05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2191–2200
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2191–2200
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' शिष्यो! यदि तुम्हें यही अच्छा लगता है तो तुम पृथ्वीपर या देवलोकमें जहाँ चाहो जा सकते हो; परंतु प्रमाद न करना; क्योंकि वेदमें बहुत सी प्ररोचनात्मक श्रुतियाँ हैं, जो व्याजसे ( फलोंका लोभ दिखाकर ) धर्मका प्रतिपादन करती हैं ' ॥ ६ ॥
तेऽनुज्ञातास्ततः सर्वे गुरुणा सत्यवादिना ।
जग्मुः प्रदक्षिणं कृत्वा व्यासं मूर्ध्नाभिवाद्य च ॥ ७ ॥
सत्यवादी गुरुकी यह आज्ञा पाकर सभी शिष्योंने उनके चरणोंपर सिर रखकर प्रणाम किया । तत्पश्चात् वे व्यासजीकी प्रदक्षिणा करके वहाँसे चले गये ' ॥ ७ ॥
अवतीर्य महीं तेऽथ चातुर्होत्रमकल्पयन् ।
संयाजयन्तो विप्रांश्च राजन्यांश्च विशस्तथा ॥ ८ ॥
पुज्यमाना द्विजैर्नित्यं मोदमाना गृहे रताः ।
याजनाध्यापनरताः श्रीमन्तो लोकविश्रुताः ॥ ९ ॥
पृथ्वीपर उतरकर उन्होंने चातुर्होत्र कर्म ( अग्निहोत्रसे लेकर सोमयागतक ) का प्रचार किया और गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्योंके यज्ञ कराते हुए वे द्विजातियोंसे पूजित हो बड़े आनन्दसे रहने लगे । यज्ञ कराने और वेदोंकी शिक्षा देनेमें ही वे तत्पर रहते थे । इन्हीं कर्मोंके कारण वे श्रीसम्पन्न और लोक- विख्यात हो गये थे ॥ ८ - ९ ॥
अवतीर्णेषु शिष्येषु व्यासः पुत्रसहायवान् ।
तूष्णीं ध्यानपरो धीमानेकान्ते समुपाविशत् ॥ १० ॥
शिष्योंके पर्वतसे नीचे उतर जानेपर व्यासजीके साथ उनके पुत्र शुकदेवके सिवा और कोई नहीं रह गया । वे बुद्धिमान् व्यासजी एकान्तमें ध्यानमग्न होकर चुपचाप बैठे थे ॥ १० ॥
तं ददर्शाश्रमपदे नारदः सुमहातपाः ।
अथैनमब्रवीत् काले मथुराक्षरया गिरा ॥ ११ ॥
उसी समय महातपस्वी नारदजी उस आश्रमपर पधारकर व्यासजीसे मिले और मधुर अक्षरोंसे युक्त मीठी वाणीमें उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ११ ॥
भो भो ब्रह्मर्षिवासिष्ठ ब्रह्मघोषो न वर्तते ।
एको ध्यानपरस्तूष्णीं किमास्से चिन्तयन्निव ॥ १२ ॥
‘ हे ब्रह्मर्षिवासिष्ठ! आज आपके इस आश्रममें वेदमन्त्रोंकी ध्वनि क्यों नहीं हो रही है? आप अकेले ध्यानमग्न होकर चुपचाप क्यों बैठे हैं? जान पड़ता है, आप किसी चिन्तामें मग्न हैं ॥ १२ ॥
ब्रह्मघोषैर्विरहितः पर्वतोऽयं न शोभते ।
रजसा तमसा चैव सोमः सोपप्लवो यथा ॥ १३ ॥
न भ्राजते यथापूर्वं निषादानामिवालयः ।
देवर्षिगणजुष्टोऽपि वेदध्वनिनिराकृतः ॥ १४ ॥
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' वेदध्वनि न होनेके कारण इस पर्वतकी पहले जैसी शोभा नहीं रही । रज और तमसे आच्छन्न हो यह राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान जान पड़ता है । देवर्षियोंसे सेवित होनेपर भी यह शैलशिखर ब्रह्मघोषके बिना भीलोंके घरकी तरह श्रीहीन प्रतीत होता है ॥ १३-१४ ॥
