05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2271–2280
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2271–2280
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१४२ - लक्ष्मीनिवास, १४३ - विद्याके आश्रय, १४४ - कीर्तिके आधार, १४५ - सम्पत्तिके आश्रय, १४६ -सर्वावास ( सबके निवासस्थान), १४७ - वासुदेव, १४८- सर्वच्छन्दक ( सबकी इच्छा पूर्ण करनेवाले ), १४ ९ - हरिहय, १५० - हरिमेध ( अश्वमेधयज्ञरूप ), १५१ - महायज्ञभागहर, १५२-वरप्रद ( भक्तोंको वरदान देनेवाले ), १५३ - सुखप्रद ( सबको सुख प्रदान करनेवाले ), १५४-धनप्रद ( सबको धन देनेवाले ), १५५ - हरिमेध ( भगवद्भक्त भी आप ही हैं ), १५६ - यम, १५७-नियम, १५८ - महानियम आदि साधन भी आप ही हैं । १५ ९- कृच्छ्र, १६० -अतिकृच्छ्र, १६१-महाकृच्छ्र, १६२ - सर्वकृच्छ्र आदि चान्द्रायणव्रत भी आप ही हैं । १६३ - नियमधर ( नियमोंको धारण करनेवाले ), १६४ -निवृत्तभ्रम ( भ्रमरहित), १६५ -प्रवचनगत ( वेदवाक्यके विषय ), १६६ - पृश्निगर्भप्रवृत्त, १६७- प्रवृत्तवेदक्रिय (वैदिक कर्मोंकि प्रवर्तक), १६८ - अज (जन्मरहित ), १६ ९ - सर्वगति ( सर्वव्यापी ), १७०- सर्वदर्शी, १७१ - अग्राह्य, १७२- अचल, १७३ -महाविभूति (सृष्टिरूप विभूतिवाले ), १७४ -माहात्म्य शरीर (अतुलित प्रभावशाली स्वरूपवाले), १७५- पवित्र, १७६ -महापवित्र ( पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले ), १७७-हिरणमय, १७८ - बृहद् (ब्रह्म), १७९ - अप्रतर्क्य ( तर्कसे जाननेमें न आनेवाले ), १८०-अविज्ञेय, १८१ -ब्रह्माग्रय, १८२-प्रजाकी सृष्टि करनेवाले, १८३ - प्रजाका अन्त करनेवाले, १८४ - महामायाधर, १८५ - चित्रशिखण्डी, १८६- वरप्रद, १८७- पुरोडाश भागको ग्रहण करनेवाले, १८८ -गताध्वर ( प्राप्तयज्ञ), १८ ९ -छिन्नतृष्ण ( तृष्णारहित), १ ९ ० -छिन्नसंशय ( संशयरहित ), १ ९ १ - सर्वतोवृत्त ( सर्वव्यापक ), १ ९ २ - निवृत्तिरूप, १ ९ ३ -ब्राह्मणरूप, १ ९४-ब्राह्मणप्रिय, १ ९ ५ -विश्वमूर्ति, १ ९ ६- महामूर्ति, १ ९७- बान्धव (जगत्के बन्धु ), १ ९८-भक्तवत्सल तथा १ ९९- ब्रह्मण्यदेव आदि नामोंसे पुकारे जानेवाले परमेश्वर! आपको नमस्कार है । मैं आपका भक्त हूँ । आपके दर्शनकी इच्छासे यहाँ उपस्थित हुआ हूँ । २००-एकान्तमें दर्शन देनेवाले आप परमात्माको बारंबार नमस्कार है ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अष्टत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तीन सौ अड़तीसवाँअध्याय पूराहुआ ॥ ३३८ ॥
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एकोनचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान्का दर्शन, भगवान्का वासुदेव - संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण - पठनका माहात्म्य भीष्म उवाच
एवं स्तुतः स भगवान् गुह्यैस्तथ्यैश्च नामभिः ।
