05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 281–290
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290
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२. सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव तथा समाश्रय – ये छः राजाके नीतिसम्बन्धी गुण हैं ।
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त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति वैशम्पायन उवाच
अभिषिक्तो महाप्राज्ञो राज्यं प्राप्य युधिष्ठिरः ।
दाशार्हं पुण्डरीकाक्षमुवाच प्राञ्जलिः शुचिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! राज्याभिषेकके पश्चात् राज्य पाकर परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरने पवित्रभावसे हाथ जोड़कर कमलनयन दशार्हवंशी श्रीकृष्णसे कहा – ॥
तव कृष्ण प्रसादेन नयेन च बलेन च ।
बुद्धया च यदुशार्दूल तथा विक्रमणेन च ॥ २ ॥
पुनः प्राप्तमिदं राज्यं पितृपैतामहं मया ।
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष पुनः पुनररिंदम ॥ ३ ॥
‘ यदुसिंह श्रीकृष्ण! आपकी ही कृपा, नीति, बल, बुद्धि और पराक्रमसे मुझे पुनः अपने बाप- दादोंका यह राज्य प्राप्त हुआ है । शत्रुओंका दमन करनेवाले कमलनयन! आपको बारंबार नमस्कार है ॥ २-३ ॥
त्वामेकमाहुः पुरुषं त्वामाहुः सात्वतां पतिम् ।
नामभिस्त्वां बहुविधैः स्तुवन्ति प्रयता द्विजाः ॥ ४ ॥
‘ अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले द्विज एकमात्र आपको ही अन्तर्यामी पुरुष एवं उपासना करनेवाले भक्तोंका प्रतिपालक बताते हैं । साथ ही वे नाना प्रकारके नामोंद्वारा आपकी स्तुति करते हैं ॥ ४ ॥
विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।
विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥ ५ ॥
' यह सम्पूर्ण विश्व आपकी लीलामयी सृष्टि है । आप इस विश्वके आत्मा हैं । आपहीसे इस जगत्की उत्पत्ति हुई है । आप ही व्यापक होनेके कारण ' विष्णु', विजयी होनेसे ' जिष्णु ', दुःख और पाप हर लेनेसे ' हरि', अपनी ओर आकृष्ट करनेके कारण ' कृष्ण ', विकुण्ठ धामके अधिपति होनेसे ' वैकुण्ठ ' तथा क्षर- अक्षर पुरुषसे उत्तम होनेके कारण
‘ पुरुषोतम ' कहलाते हैं । आपको नमस्कार है ॥ ५ ॥
अदित्याः सप्तधा त्वं तु पुराणो गर्भतां गतः ।
पृश्निगर्भस्त्वमेवैकस्त्रियुगं त्वां वदन्त्यपि ॥ ६ ॥
‘ आप पुराणपुरुष परमात्माने ही सात प्रकारसे अदितिके गर्भमें अवतार लिया है । आप ही पृश्निगर्भके नामसे प्रसिद्ध हैं । विद्वान्लोग तीनों युगोंमें प्रकट होनेके कारण आपको ' त्रियुग ' कहते हैं ॥ ६ ॥
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शुचिश्रवा हृषीकेशो घृतार्चिर्हस उच्यते ।
त्रिचक्षुः शम्भुरेकस्त्वं विभुर्दामोदरोऽपि च ॥ ७ ॥