ऋषयश्च हि देवाश्च गन्धर्वाश्च महौजसः ।
वियुक्ता ब्रह्मघोषेण न भ्राजन्ते यथा पुरा ॥ १५ ॥
' यहाँके ऋषि, देवता और महाबली गन्धर्व भी ब्रह्मघोषसे विमुक्त हो अब पहलेकी भाँति शोभा नहीं पा रहे हैं ' ॥ १५ ॥
नारदस्य वचः श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।
महर्षे यत् त्वया प्रोक्तं वेदवादविचक्षण ॥ १६ ॥
एतन्मनोऽनुकूलं मे भवानर्हति भाषितुम् ।
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च सर्वत्र च कुतूहली ॥ १७ ॥
नारदजीकी बात सुनकर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने कहा- ' वेदविद्याके विद्वान् सहर्षे! आपने जो कुछ कहा है, यह मेरे मनके अनुकूल ही है । आप ही ऐसी बात कह सकते हैं । आप सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और सर्वत्रकी बातें जाननेके लिये उत्कण्ठित रहनेवाले हैं ॥ १६-१७ ॥ त्रिषु लोकेषु यद् भूतं सर्वं तव मते स्थितम् ।
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तदाज्ञापय विप्रर्षे ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १८ ॥
' तीनों लोकोंमें जो बात होती है या हो चुकी है, वह सब आपकी जानकारीमें है ।
ब्रह्मर्षे! बताइये, आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ १८ ॥
यन्मया समनुष्ठेयं ब्रह्मर्षे तदुदाहर ।
विमुक्तस्येह शिष्यैर्मे नातिहृष्टमिदं मनः ॥ १ ९ ॥
‘ ब्रह्मर्षि नारद! इस समय मेरा जो कर्तव्य है, उसे भी बताइये । अपने प्यारे शिष्योंसे बिछुड़ जानेके कारण इस समय मेरा यह मन विशेष प्रसन्न नहीं है ' ॥ १ ९ ॥ नारद उवाच
अनाम्नायमला वेदा ब्राह्मणस्याव्रतं मलम् ।
मलं पृथिव्या वाहीकाः स्त्रीणां कौतूहलं मलम् ॥ २० ॥
नारदजीने कहा – व्यासजी! वेद पढ़कर उसका अभ्यास ( पुनरावृत्ति ) न करना वेदाध्ययनका दूषण है । व्रतका पालन न करना ब्राह्मणका दूषण है । वाहीक देशके लोग पृथ्वीके दूषण हैं और नये - नये खेल- तमाशा देखनेकी लालसा स्त्रीके लिये दोषकी बात है ॥
अधीयतां भवान् वेदान् सार्धं पुत्रेण धीमता ।
विधुन्वन् ब्रह्मघोषेण रक्षोभयकृतं तमः ॥ २१ ॥
आप अपने वेदोच्चारणकी ध्वनिसे राक्षसभयजनित अन्धकारका नाश करते हुए बुद्धिमान् पुत्र शुकदेवजीके साथ वेदोंका स्वाध्याय करते रहें ॥ २१ ॥
भीष्म उवाच
नारदस्य वचः श्रुत्वा व्यासः परमधर्मवित् ।
तथेत्युवाच संहृष्टो वेदाभ्यासदृढव्रतः ॥ २२ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! नारदजीकी बात सुनकर परम धर्मज्ञ व्यासजीने ' बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और हर्षमें भरकर वे वेदाभ्यासरूपी व्रतका दृढ़तापूर्वक पालन करने लगे ॥
शुकेन सह पुत्रेण वेदाभ्यासमथाकरोत् ।
स्वरेणोच्चैः स शैक्ष्येण लोकानापूरयन्निव ॥ २३ ॥
उन्होंने अपने पुत्र शुकदेवके साथ शिक्षाके नियमानुसार उच्चस्वरसे तीनों लोकोंको परिपूर्ण करते हुए- से वेदोंकी आवृत्ति आरम्भ कर दी ॥ २३ ॥
