श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2371–2380

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2371–2380

पृष्ठ 2371

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नृपश्रेष्ठ! ऐसी बातें कहते हुए ब्रह्माजीके मनमें भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करनेका विचार उत्पन्न हुआ । बुद्धिमानोंमें अग्रगण्य नरेश! तब भगवान् ब्रह्माने हाथ जोड़कर उत्तम एवं जपने योग्य स्तोत्रका गान आरम्भ किया ॥ ३६-३७ ॥ ब्रह्मोवाच

ॐनमस्ते ब्रह्महृदय नमस्ते मम पूर्वज ।

लोकाद्य भुवनश्रेष्ठ सांख्ययोगनिधे प्रभो ॥ ३८ ॥

ब्रह्माजी बोले- प्रभो! वेद आपका हृदय है, आपको नमस्कार है । मेरे पूर्वज! आपको प्रणाम है । जगत्के आदि कारण! भुवनश्रेष्ठ! सांख्ययोगनिधे! प्रभो! आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ३८ ॥

व्यक्ताव्यक्तकराचिन्त्य क्षेमं पन्थानमास्थित ।

विश्वभुक् सर्वभूतानामन्तरात्मन्नयोनिज ।

अहं प्रसादजस्तुभ्यं लोकधाम स्वयम्भुवः ॥ ३ ९ ॥

व्यक्त जगत् और अव्यक्त प्रकृतिको उत्पन्न करनेवाले परमात्मन्! आपका स्वरूप अचिन्त्य है । आप कल्याणमय मार्गमें स्थित हैं । विश्वपालक! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा, किसी योनिसे उत्पन्न न होनेवाले, जगत्‌के आधार और स्वयम्भू हैं । मैं आपकी कृपासे उत्पन्न हुआ हूँ ॥ ३ ९ ॥

त्वत्तो मे मानसं जन्म प्रथमं द्विजपूजितम् ।

चाक्षुषं वै द्वितीयं मे जन्म चासीत् पुरातनम् ॥ ४० ॥

आपसे मेरा प्रथम बार जो जन्म हुआ था, वह द्विजोंद्वारा सम्मानित मानस -जन्म कहा गया है अर्थात् प्रथम बार मैं आपके मनसे उत्पन्न हुआ । तदनन्तर पूर्वकालमें मैं आपके

नेत्रसे उत्पन्न हुआ । वह मेरा दूसरा जन्म था ॥ ४० ॥

त्वत्प्रसादात् तु मे जन्म तृतीयं वाचिकं महत् ।

त्वत्तः श्रवणजं चापि चतुर्थं जन्म मे विभो ॥ ४१ ॥

तत्पश्चात् आपके कृपाप्रसादसे मेरा जो तीसरा महत्त्वपूर्ण जन्म हुआ, वह वाचिक था अर्थात् आपके वचनमात्रसे सुलभ हो गया था । विभो! उसके बाद आपके कानोंसे मेरा चतुर्थ जन्म हुआ था ॥ ४१ ॥

नासिक्यं चापि मे जन्म त्वत्तः परममुच्यते ।

अण्डजं चापि मे जन्म त्वत्तः षष्ठं विनिर्मितम् ॥ ४२ ॥

उसके बाद आपकी नासिकासे मेरा पाँचवाँ उत्तम जन्म बताया जाता है । तदनन्तर मैं

आपके द्वारा ब्रह्माण्डसे उत्पन्न किया गया । वह मेरा छठा जन्म था ॥ ४२ ॥

इदं च सप्तमं जन्म पद्मजन्मेति वै प्रभो ।

सर्गे सर्गे ह्यहं पुत्रस्तव त्रिगुणवर्जित ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 2372

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प्रभो! यह मेरा सातवाँ जन्म है, जो कमलसे उत्पन्न हुआ है । त्रिगुणातीत परमेश्वर! मैं प्रत्येक कल्पमें आपका पुत्र होकर प्रकट होता हूँ ॥ ४३ ॥

प्रथितः पुण्डरीकाक्ष प्रधानगुणकल्पितः ।

त्वमीश्वरः स्वभावश्च स्वयम्भूः पुरुषोत्तम ॥ ४४ ॥

कमलनयन! आपका पुत्र मैं शुद्ध सत्त्वमय शरीरसे उत्पन्न हुआ हूँ । आप ईश्वर, स्वभाव, स्वयम्भू एवं पुरुषोत्तम हैं ॥ ४४ ॥

