05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1331–1340
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1331–1340
पृष्ठ 1331
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भरतश्रेष्ठ! पहलेके लोगोमें मैथुनधर्मकी प्रवृत्ति नहीं हुई थी । इन सबको संकल्पसे ही संतान पैदा होती थी ॥ ३८ ॥
ततस्त्रेतायुगे काले संस्पर्शाज्जायते प्रजा ।
न ह्यभून्मैथुनो धर्मस्तेषामपि जनाधिप ॥ ३ ९ ॥
तदनन्तर त्रेतायुगका समय आनेपर स्पर्श करनेमात्रसे संतानकी उत्पत्ति होने लगी ।
नरेश्वर! उस समयके लोगों में भी मैथुन धर्मका प्रचार नहीं हुआ था ॥ ३ ९ ॥
द्वापरे मैथुनो धर्मः प्रजानामभवन्नृप ।
तथा कलियुगे राजन् द्वन्द्वमापेदिरे जनाः ॥ ४० ॥
नरेश्वर! द्वापरयुगमें प्रजाके मनमें मैथुनधर्मका सूत्रपात हुआ । राजन्! उसी तरह कलियुगमें भी लोग मैथुनधर्मको प्राप्त होने लगे ॥ ४० ॥
एष भूतपतिस्तात स्वध्यक्षश्च तथोच्यते ।
निरपेक्षांश्च कौन्तेय कीर्तयिष्यामि तच्छृणु ॥ ४१ ॥
तात कुन्तीनन्दन! ये भगवान् श्रीकृष्ण ही भूतनाथ एवं सबके अध्यक्ष कहे जाते हैं ।
अब जो नरकका दर्शन करनेवाले हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ४१ ॥
दक्षिणापथजन्मानः सर्वे नरवरान्ध्रकाः ।
गुहाः पुलिन्दाः शबराश्चचुका मद्रकैः सह ॥ ४२ ॥
नरेश्वर! दक्षिण भारतमें जन्म लेनेवाले सभी आन्ध्र, गुह, पुलिन्द, शबर, चूचुक और मद्रक - ये सब - के - सब म्लेच्छ हैं ॥ ४२ ॥
उत्तरापथजन्मानः कीर्तयिष्यामि तानपि ।
यौनकाम्बोजगान्धाराः किराता बर्बरैः सह ॥ ४३ ॥
एते पापकृतस्तात चरन्ति पृथिवीमिमाम् । तात! अब उत्तर भारतमें जन्म लेनेवाले म्लेच्छोंका वर्णन करूँगा; यौन, काम्बोज, गान्धार, किरात और बर्बर – ये सब - के - सब पापाचारी होकर इस सारी पृथ्वीपर विचरते रहते हैं ॥ ४३ ॥
श्वपाकबलगृध्राणां सधर्माणो नराधिप ॥ ४४ ॥
नैते कृतयुगे तात चरन्ति पृथिवीमिमाम् । नरेश्वर! ये सब - के - सब चाण्डाल, कौए और गीधोंके समान आचार- विचारवाले हैं । ये सत्ययुगमें इस पृथ्वीपर नहीं विचरण करते हैं ॥ ४४३ ॥
त्रेताप्रभृत्ति वर्धन्ते ते जना भरतर्षभ ॥ ४५ ॥
ततस्तस्मिन् महाघोरे संध्याकाल उपस्थिते ।
राजानः समसज्जन्त समासाद्येतरेतरम् ॥ ४६ ॥
भरतश्रेष्ठ! त्रेतासे वे लोग बढ़ने लगे थे । तदनन्तर त्रेता और द्वापरका महाघोर संध्याकाल उपस्थित होनेपर राजालोग एक दूसरेसे टक्कर लेकर युद्धमें आसक्त
पृष्ठ 1332
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
हुए ॥ ४५-४६ ॥
एवमेष कुरुश्रेष्ठ प्रादुर्भूतो महात्मना ।
कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार महात्मा श्रीकृष्णने इस लोकको उत्पन्न किया है ॥ ४६३ ॥
( तपः स्वरूपो महादेवः कृष्णो देवकिनन्दनः ।
तस्य प्रसादाद् दुःखस्य नाशं प्राप्स्यसि मानद ॥
एकः कर्ता स कृष्णश्च ज्ञानिनां परमा गतिः । सबको मान देनेवाले नरेश! महान् देवता भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्ण तपस्यारूप ही हैं । उन्हींकी कृपासे तुम्हारे सारे दुःखोंका नाश हो जायगा । एकमात्र जगत्स्रष्टा श्रीकृष्ण ज्ञानियोंकी परमगति हैं ॥ इदमाश्रित्य देवेन्द्रो देवा रुद्रास्तथाश्विनौ ॥ स्वे स्वे पदे विविशिरे भुक्तिमुक्तिविदो जनाः । तपस्यारूप इन श्रीकृष्णका आश्रय लेकर देवराज इन्द्र अन्यान्य देवता, रुद्रगण, दोनों अश्विनीकुमार तथा भोग और मोक्षके तत्त्वको जाननेवाले महर्षि अपने - अपने पदपर प्रतिष्ठित रहते हैं ॥
