श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1161–1170

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1161–1170

पृष्ठ 1161

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1161 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सारी प्रजा काम-क्रोध आदिके प्रवाहमें पड़कर बही जा रही है; परंतु आप उधरसे उदासीन -जैसे जान पड़ते हैं तथा धर्म, अर्थ एवं काम- सम्बन्धी कार्योंके प्रति भी निश्चेष्ट - से दिखायी देते हैं ॥ ६ ॥

नानुतिष्ठसि धर्मार्थो न कामे चापि वर्तसे ।

इन्द्रियार्थाननादृत्य मुक्तश्चरसि साक्षिवत् ॥ ७ ॥

धर्म और अर्थ- सम्बन्धी कार्योंका आप अनुष्ठान नहीं करते हैं, काममें भी आपकी प्रवृत्ति नहीं है । आप इन्द्रियोंके सम्पूर्ण विषयोंकी उपेक्षा करके साक्षीके समान मुक्तरूपसे विचरते हैं ॥ ७ ॥

का नु प्रज्ञा श्रुतं वा किं वृत्तिर्वा का नु ते मुने ।

क्षिप्रमाचक्ष्व मे ब्रह्मन् श्रेयो यदिह मन्यसे ॥ ८ ॥

मुने! आपके पास कौन- सी ऐसी बुद्धि, कैसा शास्त्रज्ञान अथवा कौन-सी वृत्ति है, जिससे आपका जीवन ऐसा बन गया है? ब्रह्मन्! आपके मतसे इस जगत्में मेरे लिये जो श्रेयका साधन हो, उसे शीघ्र बतावें ॥ ८ ॥

भीष्म उवाच

अनुयुक्तः स मेधावी लोकधर्मविधानवित् ।

उवाच श्लक्ष्णया वाचा प्रह्लादमनपार्थया ॥ ९ ॥

भीष्मजी कहते हैं— राजन्! प्रह्लादके इस प्रकार पूछनेपर लोक- धर्मके विधानको जाननेवाले उन मेधावी मुनिने उनसे मधुर एवं सार्थक वाणीमें इस प्रकार कहा ॥ ९ ॥

पश्य प्रह्लाद भूतानामुत्पत्तिमनिमित्ततः ।

ह्रासं वृद्धिं विनाशं च न प्रहृष्ये न च व्यथे ॥ १० ॥

‘प्रह्लाद! देखो, इस जगत्के प्राणियोंकी उत्पत्ति, वृद्धि, ह्रास और विनाश कारणरहित सत्स्वरूप परमात्मासे ही हुए हैं; इस कारण मैं उनके लिये न तो हर्ष प्रकट करता हूँ और न व्यथित ही होता हूँ ॥ १० ॥

स्वभावादेव संदृश्या वर्तमानाः प्रवृत्तयः ।

स्वभावनिरताः सर्वाः परितुष्येन केनचित् ॥ ११ ॥

' ऐसा समझना चाहिये, पूर्वकृत कर्मानुसार बने हुए स्वभावसे ही प्राणियोंकी वर्तमान प्रवृत्तियाँ प्रकट हुई हैं; अतः समस्त प्रजा स्वभावमें ही तत्पर है, उनका दूसरा कोई आश्रय नहीं है । इस रहस्यको समझकर मनुष्यको किसी भी परिस्थितिमें संतुष्ट नहीं होना चाहिये ॥ ११ ॥

पश्य प्रह्लाद संयोगान् विप्रयोगपरायणान् ।

संचयांश्च विनाशान्तान् न क्वचिद् विदधे मनः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1162

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1162 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

'प्रह्लाद! देखो, जितने संयोग हैं, उनका पर्यवसान वियोगमें ही होता है और जितने संचय हैं, उनकी समाप्ति विनाशमें ही होती है । यह सब देखकर मैं कहीं भी अपने मनको नहीं लगाता हूँ ॥ १२ ॥

अन्तवन्ति च भूतानि गुणयुक्तानि पश्यतः ।

उत्पत्तिनिधनज्ञस्य किं कार्यमवशिष्यते ॥ १३ ॥

'जो गुणयुक्त सम्पूर्ण भूतोंको नाशवान् देखता है तथा उत्पत्ति और प्रलयके तत्त्वको जानता है, उसके लिये यहाँ कौन - सा कार्य अवशिष्ट रह जाता है? ॥ १३ ॥

