श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1371–1380

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1371–1380

पृष्ठ 1371

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जैसे लोहयुक्त सुवर्ण आगमें पकाकर शुद्ध किये बिना अपने स्वरूपसे प्रकाशित नहीं होता, उसी प्रकार चित्तके राग आदि दोषोंका नाश हुए बिना उसमें ज्ञानस्वरूप आत्मा प्रकाशित नहीं होता है ॥ ६ ॥

यश्चाधर्मं चरेल्लोभात् कामक्रोधावनुप्लवन् ।

धर्म्यं पन्थानमाक्रम्य सानुबन्धो विनश्यति ॥ ७ ॥

जो लोभवश काम-क्रोधका अनुसरण करते हुए धर्ममार्गका उल्लंघन करके अधर्मका आचरण करने लगता है, वह सगे - सम्बन्धियोंसहित नष्ट हो जाता है ॥

शब्दादीन् विषयांस्तस्मान्न संरागादयं व्रजेत् ।

क्रोधो हर्षो विषादश्च जायन्तेह परस्परात् ॥ ८ ॥

अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको कभी रागके वशमें होकर शब्द आदि विषयोंका सेवन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वैसा करनेपर हर्ष, क्रोध और विषाद–इन सात्त्विक, राजस और तामस भावोंकी एक- दूसरेसे उत्पत्ति होती है ॥ ८ ॥

पञ्चभूतात्मके देहे सत्त्वे राजसतामसे ।

कमभिष्टुवते चायं कं वाऽऽक्रोशति किं वदन् ॥ ९ ॥

यह शरीर पाँच भूतोंका विकार है और सत्त्व, रज एवं तम- तीन गुणोंसे युक्त है। इसमें रहकर यह निर्विकार आत्मा क्या कहकर किसकी निन्दा और किसकी स्तुति करे ॥ ९ ॥

स्पर्शरूपरसाद्येषु सङ्गं गच्छन्ति बालिशाः ।

नावगच्छन्त्यविज्ञानादात्मानं पार्थिवं गुणम् ॥ १० ॥

अज्ञानी पुरुष स्पर्श, रूप और रस आदि विषयोंमें आसक्त होते हैं । वे विशिष्ट ज्ञानसे रहित होनेके कारण यह नहीं जानते हैं कि यह शरीर पृथ्वीका विकार है ॥ १० ॥

मृन्मयं शरणं यद्वन्मृदैव परिलिप्यते ।

पार्थिवोऽयं तथा देहो मृद्विकारान्न नश्यति ॥ ११ ॥

जैसे मिट्टीका घर मिट्टीसे ही लीपा जाता है तो सुरक्षित रहता है, उसी प्रकार यह पार्थिव शरीर पृथ्वीके ही विकारभूत अन्न और जलके सेवनसे ही नष्ट नहीं होता है ॥ ११ ॥

मधु तैलं पयः सर्पिर्मांसानि लवणं गुडः ।

धान्यानि फलमूलानि मृद्विकाराः सहाम्भसा ॥ १२ ॥

मधु, तेल, दूध, घी, मांस, लवण, गुड़, धान्य, फल- मूल और जल - ये सभी पृथ्वीके ही विकार हैं ॥ १२ ॥

यद्वत् कान्तारमातिष्ठन्नौत्सुक्यं समनुव्रजेत् ।

ग्राम्यमाहारमादद्यादस्वाद्वपि हि यापनम् ॥ १३ ॥

तद्वत् संसारकान्तारमातिष्ठन् श्रमतत्परः ।

यात्रार्थमद्यादाहारं व्याधितो भेषजं यथा ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1372

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जैसे वनमें रहनेवाला संन्यासी स्वादिष्ट अन्न ( मिठाई आदि ) के लिये उत्सुक नहीं होता । वह शरीर- निर्वाहके लिये स्वाधीन रूखा- सूखा ग्रामीण आहार भी ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार संसाररूपी वनमें रहनेवाला गृहस्थ परिश्रममें संलग्न हो जीवन - निर्वाहमात्रके लिये शुद्ध सात्त्विक आहार ग्रहण करे । ठीक उसी तरह, जैसे रोगी जीवनरक्षाके लिये औषध सेवन करता है ॥ १३-१४ ॥

