05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1921–1930

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1921–1930

पृष्ठ 1921

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1921 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पापकर्मको अहिंसाका व्रत भी दूर नहीं कर सकता । ऐसा वेदशास्त्रोंके ज्ञाता, वेदका उपदेश देनेवाले ब्राह्मणोंका कथन है ॥ १२-१३ ॥

अहं तु तावत् पश्यामि कर्म यद् वर्तते कृतम् ।

गुणयुक्तं प्रकाशं वा पापेनानुपसंहितम् ॥ १४ ॥

परंतु मैं तो ऐसा देखता हूँ कि जो कर्म किया गया है वह पुण्य हो या पापयुक्त, प्रकटरूपमें किया गया हो या छिपाकर ( तथा जान- बूझकर किया गया हो या अनजानमें ), वह अपना फल अवश्य देता ही है ॥ १४ ॥

यथा सूक्ष्माणि कर्माणि फलन्तीह यथातथम् ।

बुद्धियुक्तानि तानीह कृतानि मनसा सह ॥ १५ ॥

भवत्यल्पफलं कर्म सेवितं नित्यमुल्बणम् ।

अबुद्धिपूर्वं धर्मज्ञ कृतमुग्रेण कर्मणा ॥ १६ ॥

धर्मज्ञ राजा जनक! जैसे मनसे सोच- विचारकर बुद्धिद्वारा निश्चय करके जो स्थूल या सूक्ष्म कर्म यहाँ किये जाते हैं वे यथायोग्य फल अवश्य देते हैं । उसी प्रकार हिंसा आदि उग्र कर्मके द्वारा अनजानमें किया हुआ भयंकर पाप यदि सदा बनता रहे तो उसका फल भी मिलता ही है; अन्तर इतना ही है कि जान- बूझकर किये हुए कर्मकी अपेक्षा उसका फल बहुत कम हो जाता है ॥ १५-१६ ॥

कृतानि यानि कर्माणि दैवतैर्मुनिभिस्तथा ।

न चरेत् तानि धर्मात्मा श्रुत्वा चापि न कुत्सयेत् ॥ १७ ॥

देवताओं और मुनियोंद्वारा जो अनुचित कर्म किये गये हों धर्मात्मा पुरुष उनका अनुकरण न करे; और उन कर्मोंको सुनकर भी उन देवता आदिकी निन्दा भी न करे ॥ १७ ॥

संचिन्त्य मनसा राजन् विदित्वा शक्यमात्मनः ।

करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति ॥ १८ ॥

राजन्! जो मनुष्य मनसे खूब सोच- विचारकर, ' अमुक काम मुझसे हो सकेगा या नहीं’ — इसका निश्चय करके शुभकर्मका अनुष्ठान करता है, वह अवश्य ही अपनी भलाई देखता है ॥ १८ ॥

नवे कपाले सलिलं संन्यस्तं हीयते यथा ।

नवेतरे तथाभावं प्राप्नोति सुखभावितम् ॥ १ ९ ॥

जैसे नये बने हुए कच्चे घड़ेमें रखा हुआ जल नष्ट हो जाता है, परंतु पके - पकाये घड़ेमें रखा हुआ ज्यों- का - त्यों बना रहता है, उसी प्रकार परिपक्व विशुद्ध अन्तःकरणमें सम्पादित सुखदायक शुभकर्म निश्चल रहते हैं ॥ १ ९ ॥

सतोयेऽन्यत् तु यत् तोयं तस्मिन्नेव प्रसिच्यते ।

वृद्धे वृद्धिमवाप्नोति सलिले सलिलं यथा ॥ २० ॥

पृष्ठ 1922

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1922 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एवं कर्माणि यानीह बुद्धियुक्तानि पार्थिव ।

