05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1381–1390
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1381–1390
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परं तत् सर्वधर्मेभ्यस्तेन यान्ति परां गतिम् ॥ ७ ॥
यह जो ब्रह्मचर्य नामक गुण है, इसे तो शास्त्रोंमें ब्रह्मका स्वरूप ही बताया गया है । यह सब धर्मोंसे श्रेष्ठ है । ब्रह्मचर्यके पालनसे मनुष्य परमपदको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ७ ॥
लिङ्गसंयोगहीनं यच्छब्दस्पर्शविवर्जितम् ।
श्रोत्रेण श्रवणं चैव चक्षुषा चैव दर्शनम् ॥ ८ ॥
वाक्सम्भाषाप्रवृत्तं यत् तन्मनःपरिवर्जितम् ।
बुद्धया चाध्यवसीयीत ब्रह्मचर्यमकल्मषम् ॥ ९ ॥
वह परमपद पाँच प्राण, मन, बुद्धि और दसों इन्द्रियोंके संघातरूप शरीरके संयोगसे शून्य है, शब्द और स्पर्शसे रहित है । जो कानसे सुनता नहीं, आँखसे देखता नहीं और वाणीद्वारा कुछ बोलता नहीं है, तथा जो मनसे भी रहित है, वही वह परमपद या ब्रह्म है । मनुष्य बुद्धिके द्वारा उसका निश्चय करे और उसकी प्राप्तिके लिये निष्कलंक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करे ॥
सम्यग्वृत्तिर्ब्रह्मलोकं प्राप्नुयान्मध्यमः सुरान् ।
द्विजाग्ग्रो जायते विद्वान् कन्यसीं वृत्तिमास्थितः ॥ १० ॥
जो मनुष्य इस व्रतका अच्छी तरह पालन करता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त कर लेता है । मध्यम श्रेणीके ब्रह्मचारीको देवताओंका लोक प्राप्त होता है और कनिष्ठ श्रेणीका विद्वान् ब्रह्मचारी श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें जन्म लेता है ॥ १० ॥
सुदुष्करं ब्रह्मचर्यमुपायं तत्र मे शृणु ।
सम्प्रदीप्तमुदीर्णं च निगृह्णीयाद् द्विजो रजः ॥ ११ ॥
ब्रह्मचर्यका पालन अत्यन्त कठिन है । उसके लिये जो उपाय है, वह मुझसे सुनो । ब्राह्मणको चाहिये कि जब रजोगुणकी वृत्ति प्रकट होने और बढ़ने लगे तो उसे रोक दे ॥ ११ ॥
योषितां न कथा श्राव्या न निरीक्ष्या निरम्बराः ।
कथञ्चिद् दर्शनादासां दुर्बलानां विशेद्रजः ॥ १२ ॥
स्त्रियोंकी चर्चा न सुने । उन्हें नंगी अवस्थामें न देखे; क्योंकि यदि किसी प्रकार नग्नावस्थाओंमें उनपर दृष्टि चली जाती है तो दुर्बल हृदयवाले पुरुषोंके मनमें रजोगुण – राग या कामभावका प्रवेश हो जाता है ॥ १२ ॥
रागोत्पन्नश्चरेत् कृच्छ्रं महार्तिः प्रविशेदपः ।
मग्नः स्वप्ने च मनसा त्रिर्जपेदघमर्षणम् ॥ १३ ॥
-विकार उत्पन्न ब्रह्मचारीके मनमें यदि राग या काम- हो जाय तो वह आत्मशुद्धिके लिये कृच्छ्रव्रतका आचरण करे । यदि वीर्यकी वृद्धि होनेसे उसे कामवेदना अधिक सता रही हो तो वह नदी या सरोवरके जलमें प्रवेश करके
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स्नान करे । यदि स्वप्नावस्थामें वीर्यपात हो जाय तो जलमें गोता लगाकर मन - ही- मन तीन बार अघमर्षण सूक्तका जप करे ॥ १३ ॥
पाप्मानं निर्दहेदेवमन्तर्भूतरजोमयम् ।
ज्ञानयुक्तेन मनसा संततेन विचक्षणः ॥ १४ ॥
