05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1461–1470
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1461–1470
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तं बलिं नाधिगच्छामि ब्रह्मन्नाचक्ष्व मे बलिम् ॥ ७ ॥
‘ वही यथासमय आलस्य छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाशित होता, वही अस्त होता और वही वर्षा करता था । ब्रह्मन्! उस बलिको मैं ढूँढ़नेपर भी नहीं पा रहा हूँ । आप मुझे राजा बलिका पता बताइये ॥ ६-७ ॥ ब्रह्मोवाच
नैतत् ते साधु मघवन् यदेनमनुपृच्छसि ।
पृष्टस्तु नानृतं ब्रूयात् तस्माद् वक्ष्यामि ते बलिम् ॥ ८ ॥
ब्रह्माजीने कहा — मघवन्! यह तुम्हारे लिये अच्छी बात नहीं है कि तुम मुझसे बलिका पता पूछ रहे हो । पूछनेपर झूठ नहीं बोलना चाहिये, इसलिये मैं तुमसे बलिका पता बता रहा हूँ ॥ ८ ॥
उष्ट्रेषु यदि वा गोषु खरेष्वश्वेषु वा पुनः ।
वरिष्ठो भविता जन्तुः शून्यागारे शचीपते ॥ ९ ॥
शचीपते! किसी शून्य घरमें ऊँट, गौ, गर्दभ अथवा अश्वजातिके पशुओंमें जो श्रेष्ठ जीव उपलब्ध हो, उसे बलि समझो ॥ ९ ॥
शक्र उवाच
यदि स्म बलिना ब्रह्मन् शून्यागारे समेयिवान् ।
हन्यामेनं न वा हन्यां तद् ब्रह्मन्ननुशाधि माम् ॥ १० ॥
इन्द्रने पूछा — ब्रह्मन्! यदि किसी एकान्त गृहमें राजा बलिसे मेरी भेंट हो जाय तो मैं उन्हें मार डालूँ या न मारूँ, यह मुझे बतावें ॥ १० ॥
ब्रह्मोवाच
मा स्म शक्र बलिं हिंसीर्न बलिर्वधमर्हति ।
न्यायस्तु शक्र प्रष्टव्यस्त्वया वासव काम्यया ॥ ११ ॥
ब्रह्माजीने कहा — इन्द्र! तुम बलिका वध न करना, बलि वधके योग्य नहीं है । वासव! तुम उनसे इच्छानुसार न्यायोचित व्यवहारके विषयमें प्रश्न कर सकते हो ॥ ११ ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्तो भगवता महेन्द्रः पृथिवीं तदा ।
चचारैरावतस्कन्धमधिरुह्य श्रिया वृतः ॥ १२ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! भगवान् ब्रह्माजीके इस प्रकार आदेश देनेपर देवराज इन्द्र ऐरावतकी पीठपर सवार हो राजलक्ष्मीसे सुशोभित होते हुए पृथ्वीपर विचरने लगे ॥ १२ ॥
ततो ददर्श स बलिं खरवेषेण संवृतम् ।
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यथाऽऽख्यातं भगवता शून्यागारकृतालयम् ॥ १३ ॥
तदनन्तर उन्होंने भगवान् ब्रह्माके बताये अनुसार एक शून्य घरमें निवास करनेवाले राजा बलिको देखा, जिन्होंने गर्दभके वेषमें अपने आपको छिपा रखा था ॥ १३ ॥
शक्र उवाच
खरयोनिमनुप्राप्तस्तुषभक्षोऽसि दानव ।
इयं ते योनिरधमा शोचस्याहो न शोचसि ॥ १४ ॥
इन्द्र बोले- दानव! तुम गदहेकी योनिमें पड़कर भूसी खा रहे हो । यह नीच योनि तुम्हें प्राप्त हुई है । इसके लिये तुम्हें शोक होता है या नहीं? ॥ १४ ॥
अदृष्टं बत पश्यामि द्विषतां वशमागतम् ।
श्रिया विहीनं मित्रैश्च भ्रष्टवीर्यपराक्रमम् ॥ १५ ॥
