श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1931–1940
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1931–1940
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चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पराशरगीता - ब्राह्मण और शूद्रकी जीविका, निन्दनीय कर्मोंके त्यागकी आज्ञा, मनुष्योंमें आसुरभावकी उत्पत्ति और भगवान् शिवके द्वारा उसका निवारण तथा स्वधर्मके अनुसार कर्तव्यपालनका आदेश पराशर उवाच
प्रतिग्रहागता विप्रे क्षत्रिये युधि निर्जिताः ।
वैश्ये न्यायार्जिताश्चैव शूद्रे शुश्रूषयार्जिताः ॥ १ ॥
स्वल्पाप्यर्थाः प्रशस्यन्ते धर्मस्यार्थे महाफलाः । पराशरजी कहते हैं - राजन्! ब्राह्मणके यहाँ प्रतिग्रहसे मिला हुआ, क्षत्रियके घर युद्धसे जीतकर लाया हुआ, वैश्यके पास न्यायपूर्वक ( खेती आदिसे ) कमाया हुआ और शूद्रके यहाँ सेवासे प्राप्त हुआ थोड़ा-सा भी धन हो तो उसकी बड़ी प्रशंसा होती है तथा धर्मके कार्यमें उसका उपभोग हो तो वह महान् फल देनेवाला होता है ॥ १३ ॥
नित्यं त्रयाणां वर्णानां शुश्रूषुः शूद्र उच्यते ॥ २ ॥
क्षत्रधर्मा वैश्यधर्मा नावृत्तिः पतते द्विजः ।
शूद्रधर्मा यदा तु स्यात् तदा पतति वै द्विजः ॥ ३ ॥
शूद्रको तीनों वर्णोंका नित्य सेवक बताया जाता है। यदि ब्राह्मण जीविकाके अभावमें क्षत्रिय अथवा वैश्यके धर्मसे जीवन -निर्वाह करे तो वह पतित नहीं होता है; किंतु जब वह शूद्रके धर्मको अपनाता है, तब तत्काल पतित हो जाता है ॥ २-३ ॥
वाणिज्यं पाशुपाल्यं च तथा शिल्पोपजीवनम् ।
शूद्रस्यापि विधीयन्ते यदा वृत्तिर्न जायते ॥ ४ ॥
जब शूद्र सेवावृत्तिसे जीविका न चला सके, तब उसके लिये भी व्यापार, पशुपालन तथा शिल्पकला आदिसे जीवन - निर्वाह करनेकी आज्ञा है ॥ ४ ॥
रङ्गावतरणं चैव तथा रूपोपजीवनम् ।
मद्यमांसोपजीव्यं च विक्रयं लोहचर्मणोः ॥ ५ ॥
अपूर्विणा न कर्तव्यं कर्म लोके विगर्हितम् ।
कृतपूर्वं तु त्यजतो महान् धर्म इति श्रुतिः ॥ ६ ॥
रंगमंचपर स्त्री आदिके वेषमें उतरकर नाचना या खेल दिखाना, बहुरूपियेका काम करना, मदिरा और मांस बेचकर जीविका चलाना तथा लोहे और चमड़ेकी बिक्री करना— ये सब काम ( सबके लिये ) लोकमें निन्दित माने गये हैं । जिसके घरमें पूर्वपरम्परासे ये काम
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न होते आये हों, उसे स्वयं इनका आरम्भ नहीं करना चाहिये । जिसके यहाँ पहलेसे इन्हें करनेकी प्रथा हो, वह भी छोड़ दे तो महान् धर्म होता है - ऐसा शास्त्रका निर्णय है ॥
संसिद्धः पुरुषो लोके यदाचरति पापकम् ।
मदेनाभिप्लुतमनास्तच्च न ग्राह्यमुच्यते ॥ ७ ॥
