श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2071–2080
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2071–2080
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सत्त्वगुणके साथ रजोगुण, रजोगुणके साथ तमोगुण, तमोगुणके साथ सत्त्वगुण तथा सत्त्वगुणके साथ अव्यक्त ( जीवात्मा ) का सम्मिश्रण देखा जाता है ( यह दो तत्त्वोंका संयोग या मेल ही द्वन्द्व है ) । जीवात्मा जब सत्त्वगुणसे संयुक्त होता है, तब देवलोकको प्राप्त होता है ॥ ६-७ ॥
रजः सत्त्वसमायुक्तो मानुषेषु प्रपद्यते ।
रजस्तमोभ्यां संयुक्तस्तिर्यग्योनिषु जायते ॥ ८ ॥
रजोगुण और सत्त्वगुणसे संयुक्ति होनेपर वह मनुष्य- लोकमें जाता है तथा रजोगुण और तमोगुणसे संयुक्त होनेपर वह पशु- पक्षी आदिकी योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है ॥ ८ ॥
राजसैस्तामसैः सत्त्वैर्युक्तो मानुषमाप्नुयात् ।
पुण्यपापवियुक्तानां स्थानमाहुर्महात्मनाम् ।
शाश्वतं चाव्ययं चैवमक्षयं चामृतं च तत् ॥ ९ ॥
राजस, तामस और सात्त्विक तीनों भावोंसे युक्त होनेपर जीवको मनुष्ययोनिकी प्राप्ति होती है । जो पुण्य और पाप दोनोंसे रहित हैं, उन महात्मा पुरुषोंके लिये सनातन, अविकारी, अक्षय और अमृतपदकी प्राप्ति बतायी गयी है ॥ ९ ॥
ज्ञानिनां सम्भवं श्रेष्ठं स्थानमव्रणमच्युतम् ।
अतीन्द्रियमबीजं च जन्ममृत्युतमोनुदम् ॥ १० ॥
जहाँ किसी प्रकारका कष्ट नहीं है, जहाँसे कभी पतन नहीं होता है, जो इन्द्रियातीत है, जहाँ बन्धनमें डालनेवाला कोई कारण नहीं है तथा जो जन्म, मृत्यु और अज्ञानका विनाश करनेवाला है, वह श्रेष्ठ स्थान ( परमपद ) ज्ञानियोंको ही प्राप्त हो सकता है ॥ १० ॥
अव्यक्तस्थं परं यत् तत् पृष्टस्तेऽहं नराधिप ।
स एष प्रकृतिस्थो हि तत्स्थ इत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
नरेश्वर! तुमने जो अव्यक्त प्रकृतिमें स्थित परमतत्त्वके विषयमें मुझसे प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें यह निवेदन है कि यह परमतत्त्व प्राकृत शरीरमें स्थित होनेसे ही प्रकृतिस्थ कहलाता है ॥ ११ ॥
अचेतना चैव मता प्रकृतिश्चापि पार्थिव ।
एतेनाधिष्ठिता चैव सृजते संहरत्यपि ॥ १२ ॥
पृथ्वीनाथ! प्रकृति अचेतन मानी गयी है । इस परमतत्त्वद्वारा अधिष्ठित होकर ही वह सृष्टि एवं संहार करती है ॥ १२ ॥
जनक उवाच
अनादिनिधनावेतावुभावेव महामते ।
अमूर्तिमन्तावचलावप्रकम्प्यगुणागुणौ ॥ १३ ॥
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जनकने पूछा — महामते! प्रकृति और पुरुष दोनों आदि- अन्तसे रहित, मूर्तिहीन और अचल हैं । दोनों अपने - अपने गुणमें स्थिर रहनेवाले और दोनों ही निर्गुण हैं ॥
अग्राह्यावृषिशार्दूल कथमेको ह्यचेतनः ।
चेतनावांस्तथा चैकः क्षेत्रज्ञ इति भाषितः ॥ १४ ॥
मुनिश्रेष्ठ! वे दोनों ही बुद्धि - अगोचर हैं । फिर इन दोनोंमेंसे एक प्रकृतिको आपने अचेतन क्यों बताया है? तथा दूसरेको चेतन एवं क्षेत्रज्ञ कैसे कहा है? ॥ १४ ॥
