05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 301–310

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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बृहस्पतिश्च शुक्रश्च च्यवनश्च महामुनिः ।

सनत्कुमारः कपिलो वाल्मीकिस्तुम्बुरुः कुरुः ॥ ८ ॥

मौद्गल्यो भार्गवो रामस्तृणबिन्दुर्महामुनिः ।

पिप्पलादोऽथ वायुश्च संवर्तः पुलहः कचः ॥ ९ ॥

काश्यपश्च पुलस्त्यश्च क्रतुर्दक्षः पराशरः ।

मरीचिरंगिराः काश्यो गौतमो गालवो मुनिः ॥ १० ॥

धौम्यो विभाण्डो माण्डव्यो धौम्रः कृष्णानुभौतिकः ।

उलूकः परमो विप्रो मार्कण्डेयो महामुनिः ॥ ११ ॥

भास्करिः पूरणः कृष्णः सूतः परमधार्मिकः ।

एतैश्चान्यैर्मुनिगणैर्महाभागैर्महात्मभिः ॥ १२ ॥

श्रद्धादमशमोपेतैर्वृतश्चन्द्र इव ग्रहैः । वेदोंके ज्ञाता व्यास, देवर्षि नारद, देवस्थान, वात्स्य, अश्मक, सुमन्तु, जैमिनि, महात्मा पैल, शाण्डिल्य, देवल, बुद्धिमान् मैत्रेय, असित, वसिष्ठ, महात्मा कौशिक ( विश्वामित्र ), हारीत, लोमश, बुद्धिमान् दत्तात्रेय, बृहस्पति, शुक्र, महामुनि च्यवन, सनत्कुमार, कपिल, वाल्मीकि, तुम्बुरु, कुरु, मौद्गल्य, भृगुवंशी परशुराम, महामुनि तृणबिन्दु, पिप्पलाद, वायु, संवर्त, पुलह, कच, कश्यप, पुलस्त्य, क्रतु, दक्ष, पराशर, मरीचि, अंगिरा, काश्य, गौतम, गालव मुनि, धौम्य, विभाण्ड, माण्डव्य, धौम्र, कृष्णानुभौतिक, श्रेष्ठ ब्राह्मण उलूक, महामुनि मार्कण्डेय, भास्कर, पूरण, कृष्ण और परम धार्मिक सूत —ये तथा और भी बहुत -से सौभाग्यशाली महात्मा मुनि, जो श्रद्धा, शम, दम आदि गुणोंसे सम्पन्न थे, भीष्मजीको घेरे हुए थे । इन ऋषियोंके बीचमें भीष्मजी ग्रहों से घिरे हुए चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे ॥ ५–१२३ ॥ भीष्मस्तु पुरुषव्याघ्रः कर्मणा मनसा गिरा ॥ १३ ॥

शरतल्पगतः कृष्णं प्रदध्यौ प्राञ्जलिः शुचिः । पुरुषसिंह भीष्म शरशय्यापर ही पड़े - पड़े हाथ जोड़ पवित्र भावसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करने लगे ॥ १३३ ॥

स्वरेण हृष्टपुष्टेन तुष्टाव मधुसूदनम् ॥ १४ ॥

योगेश्वरं पद्मनाभं विष्णुं जिष्णुं जगत्पतिम् ।

कृताञ्जलिपुटो भूत्वा वाग्विदां प्रवरः प्रभुः ॥ १५ ॥

भीष्मः परमधर्मात्मा वासुदेवमथास्तुवत् । ध्यान करते- करते वे हृष्ट-पुष्ट स्वरसे भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे । वाग्वेत्ताओंमें श्रेष्ठ, शक्तिशाली, परम धर्मात्मा भीष्मने हाथ जोड़कर योगेश्वर, पद्मनाभ, सर्वव्यापी, विजयशील जगदीश्वर वासुदेवकी इस प्रकार स्तुति आरम्भ की ॥ १४-१५३ ॥

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भीष्म उवाच आरिराधयिषुः कृष्णं वाचं जिगदिषामि याम् ॥ १६ ॥

तया व्याससमासिन्या प्रीयतां पुरुषोत्तमः । भीष्मजी बोले- मैं श्रीकृष्णके आराधनकी इच्छा मनमें लेकर जिस वाणीका प्रयोग करना चाहता हूँ, वह विस्तृत हो या संक्षिप्त, उसके द्वारा वे पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों ॥ १६३ ॥