तं मुनिं दर्शयामास नारदं विश्वरूपधृक् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार गुह्य तथा सत्य नामोंसे जब नारदजीने भगवान्की स्तुति की, तब उन्होंने विश्वरूप धारण करके उन्हें दर्शन दिया ॥ १ ॥
किंचिच्चन्द्राद् विशुद्धात्मा किंचिच्चन्द्राद् विशेषवान् ।
कृशानुवर्णः किंचिच्च किंचिद्धिष्ण्याकृतिः प्रभुः ॥ २ ॥
उनका वह स्वरूप कुछ चन्द्रमासे भी अधिक निर्मल और कुछ चन्द्रमासे भी विलक्षण था । कुछ अग्निके समान देदीप्यमान और कुछ नक्षत्रोंके समान जाज्वल्यमान था ॥ २ ॥
शुकपत्रनिभः किंचित् किंचित्स्फटिकसंनिभः ।
नीलाञ्जनचयप्रख्यो जातरूपप्रभः क्वचित् ॥ ३ ॥
कुछ तोतेकी पाँखके समान हरा, कुछ स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल, कहींसे कज्जलराशिके समान काला और कहीं से सुवर्णके समान कान्तिमान् था ॥ ३ ॥
प्रवालाङ्कुरवर्णश्च श्वेतवर्णस्तथा क्वचित् ।
क्वचित् सुवर्णवर्णाभो वैदूर्यसदृशः क्वचित् ॥ ४ ॥
कहीं नवांकुरित पल्लवके समान था । कहीं श्वेतवर्ण दिखायी देता था, कहीं सुनहरी आभा दिखायी देती थी और कहीं - कहीं वैदूर्यमणिकी- सी छटा छिटक रही थी ॥ ४ ॥
नीलवैदूर्यसदृश इन्द्रनीलनिभः क्वचित् ।
मयूरग्रीववर्णाभो मुक्ताहारनिभः क्वचित् ॥ ५ ॥
कहीं नीलवैदूर्य, कहीं इन्द्रनीलमणि, कहीं मोरकी ग्रीवाके सदृश वर्ण और कहीं मोतीके हारकी - सी कान्ति दृष्टिगोचर होती थी ॥ ५ ॥
एतान् बहुविधान् वर्णान् रूपैर्बिभ्रत्सनातनः ।
सहस्रनयनः श्रीमान् शतशीर्षः सहस्रपात् ॥ ६ ॥
सहस्रोदरबाहुश्च अव्यक्त इति च क्वचित् ।
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इस प्रकार वे सनातन भगवान् श्रीहरि अपने स्वरूपमें नाना प्रकारके रंग धारण किये हुए थे । उनके हजारों नेत्र, सैकड़ों ( हजारों) मस्तक, हजारों पैर, हजारों उदर और हजारों हाथ थे । वे अपूर्व कान्तिसे सम्पन्न थे और कहीं- कहीं उनकी आकृति अव्यक्त थी ॥ ६३ ॥
ओङ्कारमुद्गिरन् वक्त्रात् सावित्रीं तदन्वयाम् ॥ ७ ॥
शेषेभ्यश्चैव वक्त्रेभ्यश्चतुर्वेदान् गिरन् बहुन् ।
आरण्यकं जगौ देवो हरिर्नारायणो वशी ॥ ८ ॥
सबको वशमें रखनेवाले वे भगवान् नारायण हरि एक मुखसे तो ओङ्कार तथा उससे सम्बन्ध रखनेवाली गायत्रीका जप करते थे एवं अन्यान्य मुखोंसे चारों वेदों और उनके आरण्यकभागका गान कर रहे थे ॥ ७-८ ॥
वेदिं कमण्डलुं शुभ्रान् मणीनुपानही कुशान् ।
अजिनं दण्डकाष्ठं च ज्वलितं च हुताशनम् ॥ ९ ॥
धारयामास देवेशो हस्तैर्यज्ञपतिस्तदा । यज्ञोंके स्वामी उन भगवान् देवेश्वर विष्णुने उस समय अपने हाथोंमें यज्ञवेदी, कमण्डलु, चमकीले मणिरत्न, उपानह, कुशा, मृगचर्म, दण्ड -काष्ठ और प्रज्वलित अग्नि— ये सब वस्तुएँ ले रखी थीं ॥ ९ ३ ॥ तं प्रसन्नं प्रसन्नात्मा नारदो द्विजसत्तमः ॥ १० ॥
वाग्यतः प्रणतो भूत्वा ववन्दे परमेश्वरम् । उनका दर्शन करनेके पश्चात् प्रसन्नचित्त हुए द्विजश्रेष्ठ नारदने मौनभावसे नतमस्तक हो उन प्रसन्न हुए परमेश्वरकी वन्दना की ॥ १०३ ॥
तमुवाच नतं मूर्ध्ना देवानामादिरव्ययः ॥ ११ ॥
