05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2061–2070
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2061–2070
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ते वध्यमाना ह्यन्योन्यं गुणैर्हारिभिरव्ययैः ॥ १४ ॥
पृथ्वीनाथ! प्रवाहरूपसे सदा विद्यमान रहनेवाले इन मनोहर शब्द आदि विषयोंसे आविष्ट होकर सभी प्राणी प्रतिदिन कभी एक- दूसरेको चाहते हैं, कभी पारस्परिक हितसाधनमें तत्पर रहते हैं, कभी एक-दूसरेको नीचा दिखानेकी चेष्टा करते हैं, कभी आपसमें ईर्ष्या रखते हैं और कभी परस्पर प्रहार भी कर बैठते हैं ॥ १३-१४ ॥
इहैव परिवर्तन्ते तिर्यग्योनिप्रवेशिनः ।
त्रीणि कल्पसहस्राणि एतेषामहरुच्यते ॥ १५ ॥
रात्रिरेतावती चैव मनसश्च नराधिप । ऐसे विषयासक्त प्राणी तिर्यग्योनियोंमें प्रवेश करके इसी संसारमें चक्कर काटते रहते हैं । इन शब्दादि विषयोंका एक दिन तीन हजार कल्पोंका बताया जाता है । नरेश्वर! इनकी
रात भी इतनी ही बड़ी है । मनके भी दिन - रातका परिमाण इतना ही है ॥ १५३ ॥
मनश्चरति राजेन्द्र चारितं सर्वमिन्द्रियैः ॥ १६ ॥
न चेन्द्रियाणि पश्यन्ति मन एवानुपश्यति ।
चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा तु न चक्षुषा ॥ १७ ॥
राजेन्द्र! मन इन्द्रियोंद्वारा संचालित होकर सब विषयोंकी ओर जाता है । इन्द्रियाँ उन विषयोंको नहीं देखतीं, मन ही उन्हें निरन्तर देखता है । आँख मनके सहयोगसे ही रूपका दर्शन करती है, अपनी शक्तिसे नहीं ॥ १६-१७ ॥
मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ।
तथेन्द्रियाणि सर्वाणि पश्यन्तीत्यभिचक्षते ॥ १८ ॥
जिस समय मन व्यग्र रहता है, उस समय आँख देखती हुई भी नहीं देख पाती । लोग भ्रमवश ही ऐसा कहते हैं कि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विषयोंको प्रत्यक्ष करती हैं ॥ १८ ॥
न चेन्द्रियाणि पश्यन्ति मन एवात्र पश्यति ।
मनस्युपरते राजन्निन्द्रियोपरमो भवेत् ॥ १ ९ ॥
किंतु इन्द्रियाँ कुछ नहीं देखतीं, केवल मन ही देखता है । राजन्! मन विषयोंसे उपरत हो जाय तो इन्द्रियाँ भी विषयोंसे निवृत्त हो जाती हैं ॥ १ ९ ॥
न चेन्द्रियव्युपरमे मनस्युपरमो भवेत् ।
एवं मनःप्रधानानि इन्द्रियाणि प्रभावयेत् ॥ २० ॥
परंतु इन्द्रियोंके उपरत होनेपर मनमें उपरति नहीं आती । इस प्रकार यह निश्चय करना चाहिये कि सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें मन ही प्रधान है ॥ २० ॥
इन्द्रियाणां तु सर्वेषामीश्वरं मन उच्यते ।
एतद् विशन्ति भूतानि सर्वाणीह महायशः ॥ २१ ॥
मनको सम्पूर्ण इन्द्रियोंका स्वामी कहा जाता है। महायशस्वी नरेश! जगत्के समस्त प्राणी इस मनका ही आश्रय लेते हैं ॥ २१ ॥
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य-जनकका संवादविषयक तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३११ ॥
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द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः संहारक्रमका वर्णन याज्ञवल्क्य उवाच