‘ आपकी कीर्ति परम पवित्र है । आप सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक हैं । घृत ही जिसकी ज्वाला है - वह यज्ञपुरुष आप ही हैं । आप ही हंस ( विशुद्ध परमात्मा) कहे जाते हैं । त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर और आप एक ही हैं । आप सर्वव्यापी होनेके साथ ही दामोदर ( यशोदा मैयाके द्वारा बँध जानेवाले नटवरनागर ) भी हैं ॥ ७ ॥
वराहोऽग्निर्बृहद्भानुर्वृषभस्तार्क्ष्यलक्षणः ।
अनीकसाहः पुरुषः शिपिविष्ट उरुक्रमः ॥ ८ ॥
‘वराह, अग्नि, बृहद्भानु ( सूर्य ), वृषभ ( धर्म ), गरुडध्वज, अनीकसाह ( शत्रुसेनाका वेग सह सकनेवाले ), पुरुष ( अन्तर्यामी ), शिपिविष्ट ( सबके शरीरमें आत्मारूपसे प्रविष्ट) और उरुक्रम ( वामन ) —ये सभी आपके ही नाम और रूप हैं ॥ ८ ॥
वरिष्ठ उग्रसेनानीः सत्यो वाजसनिर्गुहः ।
अच्युतश्यावनोऽरीणां संस्कृतो विकृतिर्वृषः ॥ ९ ॥
‘ सबसे श्रेष्ठ, भयंकर सेनापति, सत्यस्वरूप, अन्नदाता तथा स्वामी कार्तिकेय भी आप ही हैं । आप स्वयं कभी युद्धसे विचलित न होकर शत्रुओंको पीछे हटा देते हैं । संस्कार- सम्पन्न द्विज और संस्कारशून्य वर्णसंकर भी आपके ही स्वरूप हैं। आप कामनाओंकी वर्षा करनेवाले वृष ( धर्म) हैं ॥ ९ ॥
कृष्णधर्मस्त्वमेवादिर्वृषदर्भो वृषाकपिः ।
सिन्धुर्विधर्मस्त्रिककुप् त्रिधामा त्रिदिवाच्युतः ॥ १० ॥
' कृष्णधर्म ( यज्ञस्वरूप ) और सबके आदिकारण आप ही हैं। वृषदर्भ ( इन्द्रके दर्पका दलन करनेवाले ) और वृषाकपि ( हरिहर ) भी आप ही हैं । आप ही सिन्धु ( समुद्र ), विधर्म ( निर्गुण परमात्मा ), त्रिककुप् ( ऊपर- नीचे और मध्य – ये तीन दिशाएँ), त्रिधामा ( सूर्य, चन्द्र और अग्नि ये त्रिविध तेज) तथा वैकुण्ठधामसे नीचे अवतीर्ण होनेवाले भी हैं ॥ १० ॥
सम्राड् विराट् स्वराट् चैव सुरराजो भवोद्भवः ।
विभुर्भूरतिभूः कृष्णः कृष्णवर्त्मा त्वमेव च ॥ ११ ॥
‘ आप सम्राट्, विराट्, स्वराट् और देवराज इन्द्र हैं । यह संसार आपहीसे प्रकट हुआ है । आप सर्वत्र व्यापक, नित्य सत्तारूप और निराकार परमात्मा हैं । आप ही कृष्ण ( सबको अपनी ओर खींचनेवाले ) और कृष्णवर्त्मा ( अग्नि ) हैं ॥ ११ ॥
स्विष्टकृद् भिषजावर्तः कपिलस्त्वं च वामनः ।
यज्ञो ध्रुवः पतङ्गश्च यज्ञसेनस्त्वमुच्यसे ॥ १२ ॥
'आपहीको लोग अभीष्टसाधक, अश्विनीकुमारोंके पिता सूर्य, कपिल मुनि, वामन, यज्ञ, ध्रुव, गरुड़ तथा यज्ञसेन कहते हैं ॥ १२ ॥
शिखण्डी नहुषो बभ्रुर्दिवःस्पृक् त्वं पुनर्वसुः ।
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सुबभ्रू रुक्मयज्ञश्च सुषेणो दुन्दुभिस्तथा ॥ १३ ॥
‘ आप अपने मस्तकपर मोरका पंख धारण करते हैं । आप ही पूर्वकालमें राजा नहुष होकर प्रकट हुए थे । आप सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करनेवाले महेश्वर तथा एक ही पैरमें आकाशको नाप लेनेवाले विराट् हैं । आप ही पुनर्वसु नक्षत्रके रूपमें प्रकाशित हो रहे हैं । सुबभ्रु ( अत्यन्त पिङ्गल वर्ण ), रुक्मयज्ञ ( सुवर्णकी दक्षिणा से भरपूर यज्ञ ), सुषेण ( सुन्दर सेनासे सम्पन्न ) तथा दुन्दुभिस्वरूप हैं ॥ १३ ॥