शुचिं शुचिपदं हंसं तत्पदं परमेष्ठिनम् ॥ १७ ॥

युक्त्या सर्वात्मनाऽऽत्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् । जो स्वयं शुद्ध हैं, जिनकी प्राप्तिका मार्ग भी शुद्ध है, जो हंसस्वरूप, तत् पदके लक्ष्यार्थ परमात्मा और प्रजापालक परमेष्ठी हैं, मैं सब ओरसे सम्बन्ध तोड़ केवल उन्हींसे नाता जोड़कर सब प्रकारसे उन्हीं सर्वात्मा श्रीकृष्णकी शरण लेता हूँ ॥ १७३ ॥

अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः ॥ १८ ॥

एको यं वेद भगवान् धाता नारायणो हरिः । उनका न आदि है न अन्त । वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं । उनको न देवता जानते हैं न ऋषि । एकमात्र सबका धारण- पोषण करनेवाले ये भगवान् श्रीनारायण हरि ही उन्हें जानते हैं ॥ १८३ ॥

नारायणादृषिगणास्तथा सिद्धमहोरगाः ॥ १ ९ ॥ देवा देवर्षयश्चैव यं विदुः परमव्ययम् । नारायणसे ही ऋषिगण, सिद्ध, बड़े - बड़े नाग, देवता तथा देवर्षि भी उन्हें अविनाशी परमात्माके रूपमें जानने लगे हैं ॥ १ ९ ३ ॥ देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ २० ॥

यं न जानन्ति को ह्येष कुतो वा भगवानिति । देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग भी जिनके विषयमें यह नहीं जानते हैं कि ‘ ये भगवान् कौन हैं तथा कहाँसे आये हैं? ' ॥ २० ॥

यस्मिन् विश्वानि भूतानि तिष्ठन्ति च विशन्ति च ॥ २१ ॥

गुणभूतानि भूतेशे सूत्रे मणिगणा इव । उन्हींमें सम्पूर्ण प्राणी स्थित हैं और उन्हींमें उनका लय होता है । जैसे डोरेमें मनके पिरोये होते हैं, उसी प्रकार उन भूतेश्वर परमात्मामें समस्त त्रिगुणात्मक भूत पिरोये हुए हैं ॥ २१३ ॥

यस्मिन् नित्ये तते तन्तौ दृढे स्रगिव तिष्ठति ॥ २२ ॥

सदसद्ग्रथितं विश्वं विश्वाङ्गे विश्वकर्मणि ।

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भगवान् सदा नित्य विद्यमान ( कभी नष्ट न होनेवाले) और तने हुए एक सुदृढ़ सूतके समान हैं । उनमें यह कार्य- कारणरूप जगत् उसी प्रकार गुँथा हुआ है, जैसे सूतमें फूलकी माला । यह सम्पूर्ण विश्व उनके ही श्रीअंगमें स्थित है; उन्होंने ही इस विश्वकी सृष्टि की है ॥ २२ ॥

हरिं सहस्रशिरसं सहस्रचरणेक्षणम् ॥ २३ ॥

सहस्रबाहुमुकुटं सहस्रवदनोज्ज्वलम् । उन श्रीहरिके सहस्रों सिर, सहस्रों चरण और सहस्रों नेत्र हैं, वे सहस्रों भुजाओं, सहस्रों मुकुटों तथा सहस्रों मुखोंसे देदीप्यमान रहते हैं ॥ २३ ॥

प्राहुर्नारायणं देवं यं विश्वस्य परायणम् ॥ २४ ॥

अणीयसामणीयांसं स्थविष्ठं च स्थवीयसाम् ।

गरीयसां गरिष्ठं च श्रेष्ठं च श्रेयसामपि ॥ २५ ॥

वे ही इस विश्वके परम आधार हैं । इन्हींको नारायणदेव कहते हैं । वे सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म

और स्थूलसे भी स्थूल हैं । वे भारी- से- भारी और उत्तमसे भी उत्तम हैं ॥

यं वाकेष्वनुवाकेषु निषत्सूपनिषत्सु च ।

गृणन्ति सत्यकर्माणं सत्यं सत्येषु सामसु ॥ २६ ॥

वाकों और अनुवाकोंमें, निषदों और उपनिषदोंमें तथा सच्ची बात बतानेवाले साममन्त्रोंमें उन्हींको सत्य और सत्यकर्मा कहते हैं ॥ २६ ॥