तत्त्वानां सर्वसंख्या च कालसंख्या तथैव च ।
मया प्रोक्ताऽऽनुपूर्व्येण संहारमपि मे शृणु ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं - राजन्! अब मेरेद्वारा क्रमशः बतायी हुई तत्त्वोंकी सम्पूर्ण संख्या, कालसंख्या तथा तत्त्वोंके संहारकी वार्ता सुनो ॥ १ ॥
यथा संहरते जन्तून् ससर्ज च पुनः पुनः ।
अनादिनिधनो ब्रह्मा नित्यश्चाक्षर एव च ॥ २ ॥
आदि और अन्तसे रहित नित्य अक्षरस्वरूप ब्रह्माजी किस प्रकार बारंबार प्राणियोंकी सृष्टि और संहार करते हैं — यह बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥
अहःक्षयमथो बुद्ध्वा निशि स्वप्नमनास्तथा ।
चोदयामास भगवानव्यक्तोऽहंकृतं नरम् ॥ ३ ॥
भगवान् ब्रह्माजी जब देखते हैं कि मेरे दिनका अन्त हो गया, तब उनके मनमें रातको शयन करनेकी इच्छा होती है, इसलिये वे अहंकारके अभिमानी देवता रुद्रको संहारके लिये प्रेरित करते हैं ॥ ३ ॥
ततः शतसहस्रांशुरव्यक्तेनाभिचोदितः ।
कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानमादित्यो ज्वलदग्निवत् ॥ ४ ॥
उस समय वे रुद्रदेव ब्रह्माजीसे प्रेरित होकर प्रचण्ड सूर्यका रूप धारण करते हैं और अपनेको बारह रूपोंमें अभिव्यक्त करके अग्निके समान प्रज्वलित हो उठते हैं ॥ ४ ॥
चतुर्विधं महीपाल निर्दहत्याशु तेजसा ।
जरायुजाण्डजस्वेदजोद्भिज्जं च नराधिप ॥ ५ ॥
भूपाल! नरेश्वर! फिर वे अपने तेजसे जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज –इन चार प्रकारके प्राणियोंसे भरे हुए सम्पूर्ण जगत्को शीघ्र ही भस्म कर डालते हैं ॥
एतदुन्मेषमात्रेण विनष्टं स्थाणु जङ्गमम् ।
कूर्मपृष्ठसमा भूमिर्भवत्यथ समन्ततः ॥ ६ ॥
पलक मारते - मारते इस समस्त चराचर जगत्का नाश हो जाता है और यह भूमि सब ओरसे कछुएकी पीठकी तरह प्रतीत होने लगती है ॥ ६ ॥
जगद् दग्ध्वामितबलः केवलां जगतीं ततः ।
अम्भसा बलिना क्षिप्रमापूरयति सर्वशः ॥ ७ ॥
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जगत्को गन्ध करनेके बाद अमित बलवान् रुद्र इस अकेली बची हुई समूची पृथ्वीको शीघ्र ही जलके महान् प्रवाहमें डुबो देते हैं ॥ ७ ॥
ततः कालाग्निमासाद्य तदम्भो याति संक्षयम् ।
विनष्टेऽम्भसि राजेन्द्र जाज्वलत्यनलो महान् ॥ ८ ॥
तदनन्तर कालाग्निकी लपटमें पड़कर वह सारा जल सूख जाता है । राजेन्द्र! जलके नष्ट हो जानेपर आग अत्यन्त भयानक रूप धारण करती है और सब ओर बड़े जोरसे प्रज्वलित होने लगती है ॥ ८ ॥
तमप्रमेयोऽतिबलं ज्वलमानं विभावसुम् ।
ऊष्माणं सर्वभूतानां सप्तार्चिषमथाञ्जसा ॥ ९ ॥
भक्षयामास भगवान् वायुरष्टात्मको बली ।
विचरन्नमितप्राणस्तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा ॥ १० ॥
सम्पूर्ण भूतोंको गर्मी पहुँचानेवाली तथा अत्यन्त प्रबल वेगसे जलती हुई उस सात ज्वालाओंसे युक्त अताको बलवान् वायुदेव अपने आठ रूपोंमें प्रकट होकर निगल जाते हैं और ऊपर- नीचे तथा बीचमें सब ओर प्रवाहित होने लगते हैं ॥ ९ -१० ॥
तमप्रतिबलं भीममाकाशं ग्रसतेऽऽत्मना ।