विवेकी पुरुषको इस प्रकार ज्ञानयुक्त एवं संयमशील मनके द्वारा अपने अन्तःकरणमें प्रकट हुए पापमय कामविकारको दग्ध कर देना चाहिये ॥ १४ ॥
कुणपामेध्यसंयुक्तं यद्वदच्छिद्रबन्धनम् ।
तद्वद् देहगतं विद्यादात्मानं देहबन्धनम् ॥ १५ ॥
मुर्देके समान अपवित्र एवं मलयुक्त नाड़ियाँ जिस प्रकार देहके भीतर दृढ़तापूर्वक बँधी हुई हैं, उसी प्रकार ( अज्ञानसे ) उसके भीतर जीवात्मा भी दृढ़ बन्धनमें बँधा हुआ है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १५ ॥
वातपित्तकफाद् रक्तं त्वङ्मांसं स्नायुमस्थि च ।
मज्जां देहं शिराजालैस्तर्पयन्ति रसा नृणाम् ॥ १६ ॥
भोजनसे प्राप्त हुए रस नाड़ीसमूहोंद्वारा संचरित होकर मनुष्योंके वात, पित्त, कफ, रक्त, त्वचा, मांस, स्नायु, अस्थि, चर्बी एवं सम्पूर्ण शरीरको तृप्त एवं पुष्ट करते हैं ॥ १६ ॥
दश विद्याद् धमन्योऽत्र पञ्चेन्द्रियगुणावहाः ।
याभिः सूक्ष्माः प्रतायन्ते धमन्योऽन्याः सहस्रशः ॥ १७ ॥
इस शरीरके भीतर उपर्युक्त वात, पित्त आदि दस वस्तुओंको वहन करनेवाली दस ऐसी नाड़ियाँ हैं जो पाँचों इन्द्रियोंके शब्द आदि गुणोंको ग्रहण करनेकी शक्ति प्राप्त करानेवाली हैं । उन्हींके साथ अन्य सहस्रों सूक्ष्म नाड़ियाँ सारे शरीरमें फैली हुई हैं ॥ १७ ॥
एवमेताः शिरा नद्यो रसोदा देहसागरम् ।
तर्पयन्ति यथाकालमापगा इव सागरम् ॥ १८ ॥
जैसे नदियाँ अपने जलसे यथासमय समुद्रको तृप्त करती रहती हैं, उसी प्रकार रसको बहानेवाली ये नाड़ीरूप नदियाँ इस देह सागरको तृप्त किया करती हैं ॥ १८ ॥
मध्ये च हृदयस्यैका शिरा तत्र मनोवहा ।
शुक्रं संकल्पजं नॄणां सर्वगात्रैर्विमुञ्चति ॥ १ ९ ॥
हृदयके मध्यभागमें एक मनोवहा नामकी नाड़ी है जो पुरुषोंके कामविषयक संकल्पके द्वारा सारे शरीरसे वीर्यको खींचकर बाहर निकाल देती है ॥ १ ९ ॥
सर्वगात्रप्रतायिन्यस्तस्या ह्यनुगताः शिराः ।
नेत्रयोः प्रतिपद्यन्ते वहन्त्यस्तैजसं गुणम् ॥ २० ॥
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उस नाड़ीके पीछे चलनेवाली और सम्पूर्ण शरीरमें फैली हुई अन्य नाड़ियाँ तैजस-गुणरूप ग्रहणकी शक्तिको वहन करती हुई नेत्रोंतक पहुँचती हैं ॥ २० ॥
पयस्यन्तर्हितं सर्पिर्यद्वन्निर्मथ्यते खजैः ।
शुक्रं निर्मथ्यते तद्वत् देहसंकल्पजैः खजैः ॥ २१ ॥
जिस प्रकार दूधमें छिपे हुए घीको मथानीसे मथकर अलग किया जाता है, उसी प्रकार देहस्थ संकल्प और इन्द्रियोंसे होनेवाले स्त्रियोंके दर्शन एवं स्पर्श आदिसे मथित होकर पुरुषका वीर्य बाहर निकल जाता है ॥ २१ ॥
स्वप्नेऽप्येवं यथाभ्येति मनः संकल्पजं रजः ।
शुक्रं संकल्पजं देहात् सृजत्यस्य मनोवहा ॥ २२ ॥
जैसे स्वप्नमें संसर्ग न होनेपर भी मनके संकल्पसे उत्पन्न हुआ स्त्रीविषयक राग उपस्थित हो जाता है, उसी प्रकार मनोवहा नाड़ी पुरुषके शरीरसे संकल्पजनित वीर्यका निःसारण कर देती है ॥ २२ ॥
महर्षिर्भगवानत्रिर्वेद तच्छ्रुक्रसम्भवम् ।
त्रिबीजमिन्द्रदैवत्यं तस्मादिन्द्रियमुच्यते ॥ २३ ॥
भगवान् महर्षि अत्रि वीर्यकी उत्पत्ति और गतिको जानते हैं, तथा ऐसा
कहते हैं कि मनोवहा नाड़ी, संकल्प और अन्न-ये तीन ही वीर्यके कारण हैं ।
