05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1171–1180

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1171–1180

पृष्ठ 1171

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मनुष्ययोनिमिच्छन्ति सर्वभूतानि सर्वशः ।

मनुष्यत्वे च विप्रत्वं सर्व एवाभिनन्दति ॥ ८ ॥

' मुने! सभी प्राणी सब प्रकारसे मनुष्ययोनि पानेकी इच्छा रखते हैं । उसमें भी ब्राह्मणत्वकी प्रशंसा तो सभी लोग करते हैं ॥ ८ ॥

मनुष्यो ब्राह्मणश्चासि श्रोत्रियश्चासि काश्यप ।

सुदुर्लभमवाप्यैतन्न दोषान्मर्तुमर्हसि ॥ ९ ॥

‘ काश्यप! आप तो मनुष्य हैं, ब्राह्मण हैं और श्रोत्रिय भी हैं । ऐसा परम दुर्लभ शरीर पाकर आपको उसमें दोषदृष्टि करके स्वयं ही मरनेके लिये उद्यत होना उचित नहीं है ॥ ९ ॥

सर्वे लाभाः साभिमाना इति सत्यवती श्रुतिः ।

संतोषणीयरूपोऽसि लोभाद् यदभिमन्यसे ॥ १० ॥

' संसारमें जितने लाभ हैं, वे सभी अभिमानपूर्ण हैं, ऐसा सत्य अर्थका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका कथन है ( अर्थात् मैंने यह लाभ अपने पुरुषार्थसे किया है, ऐसा अहंकार प्रायः सभी मनुष्य कर लेते हैं ) । आपका स्वरूप तो संतोष रखनेके योग्य है । आप लोभवश ही उसकी अवहेलना करते हैं ॥ १० ॥

अहो सिद्धार्थता तेषां येषां सन्तीह पाणयः ।

अतीव स्पृहये तेषां येषां सन्तीह पाणयः ॥ ११ ॥

‘ अहो! जिनके पास भगवान्‌के दिये हुए हाथ हैं, उनको तो मैं कृतार्थ मानता हूँ । इस जगत्में जिनके पास एकसे अधिक हाथ हैं, उनके जैसा सौभाग्य पानेकी इच्छा मुझे बारंबार होती है ॥ ११ ॥

पाणिमद्भ्यः स्पृहास्माकं यथा तव धनस्य वै ।

न पाणिलाभादधिको लाभः कश्चन विद्यते ॥ १२ ॥

‘ जैसे आपके मनमें धनकी लालसा है, उसी प्रकार हम पशुओंको हाथवाले मनुष्योंसे हाथ पानेकी अभिलाषा रहती है । हमारी दृष्टिमें हाथ मिलनेसे अधिक दूसरा कोई लाभ नहीं ॥ १२ ॥

अपाणित्वाद् वय ब्रह्मन् कण्टकं नोद्धरामहे ।

जन्तूनुच्चावचानङ्गे दशतो न कषाम वा ॥ १३ ॥

‘ ब्रह्मन्! हमारे शरीरमें काँटे गड़ जाते हैं; परंतु हाथ न होनेसे हम उन्हें निकाल नहीं पाते हैं । जो छोटे-बड़े जीव- जन्तु हमारे शरीरमें हँसते हैं, उनको भी हम हटा नहीं सकते ॥ १३ ॥

अथ येषां पुनः पाणी देवदत्तौ दशाङ्गुली ।

उद्धरन्ति कृमीनङ्गाद् दशतो निकषन्ति च ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1172

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‘ परंतु जिनके पास भगवान्के दिये हुए दस अंगुलियोंसे युक्त दो हाथ हैं, वे अपने अंगोंसे उन कीड़ोंको हटाते या नष्ट कर देते हैं, जो उन्हें हँसते हैं ॥ १४ ॥

वर्षाहिमातपानां च परित्राणानि कुर्वते ।

चैलमन्नं सुखं शय्यां निवातं चोपभुञ्जते ॥ १५ ॥

‘ वे वर्षा, सर्दी और धूपसे अपनी रक्षा कर लेते हैं, कपड़ा पहनते हैं, सुखपूर्वक अन्न खाते हैं, शय्या बिछाकर सोते हैं तथा एकान्त स्थानका उपभोग करते हैं ॥ १५ ॥

