05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2011–2020
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2011–2020
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इसी प्रकार वह जलोदर, तृषारोग, ज्वर, गलगण्ड ( गलसूआ ), विषूचिका ( हैजा ), सफेद कोढ़, अग्निदाह, सिध्मा ( सफेद दाग या सेहुँवा ), अपस्मार ( मृगी ) आदि रोगोंका शिकार होता रहता है ॥ ६ ॥
यानि चान्यानि द्वन्द्वानि प्राकृतानि शरीरिषु ।
उत्पद्यन्ते विचित्राणि तान्येषोऽप्यभिमन्यते ॥ ७ ॥
इनके सिवा और भी जितने प्रकारके प्रकृतिजन्य विचित्र रोग या द्वन्द्व देहधारियोंमें उत्पन्न होते हैं, उन सबसे यह अपनेको आक्रान्त मानता है ॥ ७ ॥
तिर्यग्योनिसहस्रेषु कदाचिद् देवतास्वपि ।
अभिमन्यत्यभीमानात् तथैव सुकृतान्यपि ॥ ८ ॥
कभी अपनेको सहस्रों तिर्यग्योनियोंका जीव समझता है और कभी देवत्वका अभिमान धारण करता है तथा इसी अभिमानके कारण उन - उन शरीरोंद्वारा किये हुए कर्मोंका फल भी भोगता है ॥ ८ ॥
शुक्लवासाश्च दुर्वासाः शायी नित्यमधस्तथा ।
मण्डूकशायी च तथा वीरासनगतस्तथा ॥ ९ ॥
चीरधारणमाकाशे शयनं स्थानमेव च ।
इष्टकाप्रस्तरे चैव कण्टकप्रस्तरे तथा ॥ १० ॥
भस्मप्रस्तरशायी च भूमिशय्या तलेषु च ।
वीरस्थानाम्बुपङ्के च शयनं फलकेषु च ॥ ११ ॥
विविधासु च शय्यासु फलगृद्धयान्वितस्तथा ।
मुञ्जमेखलनग्नत्वं क्षौमकृष्णाजिनानि च ॥ १२ ॥
फलकी आशासे बँधा हुआ मनुष्य कभी नये- धुले सफेद वस्त्र पहनता है और कभी फटे - पुराने मैले वस्त्र धारण करता है, कभी पृथ्वीपर सोता है, कभी मेढकके समान हाथ-पैर सिकोड़कर शयन करता है, कभी वीरासनसे बैठता है और कभी खुले आकाशके नीचे । कभी चीर और वल्कल पहनता है, कभी ईंट और पत्थरपर सोता-बैठता है तो कभी काँटोंके बिछौनोंपर । कभी राख बिछाकर सोता है, कभी भूमिपर ही लेट जाता है, कभी किसी पेड़के नीचे पड़ा रहता है । कभी युद्धभूमिमें, कभी पानी और कीचड़में, कभी चौकियोंपर तथा कभी नाना प्रकारकी शय्याओंपर सोता है । कभी मूँजकी मेखला बाँधे कौपीन धारण करता है, कभी नंग- धड़ंग घूमता है । कभी रेशमी वस्त्र और कभी काला मृगचर्म पहनता है ॥ ९ –१२ ॥
शाणीवालपरीधानो व्याघ्रचर्मपरिच्छदः ।
सिंहचर्मपरीधानः पट्टवासास्तथैव च ॥ १३ ॥
कभी सन या ऊनके बने वस्त्र धारण करता है । कभी व्याघ्र या सिंहके चमड़ोंसे अपने
अंगोंको ढँक लेता है । कभी रेशमी पीताम्बर पहनता है ॥ १३ ॥
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फलकं परिधानश्च तथा कण्टकवस्त्रधृक् ।
कीटकावसनश्चैव चीरवासास्तथैव च ॥ १४ ॥
कभी फलकवस्त्र ( भोजपत्रकी छाल ), कभी साधारण वस्त्र और कभी कण्टकवस्त्र धारण करता है । कभी कीड़ोंसे निकले हुए रेशमके मुलायम वस्त्र पहनता है तो कभी चिथड़े पहनकर रहता है ॥ १४ ॥