इस वीर्यका देवता इन्द्र है; इसलिये इसे इन्द्रिय कहते हैं ॥ २३ ॥
ये वै शुक्रगतिं विद्युर्भूतसंकरकारिकाम् ।
विरागा दग्धदोषास्ते नाप्नुयुर्देहसम्भवम् ॥ २४ ॥
जो यह जानते हैं कि वीर्यकी गति ही सम्पूर्ण प्राणियोंमें वर्णसंकरता उत्पन्न करनेवाली है, वे विरक्त हो अपने सारे दोषोंको भस्म कर डालते हैं; इसलिये वे पुनः देहके बन्धनमें नहीं पड़ते ॥ २४ ॥
गुणानां साम्यमागम्य मनसैव मनोवहम् ।
देहकर्मा नुदन् प्राणानन्तकाले विमुच्यते ॥ २५ ॥
जो केवल शरीरकी रक्षाके लिये भोजन आदि कर्म करता है, वह अभ्यासके बलसे गुणोंकी साम्यावस्थारूप निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके मनके द्वारा मनोवहा नाड़ीको संयममें रखते हुए अन्तकालमें प्राणोंको सुषुम्णा मार्गसे ले जाकर संसार- बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥
भविता मनसो ज्ञानं मन एव प्रजायते ।
ज्योतिष्मद्विरजो नित्यं मन्त्रसिद्धं महात्मनाम् ॥ २६ ॥
उन महात्माओंके मनमें तत्त्वज्ञानका उदय हो जाता है; क्योंकि प्रणवोपासनासे परिशुद्ध हुआ उनका मन नित्य प्रकाशमय और निर्मल हो जाता है ॥ २६ ॥
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तस्मात् तदभिघाताय कर्म कुर्यादकल्मषम् ।
रजस्तमश्च हित्वेह यथेष्टां गतिमाप्नुयात् ॥ २७ ॥
अतः मनको वशमें करनेके लिये मनुष्यको निर्दोष एवं निष्काम कर्म करने चाहिये । ऐसा करनेसे वह रजोगुण और तमोगुणसे छूटकर इच्छानुसार गति प्राप्त कर लेता है ॥ २७ ॥
तरुणाधिगतं ज्ञानं जरादुर्बलतां गतम् ।
विपक्वबुद्धिः कालेन आदत्ते मानसं बलम् ॥ २८ ॥
युवावस्थामें प्राप्त किया हुआ ज्ञान प्रायः बुढ़ापेमें क्षीण हो जाता है, परंतु परिपक्वबुद्धि मनुष्य समयानुसार ऐसा मानसिक बल प्राप्त कर लेता है, जिससे उसका ज्ञान कभी क्षीण नहीं होता ॥ २८ ॥
सुदुर्गमिव पन्थानमतीत्य गुणबन्धनम् ।
यथा पश्येत् तथा दोषानतीत्यामृतमश्नुते ॥ २९ ॥
वह परिपक्व बुद्धिवाला मनुष्य अत्यन्त दुर्गम मार्गके समान गुणोंके बन्धनको पार करके जैसे - जैसे अपने दोष देखता है, वैसे - ही- वैसे उन्हें लाँघकर अमृतमय परमात्मपदको प्राप्त कर लेता है ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेयाध्यात्मकथने चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसम्बन्धी अध्यात्मकथनविषयक दो सौ चौदहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २१४ ॥
१. ‘ कृच्छ्र ’ शब्दसे प्राजापत्यकृच्छ्रका ग्रहण किया जाता है । प्राजापत्यकृच्छ्रका विधान इस प्रकार है- त्र्यहं प्रातत्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् । त्र्यहं परं च नाश्नीयात् प्राजापत्योऽयमुच्यते ॥ (मनुस्मृति ११।२१२ ) तीन दिन केवल प्रातःकाल, तीन दिन केवल सायंकाल तथा तीन दिनतक केवल अयाचित अन्नका भोजन करे । फिर तीन दिनतक उपवास रखे । इसे प्राजापत्यकृच्छ्र कहा जाता है । २. अघमर्षणसूक्त निम्नलिखित है— ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः । समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः ।