सत्यशौचार्जवत्यागैर्वर्चसा विक्रमेण च ।

क्षान्त्या धृत्या च बुद्धया च मनसा तपसैव च ॥ १५ ॥

भावान् सर्वानुपावृत्तान् समीक्ष्य विषयात्मकान् ।

शान्तिमिच्छन्नदीनात्मा संयच्छेदिन्द्रियाणि च ॥ १६ ॥

उदारचित्त पुरुष सत्य, शौच, सरलता, त्याग, तेज, पराक्रम, क्षमा, धैर्य, बुद्धि, मन और तपके प्रभावसे समस्त विषयात्मक भावोंपर आलोचनात्मक दृष्टि रखते हुए शान्तिकी इच्छासे अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखे ॥

सत्त्वेन रजसा चैव तमसा चैव मोहिताः ।

चक्रवत् परिवर्तन्ते ह्यज्ञानाज्जन्तवो भृशम् ॥ १७ ॥

अजितेन्द्रिय जीव अज्ञानवश सत्त्व, रज और तमसे मोहित हो निरन्तर चक्रकी तरह घूमते रहते हैं ॥

तस्मात् सम्यक् परीक्षेत दोषानज्ञानसम्भवान् ।

अज्ञानप्रभवं दुःखमहंकारं परित्यजेत् ॥ १८ ॥

अतः विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह अज्ञानजनित दोषोंकी भलीभाँति परीक्षा करे तथा उस अज्ञानसे उत्पन्न हुए दुःख और अहंकारको त्याग दे ॥ १८ ॥

महाभूतानीन्द्रियाणि गुणाः सत्त्वं रजस्तमः ।

त्रैलोक्यं सेश्वरं सर्वमहंकारे प्रतिष्ठितम् ॥ १ ९ ॥

पञ्चमहाभूत, इन्द्रियाँ, शब्द आदि गुण, सत्त्व, रज और तम तथा लोकपालोंसहित तीनों लोक- यह सब कुछ अहंकारमें ही प्रतिष्ठित है ॥ १ ९ ॥

यथेह नियतः कालो दर्शयत्यार्तवान् गुणान् ।

तद्वद्भूतेष्वहंकारं विद्यात् कर्मप्रवर्तकम् ॥ २० ॥

जैसे इस जगत्में नियत काल यथासमय ऋतु- सम्बन्धी गुणोंको प्रकट कर दिखाता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंमें अहंकारको ही उनके कर्मोंका प्रवर्तक जानना चाहिये ॥ २० ॥

सम्मोहकं तमो विद्यात् कृष्णमज्ञानसम्भवम् ।

प्रीतिदुःखनिबद्धांश्च समस्तांस्त्रीनथो गुणान् ॥ २१ ॥

अहंकार सात्त्विक, राजस और तामस तीन प्रकारका होता है । तमोगुण मोहमें डालनेवाला तथा अन्धकारके समान काला है । उसे अज्ञानसे उत्पन्न हुआ समझना चाहिये ।

पृष्ठ 1373

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प्रीति उत्पन्न करनेवाले भाव सात्त्विक हैं और दुःख देनेवाले राजस । इस प्रकार इन समस्त त्रिविध गुणोंका स्वरूप जानना चाहिये ॥ २१ ॥

सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च निबोध तान् ।

प्रसादो हर्षजा प्रीतिरसंदेहो धृतिः स्मृतिः ।

एतान् सत्त्वगुणान् विद्यादिमान् राजसतामसान् ॥ २२ ॥

कामक्रोधौ प्रमादश्च लोभमोहौ भयं क्लमः ।

विषादशोकावरतिर्मानदर्पावनार्यता ॥ २३ ॥

अब मैं तुम्हें सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणके कार्य बताता हूँ, सुनो । प्रसन्नता, हर्षजनित प्रीति, संदेहका अभाव, धैर्य और स्मृति- इन सबको सत्त्वगुणके कार्य समझो । काम, क्रोध, प्रमाद, लोभ, मोह, भय, क्लान्ति, विषाद, शोक, अप्रसन्नता, मान, दर्प और अनार्यता—इन्हें रजोगुण और तमोगुणके कार्य समझना चाहिये ॥ २२-२३ ॥