त्वं हि विप्रेन्द्र कार्त्स्न्येन मोक्षधर्ममुपाससे ।
साकल्यं मोक्षधर्मस्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १५ ॥
विप्रवर! आप पूर्णरूपसे मोक्षधर्मका सेवन करते हैं, इसलिये आपहीके मुँहसे मैं सम्पूर्ण मोक्ष - धर्मका यथावत् रूपसे श्रवण करना चाहता हूँ ॥ १५ ॥
अस्तित्वं केवलत्वं च विनाभावं तथैव च ।
दैवतानि च मे ब्रूहि देहं यान्याश्रितानि वै ॥ १६ ॥
आप पुरुषके अस्तित्व, केवलत्व और प्रकृतिसे पृथक् सत्ताका स्पष्टीकरण कीजिये और देहका आश्रय ग्रहण करनेवाले जो देवता हैं, उनका तत्त्व भी मुझे समझाइये ॥ १६ ॥
तथैवोत्क्रामिणः स्थानं देहिनो वै विपद्यतः ।
कालेन यद्धि प्राप्नोति स्थानं तत् प्रब्रवीहि मे ॥ १७ ॥
तथा मरनेवाले जीवके प्राणोंका जब उत्क्रमण होता है, उस समय उसे समयानुसार किस स्थानकी प्राप्ति होती है? इसपर भी प्रकाश डालिये ॥ १७ ॥
सांख्यज्ञानं च तत्त्वेन पृथग्योगं तथैव च ।
अरिष्टानि च तत्त्वानि वक्तुमर्हसि सत्तम ।
विदितं सर्वमेतत् ते पाणावामलकं यथा ॥ १८ ॥
साधुशिरोमणे! साथ ही पृथक्- पृथक् सांख्य और योगके ज्ञानका तथा मृत्युसूचक लक्षणोंका यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये; क्योंकि ये सारी बातें आपको हाथपर रखे हुए आँवलेके समान ज्ञात हैं ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे चतुर्दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकका संवादविषयक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१४ ॥
१-२ - दो गुणोंके मेलको द्वन्द्व और तीन गुणोंके मेलको संनिपात कहते हैं ।
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पञ्चदशाधिकत्रिशततमोध्यायः प्रकृति -- पुरुषकापुरुषका प्रकृति विवेक और उसका फल याज्ञवल्क्य उवाच
न शक्यो निर्गुणस्तात गुणीकर्तुं विशाम्पते ।
गुणवांश्चाप्यगुणवान् यथातत्त्वं निबोध मे ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं -तात! प्रजापालक नरेश! निर्गुणको सगुण और सगुणको
निर्गुण नहीं किया जा सकता । इस विषयमें जो यथार्थ तत्त्व है, वह मुझसे सुनो ॥ १ ॥
गुणवानेव निर्गुणश्चागुणस्तथा ।
प्राहुरेवं महात्मानो मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥ २ ॥
तत्त्वदर्शी महात्मा मुनि कहते हैं, जिसका गुणोंके साथ सम्पर्क है, वह गुणवान् है तथा जो गुणोंके संसर्गसे रहित है, वह निर्गुण कहलाता है ॥ २ ॥
गुणस्वभावस्त्वव्यक्तो गुणान् नैवातिवर्तते ।
उपर्युक्ते च तानेव स चैवाज्ञः स्वभावतः ॥ ३ ॥
अव्यक्त प्रकृति स्वभावसे ही गुणवती है । वह गुणोंका कभी उल्लंघन नहीं कर सकती है । उन्हींको उपयोगमें लाती है और स्वभावसे ही ज्ञानरहित है ॥ ३ ॥
अव्यक्तस्तु न जानीते पुरुषो ज्ञः स्वभावतः ।
न मत्तः परमोऽस्तीति नित्यमेवाभिमन्यते ॥ ४ ॥