त्वया विनिर्मितोऽहं वै वेदचक्षुर्वयोतिगः ।

ते मे वेदा हृताश्चक्षुरन्धो जातोऽस्मि जागृहि ॥ ४५ ॥

ददस्व चक्षूंषि मम प्रियोऽहं ते प्रियोऽसि मे । आपने मुझे वेदरूपी नेत्रोंसे युक्त बनाया है । आपकी ही कृपासे कालातीत हूँ- मुझपर कालका जोर नहीं चलता । मेरे नेत्ररूप वे वेद दानवोंद्वारा हर लिये गये हैं; अतः मैं अन्धा-सा हो गया हूँ। प्रभो! निद्रा त्यागकर जागिये । मुझे मेरे नेत्र वापस दीजिये; क्योंकि मैं आपका प्रिय भक्त हूँ और आप मेरे प्रियतम स्वामी हैं ॥ ४५३ ॥

एवं स्तुतः स भगवान् पुरुषः सर्वतोमुखः ॥ ४६ ॥

जौ निद्रामथ तदा वेदकार्यार्थमुद्यतः । ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर सब ओर मुखवाले सबके अन्तर्यामी आत्मा भगवान्ने उसी क्षण निद्रा त्याग दी और वे वेदोंकी रक्षा करनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ४६३ || ऐश्वर्येण प्रयोगेण द्वितीयां तनुमास्थितः ॥ ४७ ॥

सुनासिकेन कायेन भूत्वा चन्द्रप्रभस्तदा ।

कृत्वा हयशिरः शुभ्रं वेदानामालयं प्रभुः ॥ ४८ ॥

उन्होंने अपने ऐश्वर्यके योगसे दूसरा शरीर धारण किया, जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान् था । सुन्दर नासिकावाले शरीरसे युक्त हो वे प्रभु घोड़ेके समान गर्दन और

मुखधारण करके स्थित हुए । उनका वह शुद्ध मुख सम्पूर्ण वेदोंका आलय था ॥ ४७-४८ ॥

तस्य मूर्धा समभवद् द्यौः सनक्षत्रतारका ।

केशाश्चास्याभवन् दीर्घा रवेरंशुसमप्रभाः ॥ ४ ९ ॥

नक्षत्रों और ताराओंसे युक्त स्वर्गलोक उनका सिर था । सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बड़े - बड़े बाल थे ॥ ४ ९ ॥

कर्णावाकाशपाताले ललाटं भूतधारिणी ।

गङ्गा सरस्वती श्रोण्यौ भ्रुवावास्तां महोदधी ॥ ५० ॥

आकाश और पाताल उनके कान थे एवं समस्त भूतोंको धारण करनेवाली पृथ्वी ललाट थी । गंगा और सरस्वती उनके नितम्ब तथा दो समुद्र उनकी दोनों भौंहें थे ॥ ५० ॥

चक्षुषी सोमसूर्यौ ते नासा संध्या पुनः स्मृता ।

पृष्ठ 2373

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ॐ कारस्त्वथ संस्कारो विद्युज्जिह्वा च निर्मिता ॥ ५१ ॥

दन्ताश्च पितरो राजन् सोमपा इति विश्रुताः ।

गोलोको ब्रह्मलोकश्च ओष्ठावास्तां महात्मनः ॥ ५२ ॥

चन्द्रमा और सूर्य उनके दोनों नेत्र तथा नासिका संध्या थी । ॐकार संस्कार ( आभूषण ) और विद्युत् जिह्वा बनी हुई थी । राजन्! सोमपान करनेवाले पितर उनके दाँत सुने गये हैं तथा गोलोक और ब्रह्मलोक उन महात्माके ओष्ठ थे ॥ ५१-५२ ॥

ग्रीवा चास्याभवद् राजन् कालरात्रिर्गुणोत्तरा ।

एतद्धयशिरः कृत्वा नानामूर्तिभिरावृतम् ॥ ५३ ॥

अन्तर्दधौ स विश्वेशो विवेश च रसां प्रभुः । नरेश्वर! तमोमयी कालरात्रि उनकी ग्रीवा थी । इस प्रकार अनेक मूर्तियोंसे आवृत हयग्रीव रूप धारण करके वे जगदीश्वर श्रीहरि वहाँसे अन्तर्धान हो गये और रसातलमें जा पहुँचे ॥ ५३ ॥

