05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1321–1330

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1321–1330

पृष्ठ 1321

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फिर कर्म सम्पन्न होता और उसका फल मिलता है ॥ ६ ॥

फलं कर्मात्मकं विद्यात् कर्म ज्ञेयात्मकं तथा ।

ज्ञेयं ज्ञानात्मकं विद्याज्ज्ञानं सदसदात्मकम् ॥ ७ ॥

इस प्रकार फलको कर्मस्वरूप समझे । कर्मको जाननेमें आनेवाले पदार्थोंका रूप समझे और ज्ञेयको ज्ञानरूप समझे तथा ज्ञानका स्वरूप कार्य और कारण जाने ॥ ७ ॥

ज्ञानानां च फलानां च ज्ञेयानां कर्मणां तथा ।

क्षयान्ते यत् फलं विद्याज्ज्ञानं ज्ञेयप्रतिष्ठितम् ॥ ८ ॥

ज्ञान, फल, ज्ञेय और कर्म– इन सबका अन्त होनेपर जो प्राप्तव्य फलरूपसे शेष रहता है, उसको ही तुम ज्ञेयमात्रमें व्याप्त होकर स्थित हुआ ज्ञानस्वरूप परमात्मा समझो ॥ ८ ॥

महद्धि परमं भूतं यत् प्रपश्यन्ति योगिनः ।

अबुधास्तं न पश्यन्ति ह्यात्मस्थं गुणबुद्धयः ॥ ९ ॥

उस परम महान् तत्त्वको योगिजन ही देख पाते हैं । विषयोंमें आसक्त अज्ञानी मनुष्य अपने भीतर ही विराजमान उस परब्रह्म परमात्माको नहीं देख सकते हैं ॥ ९ ॥

पृथिवीरूपतो रूपमपामिह महत्तरम् ।

अद्ध्यो महत्तरं तेजस्तेजसः पवनो महान् ॥ १० ॥

पवनाच्च महद् व्योम तस्मात् परतरं मनः ।

मनसो महती बुद्धिर्बुद्धेः कालो महान् स्मृतः ॥ ११ ॥

कालात् स भगवान् विष्णुर्यस्य सर्वमिदं जगत् ।

नादिर्न मध्यं नैवान्तस्तस्य देवस्य विद्यते ॥ १२ ॥

इस जगत्में पृथ्वीके रूपसे जलका ही रूप महान् है । जलसे तेज अति महान् है, तेजसे पवन महान् है, पवनसे आकाश महान् है, आकाशसे मन परतर है अर्थात् सूक्ष्म, श्रेष्ठ और महान् है । मनसे बुद्धि महान् है, बुद्धिसे काल अर्थात् प्रकृति महान् है और कालसे भगवान् विष्णु अनन्त, सूक्ष्म, श्रेष्ठ और महान् हैं । यह सारा जगत् उन्हींकी सृष्टि है । उन भगवान् विष्णुका न कोई आदि है, न मध्य है और न अन्त ही है ॥

अनादित्वादमध्यत्वादनन्तत्वाच्च सोऽव्ययः ।

अत्येति सर्वदुःखानि दुःखं ह्यन्तवदुच्यते ॥ १३ ॥

वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित होनेके कारण ही अविनाशी हैं; अतएव सम्पूर्ण दुःखोंसे परे हैं, क्योंकि विनाशशील वस्तु ही दुःखरूप हुआ करती है ॥ १३ ॥

तद् ब्रह्म परमं प्रोक्तं तद्धाम परमं पदम् ।

तद् गत्वा कालविषयाद् विमुक्ता मोक्षमाश्रिताः ॥ १४ ॥

अविनाशी विष्णु ही परब्रह्म कहे जाते हैं । वे ही परमधाम और परमपद हैं । उन्हें प्राप्त कर लेनेपर जीव कालके राज्यसे मुक्त हो मोक्षधाममें स्थित हो जाते हैं ॥

