श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2431–2440
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2431–2440
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षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना नागउवाच
अथ ब्राह्मणरूपेण कं तं समनुपश्यसि ।
मानुषं केवलं विप्रं देवं वाथ शुचिस्मिते ॥ १ ॥
नागने पूछा- पवित्र मुसकानवाली देवि! ब्राह्मणरूपमें तुमने किसका दर्शन किया है? वे ब्राह्मण कोई मनुष्य हैं या देवता? ॥ १ ॥
को हि मां मानुषः शक्तो द्रष्टुकामो यशस्विनि ।
संदर्शनरुचिर्वाक्यमाज्ञापूर्वं वदिष्यति ॥ २ ॥
यशस्विनि! भला, कौन मनुष्य मुझे देखनेकी इच्छा कर सकता है और यदि दर्शनकी इच्छा करे भी तो कौन इस तरह मुझे आज्ञा देकर बुला सकता है? ॥ २ ॥
सुरासुरगणानां च देवर्षीणां च भाविनि ।
ननु नागा महावीर्याः सौरसेयास्तरस्विनः ॥ ३ ॥
वन्दनीयाश्च वरदा वयमप्यनुयायिनः ।
मनुष्याणां विशेषेण नावेक्ष्या इति मे मतिः ॥ ४ ॥
भाविनि! सुरसाके वंशज नाग महापराक्रमी और अत्यन्त वेगशाली होते हैं । वे देवताओं, असुरों और देवर्षियोंके लिये भी वन्दनीय हैं । हमलोग भी अपने सेवकको वर देनेवाले हैं । विशेषतः मनुष्योंके लिये हमारा दर्शन सुलभ नहीं है, ऐसी मेरी धारणा है ॥ ३-४ ॥ नागभार्योवाच
आर्जवेन विजानामि नासौ देवोऽनिलाशन ।
एकं तस्मिन् विजानामि भक्तिमानतिरोषण ॥ ५ ॥
नागपत्नी बोली- अत्यन्त क्रोधी स्वभाववाले वायुभोजी नागराज! उन ब्राह्मणकी सरलतासे तो मैं यही समझती हूँ कि वे देवता नहीं हैं । मुझे उनमें एक बहुत बड़ी विशेषता यह जान पड़ी है कि वे आपके भक्त हैं ॥ ५ ॥
स हि कार्यान्तराकाङ्क्षी जलेप्सुः स्तोकको यथा ।
वर्षं वर्षप्रियः पक्षी दर्शनं तव काङ्क्षति ॥ ६ ॥
जैसे वर्षाके जलका प्रेमी प्यासा पपीहा पक्षी पानीके लिये वर्षाकी बाट जोहता रहता है, उसी प्रकार वे ब्राह्मण किसी दूसरे कार्यको सिद्ध करनेकी इच्छासे आपका दर्शन चाहते
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हैं ॥ ६ ॥
हित्वा त्वद्दर्शनं किंचिद् विघ्नं न प्रतिपालयेत् ।
तुल्योऽप्यभिजने जातो न कश्चित् पर्युपासते ॥ ७ ॥
वे आपका दर्शन छोड़कर दूसरी किसी वस्तुको विघ्न समझते हैं; अतः वह विघ्न उन्हें नहीं प्राप्त होना चाहिये । उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ आपके समान कोई सद्गृहस्थ अतिथिकी उपेक्षा करके घरमें नहीं बैठता है ॥ ७ ॥
तद्रोषं सहजं त्यक्त्वा त्वमेनं द्रष्टुमर्हसि ।
आशाच्छेदेन तस्याद्य नात्मानं दग्धुमर्हसि ॥ ८ ॥
अतः आप अपने सहज रोषको त्यागकर इन ब्राह्मणदेवताका दर्शन कीजिये । आज इनकी आशा भंग करके अपने - आपको भस्म न कीजिये ॥ ८ ॥