अधिष्ठाय च गां लोके भुञ्जते वाहयन्ति च ।

उपायैर्बहुभिश्चैव वश्यानात्मनि कुर्वते ॥ १६ ॥

' हाथवाले मनुष्य बैलोंसे जुती हुई गाड़ीपर चढ़कर उन्हें हाँकते हैं और जगत्में उनका यथेष्ट उपभोग करते हैं तथा हाथसे ही अनेक प्रकारके उपाय करके लोगोंको अपने वशमें कर लेते हैं ॥ १६ ॥

ये खल्वजिह्वाः कृपणा अल्पप्राणा अपाणयः ।

सहन्ते तानि दुःखानि दिष्ट्या त्वं न तथा मुने ॥ १७ ॥

' मुने! जो दुःख बिना हाथके दीन, दुर्बल और बेजबान प्राणी सहते हैं, सौभाग्यवश वे तो आपको नहीं सहने पड़ते हैं ॥ १७ ॥

दिष्ट्या त्वं न शृगालो वै न कृमिर्न च मूषकः ।

न सर्पो न च मण्डूको न चान्यः पापयोनिजः ॥ १८ ॥

‘ आपका बड़ा भाग्य है कि आप गीदड़, कीड़ा, चूहा, साँप, मेढ़क या किसी दूसरी पापयोनिमें नहीं उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥

एतावतापि लाभेन तोष्टुमर्हसि काश्यप ।

किं पुनर्योऽसि सत्त्वानां सर्वेषां ब्राह्मणोत्तमः ॥ १ ९ ॥

‘ काश्यप! आपको इतने ही लाभसे संतुष्ट रहना चाहिये । इससे अधिक लाभ क्या होगा कि आप सभी प्राणियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं ॥ १ ९ ॥

इमे मां कृमयोऽदन्ति येषामुद्धरणाय वै ।

नास्ति शक्तिरपाणित्वात् पश्यावस्थामिमां मम ॥ २० ॥

' मुझे ये कीड़े खा रहे हैं, जिन्हें निकाल फेंकनेकी शक्ति मुझमें नहीं है । हाथ न होनेके कारण होनेवाली मेरी इस दुर्दशाको आप प्रत्यक्ष देख लें ॥ २० ॥

अकार्यमिति चैवेमं नात्मानं संत्यजाम्यहम् ।

नातः पापीयसीं योनिं पतेयमपरामिति ॥ २१ ॥

‘ आत्महत्या करना पाप है; यह सोचकर ही मैं अपने इस शरीरका परित्याग नहीं करता हूँ । मुझे भय है कि मैं इससे भी बढ़कर किसी दूसरी पापयोनिमें न गिर जाऊँ ॥ २१ ॥

मध्ये वै पापयोनीनां शार्गालीं यामहं गतः ।

पापीयस्यो बहुतरा इतोऽन्याः पापयोनयः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1173

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‘ यद्यपि मैं इस समय जिस शृगालयोनिमें हूँ, इसकी गणना भी पापयोनियोंमें ही है, तथापि दूसरी बहुत - सी पापयोनियाँ इससे भी नीची श्रेणीकी हैं ॥ २२ ॥

जात्यैवैके सुखितराः सन्त्यन्ये भृशदुःखिताः ।

नैकान्तं सुखमेवेह क्वचित्पश्यामि कस्यचित् ॥ २३ ॥

‘ कुछ देवता आदि जातिसे ही सुखी हैं, दूसरे पशु आदि जातिसे ही अत्यन्त दुखी हैं; परंतु मैं कहीं किसीको ऐसा नहीं देखता, जिसको सर्वथा सुख ही सुख हो ॥ २३ ॥