चतुर्भिश्चतुरात्मानं सत्त्वस्थं सात्वतां पतिम् ।

यं दिव्यैर्देवमर्चन्ति गुह्यैः परमनामभिः ॥ २७ ॥

वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध – इन चार दिव्य गोपनीय और उत्तम नामोंद्वारा ब्रह्म, जीव, मन और अहंकार-इन चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए उन्हीं भक्तप्रतिपालक भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की जाती है, जो सबके अन्तःकरणमें विद्यमान ॥ २७ ॥

यस्मिन् नित्यं तपस्तप्तं यदङ्गेष्वनुतिष्ठति ।

सर्वात्मा सर्ववित् सर्वः सर्वज्ञः सर्वभावनः ॥ २८ ॥

भगवान् वासुदेवकी प्रसन्नताके लिये ही नित्य तपका अनुष्ठान किया जाता है; क्योंकि वे सबके हृदयोंमें विराजमान हैं । वे सबके आत्मा, सबको जाननेवाले, सर्वस्वरूप, सर्वज्ञ और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं ॥

यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत् ।

भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै दीप्तमग्निमिवारणिः ॥ २९ ॥

जैसे अरणि प्रज्वलित अग्निको प्रकट करती है, उसी प्रकार देवकीदेवीने इस भूतलपर रहनेवाले ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञोंकी रक्षाके लिये उन भगवान्‌को वसुदेवजीके तेजसे प्रकट

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किया था ॥ २ ९ ॥

यमनन्यो व्यपेताशीरात्मानं वीतकल्मषम् ।

दृष्ट्यानन्त्याय गोविन्दं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ ३० ॥

अतिवाय्विन्द्रकर्माणमतिसूर्यातितेजसम् ।

अतिबुद्धीन्द्रियात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥ ३१ ॥

सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके अनन्यभावसे स्थित रहनेवाला साधक मोक्षके उद्देश्यसे अपने विशुद्ध अन्तःकरणमें जिन पापरहित शुद्ध-बुद्ध परमात्मा गोविन्दका ज्ञानदृष्टिसे साक्षात्कार करता है, जिनका पराक्रम वायु और इन्द्रसे बहुत बढ़कर है, जो अपने तेजसे सूर्यको भी तिरस्कृत कर देते हैं तथा जिनके स्वरूपतक इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी भी पहुँच नहीं हो पाती, उन प्रजापालक परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ३०-३१ ॥

पुराणे पुरुषं प्रोक्तं ब्रह्म प्रोक्तं युगादिषु ।

क्षये संकर्षणं प्रोक्तं तमुपास्यमुपास्महे ॥ ३२ ॥

पुराणोंमें जिनका ' पुरुष' नामसे वर्णन किया गया है, जो युगोंके आरम्भमें ‘ ब्रह्म ' और युगान्तमें ‘ संकर्षण ' कहे गये हैं, उन उपास्य परमेश्वरकी हम उपासना करते हैं ॥ ३२ ॥