वस्त्राणि चान्यानि बहून्यभिमन्यत्यबुद्धिमान् ।
भोजनानि विचित्राणि रत्नानि विविधानि च ॥ १५ ॥
वह अज्ञानी जीव इनके अतिरिक्त भी नाना प्रकारके वस्त्र पहनता, विचित्र - विचित्र भोजनोंके स्वाद लेता और भाँति- भाँतिके रत्न धारण करता है ॥ १५ ॥
एकरात्रान्तराशित्वमेककालिकभोजनम् ।
चतुर्थाष्टमकालश्च षष्ठकालिक एव च ॥ १६ ॥
कभी एक रातका अन्तर देकर भोजन करता है, कभी दिन रातमें एक बार अन्न ग्रहण करता है और कभी दिनके चौथे, छठे या आठवें पहरमें भोजन करता है ॥ १६ ॥
षड्रात्रभोजनश्चैव तथैवाष्टहभोजनः ।
सप्तरात्रदशाहारो द्वादशाहिकभोजनः ॥ १७ ॥
कभी छः रात बिताकर खाता है और कभी सात, आठ, दस अथवा बारह दिनोंके बाद अन्न ग्रहण करता है ॥ १७ ॥
मासोपवासी मूलाशी फलाहारस्तथैव च ।
वायुभक्षोऽम्बुपिण्याकदधिगोमयभोजनःनः ॥ १८ ॥
कभी लगातार एक मासतक उपवास करता है । कभी फल खाकर रहता है और कभी कन्द - मूलके भोजनसे निर्वाह करता है । कभी पानी- हवा पीकर रह जाता है । कभी तिलकी खली, कभी दही और कभी गोबर खाकर ही रहता है ॥ १८ ॥
गोमूत्रभोजनश्चैव शाकपुष्पाद एव च ।
शैवालभोजनश्चैव तथाऽऽचामेन वर्तयन् ॥ १ ९ ॥
कभी वह गोमूत्रका भोजन करनेवाला बनता है । कभी वह साग, फूल या सेवार खाता है तथा कभी जलका आचमन मात्र करके जीवन - निर्वाह करता है ॥
वर्तयन् शीर्णपर्णैश्च प्रकीर्णफलभोजनः ।
विविधानि च कृच्छ्राणि सेवते सिद्धिकाङ्क्षया ॥ २० ॥
कभी सूखे पत्ते और पेड़से गिरे हुए फलोंको ही खाकर रह जाता है । इस प्रकार सिद्धि पानेकी अभिलाषासे वह नाना प्रकारके कठोर नियमोंका सेवन करता है ॥
चान्द्रायणानि विधिवल्लिङ्गानि विविधानि च ।
चातुराश्रम्यपन्थानमाश्रयत्यपथानपि ॥ २१ ॥
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कभी विधिपूर्वक चान्द्रायण व्रतका अनुष्ठान करता और अनेक प्रकारके धार्मिक चिह्न धारण करता है । कभी चारों आश्रमोंके मार्गपर चलता और कभी विपरीत पथका भी आश्रय लेता है ॥ २१ ॥
उपाश्रमानप्यपरान् पाषण्डान् विविधानपि ।
विविक्ताश्च शिलाच्छायास्तथा प्रस्रवणानि च ॥ २२ ॥
कभी नाना प्रकारके उपाश्रमों तथा भाँति- भाँतिके पाखण्डोंको अपनाता है । कभी एकान्तमें शिलाखण्डोंकी छायामें बैठता और कभी झरनोंके समीप निवास करता है ॥ २२ ॥
पुलिनानि विविक्तानि विविक्तानि वनानि च ।
देवस्थानानि पुण्यानि विविक्तानि सरांसि च ॥ २३ ॥
कभी नदियोंके एकान्त तटोंमें, कभी निर्जन वनोंमें, कभी पवित्र देवमन्दिरोंमें तथा कभी एकान्त सरोवरोंके आसपास रहता है ॥ २३ ॥
विविक्ताश्चापि शैलानां गुहा गृहनिभोपमाः ।
विविक्तानि च जप्यानि व्रतानि विविधानि च ॥ २४ ॥
नियमान् विविधांश्चापि विविधानि तपांसि च ।
