05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 291–300

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300

पृष्ठ 291

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रेशमी पीताम्बर धारण किये भगवान् सुवर्णजटित नीलमके समान जान पड़ते हैं ॥ १३-१४ ॥

कौस्तुभेनोरसिस्थेन मणिनाभिविराजितम् ।

उद्यतेवोदयं शैलं सूर्येणाभिविराजितम् ॥ १५ ॥

उनके वक्षःस्थलपर स्थित हुई कौस्तुभमणि अपना प्रकाश बिखेरती हुई उसी प्रकार उनकी शोभा बढाती है, मानो उगते हुए सूर्य उदयाचलको प्रकाशित कर रहे हों ॥ १५ ॥

नौपम्यं विद्यते तस्य त्रिषु लोकेषु किंचन ।

सोऽभिगम्य महात्मानं विष्णुं पुरुषविग्रहम् ॥ १६ ॥

उवाच मधुरं राजा स्मितपूर्वमिदं तदा । भगवान्‌की उस दिव्य झाँकीकी तीनों लोकोंमें कहीं उपमा नहीं थी । राजा युधिष्ठिर मानवविग्रहधारी उन परमात्मा विष्णुके समीप जाकर मुसकराते हुए मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले – ॥ १६३ ॥

सुखेन ते निशा कच्चिद् व्युष्टा बुद्धिमतां वर ॥ १७ ॥

कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवाच्युत । ' बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अच्युत! आपकी रात सुखसे बीती है न? सारी ज्ञानेन्द्रियाँ प्रसन्न तो हैं न? ॥ १७३ ॥

तथैवोपश्रिता देवी बुद्धिर्बुद्धिमतां वर ॥ १८ ॥

वयं राज्यमनुप्राप्ताः पृथिवी च वशे स्थिता ।

तव प्रसादाद् भगवंस्त्रिलोकगतिविक्रम ॥ १ ९ ॥

जयं प्राप्ता यशश्चाग्र्यं न च धर्मच्युता वयम् । ' बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! बुद्धिदेवीने आपका आश्रय लिया है न? प्रभो! हमने आपकी ही कृपासे राज्य पाया है और यह पृथ्वी हमारे अधिकारमें आयी है । भगवन्! आप ही तीनों लोकोंके आश्रय और पराक्रम हैं । आपकी ही दयासे हमने विजय तथा उत्तम यश प्राप्त किये हैं और धर्मसे भ्रष्ट नहीं हुए हैं ' ॥ १८-१९ ३ ॥

तं तथा भाषमाणं तु धर्मराजमरिंदमम् ।

नोवाच भगवान् किंचिद् ध्यानमेवान्वपद्यत ॥ २० ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर इस प्रकार कहते चले जा रहे थे; परंतु

भगवान्ने उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया । वे उस समय ध्यानमें मग्न थे ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कृष्णं प्रति युधिष्ठिरवाक्ये पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्रीकृष्णके प्रति युधिष्ठिरका वचनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥

पृष्ठ 292

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पृष्ठ 293

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षट्चत्वारिंशोऽध्यायः युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवाद, श्रीकृष्णद्वारा भीष्मकी प्रशंसा और युधिष्ठिरको उनके पास चलनेका आदेश युधिष्ठिर उवाच

किमिदं परमाश्चर्यं ध्यायस्यमितविक्रम ।

कच्चिल्लोकत्रयस्यास्य स्वस्ति लोकपरायण ॥ १ ॥

चतुर्थं ध्यानमार्गं त्वमालम्ब्य पुरुषर्षभ ।

अपक्रान्तो यतो देवस्तेन मे विस्मितं मनः ॥ २ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— अमितपराक्रमी, जगत्के आश्रयदाता पुरुषोत्तम! आप यह किसका ध्यान कर रहे हैं? यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! इस त्रिलोकीका कुशल तो है न? आप तो जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति - तीनों अवस्थाओंसे परे तुरीय ध्यानमार्गका आश्रय लेकर स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे ऊपर उठ गये हैं । इससे मेरे मनको बड़ा आश्चर्य हो रहा है ॥ १-२ ॥

निगृहीतो हि वायुस्ते पञ्चकर्मा शरीरगः ।

इन्द्रियाणि प्रसन्नानि मनसि स्थापितानि ते ॥ ३ ॥

आपके शरीरमें रहनेवाली और श्वास-प्रश्वास आदि पाँच कर्म करनेवाली प्राणवायु अवरुद्ध हो गयी है । आपने अपनी प्रसन्न इन्द्रियोंको मनमें स्थापित कर दिया है ॥ ३ ॥