श्रूयतामस्य सद्भावः सम्यग्ज्ञानं यथा तव ।
भूतानामन्तरात्मासौ स नित्यपदसंवृतः ॥
वे सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं तथा नित्य वैकुण्ठधाममें अपनी योगमायासे आवृत होकर निवास करते हैं । उनकी सत्ता और महत्ताको तुम श्रवण करो, जिससे तुम्हें श्रीकृष्णतत्त्वका ज्ञान हो जाय ॥
पुरा देवऋषिः श्रीमान् नारदः परमार्थवान् ।
चचार पृथिवीं कृत्स्नां तीर्थान्यनुचरन् प्रभुः ॥
पहलेकी बात है परमार्थसे सम्पन्न देवर्षि श्रीनारदजी भूमण्डलके सम्पूर्ण तीर्थोंमें विचरण करते हुए घूम रहे थे ॥
हिमवत्पादमाश्रित्य विचार्य च पुनः पुनः ।
स ददर्श ह्रदं तत्र पद्मोत्पलसमाकुलम् ॥
वे हिमालयके समीपवर्ती पर्वतपर बारंबार विचरण करके एक ऐसे स्थानपर गये, जहाँ उन्हें कमल और उत्पलसे भरा हुआ एक सरोवर दिखायी दिया ॥
ततः स्नात्वा महातेजा वाग्यतो नियतेन्द्रियः ।
तुष्टाव पुरुषव्याघ्रो जिज्ञासुश्च तदद्भुतम् ॥
तत्पश्चात् महातेजस्वी पुरुषप्रवर नारदने उस सरोवरमें मौनभावसे स्नान करके इन्द्रियोंको संयममें रखकर उस भगवान्के स्वरूपका अद्भुत रहस्य जाननेके लिये भगवान्की स्तुति की ॥ ततो वर्षशते पूर्णे भगवाँल्लोकभावनः ।
पृष्ठ 1333
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रादुश्चकार विश्वात्मा ऋषेः परमसौहृदात् ॥ तदनन्तर सौ वर्ष पूर्ण होनेपर लोकस्रष्टा विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि ऋषिके प्रति परम सौहार्दवश उनके सामने प्रकट हुए ॥
तमागतं जगन्नाथं सर्वकारणकारणम् ।
अखिलामरमौल्यङ्गरुक्मारुणपदद्वयम् ॥
वैनतेयपदस्पर्शकिणशोभितजानुकम् ।
पीताम्बरलसत्काञ्चीदामबद्धकटीतटम् ॥
श्रीवत्सवक्षसं चारुमणिकौस्तुभकन्धरम् ।
मन्दस्मितमुखाम्भोजं चलदायतलोचनम् ॥
नम्रचापानुकरणनम्रभ्रूयुगशोभितम् ।
नानारत्नमणिवज्रस्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥
इन्द्रनीलनिभाभं तं केयूरमुकुटोज्ज्वलम् ।
देवैरिन्द्रपुरोगैश्च ऋषिसङ्घैरभिष्टुतम् ॥
नारदो जयशब्देन ववन्दे शिरसा हरिम् । नारदजीने देखा, समस्त कारणोंके भी कारण भगवान् जगन्नाथ पधारे हैं । उनके युगल चरणारविन्द सम्पूर्ण देवताओंके सुवर्णमय मुकुटोंके कुंकुमसे रक्तवर्ण हो रहे हैं । गरुड़जीके ऊपर सवारी करनेसे उनके दोनों घुटनोंमें रगड़ पड़नेके कारण चिह्न बन गये हैं; जो उन घुटनोंकी शोभा बढ़ा रहे हैं । उनके श्यामसुन्दर अंगपर पीताम्बर शोभा पा रहा है और कटिप्रदेशमें किंकिणीकी लड़ें बँधी हुई हैं । वक्षःस्थलमें श्रीवत्सकी सुनहरी रेखा शोभा पाती है । गलेमें मनोहर कौस्तुभमणि अपना प्रकाश बिखेर रही है । मुखारविन्दपर मन्द-मन्द मुसकानकी मनोहर छटा छा रही है । विशाल नेत्र चंचल गतिसे इधर- उधर देख रहे हैं । झुके हुए दो धनुषोंकी भाँति बाँकी भौंहें उनके मुखमण्डलकी शोभा बढ़ा रही हैं । नाना प्रकारके रत्न, मणि और हीरोंसे जटित मकराकार कुण्डल जगमगा रहे हैं। उनकी अंगकान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है। बाँहोंमें केयूर तथा मस्तकपर मुकुटकी उज्ज्वल आभा छिटक रही है एवं इन्द्र आदि देवता और महर्षियोंके समुदाय उनकी स्तुति करते हैं । भगवान्की यह झाँकी देखकर जय-जयकार करते हुए नारदजीने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ||
