श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2001–2010
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2001–2010
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द्वयधिकत्रिशततमोऽध्यायः वसिष्ठ और करालजनकका संवाद -क्षर और अक्षरतत्त्वका निरूपण और इनके ज्ञानसे मुक्ति युधिष्ठिरउवाच
किं तदक्षरमित्युक्तं यस्मान्नावर्तते पुनः ।
किं च तत्क्षरमित्युक्तं यस्मादावर्तते पुनः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! वह अक्षर तत्त्व क्या है, जिसे प्राप्त कर लेनेपर जीव फिर इस संसारमें नहीं लौटता तथा वह क्षर पदार्थ क्या है, जिसको जानने या पा लेनेपर भी पुनः इस संसारमें लौटना पड़ता है? ॥ १ ॥
अक्षरक्षरयोर्व्यक्तिं पृच्छाम्यरिनिषूदन ।
उपलब्धं महाबाहो तत्त्वेन कुरुनन्दन ॥ २ ॥
शत्रुसूदन! महाबाहु! कुरुनन्दन! क्षर और अक्षरके स्वरूपको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये ही मैंने आपसे यह प्रश्न किया है ॥ २ ॥
त्वं हि ज्ञाननिधिर्विप्रैरुच्यसे वेदपारगैः ।
ऋषिभिश्च महाभागैर्यतिभिश्च महात्मभिः ॥ ३ ॥
वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण, महाभाग महर्षि तथा महात्मा यति भी आपको ज्ञाननिधि कहते हैं ॥ ३ ॥
शेषमल्पं दिनानां ते दक्षिणायनभास्करे ।
आवृते भगवत्यर्के गन्तासि परमां गतिम् ॥ ४ ॥
अब सूर्यके दक्षिणायनमें रहनेके थोड़े ही दिन शेष हैं । भगवान् सूर्यके उत्तरायणमें पदार्पण करते ही आप परमधामको पधारेंगे ॥ ४ ॥
त्वयि प्रतिगते श्रेयः कुतः श्रोष्यामहे वयम् ।
कुरुवंशप्रदीपस्त्वं ज्ञानदीपेन दीप्यसे ॥ ५ ॥
आपके चले जानेपर हमलोग अपने कल्याणकी बातें किससे सुनेंगे? आप कुरुवंशको प्रकाशित करनेवाले प्रदीप हैं और ज्ञानदीपसे उद्भासित हो रहे हैं ॥ ५ ॥
तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि त्वत्तः कुरुकुलोद्वह ।
न तृप्यामीह राजेन्द्र शृण्वन्नमृतमीदृशम् ॥ ६ ॥
अतः कुरुकुलधुरन्धर! राजेन्द्र! मैं आपहीके मुँहसे यह सब सुनना चाहता हूँ । आपके इन अमृतमय वचनोंको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती है (अतएव आप मुझे यह क्षर-अक्षरका विषय बताइये । ) ॥ ६ ॥
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भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् ।
वसिष्ठस्य च संवादं करालजनकस्य च ॥ ७ ॥
- भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! इस विषयमें कराल नामक जनक और वसिष्ठका जो संवाद हुआ था, वही प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें बतलाऊँगा ॥ ७ ॥
वसिष्ठं श्रेष्ठमासीनमृषीणां भास्करद्युतिम् ।
पप्रच्छ जनको राजा ज्ञानं नैःश्रेयसं परम् ॥ ८ ॥
एक समयकी बात है, ऋषियोंमें सूर्यके समान तेजस्वी मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ अपने आश्रमपर विराजमान थे । वहाँ राजा जनकने पहुँचकर उनसे परम कल्याणकारी ज्ञानके विषयमें पूछा ॥ ८ ॥
परमध्यात्मकुशलमध्यात्मगतिनिश्चयम् ।
मैत्रावरुणिमासीनमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ ९ ॥
स्वक्षरं प्रश्रितं वाक्यं मधुरं चाप्यनुल्बणम् ।