मनुष्या ह्याढ्यतां प्राप्य राज्यमिच्छन्त्यनन्तरम् ।

राज्याद् देवत्वमिच्छन्ति देवत्वादिन्द्रतामपि ॥ २४ ॥

' मनुष्य धनी हो जानेपर राज्य पाना चाहते हैं, राज्यसे देवत्वकी इच्छा करते हैं और देवत्वसे फिर इन्द्रपद प्राप्त करना चाहते हैं ॥ २४ ॥

भवेस्त्वं यद्यपि त्वाढ्यो न राजा न च दैवतम् ।

देवत्वं प्राप्य चेन्द्रत्वं नैव तुष्येस्तथा सति ॥ २५ ॥

' यदि आप धनी हो जायँ तो भी ब्राह्मण होनेके कारण राजा नहीं हो सकते । यदि कदाचित् राजा हो जायँ तो देवता नहीं हो सकते । देवता और इन्द्रका पद भी पा जायँ तो भी आप उतनेसे संतुष्ट नहीं रह सकेंगे ॥ २५ ॥

न तृप्तिः प्रियलाभेऽस्ति तृष्णा नाद्भिः प्रशाम्यति ।

सम्प्रज्वलति सा भूयः समिद्भिरिव पावकः ॥ २६ ॥

‘प्रिय वस्तुओंका लाभ होनेसे कभी तृप्ति नहीं होती । बढ़ती हुई तृष्णा जलसे नहीं बुझती । ईंधन पाकर जलनेवाली आगके समान वह और भी प्रज्वलित होती जाती है ॥ २६ ॥

अस्त्येव त्वयि शोकोऽपि हर्षश्चापि तथा त्वयि ।

सुखदुःखे तथा चोभे तत्र का परिदेवना ॥ २७ ॥

' तुम्हारे भीतर शोक भी है और हर्ष भी । साथ ही सुख और दुःख दोनों हैं; फिर शोक करना किस कामका? ॥ २७ ॥

परिच्छिद्यैव कामानां सर्वेषां चैव कर्मणाम् ।

मूलं बुद्धीन्द्रियग्रामं शकुन्तानिव पञ्जरे ॥ २८ ॥

' बुद्धि और इन्द्रियाँ ही समस्त कामनाओं और कर्मोंकी मूल हैं । उन्हें पिंजड़ेमें बंद पक्षियोंकी तरह अपने काबूमें रखा जाय तो कोई भय नहीं है ॥ २८ ॥

न द्वितीयस्य शिरसश्छेदनं विद्यते क्वचित् ।

न च पाणेस्तृतीयस्य यन्नास्ति न ततो भयम् ॥ २ ९ ॥

' मनुष्यको दूसरे सिर और तीसरे हाथके कटनेका कभी भय नहीं होता है । जो वास्तवमें है ही नहीं, उसके कारण भय भी नहीं होता है ॥ २ ९ ॥ न खल्वप्यरसज्ञस्य कामः क्वचन जायते ।

पृष्ठ 1174

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संस्पर्शाद् दर्शनाद् वापि श्रवणाद् वापि जायते ॥ ३० ॥

'जो किसी विषयका रस नहीं जानता, उसके मनमें कभी उसकी कामना भी नहीं होती । स्पर्शसे, दर्शनसे अथवा श्रवणसे भी कामनाका उदय होता है ॥

न त्वं स्मरसि वारुण्या लट्वाकानां च पक्षिणाम् ।

ताभ्यां चाभ्यधिको भक्ष्यो न कश्चिद् विद्यते क्वचित् ॥ ३१ ॥

‘ वारुणी मदिरा तथा चिड़िया – इन दोनोंका आप कभी स्मरण नहीं करते होंगे; क्योंकि इनको आपने नहीं खाया है; परंतु ( जो तामसी मनुष्य इनको खाते हैं उनके लिये ) कहीं और कोई भी भक्ष्य पदार्थ उन दोनोंसे बढ़कर नहीं है ॥ ३१ ॥

यानि चान्यानि भूतेषु भक्ष्यजातानि कस्यचित् ।

येषामभुक्तपूर्वाणि तेषामस्मृतिरेव ते ॥ ३२ ॥

‘ प्राणियोंमें किसीके भी जो अन्यान्य भक्ष्य पदार्थ हैं, जिनका तुमने पहले उपभोग नहीं किया है, उन भोजनोंकी स्मृति तुमको कभी नहीं होगी ॥ ३२ ॥