प्रकृतिको किसी वस्तुका ज्ञान नहीं होता । इसके विपरीत पुरुष स्वभावसे ही ज्ञानी है । वह सदा इस बातको जानता रहता है कि मुझसे कोई दूसरा उत्कृष्ट पदार्थ नहीं है ॥ ४ ॥
अनेन कारणेनैतदव्यक्तं स्यादचेतनम् ।
नित्यत्वाच्चाक्षरत्वाच्च क्षरत्वान्न तदन्यथा ॥ ५ ॥
इस कारणसे प्रकृतिको अचेतन माना गया है । क्षर अर्थात् विनाशी होनेके कारण वह जडके सिवा और कुछ हो ही नहीं सकती । इधर नित्य तथा अक्षर ( अविनाशी ) होनेके कारण पुरुष चेतन है ॥ ५ ॥
यदाज्ञानेन कुर्वीत गुणसर्गं पुनः पुनः ।
यदाऽऽत्मानं न जानीते तदाऽऽत्मापि न मुच्यते ॥ ६ ॥
परंतु वह जबतक अज्ञानवश बारंबार गुणोंका संसर्ग करता और अपने असंगस्वरूपको नहीं जानता है, तबतक उसकी मुक्ति नहीं होती है ॥ ६ ॥
कर्तृत्वाच्चापि सर्गाणां सर्गधर्मा तथोच्यते ।
कर्तृत्वाच्चापि योगानां योगधर्मा तथोच्यते ॥ ७ ॥
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वह अपनेको सृष्टिका कर्ता माननेके कारण सर्गधर्मा कहलाता है और योगका कर्ता माननेसे योगधर्मा कहा जाता है ॥ ७ ॥
कर्तृत्वात् प्रकृतीनां च तथा प्रकृतिधर्मिता ॥ ८ ॥
नाना प्रकृतियोंको अपनेमें स्वीकार कर लेनेसे वह प्रकृति- धर्मवाला हो जाता है ॥ ८ ॥
कर्तृत्वाच्चापि बीजानां बीजधर्मा तथोच्यते ।
गुणानां प्रसवत्वाच्च प्रलयत्वात् तथैव च ॥ ९ ॥
तथा स्थावर पदार्थोंके बीजोंका कर्ता होनेसे उसे बीजधर्मा कहते हैं । साथ ही वह गुणोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कर्ता है, इसलिये गुणधर्मा कहलाता है ॥ ९ ॥
उपेक्षत्वादनन्यत्वादभिमानाच्च केवलम् ।
मन्यन्ते यतयः सिद्धा अध्यात्मज्ञा गतज्वराः ।
अनित्यं नित्यमव्यक्तं व्यक्तमेतद्धि शुश्रुम ॥ १० ॥
अध्यात्मशास्त्रको जाननेवाले चिन्तारहित सिद्ध यति लोग पुरुषको केवल (प्रकृतिके संगसे रहित ) मानते हैं; क्योंकि वह साक्षी और अद्वितीय है, उसे सुख- दुःखका अनुभव तो अभिमानके कारण होता है । वह वास्तवमें तो नित्य और अव्यक्त है, किंतु प्रकृतिके सम्बन्धसे अनित्य और व्यक्त प्रतीत होता है ॥ १० ॥
अव्यक्तैकत्वमित्याहुर्नानात्वं पुरुषे तथा ।
सर्वभूतदयावन्तः केवलं ज्ञानमास्थिता ॥ ११ ॥
सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाले और केवल ज्ञानका सहारा लेनेवाले कुछ सांख्यके विद्वान् प्रकृतिको एक तथा पुरुषको अनेक मानते हैं ॥ ११ ॥
अन्यः स पुरुषोऽव्यक्तस्त्वध्रुवो ध्रुवसंज्ञकः ।
यथा मुञ्ज इषीकाणां तथैवैतद्धि जायते ॥ १२ ॥
पुरुष प्रकृतिसे भिन्न और नित्य है तथा अव्यक्त ( प्रकृति) पुरुषसे भिन्न एवं अनित्य है । जैसे सींकसे मूँज अलग होती है, उसी प्रकार प्रकृति भी पुरुषसे पृथक् है ॥
अन्यच्च मशकं विद्यादन्यच्चोदुम्बरं तथा ।
न चोदुम्बरसंयोगैर्मशकस्तत्र लिप्यते ॥ १३ ॥
अन्य एव तथा मत्स्यस्तदन्यदुदकं स्मृतम् ।
न चोदकस्य स्पर्शेन मत्स्यो लिप्यति सर्वशः ॥ १४ ॥
जैसे गूलर और उसके कीड़े एक साथ होनेपर भी अलग- अलग समझे जाते हैं, गूलरके
