श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2181–2190
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2181–2190
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परमात्मभावको नहीं प्राप्त होता है ॥ ४७ ॥
नास्ति ते सुखदुःखेषु विशेषो नासि लोलुपः ।
नौत्सुक्यं नृत्यगीतेषु न राग उपजायते ॥ ४८ ॥
आप सुख- दुःखमें कोई अन्तर नहीं समझते । आपके मनमें लोभ नहीं है । आपको न तो नाच देखनेकी उत्कण्ठा होती है और न गीत सुननेकी । किसी विषय के प्रति आपके मनमें रण नहीं उत्पन्न होता है ॥ ४८ ॥
न बन्धुष्वनुबन्धस्ते न भयेष्वस्ति ते भयम् ।
पश्यामि त्वां महाभाग तुल्यलोष्टाश्मकाञ्चनम् ॥ ४ ९ ॥
महाभाग! न तो भाई- बन्धुओंमें आपकी आसक्ति है, न भयदायक पदार्थोंसे आपको भय ही होता है । मैं देखता हूँ, आपके लिये मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्ण एक- से हैं ॥ ४ ९ ॥
अहं त्वामनुपश्यामि ये चाप्यन्ये मनीषिणः ।
आस्थितं परमं मार्गमक्षयं तमनामयम् ॥ ५० ॥
मैं तथा दूसरे मनीषी पुरुष भी आपको अक्षय एवं अनामय परम मार्ग ( मोक्ष ) में स्थित मानते हैं ॥ ५० ॥
यत् फलं ब्राह्मणस्येह मोक्षार्थश्च यदात्मकः ।
तस्मिन् वै वर्तसे ब्रह्मन् किमन्यत् परिपृच्छसि ॥ ५१ ॥
ब्रह्मन्! इस जगत्में ब्राह्मण होनेका जो फल है और मोक्षका जो स्वरूप है, उसीमें आपकी स्थिति है । अब और क्या पूछना चाहते हैं? ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकोत्पत्तौ षड्विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकोत्पत्तिविषयक तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२६ ॥
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सप्तविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः शुकदेवजीका पिताके पास लौट आना तथा व्यासजीका अपने शिष्योंको स्वाध्यायकी विधि बताना भीष्म उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं कृतात्मा कृतनिश्चयः ।
आत्मनाऽऽत्मानमास्थाय दृष्ट् चात्मानमात्मना ॥ १ ॥
कृतकार्यः सुखी शान्तस्तूष्णीं प्रायादुदङ्मुखः ।
शैशिरं गिरिमुद्दिश्य सधर्मा मातरिश्वनः ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! राजा जनककी यह बात सुनकर विशुद्ध अन्तःकरणवाले शुकदेवजी एक दृढ़ निश्चयपर पहुँच गये और बुद्धिके द्वारा आत्मामें स्थित होकर स्वयं अपने आत्मस्वरूपका साक्षात्कार करके कृतार्थ हो गये । एवं आनन्दमग्न हो, बड़ी शान्तिका अनुभव करते हुए हिमालयपर्वतको लक्ष्य करके वायुके समान वेगसे चुपचाप उत्तर दिशाकी ओर चल दिये ॥ १-२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु देवर्षिर्नारदस्तथा ।
हिमवन्तमियाद् द्रष्टुं सिद्धचारणसेवितम् ॥ ३ ॥