यदि कोई जगत्में प्रसिद्ध हुआ पुरुष घमण्डमें आकर या मनमें लोभ भरा रहनेके कारण पापाचरण करने लगे तो उसका वह कार्य अनुकरण करने योग्य नहीं बताया गया है ॥ ७ ॥
श्रूयते हि पुराणेषु प्रजा धिग्दण्डशासनाः ।
दान्ता धर्मप्रधानाश्च न्यायधर्मानुवृत्तिकाः ॥ ८ ॥
पुराणोंमें सुना जाता है कि पहले अधिकांश मनुष्य संयमी, धार्मिक तथा न्यायोचित आचारका ही अनुसरण करनेवाले थे । उस समय अपराधियोंको धिक्कारमात्रका ही दण्ड दिया जाता था ॥ ८ ॥
धर्म एव सदा नॄणामिह राजन् प्रशस्यते ।
धर्मवृद्धा गुणानेव सेवन्ते हि नरा भुवि ॥ ९ ॥
राजन्! इस जगत्में सदा मनुष्योंके धर्मकी ही प्रशंसा होती आयी है । धर्ममें बढ़े - चढ़े लोग इस भूतलपर केवल सद्गुणोंका ही सेवन करते हैं ॥ ९ ॥
तं धर्ममसुरास्तात नामृष्यन्त जनाधिप ।
विवर्धमानाः क्रमशस्तत्र तेऽन्वाविशन् प्रजाः ॥ १० ॥
तात! जनेश्वर! परंतु उस धर्मको असुर नहीं सह सके । वे क्रमशः बढ़ते हुए प्रजाके शरीरमें समा गये ॥ १० ॥
तासां दर्पः समभवत् प्रजानां धर्मनाशनः ।
दर्पात्मनां ततः पश्चात् क्रोधस्तासामजायत ॥ ११ ॥
तब प्रजाओंमें धर्मको नष्ट करनेवाला दर्प प्रकट हुआ । फिर जब प्रजाओंके मनमें दर्प आ गया, तब क्रोधका भी प्रादुर्भाव हो गया ॥ ११ ॥
ततः क्रोधाभिभूतानां वृत्तं लज्जासमन्वितम् ।
ह्रीश्चैवाप्यनशद् राजंस्ततो मोहो व्यजायत ॥ १२ ॥
राजन्! तदनन्तर क्रोधसे आक्रान्त होनेपर मनुष्योंके लज्जायुक्त सदाचारका लोप हो
गया । उनका संकोच भी जाता रहा । इसके बाद उनमें मोहकी उत्पत्ति हुई ॥ १२ ॥
ततो मोहपरीतास्ता नापश्यन्त यथा पुरा ।
परस्परावमर्देन वर्धयन्त्यो यथासुखम् ॥ १३ ॥
मोहसे घिर जानेपर उनमें पहले जैसी विवेकपूर्ण दृष्टि नहीं रह गयी; अतः वे परस्पर एक - दूसरेका विनाश करके अपने - अपने सुखको बढ़ानेकी चेष्टा करने लगे ॥ १३ ॥
ताः प्राप्य तु स धिग्दण्डो न कारणमतोऽभवत् ।
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ततोऽभ्यगच्छन् देवांश्च ब्राह्मणांश्चावमन्य ह ॥ १४ ॥
उन बिगड़े हुए लोगोंको पाकर धिक्कारका दण्ड उन्हें राहपर लानेमें सफल न हो सका । सभी मनुष्य देवता और ब्राह्मणोंका अपमान करके मनमाने तौरपर विषय - भोगोंका सेवन करने लगे ॥ १४ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु देवा देववरं शिवम् ।
अगच्छन् शरणं धीरं बहुरूपं गुणाधिकम् ॥ १५ ॥
ऐसा अवसर उपस्थित होनेपर सम्पूर्ण देवता अनेक रूपधारी, अधिक गुणशाली, धीरजस्वभाव देवेश्वर भगवान् शिवकी शरणमें गये ॥ १५ ॥
तेन स्म ते गगनगाः सपुराः पातिताः क्षितौ ।
त्रिधाप्येकेन बाणेन देवाप्यायिततेजसा ॥ १६ ॥
तब शिवजीने देवताओंके द्वारा बढ़ाये हुए तेजसे युक्त एक ही शक्तिशाली बाणके द्वारा तीन नगरोंसहित आकाशमें विचरनेवाले उन समस्त असुरोंको मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ १६ ॥
