05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1471–1480
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1471–1480
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यत् त्वमेवंगतो वज्रिन् यच्चाप्येवंगता वयम् ॥ ३५ ॥
वज्रधारी इन्द्र! आज तो तुम इस तरह समृद्धिशाली हो गये हो और हमलोग जो ऐसी अवस्थामें पहुँच गये हैं, यह न तो हमारा किया हुआ है और न तुमने ही कुछ किया ॥ ३५ ॥
न कर्म भविताप्येतत् कृतं मम शतक्रतो ।
ऋद्धिर्वाऽप्यथवा नर्द्धिः पर्यायकृतमेव तत् ॥ ३६ ॥
शतक्रतो! इस समय मैं इस परिस्थितिमें हूँ और जो कर्म मेरे इस शरीरसे हो रहा है, यह सब मेरा किया हुआ नहीं है । समृद्धि और निर्धनता ( प्रारब्धके अनुसार) बारी - बारीसे सबपर आती है ॥ ३६ ॥
पश्यामि त्वां विराजन्तं देवराजमवस्थितम् ।
श्रीमन्तं द्युतिमन्तं च गर्जमानं ममोपरि ॥ ३७ ॥
मैं देखता हूँ, इस समय तुम देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हो । अपने कान्तिमान् और तेजस्वी स्वरूपसे विराज रहे हो और मेरे ऊपर बारंबार गर्जना करते हो ॥
एवं नैव न चेत् कालो मामाक्रम्य स्थितो भवेत् ।
पातयेयमहं त्वाद्य सवज्रमपि मुष्टिना ॥ ३८ ॥
परंतु यदि इस तरह काल मुझपर आक्रमण करके मेरे सिरपर सवार न होता तो मैं आज वज्र लिये होनेपर भी तुम्हें केवल मुक्केसे मारकर धरतीपर गिरा देता ॥
न तु विक्रमकालोऽयं शान्तिकालोऽयमागतः ।
कालः स्थापयते सर्वं कालः पचति वै तथा ॥ ३ ९ ॥
किंतु यह मेरे लिये पराक्रम प्रकट करनेका समय नहीं है; अपितु शान्त रहनेका समय आया है । काल ही सबको विभिन्न अवस्थाओंमें स्थापित करके सबका पालन करता है और काल ही सबको पकाता ( क्षीण करता ) है ॥ ३ ९ ॥
मां चेदभ्यागतः कालो दानवेश्वरपूजितम् ।
गर्जन्तं प्रतपन्तं च कमन्यं नागमिष्यति ॥ ४० ॥
एक दिन मैं दानवेश्वरोंद्वारा पूजित था और मैं भी गर्जता तथा अपना प्रताप सर्वत्र फैलाता था । जब मुझपर भी कालका आक्रमण हुआ है, तब दूसरे किसपर वह आक्रमण नहीं करेगा? ॥ ४० ॥
द्वादशानां तु भवतामादित्यानां महात्मनाम् ।
तेजांस्येकेन सर्वेषां देवराज धृतानि मे ॥ ४१ ॥
देवराज! तुमलोग जो बारह महात्मा आदित्य कहलाते हो, तुम सब लोगोंके तेज मैंने अकेले धारण कर रखे थे ॥ ४१ ॥
अहमेवोद्वहाम्यापो विसृजामि च वासव ।
तपामि चैव त्रैलोक्यं विद्योताम्यहमेव च ॥ ४२ ॥
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वासव! मैं ही सूर्य बनकर अपनी किरणोंद्वारा पृथ्वीका जल ऊपर उठाता और मेघ बनकर वर्षा करता था । मैं ही त्रिलोकीको ताप देता और विद्युत् बनकर प्रकाश फैलाता था ॥ ४२ ॥