रसां पुनः प्रविष्टश्च योगं परममास्थितः ॥ ५४ ॥

शैक्ष्यं स्वरं समास्थाय उद्गीतं प्रासृजत् स्वरम् । रसातलमें प्रवेश करके परम योगका आश्रय ले शिक्षाके नियमानुसार उदात्त आदि स्वरोंसे युक्त उच्च स्वरसे सामवेदका गान करने लगे ॥ ५४३ ॥

स स्वरः सानुनादी च सर्वशः स्निग्ध एव च ॥ ५५ ॥

बभूवान्तर्महीभूतः सर्वभूतगुणोदितः । नाद और स्वरसे विशिष्ट सामगानकी वह सर्वथा स्निग्ध एवं मधुर ध्वनि रसातलमें सब ओर फैल गयी, जो समस्त प्राणियोंके लिये गुणकारक थी ॥ ५५३ ॥

ततस्तावसुरौ कृत्वा वेदान् समयबन्धनान् ॥ ५६ ॥

रसातले विनिक्षिप्य यतः शब्दस्ततो द्रुतौ । उन दोनों असुरोंने वह शब्द सुनकर वेदोंको कालपाशसे आबद्ध करके रसातलमें फेंक दिया और स्वयं उसी ओर दौड़े जिधरसे वह ध्वनि आ रही थी ॥ ५६३ ॥

एतस्मिन्नन्तरे राजन् देवो हयशिरोधरः ॥ ५७ ॥

जग्राह वेदानखिलान् रसातल गतान् हरिः ।

प्रादाच्च ब्रह्मणे भूयस्ततः स्वां प्रकृतिं गतः ॥ ५८ ॥

राजन्! इसी बीचमें हयग्रीव रूपधारी भगवान् श्रीहरिने रसातलमें पड़े हुए उन सम्पूर्ण वेदोंको ले लिया तथा ब्रह्माजीको पुनः वापस दे दिया और फिर वे अपने आदि रूपमें आ गये ॥ ५७-५८ ॥

स्थापयित्वा हयशिर उदक्पूर्वे महोदधौ ।

वेदानामालयं चापि बभूवाश्वशिरास्ततः ॥ ५ ९ ॥

पृष्ठ 2374

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भगवान्‌ने महासागरके पूर्वोत्तरभागमें वेदोंके आश्रयभूत अपने हयग्रीव रूपकी स्थापना करके पुनः पूर्वरूप धारण कर लिया । तबसे भगवान् हयग्रीव वहीं रहने लगे ॥ ५ ९ ॥

अथ किंचिदपश्यन्तौ दानवौ मधुकैटभौ ।

पुनराजग्मतुस्तत्र वेगितौ पश्यतां च तौ ॥ ६० ॥

यत्र वेदा विनिक्षिप्तास्तत् स्थानं शून्यमेव च । इधर वेदध्वनिके स्थानपर आकर मधु और कैटभ दोनों दानवोंने जब कुछ नहीं देखा, तब वे बड़े वेगसे फिर वहीं लौट आये, जहाँ उन वेदोंको नीचे डाल रखा था । वहाँ देखनेपर उन्हें वह स्थान सूना ही दिखायी दिया ॥ ६० ॥

तत उत्तममास्थाय वेगं बलवतां वरौ ॥ ६१ ॥

पुनरुत्तस्थतुः शीघ्रं रसानामालयात् तदा ।

ददृशाते च पुरुषं तमेवादिकरं प्रभुम् ॥ ६२ ॥

श्वेतं चन्द्रविशुद्धाभमनिरुद्धतनौ स्थितम् ।

भूयोऽप्यमितविक्रान्तं निद्रायोगमुपागतम् ॥ ६३ ॥

तब वे बलवानोंमें श्रेष्ठ दोनों दानव पुनः उत्तम वेगका आश्रय ले रसातलसे शीघ्र ही ऊपर उठे और ऊपर आकर देखते हैं तो वे ही आदिकर्ता भगवान् पुरुषोत्तम दृष्टिगोचर हुए । जो चन्द्रमाके समान विशुद्ध, उज्ज्वल प्रभासे विभूषित, गौरवर्णके थे । वे उस समय अनिरुद्ध- विग्रहमें स्थित थे और वे अमित पराक्रमी भगवान् योगनिद्राका आश्रय लेकर सो रहे थे ॥

