श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1541–1550

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1541–1550

पृष्ठ 1541

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कलियुग आनेपर तो कहीं वेदोंका दर्शन होता है और कहीं नहीं होता है ।

उस समय केवल अधर्मसे पीड़ित होकर यज्ञ और वेद लुप्त हो जाते हैं ॥ ३६ ॥

कृते युगे यस्तु धर्मो ब्राह्मणेषु प्रदृश्यते ।

आत्मवत्सु तपोवत्सु श्रुतवत्सु प्रतिष्ठितः ॥ ३७ ॥

सत्ययुगमें जिस चारों चरणोंवाले धर्मकी चर्चा की गयी है, वह अन्य युगोंमें भी मनको वशमें रखनेवाले तपस्वी एवं वेद - वेदान्तोंके ज्ञाता ब्राह्मणोंमें प्रतिष्ठित देखा जाता है ॥ ३७ ॥

सधर्मव्रतसंयोगं यथाधर्मं युगे युगे ।

विक्रियन्ते स्वधर्मस्था वेदवादा यथागमम् ॥ ३८ ॥

सत्ययुगमें मनुष्य स्वभावके अनुसार यज्ञ, व्रत और तीर्थाटन आदि करते हैं और त्रेता आदि युगमें वेदवादी एवं स्वधर्मनिष्ठ पुरुष शास्त्रके कथनानुसार धर्मके ह्राससे विकारको प्राप्त होते हैं ॥ ३८ ॥

यथा विश्वानि भूतानि वृष्ट्या भूयांसि प्रावृषि ।

सृज्यन्ते जङ्गमस्थानि तथा धर्मा युगे युगे ॥ ३ ९ ॥

जैसे वर्षाकालमें जलकी वर्षा होनेसे स्थावर और जंगम समस्त पदार्थ वृद्धिको प्राप्त होते हैं और वर्षा बीतनेपर उनका ह्रास होने लगता है, उसी प्रकार प्रत्येक युगमें धर्म और अधर्मकी वृद्धि एवं ह्रास होते रहते हैं ॥ ३ ९ ॥

यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये ।

दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा ब्रह्महरादिषु ॥ ४० ॥

जैसे वसन्त आदि ऋतुओंमें फूल और फल आदि नाना प्रकारके ऋतुचिह्न दृष्टिगोचर होते हैं और भिन्न ऋतुओंमें उन चिह्नोंका दर्शन नहीं होता, उसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरमें भी सृष्टि, रक्षा और संहारकी शक्तियाँ कभी न्यून और कभी अधिक दिखायी देती हैं ॥ ४० ॥

विहितं कालनानात्वमनादिनिधनं तथा ।

कीर्तितं तत्पुरस्तात् ते तत्सूते चात्ति च प्रजाः ॥ ४१ ॥

स्वयं ब्रह्माजीने ही सत्ययुग, त्रेता आदिके रूपमें कालभेदका विधान किया

है । वह अनादि और अनन्त है । वह काल ही लोककी सृष्टि और संहार करता है ।

बेटा! यह बात मैं तुमसे पहले ही बता चुका हूँ ॥ ४१ ॥

दधाति प्रभवे स्थानं भूतानां संयमो यमः ।

स्वभावेनैव वर्तन्ते द्वन्द्वयुक्तानि भूरिशः ॥ ४२ ॥

काल ही सम्पूर्ण प्राणियोंको संयम और नियममें रखनेवाला है । वही उनकी उत्पत्तिके लिये स्थान धारण करता है । सारे प्राणी स्वभावसे ही द्वन्द्वोंसे युक्त होकर अत्यन्त कष्ट पाते हैं ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 1542

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सर्गकालक्रिया वेदाः कर्ता कार्यं क्रियाफलम् ।

प्रोक्तं ते पुत्र सर्वं वै यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ४३ ॥

बेटा! तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार मैंने तुम्हें सृष्टि, काल, क्रिया, वेद, कर्ता, कार्य तथा क्रियाफल आदि सब विषय बता दिये ॥ ४३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवजीका अनुप्रश्नविषयक दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३२ ॥