संरक्षामि विलुम्पामि ददाम्यहमथाददे ।
संयच्छामि नियच्छामि लोकेषु प्रभुरीश्वरः ॥ ४३ ॥
मैं प्रजाकी रक्षा करता था और लुटेरोंको लूट भी लेता था । मैं सदा दान देता और प्रजासे कर लेता था । मैं ही सम्पूर्ण लोकोंका शासक और प्रभु होकर सबको संयम- नियममें रखता था ॥ ४३ ॥
तदद्य विनिवृत्तं मे प्रभुत्वममराधिप ।
कालसैन्यावगाढस्य सर्वं न प्रतिभाति मे ॥ ४४ ॥
अमरेश्वर! आज मेरी वह प्रभुता समाप्त हो गयी । कालकी सेनासे मैं आक्रान्त हो गया अतः मेरा वह सब ऐश्वर्य अब प्रकाशित नहीं हो रहा है ॥ ४४ ॥
नाहं कर्ता न चैव त्वं नान्यः कर्ता शचीपते ।
पर्यायेण हि भुज्यन्ते लोकाः शक्र यदृच्छया ॥ ४५ ॥
शचीपति इन्द्र! न मैं कर्ता हूँ, न तुम कर्ता हो और न कोई दूसरा ही कर्ता है । काल बारी - बारीसे अपनी इच्छाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंका उपभोग करता है ॥
मासमासार्धवेश्मानमहोरात्राभिसंवृतम् ।
ऋतुद्वारं वर्षमुखमायुर्वेदविदो जनाः ॥ ४६ ॥
वेदवेत्ता पुरुष कहते हैं कि मास और पक्ष कालके आवास ( शरीर ) हैं । दिन और रात उसके आवरण ( वस्त्र ) हैं। ऋतुएँ द्वार ( मन-इन्द्रिय) हैं और वर्ष मुख है । वह काल आयुस्वरूप है ॥ ४६ ॥
आहुः सर्वमिदं चिन्त्यं जनाः केचिन्मनीषया ।
अस्याः पञ्चैव चिन्तायाः पर्येष्यामि च पञ्चधा ॥ ४७ ॥
कुछ विद्वान् अपनी बुद्धिके बलसे कहते हैं कि यह सब कुछ कालसंज्ञक ब्रह्म है । इसका इसी रूपमें चिन्तन करना चाहिये । इस चिन्तनके मास आदि उपर्युक्त पाँच ही विषय हैं । मैं पूर्वोक्त पाँच भेदोंसे युक्त कालको जानता हूँ ॥ ४७ ॥
गम्भीरं गहनं ब्रह्म महत्तोयार्णवं यथा ।
अनादिनिधनं चाहुरक्षरं क्षरमेव च ॥ ४८ ॥
वह कालरूप ब्रह्म अनन्त जलसे भरे हुए महासागरके समान गम्भीर एवं गहन है ।
उसका कहीं आदि - अन्त नहीं है । उसे ही क्षर एवं अक्षररूप बताया गया है ॥
सत्त्वेषु लिङ्गमावेश्य निर्लिङ्गमपि तत् स्वयम् ।
मन्यन्ते ध्रुवमेवैनं ये जनास्तत्त्वदर्शिनः ॥ ४ ९ ॥
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जो लोग तत्त्वदर्शी हैं, वे निश्चितरूपसे ऐसा मानते हैं कि वह कालरूप परब्रह्म परमात्मा स्वयं निराकार होते हुए भी समस्त प्राणियोंके भीतर जीवका प्रवेश कराता है ॥ ४ ९ ॥
भूतानां तु विपर्यासं कुरुते भगवानिति ।
न ह्येतावद् भवेद् गम्यं न यस्मात् प्रभवेत् पुनः ॥ ५० ॥
भगवान् काल ही समस्त प्राणियोंकी अवस्थामें उलट - फेर कर देते हैं । कोई भी व्यक्ति उनके इस माहात्म्यको समझ नहीं पाता । कालकी ही महिमासे पराजित होकर मनुष्य कुछ भी कर नहीं पाता ॥ ५० ॥
