05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2361–2370

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2361–2370

पृष्ठ 2361

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3 - यद्यपि नारदजी ब्रह्माजीके ही पुत्र हैं तथापि दक्षके शापवश उन्हें पुनः प्रजापतिसे जन्म ग्रहण करना पड़ा यह कथा हरिवंशमें आयी है । २ -अग्निष्वात्त आदि पितृगण देवताओंके ही पुत्र हैं। एक समय देवता दीर्घकालतक असुरोंके साथ युद्धमें लगे रहे, इसलिये उन्हें अपने पढ़े हुए वेद भूल गये । फिर उन पुत्रोंसे ही वेदोंको पढ़कर देवताओंने उनको पितृपदपर प्रतिष्ठित किया ।

पृष्ठ 2362

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षट्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः नारायणकी महिमासम्बन्धी उपाख्यानका उपसंहार वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैतन्नारदो वाक्यं नरनारायणेरितम् ।

अत्यन्तं भक्तिमान् देवे एकान्तित्वमुपेयिवान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! नर- नारायणका वह कथन सुनकर भगवान्‌के

प्रति नारदजीकी भक्ति बहुत बढ़ गयी । वे उनके अनन्य भक्त हो गये ॥ १ ॥

प्रोष्य वर्षसहस्रं तु नरनारायणाश्रमे ।

श्रुत्वा भगवदाख्यानं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम् ॥ २ ॥

हिमवन्तं जगामाशु यत्रास्य स्वक आश्रमः । नर- नारायणके आश्रममें भगवान्की कथा सुनते और प्रतिदिन अविनाशी श्रीहरिका दर्शन करते हुए जब नारदजीके एक हजार दिव्य वर्ष पूरे हो गये तब वे शीघ्र ही हिमालयपर्वतके उस भागमें चले गये, जहाँ उनका अपना आश्रम था ॥ २३ ॥

तावपि ख्याततपसौ नरनारायणावृषी ॥ ३ ॥

तस्मिन्नेवाश्रमे रम्ये तेपतुस्तप उत्तमम् । तत्पश्चात् वे विख्यात तपस्वी नर- नारायण ऋषि भी पुनः उसी रमणीय आश्रममें रहते हुए उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ ३३ ॥

त्वमप्यमितविक्रान्तः पाण्डवानां कुलोद्वहः ॥ ४ ॥

पावितात्माद्य संवृत्तः श्रुत्वेमामादितः कथाम् । जनमेजय! तुम पाण्डवोंके कुलभूषण और अत्यन्त पराक्रमी हो । तुम भी प्रारम्भसे ही इस कथाको सुनकर आज परम पवित्र हो गये हो ॥ ४३ ॥

नैव तस्यापरो लोको नायं पार्थिवसत्तम ॥ ५ ॥

कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम् । नृपश्रेष्ठ! जो मन, वाणी, और क्रियाद्वारा अविनाशी भगवान् विष्णुके साथ द्वेष रखता है, उसका न इस लोकमें ठिकाना है और न परलोकमें ॥ ५३ ॥

मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीः समाः ॥ ६ ॥

यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् । जो देवश्रेष्ठ भगवान् नारायण हरिसे द्वेष करता है, उसके पितर सदाके लिये नरकमें डूब जाते हैं ॥ ६३ ॥

कथं नाम भवेद् द्वेष्य आत्मा लोकस्य कस्यचित् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2363

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आत्मा हि पुरुषव्याघ्र ज्ञेयो विष्णुरिति स्थितिः । पुरुषसिंह! भगवान् विष्णुको सबका आत्मा जानना चाहिये । यही वास्तविक स्थिति है । कोई भी मनुष्य भला अपने आत्माके साथ द्वेष कैसे कर सकता है? ॥ ७३ ॥