इसी समय देवर्षि नारद सिद्धों और चारणोंसे सेवित हिमालय पर्वतपर उसका दर्शन करनेके लिये आये ॥ ३ ॥
तमप्सरोगणाकीर्ण शान्तस्वननिनादितम् ।
किन्नराणां सहस्रैश्च भृङ्गजैस्तथैव च ॥ ४ ॥
मद्गुभिः खञ्जरीटैश्च विचित्रैर्जीवजीवकैः ॥ ५ ॥
चित्रवर्णैर्मयूरैश्च केकाशतविराजितैः ।
राजहंससमूहैश्च कृष्णैः परभृतैस्तथा ॥ ६ ॥
उस पर्वतपर सब ओर अप्सराएँ विचर रही थीं । चारों ओर विविध प्राणियोंकी शान्तिमयी ध्वनिसे वहाँका सारा प्रान्त व्याप्त हो रहा था । सहस्रों किन्नर, भ्रमर, मद्गु, मयूर,,,विचित्र खंजरीट चकोर सैकड़ों मधुर वाणीसे सुशोभित विचित्र वर्णवाले राजहंसोंके समुदाय तथा काले कोकिल वहाँ अपनी शान्त मधुर ध्वनि फैला रहे थे ॥ ४-६ ॥
पक्षिराजो गरुत्मांश्च यं नित्यमधितिष्ठति ।
चत्वारो लोकपालाश्च देवाः सर्षिगणास्तथा ॥ ७ ॥
तत्र नित्यं समायान्ति लोकस्य हितकाम्यया ।
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पक्षिराज गरुड उस पर्वतपर नित्य विराजमान होते हैं । चारों लोकपाल, देवता तथा ऋषिगण सम्पूर्ण जगत्के हितकी कामनासे वहाँ सदा आते रहते हैं ॥ ७३ ॥
विष्णुना यत्र पुत्रार्थे तपस्तप्तं महात्मना ॥ ८ ॥
तत्रैव च कुमारेण बाल्ये क्षिप्ता दिवौकसः ।
शक्तिर्न्यस्ता क्षितितले त्रैलोक्यमवमन्य वै ॥ ९ ॥
वहीं महात्मा श्रीविष्णु ( श्रीकृष्ण) ने पुत्रके लिये तप किया था । वहीं कुमार कार्तिकेयने बाल्यावस्थामें देवताओंपर आक्षेप किया था और त्रिलोकीका अपमान करके पृथ्वीमें अपनी शक्ति गाड़ दी थी ॥ ८ - ९ ॥
तत्रोवाच जगत् स्कन्दः क्षिपन् वाक्यमिदं तदा ।
योऽन्योऽस्ति मत्तोऽभ्यधिको विप्रा यस्याधिकं प्रियाः ॥ १० ॥
यो ब्रह्मण्यो द्वितीयोऽस्ति त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ।
सोऽभ्युद्धरत् त्विमां शक्तिमथवा कम्पयत्विति ॥ ११ ॥
उस समय वहाँ स्कन्दने सम्पूर्ण जगत्पर आक्षेप करते हुए यह बात कही थी- ' जो कोई भी दूसरा पुरुष मुझसे अधिक बलवान् हो, जिसे ब्राह्मण अधिक प्रिय हों, जो दूसरा व्यक्ति मुझसे भी अधिक ब्राह्मणभक्त तथा तीनों लोकोंमें पराक्रमशाली हो, वह इस शक्तिको उखाड़ दे अथवा हिला दे ' ॥ १०-११ ॥
तच्छ्रुत्वा व्यथिता लोकाः क इमामुद्धरेदिति ।
अथ देवगणं सर्वं सम्भ्रान्तेन्द्रियमानसम् ॥ १२ ॥
अपश्यद् भगवान् विष्णुः क्षिप्तं सासुरराक्षसम् ।
किं त्वत्र सुकृतं कार्यं भवेदिति विचिन्तयन् ॥ १३ ॥
उनकी यह तिरस्कारपूर्ण घोषणा सुनकर सब लोग व्यथित हो उठे और मन - ही- मन सोचने लगे, ‘ भला, कौन वीर इस शक्तिको उखाड़ सकता है? ' उस समय भगवान् विष्णुने देखा कि सम्पूर्ण देवताओंकी इन्द्रियाँ और चित्त भयसे व्याकुल हैं तथा असुर और राक्षसों-सहित सम्पूर्ण जगत्पर स्कन्दद्वारा आक्षेप किया गया है । यह देखकर वे सोचने लगे कि यहाँ क्या करना अच्छा होगा? ॥ १२-१३ ॥