आज तुम्हारी ऐसी अवस्था देख रहा हूँ, जो पहले कभी नहीं देखी गयी थी । तुम शत्रुओंके वशमें पड़ गये हो । राजलक्ष्मी तथा मित्रोंसे हीन हो गये हो तथा तुम्हारा बल-पराक्रम नष्ट हो गया है ॥ १५ ॥
यत् तद् यानसहस्रैस्त्वं ज्ञातिभिः परिवारितः ।
लोकान् प्रतापयन् सर्वान् यास्यस्मानवितर्कयन् ॥ १६ ॥
पहले तुम अपने सहस्रों वाहनों और सजातीय बन्धुओंसे घिरकर सब लोगोंको ताप देते और हम देवताओंको कुछ न समझते हुए यात्रा करते थे ॥ १६ ॥
त्वन्मुखाश्चैव दैतेया व्यतिष्ठंस्तव शासने ।
अकृष्टपच्या च मही तवैश्वर्ये बभूव ह ॥ १७ ॥
इदं च तेऽद्य व्यसनं शोचस्याहो न शोचसि । सब दैत्य तुम्हारा मुँह जोहते हुए तुम्हारे ही शासनमें रहते थे । तुम्हारे राज्यमें पृथ्वी बिना जोते - बोये ही अनाज पैदा करती थी । परंतु आज तुम्हारे ऊपर यह संकट आ पहुँचा है । इसके लिये तुम शोक करते हो या नहीं? ॥ १७३ ॥
यदाऽऽतिष्ठः समुद्रस्य पूर्वकूले विलेलिहन् ॥ १८ ॥
ज्ञातीन् विभजतो वित्तं तदाऽऽसीत् ते मनः कथम् । जिस समय तुम समुद्रके पूर्वतटपर विविध भोगोंका आस्वादन करते हुए निवास करते थे और अपने भाई- बन्धुओंको धन बाँटते थे, उस समय तुम्हारे मनकी अवस्था कैसी रही होगी? ॥ १८३ ॥
यत् ते सहस्रसमिता ननृतुर्देवयोषितः ॥ १ ९ ॥
बहूनि वर्षपूगानि विहारे दीप्यतः श्रिया ।
सर्वाः पुष्करमालिन्यः सर्वाः काञ्चनसप्रभाः ॥ २० ॥
कथमद्य तदा चैव मनस्ते दानवेश्वर ।
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तुमने बहुत वर्षोंतक राजलक्ष्मीसे सुशोभित हो विहारमें समय बिताया है । उस समय सुवर्णकी- सी कान्तिवाली सहस्रों देवांगनाएँ जो सब- की सब पद्ममालाओंसे अलंकृत होती थीं, तुम्हारे सामने नृत्य किया करती थीं । दानवराज! उन दिनों तुम्हारे मनकी क्या अवस्था थी और अब कैसी है? ॥ १ ९ -२० ॥ छत्रं तवासीत् सुमहत् सौवर्णं रत्नभूषितम् ॥ २१ ॥
ननृतुस्तत्र'गन्धर्वाः षट् सहस्राणि सप्तधा । एक समय था, जब कि तुम्हारे ऊपर सोनेका बना हुआ रत्नभूषित विशाल छत्र तना रहता था और छः हजार गन्धर्व सप्त स्वरोंमें गीत गाते हुए तुम्हारे सम्मुख अपनी नृत्यकलाका प्रदर्शन करते थे ॥ २१ ॥
यूपस्तवासीत् सुमहान् यजतः सर्वकाञ्चनः ॥ २२ ॥
यत्राददः सहस्राणि अयुतानां गवां दश ।
अनन्तरं सहस्रेण तदाऽऽसीद् दैत्य का मतिः ॥ २३ ॥
यज्ञ करते समय तुम्हारे यज्ञमण्डपका अत्यन्त विशाल मध्यवर्ती स्तम्भ पूरा--का- पूरा सोनेका बना होता था । जिस समय तुम निरन्तर दस-दस करोड़ गौओंका सहस्रों बार दान किया करते थे, दैत्यराज! उस समय तुम्हारे मनमें कैसे विचार उठते रहे होंगे? ॥ २२-२३ ॥
यदा च पृथिवीं सर्वां यजमानोऽनुपर्यगाः ।
शम्याक्षेपेण विधिना तदाऽऽसीत् किं तु ते हृदि ॥ २४ ॥