पप्रच्छर्षिवरं राजा करालजनकः पुरा ॥ १० ॥
मित्रावरुणके पुत्र वसिष्ठजी अध्यात्मविषयक प्रवचनमें अत्यन्त कुशल थे और उन्हें अध्यात्मज्ञानका निश्चय हो गया था । वे एक आसनपर विराजमान थे। पूर्वकालमें कराल नामक राजा जनकने उन मुनिवरके पास जा हाथ जोड़कर प्रणाम किया और सुन्दर अक्षरोंसे युक्त विनयपूर्ण तथा कुतर्करहित मधुर वाणीमें इस प्रकार पूछा— ॥ ९ -१० ॥
भगवन् श्रोतुमिच्छामि परं ब्रह्म सनातनम् ।
यस्मान्न पुनरावृत्तिमाप्नुवन्ति मनीषिणः ॥ ११ ॥
‘ भगवन्! जहाँसे मनीषी पुरुष पुनः इस संसारमें लौटकर नहीं आते हैं, उस सनातन परब्रह्मके स्वरूपका मैं वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ ११ ॥
यच्च तत् क्षरमित्युक्तं यत्रेदं क्षरते जगत् ।
यच्चाक्षरमिति प्रोक्तं शिवं क्षेम्यमनामयम् ॥ १२ ॥
‘ तथा जिसे क्षर कहा गया है, उसे भी जानना चाहता हूँ । जिसमें इस जगत्का क्षरण (लय) होता है और जिसे अक्षर कहा गया है, उस निर्विकार कल्याणमय शिवस्वरूप अधिष्ठानका भी ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ' ॥ १२ ॥
वसिष्ठ उवाच
श्रूयतां पृथिवीपाल क्षरतीदं यथा जगत् ।
यन्न क्षरति पूर्वेण यावत्कालेन वाप्यथ ॥ १३ ॥
वसिष्ठजीने कहा — भूपाल! जिस प्रकार इस जगत्का क्षय ( परिवर्तन ) होता है, उसको तथा जो किसी भी कालमें क्षरित ( नष्ट) नहीं होता, उस अक्षरको भी बता रहा हूँ,
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सुनो ॥ १३ ॥
युगं द्वादशसाहस्रं कल्पं विद्धि चतुर्युगम् ।
दशकल्पशतावृत्तमहस्तद् ब्राह्ममुच्यते ॥ १४ ॥
देवताओंके बारह हजार वर्षोंका एक चतुर्युग होता है । इसीको कल्प अर्थात् महायुग समझो । ऐसे एक हजार महायुगोंका ब्रह्माजीका एक दिन बताया जाता है ॥ १४ ॥
रात्रिश्चैतावती राजन् यस्यान्ते प्रतिबुद्धयते ।
सृजत्यनन्तकर्माणं महान्तं भूतमग्रजम् ॥ १५ ॥
मूर्तिमन्तममूर्तात्मा विश्वं शम्भुः स्वयम्भुवः ।
अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानं ज्योतिरव्ययम् ॥ १६ ॥
सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १७ ॥
राजन्! उनकी रात्रि भी इतनी ही बड़ी होती है; जिसके अन्तमें वे जागते हैं । अनन्तकर्मा ब्रह्माजी सबके अग्रज और महान् भूत हैं । यह सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप है । जो अणिमा, लघिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियोंपर शासन करनेवाले हैं, वे कल्याणस्वरूप निराकार परमेश्वर ही उन मूर्तिमान् ब्रह्माकी सृष्टि करते हैं । परमात्मा ज्योतिःस्वरूप स्वयं प्रकट और अविनाशी हैं । उनके हाथ, पैर, नेत्र, मस्तक और मुख सब ओर हैं । कान भी सब ओर हैं । वे संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं ॥ १५–१७ ॥
हिरण्यगर्भो भगवानेष बुद्धिरिति स्मृतः ।
महानिति च योगेषु विरिञ्चिरिति चाप्यजः ॥ १८ ॥
परमेश्वरसे उत्पन्न जो सबके अग्रज भगवान् हिरण्यगर्भ हैं, ये ही बुद्धि कहे गये हैं । योगशास्त्रमें ये ही महान् कहे गये हैं । इन्हींको विरिञ्चि तथा अज भी कहते हैं ॥ १८ ॥
सांख्ये च पठ्यते शास्त्रे नामभिर्बहुधात्मकः ।