आत्मप्रमाणरचिते अपामुपरि कल्पिते ।

शयने नागभोगाढ्ये ज्वालामालासमावृते ॥ ६४ ॥

निष्कल्मषेण सत्त्वेन सम्पन्नं रुचिरप्रभम् ।

तं दृष्ट्वा दानवेन्द्रौ तौ महाहासममुञ्चताम् ॥ ६५ ॥

पानीके ऊपर शेषनागके शरीरकी शय्या निर्मित हुई थी, जिसकी लम्बाई भगवान्‌के श्रीविग्रहके अनुरूप ही थी। वह शय्या ज्वालामालाओंसे आवृत जान पड़ती थी । उसके ऊपर विशुद्ध सत्त्वगुणसे सम्पन्न मनोहर कान्तिवाले भगवान् नारायण सो रहे थे । उन्हें देखकर वे दोनों दानवराज ठहाका मारकर जोर- जोरसे हँसने लगे ॥ ६४-६५ ॥

ऊचतुश्च समाविष्टौ रजसा तमसा च तौ ।

अयं स पुरुषः श्वेतः शेते निद्रामुपागतः ॥ ६६ ॥

अनेन नूनं वेदानां कृतमाहरणं रसात् ।

कस्यैष को नु खल्वेष किं च स्वपिति भोगवान् ॥ ६७ ॥

रजोगुण और तमोगुणसे आविष्ट हुए वे दोनों असुर परस्पर कहने लगे, ‘ यह जो श्वेतवर्णवाला पुरुष निद्रामें निमग्न होकर सो रहा है, निश्चय ही इसीने रसातलसे वेदोंका

पृष्ठ 2375

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अपहरण किया है । यह किसका पुत्र है? कौन है? और क्यों यहाँ सर्पके शरीरकी शय्यापर सो रहा है? ' ॥ ६६-६७ ॥

इत्युच्चारितवाक्यौ तौ बोधयामासतुर्हरिम् ।

युद्धार्थिनौ हि विज्ञाय विबुद्धः पुरुषोत्तमः ॥ ६८ ॥

निरीक्ष्य चासुरेन्द्रौ तौ ततो युद्धे मनो दधे । इस प्रकार बातचीत करके उन दोनोंने भगवान्‌को जगाया । उन्हें युद्धके लिये उत्सुक जान भगवान् पुरुषोत्तम जाग उठे । फिर उन दोनों असुरेन्द्रोंका अच्छी तरह निरीक्षण करके उन्होंने मन- ही- मन उनके साथ युद्ध करनेका निश्चय किया ॥ ६८३ ॥

अथ युद्धं समभवत् तयोर्नारायणस्य वै ॥ ६ ९ ॥

रजस्तमोविष्टतनू तावुभौ मधुकैटभी ।

ब्रह्मणोपचितिं कुर्वन् जघान मधुसूदनः ॥ ७० ॥

फिर तो उन दोनों असुरोंका और भगवान् नारायणका युद्ध आरम्भ हो गया । भगवान् मधुसूदनने ब्रह्माजीका मान रखनेके लिये तमोगुण और रजोगुणसे आविष्ट शरीरवाले उन दोनों दैत्यों – मधु और कैटभको मार डाला ॥

ततस्तयोर्वधेनाशु वेदापहरणेन च ।

शोकापनयनं चक्रे ब्रह्मणः पुरुषोत्तमः ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 2376

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इस प्रकार वेदोंको वापस लाकर और मधु - कैटभका वध करके भगवान् पुरुषोत्तमने ब्रह्माजीका शोक दूर कर दिया ॥ ७१ ॥

ततः परिवृतो ब्रह्मा हरिणा वेदसत्कृतः ।

निर्ममे स तदा लोकान् कृत्स्नान् स्थावरजङ्गमान् ॥ ७२ ॥

तत्पश्चात् वेदसे सम्मानित और भगवान् से सुरक्षित होकर ब्रह्माजीने समस्त चराचर जगत्की सृष्टि की ॥ ७२ ॥

दत्त्वा पितामहायाग्र्यां मतिं लोकविसर्गिकीम् ।

तत्रैवान्तर्दधे देवो यत एवागतो हरिः ॥ ७३ ॥

ब्रह्माजीको लोक- रचनाकी श्रेष्ठ बुद्धि देकर भगवान् नारायणदेव वहीं अन्तर्धान हो गये । वे जहाँसे आये थे, वहीं चले गये ॥ ७३ ॥