दोषाणामेवमादीनां परीक्ष्य गुरुलाघवम् ।

विमृशेदात्मसंस्थानमेकैकमनुसंततम् ॥ २४ ॥

इनके तथा ऐसे ही दूसरे दोषोंके बड़े- छोटेका विचार करके फिर इस बातकी परीक्षा करे कि इनमेंसे एक-एक दोष मुझमें है या नहीं। यदि है तो कितनी मात्रामें है ( इस तरह विचार करते हुए सभी दोषोंसे छूटनेका प्रयत्न करे ) ॥ २४ ॥

युधिष्ठिरउवाच

के दोषा मनसा त्यक्ताः के बुद्धया शिथिलीकृताः ।

के पुनः पुनरायान्ति के मोहादफला इव ॥ २५ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! पूर्वकालके मुमुक्षुओंने किन -किन दोषोंका मनके द्वारा त्याग किया है और किन्हें बुद्धिके द्वारा शिथिल किया है? कौन दोष बारंबार आते हैं और कौन मोहवश फल देनेमें असमर्थ- से प्रतीत होते हैं? ॥ २५ ॥

केषां बलाबलं बुद्धया हेतुभिर्विमृशेद् बुधः ।

एष मे संशयस्तात तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २६ ॥

विद्वान् पुरुष अपनी बुद्धि तथा युक्तियोंद्वारा किन दोषोंके बलाबलका विचार करे ।

तात! पितामह! यह मेरा संशय है । आप मुझसे इसका विवेचन कीजिये ॥ २६ ॥

भीष्मउवाच दोषैर्मूलादवच्छिन्नैर्विशुद्धात्मा विमुच्यते ।

विनाशयति सम्भूतमयस्मयमयो यथा ।

तथा कृतात्मा सहजैर्दोषैर्नश्यति तामसैः ॥ २७ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! इन दोषोंका मूल कारण है अज्ञान । अतः मूलसहित इन दोषोंका नाश हो जानेपर मनुष्यका अन्तःकरण विशुद्ध होता है और वह संसार - बन्धनसे

पृष्ठ 1374

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मुक्त हो जाता है । जैसे लोहेकी बनी हुई छेनीकी धार लोहमयी साँकलको काटकर स्वयं भी नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार शुद्ध हुई बुद्धि तमोगुणजनित सहज दोषोंको नष्ट करके उनके साथ ही स्वयं भी शान्त हो जाती है ॥ २७ ॥

राजसं तामसं चैव शुद्धात्मकमकल्मषम् ।

तत् सर्वं देहिनां बीजं सत्त्वमात्मवतः समम् ॥ २८ ॥

यद्यपि रजोगुण, तमोगुण तथा काम, मोह आदि दोषोंसे रहित शुद्ध सत्त्वगुण – ये तीनों ही देहधारियोंकी देहकी उत्पत्तिके मूल कारण हैं, तथापि जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, उस पुरुषके लिये सत्त्वगुण ही समताका साधन है ॥ २८ ॥

तस्मादात्मवता वर्ज्यं रजश्च तम एव च ।

रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तं सत्त्वं निर्मलतामियात् ॥ २ ९ ॥

अतः जितात्मा पुरुषको रजोगुण और तमोगुणका त्याग ही करना चाहिये । इन दोनोंसे छूट जानेपर बुद्धि निर्मल हो जाती है ॥ २ ९ ॥

अथवा मन्त्रवद्ब्रूयुरात्मादानाय दुष्कृतम् ।

सवै हेतुरनादाने शुद्धधर्मानुपालने ॥ ३० ॥

अथवा बुद्धिको वशमें करनेके लिये शास्त्रविहित मन्त्रयुक्त यज्ञादि कर्मको कुछ लोग दोषयुक्त बताते हैं; परंतु वह मन्त्रयुक्त यज्ञादि धर्म भी निष्कामभावसे किये जानेपर वैराग्यका हेतु है । तथा शुद्ध धर्म- शम, दम आदिके निरन्तर पालनमें भी वही निमित्त बनता है ॥