य एष गुरुरस्माकमृषिर्गन्धवतीसुतः ॥ ८ ॥

तेनैतत् कथितं तात माहात्म्यं परमव्ययम् ।

तस्माच्छ्रुतं मया चेदं कथितं च तवानघ ॥ ९ ॥

तात! ये जो हमलोगोंके गुरु गन्धवतीपुत्र महर्षि व्यास बैठे हैं, इन्होंने ही भगवान्के परम उत्तम अविनाशी माहात्म्यका वर्णन किया है । निष्पाप! उन्हींसे मैंने यह सब सुना है और मेरेद्वारा तुमको भी कहा गया है ॥ ८ - ९ ॥

नारदेन तु सम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः ।

एष धर्मो जगन्नाथात् साक्षान्नारायणान्नृप ॥ १० ॥

नरेश्वर! देवर्षि नारदने तो रहस्य और संग्रह- सहित इस धर्मको साक्षात् जगदीश्वर नारायणसे ही प्राप्त किया था ॥ १० ॥

एवमेष महान् धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम ।

कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ ११ ॥

नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार यह महान् धर्म मैंने तुम्हें पहले हरिगीतामें संक्षेपसे बताया है ॥ ११ ॥

कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं भुवि ।

को ह्यन्यः पुरुषव्याघ्र महाभारतकृद् भवेत् ॥ १२ ॥

पुरुषसिंह! तुम कृष्णद्वैपायन व्यासको इस भूतलपर नारायणका ही स्वरूप समझो ।

भला, भगवान्‌के सिवा दूसरा कौन महाभारतका कर्ता हो सकता है? ॥ १२ ॥

धर्मान् नानाविधांश्चैव को ब्रूयात् तमृते प्रभुम् ॥ १३ ॥

वर्ततां ते महायज्ञो यथा संकल्पितस्त्वया ।

संकल्पिताश्वमेधस्त्वं श्रुतधर्मश्च तत्त्वतः ॥ १४ ॥

भगवान्‌के सिवा दूसरा कौन ऐसा है, जो नाना प्रकारके धर्मोंका वर्णन कर सके? तुम्हारा यह महान् यज्ञ, जैसा कि तुमने संकल्प कर रक्खा है, निरन्तर चालू रहे । तुमने अश्वमेध - यज्ञ करनेका संकल्प लिया है और सब धर्मोंका यथार्थ रूपसे श्रवण किया है ॥ १३-१४ ॥ सौतिरुवाच

एतत् तु महदाख्यानं श्रुत्वा पार्थिवसत्तमः ।

ततो यज्ञसमाप्यर्थं क्रियाः सर्वाः समारभत् ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2364

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सूतपुत्र कहते हैं - शौनक! वैशम्पायनजीके मुखसे यह महान् उपाख्यान सुनकर राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजयने अपने यज्ञको पूर्ण करनेका सारा कार्य आरम्भ किया ॥ १५ ॥

नारायणीयमाख्यानमेतत् ते कथितं मया ।

पृष्टेन शौनकाद्येह नैमिषारण्यवासिषु ॥ १६ ॥

शौनक! आज तुम्हारे प्रश्नके अनुसार इन नैमिषारण्यनिवासी मुनियोंके समीप मैंने यहाँ यह नारायणका माहात्म्य- सम्बन्धी उपाख्यान तुम्हें सुनाया है ॥ १६ ॥

नारदेन पुरा राजन् गुरवे मे निवेदितम् ।

ऋषीणां पाण्डवानां च शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः ॥ १७ ॥

राजन्! पूर्वकालमें नारदजीने ऋषियों, पाण्डवों, श्रीकृष्ण तथा भीष्मके सुनते हुए यह प्रसंग मेरे गुरु व्यासजीको बताया था ॥ १७ ॥

स हि परमगुरुर्जन भुवनपतिः

पृथुधरणिधरः श्रुतिविनयनिधिः ।

शमनियमनिधिर्द्विजपरमहित- स्तव भवतु गतिर्हरिरमरहितः ॥ १८ ॥

वे परम गुरु, जनपति, भुवनपति, विशाल पृथ्वीको धारण करनेवाले, वेदज्ञान और विनयके भण्डार, शम और नियमकी निधि, ब्राह्मणोंके परम हितैषी तथा देवताओंके हितचिन्तक श्रीहरि तुम्हारे आश्रय हों ॥ १८ ॥