गतिं हि सर्वभूतानामगत्वा क्व गमिष्यति ।
यो धावता न हातव्यस्तिष्ठन्नपि न हीयते ॥ ५१ ॥
तमिन्द्रियाणि सर्वाणि नानुपश्यन्ति प्रञ्चधा ।
आहुश्चैनं केचिदग्निं केचिदाहुः प्रजापतिम् ॥ ५२ ॥
देवराज! समस्त प्राणियोंकी गति जो काल है, उसको प्राप्त हुए बिना तुम कहाँ जाओगे? मनुष्य भागकर भी उसे छोड़ नहीं सकता -उससे दूर नहीं जा सकता और न खड़ा होकर ही उसके चंगुल से छूट सकता है। श्रवण आदि समस्त इन्द्रियाँ मास - पक्ष आदि पाँच भेदोंसे युक्त उस कालका अनुभव नहीं कर पातीं । कुछ लोग इन कालदेवताको अग्नि कहते हैं और कुछ प्रजापति ॥
ऋतून् मासार्धमासांश्च दिवसांश्च क्षणांस्तथा ।
पूर्वाह्णमपराह्णे च मध्याह्नमपि चापरे ॥ ५३ ॥
मुहूर्तमपि चैवाहुरेकं सन्तमनेकधा ।
तं कालमिति जानीहि यस्य सर्वमिदं वशे ॥ ५४ ॥
दूसरे लोग उस कालको ऋतु, मास, पक्ष, दिन, क्षण, पूर्वाह्न, अपराह्न और मध्याह्न कहते हैं । उसीको विद्वान् पुरुष मुहूर्त भी कहते हैं । वह एक होकर भी अनेक प्रकारका बताया जाता है । इन्द्र! तुम उस कालको इस प्रकार जानो । यह सारा जगत् उसीके अधीन है ॥
बहूनीन्द्रसहस्राणि समतीतानि वासव ।
बलवीर्योपपन्नानि यथैव त्वं शचीपते ॥ ५५ ॥
शचीपति इन्द्र! जैसे तुम हो, वैसे ही बल और पराक्रमसे सम्पन्न अनेक सहस्र इन्द्र समाप्त हो चुके हैं ॥
त्वामप्यतिबलं शक्र देवराजं बलोत्कटम् ।
प्राप्ते काले महावीर्यः कालः संशमयिष्यति ॥ ५६ ॥
शक्र! तुम अपनेको अत्यन्त शक्तिशाली और उत्कट बलसे युक्त देवराज समझते हो; परंतु समय आनेपर महापराक्रमी काल तुम्हें भी शान्त कर देगा ॥ ५६ ॥
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य इदं सर्वमादत्ते तस्माच्छक्र स्थिरो भव ।
मया त्वया च पूर्वैश्च न स शक्योऽतिवर्तितुम् ॥ ५७ ॥
इन्द्र! वह काल ही सम्पूर्ण जगत्को अपने वशमें कर लेता है; अतः तुम भी स्थिर रहो ।
मैं, तुम तथा हमारे पूर्वज भी कालकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकते ॥ ५७ ॥
यामेतां प्राप्य जानीषे राज्यश्रियमनुत्तमाम् ।
स्थिता मयीति तन्मिथ्या नैषा ह्येकत्र तिष्ठति ॥ ५८ ॥
तुम जिस इस परम उत्तम राजलक्ष्मीको पाकर यह जानते हो कि यह मेरे पास स्थिरभावसे रहेगी, तुम्हारी यह धारणा मिथ्या है; क्योंकि यह कहीं एक जगह बँधकर नहीं रहती है ॥ ५८ ॥
स्थिता हीन्द्र सहस्रेषु त्वद्विशिष्टतमेष्वियम् ।
मां च लोला परित्यज्य त्वामगाद् विबुधाधिप ॥ ५ ९ ॥