गभस्तिनेमिः श्रीपद्मः पुष्करः पुष्पधारणः ।
ऋभुर्विभुः सर्वसूक्ष्मश्चारित्रं चैव पठ्यसे ॥ १४ ॥
‘ आप ही गभस्तिनेमि ( कालचक्र ), श्रीपद्म, पुष्कर, पुष्पधारी, ऋभु विभु, सर्वथा सूक्ष्म और सदाचार स्वरूप कहलाते हैं ॥ १४ ॥
अम्भोनिधिस्त्वं ब्रह्मा त्वं पवित्रं धाम धामवित् ।
हिरण्यगर्भं त्वामाहुः स्वधा स्वाहा च केशव ॥ १५ ॥
' आप ही जलनिधि समुद्र, आप ही ब्रह्मा तथा आप ही पवित्र धाम एवं धामके ज्ञाता हैं । केशव! विद्वान् पुरुष आपको ही हिरण्यगर्भ, स्वधा और स्वाहा आदि नामोंसे पुकारते हैं ॥ १५ ॥
योनिस्त्वमस्य प्रलयश्च कृष्ण त्वमेवेदं सृजसे विश्वमग्रे । विश्वं चेदं त्वद्वशे विश्वयोने नमोऽस्तु ते शार्ङ्गचक्रासिपाणे ॥ १६ ॥
' श्रीकृष्ण! आप ही इस जगत्के आदि कारण हैं और आप ही इसके प्रलयस्थान । कल्पके आरम्भमें आप ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं । विश्वके कारण! यह सम्पूर्ण विश्व आपके ही अधीन है । हाथोंमें धनुष, चक्र और खड्ग धारण करनेवाले परमात्मन्! आपको नमस्कार है ' ॥ १६ ॥
एवं स्तुतो धर्मराजेन कृष्णः
सभामध्ये प्रीतिमान् पुष्कराक्षः ।
तमभ्यनन्दद् भारतं पुष्कलाभि- र्वाग्भिर्ज्येष्ठं पाण्डवं यादवाग्र्यः ॥ १७ ॥
इस प्रकार जब धर्मराज युधिष्ठिरने सभामें यदुकुल- शिरोमणि कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति की, तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर भरतभूषण ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरका उत्तम वचनोंद्वारा अभिनन्दन किया ॥ १७ ॥
(एतन्नामशतं विष्णोर्धर्मराजेन कीर्तितम् । यः पठेच्छृणुयाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ )
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जो धर्मराज युधिष्ठिरद्वारा वर्णित भगवान् श्रीकृष्णके इन सौ नामोंका पाठ या श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वासुदेवस्तुती त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुतिविषयक तैंतालीसवाँअध्याय पूराहुआ ॥ ४३ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोक हैं )
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चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः महाराज युधिष्ठिरके दिये हुए विभिन्न भवनोंमें भीमसेन आदि सब भाइयोंका प्रवेश और विश्राम वैशम्पायन उवाच
ततो विसर्जयामास सर्वाः प्रकृतयो नृपः ।
विविशुश्चाभ्यनुज्ञाता यथास्वानि गृहाणि ते ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने मन्त्री, प्रजा आदि सारी प्रकृतियोंको बिदा किया । राजाकी आज्ञा पाकर सब लोग अपने - अपने घरको चले गये ॥ १ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा भीमं भीमपराक्रमम् ।
सान्त्वयन्नब्रवीच्छ्रीमानर्जुनं यमजौ तथा ॥ २ ॥
इसके बाद श्रीमान् महाराज युधिष्ठिरने भयानक पराक्रमी भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल-सहदेवको सान्त्वना देते हुए कहा - ॥ २ ॥