मस्तक झुकाकर चरणोंमें पड़े हुए नारदजीसे देवताओंके आदिकारण अविनाशी श्रीहरिने इस प्रकार कहा ॥ ११ ॥
श्रीभगवानुवाच
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महर्षयः ।
इमं देशमनुप्राप्ता मम दर्शनलालसाः ॥ १२ ॥
श्रीभगवान् बोले — देवर्षे! महर्षि एकत, द्वित और त्रित – ये सब भी मेरे दर्शनकी इच्छासे इस स्थानपर आये हुए थे ॥ १२ ॥
न च मां ते ददृशिरे न च द्रक्ष्यति कश्चन ।
ऋते ह्यैकान्तिकश्रेष्ठात् त्वं चैवैकान्तिकोत्तमः ॥ १३ ॥
किंतु उन्हें मेरा दर्शन न प्राप्त हो सका । वास्तवमें मेरे अनन्य भक्तके सिवा और कोई मनुष्य मेरा दर्शन नहीं कर सकता । तुम तो मेरे अनन्य भक्तोंमें श्रेष्ठ हो; इसीलिये तुम्हें मेरा दर्शन हुआ है ॥ १३ ॥
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ममैतास्तनवः श्रेष्ठा जाता धर्मगृहे द्विज ।
तास्त्वं भजस्व सततं साधयस्व यथागतम् ॥ १४ ॥
विप्रवर! धर्मके घरमें जो अवतीर्ण हुए हैं, वे नर- नारायण आदि चारों भाई मेरे ही स्वरूप हैं; अतः तुम सदा उनका भजन किया करो तथा जो कार्य प्राप्त हो, उसका साधन करो ॥ १४ ॥
वृणीष्व च वरं विप्र मत्तस्त्वं यदिहेच्छसि ।
प्रसन्नोऽहं तवाद्येह विश्वमूर्तिरिहाव्ययः ॥ १५ ॥
द्विजश्रेष्ठ! मैं अविनाशी विश्वरूप परमेश्वर आज तुमपर प्रसन्न हुआ हूँ; अतः तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, वह वर माँग लो ॥ १५ ॥
नारद उवाच
अद्य मे तपसो देव यमस्य नियमस्य च ।
सद्यः फलमवाप्तं वै दृष्टो यद् भगवान् मया ॥ १६ ॥
नारदजीने कहा — देव! जब मैंने आप भगवान्का दर्शन पा लिया, तब मुझे तप, यम और नियम — सबका फल तत्काल ही मिल गया ॥ १६ ॥
वर एष ममात्यन्तं दृष्टस्त्वं यत् सनातनः ।
भगवन् विश्वदृक् सिंहः सर्वमूर्तिर्महान् प्रभुः ॥ १७ ॥
भगवन्! आप सम्पूर्ण विश्वके द्रष्टा, सिंहके समान निर्भय, सर्वस्वरूप, महान् एवं सनातन प्रभु हैं । आपका जो दर्शन हो गया, यही मेरे लिये सबसे बड़ा वरदान है ॥ १७ ॥
भीष्म उवाच
एवं संदर्शयित्वा तु नारदं परमेष्ठिनम् ।
उवाच वचनं भूयो गच्छ नारद मा चिरम् ॥ १८ ॥
भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! इस प्रकार दर्शन देकर भगवान्ने ब्रह्मपुत्र नारदजीसे फिर कहा, ‘ नारद! जाओ, विलम्ब न करो ॥ १८ ॥
इमे ह्यनिन्द्रियाहारा मद्भक्ताश्चन्द्रवर्चसः ।
एकाग्राश्चिन्तयेयुर्मां नैषां विघ्नो भवेदिति ॥ १ ९ ॥
‘ ये इन्द्रिय और आहारसे शून्य, चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मेरे भक्तजन एकाग्रभावसे मेरा चिन्तन कर सकें और इनके ध्यानमें किसी प्रकारका विघ्न न हो, इसके लिये तुम्हें यहाँसे चले जाना चाहिये ॥ १ ९ ॥
सिद्धा ह्येते महाभागाः पुरा ह्येकान्तिनोऽभवन् ।
तमोरजोभिर्निर्मुक्ता मां प्रवेक्ष्यन्त्यसंशयम् ॥ २० ॥
‘ यहाँ निवास करनेवाले ये सभी महाभाग सिद्ध हो चुके हैं । ये पहले भी मेरे अनन्य भक्त रहे हैं । ये तमोगुण और रजोगुणसे मुक्त हैं; अतः निःसंदेह मुझमें ही प्रवेश