ततः स भगवान् श्रीमान् मेघगम्भीरया गिरः ।
प्राहेशः सर्वभूतानां नारदं पतितं क्षितौ ॥
तदनन्तर नारदजीको पृथ्वीपर पड़ा देख सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी श्रीमान् भगवान् नारायणने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा ॥ श्रीभगवानुवाच
पृष्ठ 1334
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भद्रमस्तु ऋषे तुभ्यं वरं वरय सुव्रत ।
यत्ते मनसि सुव्यक्तमस्ति च प्रददामि तत् ॥
श्रीभगवान् बोले — उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवर्षे! तुम्हारा कल्याण हो । तुम कोई वर माँगो । तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हुई हो, उसे स्पष्ट बताओ । मैं उसे पूर्ण करूँगा ॥ भीष्म उवाच
स चेमं जयशब्देन प्रसीदेत्यातुरो मुनिः ।
प्रोवाच हृदि संरूढं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥
विवक्षितं जगन्नाथ मया ज्ञातं त्वयाच्युत ।
तत् प्रसीद हृषीकेश श्रोतुमिच्छामि तद्धरे ॥
भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! प्रेमसे आतुर हुए मुनिवर नारदने जय -जयकार करते हुए अपने हृदयमें नित्य विराजमान रहनेवाले शंख, चक्र और गदाधारी भगवान्से कहा —'प्रभो! प्रसन्न होइये । जगन्नाथ! अच्युत! हृषीकेश! हरे! मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, वह
आपको पहलेसे ही ज्ञात है । मैं उसीको सुनना चाहता हूँ । आप मुझपर कृपा करें' ॥
ततः स्मयन् महाविष्णुरभ्यभाषत नारदम् ।
निर्द्वन्द्वा निरहङ्काराः शुचयः शुद्धलोचनाः ॥
ते मां पश्यन्ति सततं तान् पृच्छ यदिहेच्छसि । तब मुसकराते हुए भगवान् महाविष्णुने नारदजीसे कहा- ' जो लोग शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित, अहंकारशून्य, पवित्र तथा निर्दोष दृष्टिवाले महात्मा हैं वे निरन्तर मेरे उस स्वरूपका साक्षात्कार करते हैं; अतः तुम यहाँ जो कुछ चाहते हो, उसके विषयमें उन्हीं महात्माओंके पास जाकर प्रश्न करो ॥
ये योगिनो महाप्राज्ञा मदंशा ये व्यवस्थिताः ।
तेषां प्रसादं देवर्षे मत्प्रसादमवैहि तत् ॥
' देवर्षे! जो लोग योगी और महाज्ञानी हैं; तथा जो मेरे अंशरूपसे स्थित हैं, उनके प्रसादको तुम'मेरा ही कृपाप्रसाद समझो' ॥
इत्युक्त्वा स जगामाथ भगवान् भूतभावनः ।
तस्माद् व्रज हृषीकेशं कृष्णं देवकिनन्दनम् ॥
ऐसा कहकर भूतभावन भगवान् विष्णु वहाँसे चले गये; अतः युधिष्ठिर! तुम भी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी शरणमें जाओ ॥
एतमाराध्य गोविन्दं गता मुक्तिं महर्षयः ।
एष कर्ता विकर्ता च सर्वकारणकारणम् ॥
पृष्ठ 1335
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इन भगवान् गोविन्दकी आराधना करके कितने ही महर्षि मुक्तिको प्राप्त हो गये हैं । ये ही जगत्के सृष्टिकर्ता, संहारकर्ता और समस्त कारणोंके भी कारण हैं ॥