यज्ञांश्च विविधाकारान् विधींश्च विविधांस्तथा ॥ २५ ॥
कभी पर्वतोंकी एकान्त गुफाओंमें, जो गृहके समान ही होती हैं, निवास करता है । उन स्थानोंमें नाना प्रकारके गोपनीय जप, व्रत, नियम, तप, यज्ञ तथा अन्य भाँति- भाँतिके कर्मोंका अनुष्ठान करता है ॥ २४-२५ ॥
वणिक्यथं द्विजं क्षत्रं वैश्यशूद्रांस्तथैव च ।
दानं च विविधाकारं दीनान्धकृपणादिषु ॥ २६ ॥
वह कभी व्यापार करता, कभी ब्राह्मण और क्षत्रियोंके कर्तव्यका पालन करता तथा कभी वैश्यों और शूद्रोंके कर्मोंका आश्रय लेता । दीन- दुखी और अन्धोंको नाना प्रकारके दान देता है ॥ २६ ॥
अभिमन्यत्यसम्बोधात् तथैव त्रिविधान् गुणान् ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव धर्मार्थौ काम एव च ॥ २७ ॥
अज्ञानवश वह अपनेमें सत्त्व, रज, तम इन त्रिविध गुणों और धर्म, अर्थ एवं कामका अभिमान कर लेता है ॥
प्रकृत्याऽऽत्मानमेवात्मा एवं प्रविभजत्युत ।
स्वधाकारवषट्कारौ स्वाहाकारनमस्क्रियाः ॥ २८ ॥
इस प्रकार आत्मा प्रकृतिके द्वारा अपने ही स्वरूपके अनेक विभाग करता है । वह कभी स्वाहा, कभी स्वधा, कभी वषट्कार और कभी नमस्कारमें प्रवृत्त होता है ॥ याजनाध्यापनं दानं तथैवाहुः प्रतिग्रहम् ।
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यजनाध्ययने चैव यच्चान्यदपि किंचन ॥ २ ९ ॥ कभी यज्ञ करता और कराता, कभी वेद पढ़ता और पढ़ाता तथा कभी दान करता और प्रतिग्रह लेता है । इसी प्रकार वह दूसरे दूसरे कार्य भी किया करता है ॥
जन्ममृत्युविवादे च तथा विशसनेऽपि च ।
शुभाशुभमयं सर्वमेतदाहुः क्रियापथम् ॥ ३० ॥
कभी जन्म लेता, कभी मरता तथा कभी विवाद और संग्राममें प्रवृत्त रहता है । विद्वान् पुरुषोंका कहना है कि यह सब शुभाशुभ कर्ममार्ग है ॥ ३० ॥
प्रकृतिः कुरुते देवी भवं प्रलयमेव च ।
दिवसान्ते गुणानेतानभ्येत्यैकोऽवतिष्ठते ॥ ३१ ॥
रश्मिजालमिवादित्यस्तत् तत्काले नियच्छति । प्रकृतिदेवी ही जगत्की सृष्टि और प्रलय करती है । जैसे सूर्य प्रतिदिन प्रातःकाल अपनी किरणोंको सब ओर फैलाता और सायंकालमें अपने किरण- जालको समेट लेता है, वैसे ही आदिपुरुष ब्रह्मा अपने दिन – कल्पके आरम्भमें तीनों गुणोंका विस्तार करता और अन्तमें सबको समेटकर अकेला ही रह जाता है ॥ ३१३ ॥
एवमेषोऽसकृत्पूर्वं क्रीडार्थमभिमन्यते ॥ ३२ ॥
आत्मरूपगुणानेतान् विविधान् हृदयप्रियान् । इस प्रकार प्रकृतिसे संयुक्त हुआ पुरुष तत्त्वज्ञान होनेसे पहले मनको प्रिय लगनेवाले नाना प्रकारके अपने व्यापारोंको क्रीड़ाके लिये बार-बार करता और उन्हें अपना कर्तव्य मानता है ॥ ३२३ ॥
एवमेतां विकुर्वाणः सर्गप्रलयधर्मिणीम् ॥ ३३ ॥
क्रियां कियापथे रक्तस्त्रिगुणां त्रिगुणाधिपः ।