शत्रुभिर्विविधैः शस्त्रैः क्षतदेहा महारणे ।
श्रान्ता भवन्तः सुभृशं तापिताः शोकमन्युभिः ॥ ३ ॥
‘ बन्धुओ! इस महासमरमें शत्रुओंने नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा तुम्हारे शरीरको घायल कर दिया है । तुम सब लोग अत्यन्त थक गये हो और शोक तथा क्रोधने तुम्हें संतप्त कर दिया है ॥ ३ ॥
अरण्ये दुःखवसतीर्मत्कृते भरतर्षभाः ।
भवद्भिरनुभूता हि यथा कुपुरुषैस्तथा ॥ ४ ॥
‘ भरतश्रेष्ठ वीरो! तुमने मेरे लिये वनमें रहकर जैसे कोई भाग्यहीन मनुष्य दुःख भोगता है, उसी प्रकार दुःख और कष्ट भोगे हैं ॥ ४ ॥
यथासुखं यथाजोषं जयोऽयमनुभूयताम् ।
विश्रान्ताँल्लब्धविज्ञानान् श्वः समेतास्मि वः पुनः ॥ ५ ॥
‘ अब इस समय तुमलोग सुखपूर्वक जी भरकर इस विजयजनित आनन्दका अनुभव करो । अच्छी तरह विश्राम करके जब तुम्हारा चित्त स्वस्थ हो जाय, तब फिर कल तुम लोगोंसे मिलूँगा ' ॥ ५ ॥
ततो दुर्योधनगृहं प्रासादैरुपशोभितम् ।
बहुरत्नसमाकीर्णं दासीदाससमाकुलम् ॥ ६ ॥
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातं भ्रात्रा दत्तं वृकोदरः ।
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प्रतिपेदे महाबाहुर्मन्दिरं मघवानिव ॥ ७ ॥
तदनन्तर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे भाई युधिष्ठिरने दुर्योधनका महल भीमसेनको अर्पित किया । वह बहुत - सी अट्टालिकाओंसे सुशोभित था । वहाँ अनेक प्रकारके रत्नोंका भण्डार पड़ा था और बहुत - सी दास - दासियाँ सेवाके लिये प्रस्तुत थीं । जैसे इन्द्र अपने भवनमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार महाबाहु भीमसेन उस महलमें चले गये ॥ ६-७ ॥
यथा दुर्योधनगृहं तथा दुःशासनस्य तु ।
प्रासादमालासंयुक्तं हेमतोरणभूषितम् ॥ ८ ॥
दासीदाससुसम्पूर्णं प्रभूतधनधान्यवत् ।
प्रतिपेदे महाबाहुरर्जुनो राजशासनात् ॥ ९ ॥
जैसा दुर्योधनका भवन सजा हुआ था, वैसा ही दुःशासनका भी था । उसमें भी प्रासादमालाएँ शोभा दे रही थीं । वह सोनेकी बंदनवारोंसे सजाया गया था । प्रचुर धन - धान्य तथा दास- दासियोंसे भरा- पूरा था । राजाकी आज्ञासे वह भवन महाबाहु अर्जुनको मिला ॥ ८ - ९ ॥
दुर्मर्षणस्य भवनं दुःशासनगृहाद् वरम् ।
कुबेरभवनप्रख्यं मणिहेमविभूषितम् ॥ १० ॥
दुर्मर्षणका महल तो दुःशासनके घरसे भी सुन्दर था । उसे सोने और मणियोंसे सजाया गया था; अतः वह कुबेरके राजभवनकी भाँति प्रकाशित होता था ॥ १० ॥
नकुलाय वरार्हाय कर्शिताय महावने ।
ददौ प्रीतो महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ११ ॥
महाराज! धर्मपुत्र युधिष्ठिरने अत्यन्त प्रसन्न होकर महान् वनमें कष्ट उठाये हुए, वर पानेके अधिकारी नकुलको दुर्मर्षणका वह सुन्दर भवन प्रदान किया ॥ ११ ॥
दुर्मुखस्य च वेश्माग्र्यं श्रीमत् कनकभूषणम् ।
पूर्णपद्मदलाक्षीणां स्त्रीणां शयनसंकुलम् ॥ १२ ॥
प्रददौ सहदेवाय संततं प्रियकारिणे ।
मुमुदे तच्च लब्ध्वासौ कैलासं धनदो यथा ॥ १३ ॥