अनामृष्य ततः क्षेपमवैक्षत च पावकिम् ।
सम्प्रगृह्य विशुद्धात्मा शक्तिं प्रज्वलितां तदा ॥ १४ ॥
कम्पयामास सव्येन पाणिना पुरुषोत्तमः । तब उस आक्षेपको सहन न करके विशुद्धात्मा भगवान् विष्णुने अग्निकुमार स्कन्दकी ओर देखा । फिर उन पुरुषोत्तमने उस समय उस प्रज्वलित शक्तिको बायें हाथसे पकड़कर हिला दिया ॥ १४ ॥
शक्त्यां तु कम्प्यमानायां विष्णुना बलिना तदा ॥ १५ ॥
मेदिनी कम्पिता सर्वा सशैलवनकानना ।
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बलवान् भगवान् विष्णुके द्वारा उस शक्तिके कम्पित किये जानेपर पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी ॥ १५३ ॥
शक्तेनापि समुद्धर्तुं कम्पिता साभवत् तदा ॥ १६ ॥
रक्षिता स्कन्दराजस्य धर्षणा प्रभविष्णुना । यद्यपि प्रभावशाली भगवान् विष्णु उसे उखाड़ फेंकनेमें समर्थ थे तो भी उन्होंने कुमार
स्कन्दका तिरस्कार नहीं होने दिया । उन्हें अपमानसे बचा लिया ॥ १६३ ॥
तां कम्पयित्वा भगवान् प्रह्लादमिदमब्रवीत् ॥ १७ ॥
पश्य वीर्यं कुमारस्य नैतदन्यः करिष्यति । उस शक्तिको हिलाकर भगवान्ने प्रह्लादसे कहा- ' देखो, कुमारमें कितना बल है? यह कार्य दूसरा कोई नहीं कर सकेगा' ॥ १७३ ॥
सोऽमृष्यमाणस्तद्वाक्यं समुद्धरणनिश्चितः ॥ १८ ॥
जग्राह तां तदा शक्तिं न चैनां स व्यकम्पयत् । भगवान्के इस कथनको सहन न कर सकनेके कारण प्रह्लादने स्वयं ही उस शक्तिको उखाड़ फेंकनेका दृढ़ निश्चय कर लिया और उस शक्तिको पकड़कर खींचा; परंतु वे उसे हिला भी न सके ॥ १८३ ॥
नादं महान्तं मुक्त्वा स मूर्च्छितो गिरिमूर्धनि ॥ १ ९ ॥ विह्वलः प्रापतद् भूमौ हिरण्यकशिपोः सुतः । हिरण्यकशिपुकुमार प्रह्लाद बड़े जोरसे चिग्घाड़कर मूर्च्छित एवं व्याकुल हो उस पर्वतशिखरकी भूमिपर गिर पड़े ॥ १ ९ ॥ तत्रोत्तरां दिशं गत्वा शैलराजस्य पार्श्वतः ॥ २० ॥
तपोऽतप्यत दुर्धर्षं तात नित्यं वृषध्वजः । तात! उसी गिरिराज हिमालयके पार्श्वभागमें उत्तर दिशाकी ओर जाकर भगवान् वृषध्वज शिवने नित्य- निरन्तर दुर्धर्ष तपस्या की है ॥ २०६३ ॥
पावकेन परिक्षिप्तं दीप्यता यस्य चाश्रमम् ॥ २१ ॥
आदित्यपर्वतं नाम दुर्धर्षमकृतात्मभिः ।
न तत्र शक्यते गन्तुं यक्षराक्षसदानवैः ॥ २२ ॥
भगवान् शंकरके उस आश्रमको प्रज्वलित अग्निने चारों ओरसे घेर रक्खा है । उस पर्वतशिखरका नाम आदित्यगिरि है, जिसपर अजितात्मा पुरुष नहीं चढ़ सकते । यक्ष, राक्षस और दानवोंके लिये वहाँ पहुँचना सर्वथा असम्भव है ॥ २१-२२ ॥
दशयोजनविस्तारमग्निज्वालासमावृतम् ।
भगवान् पावकस्तत्र स्वयं तिष्ठति वीर्यवान् ॥ २३ ॥
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वह दस योजन विस्तृत शिखर आगकी लपटोंसे घिरा हुआ है । शक्तिशाली भगवान् अग्निदेव वहाँ स्वयं विराजमान हैं ॥ २३ ॥