आशया ह्यभिपन्नानामकृत्वाश्रुप्रमार्जनम् ।
राजा वा राजपुत्रो वा भ्रूणहत्यैव युज्यते ॥ ९ ॥
जो आशा लगाकर अपनी शरणमें आये हों, उनके आँसू जो नहीं पोंछता है, वह राजा हो या राजकुमार, उसे भ्रूणहत्याका पाप लगता है ॥ ९ ॥
मौने ज्ञानफलावाप्तिर्दानेन च यशो महत् ।
वाग्मित्वं सत्यवाक्येन परत्र च महीयते ॥ १० ॥
मौन रहनेसे ज्ञानरूपी फलकी प्राप्ति होती है, दान देनेसे महान् यशकी वृद्धि होती है । सत्य बोलनेसे वाणीकी पटुता और परलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है ॥
भूप्रदानेन च गतिं लभत्याश्रमसम्मिताम् ।
न्याय्यस्यार्थस्य सम्प्राप्तिं कृत्वा फलमुपाश्नुते ॥ ११ ॥
भूदान करनेसे मनुष्य आश्रम- धर्मके पालनके समान उत्तम गति पाता है । न्यायपूर्वक धनका उपार्जन करके पुरुष श्रेष्ठ फलका भागी होता है ॥ ११ ॥
अभिप्रेतामसंश्लिष्टां कृत्वा चात्महितां क्रियाम् ।
न याति निरयं कश्चिदिति धर्मविदो विदुः ॥ १२ ॥
अपनी रुचिके अनुकूल कर्म भी यदि पापके सम्पर्कसे रहित और अपने लिये हितकर
हो तो उसे करके कोई भी नरकमें नहीं पड़ता है । ऐसा धर्मज्ञ पुरुष जानते हैं ॥ १२ ॥
नागउवाच
अभिमानैर्न मानो मे जातिदोषेण वै महान् ।
रोषः संकल्पजः साध्वि दग्धो वागग्निना त्वया ॥ १३ ॥
नागने कहा – साध्वि! मुझमें अहंकारके कारण अभिमान नहीं है; अपितु जाति-दोषके कारण महान् रोष भरा हुआ है । मेरे उस संकल्पजनित रोषको अब तुमने अपनी वाणीरूप अग्निसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ १३ ॥
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न च रोषादहं साध्वि पश्येयमधिकं तमः ।
तस्य वक्तव्यतां यान्ति विशेषेण भुजङ्गमाः ॥ १४ ॥
पतिव्रते! मैं रोषसे बढ़कर मोहमें डालनेवाला दूसरा कोई दोष नहीं देखता और क्रोधके लिये सर्प ही अधिक बदनाम हैं ॥ १४ ॥
रोषस्य हि वशं गत्वा दशग्रीवः प्रतापवान् ।
तथा शक्रप्रतिस्पर्धी हतो रामेण संयुगे ॥ १५ ॥
इन्द्रसे भी टक्कर लेनेवाला प्रतापी दशानन रावण रोषके ही अधीन होकर युद्धमें श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे मारा गया ॥ १५ ॥
अन्तःपुरगतं वत्सं श्रुत्वा रामेण निर्हतम् ।
धर्षणारोषसंविग्नाः कार्तवीर्यसुता हताः ॥ १६ ॥
' होमधेनुके बछड़ेका अपहरण करके उसे राजाके अन्तःपुरमें रख दिया गया है' ऐसा सुनकर परशुरामजीने तिरस्कारजनक रोषसे भरे हुए कार्तवीर्य पुत्रोंको मार डाला ॥ १६ ॥
जामदग्न्येन रामेण सहस्रनयनोपमः ।
संयुगे निहतो रोषात् कार्तवीर्यो महाबलः ॥ १७ ॥
महाबली राजा कार्तवीर्य अर्जुन इन्द्रके समान पराक्रमी था; परंतु रोषके ही कारण जमदग्निनन्दन परशुरामके द्वारा युद्धमें मारा गया ॥ १७ ॥