दुर्मुखका श्रेष्ठ भवन तो और भी सुन्दर था । उसे सुवर्णसे सुसज्जित किया गया था । खिले हुए कमलदलके समान नेत्रोंवाली सुन्दर स्त्रियोंकी शय्याओंसे भरा हुआ वह भवन युधिष्ठिरने सदा अपना प्रिय करनेवाले सहदेवको दिया । जैसे कुबेर कैलासको पाकर संतुष्ट हुए थे, उसी प्रकार उस सुन्दर महलको पाकर सहदेवको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १२-१३ ॥
युयुत्सुर्विदुरश्चैव संजयश्च विशाम्पते ।
सुधर्मा चैव धौम्यश्च यथास्वान् जग्मुरालयान् ॥ १४ ॥
प्रजानाथ! युयुत्सु, विदुर, संजय, सुधर्मा और धौम्य मुनि भी अपने - अपने पहलेके ही घरोंमें गये ॥ १४ ॥
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सह सात्यकिना शौरिरर्जुनस्य निवेशनम् ।
विवेश पुरुषव्याघ्रो व्याघ्रो गिरिगुहामिव ॥ १५ ॥
जैसे व्याघ्र पर्वतकी कन्दरामें प्रवेश करता है, उसी प्रकार सात्यकिसहित पुरुषसिंह श्रीकृष्णने अर्जुनके महलमें पदार्पण किया ॥ १५ ॥
तत्र भक्ष्यान्नपानैस्ते मुदिताः सुसुखोषितः ।
सुखप्रबुद्धा राजानमुपतस्थुर्युधिष्ठिरम् ॥ १६ ॥
वहाँ अपने - अपने स्थानोंपर खान- पानसे संतुष्ट हो वे सब लोग रातभर बड़े सुखसे सोये और सबेरे उठकर राजा युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित हो गये ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि गृहविभागे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें गृहोंका विभाजनविषयक चौवालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन जनमेजय उवाच
प्राप्य राज्यं महाबाहुर्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
यदन्यदकरोद् विप्र तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा — विप्रवर! राज्य पानेके पश्चात् धर्मपुत्र महाबाहु युधिष्ठिरने और कौन - कौन - सा कार्य किया था? यह मुझे बतानेकी कृपा करें? ॥ १ ॥
भगवान् वा हृषीकेशस्त्रैलोक्यस्य परो गुरुः ।
ऋषे यदकरोद् वीरस्तच्च व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
महर्षे! तीनों लोकोंके परम गुरु वीरवर भगवान् श्रीकृष्णने भी क्या- क्या किया था? यह भी विस्तारपूर्वक बतावें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु तत्त्वेन राजेन्द्र कीर्त्यमानं मयानघ ।
वासुदेवं पुरस्कृत्य यदकुर्वत पाण्डवाः ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा - निष्पाप नरेश! भगवान् श्रीकृष्णको आगे करके पाण्डवोंने जो कुछ किया था, उसे ठीक - ठीक बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ ३ ॥
प्राप्य राज्यं महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
चातुर्वर्ण्यं यथायोग्यं स्वे स्वे स्थाने न्यवेशयत् ॥ ४ ॥
महाराज! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने राज्य प्राप्त करनेके बाद सबसे पहले चारों वर्णोंको योग्यतानुसार अपने - अपने स्थान ( कर्तव्यपालन ) में स्थिर किया ॥ ४ ॥
ब्राह्मणानां सहस्रं च स्नातकानां महात्मनाम् ।