* इन सप्तर्षियोंके नाम इस प्रकार हैं— मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ॥ (महा० शान्ति० ३४०।६९ ) मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ– ये सातों महर्षि तुम्हारे (ब्रह्माजीके ) द्वारा ही अपने मनसे रचे हुए हैं । * स्वाध्याय, गार्हस्थ्य, संध्यावन्दनादि, कृच्छ्रचान्द्रायणादि, यज्ञ, पूर्तकर्म, योग, दान, गुरुशुश्रूषा और समाधि— ये दस क्रमयोग हैं ।

पृष्ठ 1543

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त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ब्राह्मप्रलय एवं महाप्रलयका वर्णन व्यासउवाच

प्रत्याहारं तु वक्ष्यामि शर्वर्यादौ गतेऽहनि ।

यथेदं कुरुतेऽध्यात्मं सुसूक्ष्मं विश्वमीश्वरः ॥ १ ॥

व्यासजी कहते हैं- बेटा! अब मैं यह बता रहा हूँ कि ब्रह्माजीका दिन बीतनेपर उनकी रात्रि आरम्भ होनेके पहले ही किस प्रकार इस सृष्टिका लय होता है तथा लोकेश्वर ब्रह्माजी स्थूल जगत्‌को अत्यन्त सूक्ष्म करके इसे कैसे अपने भीतर लीन कर लेते हैं? ॥ १ ॥

दिवि सूर्यस्तथा सप्त दहन्ति शिखिनोऽर्चिषः ।

सर्वमेतत् तदार्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते जगत् ॥ २ ॥

जब प्रलयका समय आता है, तब आकाशमें ऊपरसे सूर्य और नीचेसे अग्निकी सात ज्वालाएँ संसारको भस्म करने लगती हैं । उस समय यह सारा जगत् ज्वालाओंसे व्याप्त होकर जाज्वल्यमान दिखायी देने लगता है ॥ २ ॥

पृथिव्यां यानि भूतानि जङ्गमानि ध्रुवाणि च ।

तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयान्ति च ॥ ३ ॥

भूतलके जितने भी चराचर प्राणी हैं, वे सब पहले ही दग्ध होकर पृथ्वीमें एकाकार हो जाते हैं ॥ ३ ॥

ततः प्रलीने सर्वस्मिन् स्थावरे जङ्गमे तथा ।

निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिर्दृश्यते कूर्मपृष्ठवत् ॥ ४ ॥

तदनन्तर स्थावर- जंगम सम्पूर्ण प्राणियोंके लीन हो जानेपर तृण और वृक्षोंसे रहित हुई यह भूमि कछुएकी पीठ - सी दिखायी देने लगती है ॥ ४ ॥

भूमेरपि गुणं गन्धमाप आददते यदा ।

आत्तगन्धा तदा भूमिः प्रलयत्वाय कल्पते ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् जब जल पृथ्वीके गुण गन्धको ग्रहण कर लेता है, तब गन्धहीन हुई पृथ्वी अपने कारणभूत जलमें लीन हो जाती है ॥ ५ ॥

आपस्तत्र प्रतिष्ठन्ति ऊर्मिमत्यो महास्वनाः ।

सर्वमेवेदमापूर्य तिष्ठन्ति च चरन्ति च ॥ ६ ॥

फिर तो जल गम्भीर शब्द करता हुआ चारों ओर उमड़ पड़ता है और उसमें उत्ताल तरंगें उठने लगती हैं । वह सम्पूर्ण विश्वको अपनेमें निमग्न करके लहराता रहता है ॥ ६ ॥

अपामपि गुणं तात ज्योतिराददते यदा ।

पृष्ठ 1544

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आपस्तदा त्वात्तगुणा ज्योतिः षूपरमन्ति वै ॥ ७ ॥

वत्स! तदनन्तर तेज जलके गुण रसको ग्रहण कर लेता है और रसहीन जल तेजमें लीन हो जाता है ॥ ७ ||