मयाप्येतच्छ्रुतं राजन् नारदात्तु निबोध तत् ।
स्वयमेव समाचष्ट नारदो भगवान् मुनिः ॥
राजन्! मैंने भी यह बात नारदजीसे ही सुनी है । तुम भी उनके मुखसे सुन सकते हो ।
भगवान् नारदमुनिने स्वयं ही यह बात मुझसे कही थी ॥
समस्तसंसारविघातकारणं भजन्ति ये विष्णुमनन्यमानसाः । ते यान्ति सायुज्यमतीव दुर्लभं इतीव नित्यं हृदि वर्णयन्ति ॥ ) जो समस्त संसार- बन्धनकी निवृत्तिके कारणभूत भगवान् विष्णुकी अनन्य चित्तसे आराधना करते हैं, वे अत्यन्त दुर्लभ सायुज्य मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। यह बात सदा मेरे हृदयमें बनी रहती है तथा ऋषिलोग भी इसका वर्णन करते हैं ॥ देवं देवर्षिराचष्ट नारदः सर्वलोकदृक् ॥ ४७ ॥
सम्पूर्ण जगत्को देखनेवाले देवर्षि नारदने भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन किया था ॥ ४७ ॥
नारदोऽप्यथ कृष्णस्य परं मेने नराधिप ।
शाश्वतत्वं महाबाहो यथावद् भरतर्षभ ॥ ४८ ॥
महाबाहु भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! नारदजीने श्रीकृष्णके परम सनातन परमात्मभावको यथावत्रूपसे जाना और माना है ॥
एवमेष महाबाहुः केशवः सत्यविक्रमः ।
अचिन्त्यः पुण्डरीकाक्षो नैष केवलमानुषः ॥ ४ ९ ॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार ये सत्यपराक्रमी कमलनयन महाबाहु केशव अचिन्त्य परमेश्वर हैं ।
इन्हें केवल मनुष्य नहीं मानना चाहिये ॥ ४ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सर्वभूतोत्पत्तिकथने सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिविषयक दो सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०७ ॥
पुरुष ( श्रीकृष्ण) ही यह सब कुछ हैं ।
पृष्ठ 1336
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ब्रह्माके पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंके वंशका तथा प्रत्येक दिशामें निवास करनेवाले महर्षियोंका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
के पूर्वमासन् पतयः प्रजानां भरतर्षभ ।
के चर्षयो महाभागा दिक्षु प्रत्येकशः स्मृताः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालमें कौन -कौन- से लोग प्रजापति थे और प्रत्येक दिशामें किन- किन महाभाग महर्षियोंकी स्थिति मानी गयी है ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
श्रूयतां भरतश्रेष्ठ यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
प्रजानां पतयो येऽस्मिन् दिक्षु ये चर्षयः स्मृताः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा - भरतश्रेष्ठ! इस जगत्में जो प्रजापति रहे हैं तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें जिन - जिन ऋषियोंकी स्थिति मानी गयी है, उन सबको जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछते हो; मैं बताता हूँ, सुनो ॥ २ ॥
एकः स्वयम्भूर्भगवानाद्यो ब्रह्मा सनातनः ।
ब्रह्मणः सप्त वै पुत्रा महात्मानः स्वयम्भुवः ॥ ३ ॥
एकमात्र सनातन भगवान् स्वयम्भू ब्रह्मा सबके आदि हैं । स्वयम्भू ब्रह्माके सात महात्मा पुत्र बताये गये हैं ॥ ३ ॥