असुरवधकरस्तपसां निधिः

सुमहतां यशसां च भाजनम् ।

मधुकैटभहा कृतधर्मविदां गतिदो- ऽभयदो मखभागहरोऽस्तु शरणं स ते ॥ १ ९ ॥

असुरोंका वध करनेवाले, तपस्याकी निधि, विशाल यशके भाजन, मधु और कैटभके हन्ता, सत्ययुगके धर्मोंका ज्ञान रखकर उनका पालन करनेवालोंको सद्गति प्रदान करनेवाले, अभयदाता तथा यज्ञका भाग ग्रहण करनेवाले भगवान् नारायण तुम्हें शरण दें ॥ १ ९ ॥ त्रिगुणो विगुणश्चतुरात्मधरः पूर्तेष्टयोश्च फलभागहरः । विदधातु नित्यमजितोऽतिचलो गतिमात्मगां सुकृतिनामृषीणाम् ॥ २० ॥

जो तीनों गुणोंसे विशिष्ट होते हुए भी निर्गुण हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नामक चार विग्रहोंको धारण करनेवाले हैं, इष्ट ( यज्ञ- याग आदि ), आपूर्त (वापी, कूप, तड़ाग-निर्माण आदि ) के फलभागको ग्रहण करनेवाले हैं, जो कभी किसीसे पराजित

पृष्ठ 2365

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नहीं होते तथा धैर्य या मर्यादासे विचलित नहीं होते, वे भगवान् श्रीहरि पुण्यात्मा ऋषियोंको आत्मज्ञानजन्य सद्गति प्रदान करें ॥ २० ॥

तं लोकसाक्षिणमजं पुरुषं पुराणं रविवर्णमीश्वरं गतिं बहुशः । प्रणमध्वमेकमनसो यतः सलिलोद्भवोऽपि तमृषिं प्रणतः ॥ २१ ॥

जो सम्पूर्ण जगत्के साक्षी, अजन्मा, अन्तर्यामी, पुराणपुरुष, सूर्यके समान तेजस्वी, ईश्वर और सब प्रकारसे सबकी गति हैं, उन परमेश्वरको तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करो; क्योंकि उन वासुदेवस्वरूप नारायण ऋषिको शेषशायी भी प्रणाम करते हैं ॥ २१ ॥

स हि लोकयोनिरमृतस्य पदं सूक्ष्मं परायणमचलं हि पदम् । तत्सांख्ययोगिभिरुदारवृतं बुद्धया यतात्मभिरिदं सनातनम् ॥ २२ ॥

वे इस जगत्के आदिकारण, अमृतपद ( मोक्षके आश्रय) सूक्ष्मस्वरूप, दूसरोंको शरण देनेवाले, अविचल और सनातन पद हैं । उदार शौनक! अपने मनको वशमें रखनेवाले सांख्ययोगी बुद्धिके द्वारा उन्हींका वरण करते हैं ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये षट्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौछियालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३४६ ॥

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पृष्ठ 2366

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सप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः हयग्रीव - अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन शौनक उवाच

श्रुतं भगवतस्तस्य माहात्म्यं परमात्मनः ।

जन्म धर्मगृहे चैव नरनारायणात्मकम् ॥ १ ॥

शौनकने कहा – सूतनन्दन! हमलोगोंने षड्विधि ऐश्वर्यसे सम्पन्न उन परमात्मा श्रीहरिका माहात्म्य सुना और धर्मके घरमें उन्होंने ही नर- नारायणरूपसे जन्म ग्रहण किया था, इस बातको भी जान लिया ॥ १ ॥