तयोरभ्यसतोरेव नानाधर्मप्रवादिनोः ।
वातोऽतिमात्रं प्रववौ समुद्रानिलवेजितः ॥ २४ ॥
नाना प्रकारके धर्मोंका प्रतिपादन करनेवाले वे पिता- पुत्र उक्त रूपसे वेदोंका अभ्यास कर ही रहे थे कि समुद्री हवासे प्रेरित होकर बड़े जोरकी आँधी चलने लगी ॥ २४ ॥
ततोऽनध्याय इति तं व्यासः पुत्रमवारयत् ।
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शुको वारितमात्रस्तु कौतूहलसमन्वितः ॥ २५ ॥
तब अनध्याय- काल बताकर व्यासजीने अपने पुत्रको वेद पढ़नेसे उस समय रोक दिया। उनके मना करनेपर शुकदेवजीके मनमें इसका कारण जाननेके लिये प्रबल उत्कण्ठा हुई ॥ २५ ॥
अपृच्छत् पितरं ब्रह्मन् कुतो वायुरभूदयम् ।
आख्यातुमर्हति भवान् वायोः सर्वं विचेष्टितम् ॥ २६ ॥
उन्होंने अपने पितासे पूछा — ' ब्रह्मन्! इस वायुकी उत्पत्ति किससे हुई है? आप वायुकी सारी चेष्टाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन करें ' ॥ २६ ॥
शुकस्यैतद् वचः श्रुत्वा व्यासः परमविस्मितः ।
अनध्यायनिमित्तेऽस्मिन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ २७ ॥
शुकदेवजीका यह वचन सुनकर व्यासजी अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठे और अनध्यायके कारणपर प्रकाश डालते हुए इस प्रकार बोले- ॥ २७ ॥
दिव्यं ते चक्षुरुत्पन्नं स्वयं ते निर्मलं मनः ।
तमसा रजसा चापि त्यक्तः सत्त्वे व्यवस्थितः ॥ २८ ॥
' बेटा! तुम्हें स्वयं ही दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गयी है । तुम्हारा हृदय अत्यन्त निर्मल है । तुम रजोगुण और तमोगुणसे रहित होकर सत्त्वगुणमें प्रतिष्ठित हो ॥ २८ ॥
आदर्श स्वामिव च्छायां पश्यस्यात्मानमात्मना ।
व्यस्यात्मनि स्वयं वेदान् बुद्धया समनुचिन्तय ॥ २ ९ ॥
‘ जैसे लोग दर्पणमें अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं, उसी प्रकार तुम बुद्धिके द्वारा आत्माका साक्षात्कार करते हो; अतः स्वयं ही वेदोंको अपने भीतर स्थापित करके बुद्धिद्वारा अनध्यायके कारणभूत वायुके विषयमें विचार करो ॥ २ ९ ॥
देवयानचरो विष्णोः पितृयाणश्च तामसः ।
द्वावेतौ प्रेत्य पन्थानौ दिवं चाधश्च गच्छतः ॥ ३० ॥
‘ मरकर ऊपरके लोकोंमें जानेवाले और नीचेके लोकोंमें जानेवाले मनुष्योंके लिये दो मार्ग हैं, एक तो देवयान जो कि विष्णुलोकका मार्ग है, अतः सात्त्विक है, दूसरा पितृयान जो कि तामस है ॥ ३० ॥
पृथिव्यामन्तरिक्षे च यत्र संवान्ति वायवः ।
सप्तैते वायुमार्गा वै तान् निबोधानुपूर्वशः ॥ ३१ ॥
' पृथ्वीपर या आकाशमें जहाँ भी हवा चलती है, उसके बहनेके लिये सात मार्ग हैं । तुम क्रमशः उनका वर्णन सुनो ॥ ३१ ॥
तत्र देवगणाः साध्या महाभूता महाबलाः ।
तेषामप्यभवत् पुत्रः समानो नाम दुर्जयः ॥ ३२ ॥
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‘ पृथ्वी और आकाशमें जो महाबली और महान् भूत- स्वरूप साध्य नामक देवगण अदृश्यभावसे रहते हैं, उनके दुर्जय पुत्रका नाम है समान ॥ ३२ ॥