तदेष तपसां शत्रुः श्रेयसां विनिपातकः ।
निगृहीतो मया रोषः श्रुत्वैवं वचनं तव ॥ १८ ॥
इसलिये आज तुम्हारी बात सुनकर ही तपस्याके शत्रु और कल्याणमार्गसे भ्रष्ट करनेवाले इस क्रोधको मैंने काबू कर लिया है ॥ १८ ॥
आत्मानं च विशेषेण प्रशंसाम्यनपायिनी ।
यस्य मे त्वं विशालाक्षि भार्या गुणसमन्विता ॥ १ ९ ॥
विशाललोचने! मैं अपनी एवं अपने सौभाग्यकी विशेषरूपसे प्रशंसा करता हूँ, जिसे तुम- जैसी सद्गुणवती तथा कभी विलग न होनेवाली पत्नी प्राप्त हुई है ॥ १ ९ ॥
एष तत्रैव गच्छामि यत्र तिष्ठत्यसौ द्विजः ।
सर्वथा चोक्तवान् वाक्यं स कृतार्थः प्रयास्यति ॥ २० ॥
यह लो, अब मैं वहीं जाता हूँ, जहाँ वे ब्राह्मण देवता विराजमान हैं । वे जो कहेंगे वही करूँगा । वे सर्वथा कृतार्थ होकर यहाँसे जायँगे ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६० ॥
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एकषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः नागराज और ब्राह्मणका परस्पर मिलन तथा बातचीत भीष्म उवाच
स पन्नगपतिस्तत्र प्रययौ ब्राह्मणं प्रति ।
तमेव मनसा ध्यायन् कार्यवत्तां विचारयन् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! यह कहकर नागराज मन- ही- मन उस ब्राह्मणके कार्यका विचार करते हुए उसके पास गये ॥ १ ॥
तमतिक्रम्य नागेन्द्रो मतिमान् स नरेश्वर ।
प्रोवाच मधुरं वाक्यं प्रकृत्या धर्मवत्सलः ॥ २ ॥
नरेश्वर! उसके निकट पहुँचकर बुद्धिमान् नागेन्द्र, जो स्वभावसे ही धर्मानुरागी थे, मधुर वाणीमें बोले – ||
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भो भोः क्षाम्याभिभाषे त्वां न रोषं कर्तुमर्हसि ।
इह त्वमभिसम्प्राप्तः कस्यार्थे किं प्रयोजनम् ॥ ३ ॥
‘ हे ब्राह्मणदेव! आप मेरे अपराधोंको क्षमा करें । मुझपर रोष न करें । मैं आपसे पूछता हूँ कि आप यहाँ किसके लिये आये हैं? आपका क्या प्रयोजन है? ॥ ३ ॥
आभिमुख्यादभिक्रम्य स्नेहात् पृच्छामि ते द्विज ।
विविक्ते गोमतीतीरे कं वा त्वं पर्युपाससे ॥ ४ ॥
' ब्रह्मन्! मैं आपके सामने आकर प्रेमपूर्वक पूछता हूँ कि गोमतीके इस एकान्त तटपर आप किसकी उपासना करते हैं? ' ॥ ४ ॥
ब्राह्मणउवाच
धर्मारण्यं हि मां विद्धि नागं द्रष्टुमिहागतम् ।
पद्मनाभं द्विजश्रेष्ठ तत्र मे कार्यमाहितम् ॥५ ॥
ब्राह्मणने कहा –द्विजश्रेष्ठ! आपको विदित हो कि मेरा नाम धर्मारण्य है । मैं नागराज
पद्मनाभका दर्शन करनेके लिये यहाँ आया हूँ। उन्हींसे मुझे कुछ काम है ॥ ५ ॥
तस्य चाहमसांनिध्ये श्रुतवानस्मि तं गतम् ।