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करेंगे ॥ २० ॥
न दृश्यश्चक्षुषा योऽसौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च ।
न यश्चैव गन्धेन रसेन च विवर्जितः ॥ २१ ॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव न गुणास्तं भजन्ति वै ।
यश्च सर्वगतः साक्षी लोकस्यात्मेति कथ्यते ॥ २२ ॥
भूतग्रामशरीरेषु नश्यत्सु न विनश्यति ।
अजो नित्यः शाश्वतश्च निर्गुणो निष्कलस्तथा ॥ २३ ॥
द्विर्द्वादशेभ्यस्तत्त्वेभ्यः ख्यातो यः पञ्चविंशकः ।
पुरुषो निष्क्रियश्चैव ज्ञानदृश्यश्च कथ्यते ॥ २४ ॥
यं प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता वै द्विजसत्तमाः ।
स वासुदेवो विज्ञेयः परमात्मा सनातनः ॥ २५ ॥
‘ जो नेत्रोंसे देखा नहीं जाता, त्वचासे जिसका स्पर्श नहीं होता, गन्ध ग्रहण करनेवाली घ्राणेन्द्रियसे जो सूँघनेमें नहीं आता, जो रसनेन्द्रियकी पहुँचसे परे है; सत्त्व, रज और तम नामक गुण जिसपर कोई प्रभाव नहीं डाल पाते, जो सर्वव्यापी, साक्षी और सम्पूर्ण जगत्का आत्मा कहलाता है, सम्पूर्ण प्राणियोंका नाश हो जानेपर भी जो स्वयं नष्ट नहीं होता है, जिसे अजन्मा, नित्य, सनातन, निर्गुण और निष्कल बताया गया है, जो चौबीस तत्त्वोंसे परे पचीसवें तत्त्वके रूपमें विख्यात है, जिसे अन्तर्यामी पुरुष, निष्क्रिय तथा ज्ञानमय नेत्रोंसे ही देखने योग्य बताया जाता है, जिसमें प्रवेश करके श्रेष्ठ द्विज यहाँ मुक्त हो
जाते हैं, वही सनातन परमात्मा है । उसीको वासुदेव नामसे जानना चाहिये ॥ २१–२५ ॥
पश्य देवस्य माहात्म्यं महिमानं च नारद ।
शुभाशुभैः कर्मभिर्यो न लिप्यति कदाचन ॥ २६ ॥
‘ नारद! उस परमात्मदेवका माहात्म्य और महिमा तो देखो, जो शुभाशुभ कर्मोंसे कभी लिप्त नहीं होता है ॥ २६ ॥
सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणानेतान् प्रचक्षते ।
यत्ते सर्वशरीरेषु तिष्ठन्ति विचरन्ति च ॥ २७ ॥
' सत्त्व, रज और तम— ये तीन गुण बताये जाते हैं, जो सम्पूर्ण शरीरोंमें स्थित रहते हैं और विचरते हैं ॥
एतान् गुणांस्तु क्षेत्रज्ञो भुङ्क्ते नैभिः स भुज्यते ।
निर्गुणो गुणभुक् चैव गुणस्रष्टा गुणाधिकः ॥ २८ ॥
‘ इन गुणोंको क्षेत्रज्ञ स्वयं भोगता है, किंतु इन गुणोंके द्वारा वह क्षेत्रज्ञ भोगा नहीं जाता; क्योंकि वह निर्गुण, गुणोंका भोक्ता, गुणोंका स्रष्टा तथा गुणोंसे उत्कृष्ट है ॥ २८ ॥
जगत्प्रतिष्ठा देवर्षे पृथिव्यप्सु प्रलीयते ।
ज्योतिष्यापः प्रलीयन्ते ज्योतिर्वायौ प्रलीयते ॥ २ ९ ॥
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‘ देवर्षे! यह सम्पूर्ण जगत् जिसपर प्रतिष्ठित है, वह पृथ्वी जलमें विलीन हो जाती है । जलका तेजमें और तेजका वायुमें लय होता है ॥ २ ९ ॥
खे वायुः प्रलयं याति मनस्याकाशमेव च ।
मनो हि परमं भूतं तदव्यक्ते प्रलीयते ॥ ३० ॥
‘ वायुका आकाशमें लय होता है, आकाश मनमें विलीन होता है । मन उत्कृष्ट भूत है ।