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पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश भीष्म उवाच
दुरन्तेष्विन्द्रियार्थेषु सक्ताः सीदन्ति जन्तवः ।
ये त्वसक्ता महात्मानस्ते यान्ति परमां गतिम् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इन्द्रियोंके विषयोंका पार पाना बहुत कठिन है । जो प्राणी उनमें आसक्त होते हैं वे दुःख भोगते रहते हैं; और जो महात्मा उनमें आसक्त नहीं होते वे परम गतिको प्राप्त होते हैं ॥ १ ॥
जन्ममृत्युजरादुःखैर्व्याधिभिर्मानसक्लमैः ।
दृष्ट्वैव संततं लोकं घटेन्मोक्षाय बुद्धिमान् ॥ २ ॥
यह जगत् जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके दुःखों, नाना प्रकारके रोगों तथा मानसिक चिन्ताओंसे व्याप्त है; ऐसा समझकर बुद्धिमान् पुरुषको मोक्षके लिये ही प्रयत्न करना चाहिये ॥ २ ॥
वाङ्मनोभ्यां शरीरेण शुचिः स्यादनहंकृतः ।
प्रशान्तो ज्ञानवान् भिक्षुर्निरपेक्षश्चरेत् सुखम् ॥ ३ ॥
वह मन, वाणी और शरीरसे पवित्र रहकर अहंकारशून्य, शान्तचित्त, ज्ञानवान् एवं निःस्पृह होकर भिक्षावृत्तिसे निर्वाह करता हुआ सुखपूर्वक विचरे ॥ ३ ॥
अथवा मनसः सङ्गं पश्येद् भूतानुकम्पया ।
तत्राप्युपेक्षां कुर्वीत ज्ञात्वा कर्मफलं जगत् ॥ ४ ॥
अथवा प्राणियोंपर दया करते रहने से भी मोहवश उनके प्रति मनमें आसक्ति हो जाती है । इस बातपर दृष्टिपात करे और यह समझकर कि सारा जगत् अपने - अपने कर्मोंका फल भोग रहा है, सबके प्रति उपेक्षाभाव रखे ॥ ४ ॥
यत् कृतं स्याच्छुभं कर्म पापं वा यदि वाश्नुते ।
तस्माच्छुभानि कर्माणि कुर्याद् वा बुद्धिकर्मभिः ॥ ५ ॥
मनुष्य शुभ या अशुभ जैसा भी कर्म करता है उसका फल उसे स्वयं ही भोगना पड़ता है; इसलिये मन, बुद्धि और क्रियाके द्वारा सदा शुभ कर्मोंका ही आचरण करे ॥ ५ ॥
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतेषु चार्जवम् ।
क्षमा चैवाप्रमादश्च यस्यैते स सुखी भवेत् ॥ ६ ॥
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अहिंसा, सत्यभाषण, समस्त प्राणियोंके प्रति सरलतापूर्ण बर्ताव, क्षमा तथा प्रमादशून्यता – ये गुण जिस पुरुषमें विद्यमान हों, वही सुखी होता है ॥ ६ ॥
यश्चैनं परमं धर्मं सर्वभूतसुखावहम् ।
दुःखान्निःसरणं वेद सर्वज्ञः स सुखी भवेत् ॥ ७ ॥
जो मनुष्य इस अहिंसा आदि परम धर्मको समस्त प्राणियोंके लिये सुखद और दुःखनिवारक जानता है, वही सर्वज्ञ है और वही सुखी होता है ॥ ७ ॥
तस्मात् समाहितं बुद्धया मनो भूतेषु धारयेत् ।
नापध्यायेन्न स्पृहयेन्नाबद्धं चिन्तयेदसत् ॥ ८ ॥
अथामोघप्रयत्नेन मनो ज्ञाने निवेशयेत् ।
वाचामोघप्रयासेन मनोज्ञं तत् प्रवर्तते ॥ ९ ॥
इसलिये बुद्धिके द्वारा मनको समाहित करके समस्त प्राणियोंमें स्थित परमात्मामें लगावे । किसीका अहित न सोचे, असम्भव वस्तुकी कामना न करे, मिथ्या पदार्थोंकी चिन्ता न करे और सफल प्रयत्न करके मनको ज्ञानके साधनमें लगा दे । वेदान्त - वाक्योंके श्रवण तथा सुदृढ़ प्रयत्नसे उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होती है ॥