महावराहसृष्टा च पिण्डोत्पत्तिः पुरातनी ।

प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यो यथा परिकल्पितः ॥ २ ॥

तथा च नः श्रुतो ब्रह्मन् कथ्यमानस्त्वयानघ । निष्पाप सूतपुत्र! भगवान् महावराहने जो प्राचीन कालमें पिण्डोंकी उत्पत्ति करके पिण्डदानकी मर्यादा चलायी तथा प्रवृत्ति और निवृत्तिके विषयमें जिस विधिकी जैसी कल्पना की, वह सब आपके मुखसे हमलोंगोंने सुना ॥ २३ ॥

हव्यकव्यभुजो विष्णुरुदक्पूर्वे महोदधौ ॥ ३ ॥

यच्च तत् कथितं पूर्वं त्वया हयशिरो महत् ।

तच्च दृष्टं भगवता ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥। ४ ॥

समुद्रके उत्तर- पूर्वभागमें हव्य और कव्यका भोग ग्रहण करनेवाले भगवान् विष्णुने महान् हयग्रीवावतार धारण किया था, यह बात आपने पहले मुझसे कही थी । साथ ही यह भी बतायी थी कि भगवान् परमेष्ठी ब्रह्माने उस रूपका प्रत्यक्ष दर्शन किया था ॥ ३-४ ॥

किं तदुत्पादितं पूर्वं हरिणा लोकधारिणा ।

रूपं प्रभावं महतामपूर्वं धीमतां वर ॥ ५ ॥

महान् बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र! सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करनेवाले श्रीहरिने पूर्वकालमें वह अद्भुत प्रभावशाली रूप क्यों प्रकट किया? उनका वैसा रूप तो पहले कभी देखनेमें नहीं आया था ॥ ५ ॥

दृष्ट्वा हि विबुधश्रेष्ठमपूर्वममितौजसम् ।

तदश्वशिरसं पुण्यं ब्रह्मा किमकरोन्मुने ॥ ६ ॥

मुने! अमित बलशाली एवं अपूर्वरूपधारी उन पुण्यात्मा सुरश्रेष्ठ हयग्रीवका दर्शन करके ब्रह्माजीने क्या किया? ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2367

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एतन्नः संशयं ब्रह्मन् पुराणं ज्ञानसम्भवम् ।

कथयस्वोत्तममते महापुरुषनिर्मितम् ॥ ७ ॥

पाविताः स्म त्वया ब्रह्मन् पुण्यां कथयता कथाम् । सूतनन्दन! आपकी बुद्धि बड़ी उत्तम है । महापुरुष भगवान्‌के अवतारसम्बन्धी इस

पुरातन ज्ञानके विषयमें हमलोगोंको संशय हो रहा है । आप इसका समाधान कीजिये ।

आपने यह पुण्यमयी कथा कहकर हमलोगोंको पवित्र कर दिया है ॥ ७३ ॥।

सौतिरुवाच कथयिष्यामि ते सर्वं पुराणं वेदसम्मितम् ॥ ८ ॥

जगौ यद् भगवान् व्यासो राज्ञः पारिक्षितस्य वै । सूतपुत्रने कहा— शौनकजी! मैं तुमसे वेदतुल्य प्रमाणभूत सारा पुरातन वृत्तान्त कहूँगा, जिसे भगवान् व्यास - राजा जनमेजयको सुनाया था ॥ ८३ ॥

श्रुत्वाश्वशिरसो मूर्ति देवस्य हरिमेधसः ॥ ९ ॥

उत्पन्नसंशयो राजा एतदेवमचोदयत् । भगवान् विष्णुके हयग्रीवावतारकी चर्चा सुनकर तुम्हारी ही तरह राजा जनमेजयको भी संदेह हो गया था । तब उन्होंने इस प्रकार प्रश्न किया – ॥ ९ ३ ॥ जनमेजय उवाच यत्तद् दर्शितवान् ब्रह्मा देवं हयशिरोधरम् ॥ १० ॥

किमर्थं तत् समभवत् तन्ममाचक्ष्व सत्तम । जनमेजय बोले- सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मुने! ब्रह्माजीने भगवान्‌के जिस हयग्रीवावतारका दर्शन किया था, उसका प्रादुर्भाव किसलिये हुआ था? यह मुझे बताइये ॥ वैशम्पायन उवाच यत् किंचिदिह लोके वै देहसत्त्वं विशाम्पते ॥ ११ ॥

सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिभिः । वैशम्पायनजीने कहा-प्रजानाथ! इस जगत्में जितने प्राणी हैं, वे सब ईश्वरके संकल्पसे उत्पन्न हुए पाँच महाभूतोंसे युक्त हैं ॥ ११३ ॥

ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नातयणो विराट् ॥ १२ ॥

भूतान्तरात्मा वरदः सगुणो निर्गुणोऽपि च । विराट्स्वरूप भगवान् नारायण इस जगत्के ईश्वर और स्रष्टा हैं, वे ही सब जीवोंके अन्तरात्मा, वरदाता, सगुण और निर्गुणरूप हैं ॥ १२३ ॥

भूतप्रलयमत्यन्तं शृणुष्व नृपसत्तम ॥ १३ ॥

धरण्यामथ लीनायामप्सु चैकार्णवे पुरा ।

पृष्ठ 2368

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ज्योतिर्भूते जले चापि लीने ज्योतिषि चानिले ॥ १४ ॥

वायौ चाकाशसंलीने आकाशे च मनोऽनुगे ।

व्यक्ते मनसि संलीने व्यक्ते चाव्यक्ततां गते ॥ १५ ॥

अव्यक्ते पुरुषं याते पुंसि सर्वगतेऽपि च ।

तम एवाभवत् सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ॥ १६ ॥

नृपश्रेष्ठ! अब तुम पञ्चभूतोंके आत्यन्तिक प्रलयकी बात सुनो । पूर्वकालमें जब इस पृथ्वीका एकार्णवके जलमें लय हो गया । जलका तेजमें, तेजका वायुमें, वायुका आकाशमें, आकाशका मनमें, मनका व्यक्त ( महत्तत्त्व) में, व्यक्तका अव्यक्त प्रकृतिमें, अव्यक्तका पुरुषमें अर्थात् मायाविशिष्ट ईश्वरमें और पुरुषका सर्वव्यापी परमात्मामें लय हो गया, उस समय सब ओर केवल अन्धकार -ही - अन्धकार छा गया । उसके सिवा और कुछ भी जान नहीं पड़ता था ॥ १३-१६ ॥

तमसो ब्रह्म सम्भूतं तमोमूलामृतात्मकम् ।

तद्विश्वभावसंज्ञान्तं पौरुषीं तनुमाश्रितम् ॥ १७ ॥

तमसे जगत्का कारणभूत ब्रह्म ( परम व्योम) प्रकट हुआ है । तमका मूल है अधिष्ठानभूत अमृततत्त्व । वह मूलभूत अमृत ही तमसे युक्त हो सभी नाम- रूपमें प्रपञ्चको प्रकट करता है और विराट् शरीरका आश्रय लेकर रहता है ॥ १७ ॥

सोऽनिरुद्ध इति प्रोक्तस्तत् प्रधानं प्रचक्षते ।

तदव्यक्तमिति ज्ञेयं त्रिगुणं नृपसत्तम ॥ १८ ॥

नृपश्रेष्ठ! उसीको अनिरुद्ध कहा गया है । उसीको प्रधान भी कहते हैं तथा उसीको त्रिगुणमय अव्यक्त जानना चाहिये ॥ १८ ॥

विद्यासहायवान् देवो विष्वक्सेनो हरिःप्रभुः ।

अप्स्वेव शयनं चक्रे निद्रायोगमुपागतः ॥ १९ ॥

उस अवस्थामें विद्याशक्तिसे सम्पन्न सर्वव्यापी भगवान् श्रीहरिने योगनिद्राका आश्रय लेकर जलमें शयन किया ॥ १ ९ ॥

