05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 2441–2450

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2441–2450

पृष्ठ 2441

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अनिर्देश्येन रूपेण द्वितीय इव भास्करः ॥ १४ ॥

घीकी आहुति डालनेसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान वह अपनी तेजोमयी किरणोंसे समस्त ज्योति- र्मण्डलको व्याप्त करके अनिर्वचनीयरूपसे द्वितीय सूर्यकी भाँति देदीप्यमान होता था ॥ १४ ॥

तस्याभिगमनप्राप्तौ हस्तौ दत्तौ विवस्वता ।

तेनापि दक्षिणो हस्तो दत्तः प्रत्यर्चितार्थिना ॥ १५ ॥

जब वह निकट आया, तब भगवान् सूर्यने उसके स्वागतके लिये अपनी दोनों भुजाएँ उसकी ओर बढ़ा दीं । उसने भी उनके सम्मानके लिये अपना दाहिना हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया ॥ १५ ॥

ततो भित्त्वैव गगनं प्रविष्टो रश्मिमण्डलम् ।

एकीभूतं च तत् तेजः क्षणेनादित्यतां गतम् ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् आकाशको भेदकर वह सूर्यकी किरणोंके समूहमें समा गया और एक ही क्षणमें तेजोराशिके साथ एकाकार होकर सूर्यस्वरूप हो गया ॥ १६ ॥

तत्र नः संशयो जातस्तयोस्तेजः समागमे ।

अनयोः को भवेत् सूर्यो रथस्थो योऽयमागतः ॥ १७ ॥

उस समय उन दोनों तेजोंके मिल जानेपर हमलोगोंके मनमें यह संदेह हुआ कि इन दोनोंमें असली सूर्य कौन थे? जो उस रथपर बैठे हुए थे वे, अथवा जो अभी पधारे थे वे? ॥ १७ ॥

ते वयं जातसंदेहाः पर्यपृच्छामहे रविम् ।

क एष दिवमाक्रम्य गतः सूर्य इवापरः ॥ १८ ॥

ऐसी शंका होनेपर हमने सूर्यदेवसे पूछा-' भगवन्! ये जो दूसरे सूर्यके समान आकाशको लाँघकर यहाँतक आये थे, कौन थे? ' ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने द्विषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६२ ॥

पृष्ठ 2442

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त्रिषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः उञ्छ एवं शिलवृत्तिसे सिद्ध हुए पुरुषकी दिव्य गति सूर्यउवाच

नैष देवोऽनिलसखो नासुरो न च पन्नगः ।

उञ्छवृत्तिव्रते सिद्धो मुनिरेष दिवं गतः ॥ १ ॥

सूर्यदेवने कहा — से न तो वायुके सखा अग्निदेव थे, न कोई असुर थे और न नाग ही थे । ये उञ्छवृत्तिसे जीवननिर्वाहके व्रतका पालन करनेसे सिद्धिको प्राप्त हुए एक मुनि थे, जो दिव्यधाममें आ पहुँचे हैं ॥ १ ॥

एष मूलफलाहारः शीर्णपर्णाशनस्तथा ।

अब्भक्षो वायुभक्षश्च आसीद् विप्रः समाहितः ॥ २ ॥

ये ब्राह्मणदेवता फल - मूलका आहार करते, सूखे पत्ते चबाते अथवा पानी या हवा पीकर रह जाते थे और सदा एकाग्रचित्त होकर ध्यानमग्न रहते थे ॥ २ ॥

भवश्चानेन विप्रेण संहिताभिरभिष्टुतः ।

स्वर्गद्वारे कृतोद्योगो येनासौ त्रिदिवं गतः ॥ ३ ॥

इन श्रेष्ठ ब्राह्मणने संहिताके मन्त्रोंद्वारा भगवान् शंकरका स्तवन किया था ।

इन्होंने स्वर्गलोक पानेकी साधना की थी, इसलिये ये स्वर्गमें गये हैं ॥ ३ ॥

असङ्गतिरनाकाङ्क्षी नित्यमुञ्छशिलाशनः ।

सर्वभूतहिते युक्त एष विप्रो भुजङ्गम ॥ ४ ॥

नागराज! ये ब्राह्मण असंग रहकर लौकिक कामनाओंका त्याग कर चुके थे और सदा उञ्छ * एवं शिलवृत्तिसे प्राप्त हुए अन्नको ही खाते थे । ये निरन्तर समस्त प्राणियोंके हितसाधनमें संलग्न रहते थे ॥ ४ ॥