इन्द्र! यह लक्ष्मी तुमसे भी श्रेष्ठ सहस्रों पुरुषोंके पास रह चुकी है । देवेश्वर! इस समय यह चंचला मुझे भी छोड़कर तुम्हारे पास गयी है ॥ ५ ९ ॥
मैवं शक्र पुनः कार्षीः शान्तो भवितुमर्हसि ।
त्वामप्येवंविधं ज्ञात्वा क्षिप्रमन्यं गमिष्यति ॥ ६० ॥
शक्र! अब फिर तुम ऐसा बर्ताव न करना । अब तुमको शान्ति धारण कर लेनी चाहिये । तुम्हें भी मेरी- जैसी स्थितिमें जानकर यह लक्ष्मी शीघ्र किसी दूसरेके पास चली जायगी ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि बलिवासवसंवादे चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें बलि और इन्द्रका संवादविषयक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२४ ॥
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पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इन्द्र और लक्ष्मीका संवाद, बलिको त्यागकर आयी हुई लक्ष्मीकी इन्द्रके द्वारा प्रतिष्ठा भीष्म उवाच
शतक्रतुरथापश्यद् बलेर्दीप्तां महात्मनः ।
स्वरूपिणीं शरीराद्धि निष्क्रामन्तीं तदा श्रियम् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर इन्द्रने देखा कि महात्मा बलिके शरीरसे परम सुन्दरी तथा कान्तिमती लक्ष्मी मूर्तिमती होकर निकल रही हैं ॥ १ ॥
तां दृष्ट्वा प्रभया दीप्तां भगवान् पाकशासनः ।
विस्मयोत्फुल्लनयनो बलिं पप्रच्छ वासवः ॥ २ ॥
पाकशासन भगवान् इन्द्र प्रभासे प्रकाशित होनेवाली उस लक्ष्मीको देखकर
आश्चर्यचकित हो उठे । उनके नेत्र विस्मयसे खिल उठे । उन्होंने बलिसे पूछा ॥ २ ॥
शक्र उवाच
बले केयमपक्रान्ता रोचमाना शिखण्डिनी ।
त्वत्तः स्थिता सकेयूरा दीप्यमाना स्वतेजसा ॥ ३ ॥
इन्द्र बोले- बले! यह वेणी धारण करनेवाली कान्तिमयी कौन सुन्दरी तुम्हारे शरीरसे निकल कर खड़ी है? इसकी भुजाओंमें बाजूबंद शोभा पा रहे हैं और यह अपने तेजसे उद्भासित हो रही है ॥ ३ ॥
बलिरुवाच
न हीमामासुरीं वेद्मि न दैवीं च न मानुषीम् ।
त्वमेनां पृच्छ वा मा वा यथेष्टं कुरु वासव ॥ ४ ॥
बलिने कहा — इन्द्र! मेरी समझमें न तो यह असुरकुलकी स्त्री है, न देवजातिकी है और न मानवी ही है । तुम जानना चाहते हो तो इसीसे पूछो अथवा न पूछो । जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा करो ॥ ४ ॥
शक्र उवाच
का त्वं बलेरपक्रान्ता रोचमाना शिखण्डिनी ।
अजानतो ममाचक्ष्व नामधेयं शुचिस्मिते ॥ ५ ॥
का त्वं तिष्ठसि मामेवं दीप्यमाना स्वतेजसा ।
हित्वा दैत्यवरं सुभ्रु तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ६ ॥