जब तुमने शम्याक्षेपकी* विधिसे यज्ञ करते हुए सारी पृथ्वीकी परिक्रमा की थी, उस समय तुम्हारे हृदयमें कितना उत्साह रहा होगा? ॥ २४ ॥
न ते पश्यामि भृङ्गारं न च्छत्रं व्यजने न च ।
ब्रह्मदत्तां च ते मालां न पश्याम्यसुराधिप ॥ २५ ॥
असुरराज! अब तो मैं तुम्हारे पास न तो सोनेकी झारी, न छत्र और न चँवर ही देखता हूँ तथा ब्रह्माजीकी दी हुई वह दिव्य माला भी तुम्हारे गलेमें नहीं दिखायी देती है ॥ (भीष्मउवाच
ततः प्रहस्य स बलिर्वासवेन समीरितम् ।
निशम्य भावगम्भीरं सुरराजमथाब्रवीत् ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इन्द्रकी कही हुई वह भावगम्भीर वाणी सुनकर राजा बलि हँस पड़े और देवराजसे इस प्रकार बोले ॥ बलिरुवाच अहो हि तव बालिश्यमिह देवगणाधिप । अयुक्तं देवराजस्य तव कष्टमिदं वचः ॥ )
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बलिने कहा — देवेश्वर! यहाँ तुमने जो मूर्खता दिखायी है, वह मेरे लिये आश्चर्यजनक है । तुम देवताओंके राजा हो । इस तरह दूसरोंको कष्ट देनेवाली बात कहना तुम्हारे लिये योग्य नहीं है ॥
न त्वं पश्यसि भृङ्गारं न च्छत्रं व्यजने न च ।
ब्रह्मदत्तां च मे मालां न त्वं द्रक्ष्यसि वासव ॥ २६ ॥
इन्द्र! इस समय तुम मेरी सोनेकी झारीको, मेरे छत्र और चँवरको तथा ब्रह्माजीकी दी हुई मेरी उस दिव्य मालाको भी नहीं देख सकोगे ॥ २६ ॥
गुहायां निहितानि त्वं मम रत्नानि पृच्छसि ।
यदा मे भविता कालस्तदा त्वं तानि द्रक्ष्यसि ॥ २७ ॥
तुम मेरे जिन रत्नोंके विषयमें पूछ रहे हो, वे सब गुफामें छिपा दिये गये हैं । जब मेरे लिये अच्छा समय आयेगा, तब तुम फिर उन्हें देखोगे ॥ २७ ॥
न त्वेतदनुरूपं ते यशसो वा कुलस्य च ।
समृद्धार्थोऽसमृद्धार्थं यन्मां कत्थितुमिच्छसि ॥ २८ ॥
इस समय तुम समृद्धिशाली हो और मेरी समृद्धि छिन गयी है, ऐसी अवस्थामें जो तुम मेरे सामने अपनी प्रशंसाके गीत गाना चाहते हो, यह तुम्हारे कुल और यशके अनुरूप नहीं है ॥ २८ ॥
न हि दुःखेषु शोचन्ते न प्रहृष्यन्ति चर्धिषु ।
कृतप्रज्ञा ज्ञानतृप्ताः क्षान्ताः सन्तो मनीषिणः ॥ २ ९ ॥
जिसकी बुद्धि शुद्ध है तथा जो ज्ञानसे तृप्त हैं, वे क्षमाशील मनीषी सत्पुरुष दुःख पड़नेपर शोक नहीं करते और समृद्धि प्राप्त होनेपर हर्षसे फूल नहीं उठते हैं ॥ २ ९ ॥
त्वं तु प्राकृतया बुद्धया पुरन्दर विकत्थसे ।
यदाहमिव भावी स्यास्तदा नैवं वदिष्यसि ॥ ३० ॥
पुरन्दर! तुम अपनी अशुद्ध बुद्धिके कारण मेरे सामने आत्मप्रशंसा कर रहे हो । जब मेरी - जैसी स्थिति तुम्हारी भी हो जायगी, तब ऐसी बात नहीं बोल सकोगे ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि बलिवासवसंवादो नाम त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२३ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें बलि और इन्द्रका संवाद नामक दो सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं ) Fr