न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च पन्नगाः ।

प्रभवन्तीह भूतानां प्राप्तानामुत्तमां गतिम् ॥ ५ ॥

ऐसे लोगोंको जो उत्तम गति प्राप्त होती है, उसे न देवता, न गन्धर्व, न असुर और न नाग ही पा सकते हैं ॥ एतदेवंविधं दृष्टमाश्चर्य तत्र मे द्विज ।

संसिद्धो मानुषः कार्म योऽसौ सिद्धगतिं गतः ।

सूर्येण सहितो ब्रह्मन् पृथिवीं परिवर्तते ॥ ६ ॥

विप्रवर! सूर्यमण्डलमें मुझे यह ऐसा ही आश्चर्य दिखायी दिया था कि

उञ्छवृत्तिसे सिद्ध हुआ वह मनुष्य इच्छानुसार सिद्ध- गतिको प्राप्त हुआ ।

ब्रह्मन्! अब वह सूर्यके साथ रहकर समूची पृथ्वीकी परिक्रमा करता है ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2443

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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने त्रिषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६३ ॥

* ‘ उञ्छः कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम् । ’ कटे हुए खेतसे वहाँ गिरे हुए अन्नके दाने बीनकर लाना अथवा बाजार उठ जानेपर वहाँ बिखरे हुए अनाजके एक-एक दानेको बीन लाना ' उञ्छ' कहलाता है । इसी तरह धान, गेहूँ और जौ आदिकी बाल बीनकर लाना ' शिल ' कहा गया है ।

पृष्ठ 2444

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चतुःषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ब्राह्मणका नागराजसे बातचीत करके और उञ्छव्रतके पालनका निश्चय करके अपने घरको जानेके लिये नागराजसे विदा माँगना ब्राह्मणउवाच

आश्चर्यं नात्र संदेहः सुप्रीतोऽस्मि भुजङ्गम ।

अन्वर्थोपगतैर्वाक्यैः पन्थानं चास्मि दर्शितः ॥ १ ॥

ब्राह्मणने कहा — नागराज! इसमें संदेह नहीं कि यह एक आश्चर्यजनक वृत्तान्त है । इसे सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है । मेरे मनमें जो अभिलाषा थी, उसके अनुकूल वचन कहकर आपने मुझे रास्ता दिखा दिया ॥

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि साधो भुजगसत्तम ।

स्मरणीयोऽस्मि भवता सम्प्रेषणनियोजनैः ॥ २ ॥

भुजंग शिरोमणे! आपका कल्याण हो । अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा, यदि आपको मुझे कहीं भेजना हो या किसी काममें नियुक्त करना हो तो ऐसे अवसरोंपर मेरा अवश्य स्मरण करना चाहिये ॥ २ ॥

नागउवाच

अनुक्त्वा हृद्गतं कार्यं क्वेदानीं प्रस्थितो भवान् ।

उच्यतां द्विज यत् कार्यं यदर्थं त्वमिहागतः ॥ ३ ॥

नागने कहा — विप्रवर! आपने अभी अपने मनकी बात तो बतायी ही नहीं, फिर इस समय आप कहाँ चले जा रहे हैं? आपका जो कार्य है, जिसके लिये आप यहाँ आये हैं, उसे बताइये तो सही ॥ ३ ॥

उक्तानुक्ते कृते कार्ये मामामन्त्र्य द्विजर्षभ ।

मया प्रत्यभ्यनुज्ञातस्ततो यास्यसि सुव्रत ॥ ४ ॥

उत्तम व्रतका पालन करनेवाले द्विजश्रेष्ठ! आप कहें या न कहें । मेरे द्वारा जब आपका कार्य सम्पन्न हो जाय, तब आप मुझसे पूछकर, मेरी अनुमति लेकर अपने घरको जाइयेगा ॥ ४ ॥

न हि मां केवलं दृष्ट्वा त्यक्त्वा प्रणयवानिह ।

गन्तुमर्हसि विप्रर्षे वृक्षमूलगतो यथा ॥ ५ ॥

ब्रह्मर्षे! आपका मुझमें प्रेम है; इसलिये वृक्षके नीचे बैठे हुए बटोहीकी तरह केवल मुझे देखकर ही चल देना आपके लिये उचित नहीं है ॥ ५ ॥