वह अव्यक्त प्रकृतिमें लीन होता है ॥ ३० ॥
अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् निष्क्रिये सम्प्रलीयते ।
नास्ति तस्मात् परतरः पुरुषाद् वै सनातनात् ॥ ३१ ॥
‘ ब्रह्मन्! अव्यक्तका निष्क्रिय पुरुषमें लय होता है । उस सनातन पुरुषसे उत्कृष्ट दूसरी कोई वस्तु नहीं है ॥ ३१ ॥
नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम् ।
ऋते तमेकं पुरुषं वासुदेवं सनातनम् ॥ ३२ ॥
‘ संसारमें उस एकमात्र सनातन पुरुष वासुदेवको छोड़कर कोई भी चराचर भूत नित्य नहीं है ॥ ३२ ॥
सर्वभूतात्मभूतो हि वासुदेवो महाबलः ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ ३३ ॥
' महाबली वासुदेव सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं । पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश - ये पाँच महाभूत हैं ॥
ते समेता महात्मानः शरीरमिति संज्ञितम् ।
तदा विशति यो ब्रह्मन्नदृश्यो लघुविक्रमः ॥ ३४ ॥
‘ वे सब महाभूत एक साथ मिलकर ही शरीर नाम धारण करते हैं । ब्रह्मन्! उस समय अदृश्यभावसे जो शीघ्रगामी चेतन उसमें प्रवेश करता है, वही जीवात्मा है ॥ ३४ ॥
उत्पन्न एव भवति शरीरं चेष्टयन् प्रभुः ।
न विना धातुसंघातं शरीरं भवति क्वचित् ॥ ३५ ॥
‘ उसका शरीरमें प्रवेश करना ही उत्पन्न होना बताया जाता है । वही शरीरको चेष्टाशील बनाता है । वही इसके संचालनमें समर्थ है । कहीं भी पाँचों भूतोंके मिलित समुदायके बिना कोई शरीर नहीं होता ॥ ३५ ॥
न च जीवं विना ब्रह्मन् वायवश्चेष्टयन्त्युत ।
स जीवः परिसंख्यातः शेषः संकर्षणः प्रभुः ॥ ३६ ॥
'ब्रह्मन्! जीवके बिना प्राणवायु चेष्टा नहीं करती । वह जीव ही शेष या भगवान् संकर्षण कहा गया है ॥ ३६ ॥
तस्मात् सनत्कुमारत्वं योऽलभत् स्वेन कर्मणा ।
यस्मिंश्च सर्वभूतानि प्रलयं यान्ति संक्षयम् ॥ ३७ ॥
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स मनः सर्वभूतानां प्रद्युम्नः परिपठ्यते । ‘ जो उसी संकर्षण अथवा जीवसे उत्पन्न होकर अपने कर्म (ध्यान, पूजन आदि ) के द्वारा सनत्कुमारत्व ( जीवन्मुक्ति ) प्राप्त कर लेता है, जिसमें समस्त प्राणी लय एवं क्षयको प्राप्त होते हैं, वह सम्पूर्ण भूतोंका मन ही 'प्रद्युम्न' कहलाता है ॥ ३७३ ॥
तस्मात् प्रसूतो यः कर्ता कारणं कार्यमेव च ॥ ३८ ॥
‘उस प्रद्युम्नसे जिसकी उत्पत्ति हुई है, वह ( अहंकार ही ) तन्मात्रा आदिका कर्ता, परम्परा- सम्बन्धसे महाभूतोंका कारण तथा महत्तत्त्वका कार्य है ॥ ३८ ॥
तस्मात् सर्वं सम्भवति जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
सोऽनिरुद्धः स ईशानो व्यक्तः स सर्वकर्मसु ॥ ३ ९ ॥
‘ उसीसे समस्त चराचर जगत्की उत्पत्ति होती है । वही 'अनिरुद्ध' एवं ‘ ईशान ’ कहलाता है । वह ( कर्तृत्वके अभिमानरूपसे ) सम्पूर्ण कर्मोंमें व्यक्त होता है ॥ ३ ९ ॥
यो वासुदेवो भगवान् क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ।
ज्ञेयः स एव राजेन्द्र जीवः संकर्षणः प्रभुः ॥ ४० ॥