तौ दानवौ हरिर्हत्वा कृत्वा हयशिरस्तनुम् ।

पुनः प्रवृत्तिधर्मार्थं तामेव विदधे तनुम् ॥ ७४ ॥

श्रीहरिने इस प्रकार हयग्रीवरूप धारण करके उन दोनों दानवोंका वध किया था । उन्होंने पुनः प्रवृत्तिधर्मका प्रचार करनेके लिये ही उस शरीरको प्रकट किया था ॥ ७४ ॥

एवमेव महाभागो बभूवाश्वशिरा हरिः ।

पौराणमेतत् प्रख्यातं रूपं वरदमैश्वरम् ॥ ७५ ॥

इस तरह महाभाग श्रीहरिने हयग्रीवरूप धारण किया था । भगवान्‌का यह वरदायक रूप पुरातन एवं पुराण-प्रसिद्ध है ॥ ७५ ॥

यो ह्येतद् ब्राह्मणो नित्यं शृणुयाद् धारयीत वा ।

न तस्याध्ययनं नाशमुपगच्छेत् कदाचन ॥ ७६ ॥

जो ब्राह्मण प्रतिदिन इस अवतार कथाको सुनता या स्मरण करता है, उसका अध्ययन कभी नष्ट ( निष्फल ) नहीं होता है ॥ ७६ ॥

आराध्य तपसोग्रेण देवं हयशिरोधरम् ।

पञ्चालेन क्रमः प्राप्तो देवेन पथि देशिते ॥ ७७ ॥

महादेवजीके बताये हुए मार्गपर चलकर उग्र तपस्याद्वारा भगवान् हयग्रीवकी आराधना करके पांचालदेशीय गालवमुनिने वेदोंका क्रमविभाग प्राप्त किया था ॥ ७७ ॥

एतद्धयशिरो राजन्नाख्यानं तव कीर्तितम् ।

पुराणं वेदसमितं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ७८ ॥

राजन्! तुमने जिसके लिये मुझसे पूछा था, यह हयग्रीवावतारकी वेदानुमोदित प्राचीन कथा मैंने तुम्हें सुना दी ॥ ७८ ॥

यां यामिच्छेत् तनुं देवः कर्तुं कार्यविधौ क्वचित् ।

तां तां कुर्याद् विकुर्वाणः स्वयमात्मानमात्मना ॥ ७ ९ ॥

पृष्ठ 2377

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 2377 का मूल पृष्ठ
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परमात्मा कार्यसाधनके लिये जिस -जिस शरीरको धारण करना चाहते हैं, उसे कार्य करते समय स्वयं ही प्रकट कर लेते हैं ॥ ७ ९ ॥

एष वेदनिधिः श्रीमानेष वै तपसो निधिः ।

एष योगश्च सांख्यं च ब्रह्म चाग्र्यं हविर्विभुः ॥ ८० ॥

ये श्रीमान् हरि वेद और तपस्याकी निधि हैं । ये ही योग, सांख्य, ब्रह्म, श्रेष्ठ हविष्य और विभु हैं ॥ ८० ॥

नारायणपरा वेदा यज्ञा नारायणात्मकाः ।

तपो नारायणपरं नारायणपरा गतिः ॥ ८१ ॥

वेदोंका पर्यवसान भगवान् नारायणमें ही है । यज्ञ नारायणके ही स्वरूप हैं । तपस्याके परम फल भगवान् नारायण ही हैं तथा नारायणकी प्राप्ति ही सर्वोत्तम गति है ॥ ८१ ॥

नारायणपरं सत्यमृतं नारायणात्मकम् ।

नारायणपरो धर्मः पुनरावृत्तिदुर्लभः ॥ ८२ ॥

सत्यके परम लक्ष्य नारायण ही हैं । ऋत नारायणका ही स्वरूप है । जिसके आचरणसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती, उस निवृत्तिप्रधान धर्मके भी चरम लक्ष्य भगवान् नारायण ही हैं ॥ ८२ ॥

प्रवृत्तिलक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः ।

नारायणात्मको गन्धो भूमौ श्रेष्ठतमः स्मृतः ॥ ८३ ॥

प्रवृत्तिरूप धर्म भी नारायणका ही स्वरूप है। भूमिका श्रेष्ठतम गुण गन्ध भी नारायणमय ही है ॥ ८३ ॥