वाक् च सत्त्वं च गोविन्द बुद्धौ संवेशितानि ते ।

सर्वे चैव गुणा देवाः क्षेत्रज्ञे ते निवेशिताः ॥ ४ ॥

गोविन्द! मन तथा वाक् आदि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ आपके द्वारा बुद्धिमें लीन कर दी गयी हैं । समस्त गुणोंको और इन्द्रियोंके अनुग्राहक देवताओंको आपने क्षेत्रज्ञ आत्मामें स्थापित कर दिया है ॥ ४ ॥

नेङ्गन्ति तव रोमाणि स्थिरा बुद्धिस्तथा मनः ।

काष्ठकुड्यशिलाभूतो निरीहश्चासि माधव ॥ ५ ॥

आपके रोंगटे खड़े हो गये हैं । जरा भी हिलते नहीं हैं । बुद्धि तथा मन भी स्थिर हैं । माधव! आप काठ, दीवार और पत्थरकी तरह निश्चेष्ट हो गये हैं ॥ ५ ॥

यथा दीपो निवातस्थो निरिङ्गो ज्वलते पुनः ।

तथासि भगवन् देव पाषाण इव निश्चलः ॥ ६ ॥

भगवन्! देवदेव! जैसे वायुशून्य स्थानमें रखे हुए दीपककी लौ काँपती नहीं, एकतार जलती रहती है, उसी तरह आप भी स्थिर हैं मानो पाषाणकी मूर्ति हों ॥

पृष्ठ 294

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यदि श्रोतुमिहार्हामि न रहस्यं च ते यदि ।

छिन्धि मे संशयं देव प्रपन्नायाभियाचते ॥ ७ ॥

देव! यदि मैं सुननेका अधिकारी होऊँ और यदि यह आपका कोई गोपनीय रहस्य न हो तो मेरे इस संशयका निवारण कीजिये; इसके लिये मैं आपकी शरणमें आकर बारंबार याचना करता हूँ ॥ ७ ॥

त्वं हि कर्ता विकर्ता च क्षरं चैवाक्षरं च हि ।

अनादिनिधनश्चाद्यस्त्वमेव पुरुषोत्तम ॥ ८ ॥

पुरुषोत्तम! आप ही इस जगत्को बनाने और विलीन करनेवाले हैं । आप ही क्षर और

अक्षर पुरुष हैं । आपका न आदि है और न अन्त । आप ही सबके आदि कारण हैं ॥ ८ ॥

त्वत्प्रपन्नाय भक्ताय शिरसा प्रणताय च ।

ध्यानस्यास्य यथा तत्त्वं ब्रूहि धर्मभृतां वर ॥ ९ ॥

मैं आपकी शरणमें आया हुआ भक्त हूँ और माथा टेककर आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रभो! इस ध्यानका यथार्थ तत्त्व मुझे बता दीजिये ॥

ततः स्वे गोचरे न्यस्य मनोबुद्धीन्द्रियाणि सः ।

स्मितपूर्वमुवाचेदं भगवान् वासवानुजः ॥ १० ॥

युधिष्ठिरकी यह प्रार्थना सुनकर मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंको अपने स्थानमें स्थापित करके इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए इस प्रकार बोले ॥ १० ॥

पृष्ठ 295

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महाभारत, ध्यानमग्न श्रीकृष्णसे युधिष्ठिर प्रश्न कर रहे हैं

पृष्ठ 296

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वासुदेव उवाच

शरतल्पगतो भीष्मः शाम्यन्निव हुताशनः ।

मां ध्याति पुरुषव्याघ्रस्ततो मे तद्गतं मनः ॥ ११ ॥

श्रीकृष्णने कहा- राजन्! बाण- शय्यापर पड़े हुए पुरुषसिंह भीष्म, जो इस समय बुझती हुई आगके समान हो रहे हैं, मेरा ध्यान कर रहे हैं; इसलिये मेरा मन भी उन्हींमें लगा हुआ है ॥ ११ ॥

यस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ।

न सेहे देवराजोऽपि तमस्मि मनसा गतः ॥ १२ ॥

बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान जिनके धनुषकी टंकारको देवराज इन्द्र भी नहीं सह सके थे, उन्हीं भीष्मके चिन्तनमें मेरा मन लगा हुआ है ॥ १२ ॥