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* शम्याक्षेप कहते हैं शम्यापातको । ' शम्या' एक ऐसे काठके डंडेको कहते हैं, जिसका निचला भाग मोटा होता है । उसे जब कोई बलवान् पुरुष उठाकर जोरसे फेंके, तब जितनी दूरीपर जाकर वह गिरे, उतने भूभागको एक ‘ शम्यापात’ कहते हैं ।
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चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना भीष्मउवाच
पुनरेव तु तं शक्रः प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
निःश्वसन्तं यथा नागं प्रव्याहाराय भारत ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - भारत! ऐसा कहकर सर्पके समान फुफकारते हुए बलिसे इन्द्रने पुनः अपना उत्कर्ष सूचित करनेके लिये हँसते हुए कहा ॥ १ ॥
शक्र उवाच
यत् तद् यानसहस्रेण ज्ञातिभिः परिवारितः ।
लोकान् प्रतापयन् सर्वान् यास्यस्मानवितर्कयन् ॥ २ ॥
दृष्ट्वा सुकृपणां चेमामवस्थामात्मनो बले ।
ज्ञातिमित्रपरित्यक्तः शोचस्याहो न शोचसि ॥ ३ ॥
इन्द्र बोले— दैत्यराज बलि! पहले जो तुम सहस्रों वाहनों और भाई- बन्धुओंसे घिरकर सम्पूर्ण लोकोंको संताप देते और हम देवताओंको कुछ न समझते हुए यात्रा करते थे और अब बन्धु - बान्धवों तथा मित्रोंसे परित्यक्त होकर जो अपनी यह अत्यन्त दीनदशा देख रहे हो, इससे तुम्हारे मनमें शोक होता है या नहीं? ॥
प्रीतिं प्राप्यातुलां पूर्वं लोकांश्चात्मवशे स्थितान् ।
विनिपातमिमं बाह्यं शोचस्याहो न शोचसि ॥ ४ ॥
पूर्वकालमें तुमने सम्पूर्ण लोकोंको अपने अधीन कर लिया था और अनुपम प्रसन्नता प्राप्त की थी; किंतु इस समय बाह्य जगत्में तुम्हारा यह घोर पतन हुआ है, यह सब सोचकर तुम्हारे मनमें शोक होता है या नहीं? ॥ ४ ॥
बलिरुवाच
अनित्यमुपलक्ष्येह कालपर्यायधर्मतः ।
तस्माच्छक्र न शोचामि सर्वं ह्येवेदमन्तवत् ॥ ५ ॥
बलिने कहा—इन्द्र! कालचक्र स्वभावसे ही परिवर्तनशील है, उसके द्वारा यहाँकी प्रत्येक वस्तुको मैं अनित्य समझता हूँ, इसीलिये कभी शोक नहीं करता हूँ; क्योंकि यह सारा जगत् विनाशशील है ॥ ५ ॥
अन्तवन्त इमे देहा भूतानां च सुराधिप ।
तेन शक्र न शोचामि नापराधादिदं मम ॥ ६ ॥
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देवेश्वर! प्राणियोंके ये सारे शरीर अन्तवान् हैं; इसलिये मैं कभी शोक नहीं करता हूँ । यह गर्दभका शरीर भी मुझे किसी अपराधसे नहीं प्राप्त हुआ है ( मैंने इसे स्वेच्छासे ग्रहण किया है ) ॥ ६ ॥
जीवितं च शरीरं च जात्यैव सह जायते ।
उभे सह विवर्धेते उभे सह विनश्यतः ॥ ७ ॥
जीवन और शरीर दोनों जन्मके साथ ही उत्पन्न होते हैं, साथ ही बढ़ते हैं और साथ ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ७ ॥
न हीदृशमहं भावमवशः प्राप्य केवलम् ।