आकाशमप्यभिनदन्मनो ग्रसति चाधिकम् ॥ ११ ॥
तदनन्तर आकाश उस अत्यन्त प्रबल एवं भयंकर वायुको स्वयं ही ग्रस लेता है । फिर गर्जन -तर्जन करनेवाले उस आकाशको उससे भी अधिक शक्तिशाली मन अपना ग्रास बना लेता है ॥ ११ ॥
मनो ग्रसति भूतात्मा सो s हंकारः प्रजापतिः ।
अहंकारं महानात्मा भूतभव्यभविष्यवित् ॥ १२ ॥
क्रमशः भूतात्मा और प्रजापतिस्वरूप अहंकार मनको अपनेमें लीन कर लेता है । तत्पश्चात् भूत, भविष्य और वर्तमानका ज्ञाता बुद्धिस्वरूप महत्तत्व अहंकारको अपना ग्रास बना लेता है ॥ १२ ॥
तमप्यनुपमात्मानं विश्वं शम्भुः प्रजापतिः ।
अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ॥ १३ ॥
सर्वतः पाणिपादान्तः सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ।
सर्वतः श्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १४ ॥
हृदयं सर्वभूतानां पर्वणाङ्गुष्ठमात्रकः ।
अथ ग्रसत्यनन्तो हि महात्मा विश्वमीश्वरः ॥ १५ ॥
इसके बाद, जिनके सब ओर हाथ - पैर हैं, सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं, सब ओर कान हैं तथा जो जगत्में सबको व्याप्त करके स्थित हैं, जो सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें अंगुष्ठपर्वके बराबर आकार धारण करके विराजमान हैं, अणिमा, लघिमा और प्राप्ति आदि
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ऐश्वर्य जिनके अधीन हैं, जो सबके नियन्ता, ज्योतिः स्वरूप, अविनाशी, कल्याणमय, प्रजाके स्वामी, अनन्त, महान् आत्मा और सर्वेश्वर हैं, वे परब्रह्म परमात्मा उस अनुपम विश्वरूप बुद्धितत्त्वको अपनेमें लीन कर लेते हैं ॥ १३–१५ ॥
ततः समभवत् सर्वमक्षयाव्ययमव्रणम् ।
भूतभव्यभविष्याणां स्रष्टारमनघं तथा ॥ १६ ॥
तदनन्तर ह्रास और वृद्धिसे रहित, अविनाशी और निर्विकार, सर्वस्वरूप परब्रह्म ही शेष रह जाता है । उसीने भूत, भविष्य और वर्तमानकी सृष्टि करनेवाले निष्पाप ब्रह्माकी भी सृष्टि की है ॥ १६ ॥
एषोऽप्ययस्ते राजेन्द्र यथावत् समुदाहृतः ।
अध्यात्ममधिभूतं च अधिदैवं च श्रूयताम् ॥ १७ ॥
राजेन्द्र! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष संहारक्रमका यथावत्रूपसे वर्णन किया है । अब तुम अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवका वर्णन सुनो ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकका संवादविषयक तीन सौ बारहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३१२ ॥
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त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा सात्त्विक, राजस और तामस भावोंके लक्षण याज्ञवल्क्य उवाच
पादावध्यात्ममित्याहुर्ब्राह्मणास्तत्त्वदर्शिनः ।
गन्तव्यमधिभूतं च विष्णुस्तत्राधिदैवतम् ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं - राजन्! तत्त्वदर्शी ब्राह्मणोंका कथन है कि दोनों पैर अध्यात्म हैं, गन्तव्य स्थान अधिभूत हैं और विष्णु अधिदैवत हैं ॥ १ ॥
पायुरध्यात्ममित्याहुर्यथा तत्त्वार्थदर्शिनः ।