संकर्षणाच्च प्रद्युम्नो मनोभूतः स उच्यते ।
प्रद्युम्नाद् योऽनिरुद्धस्तु सो s हंकारः स ईश्वरः ॥ ४१ ॥
‘ राजेन्द्र! जो भगवान् वासुदेव क्षेत्रज्ञस्वरूप एवं निर्गुणरूपसे जाननेयोग्य बताये गये हैं, वे ही प्रभावशाली संकर्षणरूप जीवात्मा हैं । संकर्षणसे प्रद्युम्नका प्रादुर्भाव हुआ है, जो मनोमय कहलाते हैं । प्रद्युम्नसे जो अनिरुद्ध प्रकट हुए हैं, वे ही अहंकार और ईश्वर हैं ॥ ४०-४१ ॥
मत्तः सर्वं सम्भवति जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
अक्षरं च क्षरं चैव सच्चासच्चैव नारद ॥ ४२ ॥
'नारद! मुझसे ही समस्त स्थावर- जंगमरूप जगत्की उत्पत्ति होती है । क्षर और अक्षर तथा असत् और सत् भी मुझसे ही प्रकट हुए हैं ॥ ४२ ॥
मां प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता भक्तास्तु ये मम ।
अहं हि पुरुषो ज्ञेयो निष्क्रियः पञ्चविंशकः ॥ ४३ ॥
' यहाँ जो मेरे भक्त हैं, वे मुझमें ही प्रवेश करके मुक्त होते हैं । मैं ही पचीसवें तत्त्व निष्क्रिय पुरुषरूपसे जानने योग्य हूँ ॥ ४३ ॥
निर्गुणो निष्कलश्चैव निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।
एतत् त्वया न विज्ञेयं रूपवानिति दृश्यते ॥ ४४ ॥
इच्छन् मुहूर्तान्नश्येयमीशोऽहं जगतो गुरुः । ‘ मैं निर्गुण, निष्कल, द्वन्द्वोंसे अतीत और परिग्रहसे शून्य हूँ । तुम ऐसा न समझ लेना कि ये रूपवान् हैं, इसलिये दिखायी देते हैं; क्योंकि मैं इच्छा करते ही एक ही क्षणमें अदृश्य हो सकता हूँ; क्योंकि मैं सम्पूर्ण जगत्का ईश्वर और गुरु हूँ ॥ ४४३ ॥
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माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद ॥ ४५ ॥
सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि । 'नारद! तुम जो मुझे देख रहे हो, इस रूपमें मैंने माया रची है । तुम मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंके गुणोंसे युक्त न जानो ॥ ४५३ ॥
मयैतत् कथितं सम्यक् तव मूर्तिचतुष्टयम् ॥ ४६ ॥
अहं हि जीवसंज्ञातो मयि जीवः समाहितः ।
नैवं ते बुद्धिरत्राभूद् दृष्टो जीवो मयेति वै ॥ ४७ ॥
‘ मैंने अपने वासुदेव, संकर्षण आदि चार स्वरूपोंका तुम्हारे सामने भलीभाँति वर्णन किया है । मैं ही जीव नामसे प्रसिद्ध हूँ, मुझमें ही जीवकी स्थिति है; परंतु तुम्हारे मनमें ऐसा विचार नहीं उठना चाहिये कि मैंने जीवको देखा है ॥ ४६-४७ ॥
अहं सर्वत्रगो ब्रह्मन् भूतग्रामान्तरात्मकः ।
भूतग्रामशरीरेषु नश्यत्सु न नशाम्यहम् ॥ ४८ ॥
‘ ब्रह्मन्! मैं सर्वव्यापी और समस्त प्राणिसमुदायका अन्तरात्मा हूँ । सम्पूर्ण भूतसमुदाय और शरीरोंके नष्ट हो जानेपर भी मेरा नाश नहीं होता है ॥ ४८ ॥
सिद्धा हि ते महाभागा नरा ह्येकान्तिनोऽभवन् ।
तमोरजोभ्यां निर्मुक्ताः प्रवेक्ष्यन्ति च मां मुने ॥ ४ ९ ॥
' मुने! ये महाभाग श्वेतद्वीपनिवासी सिद्ध हैं । ये पहले मेरे अनन्य भक्त रहे हैं। ये तमोगुण और रजोगुणसे मुक्त हो गये हैं; इसलिये मेरे भीतर प्रवेश करेंगे ॥ ४ ९ ॥