स्वजनात् तं प्रतीक्षामि पर्जन्यमिव कर्षकः ॥ ६ ॥
उनके स्वजनोंसे मैंने सुना है कि वे यहाँसे दूर गये हुए हैं, अतः जैसे किसान वर्षाकी राह देखता है, उसी तरह मैं भी उनकी बाट जोहता हूँ ॥ ६ ॥
तस्य चाक्लेशकरणं स्वस्तिकारसमाहितम् ।
आवर्तयामि तद् ब्रह्म योगयुक्तो निरामयः ॥ ७ ॥
उन्हें कोई क्लेश न हो । वे सकुशल घर लौटकर आ जायँ, इसके लिये नीरोग एवं योगयुक्त होकर मैं वेदोंका पारायण कर रहा हूँ ॥ ७ ॥
नागउवाच
अहो कल्याणवृत्तस्त्वं साधुः सज्जनवत्सलः ।
अवाच्यस्त्वं महाभाग परं स्नेहेन पश्यसि ॥ ८ ॥
नागने कहा — महाभाग! आपका आचरण बड़ा ही कल्याणमय है । आप बड़े ही साधु हैं और सज्जनोंपर स्नेह रखते हैं । किसी भी दृष्टिसे आप निन्दनीय नहीं हैं; क्योंकि दूसरोंको स्नेहदृष्टिसे देखते हैं ॥ ८ ॥
अहं स नागो विप्रर्षे यथा मां विन्दते भवान् ।
आज्ञापय यथा स्वैरं किं करोमि प्रियं तव ॥ ९ ॥
ब्रह्मर्षे! मैं ही वह नाग हूँ, जिससे आप मिलना चाहते हैं । आप मुझे जैसा जानते हैं, मैं वैसा ही हूँ । इच्छानुसार आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन - सा प्रिय कार्य करूँ? ॥ ९ ॥
भवन्तं स्वजनादस्मि सम्प्राप्तं श्रुतवानहम् ।
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अतस्त्वां स्वयमेवाहं द्रष्टुमभ्यागतो द्विज ॥ १० ॥
ब्रह्मन्! अपने स्वजन ( पत्नी ) से मैंने आपके आगमनका समाचार सुना है; इसलिये स्वयं ही आपका दर्शन करनेके लिये चला आया हूँ ॥ १० ॥
सम्प्राप्तश्च भवानद्य कृतार्थः प्रतियास्यति ।
विस्रब्धो मां द्विजश्रेष्ठ विषये योक्तुमर्हसि ॥ ११ ॥
द्विजश्रेष्ठ! जब आप यहाँतक आ गये हैं, तब अब कृतार्थ होकर ही यहाँसे लौटेंगे; अतः बेखटके मुझे अपने अभीष्ट कार्यके साधनमें लगाइये ॥ ११ ॥
वयं हि भवता सर्वे गुणक्रीता विशेषतः ।
यस्त्वमात्महितं त्यक्त्वा मामेवेहानुरुध्यसे ॥ १२ ॥
आपने हम सब लोगोंको विशेषरूपसे अपने गुणोंसे खरीद लिया है; क्योंकि आप अपने हितकी बातको अलग रखकर मेरे ही कल्याणका चिन्तन कर रहे हैं ॥ १२ ॥
ब्राह्मणउवाच
आगतोऽहं महाभाग तव दर्शनलालसः ।
कंचिदर्थमनर्थज्ञः प्रष्टुकामो भुजङ्गम ॥ १३ ॥
ब्राह्मणने कहा — महाभाग नागराज! मैं आपहीके दर्शनकी लालसासे यहाँ आया हूँ ।
आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, जिसे मैं स्वयं नहीं जानता हूँ ॥ १३ ॥
अहमात्मानमात्मस्थो मार्गमाणोऽऽत्मनो गतिम् ।
वासार्थिनं महाप्रज्ञं चलच्चित्तमुपास्मि ह ॥ १४ ॥
मैं विषयोंसे निवृत्त हो अपने - आपमें ही स्थित रहकर जीवात्माओंकी परमगतिस्वरूप परब्रह्म परमात्माकी खोज कर रहा हूँ, तो भी महान् बुद्धियुक्त गृहमें आसक्त हुए इस चंचल चित्तकी उपासना करता हूँ ( अतः मैं न तो आसक्त हूँ और न विरक्त ही हूँ) ॥ १४ ॥