अप्राशनमसंस्पर्शमसंदर्शनमेव च ।

पुरुषस्यैष नियमो मन्ये श्रेयो न संशयः ॥ ३३ ॥

' मैं ऐसा मानता हूँ कि किसी वस्तुको न खाने, न छूने और न देखनेका नियम लेना ही पुरुषके लिये कल्याणकारी है, इसमें संशय नहीं ॥ ३३ ॥

पाणिमन्तो बलवन्तो धनवन्तो न संशयः ।

मनुष्या मानुषैरेव दासत्वमुपपादिताः ॥ ३४ ॥

‘ जिनके दोनों हाथ बने हुए हैं, निस्संदेह वे ही बलवान् और धनवान् हैं । मनुष्योंको तो मनुष्योंने ही दास बना रखा है ॥ ३४ ॥

वधबन्धपरिक्लेशैः क्लिश्यन्ते च पुनः पुनः ।

ते खल्वपि रमन्ते च मोदन्ते च हसन्ति च ॥ ३५ ॥

' कितने ही मनुष्य बारंबार वध और बन्धनके क्लेश भोगते रहते हैं, परंतु वे भी ( आत्महत्या करके प्राण नहीं देते, बल्कि ) आपसमें क्रीड़ा करते, आनन्दित होते और हँसते हैं ॥ ३५ ॥

अपरे बाहुबलिनः कृतविद्या मनस्विनः ।

जुगुप्सितां च कृपणां पापवृत्तिमुपासते ॥ ३६ ॥

‘ दूसरे बहुत - से बाहुबलसे सम्पन्न विद्वान् और मनस्वी मनुष्य दीन, निन्दित एवं पापपूर्ण वृत्तिसे जीविका चलाते हैं ॥ ३६ ॥

उत्सहन्ते च ते वृत्तिमन्यामप्युपसेवितुम् ।

स्वकर्मणा तु नियतं भवितव्यं तु तत् तथा ॥ ३७ ॥

' वे दूसरी वृत्तिका सेवन करनेके लिये भी उत्साह रखते हैं; परंतु अपने कर्मके अनुसार जो नियत है, वैसा ही भविष्यमें होता है ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 1175

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न पुल्कसो न चाण्डाल आत्मानं त्यक्तुमिच्छति ।

तया तुष्टः स्वया योन्या मायां पश्यस्व यादृशीम् ॥ ३८ ॥

' भंगी अथवा चाण्डाल भी अपने शरीरको त्यागना नहीं चाहता है, वह अपनी उसी

योनिसे संतुष्ट रहता है । देखिये, भगवान्‌की कैसी माया है? ॥ ३८ ॥

दृष्ट्वा कुणीन् पक्षहतान् मनुष्यानामयाविनः ।

सुसम्पूर्णः स्वया योन्या लब्धलाभोऽसि काश्यप ॥ ३ ९ ॥

‘ काश्यप! कुछ मनुष्य लूले और लँगड़े हैं, कुछ लोगोंको लकवा मार गया है, बहुत - से मनुष्य निरन्तर रोगी ही रहते हैं । उन सबकी ओर देखकर यह कहना पड़ता है कि आप अपनी योनिके अनुसार नीरोग और परिपूर्ण अंगवाले हैं । आपको मानवशरीरका लाभ मिल चुका है ॥ ३ ९ ॥

यदि ब्राह्मण देहस्ते निरातङ्को निरामयः ।

अङ्गानि च समग्राणि न च लोकेषु धिक्कृतः ॥ ४० ॥

‘ब्राह्मणदेव! यदि आपका शरीर निर्भय और नीरोग है, आपके सारे अंग ठीक हैं, किसीमें कोई विकार नहीं आया है तो लोकमें कोई भी आपको धिक्कार नहीं सकता— आप धिक्कारके पात्र नहीं हो सकते ॥ ४० ॥