उदानस्तस्य पुत्रोऽभूद् व्यानस्तस्याभवत् सुतः ।
अपानश्च ततो ज्ञेयः प्राणश्चापि ततोऽपरः ॥ ३३ ॥
'समानका पुत्र है उदान, उदानका पुत्र है व्यान, उसके पुत्रका नाम अपान जानना चाहिये और अपानसे प्राणकी उत्पत्ति हुई है ॥ ३३ ॥
अनपत्योऽभवत् प्राणो दुर्धर्षः शत्रुतापनः ।
पृथक् कर्माणि तेषां ते प्रवक्ष्यामि यथातथम् ॥ ३४ ॥
‘ प्राणके कोई संतान नहीं हुई । वह शत्रुओंको संताप देनेवाला और दुर्जय है । उन सबके कर्म पृथक् - पृथक् हैं, जिनका मैं तुमसे यथावत्रूपसे वर्णन करता हूँ ॥ ३४ ॥
प्राणिनां सर्वतो वायुश्चेष्टां वर्तयते पृथक् ।
प्राणनाच्चैव भूतानां प्राण इत्यभिधीयते ॥ ३५ ॥
' वायुदेव प्राणियोंकी पृथक् - पृथक् समस्त चेष्टाओंका सम्पादन करते हैं तथा सम्पूर्ण भूतोंको अनुप्राणित ( जीवित ) रखते हैं, इसलिये ' प्राण ' कहलाते हैं ॥ ३५ ॥
प्रेरयत्यभ्रसंघातान् धूमजांश्चोष्मजांश्च यः ।
प्रथमः प्रथमे मार्गे प्रवहो नाम योऽनिलः ॥ ३६ ॥
‘ जो धूम तथा गर्मीसे उत्पन्न बादलों और ओलोंको इधरसे उधर ले जाता है, वह प्रथम मार्गमें प्रवाहित होनेवाला ' प्रवह' नामक प्रथम वायु है ॥ ३६ ॥
अम्बरे स्नेहमभ्येत्य विद्युद्भ्यश्च महाद्युतिः ।
आवो नाम संवाति द्वितीयः श्वसनो नदन् ॥ ३७ ॥
‘ जो आकाशमें रसकी मात्राओं और बिजली आदिकी उत्पत्तिके लिये प्रकट होता है, वह महान् तेजसे सम्पन्न द्वितीय वायु ' आवह' नामसे प्रसिद्ध है । वह बड़ी भारी आवाजके साथ बहता है ॥ ३७ ॥
उदयं ज्योतिषां शश्वत् सोमादीनां करोति यः ।
अन्तर्देहेषु चोदानं यं वदन्ति मनीषिणः ॥ ३८ ॥
यश्चतुर्भ्यः समुद्रेभ्यो वायुर्धारयते जलम् ।
उद्धृत्याददते चापो जीमूतेभ्योऽम्बरेऽनिलः ॥ ३ ९ ॥
योऽद्भिः संयोज्य जीमूतान् पर्जन्याय प्रयच्छति ।
उद्वहो नाम बंहिष्ठस्तृतीयः स सदागतिः ॥ ४० ॥
' जो सदा सोम, सूर्य आदि ग्रहोंका उदय एवं उद्भव करता है, मनीषी पुरुष शरीरके भीतर जिसे ‘ उदान ’ कहते हैं, जो चारों समुद्रोंसे जलको ऊपर उठाकर जीमूत नामक मेघोंमें स्थापित करता है तथा जीमूत नामक मेघोंको जलसे संयुक्त करके उन्हें पर्जन्यके
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हवाले कर देता है, वह महान् वायु 'उद्वह ' कहलाता है, जो तृतीय मार्गपर चलनेके कारण तीसरा कहा गया है ॥ ३८-४० ॥
समूह्यमाना बहुधा येन नीताः पृथग् घनाः ।
वर्षमोक्षकृतारम्भास्ते भवन्ति घनाघनाः ॥ ४१ ॥
संहता येन चाविद्धा भवन्ति नदतां नदाः ।
रक्षणार्थाय सम्भूता मेघत्वमुपयान्ति च ॥ ४२ ॥
योऽसौ वहति भूतानां विमानानि विहायसा ।
चतुर्थः संवहो नाम वायुः स गिरिमर्दनः ॥ ४३ ॥