विसर्गमधिभूतं च मित्रस्तत्राधिदैवतम् ॥ २ ॥
तत्त्वार्थदर्शी विद्वान् गुदाको अध्यात्म कहते हैं । मलत्याग अधिभूत है और मित्र अधिदैवत हैं ॥ २ ॥
उपस्थोऽध्यात्ममित्याहुर्यथा योगप्रदर्शिनः ।
अधिभूतं तथाऽऽनन्दो दैवतं च प्रजापतिः ॥ ३ ॥
योगमतका प्रदर्शन करनेवाले जैसा कहते हैं, उसके अनुसार उपस्थ अध्यात्म है, मैथुनजनित आनन्द अधिभूत है और प्रजापति अधिदैवत हैं ॥ ३ ॥
हस्तावध्यात्ममित्याहुर्यथा संख्यानदर्शिनः ।
कर्तव्यमधिभूतं तु इन्द्रस्तत्राधिदैवतम् ॥ ४ ॥
सांख्यदर्शी विद्वानोंके कथनानुसार दोनों हाथ अध्यात्म हैं, कर्तव्य अधिभूत है और इन्द्र अधिदैवत हैं ॥
वागध्यात्ममिति प्राहुर्यथा श्रुतिनिदर्शिनः ।
वक्तव्यमधिभूतं तु वह्निस्तत्राधिदैवतम् ॥ ५ ॥
वेदार्थपर विचार करनेवाले विद्वान् जैसा कहते हैं, उसके अनुसार वाक् अध्यात्म है, वक्तव्य अधिभूत है और अग्नि अधिदैवत हैं ॥ ५ ॥
चक्षुरध्यात्ममित्याहुर्यथा श्रुतिनिदर्शिनः ।
रूपमत्राधिभूतं तु सूर्यश्चाप्यधिदैवतम् ॥ ६ ॥
वेददर्शी विद्वान् जैसा बताते हैं, उसके अनुसार नेत्र अध्यात्म है, रूप अधिभूत है और सूर्य अधिदैवत हैं ॥
श्रोत्रमध्यात्ममित्याहुर्यथा श्रुतिनिदर्शिनः ।
शब्दस्तत्राधिभूतं तु दिशश्चात्राधिदैवतम् ॥ ७ ॥
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वैदिक सिद्धान्तका ज्ञान रखनेवाले विद्वान् पुरुष कहते हैं कि श्रोत्र अध्यात्म है, शब्द अधिभूत है, और दिशाएँ अधिदैवत हैं ॥ ७ ॥
जिह्वामध्यात्ममित्याहुर्यथा श्रुतिनिदर्शिनः ।
रस एवाधिभूतं तु आपस्तत्राधिदैवतम् ॥ ८ ॥
वेदके अनुसार दृष्टि रखनेवाले विद्वानोंका कथन है कि जिह्वा अध्यात्म है, रस अधिभूत है और जल अधिदैवत है ॥ ८ ॥
घ्राणमध्यात्ममित्याहुर्यथा श्रुतिनिदर्शिनः ।
गन्ध एवाधिभूतं तु पृथिवी चाधिदैवतम् ॥ ९ ॥
वैदिक मतके अनुसार यथार्थ तत्त्वका ज्ञान रखनेवाले विद्वान् कहते हैं कि नासिका अध्यात्म है, गन्ध अधिभूत है और पृथ्वी अधिदैवत है ॥ ९ ॥
त्वगध्यात्ममिति प्राहुस्तत्त्वबुद्धिविशारदाः ।
स्पर्शमेवाधिभूतं तु पवनश्चाधिदैवतम् ॥ १० ॥
तत्त्वज्ञानमें कुशल पुरुषोंका कथन है कि त्वचा अध्यात्म है, स्पर्श अधिभूत है और वायु अधिदैवत है ॥
मनोऽध्यात्ममिति प्राहुर्यथा शास्त्रविशारदाः ।
मन्तव्यमधिभूतं तु चन्द्रमाश्चाधिदैवतम् ॥ ११ ॥
शास्त्रज्ञाननिपुण विद्वान् कहते हैं कि मन अध्यात्म है, मन्तव्य अधिभूत है और चन्द्रमा अधिदेवता हैं ॥
अहंकारिकमध्यात्ममाहुस्तत्त्वनिदर्शिनः ।
अभिमानोऽधिभूतं तु रुद्रश्चात्राधिदैवतम् ॥ १२ ॥
तत्त्वदर्शी पुरुषोंका कथन है कि अहंकार अध्यात्म है, अभिमान अधिभूत है और रुद्र अधिदेवता हैं ॥ १२ ॥
बुद्धिरध्यात्ममित्याहुर्यथावदभिदर्शिनः ।
बोद्धव्यमधिभूतं तु क्षेत्रज्ञश्चाधिदैवतम् ॥ १३ ॥
यथार्थ ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि बुद्धि अध्यात्म है, बोद्धव्य अधिभूत है और आत्मा अधिदेवता है ॥ १३ ॥
एषा ते व्यक्तितो राजन् विभूतिरनुदर्शिता ।
आदौ मध्ये तथान्ते च यथातत्त्वेन तत्त्ववित् ॥ १४ ॥