येनाभिजित्य तरसा समस्तं राजमण्डलम् ।

ऊढास्तिस्रस्तु ताः कन्यास्तमस्मि मनसा गतः ॥ १३ ॥

जिन्होंने काशीपुरीमें समस्त राजाओंके समुदायको वेगपूर्वक परास्त करके काशिराजकी तीनों कन्याओंका अपहरण किया था, उन्हीं भीष्मके पास मेरा मन चला गया है ॥ १३ ॥

त्रयोविंशतिरात्रं यो योधयामास भार्गवम् ।

न च रामेण निस्तीर्णस्तमस्मि मनसा गतः ॥ १४ ॥

जो लगातार तेईस दिनोंतक भृगुनन्दन परशुरामजीके साथ युद्ध करते रहे, तो भी परशुरामजी जिन्हें परास्त न कर सके, उन्हीं भीष्मके पास मैं मनके द्वारा पहुँच गया था ॥ १४ ॥

एकीकृत्येन्द्रियग्रामं मनः संयम्य मेधया ।

शरणं मामुपागच्छत् ततो मे तद्गतं मनः ॥ १५ ॥

वे भीष्मजी अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी वृत्तियों को एकाग्रकर बुद्धिके द्वारा मनका संयम करके मेरी शरणमें आ गये थे; इसीलिये मेरा मन भी उन्हींमें जा लगा था ॥

यं गङ्गा गर्भविधिना धारयामास पार्थिव ।

वसिष्ठशिक्षितं तात तमस्मि मनसा गतः ॥ १६ ॥

तात! भूपाल! जिन्हें गंगादेवीने विधिपूर्वक अपने गर्भमें धारण किया था और जिन्हें महर्षि वसिष्ठके द्वारा वेदोंकी शिक्षा प्राप्त हुई थी, उन्हीं भीष्मजीके पास मैं मन- ही- मन पहुँच गया था ॥ १६ ॥

दिव्यास्त्राणि महातेजा यो धारयति बुद्धिमान् ।

साङ्गांश्च चतुरो वेदांस्तमस्मि मनसा गतः ॥ १७ ॥

जो महातेजस्वी बुद्धिमान् भीष्म दिव्यास्त्रों तथा अंगोंसहित चारों वेदोंको धारण करते हैं, उन्हींके चिन्तनमें मेरा मन लगा हुआ था ॥ १७ ॥

पृष्ठ 297

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रामस्य दयितं शिष्यं जामदग्न्यस्य पाण्डव ।

आधारं सर्वविद्यानां तमस्मि मनसा गतः ॥ १८ ॥

पाण्डुकुमार! जो जमदग्निनन्दन परशुरामजीके प्रिय शिष्य तथा सम्पूर्ण विद्याओंके आधार हैं, उन्हीं भीष्मजीका मैं मन - ही- मन चिन्तन करता था ॥ १८ ॥

स हि भूतं भविष्यच्च भवच्च भरतर्षभ ।

वेत्ति धर्मविदां श्रेष्ठं तमस्मि मनसा गतः ॥ १ ९ ॥

भरतश्रेष्ठ! वे भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंकी बातें जानते हैं । धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ उन्हीं भीष्मका मैं मन - ही - मन चिन्तन करने लगा था ॥ १ ९ ॥

तस्मिन् हि पुरुषव्याघ्रे कर्मभिः स्वैर्दिवं गते ।

भविष्यति मही पार्थ नष्टचन्द्रेव शर्वरी ॥ २० ॥

पार्थ! जब पुरुषसिंह भीष्म अपने कर्मोंके अनुसार स्वर्गलोकमें चले जायँगे, उस समय यह पृथ्वी अमावास्याकी रात्रिके समान श्रीहीन हो जायगी ॥ २० ॥

तद् युधिष्ठिर गाङ्गेयं भीष्मं भीमपराक्रमम् ।

अभिगम्योपसंगृह्य पृच्छ यत् ते मनोगतम् ॥ २१ ॥

अतः महाराज युधिष्ठिर! आप भयानक पराक्रमी गंगानन्दन भीष्मके पास चलकर उनके चरणोंमें प्रणाम कीजिये और आपके मनमें जो संदेह हो उसे पूछिये ॥

चातुर्विद्यं चातुर्होत्रं चातुराश्रम्यमेव च ।

राजधर्मांश्च निखिलान् पृच्छैनं पृथिवीपते ॥ २२ ॥

पृथ्वीनाथ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों विद्याओंको, होता, उद्गाता, ब्रह्मा और अध्वर्युसे सम्बन्ध रखनेवाले यज्ञादि कर्मोंको, चारों आश्रमोंके धर्मोंको तथा सम्पूर्ण राजधर्मोंको उनसे पूछिये ॥ २२ ॥