क्रियां क्रियापथोपेतस्तथा तदिति मन्यते ॥ ३४ ॥
सृष्टि और प्रलय जिसके धर्म हैं, उस त्रिगुणमयी प्रकृतिको विकृत करके तीनों गुणोंका स्वामी आत्मा कर्ममार्गमें अनुरक्त और प्रवृत हो उस प्रकृतिके द्वारा होनेवाले प्रत्येक त्रिगुणात्मक कार्यको अपना मान लेता है ॥ ३३-३४ ॥
प्रकृत्या सर्वमेवेदं जगदन्धीकृतं विभो ।
रजसा तमसा चैव व्याप्तं सर्वमनेकधा ॥ ३५ ॥
प्रभो! प्रकृतिने इस सम्पूर्ण जगत्को अन्धा बना रखा है । उसीके संयोगसे समस्त पदार्थ अनेक प्रकारसे रजोगुण और तमोगुणसे व्याप्त हो रहे हैं ॥ ३५ ॥
एवं द्वन्द्वान्यथैतानि समावर्तन्ति नित्यशः ।
ममैवैतानि जायन्ते धावन्ते तानि मामिति ॥ ३६ ॥
निस्तर्तव्यान्यथैतानि सर्वाणीति नराधिप ।
मन्यतेऽयं ह्यबुद्धत्वात् तथैव सुकृतान्यपि ॥ ३७ ॥
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भोक्तव्यानि मयैतानि देवलोकगतेन वै ।
इहैव चैनं भोक्ष्यामि शुभाशुभफलोदयम् ॥ ३८ ॥
इस प्रकार प्रकृतिकी प्रेरणासे स्वभावतः सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंकी सदा पुनरावृत्ति होती रहती है; किंतु जीवात्मा अज्ञानवश यह मान बैठता है कि ये सारे द्वन्द्व मुझपर ही धावा करते हैं और मुझे इनसे निस्तार पानेकी चेष्टा करनी चाहिये । ( ऐसा मानकर वह दुखी होता है ) नरेश्वर! प्रकृतिसे संयुक्त हुआ पुरुष अज्ञानवश यह मान लेता है कि मैं देवलोकमें जाकर अपने समस्त प्रण्योंके फलका उपभोग करूँगा और पूर्वजन्मके किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका जो फल प्रकट हो रहा है, उसे यहीं भोगूँगा ॥ ३६–३८ ॥
सुखमेव तु कर्तव्यं सकृत् कृत्वा सुखं मम ।
यावदन्तं च मे सौख्यं जात्यां जात्यां भविष्यति ॥ ३ ९ ॥
अब मुझे सुखके साधनभूत पुण्यका ही अनुष्ठान करना चाहिये । उसका एक बार भी अनुष्ठान कर लेनेपर मुझे आजीवन सुख मिलेगा तथा भविष्यमें भी प्रत्येक जन्ममें सुखकी प्राप्ति होती रहेगी ॥ ३ ९ ॥
भविष्यति च मे दुःखं कृतेनेहाप्यनन्तकम् ।
महद् दुःखं हि मानुष्यं निरये चापि मज्जनम् ॥ ४० ॥
यदि इस जन्ममें मैं बुरे कर्म करूँगा तो मुझे यहाँ भी अनन्त दुःख भोगना पड़ेगा । यह मानव- जन्म महान् दुःखसे भरा हुआ है । इसके सिवा पापके फलसे नरकमें भी डूबना पड़ेगा ॥ ४० ॥
निरयाच्चापि मानुष्यं कालेनैष्याम्यहं पुनः ।
मनुष्यत्वाच्च देवत्वं देवत्वात् पौरुषं पुनः ॥ ४१ ॥
नरकसे दीर्घकालके बाद छुटकारा मिलनेपर मैं पुनः मनुष्यलोकमें जन्म लूँगा । मानवयोनिसे पुण्यके फलस्वरूप देवयोनिमें जाऊँगा और वहाँसे पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मानव- शरीरमें जन्म लूँगा ॥ ४१ ॥
मनुष्यत्वाच्च निरयं पर्यायेणोपगच्छति ।
य एवं वेत्ति नित्यं वै निरात्माऽऽत्मगुणैर्वृतः ॥ ४२ ॥