हिरण्यगर्भो लोकादिश्चतुर्वक्त्रोऽनिरुक्तगः ।
ब्रह्मा सनातनी देवो मम बह्वर्थचिन्तकः ॥ ५० ॥
‘जो सम्पूर्ण जगत्के आदि, चतुर्मुख, अनिर्वचनीय- स्वरूप, हिरण्यगर्भ एवं सनातन देवता हैं, वे ब्रह्मा मेरे बहुत- से कार्योंका चिन्तन करनेवाले हैं ॥ ५० ॥
ललाटाच्चैव मे रुद्रो देवः क्रोधाद् विनिःसृतः ।
पश्यैकादश मे रुद्रान् दक्षिणं पार्श्वमास्थितान् ॥ ५१ ॥
‘ मेरे क्रोधवश ललाटसे मेरे ही रुद्रदेवका प्राकट्य हुआ है । देखो, ये ग्यारह रुद्र मेरे दाहिने भागमें विराजमान हैं ॥ ५१ ॥
द्वादशैव तथाऽऽदित्यान् वामपार्श्वे समास्थितान् ।
अग्रतश्चैव मे पश्य वसूनष्टौ सुरोत्तमान् ॥ ५२ ॥
‘ इसी प्रकार मेरे बायें भागमें बारह आदित्य विराज रहे हैं । अग्रभागमें सुरश्रेष्ठ आठ वसु विद्यमान हैं । इन सबको प्रत्यक्ष देखो ॥ ५२ ॥
नासत्यं चैव दत्रं च भिषजौ पश्य पृष्ठतः ।
सर्वान् प्रजापतीन् पश्य पश्य सप्त ऋषींस्तथा ॥ ५३ ॥
वेदान् यज्ञांश्च शतशः पश्यामृतमथौषधीः ।
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तपांसि नियमांश्चैव यमानपि पृथग्विधान् ॥ ५४ ॥
' मेरे पृष्ठभागमें भी दृष्टिपात करो, जहाँ नासत्य और दस्र– ये दोनों देववैद्य अश्विनीकुमार स्थित हैं । इनके सिवा मेरे विभिन्न अंगोंमें समस्त प्रजापतियों, सप्तर्षियों, सम्पूर्ण वेदों, सैकड़ों यज्ञों, ओषधियों तथा अमृतको भी देखो । तप तथा नाना प्रकारके यम-नियम भी यहाँ मूर्तिमान् हैं ॥ ५३-५४ ॥
तथाष्टगुणमैश्वर्यमेकस्थं पश्य मूर्तिमत् ।
श्रियं लक्ष्मीं च कीर्तिं च पृथिवीं च ककुद्मिनीम् ॥ ५५ ॥
वेदानां मातरं पश्य मत्स्थां देवीं सरस्वतीम् ।
ध्रुवं च ज्योतिषां श्रेष्ठं पश्य नारद खेचरम् ॥ ५६ ॥
‘ आठ प्रकारके ऐश्वर्य भी यहाँ एक ही जगह साकाररूपसे प्रकट हैं, इन्हें देखो । श्री, लक्ष्मी, कीर्ति, पर्वतोंसहित पृथ्वी तथा वेदमाता सरस्वतीदेवी भी मेरे भीतर विराजमान हैं, उन सबका दर्शन करो । नारद! ये नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ आकाशचारी ध्रुव दिखायी दे रहे हैं, इनकी ओर भी दृष्टिपात करो ॥ ५५-५६ ॥
अम्भोधरान् समुद्रांश्च सरांसि सरितस्तथा ।
मूर्तिमन्तः पितृगणांश्चतुरः पश्य सत्तम ॥ ५७ ॥
‘ साधुशिरोमणे! बादल, समुद्र, सरोवर और सरिताओंको भी मेरे भीतर मूर्तिमान् देख लो । चारों प्रकारके पितृगण भी सशरीर प्रकट हैं, इनका भी दर्शन कर लो ॥ ५७ ॥
त्रींश्चैवेमान् गुणान् पश्य मत्स्थान् मूर्तिविवर्जितान् ।
देवकार्यादपि मुने पितृकार्यं विशिष्यते ॥ ५८ ॥
' मेरे शरीरमें स्थित हुए मूर्तिरहित इन तीन गुणोंको भी मूर्तिमान् देख लो । मुने! देवकार्यसे भी पितृकार्य बढ़कर है ॥ ५८ ॥
देवानां च पितॄणां च पिता ह्येकोऽहमादितः ।
अहं हयशिरा भूत्वा समुद्रे पश्चिमोत्तरे ॥ ५ ९ ॥