तस्मिन्नस्तमिते भीष्मे कौरवाणां धुरंधरे ।

ज्ञानान्यस्तं गमिष्यन्ति तस्मात् त्वां चोदयाम्यहम् ॥ २३ ॥

कौरववंशका भार सँभालनेवाले भीष्मरूपी सूर्य जब अस्त हो जायँगे, उस समय सब प्रकारके ज्ञानोंका प्रकाश नष्ट हो जायगा; इसलिये मैं आपको वहाँ चलनेके लिये कहता हूँ ॥ २३ ॥

तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथ्यं वचनमुत्तमम् ।

साश्रुकण्ठः स धर्मज्ञो जनार्दनमुवाच ह ॥ २४ ॥

भगवान् श्रीकृष्णका वह उत्तम और यथार्थ वचन सुनकर धर्मज्ञ युधिष्ठिरका गला भर आया और वे आँसू बहाते हुए वहाँ श्रीकृष्णसे कहने लगे— ॥ २४ ॥

यद् भवानाह भीष्मस्य प्रभावं प्रति माधव ।

तथा तन्नात्र संदेहो विद्यते मम माधव ॥ २५ ॥

पृष्ठ 298

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‘ माधव! भीष्मजीके प्रभावके विषयमें आप जैसा कहते हैं, वह सब ठीक है । उसमें मुझे भी संदेह नहीं है ॥ २५ ॥

महाभाग्यं च भीष्मस्य प्रभावश्च महाद्युते ।

श्रुतं मया कथयतां ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥ २६ ॥

‘ महातेजस्वी केशव! मैंने महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे भी भीष्मजीके महान् सौभाग्य और प्रभावका वर्णन सुना है ॥ २६ ॥

भवांश्च कर्ता लोकानां यद् ब्रवीत्यरिसूदन ।

तथा तदनभिध्येयं वाक्यं यादवनन्दन ॥ २७ ॥

‘ शत्रुसूदन! यादवनन्दन! आप सम्पूर्ण जगत्के विधाता हैं। आप जो कुछ कह रहे हैं, उसमें भी सोचने - विचारनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २७ ॥

यदि त्वनुग्रहवती बुद्धिस्ते मयि माधव ।

त्वामग्रतः पुरस्कृत्य भीष्मं यास्यामहे वयम् ॥ २८ ॥

‘ माधव! यदि आपका विचार मेरे ऊपर अनुग्रह करनेका है तो हमलोग आपको ही आगे करके भीष्मजीके पास चलेंगे ॥ २८ ॥

आवृते भगवत्यर्के स हि लोकान् गमिष्यति ।

त्वद्दर्शनं महाबाहो तस्मादर्हति कौरवः ॥ २ ९ ॥

‘ महाबाहो! सूर्यके उत्तरायण होते ही कुरुकुलभूषण भीष्म देवलोकको चले जायँगे; अतः उन्हें आपका दर्शन अवश्य प्राप्त होना चाहिये ॥ २ ९ ॥

तव चाद्यस्य देवस्य क्षरस्यैवाक्षरस्य च ।

दर्शनं त्वस्य लाभः स्यात् त्वं हि ब्रह्ममयो निधिः ॥ ३० ॥

‘ आप आदिदेव तथा क्षर- अक्षर पुरुष हैं। आपका दर्शन उनके लिये महान् लाभकारी होगा; क्योंकि आप ब्रह्ममयी निधि हैं' ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैवं धर्मराजस्य वचनं मधुसूदनः ।

पार्श्वस्थं सात्यकिं प्राह रथो मे युज्यतामिति ॥ ३१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! धर्मराजका यह वचन सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्णने पास ही खड़े हुए सात्यकिसे कहा- ' मेरा रथ जोतकर तैयार किया जाय ' ॥ ३१ ॥

सात्यकिस्त्वाशु निष्क्रम्य केशवस्य समीपतः ।

दारुकं प्राह कृष्णस्य युज्यतां रथ इत्युत ॥ ३२ ॥

आज्ञा पाते ही सात्यकि श्रीकृष्णके पाससे तुरंत बाहर निकल गये और दारुकसे बोले –'भगवान् श्रीकृष्णका रथ तैयार करो ' ॥ ३२ ॥