यमेकं बहुधाऽऽत्मानं प्रादुर्भूतमधोक्षजम् ।

नान्यभक्ताः क्रियावन्तो यजन्ते सर्वकामदम् ॥ ३३ ॥

यमाहुर्जगतः कोशं यस्मिन् संनिहिताः प्रजाः ।

यस्मिँल्लोकाः स्फुरन्तीमे जले शकुनयो यथा ॥ ३४ ॥

ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म यत् तत् सदसतोः परम् ।

अनादिमध्यपर्यन्तं न देवा नर्षयो विदुः ॥ ३५ ॥

यं सुरासुरगन्धर्वाः सिद्धा ऋषिमहोरगाः ।

प्रयता नित्यमर्चन्ति परमं दुःखभेषजम् ॥ ३६ ॥

अनादिनिधनं देवमात्मयोनिं सनातनम् ।

अप्रेक्ष्यमनभिज्ञेयं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥ ३७ ॥

जो एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं, जो इन्द्रियों और उनके विषयोंसे ऊपर उठे होनेके कारण ‘ अधोक्षज ' कहलाते हैं, उपासकोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, यज्ञादि कर्म और पूजनमें लगे हुए अनन्य भक्त जिनका यजन करते हैं, जिन्हें जगत्का कोषागार कहा जाता है, जिनमें सम्पूर्ण प्रजाएँ स्थित हैं, पानीके ऊपर तैरनेवाले जलपक्षियोंकी तरह जिनके ही ऊपर इस सम्पूर्ण जगत्की चेष्टाएँ हो रही हैं, जो परमार्थ सत्यस्वरूप और एकाक्षर ब्रह्म (प्रणव) हैं, सत् और असत्से विलक्षण हैं, जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जिन्हें न देवता ठीक- ठीक जानते हैं और न ऋषि, अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सम्पूर्ण देवता, असुर, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि, बड़े - बड़े नागगण जिनकी सदा पूजा किया करते हैं, जो दुःखरूपी रोगकी सबसे बड़ी ओषधि हैं, जन्म-

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महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 305 का मूल पृष्ठ
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मरणसे रहित, स्वयम्भू एवं सनातन देवता हैं, जिन्हें इन चर्म -चक्षुओंसे देखना और बुद्धिके द्वारा सम्पूर्णरूपसे जानना असम्भव है, उन भगवान् श्रीहरि नारायण देवकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ३३—३७ ॥

यं वै विश्वस्य कर्तारं जगतस्तस्थुषां पतिम् ।

वदन्ति जगतोऽध्यक्षमक्षरं परमं पदम् ॥ ३८ ॥

जो इस विश्वके विधाता और चराचर जगत्के स्वामी हैं, जिन्हें संसारका साक्षी और अविनाशी परमपद कहते हैं, उन परमात्माकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥

हिरण्यवर्णं यं गर्भमदितेर्दैत्यनाशनम् ।

एकं द्वादशधा जज्ञे तस्मै सूर्यात्मने नमः ॥ ३ ९ ॥

जो सुवर्णके समान कान्तिमान्, अदितिके गर्भसे उत्पन्न, दैत्योंके नाशक तथा एक होकर भी बारह रूपोंमें प्रकट हुए हैं, उन सूर्यस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ३ ९ ॥

शुक्ले देवान् पितॄन् कृष्णे तर्पयत्यमृतेन यः ।

यश्च राजा द्विजातीनां तस्मै सोमात्मने नमः ॥ ४० ॥

जो अपनी अमृतमयी कलाओंसे शुक्लपक्षमें देवताओंको और कृष्णपक्षमें पितरोंको तृप्त करते हैं तथा जो सम्पूर्ण द्विजोंके राजा हैं, उन सोमस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ४० ॥

( हुताशनमुखैर्देवैर्धार्यते सकलं जगत् । हविःप्रथमभोक्ता यस्तस्मै होत्रात्मने नमः ॥ ) अग्नि जिनके मुख हैं, वे देवता सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं, जो हविष्यके सबसे पहले भोक्ता हैं, उन अग्निहोत्रस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥

महतस्तमसः पारे पुरुषं ह्यतितेजसम् ।

यं ज्ञात्वा मृत्युमत्येति तस्मै ज्ञेयात्मने नमः ॥ ४१ ॥

जो अज्ञानमय महान् अन्धकारसे परे और ज्ञानालोकसे अत्यन्त प्रकाशित होनेवाले आत्मा हैं, जिन्हें जान लेनेपर मनुष्य मृत्युसे सदाके लिये छूट जाता है, उन ज्ञेयरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ४१ ॥

यं बृहन्तं बृहत्युक्थे यमग्नौ यं महाध्वरे ।

यं विप्रसंघा गायन्ति तस्मै वेदात्मने नमः ॥ ४२ ॥

उक्थनामक बृहत् यज्ञके समय, अग्न्याधानकालमें तथा महायागमें ब्राह्मणवृन्द जिनका ब्रह्मके रूपमें स्तवन करते हैं, उन वेदस्वरूप भगवान्‌को नमस्कार है ॥ ४२ ॥

ऋग्यजुःसामधामानं दशार्धहविरात्मकम् ।

यं सप्ततन्तुं तन्वन्ति तस्मै यज्ञात्मने नमः ॥ ४३ ॥

ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद जिसके आश्रय हैं, पाँच प्रकारका हविष्य जिसका स्वरूप है, गायत्री आदि सात छन्द ही जिसके सात तन्तु हैं, उस यज्ञके रूपमें प्रकट हुए

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महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 306 का मूल पृष्ठ
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परमात्माको प्रणाम है ॥ ४३ ॥

चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च ।

हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तस्मै होमात्मने नमः ॥ ४४ ॥

चार, चार, दो, पाँचे और दो—— इन सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंसे जिन्हें हविष्य अर्पण किया जाता है, उन होमस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ४४ ॥

यः सुपर्णा यजुर्नामच्छन्दोगात्रस्त्रिवृच्छिराः ।

रथन्तरं बृहत् साम तस्मै स्तोत्रात्मने नमः ॥ ४५ ॥

जो ‘ यजुः ’ नाम धारण करनेवाले वेदरूपी पुरुष हैं, गायत्री आदि छन्द जिनके हाथ - पैर आदि अवयव हैं, यज्ञ ही जिनका मस्तक है तथा ' रथन्तर' और ' बृहत्' नामक साम ही जिनकी सान्त्वनाभरी वाणी है, उन स्तोत्ररूपी भगवान्‌को प्रणाम है ॥ ४५ ॥

यः सहस्रसमे सत्रे जज्ञे विश्वसृजामृषिः ।

हिरण्यपक्षः शकुनिस्तस्मै हंसात्मने नमः ॥ ४६ ॥

जो ऋषि हजार वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले प्रजापतियोंके यज्ञमें सोनेकी पाँखवाले पक्षीके रूपमें प्रकट हुए थे, उन हंसरूपधारी परमेश्वरको प्रणाम है ॥ ४६ ॥

पादाङ्गं संधिपर्वाणं स्वरव्यञ्जनभूषणम् ।

यमाहुरक्षरं दिव्यं तस्मै वागात्मने नमः ॥ ४७ ॥

पदोंके समूह जिनके अंग हैं, सन्धि जिनके शरीरकी जोड़ हैं, स्वर और व्यंजन जिनके लिये आभूषणका काम देते हैं तथा जिन्हें दिव्य अक्षर कहते हैं, उन परमेश्वरको वाणीके रूपमें नमस्कार है ॥ ४७ ॥

पज्ञाङ्गो यो वराहो वै भूत्वा गामुज्जहार ह ।

लोकत्रयहितार्थाय तस्मै वीर्यात्मने नमः ॥ ४८ ॥

जिन्होंने तीनों लोकोंका हित करनेके लिये यज्ञमय वराहका स्वरूप धारण करके इस पृथ्वीको रसातलसे ऊपर उठाया था, उन वीर्यस्वरूप भगवान्‌को प्रणाम है ॥

यः शेते योगमास्थाय पर्यङ्के नागभूषिते ।

फणासहस्ररचिते तस्मै निद्रात्मने नमः ॥ ४ ९ ॥

जो अपनी योगमायाका आश्रय लेकर शेषनागके हजार फनोंसे बने हुए पलंगपर शयन करते हैं, उन निद्रास्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ४ ९ ॥

( विश्वे च मरुतश्चैव रुद्रादित्याश्विनावपि ।

वसवः सिद्धसाध्याश्च तस्मै देवात्मने नमः ॥

विश्वेदेव, मरुद्गण, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, वसु, सिद्ध और साध्य — ये सब जिनकी विभूतियाँ हैं, उन देवस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥

अव्यक्तबुद्धयहंकारमनोबुद्धीन्द्रियाणि च ।

तन्मात्राणि विशेषाश्च तस्मै तत्त्वात्मने नमः ॥

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महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 307 का मूल पृष्ठ
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अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि ( महत्तत्त्व), अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ, तन्मात्राएँ और उनका कार्य — वे सब जिनके ही स्वरूप हैं, उन तत्त्वमय परमात्माको नमस्कार है ॥

भूतं भव्यं भविष्यच्च भूतादिप्रभवाप्ययः ।

योऽग्रजः सर्वभूतानां तस्मै भूतात्मने नमः ॥

जो भूत, वर्तमान और भविष्य – कालरूप हैं, जो भूत आदिकी उत्पत्ति और प्रलयके कारण हैं, जिन्हें सम्पूर्ण प्राणियोंका अग्रज बताया गया है, उन भूतात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ॥

यं हि सूक्ष्मं विचिन्वन्ति परं सूक्ष्मविदो जनाः ।

सूक्ष्मात् सूक्ष्मं च यद् ब्रह्म तस्मै सूक्ष्मात्मने नमः ॥

सूक्ष्म तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष जिस परम सूक्ष्म तत्त्वका अनुसंधान करते रहते हैं, जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है, वह ब्रह्म जिनका स्वरूप है, उन सूक्ष्मात्माको नमस्कार है ॥

