम ॥ ७ ॥
पिंगला, कुरर पक्षी, सर्प, वनमें सारंगका अन्वेषण, बाण बनानेवाला और कुमारी कन्या – ये छः मेरे गुरु हैं ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
आशा बलवती राजन् नैराश्यं परमं सुखम् ।
आशां निराशां कृत्वा तु सुखं स्वपिति पिङ्गला ॥ ८ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! बोध्यको अपने गुरुओंसे जो उपदेश प्राप्त हुआ था, वह इस प्रकार समझना चाहिये - आशा बड़ी प्रबल है । वही सबको दुःख देती है । निराशा ही
परम सुख है । आशाको निराशाके रूपमें परिणत करके पिंगला वेश्या सुखसे सो गयी ।
( पिंगला आशाके त्यागका उपदेश देनेके कारण गुरु हुई) ॥ ८ ॥
सामिषं कुररं दृष्ट्वा वध्यमानं निरामिषैः ।
आमिषस्य परित्यागात् कुररः सुखमेधते ॥ ९ ॥
चोंचमें मांसका टुकड़ा लिये उड़ते हुए कुरर ( क्रौंच पक्षीको देखकर दूसरे पक्षी जो मांस नहीं लिये हुए थे, उसे मारने लगे । तब उसने उस मांसके टुकड़ेको त्याग दिया । अतः पक्षियोंने उसका पीछा करना छोड़ दिया । इस प्रकार आमिषके त्यागसे क्रौंचपक्षी सुखी हो गया । भोगोंके परित्यागका उपदेश देनेके कारण कुरर ( क्रौंच पक्षी गुरु हुआ ॥ ९ ॥
गृहारम्भो हि दुःखाय न सुखाय कदाचन ।
सर्पः परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते ॥ १० ॥
घर बनानेका खटपट करना दुःखका ही कारण है । उससे कभी सुख नहीं मिलता । देखो, साँप दूसरोंके बनाये हुए घर ( बिल) में प्रवेश करके सुखसे रहता है । ( अतः अनिकेत रहने — घर- द्वारके चक्करमें न पड़नेका उपदेश देनेके कारण सर्प गुरु हुआ ) ॥ १० ॥
सुखं जीवन्ति मुनयो भैक्ष्यवृत्तिं समाश्रिताः ।
अद्रोहेणैव भूतानां सारङ्गा इव पक्षिणः ॥ ११ ॥
जिस प्रकार पपीहा पक्षी किसी भी प्राणीसे वैर न करके याचनावृत्तिसे अपना निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार मुनिजन भिक्षावृत्तिका आश्रय लेकर सुखसे जीवन व्यतीत करते हैं ( अद्रोहका उपदेश देनेके कारण पपीहा गुरु हुआ) ॥ ११ ॥
इषुकारो नरः कश्चिदिषावासक्तमानसः ।
समीपेनापि गच्छन्तं राजानं नावबुद्धवान् ॥ १२ ॥
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एक बार एक बाण बनानेवालेको देखा गया, वह अपने काममें ऐसा दत्तचित्त था कि उसके पाससे निकली हुई राजाकी सवारीका भी उसे कुछ पता नहीं चला ( उसके द्वारा एकाग्रचिचत्तताका उपदेश प्राप्त हुआ; इसलिये वह गुरु हो गया) ॥ १२ ॥
बहूनां कलहो नित्य द्वयोः संकथनं ध्रुवम् ।
एकाकी विचरिष्यामि कुमारीशंखको यथा ॥ १३ ॥
बहुत मनुष्य एक साथ रहें तो उनमें प्रतिदिन कलह होता है और दो रहें तो भी उनमें बातचीत तो अवश्य ही होती है; अतः मैं कुमारी कन्याके हाथमें धारण की हुई शंखकी एक-एक चूड़ीके समान अकेला ही विचरूँगा* ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि बोध्यगीतायां अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें बोध्यगीताविषयक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥
एक गृहस्थके घरपर कुछ अतिथि आ गये । घरके सब लोग कहीं बाहर चले गये थे । भीतर केवल एक कुमारी कन्या थी, जिसपर उन अतिथियोंके भोजन आदिका भार आ पड़ा । वह उनके निमित्त रसोई बनानेके लिये धान कूटने लगी । उसके हाथोंमें शंखकी बनी हुई कई चूड़ियाँ थीं, जो धान कूटते समय खनखना उठीं । अतिथियोंको इस बातका पता न चल जाय; इसलिये एक-एक करके उसने चूड़ियाँ निकाल लीं, दोनों हाथोंमें केवल एक-एक चूड़ी ही शेष रह गयी; फिर उनका बजना बंद हो गया । इस तरह एकाकी रहनेका उपदेश देनेके कारण वह कुमारी गुरु हुई ।
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एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः - आजगरआजगर-- वृत्तिकीवृत्तिकी प्रशंसा प्रह्लाद और अवधूतकासंवाद युधिष्ठिर उवाच
केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वीतशोकश्चरेन्महीम् ।
किञ्च कुर्वन्नरो लोके प्राप्नोति गतिमुत्तमाम् ॥ १ ॥
राजा युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! आप सदाचारके स्वरूपको जाननेवाले हैं । कृपया यह बताइये, किस तरहके आचारको अपनाकर मनुष्य शोकरहित हो इस पृथ्वीपर विचरण कर सकता है? और इस जगत्में कौन- सा कर्म करके वह उत्तम गति पा सकता है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रह्लादस्य च संवादं मुनेराजगरस्य च ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं — राजन्! इस विषयमें भी प्रह्लाद तथा अजगरवृत्तिसे रहनेवाले एक मुनिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया जाता है ॥ २ ॥
चरन्तं ब्राह्मणं कञ्चित् कल्पचित्तमनामयम् ।
पप्रच्छ राजा प्रह्लादो बुद्धिमान् बुद्धिसम्मतम् ॥ ३ ॥
एक सुदृढ़चित, दुःख- शोकसे रहित तथा बुद्धिसम्मत ब्राह्मणको पृथ्वीपर विचरते देख बुद्धिमान् राजा प्रह्लादने उससे इस प्रकार पूछा ॥ ३ ॥
प्रह्रादउवाच
स्वस्थः शक्तो मृदुर्दान्तो निर्विधित्सोऽनसूयकः ।
सुवाक् प्रगल्भो मेधावी प्राज्ञश्चरसि बालवत् ॥ ४ ॥
प्रह्लाद बोले — ब्रह्मन्! आप स्वस्थ, शक्तिमान्, मृदु, जितेन्द्रिय, कर्मारम्भसे दूर रहनेवाले, दूसरोंके दोषोंपर दृष्टि न डालनेवाले, सुन्दर और मधुर वचन बोलनेवाले, निर्भीक, प्रतिभाशाली, मेधावी तथा तत्त्वज्ञ होकर भी बालकोंके समान विचर रहे हैं ॥ ४ ॥
नैव प्रार्थयसे लाभं नालाभेष्वनुशोचसि ।
नित्यतृप्त इव ब्रह्मन् न किञ्चिदिव मन्यसे ॥ ५ ॥
न आप कोई लाभ चाहते हैं और न हानि होनेपर उसके लिये शोक ही करते हैं । ब्रह्मन्! आप नित्यतृप्त - से रहते हुए न किसी वस्तुको प्रिय मानते हैं और न अप्रिय ॥ ५ ॥
स्रोतसा ह्रियमाणासु प्रजासु विमना इव ।
धर्मकामार्थकार्येषु कूटस्थ इव लक्ष्यसे ॥ ६ ॥