संयोगसे कीड़े उससे लिप्त नहीं होते तथा जैसे मत्स्य दूसरी वस्तु है और जल दूसरी ।
पानीके स्पर्शसे कभी कोई मत्स्य लिप्त नहीं होता है ॥ १३-१४ ॥
अन्यो ह्यग्निरुखाप्यन्या नित्यमेवमवेहि भोः ।
न चोपलिप्यते सोऽग्निरुखासंस्पर्शनेन वै ॥ १५ ॥
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राजन्! जैसे अग्नि दूसरी वस्तु है और मिट्टीकी हँड़िया दूसरी वस्तु । इन दोनोंके भेदको नित्य समझो । उस हँड़ियेके स्पर्शसे अग्नि दूषित नहीं होती है ॥ १५ ॥
पुष्करं त्वन्यदेवात्र तथान्यदुदकं स्मृतम् ।
न चोदकस्य स्पर्शेन लिप्यते तत्र पुष्करम् ॥ १६ ॥
जैसे कमल दूसरी वस्तु है और पानी दूसरी, पानीके स्पर्शसे कमल लिप्त नहीं होता है ।
उसी प्रकार पुरुष भी प्रकृतिसे भिन्न और असंग है ॥ १६ ॥
एतेषां सहवासं च निवासं चैव नित्यशः ।
याथातथ्येन पश्यन्ति न नित्यं प्राकृता जनाः ॥ १७ ॥
ये त्वन्यथैव पश्यन्ति न सम्यक् तेषु दर्शनम् ।
ते व्यक्तं निरयं घोरं प्रविशन्ति पुनः पुनः ॥ १८ ॥
साधारण मनुष्य इनके सहवास और निवासको कभी ठीक -ठीक समझ नहीं पाते । जो इन दोनोंके स्वरूपको अन्यथा जानते हैं अर्थात् प्रकृति और पुरुषको एक दूसरेसे भिन्न नहीं
जानते हैं उनकी दृष्टि ठीक नहीं है । वे अवश्य ही बार- बार घोर नरकमें पड़ते हैं ॥
सांख्यदर्शनमेतत् ते परिसंख्यानमुत्तमम् ।
एवं हि परिसंख्याय सांख्याः केवलतां गताः ॥ १ ९ ॥
इस प्रकार मैंने तुम्हें यह विचारप्रधान उत्तम सांख्य दर्शन बताया है । सांख्यशास्त्रके विद्वान् इस प्रकार जान करके कैवल्यको प्राप्त हो गये हैं ॥ १ ९ ॥
ये त्वन्ये तत्त्वकुशलास्तेषामेतन्निदर्शनम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि योगानामनुदर्शनम् ॥ २० ॥
दूसरे भी जो तत्त्वविचारकुशल विद्वान् हैं, उनका भी ऐसा ही मत है। इसके बाद मैं योगियोंके शास्त्रका वर्णन करूँगा ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे पञ्चदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकके संवादमें तीन सौ पंद्रहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३१५ ॥
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षोडशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति याज्ञवल्क्य उवाच
सांख्यज्ञानं मया प्रोक्तं योगज्ञानं निबोध मे ।
यथाश्रुतं यथादृष्टं तत्त्वेन नृपसत्तम ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं - नृपश्रेष्ठ! मैं सांख्यसम्बन्धी ज्ञान तो तुम्हें बतला चुका । अब जैसा मैंने देखा, सुना या समझा है, उसके अनुसार योगशास्त्रका तात्त्विक ज्ञान मुझसे सुनो ॥ १ ॥
नास्ति सांख्यसमं ज्ञानं नास्ति योगसमं बलम् ।
तावुभावेकचर्यौ तावुभावनिधनौ स्मृतौ ॥ २ ॥
सांख्यके समान कोई ज्ञान नहीं है । योगके समान कोई बल नहीं है । इन दोनोंका लक्ष्य एक है और वे दोनों ही मृत्युका निवारण करनेवाले माने गये हैं ॥ २ ॥