यदेवमभिजानामि का व्यथा मे विजानतः ॥ ८ ॥
मैं इस गर्दभ - शरीरको पाकर भी विवश नहीं हुआ हूँ । जब मैं इस प्रकार देहकी अनित्यता और आत्माकी असंगताको जानता हूँ, तब यह जानते हुए मुझे क्या व्यथा हो सकती है? ॥ ८ ॥
भूतानां निधनं निष्ठा स्रोतसामिव सागरः ।
नैतत् सम्यग्विजानन्तो नरा मुह्यन्ति वज्रधृक् ॥ ९ ॥
वज्रधारी इन्द्र! जैसे जलके प्रवाहोंका अन्तिम आश्रय समुद्र है, उसी प्रकार शरीरधारियोंकी अन्तिम गति मृत्यु है । जो पुरुष इस बातको अच्छी तरह जानते हैं, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते हैं ॥ ९ ॥
ये त्वेवं नाभिजानन्ति रजोमोहपरायणाः ।
ते कृच्छ्रं प्राप्य सीदन्ति बुद्धिर्येषां प्रणश्यति ॥ १० ॥
जो लोग रजोगुण ( काम-क्रोध ) और मोहके वशीभूत हो इस बातको भलीभाँति नहीं जानते हैं तथा जिनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वे संकटमें पड़नेपर बहुत दुखी होते हैं ॥ १० ॥
बुद्धिलाभात् तु पुरुषः सर्वं तुदति किल्बिषम् ।
विपाप्मा लभते सत्त्वं सत्त्वस्थः सम्प्रसीदति ॥ ११ ॥
जिसे सद्बुद्धि प्राप्त होती है, वह पुरुष उस बुद्धिके द्वारा सारे पापोंको नष्ट कर देता है । पापहीन होनेपर उसे सत्त्वगुणकी प्राप्ति होती है और सत्त्वगुणमें स्थित होकर वह सात्त्विक प्रसन्नता प्राप्त कर लेता है ॥
ततस्तु ये निवर्तन्ते जायन्ते वा पुनः पुनः ।
कृपणाः परितप्यन्ते तैरर्थैरभिचोदिताः ॥ १२ ॥
जो मन्दबुद्धि मानव सत्त्वगुणसे भ्रष्ट हो जाते हैं, वे बारंबार इस संसारमें जन्म लेते हैं तथा रजोगुणजनित काम, क्रोध आदि दोषोंसे प्रेरित होकर सदा संतप्त होते रहते हैं ॥ १२ ॥
अर्थसिद्धिमनर्थं च जीवितं मरणं तथा ।
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सुखदुःखफले चैव न द्वेष्मि न च कामये ॥ १३ ॥
मैं न तो अर्थसिद्धि, जीवन और सुखमय फलकी कामना करता हूँ और न अनर्थ, मृत्यु एवं दुःखमय फलसे द्वेष ही रखता हूँ ॥ १३ ॥
तं हन्ति हतो ह्येव यो नरो हन्ति कञ्चन ।
उभौ तौ न विजानीतो यश्च हन्ति हतश्च यः ॥ १४ ॥
जो मनुष्य किसीकी हत्या करता है, वह वास्तवमें स्वयं मरा हुआ होते हुए मरे हुएको ही मारता है । जो मारता है और जो मारा जाता है, वे दोनों ही आत्माको नहीं जानते हैं ( क्योंकि आत्मा हननक्रियाका न तो कर्म है, न कर्ता ) ॥ १४ ॥
हत्वा जित्वा च मघवन् यः कश्चित् पुरुषायते ।
अकर्ता ह्येव भवति कर्ता ह्येव करोति तत् ॥ १५ ॥
मघवन्! जो कोई किसीको मारकर या जीतकर अपने पौरुषपर गर्व करता है, वह वास्तवमें उस पुरुषार्थका कर्ता ही नहीं है; क्योंकि जो जगत्का कर्ता, जो परमात्मा है, वही उस कर्मका भी कर्ता है ॥ १५ ॥
को हि लोकस्य कुरुते विनाशप्रभवावुभौ ।
कृतं हि तत् कृतेनैव कर्ता तस्यापि चापरः ॥ १६ ॥