न केनचित् प्रवादेन सत्येनैवापहारिणा ।

धर्मायोत्तिष्ठ विप्रर्षे नात्मानं त्यक्तुमर्हसि ॥ ४१ ॥

‘यदि आपपर जातिच्युत करनेवाला कोई सच्चा कलंक लगा हो तो भी आपको प्राणत्यागका विचार नहीं करना चाहिये । ब्रह्मर्षे! आप धर्मपालनके लिये उठ खड़े होइये ॥ ४१ ॥

यदि ब्रह्मन् शृणोष्येतच्छ्रद्दधासि च मे वचः ।

वेदोक्तस्यैव धर्मस्य फलं मुख्यमवाप्स्यसि ॥ ४२ ॥

‘ ब्रह्मन्! यदि आप मेरी बात सुनेंगे और उसपर श्रद्धा करेंगे तो आपको वेदोक्त धर्मके पालनका ही मुख्य फल प्राप्त होगा ॥ ४२ ॥

स्वाध्यायमग्निसंस्कारमप्रमत्तोऽनुपालय ॥ सत्यं दमं च दानं च स्पर्धिष्ठा मा च केनचित् ॥ ४३ ॥

‘ आप सावधान होकर स्वाध्याय, अग्निहोत्र, सत्य, इन्द्रियसंयम तथा दानधर्मका पालन कीजिये । किसीके साथ स्पर्धा न कीजिये ॥ ४३ ॥

ये केचन स्वध्ययनाः प्राप्ता यजनयाजनम् ।

कथं ते चानुशोचेयुर्ध्यायेयुर्वाप्यशोभनम् ।

इच्छन्तस्ते विहाराय सुखं महदवाप्नुयुः ॥ ४४ ॥

‘ जो ब्राह्मण स्वाध्यायमें लगे रहते हैं तथा यज्ञ करते और कराते हैं, वे किसी प्रकारकी चिन्ता क्यों करेंगे और कोई आत्महत्या आदि बुरी बात भी क्यों सोचेंगे? वे यदि चाहें तो

पृष्ठ 1176

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1176 का मूल पृष्ठ
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यज्ञादिके द्वारा विहार करते हुए महान् सुख पा सकते हैं ॥ ४४ ॥

उत जाताः सुनक्षत्रे सुतिथौ सुमुहूर्तजाः ।

यज्ञदानप्रजेहायां यतन्ते शक्तिपूर्वकम् ॥ ४५ ॥

' जो उत्तम नक्षत्र, उत्तम तिथि और उत्तम मुहूर्तमें पैदा हुए हैं, वे अपनी शक्तिके अनुसार यज्ञ एवं दान करते और न्यायानुकूल संतानोत्पादनकी चेष्टा भी करते हैं ॥ ४५ ॥

नक्षत्रेष्वासुरेष्वन्ये दुस्तिथौ दुर्मुहूर्तजाः ।

सम्पतन्त्यासुरीं योनिं यज्ञप्रसववर्जिताः ॥ ४६ ॥

' दूसरे जो लोग आसुर नक्षत्र, दूषित तिथि तथा अशुभ मुहूर्तमें उत्पन्न होते हैं, वे यज्ञ तथा संतानसे रहित होकर आसुरी योनिमें पड़ते हैं ॥ ४६ ॥

अहमासं पण्डितको हैतुको वेदनिन्दकः ।

आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् ॥ ४७ ॥

‘ पूर्वजन्ममें मैं एक पण्डित था और कुतर्कका आश्रय लेकर वेदोंकी निन्दा करता था । प्रत्यक्षके आधारपर अनुमानको प्रधानता देनेवाली थोथी तर्कविद्यापर ही उस समय मेरा अधिक अनुराग था ॥ ४७ ॥

हेतुवादान् प्रवदिता वक्ता संसत्सु हेतुमत् ।

आक्रोष्टा चाभिवक्ता च ब्रह्मवाक्येषु च द्विजान् ॥ ४८ ॥

‘ मैं सभाओंमें जाकर तर्क और युक्तिकी बातें ही अधिक बोलता । जहाँ दूसरे ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक वेद - वाक्योंपर विचार करते, वहाँ मैं बलपूर्वक आक्रमण करके उन्हें खरी - खोटी सुना देता और स्वयं ही अपना तर्कवाद बका करता था ॥ ४८ ॥