पृष्ठ 2445

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त्वयि चाहं द्विजश्रेष्ठ भवान् मयि न संशयः ।

लोकोऽयं भवतः सर्वः का चिन्ता मयि तेऽनघ ॥ ६ ॥

विप्रवर! आपमें मैं हूँ और मुझमें आप हैं, इसमें संशय नहीं है । निष्पाप ब्राह्मण! यह

समस्त लोक आपका ही है । मेरे रहते हुए आपको किस बातकी चिन्ता है? ॥ ६ ॥

ब्राह्मणउवाच

एवमेतन्महाप्राज्ञ विदितात्मन् भुजङ्गम ।

नातिक्रान्तास्त्वया देवाः सर्वथैव यथातथम् ॥ ७ ॥

ब्राह्मणने कहा – महाप्राज्ञ आत्मज्ञानी नागराज! यह इसी प्रकार है । देवता भी आपसे

बढ़कर नहीं हैं । यह बात सर्वथा यथार्थ है ॥ ७ ॥

स एव त्वं स एवाहं योऽहं स तु भवानपि ।

अहं भवांश्च भूतानि सर्वे यत्र गताः सदा ॥ ८ ॥

( आपने सूर्यमण्डलमें जिन पुरुषोत्तम नारायणदेवकी स्थिति बतायी है ) मैं, आप तथा समस्त प्राणी सदा जिसमें स्थित हैं वही आप हैं, वही मैं हूँ और जो मैं हूँ, वही आप भी हैं ॥ ८ ॥

आसीत् तु मे भोगपते संशयः पुण्यसंचये ।

सोऽहमुञ्छव्रतं साधो चरिष्याम्यर्थसाधनम् ॥ ९ ॥

नागराज! मुझे पुण्यसंग्रहके विषयमें संशय हो गया था । मैं यह निश्चय नहीं कर पाता था कि किस साधनको अपनाऊँ? किंतु अब वह संदेह दूर हो गया है । साधो! अब मैं अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये उञ्छव्रतका ही आचरण करूँगा ॥ ९ ॥

एष मे निश्चयः साधो कृतं कारणमुत्तमम् ।

आमन्त्रयामि भद्रं ते कृतार्थोऽस्मि भुजङ्गम ॥ १० ॥

महात्मन्! यही मेरा निश्चय है । आपके द्वारा मेरा कार्य बड़े उत्तम ढंगसे सम्पन्न हो गया । भुजंगम! मैं कृतार्थ हो गया । आपका कल्याण हो । अब मैं जानेकी आज्ञा चाहता ॥ १० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने चतुःषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौचौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६४ ॥

OFF FUEL

पृष्ठ 2446

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पञ्चषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः नागराजसे विदा ले ब्राह्मणका च्यवनमुनिसे उञ्छवृत्तिकी दीक्षा लेकर साधनपरायण होना और इस कथाकी परम्पराका वर्णन भीष्म उवाच

स चामन्त्र्योरगश्रेष्ठं ब्राह्मणः कृतनिश्चयः ।

दीक्षाकाङ्क्षी तदा राजंश्यवनं भार्गवं श्रितः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार नागराजकी अनुमति लेकर वह दृढ़ निश्चयवाला ब्राह्मण उञ्छव्रतकी दीक्षा लेनेके लिये भृगुवंशी च्यवन ऋषिके पास गया ॥ १ ॥

स तेन कृतसंस्कारो धर्ममेवाधितस्थिवान् ।

तथैव च कथामेतां राजन् कथितवांस्तदा ॥ २ ॥

उन्होंने उसका दीक्षा - संस्कार सम्पन्न किया और वह धर्मका ही आश्रय लेकर रहने लगा । राजन्! उसने उञ्छवृत्तिकी महिमासे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथाको च्यवन मुनिसे भी कहा ॥ २ ॥

भार्गवेणापि राजेन्द्र जनकस्य निवेशने ।

कथैषा कथिता पुण्या नारदाय महात्मने ॥ ३ ॥

राजेन्द्र! च्यवनने भी राजा जनकके दरबारमें महात्मा नारदजीसे यह पवित्र कथा कही ॥ ३ ॥

नारदेनापि राजेन्द्र देवेन्द्रस्य निवेशने ।

कथिता भरतश्रेष्ठ पृष्टेनाक्लिष्टकर्मणा ॥ ४ ॥

नृपश्रेष्ठ! भरतभूषण! फिर अनायास ही उत्तम कर्म करनेवाले नारदजीने भी देवराज इन्द्रके भवनमें उनके पूछनेपर यह कथा सुनायी ॥ ४ ॥