रजसाधर्मयुक्तानि कार्याण्यपि समाप्नुते ।

अर्थयुक्तानि चात्यर्थं कामान् सर्वांश्च सेवते ॥ ३१ ॥

मनुष्य रजोगुणके अधीन होनेपर उसके द्वारा भाँति- भाँतिके अधर्मयुक्त एवं अर्थयुक्त कर्म करने लगता है, तथा वह सम्पूर्ण भोगोंका अत्यन्त आसक्तिपूर्वक सेवन करता है ॥ ३१ ॥

तमसा लोभयुक्तानि क्रोधजानि च सेवते ।

हिंसाविहाराभिरतस्तन्द्रीनिद्रासमन्वितः ॥ ३२ ॥

तमोगुणद्वारा मनुष्य लोभ और क्रोधजनित कर्मोंका सेवन करता है, हिंसात्मक कर्मोंमें उसकी विशेष आसक्ति हो जाती है, तथा वह हर समय निद्रा- तन्द्रासे घिरा रहता है ॥ ३२ ॥

सत्त्वस्थः सात्त्विकान् भावान् शुद्धान् पश्यति संश्रितः ।

स देही विमलः श्रीमान् श्रद्धाविद्यासमन्वितः ॥ ३३ ॥

सत्त्वगुणमें स्थित हुआ पुरुष शुद्ध सात्त्विक भावोंको ही देखता और उन्हींका आश्रय लेता है । वह अत्यन्त निर्मल और कान्तिमान् होता है । उसमें श्रद्धा और विद्याकी प्रधानता होती है ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 1375

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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेयाध्यात्मकथने द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१२ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसम्बन्धी अध्यात्मकथनविषयक दो सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१२ ॥

पृष्ठ 1376

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त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः जीवोत्पत्तिका वर्णन करते हुए दोषों और बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिये विषयासक्तिके त्यागका उपदेश भीष्म उवाच

रजसा साध्यते मोहस्तमसा भरतर्षभ ।

क्रोधलोभौ भयं दर्प एतेषां सादनाच्छुचिः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! रजोगुण और तमोगुणसे मोहकी उत्पत्ति होती है, तथा उससे क्रोध, लोभ, भय एवं दर्प उत्पन्न होते हैं । इन सबका नाश करनेसे ही मनुष्य शुद्ध होता है ॥ १ ॥

परमं परमात्मानं देवमक्षयमव्ययम् ।

विष्णुमव्यक्तसंस्थानं विदुस्तं देवसत्तमम् ॥ २ ॥

ऐसे शुद्धात्मा पुरुष ही उस अक्षय, अविनाशी, परमदेव, अव्यक्तस्वरूप, देवप्रवर परमात्मा विष्णुका तत्त्व जान पाते हैं ॥ २ ॥

तस्य मायापिनद्धाङ्गा नष्टज्ञाना विचेतसः ।

मानवा ज्ञानसम्मोहात् ततः क्रोधं प्रयान्ति वै ॥ ३ ॥

उसी ईश्वरकी मायासे आवृत हो जानेपर मनुष्योंके ज्ञान और विवेकका नाश हो जाता है, तथा वे बुद्धिके व्यामोहसे क्रोधके वशीभूत हो जाते हैं ॥ ३ ॥

क्रोधात् काममवाप्याथ लोभमोहौ च मानवाः ।

मानदर्पावहङ्कारमहङ्कारात् ततः क्रियाः ॥ ४ ॥

क्रोधसे काम उत्पन्न होता है और फिर कामसे मनुष्य लोभ, मोह, मान, दर्प एवं अहंकारको प्राप्त होते हैं । तत्पश्चात् अहंकारसे प्रेरित होकर ही उनकी सारी क्रियाएँ होने लगती हैं ॥ ४ ॥

क्रियाभिः स्नेहसम्बन्धात्स्नेहाच्छोकमनन्तरम् ।

सुखदुःखक्रियारम्भाज्जन्माजन्मकृतक्षणाः ॥ ५ ॥

ऐसी क्रियाओंद्वारा मनुष्य आसक्तिसे युक्त हो जाता है । आसक्तिसे शोक होता है । फिर सुख- दुःखयुक्त कार्य आरम्भ करनेसे मनुष्यको जन्म और मृत्युके कष्ट स्वीकार करने पड़ते हैं ॥ ५ ॥