पृथक् पृथक् प्रपश्यन्ति येऽप्यबुद्धिरता नराः ।
वयं तु राजन् पश्याम एकमेव तु निश्चयात् ॥ ३ ॥
राजन्! जो मनुष्य अज्ञानपरायण हैं, वे ही इन दोनों शास्त्रोंको सर्वथा भिन्न मानते हैं । हम तो विचारके द्वारा पूर्ण निश्चय करके दोनोंको एक ही समझते हैं ॥ ३ ॥
यदेव योगाः पश्यन्ति तत् सांख्यैरपि दृश्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित् ॥ ४ ॥
योगी जिस तत्त्वका साक्षात्कार करते हैं, वही सांख्योंद्वारा भी देखा जाता है; अतः जो सांख्य और योगको एक देखता है, वही तत्त्वज्ञानी है ॥ ४ ॥
रुद्रप्रधानानपरान् विद्धि योगानरिंदम ।
तेनैव चाथ देहेन विचरन्ति दिशो दश ॥ ५ ॥
शत्रुदमन नरेश! योग- साधनोंमें रुद्र अर्थात् प्राण प्रधान है । इन सबको तुम सर्वश्रेष्ठ समझो । प्राणको अपने वशमें कर लेनेपर योगी इसी शरीरसे दसों दिशाओंमें स्वच्छन्द विचरण कर सकते हैं ॥ ५ ॥
यावद्धि प्रलयस्तात सूक्ष्मेणाष्टगुणेन ह ।
योगेन लोकान् विचरन् सुखं संन्यस्य चानघ ॥ ६ ॥
प्रिय निष्पाप भूपाल! जबतक मृत्यु न हो जाय, तबतक ही योगी योगबलसे स्थूल शरीरको यहीं छोड़कर अष्टविध ऐश्वर्यसे युक्त सूक्ष्मशरीरके द्वारा लोक-लोकान्तरोंमें
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सुखपूर्वक विचरण करता है ॥ ६ ॥
वेदेषु चाष्टगुणिनं योगमाहुर्मनीषिणः ।
सूक्ष्ममष्टगुणं प्राहुर्नेतरं नृपसत्तम ॥ ७ ॥
नृपश्रेष्ठ! मनीषी पुरुषोंका कहना है कि वेदमें स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकारके योगोंका वर्णन है । उनमें स्थूल योग अणिमा आदि आठ प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है और सूक्ष्म योग ही ( यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि — इन आठ गुणों ( अंगों) से युक्त है; दूसरा नहीं ॥ ७ ॥
द्विगुणं योगकृत्यं तु योगानां प्राहुरुत्तमम् ।
सगुणं निर्गुणं चैव यथा शास्त्रनिदर्शनम् ॥ ८ ॥
योगका मुख्य साधन दो प्रकारका बताया गया है- सगुण और निर्गुण ( सबीज और निर्बीज ) । ऐसा ही शास्त्रोंका निर्णय है ॥ ८ ॥
धारणं चैव मनसः प्राणायामश्च पार्थिव ।
एकाग्रता च मनसः प्राणायामस्तथैव च ॥ ९ ॥
पृथ्वीनाथ! किसी विशेष देशमें चित्तको स्थापित करनेका नाम ' धारणा' है । मनकी धारणाके साथ किया जानेवाला प्राणायाम सगुण है और देश- विशेषका आश्रय न लेकर मनको निर्बीज समाधिमें एकाग्र करना निर्गुण प्राणायाम कहलाता है ॥ ९ ॥
प्राणायामो हि सगुणो निर्गुणं धारयेन्मनः ।
यद्यदृश्यति मुञ्चन् वै प्राणान् मैथिलसत्तम ।
वाताधिक्यं भवत्येव तस्मात् तं न समाचरेत् ॥ १० ॥
सगुण प्राणायाम मनको निर्गुण अर्थात् वृत्तिशून्य करके स्थिर करनेमें सहायक होता है । मैथिलशिरोमणे! यदि पूरक आदिके समय नियत देवता आदिका ध्यानद्वारा साक्षात्कार किये बिना ही कोई प्राणवायुका रेचन करता है तो उसके शरीरमें वायुका प्रकोप बढ़ जाता है; अतः ध्यान - रहित प्राणायामको नहीं करना चाहिये ॥ १० ॥