मत्स्यो भूत्वा विरिञ्चाय येन वेदाः समाहृताः ।

रसातलगतः शीघ्रं तस्मै मत्स्यात्मने नमः ॥

जिन्होंने मत्स्य - शरीर धारण करके रसातलमें जाकर नष्ट हुए सम्पूर्ण वेदोंको ब्रह्माजीके लिये शीघ्र ला दिया था, उन मत्स्यरूपधारी भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है ॥

मन्दराद्रिर्धृतो येन प्राप्ते ह्यमृतमन्थने ।

अतिकर्कशदेहाय तस्मै कूर्मात्मने नमः ॥

जिन्होंने अमृतके लिये समुद्रमन्थनके समय अपनी पीठपर मन्दराचल पर्वतको धारण किया था, उन अत्यन्त कठोर देहधारी कच्छपरूप भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है ॥

वाराहं रूपमास्थाय महीं सवनपर्वताम् ।

उद्धरत्येकदंष्ट्रेण तस्मै क्रोडात्मने नमः ॥

जिन्होंने वाराहरूप धारण करके अपने एक दाँतसे वन और पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीका उद्धार किया था, उन वाराहरूपधारी भगवान्को नमस्कार है ॥

नारसिंहवपुः कृत्वा सर्वलोकभयंकरम् ।

हिरण्यकशिपुं जघ्ने तस्मै सिंहात्मने नमः ॥

जिन्होंने नृसिंहरूप धारण करके सम्पूर्ण जगत्के लिये भयंकर हिरण्यकशिपु नामक राक्षसका वध किया था, उन नृसिंहस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ॥

वामनं रूपमास्थाय बलिं संयम्य मायया ।

त्रैलोक्यं क्रान्तवान् यस्तु तस्मै क्रान्तात्मने नमः ॥

जिन्होंने वामनरूप धारण करके मायाद्वारा बलिको बाँधकर सारी त्रिलोकीको अपने पैरोंसे नाप लिया था, उन क्रान्तिकारी वामनरूपधारी भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम है ॥

जमदग्निसुतो भूत्वा रामः शस्त्रभृतां वरः ।

महीं निःक्षत्रियां चक्रे तस्मै रामात्मने नमः ॥

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महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 308 का मूल पृष्ठ
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जिन्होंने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ जमदग्निकुमार परशुरामका रूप धारण करके इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे हीन कर दिया, उन परशुरामस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ॥

त्रिः सप्तकृत्वो यश्चैको धर्मे व्युत्क्रान्तगौरवान् ।

जघान क्षत्रियान् संख्ये तस्मै क्रोधात्मने नमः ॥

जिन्होंने अकेले ही धर्मके प्रति गौरवका उल्लंघन करनेवाले क्षत्रियोंका युद्धमें इक्कीस बार संहार किया, उन क्रोधात्मा परशुरामको नमस्कार है ॥

रामो दाशरथिर्भूत्वा पुलस्त्यकुलनन्दनम् ।

जघान रावणं संख्ये तस्मै क्षत्रात्मने नमः ॥

जिन्होंने दशरथनन्दन श्रीरामका रूप धारण करके युद्धमें पुलस्त्यकुलनन्दन रावणका वध किया था, उन क्षत्रियात्मा श्रीरामस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ॥

यो हली मुसली श्रीमान् नीलाम्बरधरः स्थितः ।

रामाय रौहिणेयाय तस्मै भोगात्मने नमः ॥

जो सदा हल, मूसल धारण किये अद्भुत शोभासे सम्पन्न हो रहे हैं, जिनके श्रीअंगोंपर नील वस्त्र शोभा पाता है, उन शेषावतार रोहिणीनन्दन रामको नमस्कार है ॥

शङ्खिने चक्रिणे नित्यं शार्ङ्गिणे पीतवाससे ।

वनमालाधरायैव तस्मै कृष्णात्मने नमः ॥

जो शंख, चक्र, शार्ङ्गधनुष, पीताम्बर और वनमाला धारण करते हैं, उन श्रीकृष्णस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ॥