तेषामधिपतिस्त्वासीद् भीमो भीमपराक्रमः ।
देवतानां भयकरः स हतः शूलपाणिना ॥ १७ ॥
उन असुरोंका स्वामी भयंकर आकारवाला तथा भीषण पराक्रमी था । देवताओंको वह सदा भयभीत किये रहता था; किंतु भगवान् शूलपाणिने उसे भी मार डाला ॥ १७ ॥
तस्मिन् हतेऽथ स्वं भावं प्रत्यपद्यन्त मानवाः ।
प्रापद्यन्त च वेदान् वै शास्त्राणि च यथा पुरा ॥ १८ ॥
उस असुरके मारे जानेपर सब मनुष्य प्रकृतिस्थ हो गये तथा उन्हें पूर्ववत् वेद और शास्त्रोंका ज्ञान हो गया ॥
ततोऽभिषिच्य राज्येन देवानां दिवि वासवम् ।
सप्तर्षयश्चान्वयुञ्जन् नराणां दण्डधारणे ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् सप्तर्षियोंने इन्द्रको स्वर्गमें देवताओंके राज्यपर अभिषिक्त किया और वे स्वयं मनुष्यके शासन - कार्यमें लग गये ॥ १ ९ ॥
सप्तर्षीणामथोर्ध्वं च विपृथुर्नाम पार्थिवः ।
राजानः क्षत्रियाश्चैव मण्डलेषु पृथक् पृथक् ॥ २० ॥
सप्तर्षियोंके बाद विपृथु नामक राजा भूमण्डलका स्वामी हुआ तथा और भी बहुत - से क्षत्रिय भिन्न- भिन्न मण्डलोंके राजा हुए ॥ २० ॥
महाकुलेषु ये जाता वृद्धाः पूर्वतराश्च ये ।
तेषामप्यासुरो भावो हृदयान्नापसर्पति ॥ २१ ॥
उस समय जो उच्च कुलोंमें उत्पन्न हुए थे, अवस्था और गुणोंमें बढ़े - चढ़े थे तथा जो उनसे भी पूर्ववर्ती पुरुष थे, उनके हृदयसे भी आसुरभाव पूर्णरूपसे नहीं निकला
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था ॥ २१ ॥
तस्मात् तेनैव भावेन सानुषङ्गेण पार्थिवाः ।
आसुराण्येव कर्माणि न्यसेवन् भीमविक्रमाः ॥ २२ ॥
अतः उसी आनुषंगिक आसुरभावसे युक्त होकर कितने ही भयंकर पराक्रमी भूपाल असुरोचित कर्मोंका ही सेवन करने लगे ॥ २२ ॥
प्रत्यतिष्ठंश्च तेष्वेव तान्येव स्थापयन्त्यपि ।
भजन्ते तानि चाद्यापि ये बालिशतरा नराः ॥ २३ ॥
जो मनुष्य अत्यन्त मूर्ख हैं, वे आज भी उन्हीं आसुरभावोंमें स्थित हैं, उन्हींकी स्थापना करते हैं और उन्हींको सब प्रकारसे अपनाते हैं ॥ २३ ॥
तस्मादहं ब्रवीमि त्वां राजन् संचिन्त्य शास्त्रतः ।
संसिद्धाधिगमं कुर्यात् कर्म हिंसात्मकं त्यजेत् ॥ २४ ॥
अतः राजन्! मैं शास्त्रके अनुसार खूब सोच - विचारकर कहता हूँ कि मनुष्यको उन्नत होनेका प्रयत्न तो करना चाहिये, किंतु हिंसात्मक कर्मका त्याग कर देना चाहिये ॥ २४ ॥
न संकरेण द्रविणं प्रचिन्वीयाद् विचक्षणः ।
धर्मार्थं न्यायमुत्सृज्य न तत् कल्याणमुच्यते ॥ २५ ॥
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह धर्म करनेके लिये न्यायको त्यागकर पापमिश्रित मार्गसे धनका संग्रह न करे; क्योंकि उसे कल्याणकारी नहीं बताया जाता है ॥ २५ ॥