तत्त्वज्ञ नरेश! यह मैंने तुम्हारे निकट आदि, मध्य और अन्तमें तत्त्वतः प्रकाशित होनेवाली जीवकी व्यक्तिगत विभूतिका वर्णन किया है ॥ १४ ॥
प्रकृतिर्गुणान् विकुरुते स्वच्छन्देनात्मकाम्यया ।
क्रीडार्थे तु महाराज शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १५ ॥
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महाराज! प्रकृति स्वतन्त्रतापूर्वक खेल करनेके लिये अपनी ही इच्छासे सैकड़ों और हजारों गुणोंको उत्पन्न करती है ॥ १५ ॥
यथा दीपसहस्राणि दीपान्मर्त्याः प्रकुर्वते ।
प्रकृतिस्तथा विकुरुते पुरुषस्य गुणान् बहून् ॥ १६ ॥
जैसे मनुष्य एक दीपकसे हजारों दीपक जला लेते हैं, उसी प्रकार प्रकृति पुरुषके सम्बन्धसे अनेक गुण उत्पन्न कर देती है ॥ १६ ॥
सत्त्वमानन्द उद्रेकः प्रीतिः प्राकाश्यमेव च ।
सुखं शुद्धित्वमारोग्यं संतोषः श्रद्दधानता ॥ १७ ॥
अकार्पण्यमसंरम्भः क्षमा धृतिरहिंसता ।
समता सत्यमानृण्यं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ १८ ॥
शौचमार्जवमाचारमलौल्यं हृद्यसम्भ्रमः ।
इष्टानिष्टवियोगानां कृतानामविकत्थना ॥ १ ९ ॥
दानेन चात्मग्रहणमस्पृहत्वं परार्थता ।
सर्वभूतदया चैव सत्त्वस्यैते गुणाः स्मृताः ॥ २० ॥
धैर्य, आनन्द, प्रीति, उत्कर्ष, प्रकाश ( ज्ञानशक्ति), सुख, शुद्धि, आरोग्य, संतोष, श्रद्धा, अकार्पण्य ( दीनताका अभाव), असंरम्भ ( क्रोधका अभाव), क्षमा, धृति, अहिंसा, समता, सत्य, ऋणसे रहित होना, मृदुता, लज्जा, अचंचलता, शौच, सरलता, सदाचार, अलोलुपता, हृदयमें सम्भ्रमका न होना, इष्ट और अनिष्टके वियोगका बखान न करना, दानके द्वारा धैर्य धारण करना, किसी वस्तुकी इच्छा न करना, परोपकार और सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया — ये सब सत्त्वसम्बन्धी गुण बताये गये हैं ॥ १७–२० ॥
रजोगुणानां संघातो रूपमैश्वर्यविग्रहौ ।
अत्यागित्वमकारुण्यं सुखदुःखोपसेवनम् ॥ २१ ॥
परापवादेषु रतिर्विवादानां च सेवनम् ।
अहंकारमसत्कारश्चिन्ता वैरोपसेवनम् ॥ २२ ॥
परितापोऽभिहरणं ह्रीनाशोऽनार्जवं तथा ।
भेदः परुषता चैव कामः क्रोधो मदस्तथा ॥ २३ ॥
दर्पो द्वेषोऽतिवादश्च एते प्रोक्ता रजोगुणाः ।
तामसानां तु संघातं प्रवक्ष्याम्युपधार्यताम् ॥ २४ ॥
रूप, ऐश्वर्य, विग्रह, त्यागका अभाव, करुणाका अभाव, दुःख सुखका उपभोग, परनिन्दामें प्रीति, वाद- विवाद करना, अहंकार, माननीय पुरुषोंका सत्कार न करना, चिन्ता, वैरभाव रखना, संताप करना, दूसरोंका धन हड़प लेना, निर्लज्जता, कुटिलता, भेदबुद्धि, कठोरता, काम, क्रोध, मद, दर्द, द्वेष और बहुत बोलनेका स्वभाव - यह रजोगुणका समूह
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है । ये सारे भाव रजोगुणके कार्य बताये गये हैं । अब मैं तामस भावोंके समूहका परिचय देता हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ २१–२४ ॥
मोहोऽप्रकाशस्तामिस्रमन्धतामिस्रसंज्ञितम् ।
मरणं चान्धतामिस्रं तामिस्रं क्रोध उच्यते ॥ २५ ॥
तमसो लक्षणानीह भक्षणाद्यभिरोचनम् ।