सम्पूर्ण जगत्का संहार और सृष्टि–इन दोनों कार्योंको कौन करता है? वह सब प्राणियोंके कर्मोंद्वारा ही किया गया है और उसका भी प्रयोजक कोई और ( ईश्वर ) ही है ॥ १६ ॥
पृथिवी ज्योतिराकाशमापो वायुश्च पञ्चमः ।
एतद्योनीनि भूतानि तत्र का परिदेवना ॥ १७ ॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश - ये ही सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंके कारण हैं; अतः उनके लिये शोक और विलापकी क्या आवश्यकता है? ॥ १७ ॥
महाविद्योऽल्पविद्यश्च बलवान् दुर्बलश्च यः ।
दर्शनीयो विरूपश्च सुभगो दुर्भगश्च यः ॥ १८ ॥
सर्वं कालः समादत्ते गम्भीरः स्वेन तेजसा ।
तस्मिन् कालवशं प्राप्ते का व्यथा मे विजानतः ॥ १ ९ ॥
कोई बड़ा भारी विद्वान् हो या अल्पविद्यासे युक्त, बलवान् हो या दुर्बल, सुन्दर हो या कुरूप, सौभाग्यशाली हो या दुर्भाग्ययुक्त, गम्भीर काल सबको अपने तेजसे ग्रहण कर लेता है; अतः उन सबके कालके अधीन हो जानेपर जगत्की क्षणभंगुरताको जाननेवाले मुझ बलिको क्या व्यथा हो सकती है? ॥ १८-१९ ॥
दग्धमेवानुदहति हतमेवानुहन्यते ।
नश्यते नष्टमेवाग्रे लब्धव्यं लभते नरः ॥ २० ॥
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जो कालके द्वारा दग्ध हो चुका है, उसीको पीछेसे आग जलाती है । जिसे कालने पहलेसे ही मार डाला है, वही किसी दूसरेके द्वारा मारा जाता है। जो पहलेसे ही नष्ट हो चुकी है, वही वस्तु किसीके द्वारा नष्ट की जाती है तथा जिसका मिलना पहलेसे ही निश्चित है, उसीको मनुष्य हस्तगत करता है ॥ २० ॥
नास्य द्वीपः कुतः पारो नावारः सम्प्रदृश्यते ।
नान्तमस्य प्रपश्यामि विधेर्दिव्यस्य चिन्तयन् ॥ २१ ॥
मैं बहुत सोचनेपर भी दिव्य विधाता कालका अन्त नहीं देख पाता हूँ। उस समुद्र - जैसे कालका कहीं द्वीप भी नहीं है, फिर पार कहाँसे प्राप्त हो सकता है? उसका आर- पार कहीं नहीं दिखायी देता है ॥ २१ ॥
यदि मे पश्यतः कालो भूतानि न विनाशयेत् ।
स्यान्मे हर्षश्च दर्पश्च क्रोधश्चैव शचीपते ॥ २२ ॥
शचीपते! यदि काल मेरे देखते - देखते समस्त प्राणियोंका विनाश नहीं करता तो मुझे हर्ष होता, अपनी शक्तिपर गर्व होता और उस क्रूर कालपर मुझे क्रोध भी होता ॥ २२ ॥
तुषभक्षं तु मां ज्ञात्वा प्रविविक्तजने गृहे ।
बिभ्रतं गार्दभं रूपमागत्य परिगर्हसे ॥ २३ ॥
इस एकान्त गृहमें गर्दभका रूप धारण किये मुझे भूसी खाता जानकर तुम यहाँ आये हो और मेरी निन्दा करते हो ॥ २३ ॥
इच्छन्नहं विकुर्यां हि रूपाणि बहुधाऽऽत्मनः ।
विभीषणानि यानीक्ष्य पलायेथास्त्वमेव मे ॥ २४ ॥
मैं चाहूँ तो अपने बहुत से ऐसे भयानक रूप प्रकट कर सकता हूँ, जिन्हें देखकर तुम्हीं मेरे निकटसे भाग खड़े होओगे ॥ २४ ॥
कालः सर्वं समादत्ते कालः सर्वं प्रयच्छति ।
कालेन विहितं सर्वं मा कृथाः शक्र पौरुषम् ॥ २५ ॥