स त्वमेवंविधो दान्तः क्षत्रियः प्रियबान्धवः ।
प्रजा भृत्यांश्च पुत्रांश्च स्वधर्मेणानुपालय ॥ २६ ॥
नरेश्वर! तुम भी इसी प्रकार जितेन्द्रिय क्षत्रिय होकर बन्धु बान्धवोंसे प्रेम रखते हुए प्रजा, भृत्य और पुत्रोंका स्वधर्मके अनुसार पालन करो ॥ २६ ॥
इष्टानिष्टसमायोगो वैरं सौहार्दमेव च ।
अथ जातिसहस्राणि बहूनि परिवर्तते ॥ २७ ॥
इष्ट और अनिष्टका संयोग, वैर और सौहार्द – इन सबका अनुभव करते - करते जीवके कई सहस्र जन्म बीत जाते हैं ॥ २७ ॥
तस्माद् गुणेषु रज्येथा मा दोषेषु कथंचन ।
निर्गुणोऽपि हि दुर्बुद्धिरात्मनः सोऽतिरज्यते ॥ २८ ॥
इसलिये तुम सद्गुणोंमें ही अनुराग रखो, दोषोंमें किसी प्रकार नहीं; क्योंकि गुणहीन और दुर्बुद्धि मनुष्य भी अपने गुणोंके अभिमानसे अत्यन्त संतुष्ट रहता है ॥
मानुषेषु महाराज धर्माधर्मौ प्रवर्ततः ।
न तथान्येषु भूतेषु मनुष्यरहितेष्विह ॥ २ ९ ॥
महाराज! यहाँ मनुष्योंमें जैसे धर्म और अधर्म निवास करते हैं, उस प्रकार मनुष्येतर अन्य प्राणियोंमें नहीं ॥ २ ९ ॥
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धर्मशीलो नरो विद्वानीहकोऽनीहकोऽपि वा ।
आत्मभूतः सदा लोके चरेद् भूतान्यहिंसया ॥ ३० ॥
धर्मशील विद्वान् मनुष्य सचेष्ट हो चाहे चेष्टारहित, उसे चाहिये कि सदैव जगत्में सबके प्रति आत्मभाव रखकर किसी भी प्राणीकी हिंसा न करते हुए समभावसे व्यवहार करे ॥ ३० ॥
यदा व्यपेतहृल्लेखं मनो भवति तस्य वै ।
नानृतं चैव भवति तदा कल्याणमृच्छति ॥ ३१ ॥
जब मनुष्यका मन कामना और कर्म- संस्कारोंसे रहित हो जाता है तथा वह मिथ्याचारसे रहित हो जाता है, उस समय उसे कल्याणकी प्राप्ति होती है ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां चतुर्नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २ ९ ४ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ९४ ॥
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पञ्चनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पराशरगीता - विषयासक्त मनुष्यका पतन, तपोबलकी श्रेष्ठता तथा दृढ़तापूर्वक स्वधर्मपालनका आदेश पराशरउवाच
एष धर्मविधिस्तात गृहस्थस्य प्रकीर्तितः ।
तपोविधिं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥ १ ॥
पराशरजी कहते हैं— तात! यह मैंने गृहस्थके धर्मका विधान बताया है । अब मैं तपकी विधि बताऊँगा, उसे मेरे मुखसे सुनो ॥ १ ॥
प्रायेण च गृहस्थस्य ममत्वं नाम जायते ।
सङ्गागतं नरश्रेष्ठ भावै राजसतामसैः ॥ २ ॥
नरश्रेष्ठ! गृहस्थ पुरुषको प्रायः राजस और तामस भावोंके संसर्गवश पदार्थ और व्यक्तियोंमें ममता हो जाती है ॥ २ ॥