यदाऽऽदित्यं स्थितं मध्ये गूहन्ति शिखिनोऽर्चिषः ।

सर्वमेवेदमर्चिर्भिः पूर्णं जाज्वल्यते नभः ॥ ८ ॥

उस समय जब आगकी लपटें सूर्यको अपने भीतर करके चारों ओरसे ढक लेती हैं, तब सम्पूर्ण आकाश ज्वालाओंसे व्याप्त होकर प्रज्वलित होता- सा जान पड़ता है ॥ ८ ॥

ज्योतिषोऽपि गुणं रूपं वायुराददते यदा ।

प्रशाम्यति ततो ज्योतिर्वायुर्दोधूयते महान् ॥ ९ ॥

फिर तेजके गुण रूपको वायुतत्त्व ग्रहण कर लेता है । इससे आग शान्त हो जाती है और वायुमें मिल जाती है । तब वायु अपने महान् वेगसे सम्पूर्ण आकाशको क्षुब्ध कर डालती है ॥ ९ ॥

ततस्तु स्वनमासाद्य वायुः सम्भवमात्मनः ।

अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च दोधवीति दिशो दश ॥ १० ॥

वह बड़े जोरसे हरहराती और अपने वेगसे उत्पन्न आवाजको फैलाती हुई ऊपर- नीचे तथा इधर - उधर दसों दिशाओंमें चलने लगती है ॥ १० ॥

वायोरपि गुणं स्पर्शमाकाशं ग्रसते यदा ।

प्रशाम्यति तदा वायुः खं तु तिष्ठति नादवत् ॥ ११ ॥

इसके बाद आकाश वायुके गुण स्पर्शको भी ग्रस लेता है । तब वायु शान्त हो जाती और आकाशमें मिल जाती है; फिर तो आकाश महान् शब्दसे युक्त हो अकेला ही रह जाता है ॥ ११ ॥

अरूपमरसस्पर्शमगन्धं न च मूर्तिमत् ।

सर्वलोकप्रणदितं खं तु तिष्ठति नादवत् ॥ १२ ॥

उसमें रूप, रस, गन्ध और स्पर्शका नाम भी नहीं रह जाता । किसी भी मूर्त पदार्थकी सत्ता नहीं रहती । जिसका शब्द सभी लोकोंमें निनादित होता था, वह आकाश ही केवल शब्द गुणसे युक्त होकर शेष रहता है ॥ १२ ॥

आकाशस्य गुणं शब्दमभिव्यक्तात्मकं मनः ।

मनसो व्यक्तमव्यक्तं ब्राह्मः सम्प्रतिसंचरः ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् दृश्य प्रपंचको व्यक्त करनेवाला मन आकाशके गुण शब्दको, जो मनसे ही प्रकट हुआ था, अपनेमें लीन कर लेता है । इस तरह व्यक्त मन और अव्यक्त ( महत्तत्त्व ) का ब्रह्माके मनमें लय होना ब्राह्म प्रलय कहलाता है ॥ १३ ॥

तदात्मगुणमाविश्य मनो ग्रसति चन्द्रमाः ।

मनस्युपरते चापि चन्द्रमस्युपतिष्ठते ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1545

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महाप्रलयके समय चन्द्रमा व्यक्त मनको आत्मगुणमें प्रविष्ट करके स्वयं उसको ग्रस लेते हैं । तब मन उपरत ( शान्त) हो जाता है; फिर वह चन्द्रमामें उपस्थित रहता है ॥ १४ ॥

तं तु कालेन महता संकल्पः कुरुते वशे ।

चित्तं ग्रसति संकल्पं तच्च ज्ञानमनुत्तमम् ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् संकल्प ( अव्यक्त मन ) दीर्घकालमें उस व्यक्तमनसहित चन्द्रमाको अपने वशीभूत कर लेता है और समष्टि बुद्धि संकल्पको ग्रस लेती है । उसी बुद्धिको परम उत्तम ज्ञान माना गया है ॥ १५ ॥

कालो गिरति विज्ञानं कालं बलमिति श्रुतिः ।

बलं कालो ग्रसति तु तं विद्वान् कुरुते वशे ॥ १६ ॥

सुननेमें आया है कि काल ज्ञान ( समष्टि बुद्धि ) को ग्रस लेता है, शक्ति उस कालको अपने अधीन कर लेती है; फिर महाकाल शक्तिको और परब्रह्म महाकालको अपने अधीन कर लेता है ॥ १६ ॥