नास्तिकः सर्वशङ्की च मूर्खः पण्डितमानिकः ।

तस्येयं फलनिर्वृत्तिः शृगालत्वं मम द्विज ॥ ४ ९ ॥

‘ मैं नास्तिक, सबपर संदेह करनेवाला तथा मूर्ख होकर भी अपनेको पण्डित माननेवाला था । विप्रवर! यह शृगालयोनि मेरे उसी कुकर्मका फल है ॥ ४ ९ ॥

अपि जातु तथा तस्मादहोरात्रशतैरपि ।

यदहं मानुषीं योनिं शृगालः प्राप्नुयां पुनः ॥ ५० ॥

अब मैं सैकड़ों दिन - रातोंतक साधन करके भी क्या कभी वह उपाय कर सकता हूँ, जिससे आज सियारकी योनिमें पड़ा हुआ मैं पुनः वह मनुष्ययोनि पा सकूँ ॥

संतुष्टश्चाप्रमत्तश्च यज्ञदानतपोरतिः ।

ज्ञेयज्ञाता भवेयं वै वर्ज्यवर्जयिता तथा ॥ ५१ ॥

' जिस मनुष्ययोनिमें मैं संतुष्ट और सावधान रहकर यज्ञ, दान और तपस्यामें लगा रह सकूँ, जिसमें मैं जाननेयोग्य वस्तुको जान लूँ और त्यागनेयोग्य वस्तुका त्याग कर दूँ' ॥ ५१ ॥

ततः स मुनिरुत्थाय काश्यपस्तमुवाच ह ।

पृष्ठ 1177

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अहो बतासि कुशलो बुद्धिमांश्चेति विस्मितः ॥ ५२ ॥

यह सुनकर काश्यप मुनि आश्चर्यसे चकित होकर खड़े हो गये और बोले— ' अहो! तुम तो बड़े कुशल और बुद्धिमान् हो ' ॥ ५२ ॥

समवैक्षत तं विप्रो ज्ञानदीर्घेण चक्षुषा ।

ददर्श चैनं देवानां देवमिन्द्रं शचीपतिम् ॥ ५३ ॥

ऐसा कहकर ब्रह्मर्षिने उसकी ओर ज्ञानदृष्टिसे देखा। तब उसके रूपमें इन्हें देवदेव शचीपति इन्द्र दिखायी दिये ॥ ५३ ॥

ततः सम्पूजयामास काश्यपो हरिवाहनम् ।

अनुज्ञातस्तु तेनाथ प्रविवेश स्वमालयम् ॥ ५४ ॥

तदनन्तर काश्यपने इन्द्रदेवका पूजन किया और उनकी आज्ञा लेकर वे पुनः अपने घरको लौट गये ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शृगालकाश्यपसंवादे अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें गीदड़ और काश्यपका संवादविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १८० ॥

पृष्ठ 1178

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एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन युधिष्ठिर उवाच

यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा तपस्तप्तं तथैव च ।

गुरूणां वापि शुश्रूषा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! यदि दान, यज्ञ, तप अथवा गुरुशुश्रूषा पुण्यकर्म है और उसका कुछ फल होता है तो वह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

आत्मनानर्थयुक्तेन पापे निविशते मनः ।

स्वकर्मकलुषं कृत्वा कृच्छ्रे लोके विधीयते ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! काम, क्रोध आदि दोषोंसे युक्त बुद्धिकी प्रेरणासे मन पापकर्ममें प्रवृत्त होता है । इस प्रकार मनुष्य अपने ही कार्योंद्वारा पाप करके दुःखमय लोक (नरक ) में गिराया जाता है ॥ २ ॥

दुर्भिक्षादेव दुर्भिक्षं क्लेशात् क्लेशं भयाद् भयम् ।

मृतेभ्यः प्रमृतं यान्ति दरिद्राः पापकारिणः ॥ ३ ॥

पापाचारी दरिद्र मनुष्य दुर्भिक्षसे दुर्भिक्ष, क्लेशसे क्लेश और भयसे भय पाते हु मरे हुओंसे भी अधिक मृतकतुल्य हो जाते हैं ॥ ३ ॥

