05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1531–1540

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1531–1540

पृष्ठ 1531

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( अब कालका विभाग इस प्रकार समझना चाहिये ) पंद्रह निमेषकी एक काष्ठा और तीस काष्ठाकी एक कला गिननी चाहिये । तीस कलाका एक मुहूर्त होता है । उसके साथ कलाका दसवाँ भाग और सम्मिलित होता है अर्थात् तीस कला और तीन काष्ठाका एक मुहूर्त होता है ॥ १२ ॥

त्रिंशन्मुहूर्त तु भवेदहश्च रात्रिश्च संख्या मुनिभिः प्रणीता । मासः स्मृतो रात्र्यहनी च त्रिंशत् संवत्सरो द्वादशमास उक्तः ॥ १३ ॥

तीस मुहूर्तका एक दिन- रात होता है । महर्षियोंने दिन और रात्रिके मुहूर्तोंकी संख्या उतनी ही बतायी है । तीस रात - दिनका एक मास और बारह मासोंका एक संवत्सर बताया गया है ॥ १३ ॥

संवत्सरं द्वे त्वयने वदन्ति संख्याविदो दक्षिणमुत्तरं च ॥ १४ ॥

विद्वान् पुरुष दो अयनोंको मिलाकर एक संवत्सर कहते हैं । वे दो अयन हैं — उत्तरायण और दक्षिणायन ॥ १४ ॥

अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके ।

रात्रिः स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः ॥ १५ ॥

मनुष्यलोकके दिन - रातका विभाग सूर्यदेव करते हैं । रात प्राणियोंके सोनेके लिये है और दिन काम करनेके लिये ॥ १५ ॥

पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः ।

शुक्लोऽहः कर्मचेष्टायां कृष्णः स्पप्नाय शर्वरी ॥ १६ ॥

मनुष्योंके एक मासमें पितरोंका एक दिन- रात होता है । शुक्लपक्ष उनके काम- काज करनेके लिये दिन है और कृष्णपक्ष उनके विश्रामके लिये रात है ॥ १६ ॥

दैवे रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः ।

अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद् दक्षिणायनम् ॥ १७ ॥

मनुष्योंका एक वर्ष देवताओंके एक दिन- रातके बराबर है, उनके दिन - रातका विभाग इस प्रकार है । उत्तरायण उनका दिन है और दक्षिणायन उनकी रात्रि ॥ १७ ॥

ये ते रात्र्यहनी पूर्वं कीर्तिते जीवलौकिके ।

तयोः संख्याय वर्षाग्रं ब्राह्मे वक्ष्याम्यहःक्षपे ॥ १८ ॥

पृथक् संवत्सराग्राणि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।

कृते त्रेतायुगे चैव द्वापरे च कलौ तथा ॥ १ ९ ॥

पहले मनुष्योंके जो दिन- रात बताये गये हैं, उन्हींकी संख्याके हिसाब से अब मैं ब्रह्माके दिन - रातका मान बताता हूँ । साथ ही सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग — इन चारों

पृष्ठ 1532

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युगोंकी वर्ष- संख्या भी अलग - अलग बता रहा हूँ ॥ १८-१९ ॥

चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् ।

तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ॥ २० ॥

देवताओंके चार हजार वर्षोंका एक सत्ययुग होता है । सत्ययुगमें चार सौ दिव्य वर्षोंकी संध्या होती है और उतने ही वर्षोंका एक संध्यांश भी होता है ( इस प्रकार सत्ययुग अड़तालीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है ) ॥ २० ॥

इतरेषु ससंध्येषु संध्यांशेषु ततस्त्रिषु ।

एक पादेन हीयन्ते सहस्राणि शतानि च ॥ २१ ॥

संध्या और संध्यांशोंसहित अन्य तीन युगों में यह (चार हजार आठ सौ वर्षोंकी) संख्या क्रमशः एक- एक चौथाई घटती जाती है * ॥ २१ ॥