समानि चैव यानीह तानि पुण्यतमान्यपि ॥ २१ ॥

राजन्! उसी जलयुक्त पक्के घड़ेमें यदि दूसरा जल डाला जाय तो पात्रमें रखा हुआ पहलेका जल और नया डाला हुआ जल - दोनों मिलकर बढ़ जाते हैं और इस प्रकार वह घड़ा अधिक जलसे सम्पन्न हो जाता है। उसी तरह यहाँ विवेकपूर्वक किये हुए जो पुण्य कर्म संचित हैं, उन्हींके समान जो नये पुण्य कर्म किये जाते हैं - वे दोनों मिलकर अधिक पुण्यतम कर्म हो जाते हैं ( और उनके द्वारा वह पुरुष महान् पुण्यात्मा हो जाता है ) ॥ २०-२१ ॥ राज्ञा जेतव्याः शत्रवश्चोन्नताश्च

सम्यक् कर्तव्यं पालनं च प्रजानाम् ।

अग्निश्चेयो बहुभिश्चापि यज्ञै- रन्त्ये मध्ये वा वनमाश्रित्य स्थेयम् ॥ २२ ॥

नरेश्वर! राजाको चाहिये कि वह बढ़े हुए शत्रुओंको जीते । प्रजाका न्यायपूर्वक पालन करे । नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा अग्निदेवको तृप्त करे तथा वैराग्य होनेपर मध्यम अवस्थामें अथवा अन्तिम अवस्थामें वनमें जाकर रहे ॥ २२ ॥

दमान्वितः पुरुषो धर्मशीलो भूतानि चात्मानमिवानुपश्येत् । गरीयसः पूजयेदात्मशक्त्या सत्येन शीलेन सुखं नरेन्द्र ॥ २३ ॥

राजन्! प्रत्येक पुरुषको इन्द्रियसंयमी और धर्मात्मा होकर समस्त प्राणियोंको अपने ही समान समझना चाहिये । जो विद्या, तप और अवस्थामें अपनेसे बड़े हों अथवा गुरु - कोटिके लोग हों, उन सबकी यथाशक्ति पूजा करनी चाहिये। सत्यभाषण और अच्छे आचार-विचारसे ही सुख मिलता है ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ १ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९१ ॥

पृष्ठ 1923

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1923 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पराशरगीता - धर्मोपार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि- सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान् लाभ पराशर उवाच

कः कस्य चोपकुरुते कश्च कस्मै प्रयच्छति ।

प्राणी करोत्ययं कर्म सर्वमात्मार्थमात्मना ॥ १ ॥

पराशरजी कहते हैं— राजन्! कौन किसका उपकार करता है और कौन किसको देता है? यह प्राणी सारा कार्य स्वयं अपने ही लिये करता है ॥ १ ॥

गौरवेण परित्यक्तं निःस्नेहं परिवर्जयेत् ।

सोदर्यं भ्रातरमपि किमुतान्यं पृथग्जनम् ॥ २ ॥

अपना सगा भाई भी यदि अपने श्रेष्ठ स्वभावका और स्नेहका त्याग कर दे तो लोग उसको त्याग देते हैं; फिर दूसरे किसी साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है ॥

विशिष्टस्य विशिष्टाच्च तुल्यौ दानप्रतिग्रहौ ।

तयोः पुण्यतरं दानं तद् द्विजस्य प्रयच्छतः ॥ ३ ॥

श्रेष्ठ पुरुषको दिया हुआ दान और श्रेष्ठ पुरुषसे प्राप्त हुआ प्रतिग्रह –इन दोनोंका महत्त्व बराबर है तो भी इन दोनोंमेंसे ब्राह्मणके लिये प्रतिग्रह स्वीकार करनेकी अपेक्षा दान देना अधिक पुण्यमय माना गया है ॥

न्यायागतं धनं चैव न्यायेनैव विवर्धितम् ।

संरक्ष्यं यत्नमास्थाय धर्मार्थमिति निश्चयः ॥ ४ ॥

जो धन न्यायसे प्राप्त किया गया हो और न्यायसे ही बढ़ाया गया हो, उसको यत्नपूर्वक

धर्मके उद्देश्यसे बचाये रखना चाहिये । यही धर्मशास्त्रका निश्चय है ॥ ४ ॥

न धर्मार्थी नृशंसेन कर्मणा धनमर्जयेत् ।

शक्तितः सर्वकार्याणि कुर्यान्नर्द्धिमनुस्मरेत् ॥ ५ ॥

धर्म चाहनेवाले पुरुषको क्रूरकर्मके द्वारा धनका उपार्जन नहीं करना चाहिये । अपनी

शक्तिके अनुसार समस्त शुभ कर्म करे । धन बढ़ानेकी चिन्तामें न पड़े ॥

अपो हि प्रयतः शीतास्तापिता ज्वलनेन वा ।

शक्तितोऽतिथये दत्त्वा क्षुधार्तायाश्नुते फलम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1924