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तब इन्द्रने पूछा- पवित्र मुसकानवाली सुन्दरी! बलिके शरीरसे निकलकर खड़ी हुई तुम कौन हो? तुम्हारी चमक - दमक अद्भुत है । तुम्हारी वेणी भी अत्यन्त सुन्दर है । मैं तुम्हें जानता नहीं हूँ; इसलिये पूछता हूँ । तुम मुझे अपना नाम बताओ । सुभ्रू! दैत्यराजको त्यागकर अपने तेजसे मुझे प्रकाशित करती हुई इस प्रकार तुम कौन खड़ी हो? मेरे प्रश्नके अनुसार अपना परिचय दो ॥ ५-६ ॥ श्रीरुवाच
मां विरोचनो वेद नायं वैरोचनो बलिः ।
आहुर्मां दुःसहेत्येवं विधित्सेति च मां विदुः ॥ ७ ॥
लक्ष्मी बोली- मुझे न तो विरोचन जानता है और न उसका पुत्र यह बलि । लोग मुझे दुःसहा कहते हैं और कुछ लोग मुझे विधित्साके नामसे भी जानते हैं ॥
भूतिर्लक्ष्मीति मामाहुः श्रीरित्येवं च वासव ।
त्वं मां शक्र न जानीषे सर्वे देवा न मां विदुः ॥ ८ ॥
वासव! जानकार मनुष्य मुझे भूति, लक्ष्मी और श्री भी कहते हैं । शक्र! तुम मुझे नहीं जानते तथा सम्पूर्ण देवताओंको भी मेरे विषयमें कुछ भी ज्ञान नहीं है ॥ ८ ॥
शक्र उवाच
किमिदं त्वं मम कृते उताहो बलिनः कृते ।
दुःसहे विजहास्येनं चिरसंवासिनी सती ॥ ९ ॥
इन्द्रने पूछा– दुःसहे! तुमने चिरकालतक राजा बलिके शरीरमें निवास किया है, अब क्या तुम मेरे लिये अथवा बलिके ही हितके लिये इनका त्याग कर रही हो? ॥ ९ ॥
श्रीरुवाच
धाता न विधाता मां विदधाति कथंचन ।
कालस्तु शक्र पर्यागान्मैनं शक्रावमन्यथाः ॥ १० ॥
लक्ष्मीने कहा — इन्द्र! धाता या विधाता किसी प्रकार भी मुझे किसी कार्यमें नियुक्त नहीं कर सकते हैं; किंतु कालका ही आदेश मुझे मानना पड़ता है । वही काल इस समय बलिका परित्याग करनेके लिये मुझे प्रेरित करनेके निमित्त उपस्थित हुआ है । इन्द्र! तुम उस कालकी अवहेलना न करना ॥ १० ॥
शक्र उवाच
कथं त्वया बलिस्त्यक्तः किमर्थं वा शिखण्डिनि ।
कथं च मां न जह्यास्त्वं तन्मे ब्रूहि शुचिस्मिते ॥ ११ ॥
इन्द्रने पूछा - वेणी धारण करनेवाली लक्ष्मी! तुमने बलिका कैसे और किसलिये त्याग किया है? शुचिस्मिते! तुम मेरा त्याग किस प्रकार नहीं करोगी? यह मुझे बताओ ॥ ११ ॥
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श्रीरुवाच
सत्ये स्थितास्मि दाने च व्रते तपसि चैव हि ।
पराक्रमे च धर्मे च पराचीनस्ततो बलिः ॥ १२ ॥
लक्ष्मीने कहा- मैं सत्य, दान, व्रत, तपस्या, पराक्रम और धर्ममें निवास करती हूँ ।
राजा बलि इन सबसे विमुख हो चुके हैं ॥ १२ ॥
ब्रह्मण्यो ऽयं पुरा भूत्वा सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
अभ्यसूयद् ब्राह्मणानामुच्छिष्टश्चास्पृशद् घृतम् ॥ १३ ॥