विवक्षता च सद्वाक्यं धर्मं सूक्ष्ममवेक्षता ।
सत्यां वाचमहिंस्रां च वदेदनपवादिनीम् ॥ १० ॥
कल्कापेतामपरुषामनृशंसामपैशुनाम् ।
ईदृगल्पं च वक्तव्यमविक्षिप्तेन चेतसा ॥ ११ ॥
जो सूक्ष्म धर्मको देखता और उत्तम वचन बोलना चाहता हो, उसको ऐसी बात कहनी चाहिये जो सत्य होनेके साथ ही हिंसा और परनिन्दासे रहित हो । जिसमें शठता, कठोरता, क्रूरता और चुगली आदि दोषोंका सर्वथा अभाव हो, ऐसी वाणी भी बहुत थोड़ी मात्रामें और सुस्थिर चित्तसे बोलनी चाहिये ॥ १०-११ ॥
वाक्प्रबद्धो हि संसारो विरागाद् व्याहरेद् यदि ।
बुद्धयाप्यनुगृहीतेन मनसा कर्म तामसम् ॥ १२ ॥
संसारका सारा व्यवहार वाणीसे ही बँधा हुआ है, अतः सदा उत्तम वाणी ही बोले और यदि वैराग्य हो तो बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके अपने किये हुए हिंसादि तामस कर्मोंको भी लोगोंसे कह दे ( क्योंकि प्रकाशित कर देनेसे पापकी मात्रा घट जाती है ) ॥ १२ ॥
भूतैर्हि करणैः कर्मणि प्रतिपद्यते ।
स दुःखं प्राप्य लोकेऽस्मिन् नरकायोपपद्यते ।
तस्मान्मनोवाक्शरीरैराचरेद् धैर्यमात्मनः ॥ १३ ॥
रजोगुणसे प्रभावित हुई इन्द्रियोंकी प्रेरणासे मनुष्य विषयभोगरूप कर्मोंमेंप्रवृत्त होता है और इस लोकमें दुःख भोगकर अन्तमें नरकगामी होता है । अतः मन, वाणी और शरीरद्वारा ऐसा कार्य करे जिससे अपनेको धैर्य प्राप्त हो ॥ १३ ॥
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प्रकीर्णमेष भारं हि यद्वद् धार्येत दस्युभिः ।
प्रतिलोमां दिशं बुद्ध्वा संसारमबुधास्तथा ॥ १४ ॥
जैसे चोर या लुटेरे किसीकी भेड़को मारकर उसे कंधेपर उठाये हुए जबतक भागते हैं तबतक उन्हें सारी दिशाओंमें पकड़े जानेका भय बना रहता है; और जब मार्गको प्रतिकूल समझकर उस भेड़के बोझको अपने कंधेसे उतार फेंकते हैं तब अपनी अभीष्ट दिशाको सुखपूर्वक चले जाते हैं । उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य जबतक सांसारिक कर्मरूप बोझको ढोते हैं तबतक उन्हें सर्वत्र भय बना रहता है; और जब उसे त्याग देते हैं, तब शान्तिके भागी हो जाते हैं ॥ १४ ॥
तमेव च यथा दस्युः क्षिप्त्वा गच्छेच्छिवां दिशम् ।
तथा रजस्तमः कर्माण्युत्सृज्य प्राप्नुयाच्छुभम् ॥ १५ ॥
जैसे चोर या डाकू जब उस चोरीके मालका बोझ उतार फेंकता है तब जहाँ उसे सुख मिलनेकी आशा होती है, उस दिशामें अनायास चला जाता है । उसी प्रकार मनुष्य राजस और तामस कर्मोंको त्यागकर शुभ गति प्राप्त कर लेता है ॥ १५ ॥
निःसंदिग्धमनीहो वै मुक्तः सर्वपरिग्रहैः ।
विविक्तचारी लघ्वाशी तपस्वी नियतेन्द्रियः ॥ १६ ॥
ज्ञानदग्धपरिक्लेशः प्रयोगरतिरात्मवान् ।
निष्प्रचारेण मनसा परं तदधिगच्छति ॥ १७ ॥
जो सब प्रकारके संग्रहसे रहित, निरीह, एकान्त- वासी, अल्पाहारी, तपस्वी और जितेन्द्रिय है, जिसके सम्पूर्ण क्लेश ज्ञानाग्निसे दग्ध हो गये हैं; तथा जो योगानुष्ठानका प्रेमी और मनको वशमें रखनेवाला है, वह अपने निश्चल चित्तके द्वारा उस परब्रह्म परमात्माको निःसंदेह प्राप्त कर लेता है ॥ १६-१७ ॥