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1924 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जो मौसमका विचार करके अपनी शक्तिके अनुसार प्यासे और भूखे अतिथिको ठंडा या गरम किया हुआ जल और अन्न पवित्रभावसे अर्पण करता है, वह उत्तम फल पाता है ॥ ६ ॥

रन्तिदेवेन लोकेष्टा सिद्धिः प्राप्ता महात्मना ।

फलपत्रैरथो मूलैर्मुनीनर्चितवांश्च सः ॥ ७ ॥

महात्मा राजा रन्तिदेवने फल- मूल और पत्तोंसे ऋषि- मुनियोंका पूजन किया था ।

इसीसे उन्हें वह सिद्धि प्राप्त हुई, जिसकी सब लोग अभिलाषा रखते हैं ॥ ७ ॥

तैरेव फलपत्रैश्च स माठरमतोषयत् ।

तस्माल्लेभे परं स्थानं शैब्योऽपि पृथिवीपतिः ॥ ८ ॥

पृथ्वीपालक महाराज शैब्यने भी उन फल और पत्रोंसे ही माठर मुनिको संतुष्ट किया था, जिससे उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति हुई ॥ ८ ॥

देवतातिथिभृत्येभ्यः पितृभ्यश्चात्मनस्तथा ।

ऋणवान् जायते मर्त्यस्तस्मादनृणतां व्रजेत् ॥ ९ ॥

प्रत्येक मनुष्य देवता, अतिथि, भरण- पोषणके योग्य कुटुम्बीजन, पितर तथा अपने-आपका भी ऋणी होकर जन्म लेता है; अतः उसे उस ऋणसे मुक्त होनेका यत्न करना चाहिये ॥ ९ ॥

स्वाध्यायेन महर्षिभ्यो देवेभ्यो यज्ञकर्मणा ।

पितृभ्यः श्राद्धदानेन नृणामभ्यर्चनेन च ॥ १० ॥

वेद- शास्त्रोंका स्वाध्याय करके ऋषियोंके, यज्ञ- कर्मद्वारा देवताओंके, श्राद्ध और दानसे पितरोंके तथा स्वागत- सत्कार, सेवा आदिसे अतिथियोंके ऋणसे छुटकारा होता है ॥ १० ॥

वाचा शेषावहार्येण पालनेनात्मनोऽपि च ।

यथावद् भृत्यवर्गस्य चिकीर्षेत् कर्म आदितः ॥ ११ ॥

इसी प्रकार वेद- वाणीके पठन, श्रवण एवं मननसे, यज्ञशेष अन्नके भोजनसे तथा जीवोंकी रक्षा करनेसे मनुष्य अपने ऋणसे मुक्त होता है । भरणीय कुटुम्बीजनके पालन-पोषणका आरम्भसे ही प्रबन्ध करना चाहिये । इससे उनके ऋणसे भी मुक्ति हो जाती है ॥ ११ ॥

प्रयत्नेन च संसिद्धा धनैरपि विवर्जिताः ।

सम्यग् हुत्वा हुतवहं मुनयः सिद्धिमागताः ॥ १२ ॥

ऋषि- मुनियोंके पास धन नहीं था तो भी वे अपने प्रयत्नसे ही सिद्ध हो गये । उन्होंने विधिपूर्वक अग्निहोत्र करके सिद्धि प्राप्त की थी ॥ १२ ॥

विश्वामित्रस्य पुत्रत्वमृचीकतनयोऽगमत् ।

ऋग्भिः स्तुत्वा महाबाहो देवान् वै यज्ञभागिनः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1925

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1925 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