प्रकाशितस्त्वं स्वगुणैर्यशोगर्भगभस्तिभिः ।
शशाङ्ककरसंस्पर्शैर्हृद्यैरात्मप्रकाशितैः ॥ १५ ॥
आप चन्द्रमाकी किरणोंकी भाँति सुखद स्पर्शवाले और स्वतः प्रकाशित होनेवाले सुयशरूपी किरणोंसे युक्त अपने मनोरम गुणोंसे ही प्रकाशमान हैं ॥ १५ ॥
तस्य मे प्रश्नमुत्पन्नं छिन्धि त्वमनिलाशन ।
पश्चात् कार्यं वदिष्यामि श्रोतुमर्हति तद् भवान् ॥ १६ ॥
पवनाशन! इस समय मेरे मनमें एक नया प्रश्न उठा है । पहले इसका समाधान कीजिये । उसके बाद मैं आपसे अपना कार्य निवेदन करूँगा और आप उसे ध्यानसे सुनियेगा ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने एकषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६१ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६१ ॥
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द्विषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः नागराजका ब्राह्मणके पूछनेपर सूर्यमण्डलकी आश्चर्यजनक घटनाओंको सुनाना ब्राह्मणउवाच विवस्वतो गच्छति पर्ययेण वोढुं भवांस्तं रथमेकचक्रम् । आश्चर्यभूतं यदि तत्र किंचिद् दृष्टं त्वया शंसितुमर्हसि त्वम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणने कहा – नागराज! आप सूर्यके एक पहियेके रथको खींचनेके लिये बारी-बारीसे जाया करते हैं । यदि वहाँ कोई आश्चर्यजनक बात आपने देखी हो तो उसे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
नाग उवाच
आश्चर्याणामनेकानां प्रतिष्ठा भगवान् रविः ।
यतो भूताः प्रवर्तन्ते सर्वे त्रैलोक्यसम्मताः ॥ २ ॥
नागने कहा— ब्रह्मन्! भगवान् सूर्य तो अनेकानेक आश्चर्योंके स्थान हैं; क्योंकि तीनों लोकोंमें जितने भी प्राणी हैं, वे सब उन्हींसे प्रेरित होकर अपने - अपने कार्योंमें प्रवृत्त होते हैं ॥ २ ॥
यस्य रश्मिसहस्रेषु शाखास्विव विहंगमाः ।
वसन्त्याश्रित्य मुनयः संसिद्धा दैवतैः सह ॥ ३ ॥
जैसे वृक्षकी शाखाओंपर बहुत -से पक्षी बसेरा लेते हैं, उसी प्रकार सूर्यदेवकी सहस्रों किरणोंका आश्रय ले देवताओंसहित सिद्ध और मुनि निवास करते हैं ॥ ३ ॥
यतो वायुर्विनिःसृत्य सूर्यरश्म्याश्रितो महान् ।
विजृम्भत्यम्बरे तत्र किमाश्चर्यमतः परम् ॥ ४ ॥
महान् वायुदेव सूर्यमण्डलसे निकलकर सूर्यकी किरणोंका आश्रय ले समूचे आकाशमें फैल जाते हैं । इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा? ॥ ४ ॥
विभज्य तं तु विप्रर्षे प्रजानां हितकाम्यया ।
तोयं सृजति वर्षासु किमाश्चर्यमतः परम् ॥ ५ ॥