तेन देवमनुष्येषु निरये चोपपद्यते । इसी तरह बारी - बारीसे वह जीव मानव- योनिसे नरकमें ( और नरकसे मानवयोनिमें ) आता-जाता रहता है । आत्मासे भिन्न तथा आत्माके गुण चैतन्य आदिसे युक्त जो इन्द्रियोंका समुदाय शरीरमें ऐसी भावना रखता है कि ' यह मैं हूँ ' वही देवलोक, मनुष्यलोक, नरक तथा तिर्यग्योनिमें जाता है ॥ ४२ ॥
ममत्वेनावृतो नित्यं तत्रैव परिवर्तते ॥ ४३ ॥
सर्गकोटिसहस्राणि मरणान्तासु मूर्तिषु ।
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स्त्री--पुत्र आदिके प्रति ममतासे बँधा हुआ पुरुष उन्हींके संसर्गमें रहकर सहस्र- सहस्र कोटि सृष्टिपर्यन्त नश्वर शरीरोंमें ही सदा चक्कर लगाता रहता है ॥ ४३३ ॥
य एवं कुरुते कर्म शुभाशुभफलात्मकम् ॥ ४४ ॥
स एवं फलमाप्नोति त्रिषु लोकेषु मूर्तिमान् । जो इस प्रकार शुभाशुभ फल देनेवाला कर्म करता है, वही तीनों लोकोंमें शरीर धारण करके इन उपर्युक्त फलोंको पाता है ॥ ४४ ॥
प्रकृतिः कुरुते कर्म शुभाशुभफलात्मकम् ।
प्रकृतिश्च तदश्नाति त्रिषु लोकेषु कामगा ॥ ४५ ॥
वास्तवमें तो प्रकृति ही शुभाशुभ फल देनेवाले कर्मोंका अनुष्ठान करती है और तीनों लोकोंमें इच्छानुसार विचरण करनेवाली वह प्रकृति ही उन कर्मोंका फल भोगती है ( किंतु पुरुष अज्ञानके कारण कर्ता - भोक्ता बन जाता है ) ॥ ४५ ॥
तिर्यग्योनिमनुष्यत्वं देवलोके तथैव च ।
त्रीणि स्थानानि चैतानि जानीयात् प्रकृतानि ह ॥ ४६ ॥
तिर्यग्योनि, मनुष्ययोनि तथा देवलोकमें देवयोनि ये कर्म- फल- भोगके तीन स्थान हैं ।
इन सबको प्राकृत समझो ॥ ४६ ॥
अलिङ्गां प्रकृतिं त्वाहुर्लिङ्गैरनुमिमीमहे ।
तथैव पौरुषं लिङ्गमनुमानाद्धि मन्यते ॥ ४७ ॥
मुनिगण प्रकृतिको लिंगरहित बताते हैं; किंतु हमलोग विशेष हेतुओंके द्वारा ही उसका अनुमान कर सकते हैं । इसी प्रकार अनुमानद्वारा ही हमें पुरुषके स्वरूपका अर्थात् उसके होनेका ज्ञान होता है ॥ ४७ ॥
स लिङ्गान्तरमासाद्य प्राकृतं लिङ्गमव्रणः ।
व्रणद्वाराण्यधिष्ठाय कर्मण्यात्मनि मन्यते ॥ ४८ ॥
पुरुष स्वयं छिद्ररहित होते हुए भी प्रकृतिनिर्मित चिह्नस्वरूप विभिन्न शरीरोंका अवलम्बन करके छिद्रोंमें स्थित रहनेवाली इन्द्रियोंका अधिष्ठाता बनकर उन सबके कर्मोंको अपनेमें मान लेता है ॥ ४८ ॥
श्रोत्रादीनि तु सर्वाणि पञ्चकर्मेन्द्रियाण्यथ ।
वागादीनि प्रवर्तन्ते गुणेष्विह गुणौः सह ॥ ४ ९ ॥
इस जगत्में श्रोत्र आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और वाक् आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ अपने - अपने गुणोंके साथ गुणमय शरीरोंमें स्थित हैं ॥ ४ ९ ॥
अहमेतानि वै सर्वं मय्येतानीन्द्रियाणि ह ।
निरिन्द्रियो हि मन्येत व्रणवानस्मि निर्व्रणः ॥ ५० ॥