निशायाः प्रथमे यामे चोदना द्वादश स्मृताः ।
मध्ये स्वप्नात् परे यामे द्वादशैव तु चोदनाः ॥ ११ ॥
रातके पहले पहरमें वायुको धारण करनेकी बारह प्रेरणाएँ बतायी गयी हैं । मध्य रात्रिमें रात्रिके बिचले दो पहरोंमें सोना चाहिये तथा पुनः अन्तिम प्रहरमें बारह प्रेरणाओंका ही अभ्यास करना चाहिये * ॥ ११ ॥
तदेवमुपशान्तेन दान्तेनैकान्तशीलिना ।
आत्मारामेण बुद्धेन योक्तव्योऽऽत्मा न संशयः ॥ १२ ॥
इस प्रकार प्राणायामके द्वारा मनको वशमें करके शान्त और जितेन्द्रिय हो एकान्तवास करनेवाले आत्माराम ज्ञानीको चाहिये कि मनको परमात्मामें लगावे । इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥
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पञ्चानामिन्द्रियाणां तु दोषानाक्षिप्य पञ्चधा ।
शब्दं रूपं तथा स्पर्शं रसं गन्धं तथैव च ॥ १३ ॥
प्रतिभामपवर्गं च प्रतिसंहृत्य मैथिल ।
इन्द्रियग्राममखिलं मनस्यभिनिवेश्य ह ॥ १४ ॥
मनस्तथैवाहंकारे प्रतिष्ठाप्य नराधिप ।
अहंकारं तथा बुद्धौ बुद्धिं च प्रकृतावपि ॥ १५ ॥
एवं हि परिसंख्याय ततो ध्यायन्ति केवलम् ।
विरजस्कमलं नित्यमनन्तं शुद्धमव्रणम् ॥ १६ ॥
तस्थुषं पुरुषं नित्यमभेद्यमजरामरम् ।
शाश्वतं चाव्ययं चैव ईशानं ब्रह्म चाव्ययम् ॥ १७ ॥
- मिथिलानरेश! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध–ये इन्द्रियोंके पाँच दोष हैं । इन दोषोंको दूर करे । फिर लय और विक्षेपको शान्त करके सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मनमें स्थिर करे । नरेश्वर! तत्पश्चात् मनको अहंकारमें, अहंकारको बुद्धिमें और बुद्धिको प्रकृतिमें स्थापित करे । इस प्रकार सबका लय करके योगी पुरुष केवल उस परमात्माका ध्यान करते हैं, जो रजोगुणसे रहित, निर्मल, नित्य, अनन्त, शुद्ध, छिद्ररहित, कूटस्थ, अन्तर्यामी, अभेद्य, अजर, अमर, अविकारी, सबका शासन करनेवाला और सनातन ब्रह्म है ॥
युक्तस्य तु महाराज लक्षणान्युपधारय ।
लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् ॥ १८ ॥
महाराज! अब समाधिमें स्थित हुए योगीके लक्षण सुनो । जैसे तृप्त हुआ मनुष्य सुखसे सोता है, उसी प्रकार योगयुक्त पुरुषके चित्तमें सदा प्रसन्नता बनी रहती है - वह समाधिसे
विरत होना नहीं चाहता । यही उसकी प्रसन्नताकी पहचान है ॥ १८ ॥
निर्वाते तु यथा दीपो ज्वलेत् स्नेहसमन्वितः ।
निश्चलोर्ध्वशिखस्तद्वद् युक्तमाहुर्मनीषिणः ॥ १ ९ ॥
जैसे तेलसे भरा हुआ दीपक वायुशून्य स्थानमें एकतार जलता रहता है । उसकी शिखा स्थिरभावसे ऊपरकी ओर उठी रहती है, उसी तरह समाधिनिष्ठ योगीको भी मनीषी पुरुष स्थिर बताते हैं ॥ १ ९ ॥
पाषाण इव मेघोत्थैर्यथा बिन्दुभिराहतः ।
नालं चालयितुं शक्यस्तथा युक्तस्य लक्षणम् ॥ २० ॥
जैसे बादलकी बरसायी हुई बूँदोंके आघातसे पर्वत चंचल नहीं होता, उसी तरह अनेक प्रकारके विक्षेप आकर योगीको विचलित नहीं कर सकते । यही योगयुक्त पुरुषकी पहचान है ॥ २० ॥