धृतिमानात्मवान् बुद्धिं निगृह्णीयादसंशयम् ।
मनो बुद्धया निगृह्णीयाद् विषयान्मनसाऽऽत्मनः ॥ १८ ॥
बुद्धिमान् एवं धीर पुरुषको चाहिये कि वह बुद्धिको निश्चय ही अपने वशमें करे; फिर बुद्धिके द्वारा मनको और मनके द्वारा अपनी इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे रोककर अपने अधीन करे ॥ १८ ॥
निगृहीतेन्द्रियस्यास्य कुर्वाणस्य मनो वशे ।
देवतास्तत् प्रकाशन्ते हृष्टा यान्ति तमीश्वरम् ॥ १ ९ ॥
इस प्रकार जिसने इन्द्रियोंको वशमें करके मनको अपने अधीन कर लिया है, उस अवस्थामें उसकी इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवता प्रसन्नतासे प्रकाशित होने लगते हैं; और ईश्वरकी ओर प्रवृत्त हो जाते हैं ॥ १ ९ ॥
ताभिः संयुक्तमनसो ब्रह्म तत् सम्प्रकाशते ।
शनैश्चोपगते सत्त्वे ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २० ॥
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उन इन्द्रियदेवताओंसे जिसका मन संयुक्त हो गया है, उसके अन्तःकरणमें परब्रह्म परमात्मा प्रकाशित हो उठता है; फिर धीरे- धीरे सत्त्वगुण प्राप्त होनेपर वह मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ २० ॥
अथवा न प्रवर्तेत योगतन्त्रैरुपक्रमेत् ।
येन तन्त्रयतस्तन्त्रं वृत्तिः स्यात् तत् तदाचरेत् ॥ २१ ॥
अथवा यदि पूर्वोक्तरूपसे उसके भीतर ब्रह्म प्रकाशित न हो तो वह योगी योगप्रधान उपायोंद्वारा अभ्यास आरम्भ करे । जिस हेतुसे योगाभ्यास करते हुए योगीकी ब्रह्ममें ही स्थिति हो, वह उसी - उसीका अनुष्ठान करे ॥ २१ ॥
कणकुल्माषपिण्याकशाकयावकसक्तवः ।
तथा मूलफलं भैक्ष्यं पर्यायेणोपयोजयेत् ॥ २२ ॥
अन्नके दाने, उड़द, तिलकी खली, साग, जौकी लप्सी, सत्तू, मूल और फल जो कुछ भी भिक्षामें मिल जाय, क्रमशः उसी अन्नसे योगी अपने जीवनका निर्वाह करे ॥ २२ ॥
आहारनियमं चैव देशे काले च सात्त्विकम् ।
तत् परीक्ष्यानुवर्तेत तत्प्रवृत्त्यनुपूर्वकम् ॥ २३ ॥
देश और कालके अनुसार सात्त्विक आहार ग्रहण करनेका नियम रखे । उस आहारके दोष - गुणकी परीक्षा करके यदि वह योगसिद्धिके अनुकूल हो तो उसे उपयोगमें ले ॥ २३ ॥
प्रवृत्तं नोपरुन्धेत शनैरग्निमिवेन्धयेत् ।
ज्ञानान्वितं तथा ज्ञानमर्कवत् सम्प्रकाशते ॥ २४ ॥
साधन आरम्भ कर देनेपर उसे बीचमें न रोके । जैसे आग धीरे- धीरे तेज की जाती है, उसी प्रकार ज्ञानके साधनको शनैः - शनैः उद्दीपित करे । ऐसा करनेसे ज्ञान सूर्यके समान प्रकाशित होने लगता है ॥
ज्ञानाधिष्ठानमज्ञानं त्रीँल्लोकानधितिष्ठति ।
विज्ञानानुगतं ज्ञानमज्ञानेनापकृष्यते ॥ २५ ॥
अज्ञानका अधिष्ठान भी ज्ञान ही है जो तीनों लोकोंमें व्याप्त है । अज्ञानके द्वारा विज्ञानयुक्त ज्ञानका ह्रास होता है ॥ २५ ॥
पृथक्त्वात् सम्प्रयोगाच्च नासूयुर्वेद शाश्वतम् ।
स तयोरपवर्गज्ञो वीतरागो विमुच्यते ॥ २६ ॥