आकाशस्य यथा घोषं तं विद्वान् कुरुतेऽऽत्मनि ।

तदव्यक्तं परं ब्रह्म तच्छाश्वतमनुत्तमम् ।

एवं सर्वाणि भूतानि ब्रह्मैव प्रतिसंचरः ॥ १७ ॥

जिस प्रकार आकाश अपने गुण शब्दको आत्मसात् कर लेता है, उसी प्रकार ब्रह्म महाकालको अपनेमें विलीन कर लेता है । वह परब्रह्म परमात्मा अव्यक्त, सनातन और सर्वोत्तम है । इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंका लय होता है और सबके लयका अधिष्ठान परब्रह्म परमात्मा ही है ॥ १७ ॥

यथावत् कीर्तितं सम्यगेवमेतदसंशयम् ।

बोध्यं विद्यामयं दृष्ट्वा योगिभिः परमात्मभिः ॥ १८ ॥

इस प्रकार परमात्मस्वरूप योगियोंने इस ज्ञानमय बोध्यतत्त्वका साक्षात्कार करके इसका यथार्थरूपसे वर्णन किया है, यह उत्तम ज्ञान निःसंदेह ऐसा ही है ॥ १८ ॥

एवं विस्तारसंक्षेपौ ब्रह्माव्यक्ते पुनः पुनः ।

युगसाहस्रयोरादावहोरात्रस्तथैव च ॥ १ ९ ॥

इस प्रकार बारंबार अव्यक्त परब्रह्ममें सृष्टिका विस्तार और लय होता है । ब्रह्माजीका दिन एक हजार चतुर्युगका होता है और उनकी रात भी उतनी ही बड़ी होती है; यह बात पहले ही बता दी गयी है ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकका अनुप्रश्नविषयक दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३३ ॥

पृष्ठ 1546

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पृष्ठ 1547

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चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन व्यास उवाच

भूतग्रामे नियुक्तं यत् तदेतत् कीर्तितं मया ।

ब्राह्मणस्य तु यत् कृत्यं तत् ते वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ १ ॥

व्यासजी कहते हैं — बेटा! तुमने भूतसमुदायके विषयमें जो प्रश्न किया था, उसीके उत्तरमें मैंने यह सब बताया है । अब मैं तुम्हें ब्राह्मणका जो कर्तव्य है, वह बता रहा हूँ, सुनो ॥ १ ॥

जातकर्मप्रभृत्यस्य कर्मणां दक्षिणावताम् ।

क्रिया स्यादासमावृत्तेराचार्ये वेदपारगे ॥ २ ॥

ब्राह्मण- बालकके जातकर्मसे लेकर समावर्तनतक समस्त संस्कार वेदोंके पारंगत विद्वान् आचार्यके निकट रहकर सम्पन्न होने चाहिये और उनमें समुचित दक्षिणा देनी चाहिये ॥ २ ॥

अधीत्य वेदानखिलान् गुरुशुश्रूषणे रतः ।

गुरूणामनृणो भूत्वा समावर्तेत यज्ञवित् ॥ ३ ॥

उपनयनके पश्चात् ब्राह्मण- बालक गुरुशुश्रूषामें तत्पर हो सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करे । तत्पश्चात् पर्याप्त गुरु- दक्षिणा दे । गुरु-ऋणसे उऋण हो वह यज्ञवेत्ता बालक समावर्तन-संस्कारके पश्चात् घर लौटे ॥ ३ ॥

आचार्येणाभ्यनुज्ञातश्चतुर्णामेकमाश्रमम् ।

आविमोक्षाच्छरीरस्य सोऽवतिष्ठेद् यथाविधि ॥ ४ ॥

तदनन्तर आचार्यकी आज्ञा लेकर चारों आश्रमोंमेंसे किसी एक आश्रममें शास्त्रोक्त विधिके अनुसार जीवनपर्यन्त रहे ( अथवा क्रमशः सभी आश्रमोंमें प्रवेश करे ) ॥ ४ ॥