उत्सवादुत्सवं यान्ति स्वर्गात् स्वर्गं सुखात् सुखम् ।

श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च धनाढ्याः शुभकारिणः ॥ ४ ॥

जो श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, धनसम्पन्न तथा शुभकर्म- परायण होते हैं, वे उत्सवसे अधिक उत्सवको, स्वर्गसे अधिक स्वर्गको तथा सुखसे अधिक सुखको प्राप्त करते हैं ॥ ४ ॥

व्यालकुञ्जरदुर्गेषु सर्पचोरभयेषु च ।

हस्तावापेन गच्छन्ति नास्तिकाः किमतः परम् ॥ ५ ॥

नास्तिक मनुष्योंके हाथमें हथकड़ी डालकर राजा उन्हें राज्यसे दूर निकाल देता है और वे उन जंगलोंमें चले जाते हैं, जो मतवाले हाथियोंके कारण दुर्गम तथा सर्प और चोर

आदिके भयसे भरे हुए होते हैं । इससे बढ़कर उन्हें और क्या दण्ड मिल सकता है? ॥ ५ ॥

प्रियदेवातिथेयाश्च वदान्याः प्रियसाधवः ।

क्षेम्यमात्मवतां मार्गमास्थिता हस्तदक्षिणम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1179

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जिन्हें देवपूजा और अतिथिसत्कार प्रिय है, जो उदार हैं तथा श्रेष्ठ पुरुष जिन्हें अच्छे लगते हैं, वे पुण्यात्मा मनुष्य अपने दाहिने हाथके समान मंगलकारी एवं मनको वशमें रखनेवाले योगियोंको ही प्राप्त होनेयोग्य मार्गपर आरूढ़ होते हैं ॥ ६ ॥

पुलाका इव धान्येषु पुत्तिका इव पक्षिषु ।

तद्विधास्ते मनुष्याणां येषां धर्मो न कारणम् ॥ ७ ॥

जिनका उद्देश्य धर्म नहीं है, ऐसे मनुष्य मानव समाजके भीतर वैसे ही समझे जाते हैं, जैसे धानमें थोथा पौधा और पंखवाले जीवोंमें मच्छर ॥ ७ ॥

सुशीघ्रमपि धावन्तं विधानमनुधावति ।

शेते सह शयानेन येन येन यथा कृतम् ॥ ८ ॥

उपतिष्ठति तिष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति ।

करोति कुर्वतः कर्म च्छायेवानुविधीयते ॥ ९ ॥

जिस-जिस मनुष्यने जैसा कर्म किया है, वह उसके पीछे लगा रहता है । यदि कर्ता पुरुष शीघ्रतापूर्वक दौड़ता है तो वह भी उतनी ही तेजीके साथ उसके पीछे जाता है । जब वह सोता है तो उसका कर्मफल भी उसके साथ ही सो जाता है । जब वह खड़ा होता है तो वह भी पास ही खड़ा रहता है और जब मनुष्य चलता है तो उसके पीछे - पीछे वह भी चलने लगता है । इतना ही नहीं, कोई कार्य करते समय भी कर्म- संस्कार उसका साथ नहीं छोड़ता । सदा छायाके समान पीछे लगा रहता है ॥ ८ - ९ ॥

येन येन यथा यद् यत् पुरा कर्म समीहितम् ।

तत्तदेकतरो भुङ्क्ते नित्यं विहितमात्मना ॥ १० ॥

जिस-जिस मनुष्यने अपने- अपने पूर्वजन्मोंमें जैसे - जैसे कर्म किये हैं, वह अपने ही किये हुए उन कर्मोंका फल सदा अकेला ही भोगता है ॥ १० ॥