एतानि शाश्वताँल्लोकान् धारयन्ति सनातनान् ।

एतद् ब्रह्मविदां तात विदितं ब्रह्म शाश्वतम् ॥ २२ ॥

ये चारों युग प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाले सनातन लोकोंको धारण करते हैं । तात! यह युगात्मक काल ब्रह्मवेत्ताओंके सनातन ब्रह्मका ही स्वरूप है ॥ २२ ॥

चतुष्पात् सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे ।

नाधर्मेणागमः कश्चित् परस्तस्य प्रवर्तते ॥ २३ ॥

सत्ययुगमें सत्य और धर्मके चारों चरण मौजूद रहते हैं— उस समय सत्य और धर्मका पूरा- पूरा पालन होता है उस समय कोई भी धर्मशास्त्र अधर्मसे संयुक्त नहीं होता; उसका उत्तम रीतिसे पालन होता है ॥ २३ ॥

इतरेष्वागमाद् धर्मः पादशस्त्ववरोप्यते ।

चौर्यकानृतमायाभिरधर्मश्चोपचीयते ॥ २४ ॥

अन्य युगोंमें शास्त्रोक्त धर्मका क्रमशः एक-एक चरण क्षीण होता जाता है और चोरी, असत्य तथा छल - कपट आदिके द्वारा अधर्मकी वृद्धि होने लगती है ॥

अरोगाः सर्वसिद्धार्थाश्चतुर्वर्षशतायुषः ।

कृते त्रेतायुगे त्वेषां पादशो हसते वयः ॥ २५ ॥

सत्ययुगके मनुष्य नीरोग होते हैं । उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध होती हैं तथा वे चार सौ वर्षोंकी आयुवाले होते हैं । त्रेतायुग आनेपर उनकी आयु एक चौथाई घटकर तीन सौ वर्षोंकी रह जाती है । इसी प्रकार द्वापरमें दो सौ और कलियुगमें सौ वर्षोंकी आयु होती है ॥ २५ ॥

वेदवादाश्चानुयुगं हसन्तीतीह नः श्रुतम् ।

आयूंषि चाशिषश्चैव वेदस्यैव च यत्फलम् ॥ २६ ॥

त्रेता आदि युगोंमें वेदोंका स्वाध्याय और मनुष्योंकी आयु घटने लगती है, ऐसा सुना गया है । उनकी कामनाओंकी सिद्धिमें भी बाधा पड़ती है और वेदाध्ययनके फलमें भी

पृष्ठ 1533

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न्यूनता आ जाती है ॥ २६ ॥

अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरेऽपरे ।

अन्ये कलियुगे नृणां युगह्रासानुरूपतः ॥ २७ ॥

युगोंके ह्रासके अनुसार सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुगमें मनुष्योंके धर्म भी भिन्न-भिन्न प्रकारके हो जाते हैं ॥ २७ ॥

तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुत्तमम् ।

द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे ॥ २८ ॥

सत्ययुगमें तपस्याको ही सबसे बड़ा धर्म माना गया है। त्रेतामें ज्ञानको ही उत्तम बताया गया है । द्वापरमें यज्ञ और कलियुगमें एकमात्र दान ही श्रेष्ठ कहा गया है ॥ २८ ॥

एतां द्वादशसाहस्रीं युगाख्यां कवयो विदुः ।

सहस्रपरिवर्तं तद् ब्राह्मं दिवसमुच्यते ॥ २ ९ ॥

इस प्रकार देवताओंके बारह हजार वर्षोंका एक चतुर्युग होता है; यह विद्वानोंकी मान्यता है । एक सहस्र चतुर्युगको ब्रह्माका एक दिन बताया जाता है ॥ २ ९ ॥

रात्रिमेतावतीं चैव तदादौ विश्वमीश्वरः ।

प्रलये ध्यानमाविश्य सुप्त्वा सोऽन्ते विबुद्धयते ॥ ३० ॥

इतने ही युगोंकी उनकी एक रात्रि भी होती है । भगवान् ब्रह्मा अपने दिनके आरम्भमें संसारकी सृष्टि करते हैं और रातमें जब प्रलयका समय होता है, तब सबको अपनेमें लीन करके योगनिद्राका आश्रय ले सो जाते हैं; फिर प्रलयका अन्त होने अर्थात् रात बीतनेपर वे जाग उठते हैं ॥ ३० ॥