पृष्ठ 1322

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गुणेष्वेते प्रकाशन्ते निर्गुणत्वात् ततः परम् ।

निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथाऽऽनन्त्याय कल्पते ॥ १५ ॥

ये वध्य जीव गुणोंमें अर्थात् गुणोंके कार्यरूप शरीर आदिके सम्बन्धसे व्यक्त हो रहे हैं; परंतु परमात्मा निर्गुण होनेके कारण उनसे अत्यन्त परे हैं । जो निवृत्तिरूप धर्म ( निष्काम कर्म) है, वह अक्षय पद ( मोक्ष ) की प्राप्ति करानेमें समर्थ है ॥ १५ ॥

ऋचो यजूंषि सामानि शरीराणि व्यपाश्रिताः ।

जिह्वाग्रेषु प्रवर्तन्ते यत्नसाध्या विनाशिनः ॥ १६ ॥

ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद – ये अध्ययनकालमें शरीरके आश्रित रहते हैं और जिह्वाके अग्रभागपर प्रकट होते हैं; इसीलिये वे यत्नसाध्य और विनाशशील हैं अर्थात् इनका लुप्त होना स्वाभाविक है ॥ १६ ॥

न चैवमिष्यते ब्रह्म शरीराश्रयसम्भवम् ।

न यत्नसाध्यं तद् ब्रह्म नादिमध्यं न चान्तवत् ॥ १७ ॥

किंतु परब्रह्म परमात्मा इस प्रकार शरीरका आश्रय लेकर प्रकट होनेपर भी वेदाध्ययनकी भाँति यत्नसाध्य नहीं है; क्योंकि उनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है ॥

ऋचामादिस्तथा साम्नां यजुषामादिरुच्यते ।

अन्तश्चादिमतां दृष्टो न त्वादिर्ब्रह्मणः स्मृतः ॥ १८ ॥

वही ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदका आदि कहलाता है । जिनका कोई आदि होता है,

उन पदार्थोंका अन्त होता देखा गया है । ब्रह्मका कोई भी आदि नहीं बताया गया है ॥

अनादित्वादनन्तत्वात्तदनन्तमथाव्ययम् ।

अव्ययत्वाच्च निर्दुःखं द्वन्द्वाभावस्ततः परम् ॥ १ ९ ॥

वह अनादि और अनन्त होनेके कारण अक्षय और अविनाशी है । अविनाशी होनेसे ही दुःखरहित है । उसमें हर्ष और शोक आदि द्वन्द्वोंका अभाव है; अतएव वह सबसे परे है ॥ १ ९ ॥

अदृष्टतोऽनुपायाच्च प्रतिसंधेश्च कर्मणः ।

न तेन मर्त्याः पश्यन्ति येन गच्छन्ति तत् पदम् ॥ २० ॥

परंतु दुर्भाग्य, साधनहीनता और कर्मफलविषयक आसक्तिके कारण जिससे परमात्माकी प्राप्ति होती है, मनुष्य उस मार्गका दर्शन नहीं कर पाते हैं ॥ २० ॥

विषयेषु च संसर्गाच्छाश्वतस्य च दर्शनात् ।

मनसा चान्यदाकांक्षन् परं न प्रतिपद्यते ॥ २१ ॥

मनुष्योंकी विषयोंमें आसक्ति है; क्योंकि विषय- सुख सदा रहनेवाले हैं; ऐसी उनकी भावना है तथा वे अपने मनसे सांसारिक पदार्थोंको पानेकी इच्छा रखते हैं; इसीलिये उन्हें परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती है ॥ गुणान् यदिह पश्यन्ति तदिच्छन्त्यपरे जनाः ।

पृष्ठ 1323

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परं नैवाभिकांक्षन्ति निर्गुणत्वाद् गुणार्थिनः ॥ २२ ॥