गृहाण्याश्रित्य गावश्च क्षेत्राणि च धनानि च ।
दाराः पुत्राश्च भृत्याश्च भवन्तीह नरस्य वै ॥ ३ ॥
घरका आश्रय लेते ही मनुष्यका गौ, खेती-बारी, धन -दौलत, स्त्री- पुत्र तथा भरण-पोषणके योग्य अन्यान्य कुटुम्बीजनोंसे सम्बन्ध स्थापित हो जाता है ॥ ३ ॥
एवं तस्य प्रवृत्तस्य नित्यमेवानुपश्यतः ।
रागद्वेषौ विवर्धेते ह्यनित्यत्वमपश्यतः ॥ ४ ॥
इस प्रकार प्रवृत्तिमार्गमें रहकर वह नित्य ही उन वस्तुओंको देखता है, किंतु उनकी अनित्यताकी ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती; इसलिये उसके मनमें इनके प्रति राग और द्वेष बढ़ने लगते हैं ॥ ४ ॥
रागद्वेषाभिभूतं च नरं द्रव्यवशानुगम् ।
मोहजाता रतिर्नाम समुपैति नराधिप ॥ ५ ॥
नरेश्वर! राग और द्वेषके वशीभूत होकर जब मनुष्य द्रव्यमें आसक्त हो जाता है, तब मोहकी कन्या रति उसके पास आ जाती है ॥ ५ ॥
कृतार्थं भोगिनं मत्वा सर्वो रतिपरायणः ।
लाभं ग्राम्यसुखादन्यं रतितो नानुपश्यति ॥ ६ ॥
तब रतिकी उपासनामें लगे हुए सभी लोग भोगीको ही कृतार्थ मानकर रतिके द्वारा जो विषय -सुख प्राप्त होता है, उससे बढ़कर दूसरा कोई लाभ नहीं समझते हैं ॥ ततो लोभाभिभूतात्मा संगाद् वर्धयते जनम् ।
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पुष्ट्यर्थं चैव तस्येह जनस्यार्थं चिकीर्षति ॥ ७ ॥
तदनन्तर उनके मनपर लोभका अधिकार हो जाता है और वे आसक्तिवश अपने परिजनोंकी संख्या बढ़ाने लगते हैं । इसके बाद उन कुटुम्बीजनोंके पालन - पोषणके लिये मनुष्यके मनमें धन- संग्रहकी इच्छा होती है ॥ ७ ॥
स जानन्नपि चाकार्यमर्थार्थं सेवते नरः ।
बालस्नेहपरीतात्मा तत्क्षयाच्चानुतप्यते ॥ ८ ॥
यद्यपि मनुष्य जानता है कि अमुक काम करना पाप है, तो भी वह धनके लिये उसका सेवन करता है । बाल - बच्चोंके स्नेहमें उसका मन डूबा रहता है और उनमेंसे जब कोई मर जाता है तब उनके लिये वह बारंबार संतप्त होता है ॥ ८ ॥
ततो मानेन सम्पन्नो रक्षन्नात्मपराजयम् ।
करोति येन भोगी स्यामिति तस्माद् विनश्यति ॥ ९ ॥
धनसे जब लोकमें सम्मान बढ़ता है, तब वह मानसम्पन्न पुरुष सदा अपने अपमानसे बचनेके लिये प्रयत्न करता रहता है एवं ' मैं भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न होऊँ' यह उद्देश्य लेकर ही वह सारा कार्य करता है और इसी प्रयत्नमें एक दिन नष्ट हो जाता है ॥ ९ ॥
तथा हि बुद्धियुक्तानां शाश्वतं ब्रह्मवादिनाम् ।
अन्विच्छतां शुभं कर्म नराणां त्यजतां सुखम् ॥ १० ॥
वास्तवमें जो शुभ कर्मोंका अनुष्ठान तो करते हैं, परन्तु उनसे सुख पानेकी इच्छाको त्याग देते हैं, उन समत्व- बुद्धिसे युक्त ब्रह्मवादी पुरुषोंको ही सनातन पदकी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥
स्नेहायतननाशाच्च धननाशाच्च पार्थिव ।
आधिव्याधिप्रतापाच्च निर्वेदमुपगच्छति ॥ ११ ॥
पृथ्वीनाथ! संसारी जीवोंको तो जब उनके स्नेहके आधारभूत स्त्री- पुत्र आदिका नाश हो जाता, धन चला जाता और रोग तथा चिन्तासे कष्ट उठाना पड़ता है, तभी वैराग्य होता है ॥ ११ ॥
निर्वेदादात्मसम्बोधः सम्बोधाच्छास्त्रदर्शनम् ।
शास्त्रार्थदर्शनाद् राजंस्तप एवानुपश्यति ॥ १२ ॥
राजन्! वैराग्यसे मनुष्यको आत्मतत्त्वकी जिज्ञासा होती है । जिज्ञासासे शास्त्रोंके स्वाध्यायमें मन लगता है तथा शास्त्रोंके अर्थ और भावके ज्ञानसे वह तपको ही कल्याणका साधन समझता है ॥ १२ ॥
दुर्लभो हि मनुष्येन्द्र नरः प्रत्यवमर्शवान् ।
यो वै प्रियसुखे क्षीणे तपः कर्तुं व्यवस्यति ॥ १३ ॥
नरेन्द्र! संसारमें ऐसा विवेकी मनुष्य दुर्लभ है, जो स्त्री-पुत्र आदि प्रियजनोंसे मिलनेवाले सुखके न रहनेपर तपमें प्रवृत्त होनेका ही निश्चय करता है ॥ १३ ॥
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तपः सर्वगतं तात हीनस्यापि विधीयते ।
जितेन्द्रियस्य दान्तस्य स्वर्गमार्गप्रवर्तकम् ॥ १४ ॥
तात! तपस्यामें सभीका अधिकार है । जितेन्द्रिय और मनोनिग्रहसम्पन्न हीन वर्णके लिये भी तपका विधान है; क्योंकि तप पुरुषको स्वर्गकी राहपर लानेवाला है ॥
प्रजापतिः प्रजाः पूर्वमसृजत् तपसा विभुः ।
क्वचित् क्वचिद् ब्रह्मपरो व्रतान्यास्थाय पार्थिव ॥ १५ ॥
भूपाल! पूर्वकालमें शक्तिशाली प्रजापतिने तपमें स्थित होकर और कभी - कभी ब्रह्मपरायण व्रतमें स्थित होकर संसारकी रचना की थी ॥ १५ ॥
आदित्या वसवो रुद्रास्तथैवाग्न्यश्विमारुताः ।
विश्वेदेवास्तथा साध्याः पितरोऽथ मरुद्गणाः ॥ १६ ॥
यक्षराक्षसगन्धर्वाः सिद्धाश्चान्ये दिवौकसः ।
संसिद्धास्तपसा तात ये चान्ये स्वर्गवासिनः ॥ १७ ॥
तात! आदित्य, वसु, रुद्र, अग्नि, अश्विनीकुमार, वायु, विश्वेदेव, साध्य, पितर, मरुद्गण, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, सिद्ध तथा अन्य जो स्वर्गवासी देवता हैं, वे सब - के - सब तपस्यासे ही सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥
ये चादौ ब्राह्मणाः सृष्टा ब्रह्मणा तपसा पुरा ।
ते भावयन्तः पृथिवीं विचरन्ति दिवं तथा ॥ १८ ॥
ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन मरीचि आदि ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया था, वे तपके ही प्रभावसे पृथ्वी और आकाशको पवित्र करते हुए ही विचरते हैं ॥ १८ ॥
मर्त्यलोके च राजानो ये चान्ये गृहमेधिनः ।
महाकुलेषु दृश्यन्ते तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ १ ९ ॥