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।

रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ ३१ ॥

एक हजार चतुर्युगका जो ब्रह्माका एक दिन बताया गया है और उतनी ही बड़ी जो उनकी रात्रि कही गयी है, उसको जो लोग ठीक -ठीक जानते हैं, वे ही दिन और रात अर्थात् कालतत्त्वको जाननेवाले हैं ॥

प्रतिबुद्धो विकुरुते ब्रह्माक्षय्यं क्षपाक्षये ।

सृजते च महद्भूतं तस्माद् व्यक्तात्मकं मनः ॥ ३२ ॥

रात्रि समाप्त होनेपर जाग्रत् हुए ब्रह्माजी पहले अपने अक्षय स्वरूपको मायासे विकारयुक्त बनाते हैं फिर महत्तत्त्वको उत्पन्न करते हैं । तत्पश्चात् उससे स्थूल जगत्को धारण करनेवाले मनकी उत्पत्ति होती है ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३१ ॥

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इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकका अनुप्रश्नविषयक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २३१ ॥

* अर्थात् संध्या और संध्याशोंसहित त्रेतायुग छत्तीस सौ वर्षोंका, द्वापर चौबीस सौ वर्षोंका और कलियुग बारह सौ वर्षोंका होता है ।

पृष्ठ 1535

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द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति - क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश व्यास उवाच

ब्रह्म तेजोमयं शुक्रं यस्य सर्वमिदं जगत् ।

एकस्य ब्रह्मभूतस्य द्वयं स्थावरजङ्गमम् ॥ १ ॥

व्यासजी कहते हैं- बेटा! तेजोमय ब्रह्म ही सबका बीज है, उसीसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है । उस एक ही ब्रह्मसे स्थावर और जंगम दोनोंकी उत्पत्ति होती है ॥

अहर्मुखे विबुद्धः सन् सृजतेऽविद्यया जगत् ।

अग्र एव महद्भूतमाशु व्यक्तात्मकं मनः ॥ २ ॥

पहले कह आये हैं, ब्रह्माजी अपने दिनके आरम्भमें जागकर अविद्या (त्रिगुणात्मिका प्रकृतिके ) द्वारा सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं । सबसे पहले महत्तत्त्व प्रकट होता है । उससे स्थूल सृष्टिका आधारभूत मन उत्पन्न होता है ॥ २ ॥

अभिभूयेह चार्चिष्मद् व्यसृजत् सप्त मानसान् ।

दूरगं बहुधागामि प्रार्थनासंशयात्मकम् ॥ ३ ॥

उस मनकी दूरतक गति है तथा वह अनेक प्रकारसे गमनागमन करता है । प्रार्थना और संशय - वृत्तिशाली वह मन चैतन्यसे संयुक्त होकर सम्पूर्ण पदार्थोंको अभिभूत करके सात मानस ऋषियोंकी सृष्टि करता है ॥ ३ ॥

मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षया ।

आकाशं जायते तस्मात् तस्य शब्दं गुणं विदुः ॥ ४ ॥

फिर सृष्टिकी इच्छासे प्रेरित होनेपर मन नाना प्रकारकी सृष्टि करता है । उससे आकाशकी उत्पत्ति होती है । आकाशका गुण ' शब्द' माना गया है ॥ ४ ॥

आकाशात् तु विकुर्वाणात् सर्वगन्धवहः शुचिः ।

बलवान् जायते वायुस्तस्य स्पर्शो गुणो मतः ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् जब आकाशमें विकार होता है, तब उससे पवित्र और सम्पूर्ण गन्धोंको वहन करनेवाले बलवान् वायुतत्त्वका आविर्भाव होता है । उसका गुण 'स्पर्श' माना गया है ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1536

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वायोरपि विकुर्वाणाज्ज्योतिर्भवति भास्वरम् ।

रोचिष्णु जायते शुक्रं तद्रूपगुणमुच्यते ॥ ६ ॥

फिर वायुमें भी विकार होता है और उससे प्रकाशपूर्ण अग्नि- तत्त्व प्रकट होता है । वह अग्नि-तत्त्व चमचमाता हुआ एवं दीप्तिमान् है । उसका गुण ‘ रूप’ बताया जाता है ॥ ६ ॥