प्रजासर्गेण दारैश्च ब्रह्मचर्येण वा पुनः ।

वने गुरुसकाशे वा यतिधर्मेण वा पुनः ॥ ५ ॥

उसकी इच्छा हो तो स्त्री- परिग्रह करके गृहस्थ धर्मका पालन करते हुए संतान उत्पन्न करे अथवा आजीवन ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करे या वनमें रहकर वानप्रस्थ - धर्मका आचरण करे अथवा गुरुके समीप रहे या संन्यास - धर्मके अनुसार जीवन व्यतीत करे ॥ ५ ॥

गृहस्थस्त्वेष धर्माणां सर्वेषां मूलमुच्यते ।

यत्र पक्वकषायो हि दान्तः सर्वत्र सिध्यति ॥ ६ ॥

यह गृहस्थ - आश्रम सब धर्मोंका मूल कहा जाता है । इसमें रहकर अन्तःकरणके रागादि दोष पक जानेपर जितेन्द्रिय पुरुषको सर्वत्र सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1548

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प्रजावान् श्रोत्रियो यज्वा मुक्त एव ऋणैस्त्रिभिः ।

अथान्यानाश्रमान् पश्चात् पूतो गच्छेत कर्मभिः ॥ ७ ॥

गृहस्थ पुरुष संतान उत्पन्न करके पितृ ऋणसे, वेदोंका स्वाध्याय करके ऋषि -ऋणसे और यज्ञोंका अनुष्ठान करके देव ऋणसे छुटकारा पाता है । इस प्रकार तीनों ऋणोंसे मुक्त हो विहित कर्मोंका सम्पादन करके पवित्र बने । तत्पश्चात् दूसरे आश्रमोंमें प्रवेश करे ॥ ७ ॥

यत् पृथिव्यां पुण्यतमं विद्यात् स्थानं तदावसेत् ।

यतेत तस्मिन् प्रामाण्यं गन्तुं यशसि चोत्तमे ॥ ८ ॥

इस पृथ्वीपर जो स्थान पवित्र एवं उत्तम जान पड़े, वहीं निवास करे । उसी स्थानमें रहकर वह उत्तम यशके विषयमें अपनेको आदर्श पुरुष बनानेका प्रयत्न करे ॥ ८ ॥

तपसा वा सुमहता विद्यानां पारणेन वा ।

इज्यया वा प्रदानैर्वा विप्राणां वर्धते यशः ॥ ९ ॥

यावदस्य भवत्यस्मिन् कीर्तिर्लोके यशस्करी ।

तावत् पुण्यकृतां लोकाननन्तान् पुरुषोऽश्नुते ॥ १० ॥

महान् तप, पूर्ण विद्याध्ययन, यज्ञ अथवा दान करनेसे ब्राह्मणोंका यश बढ़ता है । जबतक इस जगत्में यशको बढ़ानेवाली उसकी कीर्ति बनी रहती है, तबतक वह पुण्यवानोंके अक्षय लोकोंमें निवास करके दिव्य सुख भोगता रहता है ॥ ९-१० ॥

अध्यापयेदधीयीत याजयेत यजेत वा ।

न वृथा प्रतिगृह्णीयान्न च दद्यात् कथंचन ॥ ११ ॥

ब्राह्मणको अध्ययन- अध्यापन, यजनयाजन तथा दान और प्रतिग्रह- इन छः कर्मोंका आश्रय लेना चाहिये; परंतु उसे किसी तरह न तो अनुचित प्रतिग्रह स्वीकार करना चाहिये, न व्यर्थ दान ही देना चाहिये ॥ ११ ॥

याज्यतः शिष्यतो वापि कन्याया वा धनं महत् ।

यदाऽऽगच्छेद् यजेद् दद्यान्नैकोऽश्नीयात् कथंचन ॥ १२ ॥

यजमानसे, शिष्यसे अथवा कन्या- शुल्कसे जब महान् धन प्राप्त हो, तब उसके द्वारा यज्ञ करे, दान दे, अकेला किसी तरह उस धनका उपभोग न करे ॥ १२ ॥