संसारी मनुष्य इस संसारमें जिन- जिन विषयोंको देखते हैं, उन्हींको पाना चाहते हैं । सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हें पानेके लिये उनके मनमें इच्छा नहीं होती है; क्योंकि वे गुणार्थी ( विषयाभिलाषी ) होते हैं और परमात्मा निर्गुण ( गुणातीत ) हैं ॥ २२ ॥

गुणैर्यस्त्ववरैर्युक्तः कथं विद्यात् परान् गुणान् ।

अनुमानाद्धि गन्तव्यं गुणैरवयवैः परम् ॥ २३ ॥

भला, जो इन तुच्छ विषयोंमें फँसा हुआ है, वह परमदिव्य गुणोंको कैसे जान सकता है? जैसे धूमसे अग्निका अनुमान होता है, उसी प्रकार नित्यत्व आदि स्वरूपभूत दिव्य गुणोंद्वारा परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका दिग्दर्शन हो सकता है ॥ २३ ॥

सूक्ष्मेण मनसा विद्मो वाचा वक्तुं न शक्नुमः ।

मनो हि मनसा ग्राह्यं दर्शनेन च दर्शनम् ॥ २४ ॥

हम ध्यानद्वारा शुद्ध और सूक्ष्म हुए मनसे परमात्माके स्वरूपका अनुभव तो कर सकते हैं, किंतु वाणीद्वारा उसका वर्णन नहीं कर सकते; क्योंकि मनके द्वारा ही मानसिक विषयका ग्रहण हो सकता है और ज्ञानके द्वारा ही ज्ञेयको जाना जा सकता है ॥ २४ ॥

ज्ञानेन निर्मलीकृत्य बुद्धिं बुद्धया मनस्तथा ।

मनसा चेन्द्रियग्राममक्षरं प्रतिपद्यते ॥ २५ ॥

इसलिये ज्ञानके द्वारा बुद्धिको, बुद्धिके द्वारा मनको तथा मनके द्वारा इन्द्रिय-समुदायको निर्मल एवं शुद्ध करके अविनाशी परमात्माको प्राप्त किया जा सकता है ॥ बुद्धिप्रवीणो मनसा समृद्धो निराशिषं निर्गुणमभ्युपैति । परं त्यजन्तीह विलोड्यमाना हुताशनं वायुरिवेन्धनस्थम् ॥ २६ ॥

बुद्धिमें प्रवीण अर्थात् विशुद्ध और सूक्ष्म बुद्धिसे सम्पन्न एवं मानसिक बलसे युक्त हुआ पुरुष, समस्त इच्छासे अतीत निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त होता है । जैसे वायु काठमें रहनेवाले अदृश्य अग्निको बिना प्रज्वलित किये ही छोड़ देता है, वैसे ही कामनाओंसे विकल हुए पुरुष भी अपने शरीरके भीतर स्थित परमात्माका त्याग कर देते हैं अर्थात् उसे जानने और पानेकी चेष्टा नहीं करते ॥ गुणादाने विप्रयोगे च तेषां मनः सदा बुद्धिपरावराभ्याम् । अनेनैव विधिना सम्प्रवृत्तो गुणापाये ब्रह्म शरीरमेति ॥ २७ ॥

जब साधक साधनरूप गुणोंको धारण कर लेता है और उन सांसारिक पदार्थोंसे मनको हटा लेता है, तब उसका मन बुद्धिजन्य अच्छे- बुरे भावोंसे रहित होकर निरन्तर निर्मल रहता

पृष्ठ 1324

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1324 का मूल पृष्ठ
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है । इस प्रकार साधनमें लगा हुआ साधक जब गुणोंसे अतीत हो जाता है, तब ब्रह्मके स्वरूपका साक्षात् कर लेता है ॥ २७ ॥