ये पहले ब्राह्मणोंके हितैषी, सत्यवादी और जितेन्द्रिय थे; किंतु आगे चलकर ब्राह्मणोंके प्रति इनकी दोषदृष्टि हो गयी तथा इन्होंने जूठे हाथसे घी छू दिया था ॥ १३ ॥
यज्ञशीलः सदा भूत्वा मामेव यजत स्वयम् ।
प्रोवाच लोकान् मूढात्मा कालेनोपनिपीडितः ॥ १४ ॥
पहले ये सदा यज्ञ किया करते थे; किंतु आगे चलकर कालसे पीड़ित एवं मोहितचित्त होकर इन्होंने सब लोगोंको स्वयं ही स्पष्टरूपसे आदेश दिया कि तुम सब लोग मेरा ही यजन करो ॥ १४ ॥
अपाकृता ततः शक्र त्वयि वत्स्यामि वासव ।
अप्रमत्तेन धार्यास्मि तपसा विक्रमेण च ॥ १५ ॥
वासव! इस प्रकार इनके द्वारा तिरस्कृत होकर अब मैं तुममें ही निवास करूंगी । तुम्हें सदा सावधान रहकर तपस्या और पराक्रमद्वारा मुझे धारण करना चाहिये ॥ शक्र उवाच
नास्ति देवमनुष्येषु सर्वभूतेषु वा पुमान् ।
यस्त्वामेको विषहितुं शक्नुयात् कमलालये ॥ १६ ॥
इन्द्रने कहा – कमलालये! देवताओं, मनुष्यों अथवा सम्पूर्ण प्राणियोंमें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है जो अकेला तुम्हारा भार सहन कर सके? ॥ १६ ॥
श्रीरुवाच
नैव देवो न गन्धर्वो नासुरो न च राक्षसः ।
यो मामेको विषहितुं शक्तः कश्चित् पुरंदर ॥ १७ ॥
लक्ष्मीने कहा — पुरंदर! देवता, गन्धर्व, असुर और राक्षस कोई भी अकेला मेरा भार सहन नहीं कर सकता ॥ १७ ॥
शक्र उवाच
तिष्ठेथा मयि नित्यं त्वं यथा तद् ब्रूहि मे शुभे ।
तत् करिष्यामि ते वाक्यमृतं तत् वक्तुमर्हसि ॥ १८ ॥
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इन्द्रने कहा- शुभे! तुम जिस प्रकार मेरे निकट सदा निवास कर सको, वह उपाय मुझे बताओ । मैं तुम्हारी आज्ञाका यथार्थरूपसे पालन करूँगा; क्योंकि तुम वह उपाय मुझे अवश्य बता सकती हो ॥ १८ ॥
श्रीरुवाच
स्थास्यामि नित्यं देवेन्द्र यथा त्वयि निबोध तत् ।
विधिना वेददृष्टेन चतुर्धा विभजस्व माम् ॥ १ ९ ॥
लक्ष्मीने कहा — देवेन्द्र! मैं जिस उपायसे तुम्हारे निकट सदा निवास कर सकूँगी, वह बताती हूँ, सुनो । तुम वेदमें बतायी हुई विधिसे मुझे चार भागोंमें विभक्त करो ॥ १ ९ ॥ शक्र उवाच
अहं वै त्वां निधास्यामि यथाशक्ति यथाबलम् ।
न तु मेऽतिक्रमः स्याद् वै सदा लक्ष्मि तवान्तिके ॥ २० ॥
इन्द्रने कहा — लक्ष्मी! मैं शारीरिक बल और मानसिक शक्तिके अनुसार तुम्हें धारण करूँगा, किंतु तुम्हारे निकट कभी मेरा परित्याग न हो ॥ २० ॥
भूमिरेव मनुष्येषु धारिणी भूतभाविनी ।
सा ते पादं तितिक्षेत समर्था हीति मे मतिः ॥ २१ ॥
मेरी यह धारणा है कि मनुष्यलोकमें सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाली यह पृथ्वी ही सबको धारण करती है । वह तुम्हारे पैरका भार सह सकेगी; क्योंकि वह सामर्थ्यशालिनी है ॥ २१ ॥