स्वकर्मफलनिक्षेपं विधानपरिरक्षितम् ।

भूतग्राममिमं कालः समन्तात् परिकर्षति ॥ ११ ॥

अपने - अपने कर्मका फल एक धरोहरके समान है, जो कर्मजनित अदृष्टके द्वारा सुरक्षित रहता है । उपयुक्त अवसर आनेपर यह काल इस कर्मफलको प्राणिसमुदायके पास खींच लाता है ॥ ११ ॥

अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च ।

स्वं कालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुरा कृतम् ॥ १२ ॥

जैसे फूल और फल किसीकी प्रेरणाके बिना ही अपने समयपर वृक्षोंमें लग जाते हैं, उसी प्रकार पहलेके किये हुए कर्म भी अपने फलभोगके समयका उल्लंघन नहीं करते ॥ १२ ॥

सम्मानश्चावमानश्च लाभालाभौ क्षयोदयौ ।

प्रवृत्ता विनिवर्तन्ते विधानान्ते पुनः पुनः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1180

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सम्मान - अपमान, लाभ-हानि तथा उन्नति- अवनति– ये पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार बार- बार प्राप्त होते हैं और प्रारब्धभोगके पश्चात् निवृत्त हो जाते हैं ॥

आत्मना विहितं दुःखमात्मना विहितं सुखम् ।

गर्भशय्यामुपादाय भुज्यते पौर्वदेहिकम् ॥ १४ ॥

दुःख अपने ही किये हुए कर्मोंका फल है और सुख भी अपने ही पूर्वकृत कर्मोंका परिणाम है । जीव माताकी गर्भशय्यामें आते ही पूर्वशरीरद्वारा उपार्जित सुख- दुःखका उपभोग करने लगता है ॥ १४ ॥

बालो युवा च वृद्धश्च यत् करोति शुभाशुभम् ।

तस्यां तस्यामवस्थायां तत् फलं प्रतिपद्यते ॥ १५ ॥

कोई बालक हो, तरुण हो या बूढ़ा हो, वह जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, दूसरे जन्ममें उसी - उसी अवस्थामें उस - उस कर्मका फल उसे प्राप्त होता है ॥

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् ।

तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥ १६ ॥

जैसे बछड़ा हजारों गौओंमेंसे अपनी माँको पहचानकर उसे पा लेता है, वैसे ही पहलेका किया हुआ कर्म भी अपने कर्ताके पास पहुँच जाता है ॥ १६ ॥

समुन्नमग्रतो वस्त्रं पश्चाच्छुध्यति कर्मणा ।

उपवासैः प्रतप्तानां दीर्घं सुखमनन्तकम् ॥ १७ ॥

जैसे पहलेसे क्षार आदिमें भिगोया हुआ कपड़ा पीछे धोनेसे साफ हो जाता है, उसी प्रकार जो उपवासपूर्वक तपस्या करते हैं, उन्हें कभी समाप्त न होनेवाला महान् सुख मिलता है ॥ १७ ॥

दीर्घकालेन तपसा सेवितेन तपोवने ।

धर्मनिर्धूतपापानां सम्पद्यन्ते मनोरथाः ॥ १८ ॥

तपोवनमें रहकर की हुई दीर्घकालतककी तपस्यासे तथा धर्मसे जिनके सारे पाप धुल गये हैं, उनके सम्पूर्ण मनोरथ सफल हो जाते हैं ॥ १८ ॥

शकुनानामिवाकाशे मत्स्यानामिव चोदके ।

पदं यथा न दृश्येत तथा ज्ञानविदां गतिः ॥ १ ९ ॥

जैसे आकाशमें पक्षियोंके और जलमें मछलियोंके चरण - चिह्न दिखायी नहीं देते, उसी प्रकार ज्ञानियोंकी गतिका पता नहीं चलता ॥ १ ९ ॥

अलमन्यैरुपालम्भैः कीर्तितैश्च व्यतिक्रमैः ।

पेशलं चानुरूपं च कर्तव्यं हितमात्मनः ॥ २० ॥

दूसरोंको उलाहना देने तथा लोगोंके अन्यान्य अपराधोंकी चर्चा करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है । जो काम सुन्दर, अनुकूल और अपने लिये हितकर जान पड़े, वही कर्म करना चाहिये ॥ २० ॥