विचित्ररूपो विश्वात्मा एकाक्षर इति स्मृतः ॥ १ ९ ॥
वृतं नैकात्मकं येन कृतं त्रैलोक्यमात्मना ।
तथैव बहुरूपत्वाद् विश्वरूप इति स्मृतः ॥ २० ॥
अनेक नाम और रूपोंसे युक्त इन हिरण्यगर्भ ब्रह्माका सांख्यशास्त्रमें भी वर्णन आता है । ये विचित्र रूपधारी, विश्वात्मा और एकाक्षर कहे गये हैं । इस अनेक रूपोंवाली त्रिलोकीकी रचना उन्होंने ही की है और स्वयं ही इसे व्याप्त कर रक्खा है । इस प्रकार बहुत - से रूप धारण करनेके कारण वे विश्वरूप माने गये हैं ॥ १ ९ -२० ॥
एष वै विक्रियापन्नः सृजत्यात्मानमात्मना ।
अहङ्कारं महातेजाः प्रजापतिमहंकृतम् ॥ २१ ॥
ये महातेजस्वी भगवान् हिरण्यगर्भ विकारको प्राप्त हो स्वयं ही अहंकारकी और उसके अभिमानी प्रजापति विराट्की सृष्टि करते हैं ॥ २१ ॥
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अव्यक्ताद् व्यक्तमापन्नं विद्यासर्गं वदन्ति तम् ।
महान्तं चाप्यहङ्कारमविद्यासर्गमेव च ॥ २२ ॥
इनमें निराकारसे साकार रूपमें प्रकट होनेवाली मूल प्रकृतिको तो विद्यासर्ग कहते हैं और महत्तत्त्व एवं अहंकारको अविद्यासर्ग कहते हैं ॥ २२ ॥
अविधिश्च विधिश्चैव समुत्पन्नौ तथैकतः ।
विद्याविद्येति विख्याते श्रुतिशास्त्रार्थचिन्तकैः ॥ २३ ॥
अविधि ( ज्ञान ) और विधि ( कर्म) की उत्पत्ति भी उस परमात्मासे ही हुई है । श्रुति तथा शास्त्रके अर्थका विचार करनेवाले विद्वानोंने उन्हें विद्या और अविद्या बतलाया है ॥ २३ ॥
भूतसर्गमहङ्कारात् तृतीयं विद्धि पार्थिव ।
अहङ्कारेषु सर्वेषु चतुर्थं विद्धि वैकृतम् ॥ २४ ॥
पृथ्वीनाथ! अहंकारसे जो सूक्ष्म भूतोंकी सृष्टि होती है उसे तीसरा सर्ग समझो । सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे तीन प्रकारके अहंकारोंसे जो चौथी सृष्टि उत्पन्न होती है, उसे वैकृत - सर्ग समझो ॥ २४ ॥
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bag महर्षि वसिष्ठका राजा कराल जनकको उपदेश
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वायुर्ज्योतिरथाकाशमापोऽथ पृथिवी तथा ।
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च ॥ २५ ॥
आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी - ये पाँच महाभूत तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध — ये पाँच विषय वैकृत - सर्गके अन्तर्गत हैं ॥ २५ ॥
एवं युगपदुत्पन्नं दशवर्गमसंशयम् ।
पञ्चमं विद्धि राजेन्द्र भौतिकं सर्गमर्थवत् ॥ २६ ॥
इन दसोंकी उत्पत्ति एक ही साथ होती है, इसमें संशय नहीं है । राजेन्द्र! पाँचवाँ भौतिक सर्ग समझो । जो प्राणियोंके लिये विशेष प्रयोजनीय होनेके कारण सार्थक है ॥ २६ ॥
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणमेव च पञ्चमम् ।
वाक् च हस्तौ च पादौ च पायुर्मेÇ तथैव च ॥ २७ ॥
बुद्धीन्द्रियाणि चैतानि तथा कर्मेन्द्रियाणि च ।
सम्भूतानीह युगपन्मनसा सह पार्थिव ॥ २८ ॥
इस भौतिक सर्गके अन्तर्गत आँख, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा – ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाणी, हाथ, पैर, गुदा और लिंग–ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । पृथ्वीनाथ! मनसहित इन सबकी उत्पत्ति भी एक ही साथ होती है ॥ २७-२८ ॥