जन्मतो गर्भवासं तु शुक्रशोणितसम्भवम् ।

पुरीषमूत्रविक्लेदं शोणितप्रभवाविलम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1377

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1377 का मूल पृष्ठ
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जन्मके निमित्तसे गर्भवासका कष्ट भोगना पड़ता है । रज और वीर्यके परस्पर संयुक्त होनेपर गर्भवासका अवसर आता है, जहाँ मल और मूत्रसे भीगे तथा रक्तके विकारसे मलिन स्थानमें रहना पड़ता है ॥ ६ ॥

तृष्णाभिभूतस्तैर्बद्धस्तानेवाभिपरिप्लवन् ।

संसारतन्त्रवाहिन्यस्तत्र बुद्धयेत योषितः ॥ ७ ॥

तृष्णासे अभिभूत तथा काम, क्रोध आदि दोषोंसे बद्ध होकर उन्हींका अनुसरण करता हुआ मनुष्य ( महान् दुःख उठाता रहता है । यदि उनसे छूटनेकी इच्छा हो तो ) स्त्रियोंको संसाररूपी वस्त्रको बुननेवाली तन्तुवाहिनी समझे और उनसे दूर रहे ॥ ७ ॥

प्रकृत्या क्षेत्रभूतास्ता नसः क्षेत्रज्ञलक्षणाः ।

तस्मादेवाविशेषेण नरोऽतीयाद् विशेषतः ॥ ८ ॥

स्त्रियाँ प्रकृतिके तुल्य हैं; अतः क्षेत्रस्वरूपा हैं और पुरुष क्षेत्रज्ञरूप हैं ( जैसे प्रकृति अज्ञानी पुरुषको बाँधती है, उसी प्रकार ये स्त्रियाँ पुरुषोंको अपने मोहजालमें बाँध लेती हैं ), इसलिये सामान्यतः प्रत्येक पुरुषको विशेष प्रयत्नपूर्वक स्त्रीके संसर्गसे दूर रहना चाहिये ॥ ८ ॥

कृत्या ह्येता घोररूपा मोहयन्त्यविचक्षणान् ।

रजस्यन्तर्हिता मूर्तिरिन्द्रियाणां सनातनी ॥ ९ ॥

ये स्त्रियाँ भयानक कृत्याके समान हैं; अतः अज्ञानी मनुष्योंको मोहमें डाल देती हैं । इन्द्रियोंमें विकार उत्पन्न करनेवाली यह सनातन नारीमूर्ति रजोगुणसे तिरोहित है ॥ ९ ॥

तस्मात् तदात्मकाद् रागाद् बीजाज्जायन्ति जन्तवः ।

स्वदेहजानस्वसंज्ञान् यद्वदङ्गात् कृमींस्त्यजेत् ।

स्वसंज्ञानस्वकांस्तद्वत् सुतसंज्ञान् कृमींस्त्यजेत् ॥ १० ॥

अतः स्त्रीसम्बन्धी अनुरागके कारण पुरुषके वीर्यसे जीवोंकी उत्पत्ति होती है, जैसे मनुष्य अपनी ही देहसे उत्पन्न हुए जूँ और लीख आदि स्वेदज कीटोंको अपना न मानकर त्याग देता है, उसी प्रकार अपने कहलानेवाले जो अनात्मा पुत्रनामधारी कीट हैं, उन्हें भी त्याग देना चाहिये ॥ १० ॥

शुक्रतो रसतश्चैव देहाज्जायन्ति जन्तवः ।

स्वभावात् कर्मयोगाद् वा तानुपेक्षेत बुद्धिमान् ॥ ११ ॥

इस शरीरसे वीर्यद्वारा अथवा पसीनोंद्वारा स्वभावसे अथवा प्रारब्धके अनुसार जन्तुओंका जन्म होता रहता है । बुद्धिमान् पुरुषोंको उनकी उपेक्षा करनी चाहिये ॥ ११ ॥

रजस्तमसि पर्यस्तं सत्त्वं च रजसि स्थितम् ।

ज्ञानाधिष्ठानमव्यक्तं बुद्धयहङ्कारलक्षणम् ॥ १२ ॥

तमोगुणमें स्थित रजोगुण तथा रजोगुणमें स्थित सत्त्वगुण जब रजोगुण- तमोगुणमें स्थित हो जाता है और सत्त्वगुण रजोगुणमें स्थित हो जाता है, तब ज्ञानका अधिष्ठानभूत