पिबामि सुहुतं हव्यं कव्यं च श्रद्धयान्वितम् । ‘ एकमात्र मैं ही देवताओं और पितरोंका भी पिता हूँ। मैं ही हयग्रीवरूप धारण करके समुद्रमें वायव्यकोणकी ओर रहता हूँ और विधिपूर्वक हवन किये हुए हव्य और श्रद्धापूर्वक समर्पित किये हुए कव्यका भी पान करता हूँ ॥ ५ ९ ३ ॥ मया सृष्टः पुरा ब्रह्मा मां यज्ञमयजत् स्वयम् ॥ ६० ॥
ततस्तस्मिन् वरान् प्रीतो दत्तवानस्म्यनुत्तमान् । ‘ पूर्वकालमें मेरे द्वारा उत्पन्न किये गये ब्रह्माने स्वयं ही मुझ यज्ञपुरुषका यजन किया था । इससे प्रसन्न होकर मैंने उन्हें उत्तम वरदान दिये थे ॥ ६० ॥
मत्पुत्रत्वं च कल्पादौ लोकाध्यक्षत्वमेव च ॥ ६१ ॥
अहंकारकृतं चैव नाम पर्यायवाचकम् ।
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त्वया कृतां च मर्यादां नातिक्रंस्यति कश्चन ॥ ६२ ॥
( वे वरदान इस प्रकार हैं - ) ' ब्रह्मन्! तुम प्रत्येक कल्पके आदिमें मेरे पुत्ररूपसे उत्पन्न होओगे । तुम्हें लोकाध्यक्षका पद प्राप्त होगा । तुम्हारा पर्यायवाची नाम होगा, अहंकारकर्ता । तुम्हारी बाँधी हुई मर्यादाका कोई उल्लंघन नहीं करेगा ॥ ६१-६२ ॥
त्वं चैव वरदो ब्रह्मन् वरेप्सूनां भविष्यसि ।
सुरासुरगणानां च ऋषीणां च तपोधन ॥ ६३ ॥
पितॄणां च महाभाग सततं संशितव्रत ।
विविधानां च भूतानां त्वमुपास्यो भविष्यसि ॥ ६४ ॥
‘ ब्रह्मन्! तुम वर चाहनेवाले साधकोंको वर देनेमें समर्थ होओगे । कठोर व्रतका पालन करनेवाले महाभाग तपोधन! तुम देवताओं, असुरों, ऋषियों, पितरों तथा नाना प्रकारके प्राणियोंके सदा ही उपासनीय होओगे ॥ ६३-६४ ॥
प्रादुर्भावगतश्चाहं सुरकार्येषु नित्यदा ।
अनुशास्यस्त्वया ब्रह्मन् नियोज्यश्च सुतो यथा ॥ ६५ ॥
‘ ब्रह्मन्! जब मैं देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये अवतार धारण करूँ, उन दिनों सदा तुम मुझपर शासन करना और पुत्रकी भाँति मुझे प्रत्येक कार्यमें नियुक्त करना' ॥ ६५ ॥
एतांश्चान्यांश्च रुचिरान् ब्रह्मणेऽमिततेजसे ।
अहं दत्त्वा वरान् प्रीतो निवृत्तिपरमोऽभवम् ॥ ६६ ॥
‘ नारद! अमित तेजस्वी ब्रह्माको ये तथा और भी बहुत- से सुन्दर वर देकर मैं प्रसन्नतापूर्वक निवृत्तिपरायण हो गया ॥ ६६ ॥
निर्वाणं सर्वधर्माणां निवृत्तिः परमा स्मृता ।
तस्मान्निवृत्तिमापन्नश्चरेत् सर्वाङ्गनिर्वृतः ॥ ६७ ॥
‘ समस्त कर्मोंसे उपरत हो जाना ही परम निवृत्ति है; अतः जो निवृत्तिको प्राप्त हो गया है, वह सभी अंगोंसे सुखी होकर विचरण करे ॥ ६७ ॥
विद्यासहायवन्तं च आदित्यस्थं समाहितम् ।
कपिलं प्राहुराचार्याः सांख्यनिश्चितनिश्चयाः ॥ ६८ ॥
‘ सांख्यशास्त्रके सिद्धान्तका निश्चय करनेवाले आचार्यगण मुझे ही विद्याकी सहायतासे युक्त, सूर्यमण्डलमें स्थित एवं समाहितचित्त कपिल कहते हैं ॥ ६८ ॥
हिरण्यगर्भो भगवानेष च्छन्दसि सुष्टुतः ।
सोऽहं योगरतिर्ब्रह्मन् योगशास्त्रेषु शब्दितः ॥ ६ ९ ॥
' वेदमें जिनकी स्तुति की गयी है, वे भगवान् हिरण्यगर्भ मेरे ही स्वरूप हैं! ब्रह्मन्! योगीलोग जिसमें रमण करते हैं, वह योगशास्त्रप्रसिद्ध पुरुषविशेष ईश्वर भी मैं ही हूँ ॥ ६ ९ ॥