सहस्रं निष्कमेकैकं दापयामास पाण्डवः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् सहस्रों महामना स्नातक ब्राह्मणोंमेंसे प्रत्येकको पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने एक-एक हजार स्वर्णमुद्राएँ दिलवायीं ॥ ५ ॥
तथाऽनुजीविनो भृत्यान् संश्रितानतिथीनपि ।
कामैः संतर्पयामास कृपणांस्तर्ककानपि ॥ ६ ॥
इसी तरह जिनकी जीविकाका भार उन्हींके ऊपर था, उन भृत्यों, शरणागतों तथा अतिथियोंको उन्होंने इच्छानुसार भोग्यपदार्थ देकर संतुष्ट किया । दीन- दुखियों तथा पूछे हुए
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प्रश्नोंका उत्तर देनेवाले ज्योतिषियोंको भी संतुष्ट किया ॥ ६ ॥
पुरोहिताय धौम्याय प्रादादयुतशः स गाः ।
धनं सुवर्णं रजतं वासांसि विविधान्यपि ॥ ७ ॥
अपने पुरोहित धौम्यजीको उन्होंने दस हजार गौएँ, धन, सोना, चाँदी तथा नाना प्रकारके वस्त्र दिये ॥ ७ ॥
कृपाय च महाराज गुरुवृत्तिमवर्तत ।
विदुराय च राजासौ पूजां चक्रे यतव्रतः ॥ ८ ॥
महाराज! राजाने कृपाचार्यके साथ वही बर्ताव किया, जो एक शिष्यको अपने गुरुके साथ करना चाहिये । नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले युधिष्ठिरजीने विदुरजीका भी पूजनीय पुरुषकी भाँति सम्मान किया ॥ ८ ॥
भक्ष्यान्नपानैर्विविधैर्वासोभिः शयनासनैः ।
सर्वान् संतोषयामास संश्रितान् ददतां वरः ॥ ९ ॥
दाताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने समस्त आश्रित जनोंको खाने- पीनेकी वस्तुएँ, भाँति - भाँतिके कपड़े, शय्या तथा आसन देकर संतुष्ट किया ॥ ९ ॥
लब्धप्रशमनं कृत्वा स राजा राजसत्तम ।
युयुत्सोर्धार्तराष्ट्रस्य पूजां चक्रे महायशाः ॥ १० ॥
धृतराष्ट्राय तद् राज्यं गान्धार्यै विदुराय च ।
निवेद्य सुस्थवद् राजा सुखमास्ते युधिष्ठिरः ॥ ११ ॥
नृपश्रेष्ठ! महायशस्वी राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार प्राप्त हुए धनका यथोचित विभाग करके उसकी शान्ति की तथा युयुत्सु एवं धृतराष्ट्रका विशेष सत्कार किया । धृतराष्ट्र, गान्धारी तथा विदुरजीकी सेवामें अपना सारा राज्य समर्पित करके राजा युधिष्ठिर स्वस्थ एवं सुखी हो गये ॥ १०-११ ॥
तथा सर्वं स नगरं प्रसाद्य भरतर्षभ ।
वासुदेवं महात्मानमभ्यगच्छत् कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार सम्पूर्ण नगरकी प्रजाको प्रसन्न करके वे हाथ जोड़कर महात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके पास गये ॥ १२ ॥
ततो महति पर्यङ्के मणिकाञ्चनभूषिते ।
ददर्श कृष्णमासीनं नीलमेघसमद्युतिम् ॥ १३ ॥
जाज्वल्यमानं वपुषा दिव्याभरणभूषितम् ।
पीतकौशेयवसनं हेम्नेवोपगतं मणिम् ॥ १४ ॥
उन्होंने देखा, भगवान् श्रीकृष्ण मणियों तथा सुवर्णसे भूषित एक बड़े पलंगपर बैठे हैं, उनकी श्याम सुन्दर छवि नील मेघके समान सुशोभित हो रही है । उनका श्रीविग्रह दिव्य तेजसे उद्भासित हो रहा है। एक-एक अङ्ग दिव्य आभूषणोंसे विभूषित है । श्याम शरीरपर