सर्वान् विघ्नान् प्रशमयन् महादेवस्य धीमतः ।
दिव्यं वर्षसहस्रं हि पादेनैकेन तिष्ठतः ॥ २४ ॥
देवान् संतापर्यस्तत्र महादेवो महाव्रतः । परम बुद्धिमान् महादेवजी सहस्र दिव्य वर्षोंतक वहाँ एक पैरसे खड़े रहे और उनकी तपस्याके सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करते हुए अग्निदेव वहीं विराजमान थे । महान् व्रतधारी महादेवजी वहाँ देवताओंको संतप्त करते हुए महान् तपमें प्रवृत्त थे ॥ २४ ॥
ऐन्द्रीं तु दिशमास्थाय शैलराजस्य धीमतः ॥ २५ ॥
विविक्ते पर्वततटे पाराशर्यो महातपाः ।
वेदानध्यापयामास व्यासः शिष्यान् महामतिः ॥ २६ ॥
सुमन्तुं च महाभागं वैशम्पायनमेव च ।
जैमिनिं च महाप्राज्ञं पैलं चापि तपस्विनम् ॥ २७ ॥
उसी बुद्धिमान् गिरिराज हिमवान्की पूर्व दिशाका आश्रय लेकर पर्वतके एकान्त तटप्रान्तमें महातपस्वी महाबुद्धिमान् पराशरनन्दन व्यास अपने शिष्य महाभाग सुमन्तु, महाबुद्धिमान् जैमिनि, तपस्वी पैल तथा वैशम्पायन-इन चार शिष्योंको वेद पढ़ा रहे थे ॥ २५-२७ ॥
यत्र शिष्यैः परिवृतौ व्यास आस्ते महातपाः ।
तत्राश्रमपदं रम्यं ददर्श पितुरुत्तमम् ॥ २८ ॥
जहाँ महातपस्वी व्यास अपने शिष्योंसे घिरे हुए बैठे थे, वहाँ शुकदेवजीने अपने पिताके उस रमणीय एवं उत्तम आश्रमको देखा ॥ २८ ॥
आरणेयो विशुद्धात्मा नभसीव दिवाकरः ।
अथ व्यासः परिक्षिप्तं ज्वलन्तमिव पावकम् ॥ २ ९ ॥
ददृशे सुतमायान्तं दिवाकरसमप्रभम् । उस समय विशुद्ध अन्तःकरणवाले अरणीनन्दन शुकदेव आकाशमें स्थित सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे, इतनेहीमें व्यासजीने भी प्रज्वलित अग्नि तथा सूर्यके समान तेजस्वी पुत्रको सब ओर अपनी प्रभा बिखेरते हुए आते देखा ॥ २ ९ ॥
असज्जमानं वृक्षेषु शैलेषु विषयेषु च ।
योगयुक्तं महात्मानं यथा बाणं गुणच्युतम् ॥ ३० ॥
योगयुक्त महात्मा शुकदेव धनुषकी डोरीसे छूटे हुए बाणके समान तीव्र गतिसे आ रहे थे । वे वृक्षों और पर्वतोंमें कहीं भी अटक नहीं पाते थे ॥ ३० ॥
सोऽभिगम्य पितुः पादावगृह्णादरणीसुतः ।
यथोपजोषं तैश्चापि समागच्छन्महामुनिः ॥ ३१ ॥
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निकट आकर अरणीपुत्र महामुनि शुकदेवने पिताके दोनों पैर पकड़ लिये और शान्तभावसे उनके अन्य सब शिष्योंके साथ भी मिले ॥ ३१ ॥
ततो निवेदयामास पित्रे सर्वमशेषतः ।
शुको जनकराजेन संवादं प्रीतमानसः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर प्रसन्नचित्त हुए शुकने राजा जनकके साथ जो वार्तालाप हुआ था, वह सारा-का- सारा वृत्तान्त अपने पितासे कह सुनाया ॥ ३२ ॥
एवमध्यापयन् शिष्यान् व्यासः पुत्रं च वीर्यवान् ।
उवास हिमवत्पृष्ठे पाराशर्यो महामुनिः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार शक्तिशाली महामुनि पराशरनन्दन व्यास अपने शिष्यों और पुत्रको पढ़ाते हुए हिमालयके शिखरपर ही रहने लगे ॥ ३३ ॥