श्रीरुवाच
एष मे निहितः पादो योऽयं भूमौ प्रतिष्ठितः ।
द्वितीयं शक्र पादं मे तस्मात् सुनिहितं कुरु ॥ २२ ॥
लक्ष्मीने कहा — इन्द्र! यह जो मेरा एक पैर पृथ्वी पर रखा हुआ है, इसे मैंने यहीं प्रतिष्ठित कर दिया । अब तुम मेरे दूसरे पैरको भी सुप्रतिष्ठित करो ॥ २२ ॥
शक्र उवाच
आप एव मनुष्येषु द्रवन्त्यः परिचारिणीः ।
तास्ते पादं तितिक्षन्तामलमापस्तितिक्षितुम् ॥ २३ ॥
इन्द्रने कहा – लक्ष्मी! मनुष्यलोकमें जल ही सब ओर प्रवाहित होता है; अतः वही तुम्हारे दूसरे पैरका भार सहन करे; क्योंकि जल इस कार्यके लिये पूर्ण समर्थ है ॥ २३ ॥
श्रीरुवाच एष मे निहितः पादो योऽयमप्सु प्रतिष्ठितः ।
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तृतीयं शक्र पादं मे तस्मात् सुनिहितं कुरु ॥ २४ ॥
लक्ष्मीने कहा– इन्द्र! लो, मैंने यह पैर जलमें रख दिया । अब यह जलमें ही सुप्रतिष्ठित है । अब तुम मेरे तीसरे पैरको भलीभाँति स्थापित करो ॥ २४ ॥
शक्र उवाच
यस्मिन् वेदाश्च यज्ञाश्च यस्मिन् देवाः प्रतिष्ठिताः ।
तृतीयं पादमग्निस्ते सुधृतं धारयिष्यति ॥ २५ ॥
इन्द्रने कहा — देवि! जिसमें वेद, यज्ञ और सम्पूर्ण देवता प्रतिष्ठित हैं । वे अग्निदेव तुम्हारे तीसरे पैरको अच्छी तरह धारण करेंगे ॥ २५ ॥
श्रीरुवाच
एष मे निहितः पादो योऽयमग्नौ प्रतिष्ठितः ।
चतुर्थं शक्र पादं मे तस्मात् सुनिहितं कुरु ॥ २६ ॥
लक्ष्मीने कहा–इन्द्र! यह तीसरा पाद मैंने अग्निमें रख दिया । अब यह अग्निमें प्रतिष्ठित है । इसके बाद मेरे चौथे पादको भलीभाँति स्थापित करो ॥ २६ ॥
शक्र उवाच
ये वै सन्तो मनुष्येषु ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः ।
ते ते पादं तितिक्षन्तामलं सन्तस्तितिक्षितुम् ॥ २७ ॥
इन्द्र बोले – देवि! मनुष्योंमें जो ब्राह्मणभक्त और सत्यवादी श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे आपके चौथे पादका भार वहन करें; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष उसे सहन करनेमें पूर्ण समर्थ हैं ॥ २७ ॥
श्रीरुवाच
एष मे निहितः पादो योऽयं सत्सु प्रतिष्ठितः ।
एवं हि निहितां शक्र भूतेषु परिधत्स्व माम् ॥ २८ ॥
लक्ष्मीने कहा — इन्द्र! यह मैंने अपना चौथा पाद रखा । अब यह सत्पुरुषोंमें प्रतिष्ठित हुआ। इसी प्रकार तुम अब सम्पूर्ण भूतोंमें मुझे स्थापित करके सब ओरसे मेरी रक्षा करो ॥ २८ ॥
शक्र उवाच
भूतानामिह यो वै त्वां मया विनिहितां सतीम् ।