इन्द्र! काल ही सबको ग्रहण करता है, काल ही सब कुछ देता है तथा कालने ही सब कुछ किया है; अतः अपने पुरुषार्थका गर्व न करो ॥ २५ ॥
पुरा सर्वं प्रव्यथितं मयि क्रुद्धे पुरंदर ।
अवैमि त्वस्य लोकस्य धर्मं शक्र सनातनम् ॥ २६ ॥
पुरन्दर! पूर्वकालमें मेरे कुपित होनेपर सारा जगत् व्यथित हो उठता था । इस लोककी कभी वृद्धि होती है और कभी ह्रास । यह इसका सनातन स्वभाव है । शक्र! इस बातको मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ २६ ॥
त्वमप्येवमवेक्षस्व माऽऽत्मना विस्मयं गमः ।
प्रभवश्च प्रभावश्च नात्मसंस्थः कदाचन ॥ २७ ॥
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तुम भी जगत्को इसी दृष्टिसे देखो । अपने मनमें विस्मित न होओ । प्रभुता और प्रभाव अपने अधीन नहीं हैं ॥ २७ ॥
कौमारमेव ते चित्तं तथैवाद्य यथा पुरा समवेक्षस्व मघवन् बुद्धिं विन्दस्व नैष्ठिकीम् ॥ २८ ॥
तुम्हारा चित्त अभी बालकके समान है । वह जैसा पहले था, वैसा ही आज भी है ।
मघवन्! इस बातकी ओर दृष्टिपात करो और नैष्ठिक बुद्धि प्राप्त करो ॥ २८ ॥
देवा मनुष्याः पितरो गन्धर्वोरगराक्षसाः ।
आसन् सर्वे मम वशे तत् सर्वं वेत्थ वासव ॥ २ ९ ॥
वासव! एक दिन देवता, मनुष्य, पितर, गन्धर्व, नाग और राक्षस – ये सभी मेरे अधीन थे । वह सब कुछ तुम जानते हो ॥ २ ९ ॥
नमस्तस्यै दिशेऽप्यस्तु यस्यां वैरोचनो बलिः ।
इति मामभ्यपद्यन्त बुद्धिमात्सर्यमोहिताः ॥ ३० ॥
मेरे शत्रु अपने बुद्धिगत द्वेषसे मोहित होकर मेरी शरण ग्रहण करते हुए ऐसा कहा करते थे कि विरोचनकुमार बलि जिस दिशामें हों, उस दिशाको भी हमारा नमस्कार है ॥ ३० ॥
नाहं तदनुशोचामि नात्मभ्रंशं शचीपते ।
एवं मे निश्चिता बुद्धिः शास्तुस्तिष्ठाम्यहं वशे ॥ ३१ ॥
शचीपते! मुझे अपने इस पतनके लिये तनिक भी शोक नहीं होता है, मेरी बुद्धिका ऐसा निश्चय है कि मैं सदा सबके शासक ईश्वरके वशमें हूँ ॥ ३१ ॥
दृश्यते हि कुले जातो दर्शनीयः प्रतापवान् ।
दुःखं जीवन् सहामात्यो भवितव्यं हि तत् तथा ॥ ३२ ॥
एक उच्चकुलमें उत्पन्न हुआ दर्शनीय एवं प्रतापी पुरुष अपने मन्त्रियोंके साथ दुःखपूर्वक जीवन बिताता देखा जाता है, उसका वैसा ही भवितव्य था ॥ ३२ ॥
दौष्कुलेयस्तथा मूढो दुर्जातः शक्र दृश्यते ।
सुखं जीवन् सहामात्यो भवितव्यं हि तत् तथा ॥ ३३ ॥
इन्द्र! एक नीच कुलमें उत्पन्न हुआ मूढ़ मनुष्य जिसका जन्म दुराचारसे हुआ है, अपने मन्त्रियोंसहित सुखी जीवन बिताता देखा जाता है । उसकी भी वैसी ही होनहार समझनी चाहिये ॥ ३३ ॥
कल्याणी रूपसम्पन्ना दुर्भगा शक्र दृश्यते ।
अलक्षणा विरूपा च सुभगा दृश्यते परा ॥ ३४ ॥
शक्र! एक कल्याणमय आचार- विचार रखनेवाली सुरूपवती युवती विधवा हुई देखी जाती है और दूसरी कुलक्षणा और कुरूपा स्त्री सौभाग्यवती दिखायी देती है ॥ ३४ ॥
नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र त्वया कृतम् ।