जलजानामपि ह्यन्तं पर्यायेणोपलक्षये ।

महतामपि कायानां सूक्ष्माणां च महोदधौ ॥ १४ ॥

‘ महासागरके जलमें पैदा होनेवाले विशाल शरीरवाले तिमि आदि मत्स्यों तथा छोटे-छोटे कीड़ोंका भी बारी - बारीसे विनाश होता देखता हूँ ॥ १४ ॥

जङ्गमस्थावराणां च भूतानामसुराधिप ।

पार्थिवानामपि व्यक्तं मृत्युं पश्यामि सर्वशः ॥ १५ ॥

‘ असुरराज! पृथ्वीपर भी जितने स्थावर- जंगम प्राणी हैं, उन सबकी मृत्यु मुझे स्पष्ट दिखायी दे रही है ॥ १५ ॥

अन्तरिक्षचराणां च दानवोत्तम पक्षिणाम् ।

उत्तिष्ठते यथाकालं मृत्युर्बलवतामपि ॥ १६ ॥

'दानवश्रेष्ठ! आकाशमें विचरनेवाले बलवान् पक्षियोंके समक्ष भी यथासमय मृत्यु आ पहुँचती है ॥ १६ ॥

दिवि संचरमाणानि ह्रस्वानि च महान्ति च ।

ज्योतींष्यपि यथाकालं पतमानानि लक्षये ॥ १७ ॥

‘ आकाशमें जो छोटे - बड़े ज्योतिर्मय नक्षत्र विचर रहे हैं, उन्हें भी मैं यथासमय नीचे गिरते देखता हूँ ॥ १७ ॥

इति भूतानि सम्पश्यन्ननुषक्तानि मृत्युना ।

सर्वसामान्यगो विद्वान् कृतकृत्यः सुखं स्वपे ॥ १८ ॥

‘ इस प्रकार सारे प्राणियोंको मैं मृत्युके पाशमें बद्ध देखता हूँ; इसलिये तत्त्वको जानकर कृतकृत्य हो सबके प्रति समान भाव रखता हुआ सुखसे सोता हूँ ॥ १८ ॥

सुमहान्तमपि ग्रासं ग्रसे लब्धं यदृच्छया ।

शये पुनरभुञ्जानो दिवसानि बहून्यपि ॥ १ ९ ॥

‘ यदि दैवेच्छासे अकस्मात् अधिक भोजन प्राप्त हो जाय तो मैं बहुत खा लेता हूँ, ग्रासमात्र मिले तो उसीमें संतुष्ट रहता हूँ और न मिला तो बहुत दिनोंतक बिना खाये - पीये भी सो रहता हूँ ॥ १ ९ ॥ आशयन्त्यपि मामन्नं पुनर्बहुगुणं बहु ।

पृष्ठ 1163

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1163 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पुनरल्पं पुनः स्तोकं पुनर्नैवोपपद्यते ॥ २० ॥

‘ फिर कितने ही लोग आकर मुझे अनेक गुणोंसे सम्पन्न बहुत-सा अन्न खिला देते हैं । पुनः कभी बहुत थोड़ा, कभी थोड़े - से भी थोड़ा भोजन मिलता है और कभी वह भी नहीं मिलता ॥ २० ॥

कणं कदाचित् खादामि पिण्याकमपि च ग्रसे ।

भक्षये शालिमांसानि भक्षांश्चोच्चावचान् पुनः ॥ २१ ॥

‘ कभी चावलकी कनी खाता हूँ, कभी तिलकी खली ही खाकर रह जाता हूँ और कभी अगहनीके चावलका भात भरपेट खाता हूँ। इस प्रकार मुझे बढ़िया - घटिया सभी तरहके भोजन बारंबार प्राप्त होते रहते हैं ॥ २१ ॥

शये कदाचित् पर्यङ्के भूमावपि पुनः शये ।I प्रासादे चापि मे शय्या कदाचिदुपपद्यते ॥ २२ ॥

‘ कभी पलंगपर सोता हूँ, कभी पृथ्वीपर ही पड़ा रहता हूँ और कभी- कभी मुझे महलके भीतर बिछी हुई बहुमूल्य शय्या भी उपलब्ध हो जाती है ॥ २२ ॥