‘ जिसके द्वारा इधर- उधर ले जाये गये अनेक प्रकारके महामेघ घटा बाँधकर जल बरसाना आरम्भ करते हैं, घटाके रूपमें घनीभूत होनेपर भी जिसकी प्रेरणासे सारे बादल फट जाते हैं, फिर वे वेणुनादके समान शब्द करनेके कारण ' नद ' कहलाते हैं तथा प्राणियोंकी रक्षाके लिये पुनः जलका संग्रह करके घनीभूत हो जाते हैं, जो वायु देवताओंके आकाशमार्गसे जानेवाले विमानोंको स्वयं ही वहन करता है, वह पर्वतोंका मान मर्दन करनेवाला चतुर्थ वायु ' संवह ' नामसे प्रसिद्ध है ॥ ४१–४३ ॥
येन वेगवता रुग्णा रूक्षेण रुवता नगान् ।
वायुना सहिता मेघास्ते भवन्ति बलाहकाः ॥ ४४ ॥
दारुणोत्पातसंचारो नभसः स्तनयित्नुमान् ।
पञ्चमः स महावेगो विवहो नाम मारुतः ॥ ४५ ॥
‘ जो रुक्षभावसे वेगपूर्वक महान् शब्दके साथ बहकर बड़े - बड़े वृक्षोंको तोड़ देता और उखाड़ फेंकता है तथा जिसके द्वारा संगठित हुए प्रलयकालीन मेघ ' बलाहक ’ संज्ञा धारण करते हैं, जिस वायुका संचरण भयानक उत्पात लानेवाला होता है तथा जो आकाशसे अपने साथ मेघोंकी घटाएँ लिये चलता है, उस अत्यन्त वेगशाली पंचम वायुको ‘ विवह ' नाम दिया गया है ॥ ४४-४५ ॥
यस्मिन् पारिप्लवा दिव्या वहन्त्यापो विहायसा ।
पुण्यं चाकाशगङ्गायास्तोयं विष्टभ्य तिष्ठति ॥ ४६ ॥
दूरात् प्रतिहतो यस्मिन्नेकरश्मिर्दिवाकरः ।
योनिरंशुसहस्रस्य येन भाति वसुन्धरा ॥ ४७ ॥
यस्मादाप्यायते सोमो निधिर्दिव्योऽमृतस्य च ।
षष्ठः परिवहो नाम स वायुर्जयतां वरः ॥ ४८ ॥
' जिस वायुके आधारपर आकाशमें दिव्य जल ऊपर- ही ऊपर प्रवाहित होते हैं, जो आकाशगंगाके पवित्र जलको धारण करके स्थित है और जिसके द्वारा दूरसे ही प्रतिहत होकर सहस्रों किरणोंके उत्पत्तिस्थान सूर्यदेव, जिनसे यह पृथ्वी प्रकाशित होती है, एक ही
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किरणसे युक्त जान पड़ते हैं तथा जिससे अमृतकी दिव्य निधि चन्द्रमाका भी पोषण होता है, वह विजयशीलोंमें श्रेष्ठ छठा वायुतत्त्व ' परिवह' नामसे प्रसिद्ध है ॥ ४६–४८ ॥
सर्वप्राणभृतां प्राणान् योऽन्तकाले निरस्यति ।
यस्य वर्त्मानुवर्तेते मृत्युवैवस्वतावुभौ ॥ ४ ९ ॥
सम्यगन्वीक्षतां बुद्धया शान्तयाध्यात्मनित्यया ।
ध्यानाभ्यासाभिरामाणां योऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ५० ॥
यं समासाद्य वेगेन दिशोऽन्तं प्रतिपेदिरे ।
दक्षस्य दशपुत्राणां सहस्राणि प्रजापतेः ॥ ५१ ॥
येन स्पृष्टः पराभूतो यात्येव न निवर्तते ।
परावहो नाम परो वायुः स दुरतिक्रमः ॥ ५२ ॥
'जो वायु अन्तकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राणोंको शरीरसे निकालता है, जिसके इस प्राणनिष्कासनरूप मार्गका मृत्यु तथा वैवस्वत यम अनुगमनमात्र करते हैं, सदा अध्यात्मचिन्तनमें लगी हुई शान्त बुद्धिके द्वारा भलीभाँति अनुसंधान करनेवाले तथा ध्यानके अभ्यासमें ही सानन्द रत रहनेवाले पुरुषोंको जो अमृतत्व देनेमें समर्थ है, जिसमें स्थित होकर प्रजापति दक्षके दस हजार पुत्र सम्पूर्ण दिशाओंके अन्तमें पहुँच गये तथा जिससे स्पर्शित होकर विलीन हुआ प्राणी यहाँसे केवल जाता है वापस नहीं लौटता, उस सर्वश्रेष्ठ सप्तम वायुका नाम ' परावह ' है । उसका अतिक्रमण करना सभीके लिये सर्वथा कठिन है ॥ ४ ९ –५२ ॥