अव्यक्तात्मा पुरुषो व्यक्तकर्मा

सोऽव्यक्तत्वं गच्छति ह्यन्तकाले ।

तैरेवायं चेन्द्रियैर्वर्धमानै- ग्लयद्भिर्वाऽऽवर्ततेऽकामरूपः ॥ २८ ॥

पुरुषका आत्मा ( वास्तविक स्वरूप) अव्यक्त है और उसके कर्म शरीररूपमें व्यक्त हैं । अतः वह अन्तकालमें अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है । परंतु कामनाओंसे तद्रूप हुआ वह जीव उन बढ़ी हुई विषयप्रबल इन्द्रियोंसे युक्त होकर पुनः संसारमें आ जाता है अर्थात् पुनः शरीरको धारण कर लेता है ॥ २८ ॥

सर्वैरयं चेन्द्रियैः सम्प्रयुक्तो देहं प्राप्तः पञ्चभूताश्रयः स्यात् । नासामर्थ्याद् गच्छति कर्मणेह हीनस्तेन परमेणाव्ययेन ॥ २ ९ ॥ सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे संयुक्त होकर यह देहधारी जीव पंचभूतस्वरूप शरीरके आश्रित हो जाता है । ज्ञान और उपासना आदिकी शक्तिके बिना वह केवल कर्मोंद्वारा परमात्माको नहीं पाता । अतः वह उस अविनाशी परमेश्वरसे वंचित रह जाता है ॥ २ ९ ॥ पृथ्व्यां नरः पश्यति नान्तमस्या ह्यन्तश्चास्या भविता चेति विद्धि । परं नयन्तीह विलोड्यमानं यथा प्लवं वायुरिवार्णवस्थम् ॥ ३० ॥

इस भूतलपर रहनेवाला मनुष्य यद्यपि इस पृथ्वीका अन्त नहीं देखता है तो भी कहीं-न- कहीं इसका अन्त अवश्य है, ऐसा समझो । जैसे समुद्रमें लहरोंद्वारा ऊपर- नीचे होते हुए जहाजको प्रवाहके अनुकूल बहती हुई हवा तटपर लगा देती है, उसी प्रकार संसारसमुद्रमें गोता लगाते हुए मनुष्यको अनुकूल वातावरण संसारसागरसे पार कर देता है ॥ दिवाकरो गुणमुपलभ्य निर्गुणो यथा भवेदपगतरश्मिमण्डलः । तथा हासी मुनिरिह निर्विशेषवान् स निर्गुणं प्रविशति ब्रह्म चाव्ययम् ॥ ३१ ॥

सम्पूर्ण जगत्का प्रकाशक सूर्य प्रकाशरूपी गुणको पाकर भी अस्ताचलको जाते समय अपने किरणसमूहको समेटकर जैसे निर्गुण हो जाता है, उसी प्रकार भेदभावसे रहित हुआ मुनि यहाँ अविनाशी निर्गुण ब्रह्ममें प्रवेश कर जाता है ॥ ३१ ॥

अनागतं सुकृतवतां परां गतिं

पृष्ठ 1325

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स्वयम्भुवं प्रभवनिधानमव्ययम् । सनातनं यदमृतमव्ययं ध्रुवं निचाय्य तत् परममृतत्वमश्नुते ॥ ३२ ॥

जो कहींसे आया हुआ नहीं है, नित्य विद्यमान है, पुण्यवानोंकी परमगति है, स्वयम्भू ( अजन्मा ) है, सबकी उत्पत्ति और प्रलयका स्थान है, अविनाशी एवं सनातन है, अमृत, अविकारी एवं अचल है, उस परमात्माका ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य परममोक्षको प्राप्त कर लेता है ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मनुबृहस्पतिसंवादे षडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मनु और बृहस्पतिका संवादरूप दो सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०६ ॥

पृष्ठ 1326

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सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका तथा उनकी महिमाका कथन युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ पुण्डरीकाक्षमच्युतम् ।