महाबाहो! ऋचीकके पुत्र यज्ञमें भाग लेनेवाले देवताओंकी वेदमन्त्रोंद्वारा स्तुति करके विश्वामित्रके पुत्र हो गये ॥ १३ ॥

गतः शुक्रत्वमुशना देवदेवप्रसादनात् ।

देवीं स्तुत्वा तु गगने मोदते यशसा वृतः ॥ १४ ॥

महर्षि उशना देवाधिदेव महादेवजीको प्रसन्न करके उनके शुक्रत्वको प्राप्त हो उसी नामसे प्रसिद्ध हुए । साथ ही पार्वतीदेवीकी स्तुति करके वे यशस्वी मुनि आकाशमें ग्रहरूपसे स्थित हो आनन्द भोग रहे हैं ॥

असितो देवलश्चैव तथा नारदपर्वतौ ।

कक्षीवान् जामदग्न्यश्च रामस्ताण्ड्यस्तथाऽऽत्मवान् ॥ १५ ॥

वसिष्ठो जमदग्निश्च विश्वामित्रो ऽत्रिरेव च ।

भरद्वाजो हरिश्मश्रुः कुण्डधारः श्रुतश्रवाः ॥ १६ ॥

एते महर्षयः स्तुत्वा विष्णुमृग्भिः समाहिताः ।

लेभिरे तपसा सिद्धिं प्रसादात् तस्य धीमतः ॥ १७ ॥

असित, देवल, नारद, पर्वत, कक्षीवान्, जमदग्नि-नन्दन परशुराम, मनको वशमें रखनेवाले ताण्ड्य, वसिष्ठ, जमदग्नि, विश्वामित्र, अत्रि, भरद्वाज, हरिश्मश्रु, कुण्डधार तथा श्रुतश्रवा-इन महर्षियोंने एकाग्रचित्त हो वेदकी ऋचाओंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति करके उन्हीं बुद्धिमान् श्रीहरिकी कृपासे तपस्या करके सिद्धि प्राप्त कर ली ॥ १५–१७ ॥

अनर्हाश्चार्हतां प्राप्ताः सन्तः स्तुत्वा तमेव ह ।

न तु वृद्धिमिहान्विच्छेत् कर्म कृत्वा जुगुप्सितम् ॥ १८ ॥

जो पूजाके योग्य नहीं थे, वे भी भगवान् विष्णुकी स्तुति करके पूजनीय संत होकर उन्हींको प्राप्त हो गये । इस लोकमें निन्दनीय आचरण करके किसीको भी अपने अभ्युदयकी आशा नहीं रखनी चाहिये ॥ १८ ॥

येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण धिगस्तु तान् ।

धर्मं वै शाश्वतं लोके न जह्याद् धनकाङ्क्षया ॥ १ ९ ॥

धर्मका पालन करते हुए ही जो धन प्राप्त होता है, वही सच्चा धन है । जो अधर्मसे प्राप्त होता है, वह धन तो धिक्कार देने योग्य है। संसारमें धनकी इच्छासे शाश्वत धर्मका त्याग कभी नहीं करना चाहिये ॥ १ ९ ॥

आहिताग्निर्हि धर्मात्मा यः स पुण्यकृदुत्तमः ।

वेदा हि सर्वे राजेन्द्र स्थितास्त्रिष्वग्निषु प्रभो ॥ २० ॥

राजेन्द्र! जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वही धर्मात्मा है और वही पुण्यकर्म करनेवालोंमें श्रेष्ठ है । प्रभो सम्पूर्ण वेद दक्षिण, आहवनीय तथा गार्हपत्य–इन तीन अग्नियोंमें ही स्थित हैं ॥ २० ॥

स चाप्यग्न्याहितो विप्रः क्रिया यस्य न हीयते ।

पृष्ठ 1926

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1926 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रेयो ह्यनाहिताग्नित्वमग्निहोत्रं न निष्क्रियम् ॥ २१ ॥

जिसका सदाचार एवं सत्कर्म कभी लुप्त नहीं होता, वह ब्राह्मण ( अग्निहोत्र न करनेपर भी ) अग्निहोत्री ही है । सदाचारका ठीक -ठीक पालन होनेपर अग्निहोत्र न हो सके तो भी अच्छा है; किंतु सदाचारका त्याग करके केवल अग्निहोत्र करना कदापि कल्याणकारी नहीं है ॥