ततः कदाचिच्छिष्यास्तं परिवार्यावतस्थिरे ।
वेदाध्ययनसम्पन्नाः शान्तात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ ३४ ॥
वेदेषु निष्ठां सम्प्राप्य साङ्गेष्वपि तपस्विनः ।
अथोचुस्ते तदा व्यासं शिष्याः प्राञ्जलयो गुरुम् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर किसी समय वेदाध्ययनसे सम्पन्न, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, सांगवेदमें पारंगत और तपस्वी शिष्यगण गुरुवर व्यासजीको चारों ओरसे घेरकर बैठ गये और उनसे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले ॥ ३४-३५ ॥ शिष्या ऊचुः
महता तेजसा युक्ता यशसा चापि वर्धिताः ।
एकं त्विदानीमिच्छामो गुरुणाग्रहं कृतम् ॥ ३६ ॥
शिष्योंने कहा- गुरुदेव! हम आपकी कृपासे महान् तेजस्वी हो गये हैं । हमारा यश भी चारों ओर बढ़ गया है । अब इस समय हम यह चाहते हैं कि आप एक बार और हमलोगोंपर अनुग्रह करें ॥ ३६ ॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्रह्मर्षिस्तानुवाच ह ।
उच्यतामिति तद् वत्सा यद् वः कार्यं प्रियं मया ॥ ३७ ॥
शिष्योंकी यह बात सुनकर ब्रह्मर्षि व्यासने उनसे कहा- ' बच्चो! कहो, क्या चाहते हो? मुझे तुम्हारा कौन -सा प्रिय कार्य करना है? ' ॥ ३७ ॥
एतद् वाक्यं गुरोः श्रुत्वा शिष्यास्ते हृष्टमानसाः ।
पुनः प्राञ्जलयो भूत्वा प्रणम्य शिरसा गुरुम् ॥ ३८ ॥
ऊचुस्ते सहिता राजन्निदं वचनमुत्तमम् ।
यदि प्रीत उपाध्यायो धन्याः स्मो मुनिसत्तम ॥ ३ ९ ॥
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गुरुदेवका यह वचन सुनकर उन शिष्योंका हृदय हर्षसे खिल उठा । राजन्! वे पुनः हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर गुरुजीको प्रणाम करके एक साथ यह उत्तम वचन बोले— ' मुनिश्रेष्ठ!
आप हमारे उपाध्याय हैं । यदि आप प्रसन्न हैं तो हम धन्य हो गये ॥ ३८-३९ ॥
कांक्षामस्तु वयं सर्वे वरं दातुं महर्षिणा ।
षष्ठः शिष्यो न ते ख्यातिं गच्छेदत्र प्रसीद नः ॥ ४० ॥
' हम सब लोग यह चाहते हैं कि महर्षि एक वरदान दें, वह यह कि आपका कोई छठा
शिष्य प्रसिद्ध न हो । यहाँ हमलोगोंपर इतनी ही कृपा कीजिये ॥ ४० ॥
चत्वारस्ते वयं शिष्या गुरुपुत्रश्च पञ्चमः ।
इह वेदाः प्रतिष्ठेरन्नेष नः कांक्षितो वरः ॥ ४१ ॥
' हम चार आपके शिष्य हैं और पंचम शिष्य गुरुपुत्र शुकदेव हैं । इन पाँचोंमें ही आपके पढ़ाये हुए सम्पूर्ण वेद प्रतिष्ठित हों; यही हमारे लिये मनोवाञ्छित वर है, ॥ ४१ ॥
शिष्याणां वचनं श्रुत्वा व्यासो वेदार्थतत्त्ववित् ।
पराशरात्मजो धीमान् परलोकार्थचिन्तकः ॥ ४२ ॥