मर्त्यलोकमें भी जो राजे - महाराजे तथा अन्यान्य गृहस्थ महान् कुलोंमें उत्पन्न देखे जाते हैं, वह सब उनकी तपस्याका ही फल है ॥ १ ९ ॥
कौशिकानि च वस्त्राणि शुभान्याभरणानि च ।
वाहनासनपानानि तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ २० ॥
रेशमी वस्त्र, सुन्दर आभूषण, वाहन, आसन और उत्तम खान-पान आदि सब कुछ तपस्याका ही फल है ॥
मनोऽनुकूलाः प्रमदा रूपवत्यः सहस्रशः ।
वासः प्रासादपृष्ठे च तत् सर्वं तपसः फलम् ॥ २१ ॥
मनके अनुकूल चलनेवाली सहस्रों रूपवती युवतियाँ और महलोंका निवास आदि सब कुछ तपस्याका ही फल है ॥ २१ ॥
शयनानि च मुख्यानि भोज्यानि विविधानि च ।
अभिप्रेतानि सर्वाणि भवन्ति शुभकर्मिणाम् ॥ २२ ॥
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श्रेष्ठ शय्या, भाँति - भाँतिके उत्तम भोजन तथा सभी मनोवांछित पदार्थ पुण्यकर्म करनेवाले लोगोंको ही प्राप्त होते हैं ॥ २२ ॥
नाप्राप्यं तपसः किंचित् त्रैलोक्येऽपि परंतप ।
उपभोगपरित्यागः फलान्यकृतकर्मणाम् ॥ २३ ॥
परंतप! त्रिलोकीमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो तपस्यासे प्राप्त न हो सके; किंतु जिन्होंने काम्य अथवा निषिद्ध कर्म नहीं किये हैं, उनकी तपस्याका फल सुखभोगोंका परित्याग ही है ॥ २३ ॥
सुखितो दुःखितो वापि नरो लोभं परित्यजेत् ।
अवेक्ष्य मनसा शास्त्रं बुद्ध्या च नृपसत्तम ॥ २४ ॥
नृपश्रेष्ठ! मनुष्य सुखमें हो या दुःखमें, मन और बुद्धिसे शास्त्रका तत्त्व समझकर लोभका परित्याग कर दे ॥ २४ ॥
असंतोषोऽसुखायेति लोभादिन्द्रियसम्भ्रमः ।
ततोऽस्य नश्यति प्रज्ञा विद्येवाभ्यासवर्जिता ॥ २५ ॥
असंतोष दुःखका ही कारण है । लोभसे मन और इन्द्रियाँ चंचल होती हैं, उससे मनुष्यकी बुद्धि उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे बिना अभ्यासके विद्या ॥
नष्टप्रज्ञो यदा तु स्यात् तदा न्यायं न पश्यति ।
तस्मात् सुखक्षये प्राप्ते पुमानुग्रं तपश्चरेत् ॥ २६ ॥
जब मनुष्यकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, तब वह न्यायको नहीं देख पाता अर्थात् कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय नहीं कर पाता है । इसलिये सुखका क्षय हो जानेपर प्रत्येक पुरुषको घोर तपस्या करनी चाहिये ॥
यदिष्टं तत् सुखं प्राहुर्द्वेष्यं दुःखमिहेष्यते ।
कृताकृतस्य तपसः फलं पश्यस्व यादृशम् ॥ २७ ॥
जो अपनेको प्रिय जान पड़ता है, उसे सुख कहते हैं तथा जो मनके प्रतिकूल होता है, वह दुःख कहलाता है । तपस्या करनेसे सुख और न करनेसे दुःख होता है । इस प्रकार तप करने और न करनेका जैसा फल होता है, उसे तुम भलीभाँति समझ लो ॥ २७ ॥
नित्यं भद्राणि पश्यन्ति विषयांश्चोपभुञ्जते ।
प्राकाश्यं चैव गच्छन्ति कृत्वा निष्कल्मषं तपः ॥ २८ ॥