गृहमावसतो ह्यस्य नान्यत् तीर्थं प्रतिग्रहात् ।

देवर्षिपितृगुर्वर्थं वृद्धातुरबुभुक्षताम् ॥ १३ ॥

देवता, ऋषि, पितर, गुरु, वृद्ध, रोगी और भूखे मनुष्योंको भोजन देनेके लिये गृहस्थ ब्राह्मणको प्रतिग्रह स्वीकार करना चाहिये । प्रतिग्रहके सिवा ब्राह्मणके लिये धनसंग्रहका दूसरा कोई पवित्र मार्ग नहीं है ॥ १३ ॥

अन्तर्हिताधितप्तानां यथाशक्ति बुभूषताम् देवानामतिशक्त्यापि देयमेषां कृतादपि ॥ १४ ॥

अर्हतामनुरूपाणां नादेयं ह्यस्ति किंचन ।

पृष्ठ 1549

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उच्चैः श्रवसमप्यश्वं प्रापणीयं सतां विदुः ॥ १५ ॥

जो दारिद्र्यग्रस्त होनेके कारण लज्जासे छिपे-छिपे फिरते हैं तथा अत्यन्त संतप्त हैं, अथवा जो यथाशक्ति अपनी पारमार्थिक उन्नतिके लिये प्रयत्न करना चाहते हैं, ऐसे भूदेवोंको उपार्जित धनमेंसे यथाशक्ति देना चाहिये । योग्य एवं पूजनीय ब्राह्मणोंके लिये कोई भी वस्तु अदेय नहीं है । वैसे सत्पात्रोंके लिये तो उच्चैःश्रवा घोड़ा भी दिया जा सकता है, यह श्रेष्ठ पुरुषोंका मत है ॥ १४-१५ ॥

अनुनीय यथाकामं सत्यसंधो महाव्रतः ।

स्वैः प्राणैर्ब्राह्मणप्राणान् परित्राय दिवं गतः ॥ १६ ॥

महान् व्रतधारी राजा सत्यसंधने इच्छानुसार अनुनय- विनय करके अपने प्राणोंद्वारा एक ब्राह्मणके प्राणोंकी रक्षा की थी, ऐसा करके वे स्वर्गलोकमें गये थे ॥ १६ ॥

रन्तिदेवश्च सांकृत्यो वसिष्ठाय महात्मने ।

अपः प्रदाय शीतोष्णा नाकपृष्ठे महीयते ॥ १७ ॥

संकृतिके पुत्र राजा रन्तिदेवने महात्मा वसिष्ठको शीतोष्ण जल प्रदान किया था, जिससे वे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हैं ॥ १७ ॥

आत्रेयश्चेन्द्रदमनो ह्यर्हते विविधं धनम् ।

दत्त्वा लोकान् ययौ धीमाननन्तान् स महीपतिः ॥ १८ ॥

अत्रिवंशज बुद्धिमान् राजा इन्द्रदमनने एक योग्य ब्राह्मणको नाना प्रकारके धनका दान करके अक्षय लोक प्राप्त किये थे ॥ १८ ॥

शिबिरौशीनरोऽङ्गानि सुतं च प्रियमौरसम् ।

ब्राह्मणार्थमुपाहृत्य नाकपृष्ठमितो गतः ॥ १ ९ ॥

उशीनरके पुत्र राजा शिबिने किसी ब्राह्मणके लिये अपने शरीर और प्रिय औरस पुत्रका दान कर दिया था, जिससे वे यहाँसे स्वर्गलोकमें गये थे ॥ १ ९ ॥

प्रतर्दनः काशिपतिः प्रदाय नयने स्वके ।

ब्राह्मणायातुलां कीर्तिमिह चामुत्र चाश्नुते ॥ २० ॥

काशिराज प्रतर्दनने किसी ब्राह्मणको अपने दोनों नेत्र प्रदान करके इस लोकमें अनुपम कीर्ति प्राप्त की और परलोकमें वे उत्तम सुख भोगते हैं ॥ २० ॥