किंतु यह जीव वास्तवमें इन्द्रियोंसे रहित है तो भी यह मानता है कि मैं ही ये सब कर्म करता हूँ और मुझमें ही सब इन्द्रियाँ हैं । इस प्रकार यह छिद्रशून्य होकर भी अपनेको
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छिद्रयुक्त मानता है ॥ ५० ॥
अलिङ्गो लिङ्गमात्मानमकालः कालमात्मनः ।
असत्त्वं सत्त्वमात्मानमतत्त्वं तत्त्वमात्मनः ॥ ५१ ॥
वह लिंग ( सूक्ष्म ) शरीरसे हीन होनेपर भी अपनेको उससे युक्त मानता है । कालधर्म ( मृत्यु ) से रहित होकर भी अपनेको कालधर्मी ( मरणशील) समझता है । सत्त्वसे भिन्न होकर भी अपनेको सत्त्वरूप मानता है तथा महाभूतादि तत्त्वसे रहित होकर भी अपने आपको तत्त्वस्वरूप समझता है ॥ ५१ ॥
अमृत्युर्मृत्युमात्मानमचरश्चरमात्मनः ।
अक्षेत्रः क्षेत्रमात्मानमसर्गः सर्गमात्मनः ॥ ५२ ॥
वह मृत्युसे सर्वथा रहित है तो भी अपनेको मृत्युग्रस्त मानता है । अचर होनेपर भी अपनेको चलने - फिरनेवाला मानता है । क्षेत्रसे भिन्न होनेपर भी अपनेको क्षेत्र मानता है । सृष्टिसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं होनेपर भी सृष्टिको अपनी ही समझता है ॥ ५२ ॥
अतपास्तप आत्मानमगतिर्गतिमात्मनः ।
अभवो भवमात्मानमभयो भयमात्मनः ॥ ५३ ॥
अक्षरः क्षरमात्मानमबुद्धिस्त्वभिमन्यते ॥ ५४ ॥
वह कभी तप नहीं करता तो भी अपनेको तपस्वी मानता है । कहीं गमन नहीं करता तो भी अपनेको आने - जानेवाला समझता है । संसाररहित होकर भी अपनेको संसारी और निर्भय होकर भी अपनेको भयभीत मानता है । यद्यपि वह अक्षर ( अविनाशी) है तो भी अपनेको क्षर (नाशवान्) समझता है तथा बुद्धिसे परे होनेपर भी बुद्धिमत्ताका अभिमान रखता है ॥ ५३-५४ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादे त्र्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वसिष्ठ और करालजनकका संवादविषयक तीन सौतीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०३ ॥
* किसी - किसी टीकाकारने ' सिध्मा' का अर्थ ' खाँसी ' और ' दमा ' भी किया है । परंतु कोष- प्रसिद्ध अर्थ ‘ सफेद दाग या सेहुँवा ' ही है ।
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चतुरधिकत्रिशततमोऽध्यायः प्रकृतिके संसर्गदोषसे जीवका पतन वसिष्ठ उवाच
एवमप्रतिबुद्धत्वादबुद्धजनसेवनात् ।
सर्गकोटि सहस्राणि पतनान्तानि गच्छति ॥ १ ॥
वसिष्ठजी कहते हैं — राजन्! इस तरह अज्ञानके कारण अज्ञानी पुरुषोंका संग करनेसे जीवका निरन्तर पतन होता है तथा उसे हजारों - करोड़ बार जन्म लेने पड़ते हैं ॥ १ ॥
धाम्ना धामसहस्राणि मरणान्तानि गच्छति ।
तिर्यग्योनिमनुष्यत्वे देवलोके तथैव च ॥ २ ॥
वह पशु- पक्षी, मनुष्य तथा देवताओंकी योनियोंमें तथा एक स्थानसे सहस्रों स्थानोंमें बारंबार मरकर जाता और जन्म लेता है ॥ २ ॥