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
वसिष्ठश्च महाभागः सदृशो वै स्वयम्भुवा ॥ ४ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं— मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा महाभाग वसिष्ठ । ये सभी स्वयम्भू ब्रह्माके समान ही शक्तिशाली हैं ॥ ४ ॥
सप्तब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि सर्वानेव प्रजापतीन् ॥ ५ ॥
पुराणमें ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं । अब मैं समस्त प्रजापतियोंका वर्णन आरम्भ करता हूँ ॥ ५ ॥
अत्रिवंशसमुत्पन्नो ब्रह्मयोनिः सनातनः ।
प्राचीनबर्हिर्भगवांस्तस्मात् प्राचेतसो दश ॥ ६ ॥
अत्रिकुलमें उत्पन्न जो सनातन ब्रह्मयोनि भगवान् प्राचीनबर्हि हैं, उनसे प्राचेतस नामवाले दस प्रजापति उत्पन्न हुए ॥ ६ ॥
पृष्ठ 1337
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दशानां तनयस्त्वेको दक्षो नाम प्रजापतिः ।
तस्य द्वे नामनी लोके दक्षः क इति चोच्यते ॥ ७ ॥
उन दसोंके एकमात्र पुत्र दक्ष नामसे प्रसिद्ध प्रजापति हैं । उनके दो नाम बताये जाते हैं - ' दक्ष ' और ' क ' || ७ ||
मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तस्य द्वे नामनी स्मृते ।
अरिष्टनेमिरित्येके कश्यपेत्यपरे विदुः ॥ ८ ॥
मरीचिके पुत्र जो कश्यप हैं, उनके भी दो नाम माने गये हैं । कुछ लोग उन्हें अरिष्टनेमि कहते हैं और दूसरे लोग उन्हें कश्यपके नामसे जानते हैं ॥ ८ ॥
अत्रेश्चैवौरसः श्रीमान् राजा सोमश्च वीर्यवान् ।
सहस्रं यश्च दिव्यानां युगानां पर्युपासिता ॥ ९ ॥
अत्रिके औरस पुत्र श्रीमान् और बलवान् राजा सोम हुए, जिन्होंने सहस्र दिव्य युगोंतक भगवान्की उपासना की थी ॥ ॥
अर्यमा चैव भगवान् ये चास्य तनया विभो ।
एते प्रदेशाः कथिता भुवनानां प्रभावनाः ॥ १० ॥
प्रभो! भगवान् अर्यमा और उनके सभी पुत्र – ये प्रदेश ( आदेश देनेवाले शासक ) तथा प्रभावन ( उत्तम स्रष्टा ) कहे गये हैं ॥ १० ॥
शशबिन्दोश्च भार्याणां सहस्राणि दशाच्युत ।
एकैकस्यां सहस्रं तु तनयानामभूत् तदा ॥ ११ ॥
एवं शतसहस्राणां शतं तस्य महात्मनः ।
पुत्राणां च न ते कंचिदिच्छन्त्यन्यं प्रजापतिम् ॥ १२ ॥
धर्मसे विचलित न होनेवाले युधिष्ठिर! शशबिन्दुके दस हजार स्त्रियाँ थीं । उनमेंसे प्रत्येकके गर्भसे एक-एक हजार पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन महात्माके एक करोड़ पुत्र थे । वे उनके सिवा किसी दूसरे प्रजापतिकी इच्छा नहीं करते थे ॥ ११-१२ ॥
प्रजामाचक्षते विप्राः पुराणाः शाशबिन्दवीम् ।
स वृष्णिवंशप्रभवो महावंशः प्रजापतेः ॥ १३ ॥
प्राचीनकालके ब्राह्मण अधिकांश प्रजाकी उत्पत्ति शशबिन्दुसे ही बताते हैं ।
प्रजापतिका वह महान् वंश ही वृष्णिवंशका उत्पादक हुआ ॥ १३ ॥
एते प्रजानां पतयः समुद्दिष्टा यशस्विनः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि देवांस्त्रिभुवनेश्वरान् ॥ १४ ॥
युधिष्ठिर! ये सब यशस्वी प्रजापति बताये गये हैं । अब मैं तीनों लोकोंपर शासन करनेवाले देवताओंका परिचय दूँगा ॥ १४ ॥
भगोंऽशश्चार्यमा चैव मित्रोऽथ वरुणस्तथा ।
सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महाबलः ॥ १५ ॥