कर्तारमकृतं विष्णुं भूतानां प्रभवाप्ययम् ॥ १ ॥

नारायणं हृषीकेशं गोविन्दमपराजितम् ।

तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छामि केशवम् ॥ २ ।

युधिष्ठिरने कहा — भरतश्रेष्ठ! महाप्राज्ञ पितामह! कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले, सबके कर्ता, अकृत ( नित्य सिद्ध ), सर्वव्यापी तथा सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं । ये कभी किसीसे पराजित नहीं होते । ये ही नारायण, हृषीकेश, गोविन्द और केशव–इन नामोंसे भी विख्यात हैं । मैं इनके स्वरूपका तात्त्विक विवेचन सुनना चाहता हूँ ॥ भीष्म उवाच

श्रुतोऽयमर्थो रामस्य जामदग्न्यस्य जल्पतः ।

नारदस्य च देवर्षेः कृष्णद्वैपायनस्य च ॥ ३ ॥

भीष्मजी बोले — युधिष्ठिर! मैंने इस विषयका विवेचन जमदग्निनन्दन परशुराम, देवर्षि नारद तथा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीके मुँहसे सुना है ॥ ३ ॥

असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः ।

मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयन्त्यद्भुतं महत् ॥ ४ ॥

तात! असित, देवल, महातपस्वी वाल्मीकि और महर्षि मार्कण्डेयजी भी इन भगवान् गोविन्दके विषयमें बड़ी अद्भुत बातें कहा करते हैं ॥ ४ ॥

केशवो भरतश्रेष्ठ भगवानीश्वरः प्रभुः ।

पुरुषः सर्वमित्येव श्रूयते बहुधा विभुः ॥ ५ ॥

भरतश्रेष्ठ! भगवान् श्रीकृष्ण सबके ईश्वर और प्रभु हैं । श्रुतिमें ' पुरुष एवेद् सर्वम्’ * इत्यादि वचनोंद्वारा इन्हीं सर्वव्यापी श्रीकृष्णकी महिमाका नाना प्रकारसे निरूपण किया गया है ॥ ५ ॥

किं तु यानि विदुर्लोके ब्राह्मणाः शार्ङ्गधन्वनि ।

माहात्म्यानि महाबाहो शृणु तानि युधिष्ठिर ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1327

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महाबाहु युधिष्ठिर! जगत् में शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्णके जिन माहात्म्योंको ब्राह्मणलोग जानते हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ६ ॥

यानि चाहुर्मनुष्येन्द्र ये पुराणविदो जनाः ।

कर्माणि त्विह गोविन्दे कीर्तयिष्यामि तान्यहम् ॥ ७ ॥

नरेन्द्र! पुराणवेत्ता पुरुष गोविन्दकी जिन -जिन लीलाओं तथा चरित्रोंका वर्णन करते हैं, उनका मैं यहाँ वर्णन करूँगा ॥ ७ ॥

महाभूतानि भूतात्मा महात्मा पुरुषोत्तमः ।

वायुर्ज्योतिस्तथा चापः खं च गां चान्वकल्पयत् ॥ ८ ॥

सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा महात्मा पुरुषोत्तमने आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी– इन पाँच महाभूतोंकी रचना की है ॥ ८ ॥

स सृष्ट्वा पृथिवीं चैव सर्वभूतेश्वरः प्रभुः ।

अप्स्वेव भवनं चक्रे महात्मा पुरुषोत्तमः ॥ ९ ॥

सर्वभूतेश्वर, प्रभु, महात्मा पुरुषोत्तमने इस पृथ्वीकी सृष्टि करके जलमें ही अपना निवासस्थान बनाया ॥ ९ ॥

सर्वतेजोमयस्तस्मिन् शयानः पुरुषोत्तमः ।

सोऽग्रजं सर्वभूतानां संकर्षणमकल्पयत् ॥ १० ॥

आश्रयं सर्वभूतानां मनसेतीह शुश्रुम । उसमें शयन करते हुए सर्वतेजोमय पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने मनसे ही सम्पूर्ण प्राणियोंके अग्रज तथा आश्रय संकर्षणको उत्पन्न किया, यह हमने सुना है ॥ स धारयति भूतानि उभे भूतभविष्यती ॥ ११ ॥