ज्योतिषोऽपि विकुर्वाणाद् भवन्त्यापो रसात्मिकाः ।

अद्भ्यो गन्धवहा भूमिः सर्वेषां सृष्टिरुच्यते ॥ ७ ॥

फिर अग्नि- तत्त्वमें विकार आनेपर रसमय जल तत्त्वकी उत्पत्ति होती है । जलसे गन्धका वहन करनेवाली पृथ्वीका प्रादुर्भाव होता है । इस प्रकार पञ्चमहाभूतोंकी सृष्टि बतायी जाती है ॥ ७ ॥

गुणाः सर्वस्य पूर्वस्य प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तरम् ।

तेषां यावद् यथा यच्च तत्तत् तावद्गुणं स्मृतम् ॥ ८ ॥

पीछे प्रकट हुए वायु आदि भूत उत्तरोत्तर अपने पूर्ववर्ती सभी भूतोंके गुण धारण करते हैं । इन सब भूतोंमेंसे जो भूत जितने समयतक जिस प्रकार रहता है, उसके गुण भी उतने ही समयतक रहते हैं ॥ ८ ॥

उपलभ्याप्सु चेद् गन्धं केचिद् ब्रूयुरनैपुणात् ।

पृथिव्यामेव तं विद्यादपां वायोश्च संश्रितम् ॥ ९ ॥

यदि कुछ मनुष्य जलमें गन्ध पाकर अयोग्यतावश यह कहने लगें कि यह जलका ही गुण है तो उनका वह कथन मिथ्या होगा; क्योंकि गन्ध वास्तवमें पृथ्वीका गुण है; अतः उसे पृथ्वीमें ही स्थित जानना चाहिये । जल और वायुमें तो वह आगन्तुककी भाँति स्थित होता है ॥ ९ ॥

एते सप्तविधात्मानो नानावीर्याः पृथक् पृथक् ।

नाशक्नुवन् प्रजाः स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः ॥ १० ॥

ये नाना प्रकारकी शक्तिवाले महत्तत्त्व, मन ( अहंकार ) और पञ्चसूक्ष्म महाभूत — सात पदार्थ पृथक् - पृथक् रहकर जबतक सब - के - सब मिल न सकें; तबतक उनमें प्रजाकी सृष्टि करनेकी शक्ति नहीं आयी ॥ १० ॥

ते समेत्य महात्मानो ह्यन्योन्यमभिसंश्रिताः ।

शरीराश्रयणं प्राप्तास्ततः पुरुष उच्यते ॥ ११ ॥

परंतु ये सातों व्यापक पदार्थ ईश्वरकी इच्छा होनेपर जब एक-दूसरेसे मिलकर परस्पर सहयोगी हो गये, तब भिन्न -भिन्न शरीरके आकारमें परिणत हुए । उस शरीरनामक पुरमें निवास करनेके कारण जीवात्मा पुरुष कहलाता है ॥ ११ ॥

शरीरं श्रयणाद् भवति मूर्तिमत् षोडशात्मकम् ।

पृष्ठ 1537

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तमाविशन्ति भूतानि महान्ति सह कर्मणा ॥ १२ ॥

पञ्च स्थूल महाभूत, दस इन्द्रियाँ और मन-इन सोलह तत्त्वोंसे शरीरका निर्माण हुआ है । इन सबका आश्रय होनेके कारण ही देहको शरीर कहते हैं । शरीरके उत्पन्न होनेपर उसमें जीवोंके भोगावशिष्ट कर्मोंके साथ सूक्ष्म महाभूत प्रवेश करते हैं ॥ १२ ॥

सर्वभूतान्युपादाय तपसश्चरणाय हि ।

आदिकर्ता स भूतानां तमेवाहुः प्रजापतिम् ॥ १३ ॥

भूतोंके आदि कर्ता ब्रह्माजी ही तपस्याके लिये समस्त सूक्ष्म भूतोंको साथ लेकर समष्टि शरीरमें प्रवेश करके स्थित होते हैं; इसलिये मुनिजन उन्हें प्रजापति कहते हैं ॥ १३ ॥