जगतश्चिन्तयन् सृष्टिं चित्रां बहुगुणोद्भवाम् ।

तस्य चिन्तयतः सृष्टिं महानात्मगुणः स्मृतः ॥ २० ॥

अहंकारस्ततो जातो ब्रह्मा स तु चतुर्मुखः ।

हिरण्यगर्भो भगवान् सर्वलोकपितामहः ॥ २१ ॥

उस समय वे नाना गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली जगत्की अद्भुत सृष्टिके विषयमें विचार करने लगे । सृष्टिके विषयमें विचार करते हुए उन्हें अपने गुण महान् ( महत्तत्त्व) का स्मरण हो आया । उससे अहंकार प्रकट हुआ । वह अहंकार ही चार मुखोंवाले ब्रह्माजी हैं, जो सम्पूर्ण लोकोंके पितामह और भगवान् हिरण्यगर्भके नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ २०-२१ ॥ पद्मेऽनिरुद्धात् सम्भूतस्तदा पद्मनिभेक्षणः ।

पृष्ठ 2369

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सहस्रपत्रे द्युतिमानुपविष्टः सनातनः ॥ २२ ॥

ददृशेऽद्भुतसंकाशो लोकानापोमयान् प्रभुः ।

सत्त्वस्थः परमेष्ठी स ततो भूतगणान् सृजन् ॥ २३ ॥

ब्रह्माण्डमें कमलमें अनिरुद्ध ( अहंकार) से कमलनयन ब्रह्माका उस समय प्रादुर्भाव हुआ था । वे अद्भुत रूपधारी एवं तेजस्वी सनातन भगवान् ब्रह्मा सहस्रदल कमलपर विराजमान हो जब इधर- उधर दृष्टि डालने लगे, तब उन्हें समस्त जगत् जलमय दिखायी दिया । तब ब्रह्माजी सत्त्वगुणमें स्थित होकर प्राणियोंकी सृष्टिमें प्रवृत्त हुए ॥ २२-२३ ॥

पूर्वमेव च पद्मस्य पत्रे सूर्यांशुसप्रभे ।

नारायणकृतौ बिन्दू अपामास्तां गुणोत्तरौ ॥ २४ ॥

वे जिस कमलपर बैठे थे, उसका पत्ता सूर्यके समान देदीप्यमान होता था । उसपर पहलेसे ही भगवान् नारायणकी प्रेरणासे जलकी बूँदें पड़ी थीं, जो रजोगुण और तमोगुणकी प्रतीक थीं ॥ २४ ॥

तावपश्यत् स भगवाननादिनिधनोऽच्युतः ।

एकस्तत्राभवद् बिन्दुर्मध्वाभो रुचिरप्रभः ॥ २५ ॥

स तामसो मधुर्जातस्तदा नारायणाज्ञया ।

कठिनस्त्वपरो बिन्दुः कैटभो राजसस्तु सः ॥ २६ ॥

आदि- अन्तसे रहित भगवान् अच्युतने उन दोनों बूँदोंकी ओर देखा । उनमेंसे एक बूँद भगवान्‌की दृष्टि पड़ते ही उनकी प्रेरणासे तमोमय मधुनामक दैत्यके आकारमें परिणत हो गयी । उस दैत्यका रंग मधुके समान था और उसकी कान्ति बड़ी सुन्दर थी । जलकी दूसरी बूँद, जो कुछ कड़ी थी, नारायणकी आज्ञासे रजोगुणसे उत्पन्न कैटभ नामक दैत्यके रूपमें प्रकट हुई ॥

तावभ्यधावतां श्रेष्ठौ तमसा रजसान्वितौ ।

बलवन्तौ गदाहस्तौ पद्मनालानुसारिणौ ॥ २७ ॥

तमोगुण और रजोगुणसे युक्त वे दोनों श्रेष्ठ दैत्य मधु और कैटभ बड़े बलवान् थे । वे अपने हाथोंमें गदा लिये कमलनालका अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने लगे ॥ २७ ॥

ददृशातेऽरविन्दस्थं ब्रह्माणममितप्रभम् ।

सृजन्तं प्रथमं वेदांश्चतुरश्चारुविग्रहान् ॥ २८ ॥

ऊपर जाकर उन्होंने कमल- पुष्पके आसनपर बैठकर सृष्टि रचनामें प्रवृत्त हुए अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको देखा एवं उनके पास ही मनोहर रूप धारण किये हुए चारों वेदोंको देखा ॥ २८ ॥