भोजनानामपर्याप्तिस्तथा पेयेष्वतृप्तता ॥ २६ ॥
गन्धवासो विहारेषु शयनेष्वासनेषु च ।
दिवास्वप्नेऽतिवादे च प्रमादेषु च वै रतिः ॥ २७ ॥
नृत्यवादित्रगीतानामज्ञानाच्छ्रद्दधानता ।
द्वेषो धर्मविशेषाणामेते वै तामसा गुणाः ॥ २८ ॥
मोह, अप्रकाश ( अज्ञान), तामिस्र और अन्धतामिस्र – ये सब तमोगुणके लक्षण हैं । इनमें तामिस्र क्रोधका वाचक है और अन्धतामिस्र मरणका । भोजनमें रुचिका न होना, खानेकी वस्तुओंसे तृप्ति या संतोषका अभाव अथवा कितना ही भोजन क्यों न मिले, उसे पर्याप्त न मानना, पीनेकी वस्तुओंसे कभी तृप्त न होना, दुर्गन्धयुक्त वस्त्र, अनुचित विहार, मलिन शय्या और आसनोंका सेवन, दिनमें सोना, अत्यन्त वाद - विवादमें और प्रमादमें अत्यन्त आसक्त रहना, अज्ञानवश नाच - गीत और नाना प्रकारके बाजोंमें श्रद्धा, नाना प्रकारके धर्मोंसे द्वेष — ये तमोगुणके लक्षण हैं ॥ २५—२८ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकका संवादविषयक तीन सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१३ ॥
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चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः सात्त्विक, राजस और तामस प्रकृतिके मनुष्योंकी गतिका वर्णन तथा राजा जनकके प्रश्न याज्ञवल्क्य उवाच
एते प्रधानस्य गुणास्त्रयः पुरुषसत्तम ।
कृत्स्नस्य चैव जगतस्तिष्ठन्त्यनपगाः सदा ॥ १ ॥
- याज्ञवल्क्यजी कहते हैं - पुरुषप्रवर! सत्त्व, रज और तम – ये तीन प्रकृतिके गुण हैं,
जो सम्पूर्ण जगत्में सदा विद्यमान रहते हैं । कभी उससे अलग नहीं होते हैं ॥ १ ॥
अव्यक्तरूपो भगवान् शतधा च सहस्रधा ।
शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा ॥ २ ॥
कोटिशश्च करोत्येष प्रत्यगात्मानमात्मना । यह ऐश्वर्यशालिनी प्रकृति अपने ही प्रभावसे जीवको सैकड़ों, हजारों, लाखों और करोड़ों रूपोंमें प्रकट कर देती है ॥ २३ ॥
सात्त्विकस्योत्तमं स्थानं राजसस्येह मध्यमम् ॥ ॥ तामसस्याधमं स्थानं प्राहुरध्यात्मचिन्तकाः । अध्यात्म- शास्त्रका चिन्तन करनेवाले विद्वान् कहते हैं कि सात्त्विक पुरुषको उत्तम, रजोगुणीको मध्यम और तमोगुणीको अधम स्थानकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥
केवलेनेह पुण्येन गतिमूर्ध्वामवाप्नुयात् ॥ ४ ॥
पुण्यपापेन मानुष्यमधर्मेणाप्यधोगतिम् । केवल पुण्य करनेसे मनुष्य ऊर्ध्वलोकमें गमन करता है, पुण्य और पाप दोनोंके अनुष्ठानसे मर्त्यलोकमें जन्म लेता है तथा केवल पापाचार करनेपर उसे अधोगतिमें गिरना पड़ता है ॥ ४३ ॥
द्वन्द्वमेषां त्रयाणां तु संनिपातं च तत्त्वतः ॥ ५ ॥
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च शृणुष्व मे । अब मैं सत्त्व, रज और तम- इन तीनों गुणोंके द्वन्द्व और संनिपात का यथार्थरूपसे वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ५३ ॥
सत्त्वस्य तु रजो दृष्टं रजसश्च तमस्तथा ॥ ६ ॥
तमसश्च तथा सत्त्वं सत्त्वस्याव्यक्तमेव च ।
अव्यक्तः सत्त्वसंयुक्तो देवलोकमवाप्नुयात् ॥ ७ ॥