अग्निरात्मा च माता च पिता जनयिता तथा ।

गुरुश्च नरशार्दूल परिचर्या यथातथम् ॥ २२ ॥

- पुरुषसिंह! अग्नि, आत्मा, माता, जन्म देनेवाले पिता तथा गुरु — इन सबकी यथायोग्य सेवा करनी चाहिये ॥ मानं त्यक्त्वा यो नरो वृद्धसेवी विद्वान् क्लीबः पश्यति प्रीतियोगात् । दाक्ष्येण हीनो धर्मयुक्तो नदान्तो लोकेऽस्मिन् वै पूज्यते सद्भिरार्यः ॥ २३ ॥

जो अभिमानका त्याग करके वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करता, विद्वान् एवं काम- भोगमें अनासक्त होकर सबको प्रेमभावसे देखता, मनमें चतुराई न रखकर धर्ममें संलग्न रहता और दूसरोंका दमन या हिंसा नहीं करता है, वह मनुष्य इस लोकमें श्रेष्ठ है तथा सत्पुरुष भी उसका आदर करते हैं ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ २ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ९२ ॥ Fara

पृष्ठ 1927

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1927 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पराशरगीता - शूद्रके लिये सेवावृत्तिकी प्रधानता, सत्संगकी महिमा और चारों वर्णोंके धर्मपालनका महत्त्व पराशर उवाच

वृत्तिः सकाशाद् वर्णेभ्यस्त्रिभ्यो हीनस्य शोभना ।

प्रीत्योपनीता निर्दिष्टा धर्मिष्ठान् कुरुते सदा ॥ १ ॥

पराशरजी कहते हैं - राजन्! शूद्रके लिये तीनों वर्णोंकी सेवासे जीवन - निर्वाह करना ही सबसे उत्तम है । शूद्रके लिये निर्दिष्ट सेवावृत्तिका यदि वे प्रेमपूर्वक पालन करें तो वह सदा उन्हें धर्मिष्ठ बनाती है ॥ १ ॥

वृत्तिश्चेन्नास्ति शूद्रस्य पितृपैतामही ध्रुवा ।

न वृत्तिं परतो मार्गेच्छुश्रूषां तु प्रयोजयेत् ॥ २ ॥

यदि शूद्रके पास बाप - दादोंका दिया हुआ जीविकाका कोई निश्चित साधन नहीं है तो वह दूसरी किसी वृत्तिका अनुसंधान न करे । तीनों वर्णोंकी सेवाको ही जीविकाके उपयोगमें लाये ॥ २ ॥

सद्भिस्तु सह संसर्गः शोभते धर्मदर्शिभिः ।

नित्यं सर्वास्ववस्थासु नासद्भिरिति मे मतिः ॥ ३ ॥

धर्मपर दृष्टि रखनेवाले सत्पुरुषोंके संसर्गमें रहना सदा ही श्रेष्ठ है; परंतु किसी भी दशामें कभी दुष्ट पुरुषोंका संग अच्छा नहीं है, यह मेरा दृढ़ निश्चय है ॥

यथोदयगिरौ द्रव्यं संनिकर्षेण दीप्यते ।

तथा सत्संनिकर्षेण हीनवर्णोऽपि दीप्यते ॥ ४ ॥

जैसे सूर्यका सामीप्य प्राप्त होनेसे उदयाचल पर्वतकी प्रत्येक वस्तु चमक उठती है, उसी प्रकार साधु पुरुषोंके निकट रहनेसे नीच वर्णका मनुष्य भी सद्गुणोंसे सुशोभित होने लगता है ॥ ४ ॥

यादृशेन हि वर्णेन भाव्यते शुक्लमम्बरम् ।

तादृशं कुरुते रूपमेतदेवमवेहि मे ॥ ५ ॥

श्वेत वस्त्रको जैसे रंगमें रँगा जाता है, वह वैसा ही रूप धारण कर लेता है । इसी प्रकार जैसा संग किया जाता है, वैसा ही रंग अपने ऊपर चढ़ता है । यह बात मुझसे अच्छी तरह समझ लो ॥ ५ ॥