ततो विग्रहवन्तौ तौ वेदान् दृष्ट्वासुरोत्तमी ।

सहसा जगृहतुर्वेदान् ब्रह्मणः पश्यतस्तदा ॥ २९ ॥

पृष्ठ 2370

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उन विशालकाय श्रेष्ठ असुरोंने उस समय वेदोंपर दृष्टि पड़ते ही उन्हें ब्रह्माजीके देखते-देखते सहसा हर लिया ॥ २ ९ ॥

अथ तौ दानवश्रेष्ठौ वेदान् गृह्य सनातनान् ।

रसां विविशतुस्तुर्णमुदक्पूर्वे महोदधौ ॥ ३० ॥

सनातन वेदोंका अपहरण करके वे दोनों श्रेष्ठ दानव उत्तर- पूर्ववर्ती महासागरमें घुस गये और तुरंत रसातलमें जा पहुँचे ॥ ३० ॥

ततो हतेषु वेदेषु ब्रह्मा कश्मलमाविशत् ।

ततो वचनमीशानं प्राह वेदैर्विनाकृतः ॥ ३१ ॥

वेदोंका अपहरण हो जानेपर ब्रह्माजीको बड़ा खेद हुआ। उनपर मोह छा गया । वे वेदोंसे वंचित होकर मन- ही - मन परमात्मासे इस प्रकार कहने लगे ॥ ३१ ॥

ब्रह्मोवाच

वेदा मे परमं चक्षुर्वेदा मे परमं बलम् ।

वेदा मे परमं धाम वेदा मे ब्रह्म चोत्तरम् ॥ ३२ ॥

ब्रह्मा बोले — भगवन्! वेद ही मेरे उत्तम नेत्र हैं, वेद ही मेरे परम बल हैं। वेद ही मेरे परम आश्रय तथा वेद ही मेरे सर्वोत्तम उपास्य देव हैं ॥ ३२ ॥

मम वेदा हृताः सर्वे दानवाभ्यां बलादितः ।

अन्धकारा हि मे लोका जाता वेदैर्विनाकृताः ॥ ३३ ॥

मेरे वे सभी वेद आज दो दानवोंने बलपूर्वक यहाँसे छीन लिये हैं । अब वेदोंके बिना मेरे लिये सम्पूर्ण लोक अन्धकारमय हो गये हैं ॥ ३३ ॥

वेदानृते हि किं कुर्यां लोकानां सृष्टिमुत्तमाम् ।

अहो बत महद् दुःखं वेदनाशनजं मम ॥ ३४ ॥

प्राप्तं दुनोति हृदयं तीव्रं शोकपरायणम् ।

को हि शोकार्णवे मग्नं मामितोऽद्य समुद्धरेत् ॥ ३५ ॥

वेदांस्तांश्चानयेन्नष्टान् कस्य चाहं प्रियो भवे । मैं वेदोंके बिना संसारकी उत्तम सृष्टि कैसे कर सकता हूँ? अहो! आज वेदोंके नष्ट होनेसे मुझपर बड़ा भारी दुःख आ पड़ा है, जो मेरे शोकमग्न हृदयको दुःसह पीड़ा दे रहा है । आज शोकके समुद्रमें डूबे हुए मुझ असहायका यहाँसे कौन उद्धार करेगा? उन नष्ट हुए वेदोंको कौन लायेगा? मैं किसको इतना प्रिय हूँ, जो मेरी ऐसी सहायता करेगा? ॥ ३४-३५ ३ ॥ इत्येवं भाषमाणस्य ब्रह्मणो नृपसत्तम ॥ ३६ ॥

हरेः स्तोत्रार्थमुद्भूता बुद्धिर्बुद्धिमतां वर ।

ततो जगौ परं जप्यं साञ्जलिप्रग्रहः प्रभुः ॥ ३७ ॥