पृष्ठ 1338
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते ।
इत्येते द्वादशादित्याः कश्यपस्यात्मसम्भवाः ॥ १६ ॥
भग, अंश, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, महाबली विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु कहे गये हैं । ये बारह आदित्य हैं, जो कश्यप और अदितिके पुत्र हैं ॥ १५-१६ ॥
नासत्यश्चैव दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि ।
मार्तण्डस्यात्मजावेतावष्टमस्य महात्मनः ॥ १७ ॥
नासत्य और दस्र — ये दोनों अश्विनीकुमार बताये गये हैं । ये दोनों अष्टम आदित्य महात्मा सूर्यके पुत्र हैं ॥
तेच पूर्वं सुराश्चेति द्विविधाः पितरः स्मृताः ।
त्वष्टुश्चैवात्मजः श्रीमान् विश्वरूपो महायशाः ॥ १८ ॥
ये तथा पूर्वोक्त देवता -दो प्रकारके पितर माने गये हैं । त्वष्टाके पुत्र महायशस्वी श्रीमान् विश्वरूप हुए ॥
अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोऽथ रैवतः ।
हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः ॥ १ ९ ॥
सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः ।
पूर्वमेव महाभागा वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ २० ॥
अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सुरेश्वर, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित — ये ग्यारह रुद्र हैं । महाभाग आठ वसुओंके नाम पहले ही बताये गये हैं ॥ १ ९ -२० ॥
एत एवंविधा देवा मनोरेव प्रजापतेः ।
तेच पूर्वं सुराश्चेति द्विविधाः पितरः स्मृताः ॥ २१ ॥
इस प्रकार ये देवता प्रजापति मनुकी ही संतान हैं । वे तथा पूर्वोक्त देवता —ये दो प्रकारके पितर माने गये हैं ॥ २१ ॥
शीलयौवनतस्त्वन्यस्तथान्यः सिद्धसाध्ययोः ।
ऋभवो मरुतश्चैव देवानां चोदितो गणः ॥ २२ ॥
देवताओंमें एक वर्ग ऐसा है, जो सुन्दर शील- स्वभाव और अक्षय यौवनसे सम्पन्न है । दूसरा वर्ग सिद्धों और साध्योंका है । ऋभु और मरुत्– ये देवताओंके समुदायोंके नाम हैं ॥ २२ ॥
एवमेते समाम्नाता विश्वेदेवास्तथाश्विनौ ।
आदित्याः क्षत्रियास्तेषां विशश्च मरुतस्तथा ॥ २३ ॥
इसी प्रकार ये विश्वेदेव और अश्विनीकुमार भी देवताओंके गण माने गये हैं । इन देवताओंमें आदित्यगण क्षत्रिय और मरुद्गण वैश्य माने जाते हैं ॥ २३ ॥
पृष्ठ 1339
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अश्विनी तु स्मृती शूद्र तपस्युग्रे समास्थितौ ।
स्मृतास्त्वङ्गिरसो देवा ब्राह्मणा इति निश्चयः ॥ २४ ॥
उग्र तपस्यामें लगे हुए दोनों अश्विनीकुमारोंको शूद्र कहा जाता है । अंगिरा गोत्रवाले
सम्पूर्ण देवता ब्राह्मण माने गये हैं । यही विद्वानोंका निश्चय है ॥ २४ ॥
इत्येतत् सर्वदेवानां चातुर्वर्ण्य प्रकीर्तितम् ।
एतान् वै प्रातरुत्थाय देवान् यस्तु प्रकीर्तयेत् ॥ २५ ॥
स्वजादन्यकृताच्चैव सर्वपापात् प्रमुच्यते । इस प्रकार सम्पूर्ण देवताओंमें जो चार वर्ण हैं, उनका वर्णन किया गया । जो सबेरे उठकर इन देवताओंका कीर्तन करता है, वह स्वयं किये हुए तथा दूसरोंके संसर्गसे प्राप्त हुए सम्पूर्ण पापसमूहसे मुक्त हो जाता है ॥ २५३ ॥