स सात्यकेराशु वचो निशम्य

पृष्ठ 299

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रथोत्तमं काञ्चनभूषिताङ्गम् ।

मसारगल्वर्कमयैर्विभङ्गै- र्विभूषितं हेमनिबद्धचक्रम् ॥ ३३ ॥

दिवाकरांशुप्रभमाशुगामिनं विचित्रनानामणिभूषितान्तरम् । नवोदितं सूर्यमिव प्रतापिनं विचित्रतार्क्ष्यध्वजिनं पताकिनम् ॥ ३४ ॥

सुग्रीवशैब्यप्रमुखैर्वराश्वै- मनोजवैः काञ्चनभूषिताङ्गैः । संयुक्तमावेदयदच्युताय कृताञ्जलिर्दारुको राजसिंह ॥ ३५ ॥

राजसिंह! सात्यकिका यह वचन सुनकर दारुकने मरकत, चन्द्रकान्त तथा सूर्यकान्त मणियोंकी ज्योतिर्मयी तरंगों से विभूषित उस उत्तम रथको, जिसका एक-एक अंग सुनहरे साजोंसे सजाया गया था तथा जिसके पहियोंपर सोनेके पत्र जड़े गये थे, जोतकर तैयार किया और हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णको इसकी सूचना दी । वह शीघ्रगामी रथ सूर्यकी किरणोंके पड़नेसे उद्भासित हो तुरंतके उगे हुए सूर्यके समान प्रकाशित होता था, उसके भीतरी भागको नाना प्रकारकी विचित्र मणियोंसे विभूषित किया गया था । वह प्रतापी रथ विचित्र गरुड़चिह्नित ध्वजा और पताकासे सुशोभित था । उसमें सोनेके साजबाजसे सजे हुए अंगोंवाले, मनके समान वेगशाली, सुग्रीव और शैब्य आदि सुन्दर घोड़े जुते हुए थे ॥ ३३–३५ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि महापुरुषस्तवे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें महापुरुषस्तुतिविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 300

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति- भीष्मस्तवराज जनमेजय उवाच

शरतल्पे शयानस्तु भरतानां पितामहः ।

कथमुत्सृष्टवान् देहं कं च योगमधारयत् ॥१ ॥

जनमेजयने पूछा— बाणशय्यापर सोये हुए भरतवंशियोंके पितामह भीष्मजीने किस प्रकार अपने शरीरका त्याग किया और उस समय उन्होंने किस योगकी धारणा की? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् शुचिर्भूत्वा समाहितः ।

भीष्मस्य कुरुशार्दूल देहोत्सर्गं महात्मनः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! कुरुश्रेष्ठ! तुम सावधान, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर महात्मा भीष्मके देहत्यागका वृत्तान्त सुनो ॥ २ ॥

(शुक्लपक्षस्य चाष्टम्यां माघमासस्य पार्थिव । प्राजापत्ये च नक्षत्रे मध्यं प्राप्ते दिवाकरे ॥ )

निवृत्तमात्रे त्वयन उत्तरे वै दिवाकरे ।

समावेशयदात्मानमात्मन्येव समाहितः ॥ ३ ॥

राजन्! जब दक्षिणायन समाप्त हुआ और सूर्य उत्तरायणमें आ गये, तब माघमासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको रोहिणीनक्षत्रमें मध्याह्नके समय भीष्मजीने ध्यान- मग्न होकर अपने मनको परमात्मामें लगा दिया ॥ ३ ॥

विकीर्णाशुरिवादित्यो भीष्मः शरशतैश्चितः ।

शुशुभे परया लक्ष्म्या वृतो ब्राह्मणसत्तमैः ॥ ४ ॥

चारों ओर अपनी किरणें बिखेरनेवाले सूर्यके समान सैकड़ों बाणोंसे छिदेहुए भीष्म उत्तम शोभासे सुशोभित होने लगे, अनेकानेक श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें घेरकर बैठे थे ॥ ४ ॥

व्यासेन वेदविदुषा नारदेन सुरर्षिणा ।

देवस्थानेन वात्स्येन तथाश्मकसुमन्तुना ॥ ५ ॥

तथा जैमिनिना चैव पैलेन च महात्मना ।

शाण्डिल्यदेवलाभ्यां च मैत्रेयेण च धीमता ॥ ६ ॥

असितेन वसिष्ठेन कौशिकेन महात्मना ।

हारीतलोमशाभ्यां च तथाऽऽत्रेयेण धीमता ॥ ७ ॥