देवराजेन च पुरा कथितैषा कथा शुभा ।

समस्तेभ्यः प्रशस्तेभ्यो विप्रेभ्यो वसुधाधिप ॥ ५ ॥

पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् पूर्वकालमें देवराज इन्द्रने सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके समक्ष यह शुभ कथा कही ॥ ५ ॥

यदा च मम रामेण युद्धमासीत् सुदारुणम् ।

वसुभिश्च तदा राजन् कथेयं कथिता मम ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2447

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राजन्! जब परशुरामजीके साथ मेरा भयंकर युद्ध हुआ था, उस समय वसुओंने मुझे यह कथा सुनायी थी ॥

पृच्छमानाय तत्त्वेन मया चैवोत्तमा तव ।

कथेयं कथिता पुण्या धर्म्या धर्मभृतां वर ॥ ७ ॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इस समय जब तुमने परम धर्मके सम्बन्धमें मुझसे प्रश्न किया है, तब उसीके उत्तरमें मैंने यथार्थरूपसे यह पुण्यमयी धर्मसम्मत श्रेष्ठ कथा तुमसे कही है ॥ ७ ॥

यदयं परमो धर्मो यन्मां पृच्छसि भारत ।

आसीद् धीरो ह्यनाकाङ्क्षी धर्मार्थकरणे नृप ॥ ८ ॥

भरतनन्दन नरेश्वर! तुमने जिसके विषयमें मुझसे पूछा था, वह श्रेष्ठ धर्म यही है । वह धीर ब्राह्मण निष्काम- भावसे धर्म और अर्थसम्बन्धी कार्यमें संलग्न रहता था ॥ स च किल कृतनिश्चयो द्विजो भुजगपतिप्रतिदेशितात्मकृत्यः । यमनियमसहो वनान्तरं परिगणितोञ्छशिलाशनः प्रविष्टः ॥ ९ ॥

नागराजके उपदेशके अनुसार अपने कर्तव्यको समझकर उस ब्राह्मणने उसके पालनका दृढ़ निश्चय कर लिया और दूसरे वनमें जाकर उञ्छशिलवृत्तिसे प्राप्त हुए परिमित अन्नका भोजन करता हुआ यम-नियमका पालन करने लगा ॥ ९ ॥

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्यां संहितायां वैयासिक्यां शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने पञ्चषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ पैंसठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ३६५ ॥

शान्तिपर्व सम्पूर्णम् अनुष्टुप् ( अन्य बड़े छन्द ) बड़े छन्दोंका ३२ अक्षरोंके गद्य कुल योग अनुष्टुप् मानकर गिननेपर उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये १३२ ९ ६ ॥ ( ६० ९ ) ८३७१० १३७ ॥ १४२७१ ॥

दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये ४३० ॥ ( १७ ) २३ ॥ ४५३ ॥

शान्तिपर्वकी कुल श्लोक संख्या १४७२५ ॥

पृष्ठ 2448

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ | महाभारत- सार

मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।

संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे ॥

' मनुष्य इस जगत्में हजारों माता -पिताओं तथा सैकड़ों स्त्री- पुत्रोंके संयोग- वियोगका अनुभव कर चुके हैं, करते हैं और करते रहेंगे । '

हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।

दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥

' अज्ञानी पुरुषको प्रतिदिन हर्षके हजारों और भयके सैकड़ों अवसर प्राप्त होते रहते हैं; किन्तु विद्वान् पुरुषके मनपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । '

ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे ।

धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥

‘ मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता । धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते! ' न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः । नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥ ‘ कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे । धर्म नित्य है और सुख- दुःख अनित्य । इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु अनित्य। '

इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।

स भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

‘ यह महाभारतका सारभूत उपदेश ' भारत- सावित्री' के नामसे प्रसिद्ध है । जो प्रतिदिन सबेरे उठकर इसका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका फल पाकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है । ' -महाभारत, स्वर्गारोहण० ५/६० - ६४

पृष्ठ 2449

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गीताप्रसारिखपुर GITA PRESS, GORAKHPUR [SINCE 1923 ] गीताप्रेस, गोरखपुर - २७३००५ फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३१२५१

पृष्ठ 2450

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