तस्माद् गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कदाचन ।

अनित्यमिह मर्त्यानां जीवितं हि चलाचलम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1928

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1928 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इसलिये तुम गुणोंमें ही अनुराग रखो, दोषोंमें कभी नहीं; क्योंकि यहाँ मनुष्योंका जीवन अनित्य और चंचल है ॥ ६ ॥

सुखे वा यदि वा दुःखे वर्तमानो विचक्षणः यश्चिनोति शुभान्येव स तन्त्राणीह पश्यति ॥ ७ ॥

जो विद्वान् सुख अथवा दुःखमें रहकर भी सदा शुभकर्मका ही अनुष्ठान करता है, वही यहाँ शास्त्रोंको देखता और समझता है ॥ ७ ॥

धर्मादपेतं यत् कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम् ।

न तत् सेवेत मेधावी न तद्धितमिहोच्यते ॥ ८ ॥

धर्मके विपरीत कर्म यदि लौकिक दृष्टिसे बहुत लाभदायक हो तो भी बुद्धिमान् पुरुषको उसका सेवन नहीं करना चाहिये; क्योंकि उसे इस जगत् में हितकर नहीं बताया जाता है ॥ ८ ॥

( धर्मेण सहितं यत् तु भवेदल्पफलोदयम् । तत् कार्यमविशङ्केन कर्मात्यन्तं सुखावहम् II )

यो हृत्वा गोसहस्राणि नृपो दद्यादरक्षिता ।

स शब्दमात्रफलभाग् राजा भवति तस्करः ॥ ९ ॥

जो कार्य धर्मके अनुकूल हो, वह अल्प लाभदायक होनेपर भी निःशंक होकर कर लेने योग्य है; क्योंकि वह अन्तमें अत्यन्त सुख देनेवाला होता है । जो राजा दूसरोंकी हजारों गौएँ छीनकर दान करता है और प्रजाकी रक्षा नहीं करता, वह नाममात्रका ही दानी और राजा है । वास्तवमें तो वह चोर और डाकू है ॥ ९ ॥

स्वयम्भूरसृजच्चाग्रे धातारं लोकसत्कृतम् ।

धातासृजत् पुत्रमेकं लोकानां धारणे रतम् ॥ १० ॥

ईश्वरने सबसे पहले लोकपूजित ब्रह्माको उत्पन्न किया । ब्रह्माने एक पुत्र ( पर्जन्य) -को जन्म दिया, जो सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेमें तत्पर है ॥ १० ॥

तमर्चयित्वा वैश्यस्तु कुर्यादत्यर्थमृद्धिमत् ।

रक्षितव्यं तु राजन्यैरुपयोज्यं द्विजातिभिः ॥ ११ ॥

अजिह्मैरशठक्रोधैर्हव्यकव्यप्रयोक्तृभिः ।

शूद्रैर्निर्मार्जनं कार्यमेवं धर्मो न नश्यति ॥ १२ ॥

उसीकी पूजा करके वैश्यको चाहिये कि खेती और पशुपालन आदिके द्वारा उसे अत्यन्त समृद्धिशाली बनाये । राजाको उसकी रक्षा करनी चाहिये और ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे कुटिलता, शठता एवं क्रोधको त्यागकर हव्य- कव्यका प्रयोग करते हुए उस अन्न-धनका यज्ञ ( लोकहितके कार्य ) में सदुपयोग करें। शूद्रोंको यज्ञभूमि तथा त्रैवर्णिकोंके घरोंको झाड़-बुहारकर साफ रखना चाहिये। ऐसा करनेसे धर्मका नाश नहीं होता ॥ ११-१२ ॥

पृष्ठ 1929

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1929 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अप्रणष्टे ततो धर्मे भवन्ति सुखिताः प्रजाः ।