एषा तत्त्वचतुर्विंशा सर्वाकृतिषु वर्तते ।
यां ज्ञात्वा नाभिशोचन्ति ब्राह्मणास्तत्त्वदर्शिनः ॥ २ ९ ॥
ये चौबीस तत्त्व सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें मौजूद रहते हैं । तत्त्वदर्शी ब्राह्मण इनके यथार्थ स्वरूपको जानकर कभी शोक नहीं करते हैं ॥ २ ९ ॥
एतद् देहं समाख्यातं त्रैलोक्ये सर्वदेहिषु ।
वेदितव्यं नरश्रेष्ठ सदेवनरदानवे ॥ ३० ॥
सयक्षभूतगन्धर्वे सकिन्नरमहोरगे ।
सचारणपिशाचे वै सदेवर्षिनिशाचरे ॥ ३१ ॥
सदंशकीटमशके सपूतिकृमिमूषिके ।
शुनि श्वपाके चैणेये सचाण्डाले सपुल्कसे ॥ ३२ ॥
हस्त्यश्वखरशार्दूले सवृक्षे गवि चैव ह ।
यच्च मूर्तिमयं किंचित् सर्वत्रैतन्निदर्शनम् ॥ ३३ ॥
नरश्रेष्ठ! तीनों लोकोंमें जितने देहधारी हैं, उन सबमें इन्हीं तत्त्वोंके समुदायको देह समझना चाहिये । देवता, मनुष्य, दानव, यक्ष, भूत, गन्धर्व किन्नर, महासर्प, चारण, पिशाच, देवर्षि, निशाचर, दंश ( डंक मारनेवाली मक्खी ), कीट, मच्छर, दुर्गन्धित कीड़े, चूहे, कुत्ते, चाण्डाल, हिरन, श्वपाक ( कुत्ताका मांस खानेवाला ), पुल्कस ( म्लेच्छ ), हाथी, घोड़े, गधे,
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सिंह, वृक्ष और गौ आदिके रूपमें जो कुछ मूर्तिमान् पदार्थ है, सर्वत्र इन्हीं तत्त्वोंका दर्शन होता है ॥ ३०-३३ ॥
जले भुवि तथाऽऽकाशे नान्यत्रेति विनिश्चयः ।
स्थानं देहवतामासीदित्येवमनुशुश्रुम ॥ ३४ ॥
पृथ्वी, जल और आकाशमें ही देहधारियोंका निवास है, और कहीं नहीं; यह विद्वानोंका निश्चय है । ऐसा मैंने सुन रक्खा है ॥ ३४ ॥
कृत्स्नमेतावतस्तात क्षरते व्यक्तसंज्ञितम् ।
अहन्यहनि भूतात्मा ततः क्षर इति स्मृतः ॥ ३५ ॥
हे तात! यह सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत् व्यक्त कहलाता है और प्रतिदिन इसका क्षरण होता है, इसलिये इसको क्षर कहते हैं ॥ ३५ ॥
एतदक्षरमित्युक्तं क्षरतीदं यथा जगत् ।
जगन्मोहात्मकं प्राहुरव्यक्ताद् व्यक्तसंज्ञकम् ॥ ३६ ॥
इससे भिन्न जो तत्त्व है, उसे अक्षर कहा गया है । इस प्रकार उस अव्यक्त अक्षरसे उत्पन्न हुआ यह व्यक्तसंज्ञक मोहात्मक जगत् क्षरित होनेके कारण क्षर नाम धारण करता है ॥ ३६ ॥
महांश्चैवाग्रजो नित्यमेतत् क्षरनिदर्शनम् ।
कथितं ते महाराज यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ३७ ॥
क्षर- तत्त्वोंमें सबसे पहले महत्तत्त्वकी ही सृष्टि हुई है । यह बात सदा ध्यानमें रखनेयज्ञेय है । यही क्षरका परिचय है । महाराज! तुमने जो मुझसे पूछा था, उसके अनुसार यह मैंने तुम्हारे समक्ष क्षर- अक्षरके विषयका वर्णन किया है ॥ ३७ ॥
पञ्चविंशतिमो विष्णुर्निस्तत्त्वस्तत्त्वसंज्ञितः ।
तत्त्वसंश्रयणादेतत् तत्त्वमाहुर्मनीषिणः ॥ ३८ ॥
इन चौबीस तत्त्वोंसे परे जो भगवान् विष्णु ( सर्वव्यापी परमात्मा ) हैं, उन्हें पचीसवाँ तत्त्व कहा गया है । तत्त्वोंको आश्रय देनेके कारण ही मनीषी पुरुष उन्हें तत्त्व कहते हैं ॥ ३८ ॥
यन्मर्त्यमसृजद् व्यक्तं तत्तन्मूर्त्यधितिष्ठति ।
चतुर्विंशतिमोऽव्यक्तो ह्यमूर्तः पञ्चविंशकः ॥ ३ ९ ॥