चन्द्रमा इव भुतानां पुनस्तत्र सहस्रशः ।
लीयतेऽप्रतिबुद्धत्वादेवमेष ह्यबुद्धिमान् ॥ ३ ॥
जैसे चन्द्रमाका सहस्रों बार क्षय और सहस्रों बार वृद्धि होती रहती है, उसी प्रकार अज्ञानी जीव भी अज्ञानवश ही सहस्रों बार लयको प्राप्त होता है ( और जन्म लेता है ) ॥ ३ ॥
कला पञ्चदशी योनिस्तद्धाम प्रतिबुध्यते ।
नित्यमेतद् विजानीहि सोमं वै षोडशीं कलाम् ॥ ४ ॥
राजन्! चन्द्रमाकी पंद्रह कलाओंके समान जीवोंकी पंद्रह कलाएँ ही उत्पत्तिके स्थान हैं । अज्ञानी जीव उन्हींको अपना आश्रय समझता है; परंतु उसकी जो सोलहवीं कला है, उसको तुम नित्य समझो । वह चन्द्रमाकी अमा नामक सोलहवीं कलाके समान है ॥ ४ ॥
कलायां जायतेऽजस्रं पुनः पुनरबुद्धिमान् ।
धाम तस्योपयुञ्जन्ति भूय एवोपजायते ॥ ५ ॥
अज्ञानी जीव सदा बारंबार उन्हीं कलाओंमें स्थित हुआ जन्म ग्रहण करता है । वे ही कलाएँ जीवके आश्रय लेनेयोग्य हैं, अतः जीवका उन्हींसे पुनः -पुनः जन्म होता रहता है ॥ ५ ॥
षोडशी तु कला सूक्ष्मा स सोम उपधार्यताम् ।
न तूपयुज्यते देवैर्देवानुपयुनक्ति सा ॥ ६ ॥
अमा नामक जो सोलहवीं सूक्ष्म कला है, वही सोम है अर्थात् जीवकी प्रकृति है, यह तुम निश्चितरूपसे जान लो । देवतालोग अर्थात् अन्तःकरण और इन्द्रियगण जिनको पंद्रह
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कलाओंके नामसे कहा गया, वे उस सोलहवीं कलाका उपयोग नहीं कर सकते; किंतु वे सोलहवीं कला अर्थात् उन सबकी कारणभूता प्रकृति ही उनका उपयोग करती है ॥ ६ ॥
एतामक्षपयित्वा हि जायते नृपसत्तम ।
साह्यस्य प्रकृतिर्दृष्टा तत्क्षयान्मोक्ष उच्यते ॥ ७ ॥
नृपश्रेष्ठ! जीव अपने अज्ञानवश उस सोलहवीं कलारूप प्रकृतिके संयोगका क्षय नहीं कर पाता, इसलिये बारंबार जन्म ग्रहण करता है। वह ही कला जीवकी प्रकृति अर्थात् उत्पत्तिका कारण देखी गयी है । उसके संयोगका क्षय होनेपर ही मोक्षकी प्राप्ति बतायी जाती है ॥ ७ ॥
तदेव षोडशकलं देहमव्यक्तसंज्ञकम् ।
ममायमिति मन्वानस्तत्रैव परिवर्तते ॥ ८ ॥
( मूल प्रकृति, दस इन्द्रियाँ - एक प्राण और चार प्रकारका अन्तःकरण- इन ) सोलह कलाओंसेयुक्त'जो यह सूक्ष्मशरीर है, इसे ' यह मेरा है ' ऐसा माननेके कारण अज्ञानी जीव उसीमें भटकता रहता है ॥ ८ ॥
पञ्चविंशो महानात्मा तस्यैवाप्रतिबोधनात् ।
विमलस्य विशुद्धस्य शुद्धाशुद्धनिषेवणात् ॥ ९ ॥
अशुद्ध एव शुद्धात्मा तादृग् भवति पार्थिव ।
अबुद्धसेवनाच्चापि बुद्धोऽप्यबुद्धतां व्रजेत् ॥ १० ॥
पचीसवाँ तत्त्वरूप जो महान् आत्मा है, वह निर्मल एवं विशुद्ध है । उसको न जाननेके कारण तथा शुद्ध - अशुद्ध वस्तुओंके सेवनसे वह निर्मल, संगरहित आत्मा भी शुद्ध और अशुद्ध वस्तुओंके सदृश हो जाता है। पृथ्वीनाथ! अविवेकीके संगसे विवेकशील भी अविवेकी हो जाता है ॥ ९ -१० ॥