ततस्तस्मिन् महाबाहौ प्रादुर्भूते महात्मनि ।

भास्करप्रतिमं दिव्यं नाभ्यां पद्ममजायत ॥ १२ ॥

वे संकर्षण ही समस्त भूतोंको धारण करते है तथा वे ही भूत और भविष्यके भी आधार हैं । उन महाबाहु महात्मा संकर्षणका प्रादुर्भाव होनेके पश्चात् श्रीहरिकी नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्यके समान प्रकाशमान था ॥ ११-१२ ॥

स तत्र भगवान् देवः पुष्करे भ्राजयन् दिशः ।

ब्रह्मा समभवत् तात सर्वभूतपितामहः ॥ १३ ॥

तात! उस कमलसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए समस्त प्राणियोंके पितामह देवस्वरूप भगवान् ब्रह्मा उत्पन्न हुए ॥ १३ ॥

तस्मिन्नपि महाबाहौ प्रादुर्भूते महात्मनि ।

तमसा पूर्वजो जज्ञे मधुर्नाम महासुरः ॥ १४ ॥

उन महाबाहु महात्मा ब्रह्माजीकी भी उत्पत्ति हो जानेपर वहाँ तमोगुणसे मधुनामक महान् असुर प्रकट हुआ, जो असुरोंका पूर्वज था ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1328

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तमुग्रमुग्रकर्माणमुग्रं कर्म समास्थितम् ।

ब्रह्मणोपचितिं कुर्वन् जघान पुरुषोत्तमः ॥ १५ ॥

उसका स्वभाव बड़ा ही उग्र था। वह सदा ही भयानक कर्म करनेवाला था । भयंकर कर्म करनेका निश्चय लेकर आये हुए उस असुरको पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीका हित करनेके लिये मार डाला ॥ १५ ॥

तस्य तात वधात् सर्वे देवदानवमानवाः ।

मधुसूदनमित्याहुरृषभं सर्वसात्वताम् ॥ १६ ॥

तात! उस मधुका वध करनेके कारण ही सम्पूर्ण देवता, दानव और मानव–इन सर्वसात्वतशिरोमणि श्रीकृष्णको मधुसूदन कहते हैं ॥ १६ ॥

ब्रह्मानुससृजे पुत्रान् मानसान् दक्षसप्तमान् ।

मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्यं पुलहं क्रतुम् ॥ १७ ॥

ब्रह्माजीने सात मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया, जिनमें दक्ष प्रजापति सातवें थे ( ये ही सबसे प्रथम उत्पन्न हुए थे ) । शेष छः पुत्रोंके नाम इस प्रकार हैं - मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु ॥ १७ ॥

मरीचिः कश्यपं तात पुत्रमग्रजमग्रजः ।

मानसं जनयामास तैजसं ब्रह्मवित्तमम् ॥ १८ ॥

तात! इन छः पुत्रोंमें सबसे बड़े थे मरीचि । उन्होंने अपने मनसे ही ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ कश्यप नामक श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया, जो बड़े ही तेजस्वी हैं ॥ १८ ॥

अङ्गुष्ठात् ससृजे ब्रह्मा मरीचेरपि पूर्वजम् ।

सोऽभवद् भरतश्रेष्ठ दक्षो नाम प्रजापतिः ॥ १ ९ ॥

भरतश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने दक्षको अपने अँगूठेसे उत्पन्न किया था । वे मरीचिसे भी बड़े थे । इसीलिये प्रजापतिके पदपर दक्ष प्रतिष्ठित हुए ॥ १ ९ ॥

तस्य पूर्वमजायन्त दश तिस्रश्च भारत ।

प्रजापतेर्दुहितरस्तासां ज्येष्ठाभवद् दितिः ॥ २० ॥

भरतनन्दन! प्रजापति दक्षके पहले तेरह कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जिनमें दिति सबसे बड़ी थी ॥ २० ॥