महत्तत्त्व आदि व्यक्त पदार्थ जिन मरणशील ( नश्वर ) पदार्थोंकी सृष्टि करते हैं, वे किसी-न -किसी आकार या मूर्तिका आश्रय लेकर स्थित होते हैं । गणना करनेपर चौबीसवाँ तत्त्व है अव्यक्त प्रकृति और पचीसवाँ है निराकार परमात्मा ॥ ३ ९ ॥
स एव हृदि सर्वासु मूर्तिष्वातिष्ठतेऽऽत्मवान् ।
केवलश्चेतनो नित्यः सर्वमूर्तिरमूर्तिमान् ॥ ४० ॥
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जो अद्वितीय, चेतन, नित्य, सर्वस्वरूप, निराकार एवं सबके आत्मा हैं, वे परम पुरुष परमात्मा ही समस्त शरीरोंके हृदयदेशमें निवास करते हैं ॥ ४० ॥
सर्गप्रलयधर्मिण्या असर्गप्रलयात्मकः ।
गोचरे वर्तते नित्यं निर्गुणं गुणसंज्ञितम् ॥ ४१ ॥
यद्यपि सृष्टि और प्रलय प्रकृतिके ही धर्म हैं । पुरुष तो उनसे सर्वथा सम्बन्धरहित है तथापि उस प्रकृतिके संसर्गवश पुरुष भी उस सृष्टि और प्रलयरूप धर्मसे सम्बद्ध - सा जान पड़ता है । इन्द्रियोंका विषय न होनेपर भी इन्द्रियगोचर- सा हो जाता है तथा निर्गुण होनेपर भी गुणवान् - सा जान पड़ता है ॥ ४१ ॥
एवमेष महानात्मा सर्गप्रलयकोविदः ।
विकुर्वाणः प्रकृतिमानभिमन्यत्यबुद्धिमान् ॥ ४२ ॥
इस प्रकार सृष्टि और प्रलयके तत्त्वको जाननेवाला यह महान् आत्मा अविकारी होकर भी प्रकृतिके संसर्गसे युक्त हो विकारवान्-सा हो जाता है एवं प्राकृत - बुद्धिसे रहित होनेपर भी शरीरमें आत्माभिमान कर लेता है ॥ ४२ ॥
तमःसत्त्वरजोयुक्तस्तासु तास्विह योनिषु ।
नियते प्रतिबुद्धित्वादबुद्धजनसेवनात् ॥ ४३ ॥
प्रकृतिके संसर्गवश ही वह सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणसे युक्त हो जाता है तथा अज्ञानी मनुष्योंका संग करनेसे उन्हींकी भाँति अपनेको शरीरस्थ समझनेके कारण वह उन-उन सात्त्विक, राजस, तामस योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है ॥ ४३ ॥
सहवास विनाशित्वान्नान्योऽहमिति मन्यते ।
योऽहं सोऽहमिति ह्युक्त्वा गुणानेवानुवर्तते ॥ ४४ ॥
प्रकृतिके सहवाससे अपने स्वरूपका बोध लुप्त हो जानेके कारण पुरुष यह समझने लगता है कि मैं शरीरसे भिन्न नहीं हूँ। ' मैं यह हूँ, वह हूँ, अमुकका पुत्र हूँ, अमुक जातिका हूँ ', इस प्रकार कहता हुआ वह सात्त्विक आदि गुणोंका ही अनुसरण करता है ॥ ४४ ॥
तमसा तामसान् भावान् विविधान् प्रतिपद्यते ।
रजसा राजसांश्चैव सात्त्विकान् सत्त्वसंश्रयात् ॥ ४५ ॥
वह तमोगुणसे मोह आदि नाना प्रकारके तामस भावोंको, रजोगुणसे प्रकृत्ति आदि राजस भावोंको तथा सत्त्वगुणका आश्रय लेकर प्रकाश आदि सात्त्विक भावोंको प्राप्त होता है ॥ ४५ ॥
शुक्ललोहितकृष्णानि रूपाण्येतानि त्रीणि तु ।
सर्वाण्येतानि रूपाणि यानीह प्राकृतानि वै ॥ ४६ ॥
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणसे क्रमशः शुक्ल, रक्त और कृष्ण - ये तीन वर्ण प्रकट होते हैं । प्रकृतिसे जो - जो रूप प्रकट हुए हैं, वे सब इन्हीं तीनों वर्णोंके अन्तर्गत हैं ॥ ४६ ॥
तामसा निरयं यान्ति राजसा मानुषानथ ।
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सात्त्विका देवलोकाय गच्छन्ति सुखभागिनः ॥ ४७ ॥