दिव्यमष्टशलाकं तु सौवर्णं परमर्द्धिमत् ।

छत्रं देवावृधो दत्त्वा सराष्ट्रोऽभ्यपतद् दिवम् ॥ २१ ॥

राजा देवावृधने आठ शलाकाओं ( ताड़ियों ) से युक्त सोनेका बना हुआ बहुमूल्य छत्र दान करके अपने देशकी प्रजाके साथ स्वर्गलोक प्राप्त किया ॥ २१ ॥

सांकृतिश्च तथाऽऽत्रेयः शिष्येभ्यो ब्रह्म निर्गुणम् ।

उपदिश्य महातेजा गतो लोकाननुत्तमान् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1550

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अत्रिवंशमें उत्पन्न महातेजस्वी सांकृति अपने शिष्योंको निर्गुण ब्रह्मका उपदेश देकर उत्तम लोकोंको प्राप्त हुए ॥ २२ ॥

अम्बरीषो गवां दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यः प्रतापवान् ।

अर्बुदानि दशैकं च सराष्ट्रोऽभ्यपतद् दिवम् ॥ २३ ॥

प्रतापी राजा अम्बरीषने ब्राह्मणोंको ग्यारह अर्बुद (एक अरब दस करोड़ ) गौएँ दानमें देकर देशवासियोंसहित स्वर्गलोक प्राप्त किया ॥ २३ ॥

सावित्री कुण्डले दिव्ये शरीरं जनमेजयः ।

ब्राह्मणार्थे परित्यज्य जग्मतुर्लोकमुत्तमम् ॥ २४ ॥

सावित्रीने दो दिव्य कुण्डल दान किये थे और राजा जनमेजयने ब्राह्मणके लिये अपने

शरीरका परित्याग किया था । इससे वे दोनों उत्तम लोकमें गये ॥ २४ ॥

सर्वरत्नं वृषादर्भिर्युवनाश्वः प्रियाः स्त्रियः ।

रम्यमावसथं चैव दत्त्वा स्वर्लोकमास्थितः ॥ २५ ॥

वृषदर्भके पुत्र युवनाश्व सब प्रकारके रत्न, अभीष्ट स्त्रियाँ तथा सुरम्य गृह दान करके स्वर्गलोकमें निवास करते हैं ॥ २५ ॥

निमी राष्ट्रं च वैदेहो जामदग्न्यो वसुन्धराम् ।

ब्राह्मणेभ्यो ददौ चापि गयश्चोर्वी सपत्तनाम् ॥ २६ ॥

विदेहराज निमिने अपना राज्य और जमदग्निनन्दन परशुराम तथा राजा गयने नगरोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी ब्राह्मणको दानमें दे दी थी ॥ २६ ॥

अवर्षति च पर्जन्ये सर्वभूतानि भूतकृत् ।

वसिष्ठो जीवयामास प्रजापतिरिव प्रजाः ॥ २७ ॥

एक बार पानी न बरसनेपर महर्षि वसिष्ठने प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले दूसरे प्रजापतिके समान सम्पूर्ण प्रजाको जीवनदान दिया था ॥ २७ ॥

करन्धमस्य पुत्रस्तु कृतात्मा मरुतस्तथा ।

कन्यामङ्गिरसे दत्त्वा दिवमाशु जगाम ह ॥ २८ ॥

करन्धमके पुण्यात्मा पुत्र राजा मरुत्तने महर्षि अंगिराको कन्यादान करके तत्काल स्वर्गलोक प्राप्त कर लिया था ॥ २८ ॥

ब्रह्मदत्तश्च पाञ्चाल्यो राजा बुद्धिमतां वरः ।

निधिं शङ्खं द्विजाग्रेभ्यो दत्त्वा लोकानवाप्तवान् ॥ २ ९ ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पांचाल राज ब्रह्मदत्तने उत्तम ब्राह्मणोंको शंखनिधि देकर पुण्यलोक प्राप्त किये थे ॥ २ ९ ॥

राजा मित्रसहश्चापि वसिष्ठाय महात्मने ।

मदयन्तीं प्रियां दत्त्वा तया सह दिवं गतः ॥ ३० ॥