सर्वधर्मविशेषज्ञः पुण्यकीर्तिर्महायशाः ।

मारीचः कश्यपस्तात सर्वासामभवत् पतिः ॥ २१ ॥

तात! सम्पूर्ण धर्मोंके विशेषज्ञ, पुण्यकीर्ति, महायशस्वी मरीचिनन्दन कश्यप उन सब कन्याओंके पति हुए ॥ २१ ॥

उत्पाद्य तु महाभागस्तासामवरजा दश ।

ददौ धर्माय धर्मज्ञो दक्ष एव प्रजापतिः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1329

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1329 का मूल पृष्ठ
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तदनन्तर धर्मके ज्ञाता महाभाग प्रजापति दक्षने दस कन्याएँ और उत्पन्न कीं, जो पूर्वोक्त तेरह कन्याओंसे छोटी थीं। उन सबका विवाह उन्होंने धर्मके साथ कर दिया ॥ २२ ॥

धर्मस्य वसवः पुत्रा रुद्राश्चामिततेजसः ।

विश्वेदेवाश्च साध्याश्च मरुत्वन्तश्च भारत ॥ २३ ॥

भरतनन्दन! धर्मके वसु, अमित तेजस्वी रुद्र, विश्वेदेव, साध्य तथा मरुद्गण – ये बहुत-से पुत्र हुए ॥

अपराश्च यवीयस्यस्ताभ्योऽन्याः सप्तविंशतिः ।

सोमस्तासां महाभागः सर्वासामभवत् पतिः ॥ २४ ॥

इतरास्तु व्यजायन्त गन्धर्वांस्तुरगान् द्विजान् ।

गाश्च किंपुरुषान्मत्स्यानुद्भिज्जांश्च वनस्पतीन् ॥ २५ ॥

तत्पश्चात् दक्षके अन्य सत्ताईस कन्याएँ हुईं, जो पूर्वोक्त कन्याओंसे छोटी थीं । महाभाग सोम उन सबके पति हुए । इन सबके अतिरिक्त भी दक्षके बहुत- सी कन्याएँ हुईं, जिन्होंने गन्धर्वों, अश्वों, पक्षियों, गौओं, किम्पुरुषों, मत्स्यों, उद्भिज्जों और वनस्पतियोंको जन्म दिया ॥ २४-२५ ॥

आदित्यानदितिर्जज्ञे देवश्रेष्ठान् महाबलान् ।

तेषां विष्णुर्वामनोऽभूद् गोविन्दश्चाभवत् प्रभुः ॥ २६ ॥

अदितिने देवताओंमें श्रेष्ठ महाबली आदित्योंको उत्पन्न किया । उन आदित्योंमें सर्वव्यापी भगवान् गोविन्द भी वामनरूपसे प्रकट हुए ॥ २६ ॥

तस्य विक्रमणाच्चापि देवानां श्रीर्व्यवर्धत ।

दानवाश्च पराभूता दैतेयी चासुरी प्रजा ॥ २७ ॥

उनके विक्रमसे अर्थात् विराट्रूप धारणकर तीन पैडमें त्रिलोकीको नाप लेनेके कारण देवताओंकी श्रीवृद्धि हुई। दानव पराजित हुए तथा दैत्यों और असुरोंकी प्रजा भी पराभवको प्राप्त हुई ॥ २७ ॥

विप्रचित्तिप्रधानांश्च दानवानसृजद् दनुः ।

दितिस्तु सर्वानसुरान् महासत्त्वानजीजनत् ॥ २८ ॥

दनुने दानवोंको जन्म दिया, जिनमें विप्रचित्ति आदि दानव प्रमुख थे। दिति समस्त असुरों — महान् शक्तिशाली दैत्योंकी जननी हुई ॥ २८ ॥

अहोरात्रं च कालं च यथर्तु मधुसूदनः ।

पूर्वाह्नं चापराह्णं च सर्वमेवानुकल्पयत् ॥ २ ९ ॥

इन्हीं श्रीमधुसूदनने दिन - रात, ऋतुके अनुसार काल, पूर्वाह्न तथा अपराह्ण आदि समस्त काल - विभागकी व्यवस्था की ॥ २ ९ ॥ प्रध्याय सोऽसृजन्मेघांस्तथा स्थावरजङ्गमान् ।