तमोगुणी प्राणी नरकमें पड़ते हैं, राजस स्वभावके जीव मनुष्यलोकमें जाते हैं तथा सुखके भागी सात्त्विक पुरुष देवलोकको प्रस्थान करते हैं ॥ ४७ ॥
निष्कैवल्येन पापेन तिर्यग्योनिमवाप्नुयात् ।
पुण्यपापेन मानुष्यं पुण्येनैकेन देवताः ॥ ४८ ॥
अत्यन्त केवल पापकर्मोंके फलस्वरूप जीव पशु- पक्षी आदि तिर्यग्योनिको प्राप्त होता है । पुण्य और पाप दोनोंके सम्मिश्रणसे मनुष्यलोक मिलता है तथा केवल पुण्यसे प्राणी देवयोनिको प्राप्त होता है ॥ ४८ ॥
एवमव्यक्तविषयं क्षरमाहुर्मनीषिणः ।
पञ्चविंशतिमो योऽयं ज्ञानादेव प्रवर्तते ॥ ४ ९ ॥
इस प्रकार ज्ञानी पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न हुए पदार्थोंको क्षर कहते हैं । उपर्युका चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न जो पचीसवाँ तत्त्व – परमपुरुष परमात्मा बताया गया है, वही अक्षर है । उसकी प्राप्ति ज्ञानसे ही होती है ॥ ४ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादे द्वयधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वसिष्ठ और करालजनकका संवादविषयक तीन सौदोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०२ ॥
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त्र्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः प्रकृति - संसर्गके कारण जीवका अपनेको नाना प्रकारके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता मानना एवं नाना योनियों में बारंबार जन्म ग्रहण करना वसिष्ठ उवाच
एवमप्रतिबुद्धत्वादबुद्धमनुवर्तते ।
देहाद् देहसहस्राणि तथा समभिपद्यते ॥ १ ॥
वसिष्ठजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार जीव बोधहीन होनेके कारण अज्ञानका ही अनुसरण करता है; इसीलिये उसे एक शरीरसे सहस्रों शरीरोंमें भ्रमण करना पड़ता है ॥ १ ॥
तिर्यग्योनिसहस्रेषु कदाचिद् देवतास्वपि ।
उपपद्यति संयोगाद् गुणैः सह गुणक्षयात् ॥ २ ॥
वह गुणोंके साथ सम्बन्ध होनेसे उन्हीं गुणोंकी सामर्थ्यसे कभी सहस्रों बार तिर्यग्योनियोंमें और कभी देवताओंमें जन्म लेता है ॥ २ ॥
मानुषत्वाद् दिवं याति दिवो मानुष्यमेव च ।
मानुष्यान्निर यस्थानमानन्त्यं प्रतिपद्यते ॥ ३ ॥
कभी मानव- योनिसे स्वर्गलोकमें जाता है और कभी स्वर्गसे मनुष्यलोकमें लौट आता है । मनुष्यलोकसे कभी- कभी अनन्त नरकोंमें भी पड़ता है ॥ ३ ॥
कोशकारो यथाऽऽत्मानं कीटः समवरुन्धति ।
सूत्रतन्तुगुणैर्नित्यं तथायमगुणो गुणौः ॥ ४ ॥
जैसे रेशमका कीड़ा अपने ही उत्पन्न किये हुए तन्तुओंसे अपनेको सब ओरसे बाँध लेता है, उसी प्रकार यह निर्गुण आत्मा भी अपने ही प्रकट किये हुए प्राकृत गुणोंसे बँध जाता है ॥ ४ ॥
द्वन्द्वमेति च निर्द्वन्द्वस्तासु तास्विह योनिषु ।
शीर्षरोगेऽक्षिरोगे च दन्तशूले गलग्रहे ॥ ५ ॥
वह स्वयं सुख- दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित होनेपर भी भिन्न -भिन्न योनियोंमें जन्म धारण करके सुख- दुःखको भोगता है । उसे कभी सिरमें दर्द होता, कभी आँख दुखती, कभी दाँतमें व्यथा होती और कभी गलेमें घेघा निकल आता है ॥ ५ ॥
जलोदरे तृषारोगे ज्वरगण्डे विषूचके ।
श्वित्रकुष्ठेऽग्निदग्धे च सिध्मापस्मारयोरपि ॥ ६ ॥