धारयामि च चीराणि शाणक्षौमाजिनानि च ।

महार्हाणि च वासांसि धारयाम्यहमेकदा ॥ २३ ॥

‘ मैं कभी तो चिथड़े अथवा वल्कल पहनकर रहता हूँ, कभी सनके, कभी रेशमके और कभी मृगचर्मके वस्त्र धारण करता हूँ तथा किसी एक कालमें बहुत - से बहुमूल्य वस्त्रोंको भी पहन लेता हूँ ॥ २३ ॥

न संनिपतितं धर्म्यमुपभोगं यदृच्छया ।

प्रत्याचक्षे न चाप्येनमनुरुध्ये सुदुर्लभम् ॥ २४ ॥

‘ यदि दैववश मुझे कोई धर्मानुकूल भोग्य पदार्थ प्राप्त हो जाय तो मैं उससे द्वेष नहीं करता हूँ और प्राप्त न होनेपर किसी दुर्लभ भोगकी भी कभी इच्छा नहीं करता ॥ २४ ॥

अचलमनिधनं शिवं विशोकं

शुचिमतुलं विदुषां मते प्रविष्टम् ।

अनभिमतमसेवितं विमूढै- व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २५ ॥

मैं सदा पवित्रभावसे रहकर इस अजगरवृत्तिका अनुसरण करता हूँ । यह अत्यन्त सुदृढ़, मृत्युसे दूर रखनेवाली, कल्याणमय, शोकहीन, शुद्ध, अनुपम और विद्वानोंके मतके अनुकूल है । मूर्ख मनुष्य न तो इसे मानते हैं और न इसका सेवन ही करते हैं ॥ २५ ॥

अचलितमतिरच्युतः स्वधर्मात् परिमितसंसरणः परावरज्ञः । विगतभयकषायलोभमोहो व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २६ ॥

पृष्ठ 1164

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1164 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' मेरी बुद्धि अविचल है, मैं अपने धर्मसे च्युत नहीं हुआ हूँ, मेरा सांसारिक व्यवहार परिमित हो गया है, मुझे उत्तम और अधमका ज्ञान है, मेरे हृदयसे भय, राग--द्वेष, लोभ और मोह दूर हो गये हैं तथा पवित्रभावसे रहकर इस अजगरोचित व्रतका आचरण करता ॥ २६ ॥

अनियतफलभक्ष्यभोज्यपेयं

विधिपरिणामविभक्तदेशकालम् ।

हृदयसुखमसेवितं कदर्यै- व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २७ ॥

‘ यह अजगर- सम्बन्धी व्रत मेरे हृदयको सुख देनेवाला है । इसमें भक्ष्य, भोज्य, पेय और फल आदिके मिलनेकी कोई नियत व्यवस्था नहीं रहती — अनियतरूपसे जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करना होता है । इस व्रतमें प्रारब्धके परिणामके अनुसार देश और कालका विभाग नियत है । विषयलोलुप नीच पुरुष इसका सेवन नहीं करते, मैं पवित्रभावसे इसी व्रतका आचरण करता हूँ ॥ २७ ॥

इदमिदमिति तृष्णयाभिभूतं जनमनवाप्तधनं विषीदमानम् । निपुणमनुनिशम्य तत्त्वबुद्धया व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २८ ॥

' जो यह मिले, वह मिले, इस प्रकार तृष्णासे दबे रहते हैं और धन न मिलनेके कारण निरन्तर विषाद करते हैं; ऐसे लोगोंकी दशा अच्छी तरह देखकर तात्त्विक बुद्धिसे सम्पन्न हुआ मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ ॥ २८ ॥

बहुविधमनुदृश्य चार्थहेतोः कृपणमिहार्यमनार्यमाश्रयन्तम् । उपशमरुचिरात्मवान् प्रशान्तो व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ २ ९ ॥ ' मैं बारंबार देखता हूँ कि श्रेष्ठ मनुष्य भी धनके लिये दीनभावसे नीच पुरुषका आश्रय लेते हैं । यह देखकर मेरी रुचि प्रशान्त हो गयी है । अतः मैं अपने स्वरूपको प्राप्त और सर्वथा शान्त हो गया हूँ और पवित्रभावसे इस आजगर- व्रतका आचरण करता हूँ ॥ २ ९ ॥ सुखमसुखमलाभमर्थलाभं रतिमरतिं मरणं च जीवितं च । विधिनियतमवेक्ष्य तत्त्वतोऽहं व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ ३० ॥