अपां चापि गुणा राजन् रसा नारायणात्मकाः ।

ज्योतिषां च परं रूपं स्मृतं नारायणात्मकम् ॥ ८४ ॥

राजन्! जलका गुण रस भी नारायणका ही स्वरूप है । तेजका उत्तम गुण रूप भी नारायणमय ही है ॥ ८४ ॥

नारायणात्मकश्चापि स्पर्शो वायुगुणः स्मृतः ।

नारायणात्मकश्चैव शब्द आकाशसम्भवः ॥ ८५ ॥

वायुका गुण स्पर्श भी नारायणस्वरूप ही है तथा आकाशका गुण शब्द भी नारायणमय ही है ॥ ८५ ॥

मनश्चापि ततो भूतमव्यक्तगुणलक्षणम् ।

नारायणपरः कालो ज्योतिषामयनं च यत् ॥ ८६ ॥

अव्यक्त गुण एवं लक्षणवाला मन नामक भूत, काल और नक्षत्रमण्डल —–ये सब नारायणके ही आश्रित हैं ॥ ८६ ॥

नारायणपरा कीर्तिः श्रीश्च लक्ष्मीश्च देवताः ।

नारायणपरं सांख्यं योगो नारायणात्मकः ॥ ८७ ॥

पृष्ठ 2378

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कीर्ति, श्री और लक्ष्मी आदि देवियाँ नारायणको ही अपना परम आश्रय मानती हैं ।

सांख्यका परम तात्पर्य भी नारायण ही हैं और योग भी नारायणका ही स्वरूप है ॥ ८७ ॥

कारणं पुरुषो ह्येषां प्रधानं चापि कारणम् ।

स्वभावश्चैव कर्माणि दैवं येषां च कारणम् ॥ ८८ ॥

पुरुष, प्रधान, स्वभाव, कर्म तथा दैव -ये जिन वस्तुओंके कारण हैं, वे भी नारायणरूप ही हैं ॥ ८८ ॥

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।

विविधा च तथा चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ ८ ९ ॥

पञ्चकारणसंख्यातो निष्ठा सर्वत्र वै हरिः । अधिष्ठान, कर्ता, भिन्न- भिन्न प्रकारके करण, नाना प्रकारकी अलग- अलग चेष्टाएँ तथा पाँचवाँ दैव — इन पाँच कारणोंके रूपमें सर्वत्र श्रीहरि ही विराजमान हैं ॥ ८ ९ ॥ तत्त्वं जिज्ञासमानानां हेतुभिः सर्वतोमुखैः ॥ ९ ० ॥ तत्त्वमेको महायोगी हरिर्नारायणः प्रभुः । जो लोग सर्वव्यापक हेतुओंद्वारा तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखते हैं, उनके लिये महायोगी भगवान् नारायण हरि ही एकमात्र ज्ञातव्य तत्त्व हैं ॥ ९ ० ॥ ब्रह्मादीनां स लोकानामृषीणां च महात्मनाम् ॥ ९ १ ॥

सांख्यानां योगिनां चापि यतीनामात्मवेदिनाम् ।

मनीषितं विजानाति केशवो न तु तस्य ते ॥ ९ २ ॥

भगवान् केशव ब्रह्मा आदि देवताओं, सम्पूर्ण लोकों, महात्मा ऋषियों, सांख्यवेत्ताओं, योगियों और आत्मज्ञानी यतियोंके मनकी बातें भी जानते हैं; परंतु उनके मनमें क्या है? यह उनमें से किसीको पता नहीं है ॥

ये केचित् सर्वलोकेषु दैवं पित्र्यं च कुर्वते ।

दानानि च प्रयच्छन्ति तप्यन्ते च तपो महत् ॥ ९ ३ ॥

सर्वेषामाश्रयो विष्णुरैश्वरं विधिमास्थितः ।

सर्वभूतकृतावासो वासुदेवेति चोच्यते ॥ ९ ४ ॥

समस्त विश्वमें जो कोई देवताओंके लिये यज्ञ और पितरोंके लिये श्राद्ध करते हैं, दान देते हैं और बड़ी भारी तपस्या करते हैं, उन सबके आश्रय भगवान् विष्णु ही हैं । वे अपने ऐश्वर्ययोगमें स्थित रहते हैं । सम्पूर्ण प्राणियोंके आवासस्थान होनेके कारण वे ' वासुदेव' कहे जाते हैं ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥ अयं हि नित्यः परमो महर्षि- महाविभूतिर्गुणवर्जिताख्यः । गुणैश्च संयोगमुपैति शीघ्रं कालो यथर्तावृतुसम्प्रयुक्तः ॥ ९ ५ ॥