पृष्ठ 1330

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पृथिवीं सोऽसृजद् विश्वां सहितां भूरितेजसा ॥ ३० ॥

उन्होंने ही अपने मनके संकल्पसे मेघों, स्थावर-जंगम प्राणियों तथा समस्त पदार्थोंसहित महान् तेजसे संयुक्त समूची पृथ्वीकी सृष्टि की ॥ ३० ॥

ततः कृष्णो महाभागः पुनरेव युधिष्ठिर ।

ब्राह्मणानां शतं श्रेष्ठं मुखादेवासृजत् प्रभुः ॥ ३१ ॥

युधिष्ठिर! तदनन्तर महाभाग श्रीकृष्णने पुनः सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मुखसे ही उत्पन्न किया ॥ ३१ ॥

बाहुभ्यां क्षत्रियशतं वैश्यानामूरुतः शतम् ।

पद्भयां शूद्रशतं चैव केशवो भरतर्षभ ॥ ३२ ॥

भरतश्रेष्ठ! इन केशवने सैकड़ों क्षत्रियोंको अपनी दोनों भुजाओंसे, सैकड़ों वैश्योंको अपनी जाँघोंसे तथा सैकड़ों शूद्रोंको दोनों पैरोंसे उत्पन्न किया ॥ ३२ ॥

स एवं चतुरो वर्णान् समुत्पाद्य महातपाः ।

अध्यक्षं सर्वभूतानां धातारमकरोत् स्वयम् ॥ ३३ ॥

इस प्रकार इन महातपस्वी श्रीहरिने चारों वर्णोंको उत्पन्न करके स्वयं ही धाताको सम्पूर्ण भूतोंका अध्यक्ष बनाया ॥ ३३ ॥

वेदविद्याविधातारं ब्रह्माणममितद्युतिम् ।

भूतमातृगणाध्यक्षं विरूपाक्षं च सोऽसृजत् ॥ ३४ ॥

वे ही वेदविद्याको धारण करनेवाले अमित तेजस्वी ब्रह्मा हुए । फिर श्रीहरिने भूतों और मातृगणोंके अध्यक्ष विरूपाक्ष ( रुद्र ) की रचना की ॥ ३४ ॥

शासितारं च पापानां पितॄणां समवर्तिनम् ।

असृजत् सर्वभूतात्मा निधिपं च धनेश्वरम् ॥ ३५ ॥

सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा श्रीहरिने पापियोंको दण्ड देनेवाले तथा पितरोंके समवर्ती यमराजको और सम्पूर्ण निधियोंके पालक धनाध्यक्ष कुबेरको उत्पन्न किया ॥ ३५ ॥

यादसामसृजन्नाथं वरुणं च जलेश्वरम् ।

वासवं सर्वदेवानामध्यक्षमकरोत् प्रभुः ॥ ३६ ॥

इसी प्रकार उन्होंने जल- जन्तुओंके स्वामी जलेश्वर वरुणकी सृष्टि की । उन्हीं भगवान्ने इन्द्रको सम्पूर्ण देवताओंका अध्यक्ष बनाया ॥ ३६ ॥

यावद्यावदभूच्छ्रद्धा देहं धारयितुं नृणाम् ।

तावत् तावदजीवंस्ते नासीद् यमकृतं भयम् ॥ ३७ ॥

पहले मनुष्योंको जितने दिनोंतक शरीर धारण करनेकी इच्छा होती, उतने दिनोंतक वे जीवित रहते थे । उन्हें यमराजका कोई भय नहीं होता था ॥ ३७ ॥

न चैषां मैथुनो धर्मो बभूव भरतर्षभ ।

संकल्पादेव चैतेषामपत्यमुपपद्यते ॥ ३८ ॥