सुखेन तासां राजेन्द्र मोदन्ते दिवि देवताः ॥ १३ ॥

धर्मका नाश न होकर उसका पालन होता रहे तो सारी प्रजा सुखी होती है । राजेन्द्र! प्रजाओंके सुखी होनेपर स्वर्गमें देवता भी प्रसन्न रहते हैं ॥ १३ ॥

तस्माद् यो रक्षति नृपः स धर्मेणेति पूज्यते ।

अधीते चापि यो विप्रो वैश्यो यश्चार्जने रतः ॥ १४ ॥

यश्च शुश्रूषते शूद्रः सततं नियतेन्द्रियः ।

अतोऽन्यथा मनुष्येन्द्र स्वधर्मात् परिहीयते ॥ १५ ॥

जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा करता है, वह उस धर्माचरणके कारण ही लोकमें पूजित होता है । इसी प्रकार जो ब्राह्मण धर्मपूर्वक स्वाध्याय करता है, जो वैश्य धर्मके अनुसार धनोपार्जनमें तत्पर रहता है तथा जो शूद्र जितेन्द्रिय भावसे रहकर सर्वदा द्विजातियोंकी सेवा करता है, वे सभी अपने - अपने धर्माचरणके कारण लोकमें सम्मानित होते हैं । नरेन्द्र! इसके विपरीत आचरण करनेसे सब लोग अपने धर्मसे गिर जाते हैं ॥

प्राणसंतापनिर्दिष्टाः काकिण्योऽपि महाफलाः ।

न्यायेनोपार्जिता दत्ताः किमुतान्याः सहस्रशः ॥ १६ ॥

प्राणोंको कष्ट देकर भी यदि न्यायसे कमायी हुई थोड़ी- सी कौड़ियोंका भी दान किया जाय तो वे महान् फल देनेवाली होती हैं; फिर जो दूसरी वस्तुएँ हजारोंकी संख्यामें दी जाती हैं, उनकी तो बात ही क्या है ॥ १६ ॥

सत्कृत्य हि द्विजातिभ्यो यो ददाति नराधिपः ।

यादृशं तादृशं नित्यमश्नाति फलमूर्जितम् ॥ १७ ॥

जो राजा ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें जैसा दान देता है, वैसा ही उत्तम फलका वह सदा ही उपभोग करता है ॥ १७ ॥

अभिगम्य च तत् तुष्ट्या दत्तमाहुरभिष्टुतम् ।

याचितेन तु यद् दत्तं तदाहुर्मध्यमं बुधाः ॥ १८ ॥

स्वयं ही ब्राह्मणके पास जाकर उसे संतुष्ट करते हुए जो दान दिया जाता है, उसे प्रशंसनीय— उत्तम बताया गया है और याचना करनेपर जो कुछ दिया जाता है, उसे विद्वान् पुरुष मध्यम श्रेणीका दान कहते हैं ॥

अवज्ञया दीयते यत् तथैवाश्रद्धयापि वा ।

तमाहुरधमं दानं मुनयः सत्यवादिनः ॥ १ ९ ॥

अतिक्रामेन्मज्जमानो विविधेन नरः सदा ।

तथा प्रयत्नं कुर्वीत यथा मुच्येत संश्रयात् ॥ २० ॥

अवहेलना अथवा अश्रद्धासे जो कुछ दिया जाता है, उसे सत्यवादी मुनियोंने अधम श्रेणीका दान कहा है । डूबता हुआ मनुष्य जिस तरह नाना प्रकारके उपायद्वारा समुद्रसे पार

पृष्ठ 1930

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1930 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

हो जाता है, वैसे ही तुमको भी सदा ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिस प्रकार संसार- समुद्रसे छुटकारा मिले ॥ १ ९ -२० ॥

दमेन शोभते विप्रः क्षत्रियो विजयेन तु ।

धनेन वैश्यः शूद्रस्तु नित्यं दाक्ष्येण शोभते ॥ २१ ॥

ब्राह्मण इन्द्रियसंयमसे, क्षत्रिय युद्धमें विजय पानेसे, वैश्य न्यायपूर्वक उपार्जित धनसे और शूद्र सदा सेवाकार्यमें कुशलताका परिचय देनेसे शोभा पाता है ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २२ श्लोक हैं )