सवै सृजति भूतानि स्थावराणि चराणि च ।

ततः स सृजति ब्रह्मा देवर्षिपितृमानवान् ॥ १४ ॥

लोकान् नदीः समुद्रांश्च दिशः शैलान् वनस्पतीन् ।

नरकिन्नररक्षांसि वयःपशुमृगोरगान् ।

अव्ययं च व्ययं चैव द्वयं स्थावरजङ्गमम् ॥ १५ ॥

तदनन्तर वे ब्रह्मा ही चराचर प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं । वे ही देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य, नाना प्रकारके लोक, नदी, समुद्र, दिशा, पर्वत, वनस्पति, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, मृग तथा सर्पोंको भी उत्पन्न करते हैं । अक्षय आकाश आदि और क्षयशील चराचर प्राणियोंकी सृष्टि भी उन्हींके द्वारा हुई है ॥ १४-१५ ॥

तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे ।

तान्येव प्रतिपाद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ १६ ॥

पूर्वकल्पकी सृष्टिमें जिन प्राणियोंद्वारा जैसे कर्म किये गये होते हैं, दूसरे कल्पोंमें बारंबार जन्म लेनेपर वे उन पूर्वकृत कर्मोंकी वासनासे प्रभावित होनेके कारण वैसे ही कर्म करने लगते हैं ॥ १६ ॥

हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते ।

तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात् तत् तस्य रोचते ॥ १७ ॥

एक जन्ममें मनुष्य हिंसा -अहिंसा, कोमलता- कठोरता, धर्म- अधर्म और सच- झूठ आदि जिन गुणों या दोषोंको अपनाता है, दूसरे जन्ममें भी उनके संस्कारोंसे प्रभावित होकर उन्हीं गुणोंको वह पसंद करता और वैसे ही कार्यों में लग जाता है ॥ १७ ॥

महाभूतेषु नानात्वमिन्द्रियार्थेषु मूर्तिषु ।

विनियोगं च भूतानां धातैव विदधात्युत ॥ १८ ॥

पृष्ठ 1538

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आकाश आदि महाभूतोंमें, शब्द आदि विषयोंमें तथा देवता आदिकी आकृतियोंमें जो अनेकता और भिन्नता है तथा प्राणियोंकी जो भिन्न -भिन्न कार्योंमें नियुक्ति है, इन सबका विधान विधाता ही करते हैं ॥ १८ ॥

केचित् पुरुषकारं तु प्राहुः कर्मसु मानवाः ।

दैवमित्यपरे विप्राः स्वभावं भूतचिन्तकाः ॥ १ ९ ॥

कुछ लोग कर्मोंकी सिद्धिमें पुरुषार्थको ही प्रधान मानते हैं । दूसरे ब्राह्मण दैवको प्रधानता देते हैं और भूतचिन्तक नास्तिकगण स्वभावको ही कार्यसिद्धिका कारण बताते हैं ॥ १ ९ ॥

पौरुषं कर्म दैवं च फलवृत्तिः स्वभावतः ।

त्रय एतेऽपृथग्भूता न विवेकं तु केचन ॥ २० ॥

कुछ विद्वान् कहते हैं कि पुरुषार्थ, दैव और स्वभावसे अनुगृहीत कर्म — इन तीनोंके सहयोगसे फलकी सिद्धि होती है । ये तीनों मिलकर ही कार्यसाधक होते हैं । इनका अलग - अलग होना कार्यकी सिद्धिका हेतु नहीं होता है ॥ २० ॥

एतमेव च नैवं च न चोभे नानुभे न च ।

कर्मस्था विषयं ब्रूयुः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ॥ २१ ॥