उवाच शिष्यान् धर्मात्मा धर्म्यं नैःश्रेयसं वचः । शिष्योंकी यह बात सुनकर वेदार्थके तत्त्वज्ञ, पारलौकिक अर्थका चिन्तन करनेवाले, धर्मात्मा, पराशरनन्दन बुद्धिमान् व्यासजीने अपने समस्त शिष्योंसे यह धर्मानुकूल कल्याणकारी वचन कहा – ॥ ४२१३ ॥
ब्राह्मणाय सदा देयं ब्रह्म शुश्रूषवे तथा ॥ ४३ ॥
ब्रह्मलोके निवासं यो ध्रुवं समभिकाङ्क्षते । ‘ शिष्यगण! जो ब्रह्मलोकमें अटल निवास चाहता हो, उसका कर्तव्य है कि वह पढ़नेकी इच्छासे आये हुए ब्राह्मणको सदा ही वेद पढ़ावे ॥ ४३ ॥
भवन्तो बहुलाः सन्तु वेदो विस्तार्यतामयम् ॥ ४४ ॥
नाशिष्ये सम्प्रदातव्यो नाव्रते नाकृतात्मनि । 'तुमलोग बहुसंख्यक हो जाओ और इस वेदका विस्तार करो । जिसका मन वशमें न हो, जो ब्रह्मचर्य- व्रतका पालन न करता हो तथा जो शिष्यभावसे पढ़ने न आया हो, उसे वेदाध्ययन नहीं कराना चाहये ॥ ४४ ॥
एते शिष्यगुणाः सर्वे विज्ञातव्या यथार्थतः ॥ ४५ ॥
नापरीक्षितचारित्रे विद्या देया कथंचन । ' ये सभी शिष्यके गुण हैं । किसीको शिष्य बनानेसे पहले उसके इन गुणोंको यथार्थरूपसे परख लेना चाहिये । जिसके सदाचारकी परीक्षा न ली गयी हो, उसे किसी प्रकार विद्यादान नहीं देना चाहिये ॥ ४५३ ॥
यथा हि कनकं शुद्धं तापच्छेदनिकर्षणैः ॥ ४६ ॥
परीक्षेत तथा शिष्यानीक्षेत् कुलगुणादिभिः ।
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‘ जैसे आगमें तपाने, काटने और कसौटीपर कसनेसे शुद्ध सोनेकी परख की जाती है, उसी प्रकार कुल और गुण आदिके द्वारा शिष्योंकी परीक्षा करनी चाहिये ॥ न नियोज्याश्च वः शिष्या अनियोगे महाभये ॥ ४७ ॥
यथामति यथापाठं तथा विद्या फलिष्यति ।
सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु ॥ ४८ ॥
' तुमलोग अपने शिष्योंको किसी अनुचित या महान् भयदायक कार्यमें न लगाना । तुम्हारे पढ़ानेपर भी जिसकी जैसी बुद्धि होगी और जो पढ़नेमें जैसा परिश्रम करेगा, उसीके अनुसार उसकी विद्या सफल होगी । सब लोग दुर्गम संकटसे पार हों और सभी अपना कल्याण देखें ॥ ४७-४८ ॥
श्रावयेच्चतुरो वर्णान् कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ।
वेदस्याध्ययनं होदं तच्च कार्यं महत् स्मृतम् ॥ ४ ९ ॥
' ब्राह्मणको आगे रखकर चारों वर्णोंको उपदेश देना चाहिये । यह वेदाध्ययन महान्
कार्य माना गया है । इसे अवश्य करना चाहिये ॥ ४ ९ ॥
स्तुत्यर्थमिह देवानां वेदाः सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
यो निर्वदेत सम्मोहाद् ब्राह्मणं वेदपारगम् ॥ ५० ॥
सोऽभिध्यानाद् ब्राह्मणस्य पराभूयादसंशयम् । ‘ स्वयम्भू ब्रह्माने यहाँ देवताओंकी स्तुतिके लिये वेदोंकी सृष्टि की है । जो मोहवश वेदके पारंगत ब्राह्मणकी निन्दा करता है, वह उसके अनिष्ट-चिन्तनके कारण निस्संदेह पराभवको प्राप्त होता है ॥ ५० ॥
यश्चाधर्मेण विब्रूयाद् यश्चाधर्मेण मृच्छति ॥ ५१ ॥
तयोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं चाधिगच्छति । ‘ जो धार्मिक विधिका उल्लंघन करके प्रश्न करता है और जो अधर्मपूर्वक उसका उत्तर देता है, उन दोनोंमेंसे एककी मृत्यु हो जाती है अथवा एक दूसरेके द्वेषका पात्र बन जाता है ॥ ५१३ ॥
एतद् वः सर्वमाख्यातं स्वाध्यायस्य विधिं प्रति ।
उपकुर्याच्च शिष्याणामेतच्च हृदि वो भवेत् ॥ ५२ ॥
‘ यह सब मैंने तुमलोगोंसे स्वाध्यायकी विधि बतायी है । यह तुम्हारे हृदयमें सदा स्मरण रहे; क्योंकि यह शिष्योंका उपकार कर सकती है ' ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सप्तविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२७ ॥
इस प्रकारश्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३२७ ॥
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अष्टाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः शिष्योंके जानेके बाद व्यासजीके पास नारदजीका आगमन और व्यासजीको वेदपाठके लिये प्रेरित करना तथा व्यासजीका शुकदेवको अनध्यायका कारण बताते हुए ' प्रवह ' आदि सात वायुओंका परिचय देना भीष्म उवाच
एतच्छ्रुत्वा गुरोर्वाक्यं व्यासशिष्या महौजसः ।
अन्योन्यं हृष्टमनसः परिषस्वजिरे तदा ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! अपने गुरु व्यासके इस उपदेशको सुनकर उनके महातेजस्वी शिष्य मन- ही- मन बहुत प्रसन्न हुए और आपसमें एक-दूसरेको हृदयसे लगाने लगे ॥ १ ॥
उक्ताः स्मो यद् भगवता तदात्वायतिसंहितम् ।
तन्नो मनसि संरूढं करिष्यामस्तथा च तत् ॥ २ ॥
फिर व्यासजीसे बोले – ' भगवन्! आपने भविष्य में हमारे हितका विचार करके जो
बातें बतायी हैं, वे हमारे मनमें बैठ गयी हैं । हम अवश्य उनका पालन करेंगे ' ॥ २ ॥
अन्योन्यं संविभाष्यैवं सुप्रीतमनसः पुनः ।
विज्ञापयन्ति स्म गुरुं पुनर्वाक्यविशारदाः ॥ ३ ॥
इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करके गुरु और शिष्य सभी मन- ही - मन बड़े प्रसन्न हुए ।
तदनन्तर प्रवचनकुशल शिष्योंने गुरुसे इस प्रकार निवेदन किया- ॥ ३ ॥
शैलादस्मान्महीं गन्तुं कांक्षितं नो महामुने ।
वेदाननेकधा कर्तुं यदि ते रुचितं प्रभो ॥ ४ ॥
'महामुने! अब हम इस पर्वतसे पृथ्वीपर जाना चाहते हैं । वेदोंके अनेक विभाग करके उनका प्रचार करना ही हमारी इस यात्राका उद्देश्य है । प्रभो! यदि आपको यह रुचिकर जान पड़े तो हमें जानेकी आज्ञा दें ' ॥ ४ ॥
शिष्याणां वचनं श्रुत्वा पराशरसुतः प्रभुः ।
प्रत्युवाच ततो वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् ॥ ५ ॥
शिष्योंकी यह बात सुनकर पराशरनन्दन भगवान् व्यास यह धर्म और अर्थयुक्त हितकर वचन बोले ॥ ५ ॥
क्षितिं वा देवलोकं वा गम्यतां यदि रोचते ।
अप्रमादश्च वः कार्यो ब्रह्म हि प्रचुरच्छलम् ॥ ६ ॥