शास्त्रोंमें कहीं जीवात्मा और परमात्माकी पृथक्ताका प्रतिपादन करनेवाले वचन उपलब्ध होते हैं और कहीं उनकी एकताका । यह परस्पर विरोध देखकर दोषदृष्टि न करते हुए सनातन ज्ञानको प्राप्त करे । जो उन दोनों प्रकारके वचनोंका तात्पर्य समझकर मोक्षके तत्त्वको जान लेता है, वह वीतराग पुरुष संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २६ ॥
ततो वीतजरामृत्युर्ज्ञात्वा ब्रह्म सनातनम् ।
अमृतं तदवाप्नोति यत् तदक्षरमव्ययम् ॥ २७ ॥
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ऐसा पुरुष जरा और मृत्युका उल्लंघनकर सनातन ब्रह्मको जानकर उस अक्षर, अविकारी एवं अमृत ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेयाध्यात्मकथने पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णनविषयक दो सौ पंद्रहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २१५ ॥
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षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः स्वप्न और सुषुप्ति - अवस्थामें मनकी स्थिति तथा गुणातीत ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय भीष्म उवाच
निष्कल्मषं ब्रह्मचर्यमिच्छता चरितुं सदा ।
निद्रा सर्वात्मना त्याज्या स्वप्नदोषानवेक्षता ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! सदा निष्कलंक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको स्वप्नके दोषोंपर दृष्टि रखते हुए सब प्रकारसे निद्राका परित्याग कर देना चाहिये ॥ १ ॥
स्वप्ने हि रजसा देही तमसा चाभिभूयते ।
देहान्तरमिवापन्नश्चरत्युपगतस्पृहः ॥ २ ॥
स्वप्नमें जीवको प्रायः रजोगुण और तमोगुण दबा लेते हैं । वह कामनायुक्त होकर दूसरे शरीरको प्राप्त हुएकी भाँति विचरता है ॥ २ ॥
ज्ञानाभ्यासाज्जागरणं जिज्ञासार्थमनन्तरम् ।
विज्ञानाभिनिवेशात्तु स जागर्त्यनिशं सदा ॥ ३ ॥
मनुष्यमें पहले तो ज्ञानका अभ्यास करनेसे जागनेकी आदत होती है, तत्पश्चात् विचार करनेके लिये जागना अनिवार्य हो जाता है तथा जो तत्त्वज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह तो ब्रह्ममें निरन्तर जागता ही रहता है ॥ ३ ॥
अत्राह को न्वयं भावः स्वप्ने विषयवानिव ।
प्रलीनैरिन्द्रियैर्देही वर्तते देहवानिव ॥ ४ ॥
यहाँ पूर्व पक्ष यह प्रश्न उठाता है कि स्वप्नमें जो यह देहादि पदार्थ दिखायी देता है, क्या है? ( सत्य है या असत्य? यदि कहें कि सत्य है तो ठीक नहीं; क्योंकि ) स्वप्नावस्थामें सब कुछ विषयोंसे सम्पन्न- सा दिखायी देनेपर भी वास्तवमें वहाँ कोई विषय नहीं होता, सारी इन्द्रियाँ उस समय मनमें विलीन हो जाती हैं । उन्हीं इन्द्रियोंसे देहाभिमानी जीव देहधारी-जैसा बर्ताव करता है । और यदि कहें कि स्वप्नके पदार्थ असत्य हैं तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जो सर्वथा असत् है, ( जैसे आकाशका पुष्प) उसकी प्रतीति ही नहीं होती ॥ ४ ॥
अत्रोच्यते यथा ह्येतद् वेद योगेश्वरो हरिः ।
तथैतदुपपन्नार्थं वर्णयन्ति महर्षयः ॥ ५ ॥
अब यहाँ सिद्धान्तका प्रतिपादन किया जाता है । यह स्वप्न-जगत् जैसा है, उसे ठीक-ठीक योगेश्वर श्रीहरि ही जानते हैं; पर जैसा श्रीहरि जानते हैं, वैसा ही महर्षि भी उसका