मनुष्य पापरहित तपस्या करके सदा अपना कल्याण ही देखते हैं । मनोवांछित विषयोंका उपभोग करते हैं और संसारमें उनकी ख्याति होती है ॥ २८ ॥
अप्रियाण्यवमानांश्च दुःखं बहुविधात्मकम् ।
फलार्थी तत्फलं त्यक्त्वा प्राप्नोति विषयात्मकम् ॥ २ ९ ॥
मनके अनुकूल फलकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य सकाम कर्मका अनुष्ठान करके अप्रिय, अपमान और नाना प्रकारके दुःख पाता है, किंतु उस फलका परित्याग करके वह
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सम्पूर्ण विषयोंके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ॥ २ ९ ॥
धर्मे तपसि दाने च विचिकित्सास्य जायते ।
स कुत्वा पापकान्येव निरयं प्रतिपद्यते ॥ ३० ॥
जिसे धर्म, तपस्या और दानमें संशय उत्पन्न हो जाता है, वह पापकर्म करके नरकमें पड़ता है ॥ ३० ॥
सुखे तु वर्तमानो वै दुःखे वापि नरोत्तम ।
सुवृत्ताद् यो न चलते शास्त्रचक्षुः स मानवः ॥ ३१ ॥
नरश्रेष्ठ! मनुष्य सुखमें हो या दुःखमें, जो सदाचारसे कभी विचलित नहीं होता, वही शास्त्रका ज्ञाता है ॥
इषुप्रपातमात्रं हि स्पर्शयोगे रतिः स्मृता ।
रसने दर्शने घ्राणे श्रवणे च विशाम्पते ॥ ३२ ॥
प्रजानाथ! बाणको धनुषसे छूटकर पृथ्वीपर गिरनेमें जितनी देर लगती है, उतना ही समय स्पर्शेन्द्रिय, रसना, नेत्र, नासिका और कानके विषयोंका सुख अनुभव करनेमें लगता है अर्थात् विषयोंका सुख क्षणिक है ॥
ततोऽस्य जायते तीव्रा वेदना तत्क्षयात् पुनः ।
अबुधा न प्रशंसन्ति मोक्षं सुखमनुत्तमम् ॥ ३३ ॥
फिर वह सुख जब नष्ट हो जाता है, तब उसके लिये मनमें बड़ी वेदना होती है । इतनेपर भी अज्ञानी पुरुष ( विषयोंमें ही लिप्त रहते हैं, वे ) सर्वोत्तम मोक्ष - सुखकी प्रशंसा नहीं करते अर्थात् उसे नहीं चाहते ॥ ३३ ॥
ततः फलार्थं सर्वस्य भवन्ति ज्यायसे गुणाः ।
धर्मवृत्त्या च सततं कामार्थाभ्यां न हीयते ॥ ३४ ॥
अतः प्रत्येक विवेकी पुरुषके मनमें श्रेष्ठ मोक्षफलकी प्राप्ति करानेके लिये शम - दम आदि गुणोंकी उत्पत्ति होती है । निरन्तर धर्मका पालन करनेसे मनुष्य कभी धन और भोगोंसे वंचित नहीं रहता ॥ ३४ ॥
अप्रयत्नागताः सेव्या गृहस्थैर्विषयाः सदा ।
प्रयत्नेनोपगम्यश्च स्वधर्म इति मे मतिः ॥ ३५ ॥
इसलिये गृहस्थ पुरुषको सदा बिना प्रयत्न अपने - आप प्राप्त हुए विषयोंका ही सेवन करना चाहिये और प्रयत्न करके तो अपने धर्मका ही पालन करना चाहिये । यही मेरा मत है ॥ ३५ ॥
मानिनां कुलजातानां नित्यं शास्त्रार्थचक्षुषाम् ।
क्रियाधर्मविमुक्तानामशक्त्या संवृतात्मनाम् ॥ ३६ ॥
क्रियमाणं यदा कर्म नाशं गच्छति मानुषम् ।
तेषां नान्यदृते लोके तपसः कर्म विद्यते ॥ ३७ ॥