कर्मवादी इस विषयमें यह पुरुषार्थ ही कार्यसाधक है, ऐसा नहीं कहते । ऐसा नहीं है, अर्थात् पुरुषार्थ नहीं, दैव कारण है, यह भी नहीं कहते । दोनों मिलकर कार्यसिद्धिके हेतु हैं, यह भी नहीं कहते और दोनों नहीं हैं, यह भी नहीं कहते हैं । तात्पर्य यह है कि वे इस विषयमें कुछ निश्चय नहीं कर पाते हैं; परंतु जो सत्त्वस्वरूप परमात्मामें स्थित हुए योगी हैं, वे समदर्शी हैं अर्थात् शम ( ब्रह्म ) को ही कारण मानते हैं ॥ २१ ॥

तपो निःश्रेयसं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दमः ।

तेन सर्वानवाप्नोति यान् कामान् मनसेच्छति ॥ २२ ॥

तप ही जीवके कल्याणका मुख्य साधन है । तपका मूल है शम और दम । पुरुष अपने मनसे जिन-जिन कामनाओंको पाना चाहता है, उन सबको वह तपस्यासे प्राप्त कर लेता है ॥ २२ ॥

तपसा तदवाप्नोति यद्भूतं सृजते जगत् ।

स तद्भूतश्च सर्वेषां भूतानां भवति प्रभुः ॥ २३ ॥

तपस्यासे वह उस परमात्मसत्ताको भी प्राप्त कर लेता है, जिससे इस जगत्की सृष्टि होती है । तपसे परमात्मस्वरूप होकर मनुष्य समस्त प्राणियोंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करता है ॥ २३ ॥

ऋषयस्तपसा वेदानध्यैषन्त दिवानिशम् ।

अनादिनिधना विद्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ॥ २४ ॥

पृष्ठ 1539

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तपके ही प्रभावसे महर्षिगण दिन- रात वेदोंका अध्ययन करते थे । तपःशक्तिसे सम्पन्न होकर ही ब्रह्माजीने आदि- अन्तसे रहित वेदमयी वाणीका प्रथम उच्चारण किया ॥ २४ ॥

ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु सृष्टयः ।

नानारूपं च भूतानां कर्मणां च प्रवर्तनम् ॥ २५ ॥

वेदशब्देभ्य एवादौ निर्मिमीते स ईश्वरः । ऋषियोंके नाम, वेदोक्त सृष्टिक्रमके अनुसार रचे हुए सब पदार्थोंके नाम, प्राणियोंके अनेकविध रूप तथा उनके कर्मोंका विधान- यह सब कुछ वे ऐश्वर्यशाली प्रजापति सृष्टिके आदिकालमें वेदोक्त शब्दोंके अनुसार ही रचते हैं ॥ २५ ॥

नामधेयानि चर्षीणां याश्च वेदेषु सृष्टयः ॥ २६ ॥

शर्वर्यन्ते सुजातानामन्येभ्यो विदधात्यजः । वेदोंमें ऋषियोंके नाम तो हैं ही, सृष्टिमें उत्पन्न हुए सब पदार्थोंके भी नाम हैं । अजन्मा ब्रह्माजी अपनी रात्रिके अन्तमें अर्थात् नूतन सृष्टिके प्रभातकालमें अपने द्वारा रचे गये सभी पदार्थोंका दूसरोंके लिये नाम- निर्देश करते हैं ॥ २६३ || नामभेदतपःकर्मयज्ञाख्या लोकसिद्धयः ॥ २७ ॥

फिर ब्रह्माजीने ऋग्वेद आदिके नाम, वर्ण और आश्रमके भेद, तप, शाम, दम ( कृच्छ्र- चान्द्रायणादि व्रत ), कर्म ( संध्योपासन आदि नित्य - कर्म ) और

ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ बनाये । ये नाम आदि लौकिक सिद्धियाँ हैं ॥ २७ ॥

आत्मसिद्धिस्तु वेदेषु प्रोच्यते दशभिः क्रमैः ।

यदुक्तं वेदवादेषु गहनं वेददर्शिभिः ।

तदन्तेषु यथायुक्तं क्रमयोगेन लक्ष्यते ॥ २८ ॥

आत्मा ( के मोक्ष ) की सिद्धि तो वेदोंमें दस* उपायोंद्वारा बतायी जाती है । जो गहन ( दुर्बोध ) ब्रह्म वेदवाक्योंमें वेददर्शी विद्वानोंद्वारा वर्णित हुआ है और वेदान्तवचनोंमें जिसका स्पष्टरूपसे वर्णन किया गया है, वह क्रमयोगसे लक्षित होता है ॥ २८ ॥