पृष्ठ 1378

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अव्यक्त आत्मा बुद्धि और अहंकारसे युक्त हो जाता है ॥ १२ ॥

तद् बीजं देहिनामाहुस्तद् बीजं जीवसंज्ञितम् ।

कर्मणा कालयुक्तेन संसारपरिवर्तनम् ॥ १३ ॥

वह अव्यक्त आत्मा ही देहधारी प्राणियोंका बीज है और वह बीजभूत आत्मा ही गुणोंके संगके कारण जीव कहलाता है। वही कालसे युक्त कर्मसे प्रेरित हो संसार-चक्रमें घूमता रहता है ॥ १३ ॥

रमत्ययं यथा स्वप्ने मनसा देवानिव ।

कर्मगर्भेर्गुणैर्देही गर्भे तदुपलभ्यते ॥ १४ ॥

जैसे स्वप्नावस्थामें यह जीव मनके द्वारा ही दूसरा शरीर धारण करके क्रीडा करता है, उसी प्रकार वह कर्मगर्भित गुणोंद्वारा गर्भमें उपलब्ध होता है ॥ १४ ॥

कर्मणा बीजभूतेन चोद्यते यद् यदिन्द्रियम् ।

जायते तदहङ्काराद् रागयुक्तेन चेतसा ॥ १५ ॥

बीजभूत कर्मसे जिस -जिस इन्द्रियको उत्पत्तिके लिये प्रेरणा प्राप्त होती है, रागयुक्त चित्त एवं अहंकारसे वही वही इन्द्रिय प्रकट हो जाती है ॥ १५ ॥

शब्दरागाच्छ्रोत्रमस्य जायते भावितात्मनः ।

रूपरागात् तथा चक्षुर्प्राणं गन्धचिकीर्षया ॥ १६ ॥

शब्दके प्रति राग होनेसे उस भावितात्मा पुरुषकी श्रवणेन्द्रिय प्रकट होती है। रूपके प्रति राग होनेसे नेत्र और गन्ध ग्रहण करनेकी इच्छा होनेसे नासिकाका प्राकट्य होता ॥ १६ ॥

स्पर्शने त्वक् तथा वायुः प्राणापानव्यपाश्रयः ।

व्यानोदानौ समानश्च पञ्चधा देहयापनम् ॥ १७ ॥

स्पर्शके प्रति राग होनेसे त्वगिन्द्रिय और वायुका प्राकट्य होता है । वायु प्राण और अपानका आश्रय है । वही उदान, व्यान तथा समान है । इस प्रकार वह पाँच रूपोंमें प्रकट हो शरीर-यात्राका निर्वाह करती है ॥ १७ ॥

संजातैर्जायते गात्रैः कर्मजैर्वर्ष्मणा वृतः ।

दुःखाद्यन्तैर्दुःखमध्यैर्नरः शारीरमानसैः ॥ १८ ॥

मनुष्य जन्मकालमें पूर्णतः उत्पन्न हुए कर्मजनित अंगों और सम्पूर्ण शरीरसे युक्त होकर जन्म ग्रहण करता है । वह मनुष्य आदि, मध्य और अन्तमें भी शारीरिक और मानसिक दुःखोंसे पीड़ित रहता है ॥ १८ ॥

दुःखं विद्यादुपादानादभिमानाच्च वर्धते ।

त्यागात् तेभ्यो निरोधः स्यान्निरोधज्ञो विमुच्यते ॥ १ ९ ॥

शरीरके ग्रहणमात्रसे दुःखकी प्राप्ति निश्चित समझनी चाहिये । शरीरमें अभिमान करनेसे उस दुःखकी वृद्धि होती है । अभिमानके त्यागसे उन दुःखोंका अन्त होता है । जो

पृष्ठ 1379

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दुःखोंके अन्त होनेकी इस कलाको जानता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ १ ९ ॥