‘ सुख- दुःख, लाभ -हानि, अनुकूल और प्रतिकूल तथा जीवन और मरण — ये सब दैवके अधीन हैं । इस प्रकार यथार्थरूपसे जानकर मैं शुद्धभावसे इस आजगरव्रतका आचरण

पृष्ठ 1165

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1165 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

करता हूँ ॥ ३० ॥

अपगतभयरागमोहदप धृतिमतिबुद्धिसमन्वितः प्रशान्तः । उपगतफलभोगिनो निशम्य व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ ३१ ॥

' मेरे भय, राग, मोह और अभिमान नष्ट हो गये हैं । मैं धृति, मति और बुद्धिसे सम्पन्न एवं पूर्णतया शान्त हूँ । और प्रारब्धवश स्वतः अपने समीप आयी हुई वस्तुका ही उपभोग करनेवालोंको देखकर मैं पवित्र भावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ ॥ ३१ ॥

अनियतशयनासनः प्रकृत्या दमनियमव्रतसत्यशौचयुक्तः । अपगतफलसंचयः प्रहृष्टो व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ ३२ ॥

' मेरे सोने - बैठनेका कोई नियत स्थान नहीं है । मैं स्व भावतः दम, नियम, व्रत, सत्य और शौचाचारसे सम्पन्न हूँ। मेरे कर्मफल-संचयका नाश हो चुका है । मैं प्रसन्नतापूर्वक पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ ॥ ३२ ॥

अपगतमसुखार्थमीहनार्थे- रुपगतबुद्धिरवेक्ष्य चात्मसंस्थम् । तृषितमनियतं मनो नियन्तुं व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि । ३३ ॥ ' जिनका परिणाम दुःख है, उन इच्छाके विषयभूत समस्त पदार्थोंसे जो विरक्त हो चुका है, ऐसे आत्मनिष्ठ महापुरुषको देखकर मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है । अतः मैं तृष्णासे व्याकुल असंयत मनको वशमें करनेके लिये पवित्र भावसे इस आजगर- व्रतका आचरण करता हूँ ॥ ३३ ॥

न हृदयमनुरुध्य वाङ्मनो वा प्रियसुखदुर्लभतामनित्यतां च । तदुभयमुपलक्षयन्निवाहं व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥ ३४ ॥

‘ मन, वाणी और बुद्धिकी उपेक्षा करके इनको प्रिय लगनेवाले विषय - सुखोंकी दुर्लभता तथा अनित्यता — इन दोनोंको देखनेवालेकी भाँति मैं पवित्रभावसे इस आजगरव्रतका आचरण करता हूँ ॥ ३४ ॥

बहुकथितमिदं हि बुद्धिमद्भिः कविभिरपि प्रथयद्भिरात्मकीर्तिम् । इदमिदमिति तत्र तत्र हन्त

पृष्ठ 1166

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1166 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

स्वपरमतैर्गहनं प्रतर्कयद्भिः ॥ ३५ ॥

' अपनी कीर्तिका विस्तार करनेवाले विद्वानों और बुद्धिमानोंने अपने और दूसरोंके मतसे गहन तर्क और वितर्क करके ' ऐसे करना चाहिये ' ' ऐसे करना चाहिये ' इत्यादि कहकर इस व्रतकी अनेक प्रकारसे व्याख्या की है ॥ ३५ ॥

तदिदमनुनिशम्य विप्रपातं पृथगभिपन्नमिहाबुधैर्मनुष्यैः । अनवसितमनन्तदोषपारं नृषु विहरामि विनीतदोषतृष्णः ॥ ३६ ॥

'मूर्खलोग इस अजगरवृत्तिको सुनकर इसे पहाड़की चोटीसे गिरनेकी भाँति भयंकर समझते हैं । परंतु उनकी वह मान्यता भिन्न है । मैं इस अजगरवृत्तिको अज्ञानका नाशक और समस्त दोषोंसे रहित मानता हूँ। अतः दोष और तृष्णाका त्याग करके मनुष्योंमें विचरता हूँ' ॥ ३६ ॥