एवमेते दितेः पुत्रा मारुताः परमाद्भुताः ।
अनारतं ते संवान्ति सर्वगाः सर्वधारिणः ॥ ५३ ॥
‘ इस प्रकार ये सात मरुद्गण दितिके अत्यन्त अद्भुत पुत्र हैं । इनकी सर्वत्र गति है । ये निरन्तर बहते और सबको धारण करते हैं ॥ ५३ ॥
एतत् तु महदाश्चर्यं यदयं पर्वतोत्तमः ।
कम्पितः सहसा तेन वायुनातिप्रवायता ॥ ५४ ॥
' यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि अत्यन्त वेगसे बहते हुए उस वायुके द्वारा यह पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमालय भी सहसा काँप उठा है ॥ ५४ ॥
विष्णोर्निःश्वासवातोऽयं यदा वेगसमीरितः ।
सहसोदीर्यते तात जगत् प्रव्यथते तदा ॥ ५५ ॥
‘ तात! यह भगवान् विष्णुका निःश्वास है । जब कभी सहसा वह निःश्वास वेगसे निकल पड़ता है, उस समय यह सारा जगत् व्यथित हो उठता है ॥ ५५ ॥
तस्माद् ब्रह्मविदो वेदान् नाधीयन्तेऽतिवायति ।
वायोर्वायुभयं ह्युक्तं ब्रह्म तत्पीडितं भवेत् ॥ ५६ ॥
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‘ इसलिये ब्रह्मवेत्ता पुरुष प्रचण्ड वायु ( आँधी ) चलनेपर वेदका पाठ नहीं करते हैं । वेद भी भगवान्का निःश्वास ही है। उस समय वेदपाठ करनेपर वायुको वायुसे भय प्राप्त होता है और उस वेदको भी पीड़ा होती है ' ॥ ५६ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं पराशरसुतः प्रभुः ।
उक्त्वा पुत्रमधीष्वेति व्योमगङ्गामगात् तदा ॥ ५७ ॥
अनध्यायके विषयमें यह बात कहकर पराशरनन्दन भगवान् व्यास अपने पुत्र शुकदेवसे बोले –'अब तुम वेदपाठ करो। ' यों कहकर वे आकाशगंगाके तटपर चल गये ॥ ५७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अनध्यायनिमित्तकथनं नामाष्टाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२८ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अनध्यायके कारणका कथन नामक तीन सौ अट्ठाईसवाँअध्याय पूराहुआ ॥ ३२८ ॥
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एकोनत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश भीष्म उवाच
एतस्मिन्नन्तरे शून्ये नारदः समुपागमत् ।
शुकं स्वाध्यायनिरतं वेदार्थान् वक्तुमीप्सितान् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! व्यासजीके चले जानेके बाद उस सूने आश्रममें स्वाध्यायपरायण शुकदेवसे अपना इच्छित वेदोंका अर्थ कहनेके लिये देवर्षि नारदजी पधारे ॥ १ ॥
देवर्षि तु शुको दृष्ट्वा नारदं समुपस्थितम् ।
अर्घ्यपूर्वेण विधिना वेदोक्तेनाभ्यपूजयत् ॥ २ ॥
देवर्षि नारदको उपस्थित देख शुकदेवने वेदोक्त विधिसे अर्घ्य आदि निवेदन करके उनका पूजन किया ॥ २ ॥
नारदोथाब्रवीत् प्रीतो ब्रूहि धर्मभृतां वर ।
केन त्वां श्रेयसा वत्स योजयामीति हृष्टवत् ॥ ३ ॥
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शुकदेवजीको नारदजीका उपदेश