ब्रह्मर्षे! प्रजाके हितकी कामनासे भगवान् सूर्य उस वायुको अनेक भागोंमें विभक्त करके वर्षा -ऋतुमें जो जलकी वृष्टि करते हैं, उससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा? ॥ ५ ॥
यस्य मण्डलमध्यस्थो महात्मा परमत्विषा ।
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दीप्तः समीक्षते लोकान् किमाश्चर्यमतः परम् ॥ ६ ॥
सूर्यमण्डलके मध्यमें उसके अन्तर्यामी महात्मा सूर्यदेव अपनी उत्तम प्रभासे प्रकाशित होते हुए समस्त लोकोंका निरीक्षण करते हैं, उससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा? ॥ ६ ॥
शुक्रो नामासितः पादो यश्च वारिधरोऽम्बरे ।
तोयं सृजति वर्षासु किमाश्चर्यमतः परम् ॥ ७ ॥
शुक्र नामक काला मेघ, जो आकाशमें वर्षाके समय जल उत्पन्न करता है, वह इस
सूर्यका ही स्वरूप है । इससे बढ़कर और क्या आश्चर्य होगा? ॥ ७ ॥
योऽष्टमासांस्तु शुचिना किरणेनोक्षितं पयः ।
प्रत्यादत्ते पुनः काले किमाश्चर्यमतः परम् ॥ ८ ॥
सूर्यदेव बरसातमें पृथ्वीपर जो पानी बरसाते हैं, उसे अपनी विशुद्ध किरणोंद्वारा आठ
महीनेमें पुनः खींच लेते हैं । इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या होगी? ॥
यस्य तेजोविशेषेषु स्वयमात्मा प्रतिष्ठितः ।
यतो बीजं मही चेयं धार्यते सचराचरा ॥ ९ ॥
यत्र देवो महाबाहुः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ।
अनादिनिधनो विप्र किमाश्चर्यमतः परम् ॥ १० ॥
विप्रवर! जिन सूर्यदेवके विशिष्ट तेजमें साक्षात् परमात्माका निवास है, जिनसे नाना प्रकारके बीज उत्पन्न होते हैं, जिनके ही सहारे चराचर प्राणियोंसहित यह समस्त पृथ्वी टिकी हुई है तथा जिनके मण्डलमें आदि- अन्तरहित महाबाहु सनातन पुरुषोत्तम भगवान् नारायण विराजमान हैं, उनसे बढ़कर आश्चर्यकी वस्तु और क्या हो सकती है? ॥ ९ -१० ॥
आश्चर्याणामिवाश्चर्यमिदमेकं तु मे शृणु ।
विमले यन्मया दृष्टमम्बरे सूर्यसंश्रयात् ॥ ११ ॥
किंतु इन सब आश्चर्योंमें भी एक परम आश्चर्यकी यह बात जो मैंने सूर्यके सहारे निर्मल आकाशमें अपनी आँखों देखी है, उसे बता रहा हूँ — सुनिये ॥ ११ ॥
पुरा मध्याह्नसमये लोकांस्तपति भास्करे ।
प्रत्यादित्यप्रतीकाशः सर्वतः समदृश्यत ॥ १२ ॥
पहलेकी बात है, एक दिन मध्याह्नकालमें भगवान् भास्कर सम्पूर्ण लोकोंको तपा रहे थे । उसी समय दूसरे सूर्यके समान एक तेजस्वी पुरुष दिखायी दिया, जो सब ओरसे प्रकाशित हो रहा था ॥ १२ ॥
स लोकांस्तेजसा सर्वान् स्वभासा निर्विभासयन् ।
आदित्याभिमुखोऽभ्येति गगनं पाटयन्निव ॥ १३ ॥
वह अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करता हुआ मानो आकाशको चीरकर सूर्यकी ओर बढ़ा आ रहा था ॥ १३ ॥
हुताहुतिरिव ज्योतिर्व्याप्य तेजोमरीचिभिः ।