कर्मजोऽयं पृथग्भावो द्वन्द्वयुक्तोऽपि देहिनः ।

तमात्मसिद्धिर्विज्ञानाज्जहाति पुरुषो बलात् ॥ २ ९ ॥

देहाभिमानी जीवको जो यह पृथक् - पृथक् शीत- उष्ण आदि द्वन्द्वोंका भोग प्राप्त होता है, वह कर्मजनित है । मनुष्य तत्त्वज्ञानके द्वारा उस द्वन्द्वभोगको

पृष्ठ 1540

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त्याग देता है तथा ज्ञानके ही बलसे आत्मसिद्धि ( मोक्ष ) प्राप्त कर लेता है ॥ २ ९ ॥

द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ।

शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ३० ॥

ब्रह्मके दो स्वरूप जानने चाहिये - एक शब्दब्रह्म और दूसरा परब्रह्म, जो शब्दब्रह्म अर्थात् वेदका पूर्ण विद्वान् है, वह सुगमतासे परब्रह्मका साक्षात्कार कर लेता है ॥ ३० ॥

आलम्भयज्ञाः क्षत्राश्च हविर्यज्ञा विशः स्मृताः ।

परिचारयज्ञाः शूद्रास्तु तपोयज्ञा द्विजातयः ॥ ३१ ॥

ब्राह्मणोंके लिये तप ही यज्ञ है, क्षत्रियोंके लिये हिंसाप्रधान युद्ध आदि ही यज्ञ हैं, वैश्योंके लिये घृत आदि हविष्यकी आहुति देना ही यज्ञ है और शूद्रोंके लिये तीनों वर्णोंकी सेवा ही यज्ञ है ॥ ३१ ॥

त्रेतायुगे विधिस्त्वेष यज्ञानां न कृते युगे ।

द्वापरे विप्लवं यान्ति यज्ञाः कलियुगे तथा ॥ ३२ ॥

यह यज्ञोंका विधान त्रेतायुगमें ही था, सत्ययुगमें नहीं । द्वापरसे क्रमशः क्षीण होते हुए यज्ञ कलियुगमें लुप्त हो जाते हैं ॥ ३२ ॥

अपृथग्धर्मिणो मर्त्या ऋक्सामानि यजूंषि च ।

काम्या इष्टीः पृथग् दृष्ट्वा तपोभिस्तप एव च ॥ ३३ ॥

सत्ययुगमें अद्वैत- धर्ममें निष्ठा रखनेवाले मनुष्य ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद तथा सकाम इष्टियोंको ज्ञानरूप तपस्यासे भिन्न देखकर उन सबको छोड़ केवल ज्ञानरूप तपस्यामें ही संलग्न होते हैं ॥ ३३ ॥

त्रेतायां तु समस्ता ये प्रादुरासन् महाबलाः ।

संयन्तारः स्थावराणां जङ्गमानां च सर्वशः ॥ ३४ ॥

त्रेतायुगमें जो महाबली नरेश प्रकट हुए थे, वे सब- के - सब समस्त चराचर प्राणियोंके नियन्ता थे ॥ ३४ ॥

त्रेतायां संहता वेदा यज्ञा वर्णाश्रमास्तथा ।

संरोधादायुषस्त्वेते भ्रश्यन्ते द्वापरे युगे ॥ ३५ ॥

त्रेतायुगमें वेद, यज्ञ और वर्णाश्रम धर्म सुव्यवस्थितरूपसे पालित होते थे; परंतु द्वापरयुगमें आयुकी न्यूनता होनेसे लोगोंमें उनके पालनका उत्साह कम हो गया — वे वेद यज्ञ आदिसे च्युत होने लगे ॥ ३५ ॥

दृश्यन्ते न च दृश्यन्ते वेदाः कलियुगेऽखिलाः ।

उत्सीदन्ते सयज्ञाश्च केवलाधर्मपीडिताः ॥ ३६ ॥