भीष्म उवाच अजगरचरितं व्रतं महात्मा य इह नरोऽनुचरेद् विनीतरागः । अपगतभयलोभमोहमन्युः स खलु सुखी विचरेदिमं विहारम् ॥ ३७ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! जो महापुरुष राग, भय, लोभ, मोह और क्रोधको त्यागकर इस आजगर व्रतका पालन करता है, वह इस लोकमें सानन्द विचरण करता है ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि आजगरप्रह्लादसंवादे एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अजगरवृत्तिसे रहनेवाले मुनि और प्रह्लादका संवादविषयक एक सौ उनासीवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १७९ ॥

पृष्ठ 1167

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1167 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः सद्बुद्धिका आश्रय लेकर आत्महत्यादि पापकर्मसे निवृत्त होनेके सम्बन्धमें काश्यप ब्राह्मण और इन्द्रका संवाद युधिष्ठिर उवाच

बान्धवाः कर्म वित्तं वा प्रज्ञा वेह पितामह ।

नरस्य का प्रतिष्ठा स्यादेतत् पृष्टो वदस्व मे ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा - पितामह! अब मेरे प्रश्नके अनुसार मुझे यह बताइये कि मनुष्यको बन्धुजन, कर्म, धन अथवा बुद्धि – इनमेंसे किसका आश्रय लेना चाहिये? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

प्रज्ञा प्रतिष्ठा भूतानां प्रज्ञा लाभः परो मतः ।

प्रज्ञा निःश्रेयसी लोके प्रज्ञा स्वर्गो मतः सताम् ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! प्राणियोंका प्रधान आश्रय बुद्धि है। बुद्धि ही उनका सबसे बड़ा लाभ है । संसारमें बुद्धि ही उनका कल्याण करनेवाली है । सत्पुरुषोंके मतमें बुद्धि ही स्वर्ग है ॥ २ ॥

प्रज्ञया प्रापितार्थो हि बलिरैश्वर्यसंक्षये ।

प्रह्लादो नमुचिर्मङ्किस्तस्याः किं विद्यते परम् ॥ ३ ॥

राजा बलिने अपना ऐश्वर्य क्षीण हो जानेपर पुनः उसे बुद्धिबलसे ही पाया था । प्रह्लाद, नमुचि और मंकिने भी बुद्धिबलसे ही अपना- अपना अर्थ सिद्ध किया था । संसारमें बुद्धिसे बढ़कर और क्या है? ॥ ३ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

इन्द्रकाश्यपसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इन्द्र और काश्यपके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, उसे सुनो ॥ ४ ॥

वैश्यः कश्चिदृषिसुतं काश्यपं संशितव्रतम् ।

रथेन पातयामास श्रीमान् दृप्तस्तपस्विनम् ॥ ५ ॥

कहते हैं, पूर्वकालमें धनके अभिमानसे मतवाले हुए किसी धनी वैश्यने कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी ऋषिकुमार काश्यपको अपने रथसे धक्के देकर गिरा दिया ॥ ५ ॥

आर्तः स पतितः क्रुद्धस्त्यक्त्वाऽऽत्मानमथाब्रवीत् ।

मरिष्याम्यधनस्येह जीवितार्थो न विद्यते ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1168

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1168 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वे पीड़ासे कराहकर गिर पड़े और कुपित होकर आत्महत्याके लिये उद्यत हो इस प्रकार बोले — ‘ अब मैं प्राण दे दूँगा; क्योंकि इस संसारमें निर्धन मनुष्यका जीवन व्यर्थ है ' ॥ ६ ॥

तथा मुमूर्षमासीनमकूजन्तमचेतसम् ।

इन्द्रः शृगालरूपेण बभाषे लुब्धमानसम् ॥ ७ ॥

उन्हें इस प्रकार मरनेकी इच्छा लेकर बैठे मूर्च्छासे अचेत हो कुछ न बोलते और मन-ही- मन धनके लिये ललचाते देखकर इन्द्रदेव सियारका रूप धारण करके आये और उनसे इस प्रकार कहने लगे ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1169

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1169 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

महाभारत जय- काश्यप ब्राह्मणके प्रति गीदड़के रूपमें इन्द्रका उपदेश

पृष्ठ 1170

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1170 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इन्द्रको पहचाननेपर काश्यपद्वारा उनकी पूजा