इन्द्रियाणां रजस्येव प्रलयप्रभवावुभौ ।

परीक्ष्य संचरेद् विद्वान् यथावच्छास्त्रचक्षुषा ॥ २० ॥

इन्द्रियोंकी उत्पत्ति और लय- ये दोनों कार्य रजोगुणमें ही होते हैं । विद्वान् पुरुष शास्त्रदृष्टिसे इन बातोंकी भलीभाँति परीक्षा करके यथोचित आचरण करे ॥

ज्ञानेन्द्रियाणीन्द्रियार्थान्नोपसर्पन्त्यतर्षुलम् ।

हीनैश्च करणैर्देही न देहं पुनरर्हति ॥ २१ ॥

जिसमें तृष्णाका अभाव है उस पुरुषको ये ज्ञानेन्द्रियाँ विषयोंकी प्राप्ति नहीं करातीं । इन्द्रियोंके विषयासक्तिसे रहित हो जानेपर देही पुनः शरीरको धारण नहीं करता ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वार्ष्णेयाध्यात्मकथने त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसम्बन्धी अध्यात्मका कथनविषयक दो सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१३ ॥

पृष्ठ 1380

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चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति भीष्म उवाच

अत्रोपायं प्रवक्ष्यामि यथावच्छास्त्रचक्षुषा ।

तत्त्वज्ञानाच्चरन् राजन् प्राप्नुयात्परमां गतिम् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! अब मैं तुम्हें शास्त्र - दृष्टिसे मोक्षका यथावत् उपाय बताता हूँ। शास्त्रविहित कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करता हुआ मनुष्य तत्त्वज्ञानसे परमगतिको प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥

सर्वेषामेव भूतानां पुरुषः श्रेष्ठ उच्यते ।

पुरुषेभ्यो द्विजानाहुर्द्विजेभ्यो मन्त्रदर्शिनः ॥ २ ॥

समस्त प्राणियोंमें मनुष्य श्रेष्ठ कहलाता है। मनुष्योंमें द्विजोंको और द्विजोंमें भी मन्त्रद्रष्टा ( वेदज्ञ ) ब्राह्मणोंको श्रेष्ठ बताया गया है ॥ २ ॥

सर्वभूतात्मभूतास्ते सर्वज्ञाः सर्वदर्शिनः ।

ब्राह्मणा वेदशास्त्रज्ञास्तत्त्वार्थगतनिश्चयाः ॥ ३ ॥

वेद- शास्त्रोंके यथार्थ ज्ञाता ब्राह्मण समस्त भूतोंके आत्मा, सर्वज्ञ और सर्वदर्शी होते हैं । उन्हें परमार्थतत्त्वका पूर्ण निश्चय होता है ॥ ३ ॥

नेत्रहीनो यथा ह्येकः कृच्छ्राणि लभतेऽध्वनि ।

ज्ञानहीनस्तथा लोके तस्माज्ज्ञानविदोऽधिकाः ॥ ४ ॥

जैसे नेत्रहीन पुरुष मार्गमें अकेला होनेपर तरह - तरहके दुःख पाता है, उसी प्रकार संसारमें ज्ञानहीन मनुष्यको भी अनेक प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं; इसलिये ज्ञानी पुरुष ही सबसे श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥

तांस्तानुपासते धर्मान् धर्मकामा यथागमम् ।

न त्वेषामर्थसामान्यमन्तरेण गुणानिमान् ॥ ५ ॥

धर्मकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य शास्त्रके अनुसार उन- उन यज्ञादि सकाम धर्मोंका अनुष्ठान करते हैं; किंतु आगे बताये जानेवाले गुणोंके बिना इन्हें सबके लिये समानरूपसे अभीष्ट मोक्ष नामक पुरुषार्थकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ५ ॥

वाग्देहमनसां शौचं क्षमा सत्यं धृतिः स्मृतिः ।

सर्वधर्मेषु धर्मज्ञा ज्ञापयन्ति गुणान् शुभान् ॥ ६ ॥

वाणी, शरीर और मनकी पवित्रता, क्षमा, सत्य, धैर्य और स्मृति —इन गुणोंको प्रायः सभी धर्मोंके धर्मज्ञ पुरुष कल्याणकारी बताते हैं ॥ ६ ॥

यदिदं ब्रह्मणो रूपं ब्रह्मचर्यमिति स्मृतम् ।