तथैवाप्रतिबुद्धोऽपि विज्ञेयो नृपसत्तम ।
प्रकृतेस्त्रिगुणायास्तु सेवनात् त्रिगुणो भवेत् ॥ ११ ॥
नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार मूर्ख भी विवेकशीलका संग करनेसे विवेकशील हो जाता है, ऐसा समझना चाहिये । त्रिगुणात्मिका प्रकृतिके सम्बन्धसे निर्गुण आत्मा भी त्रिगुणमय-सा हो जाता है ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादे चतुरधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वसिष्ठ और करालजनकका संवादविषयक तीन सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०४ ॥
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पञ्चाधिकत्रिशततमोऽध्यायः क्षर- अक्षर एवं प्रकृति - पुरुषके विषयमें राजा जनककी शंका और उसका वसिष्ठजीद्वारा उत्तर जनक उवाच
अक्षरक्षरयोरेष द्वयोः सम्बन्ध इष्यते ।
स्त्रीपुंसोर्वापि भगवन् सम्बन्धस्तद्वदुच्यते ॥ १ ॥
राजा जनकने कहा— भगवन्! क्षर और अक्षर ( प्रकृति और पुरुष) दोनोंका यह सम्बन्ध वैसा ही माना जाता है, जैसा कि नारी और पुरुषका दाम्पत्य- सम्बन्ध बताया जाता ॥ १ ॥
ऋते तु पुरुषं नेह स्त्री गर्भं धारयत्युत ।
ऋते स्त्रियं न पुरुषो रूपं निर्वर्त येत् तथा ॥ २ ॥
इस जगत्में न तो पुरुषके बिना स्त्री गर्भ धारण कर सकती है और न स्त्रीके बिना कोई पुरुष ही किसी शरीरको उत्पन्न कर सकता है ॥ २ ॥
अन्योन्यस्याभिसम्बन्धादन्योन्यगुणसंश्रयात् ।
रूपं निर्वर्तयत्येतदेवं सर्वासु योनिषु ॥ ३ ॥
दोनों पारस्परिक सम्बन्धसे एक दूसरेके गुणोंका आश्रय लेकर ही किसी शरीरका निर्माण होता है । प्रायः सभी योनियोंमें ऐसी ही स्थिति है ॥ ३ ॥
रत्यर्थमभिसम्बन्धादन्योन्यगुणसंश्रयात् ।
ऋतौ निर्वर्त्यते रूपं तद् वक्ष्यामि निदर्शनम् ॥ ४ ॥
ये गुणाः पुरुषस्येह ये च मातृगुणास्तथा ।
अस्थि स्नायुश्च मज्जा च जानीमः पितृतो गुणाः ॥ ५ ॥
त्वङ्मांसं शोणितं चेति मातृजान्यपि शुश्रुम ।
एवमेतद् द्विजश्रेष्ठ वेदे शास्त्रे च पठ्यते ॥ ६ ॥
जब स्त्री ऋतुमती होती है, उस समय रतिके लिये पुरुषके साथ उसका सम्बन्ध होनेसे दोनोंके गुणोंका मिश्रण होनेपर शरीरकी उत्पत्ति होती है । शरीरमें पुरुष अर्थात् पिताके जो गुण हैं तथा माताके जो गुण हैं, उन्हें मैं दृष्टान्तके तौरपर बता रहा हूँ। हड्डी, स्नायु और मज्जा — इन्हें मैं पितासे प्राप्त हुए गुण समझता हूँ तथा त्वचा, मांस और रक्त - ये मातासे पैदा हुए गुण हैं, ऐसा मैंने सुना है । द्विजश्रेष्ठ! यही बात वेद और शास्त्रमें भी पढ़ी जाती है ॥ ४–६ ॥ प्रमाणं यत् स्ववेदोक्तं शास्त्रोक्तं यच्च पठ्यते ।