यवक्रीतोऽथ रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू ॥ २६ ॥
औशिजश्चैव कक्षीवान् बलश्चाङ्गिरसः सुताः । यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, औशिज, कक्षीवान् और बल — ये अंगिराके पुत्र हैं ॥ २६३ ॥
ऋषिर्मेधातिथेः पुत्रः कण्वो बर्हिषदस्तथा ॥ २७ ॥
त्रैलोक्यभावनास्तात प्राच्यां सप्तर्षयस्तथा । तात! मेधातिथिके पुत्र कण्वमुनि, बर्हिषद तथा त्रिलोकीको उत्पन्न करनेमें समर्थ सप्तर्षिगण हैं, जो पूर्व दिशामें स्थित होते हैं ॥ २७३ ॥
उन्मुचो विमुचश्चैव स्वस्त्यात्रेयश्च वीर्यवान् ॥ २८ ॥
प्रमुचश्चेध्मवाहश्च भगवांश्च दृढव्रतः ।
मित्रावरुणयोः पुत्रस्तथागस्त्यः प्रतापवान् ॥ २ ९ ॥
एते ब्रह्मर्षयो नित्यमास्थिता दक्षिणां दिशम् । उन्मुच, विमुच, बलवान् स्वस्त्यात्रेय, प्रमुच, इध्मवाह, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मित्रावरुणके प्रतापी पुत्र भगवान् अगस्त्य – ये ब्रह्मर्षि सदा दक्षिण दिशामें रहते हैं ॥ २८-२९ ३ ॥ उषङ्गुः कवषो धौम्यः परिव्याधश्च वीर्यवान् ॥ ३० ॥
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः ।
अत्रेः पुत्रश्च भगवांस्तथा सारस्वतः प्रभुः ॥ ३१ ॥
एते चैव महात्मानः पश्चिमामाश्रिता दिशम् । उषंगु, कवष, धौम्य, शक्तिशाली परिव्याध, एकत, द्वित, त्रित तथा अत्रिके प्रभावशाली पुत्र भगवान् सारस्वत — ये महात्मा महर्षि पश्चिम दिशामें निवास करते हैं ॥ ३०-३१ ॥ आत्रेयश्च वसिष्ठश्च कश्यपश्च महानृषिः ॥ ३२ ॥
पृष्ठ 1340
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
गौतमोऽथ भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ।
तथैव पुत्रो भगवानृचीकस्य महात्मनः ॥ ३३ ॥
जमदग्निश्च सप्तैते उदीचीमाश्रिता दिशम् । आत्रेय, वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र तथा महात्मा ऋचीकके पुत्र भगवान् जमदग्नि- ये सात उत्तर दिशामें रहते हैं ॥ एते प्रतिदिशं सर्वे कीर्तितास्तिग्मतेजसः ॥ ३४ ॥
साक्षिभूता महात्मानो भुवनानां प्रभावनाः ।
एवमेते महात्मानः स्थिताः प्रत्येकशो दिशम् ॥ ३५ ॥
इस प्रकार प्रत्येक दिशामें रहनेवाले सम्पूर्ण तेजस्वी महर्षियोंका वर्णन किया गया । ये महात्मा सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करनेमें समर्थ एवं सबके साक्षी हैं । इनका हृदय बड़ा विशाल है । इस तरह ये प्रत्येक दिशामें निवास करते हैं ॥ ३४-३५ ॥ एतेषां कीर्तनं कृत्वा सर्वपापात् प्रमुच्यते ।
यस्यां यस्यां दिशि ह्येते तां दिशं शरणं गतः ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वस्तिमांश्च गृहान् व्रजेत् ॥ ३६ ॥
इन सबका गुणगान करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है । जिस -जिस दिशामें ये महर्षि रहते हैं, उस-उस दिशामें जानेपर जो मनुष्य इनकी शरण लेता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और कुशलपूर्वक अपने घरको पहुँच जाता है ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दिशास्वस्तिकं नाम अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दिशास्वस्तिक नामक दो सौ आठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २०८ ॥
Fard