पृष्ठ 2379

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ये परम महर्षि नारायण नित्य, महान् ऐश्वर्यसे युक्त और गुणोंसे रहित हैं तथापि जैसे गुणहीन काल ऋतुके गुणोंसे युक्त होता है, उसी प्रकार वे भी समय-समयपर गुणोंको स्वीकार करके उनसे संयुक्त होते हैं ॥ ९ ५ ॥ नैवास्य विन्दन्ति गतिं महात्मनो न चागतिं कश्चिदिहानुपश्यति । ज्ञानात्मकाः सन्ति हि ये महर्षयः पश्यन्ति नित्यं पुरुषं गुणाधिकम् ॥ ९ ६ ॥ उन महात्माकी गतिको कोई नहीं जानता । उनके आगमनका भी यहाँ किसीको कुछ पता नहीं चलता । जो ज्ञानस्वरूप महर्षि हैं, वे ही उन नित्य, अन्तर्यामी एवं अनन्तगुणविभूषित परमात्माका साक्षात्कार करते हैं ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये सप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४७ ॥

* वैशम्पायनजीने जनमेजयको महाभारतकी कथा वेदव्यासजीकी आज्ञासे सुनायी थी इस कारण यहाँ ऐसा लिखा है ।

पृष्ठ 2380

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 2380 का मूल पृष्ठ
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अष्टचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः सात्वत - धर्मकी उपदेश - परम्परा तथा भगवान्‌के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा जनमेजय उवाच

अहो ह्येकान्तिनः सर्वान् प्रीणाति भगवान् हरिः ।

विधिप्रयुक्तां पूजां च गृह्णाति भगवान् स्वयम् ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा – ब्रह्मन्! भगवान् अनन्यभावसे भजन करनेवाले सभी भक्तोंको प्रसन्न करते और उनकी विधिवत् की हुई पूजाको स्वयं ग्रहण करते हैं; यह कितने आनन्दकी बात है ॥ १ ॥

ये तु दग्धेन्धना लोके पुण्यपापविवर्जिताः ।

तेषां त्वयाभिनिर्दिष्टा पारम्पर्यागता गतिः ॥ २ ॥

संसारमें जिन लोगोंकी वासनाएँ दग्ध हो गयी हैं और जो पुण्य- पापसे रहित हो गये हैं, उन्हें परम्परासे जो गति प्राप्त होती है, उसका भी आपने वर्णन किया है ॥

चतुर्थ्यां चैव ते गत्यां गच्छन्ति पुरुषोत्तमम् ।

एकान्तिनस्तु पुरुषा गच्छन्ति परमं पदम् ॥ ३ ॥

जो भगवान्के अनन्य भक्त हैं, वे साधुपुरुष अनिरुद्ध, प्रद्युम्न और संकर्षणकी अपेक्षा न रखकर वासुदेवसंज्ञक चौथी गतिमें पहुँचकर भगवान् पुरुषोत्तम एवं उनके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३ ॥

नूनमेकान्तधर्मोऽयं श्रेष्ठो नारायणप्रियः ।

अगत्वा गतयस्तिस्रो यद् गच्छत्यव्ययं हरिम् ॥ ४ ॥

निश्चय ही यह अनन्यभावसे भगवान्का भजनरूप धर्म श्रेष्ठ एवं श्रीनारायणको परम प्रिय है; क्योंकि इसका आश्रय लेनेवाले भक्तजन उक्त तीन गतियोंको प्राप्त न होकर सीधे चौथी गतिमें पहुँचकर अविनाशी श्रीहरिको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४ ॥

सहोपनिषदान् वेदान् ये विप्राः सम्यगास्थिताः ।

पठन्ति विधिमास्थाय ये चापि यतिधर्मिणः ॥ ५ ॥

तेभ्यो विशिष्टां जानामि गतिमेकान्तिनां नृणाम् । जो ब्राह्मण उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका भलीभाँति आश्रय ले उनका विधिपूर्वक स्वाध्याय करते हैं तथा जो संन्यासधर्मका पालन करनेवाले हैं, इन सबसे उत्तम गति उन्हींको प्राप्त होती है, जो भगवान्‌के अनन्य भक्त होते हैं ॥ ५३ ॥