उपहन्यात् स मे धृष्यस्तथा शृण्वन्तु मे वचः ॥ २ ९ ॥
इन्द्रने कहा — देवि! मेरेद्वारा स्थापित की हुई आपको समस्त प्राणियोंमेंसे जो भी
पीड़ा देगा, वह मेरेद्वारा दण्डनीय होगा । मेरी यह बात वे सब लोग सुन लें ॥
ततस्त्यक्तः श्रिया राजा दैत्यानां बलिरब्रवीत् ।
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यावत् पुरस्तात् प्रतपेत् तावद् वै दक्षिणां दिशम् ।
पश्चिमां तावदेवापि तथोदीचीं दिवाकरः ॥ ३० ॥
तदनन्तर लक्ष्मीसे परित्यक्त होकर दैत्यराज बलिने कहा – ' सूर्य जबतक पूर्वदिशामें प्रकाशित होंगे, तभीतक वे दक्षिण, पश्चिम और उत्तरदिशाको भी प्रकाशित करेंगे ॥
तथा मध्यंदिने सूर्यो नास्तमेति यदा तदा ।
पुनर्देवासुरं युद्धं भावि जेतास्मि वस्तदा ॥ ३१ ॥
‘ जब सूर्य केवल मध्याह्नकालमें ही स्थित रहेंगे, अस्ताचलको नहीं जायँगे, उस समय पुनः देवासुरसंग्राम होगा और उसमें मैं तुम सब देवताओंको परास्त करूँगा ॥
सर्वलोकान् यदाऽऽदित्य एकस्थस्तापयिष्यति ।
तदा देवासुरे युद्धे जेताहं त्वां शतक्रतो ॥ ३२ ॥
‘ शतक्रतो! जब सूर्य एक स्थान अर्थात् ब्रह्मलोकमें ही स्थित होकर नीचेके सम्पूर्ण लोकोंको ताप देने लगेंगे, उस समय देवासुरसंग्राममें मैं तुम्हें अवश्य जीत लूँगा* ' ॥ शक्र उवाच
ब्रह्मणोऽस्मि समादिष्टो न हन्तव्यो भवानिति ।
तेन तेऽहं बले वज्रं न विमुञ्चामि मूर्धनि ॥ ३३ ॥
इन्द्रने कहा — बले! ब्रह्माजीने मुझे आज्ञा दी है कि तुम बलिका वध न करना; इसीलिये तुम्हारे मस्तकपर मैं अपना वज्र नहीं छोड़ रहा हूँ ॥ ३३ ॥
यथेष्टं गच्छ दैत्येन्द्र स्वस्ति तेऽस्तु महासुर ।
आदित्यो नैव तपिता कदाचिन्मध्यतः स्थितः ॥ ३४ ॥
दैत्यराज! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चले जाओ । महान् असुर! तुम्हारा कल्याण हो । सूर्य कभी मध्याह्नमें ही स्थित होकर सम्पूर्ण लोकोंको ताप नहीं देंगे ॥ ३४ ॥
स्थापितो ह्यस्य समयः पूर्वमेव स्वयम्भुवा ।
अजस्रं परियात्येष सत्येनावतपन् प्रजाः ॥ ३५ ॥
ब्रह्माजीने पहलेसे ही उनके लिये मर्यादा स्थापित कर दी है, अतः उसी सत्यमर्यादाके अनुसार सूर्य सम्पूर्ण लोकोंको ताप प्रदान करते हुए निरन्तर परिभ्रमण करते हैं ॥ ३५ ॥
अयनं तस्य षण्मासानुत्तरं दक्षिणं तथा ।
येन संयाति लोकेषु शीतोष्णे विसृजन् रविः ॥ ३६ ॥
उनके दो मार्ग हैं— उत्तर और दक्षिण । छः महीनोंका उत्तरायण होता है और छः महीनोंका दक्षिणायन । उसीसे सम्पूर्ण जगत्में सर्दी-गर्मीकी सृष्टि करते हुए सूर्यदेव भ्रमण करते हैं ॥ ३६ ॥
भीष्म उवाच एवमुक्तस्तु दैत्येन्द्रो बलिरिन्द्रेण भारत ।