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्विविधैर्गीतवादितैः ।
क्रियमाणैर्न कम्पेत युक्तस्यैतन्निदर्शनम् ॥ २१ ॥
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उसके पास बहुत - से शंख और नगाड़ोंकी ध्वनि हो और तरह- तरहके गाने - बजाने किये जायँ तो भी उसका ध्यान भंग नहीं हो सकता । यही उसकी सुदृढ़ समाधिकी पहचान है ॥ २१ ॥
तैलपात्रं यथा पूर्णं कराभ्यां गृह्य पूरुषः ।
सोपानमारुहेद् भीतस्तर्ज्यमानोऽसिपाणिभिः ॥ २२ ॥
संयतात्मा भयात् तेषां न पात्राद् बिन्दुमुत्सृजेत् ।
तथैवोत्तरमागम्य एकाग्रमनसस्तथा ॥ २३ ॥
स्थिरत्वादिन्द्रियाणां तु निश्चलत्वात् तथैव च ।
एवं युक्तस्य तु मुनेर्लक्षणान्युपलक्षयेत् ॥ २४ ॥
जैसे मनको संयममें रखनेवाला सावधान मनुष्य हाथोंमें तेलसे भरा कटोरा लेकर सीढ़ीपर चढ़े और उस समय बहुतसे पुरुष हाथमें तलवार लेकर उसे डराने - धमकाने लगें तो भी वह उनके डरसे एक बूँद भी तेल पात्रसे गिरने नहीं देता, उसी प्रकार योगकी ऊँची स्थितिको प्राप्त हुआ एकाग्रचित्त योगी इन्द्रियोंकी स्थिरता और मनकी अविचल स्थितिके कारण समाधिसे विचलित नहीं होता। योगसिद्ध मुनिके ऐसे ही लक्षण समझने चाहिये ॥ २२–२४ ॥
स्वयुक्तः पश्यते ब्रह्म यत् तत्परममव्ययम् ।
महतस्तमसो मध्ये स्थितं ज्वलनसंनिभम् ॥ २५ ॥
जो अच्छी तरह समाधिमें स्थित हो जाता है, वह महान् अन्धकारके बीचमें प्रकाशित होनेवाली प्रज्वलित अग्निके समान हृदयदेशमें स्थित अविनाशी (ज्ञानस्वरूप ) परब्रह्मका साक्षात्कार करता है ॥ २५ ॥
एतेन केवलं याति त्यक्त्वा देहमसाक्षिकम् ।
कालेन महता राजन् श्रुतिरेषा सनातनी ॥ २६ ॥
राजन्! इस साधनाके द्वारा मनुष्य दीर्घकालके पश्चात् इस अचेतन देहका परित्याग करके केवल ( प्रकृतिके संसर्गसे रहित) परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है । ऐसी सनातन श्रुति है ॥ २६ ॥
एतद्धि योगं योगानां किमन्यद् योगलक्षणम् ।
विज्ञाय तद्धि मन्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥ २७ ॥
यही योगियोंका योग है । इसके सिवा योगका और क्या लक्षण हो सकता है? इसे जानकरमनीषी पुरुष अपने- आपको कृतकृत्य मानते हैं ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे षोडशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१६ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकका संवादविषयक तीन सौ सोलहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३१६ ॥
* एक प्राणायाममें पूरक, कुम्भक और रेचकके भेदसे तीन प्रेरणाएँ समझनी चाहिये । इस प्रकार जहाँ बारह प्रेरणाओंके अभ्यासका विधान किया गया है, वहाँ चार-चार प्राणायाम करनेकी विधि समझनी चाहिये । तात्पर्य यह कि रातके पहले और पिछले पहरोंमें ध्यानपूर्वक चार-चार प्राणायामोंका नित्य अभ्यास करना योगीके लिये अत्यन्त आवश्यक है ।