वसुदेवसुतः श्रीमान् क्रीडितो नन्दगोकुले ।

कंसस्य निधनार्थाय तस्मै क्रीडात्मने नमः ॥

जो कंसवधके लिये वसुदेवके शोभाशाली पुत्रके रूपमें प्रकट हुए और नन्दके गोकुलमें भाँति - भाँतिकी लीलाएँ करते रहे, उन लीलामय श्रीकृष्णको नमस्कार है ॥

वासुदेवत्वमागम्य यदोर्वंशसमुद्भवः ।

भूभारहरणं चक्रे तस्मै कृष्णात्मने नमः ॥

जिन्होंने यदुवंशमें प्रकट हो वासुदेवके रूपमें आकर पृथ्वीका भार उतारा है, उन श्रीकृष्णात्मा श्रीहरिको नमस्कार है ॥

सारथ्यमर्जुनस्याजौ कुर्वन् गीतामृतं ददौ ।

लोकत्रयोपकाराय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥

जिन्होंने अर्जुनका सारथित्व करते समय तीनों लोकोंके उपकारके लिये गीता - ज्ञानमय अमृत प्रदान किया था, उन ब्रह्मात्मा श्रीकृष्णको नमस्कार है ॥

दानवांस्तु वशे कृत्वा पुनर्बुद्धत्वमागतः ।

सर्गस्य रक्षणार्थाय तस्मै बुद्धात्मने नमः ॥

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महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 309 का मूल पृष्ठ
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जो सृष्टिकी रक्षाके लिये दानवोंको अपने अधीन करके पुनः बुद्धभावको प्राप्त हो गये, उन बुद्धस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ॥

हनिष्यति कली प्राप्ते म्लेच्छांस्तुरगवाहनः ।

धर्मसंस्थापको यस्तु तस्मै कल्क्यात्मने नमः ॥

जो कलियुग आनेपर घोड़ेपर सवार हो धर्मकी स्थापनाके लिये म्लेच्छोंका वध करेंगे, उन कल्किरूप श्रीहरिको नमस्कार है ॥

तारामये कालनेमिं हत्वा दानवपुङ्गवम् ।

ददौ राज्यं महेन्द्राय तस्मै मुख्यात्मने नमः ॥

जिन्होंने तारामय संग्राममें दानवराज कालनेमिका वध करके देवराज इन्द्रको सारा राज्य दे दिया था, उन मुख्यात्मा श्रीहरिको नमस्कार है ॥

यः सर्वप्राणिनां देहे साक्षिभूतो ह्यवस्थितः ।

अक्षरः क्षरमाणानां तस्मै साक्ष्यात्मने नमः ॥

जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें साक्षीरूपसे स्थित हैं तथा सम्पूर्ण क्षर ( नाशवान्) भूतोंमें अक्षर ( अविनाशी ) स्वरूपसे विराजमान हैं, उन साक्षी परमात्माको नमस्कार है ॥

नमोऽस्तु ते महादेव नमस्ते भक्तवत्सल ।

सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु प्रसीद परमेश्वर ॥

अव्यक्तव्यक्तरूपेण व्याप्तं सर्वं त्वया विभो । महादेव! आपको नमस्कार है । भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है । सुब्रह्मण्य ( विष्णु )! आपको नमस्कार है । परमेश्वर! आप मुझपर प्रसन्न हों । प्रभो! आपने अव्यक्त और व्यक्तरूपसे सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त कर रखा है ॥ नारायणं सहस्राक्षं सर्वलोकमहेश्वरम् ॥

हिरण्यनाभं यज्ञाङ्गममृतं विश्वतोमुखम् ।

प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षं प्रपद्ये पुरुषोत्तमम् ॥

मैं सहस्रों नेत्र धारण करनेवाले, सर्वलोकमहेश्वर, हिरण्यनाभ, यज्ञाङ्गस्वरूप, अमृतमय, सब ओर मुखवाले और कमलनयन पुरुषोत्तम श्रीनारायणदेवकी शरण लेता हूँ ॥

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ।

येषां हृदिस्थो देवेशो मङ्गलायतनं हरिः ॥

जिनके हृदयमें मंगलभवन देवेश्वर श्रीहरि विराजमान हैं, उनका सभी कार्योंमें सदा मंगल ही होता है— कभी किसी भी कार्यमें अमंगल नहीं होता ॥ मङ्गलं भगवान् विष्णुर्मङ्गलं मधुसूदनः । मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलं गरुडध्वजः ॥ )

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भगवान् विष्णु मंगलमय हैं, मधुसूदन मंगलमय हैं, कमलनयन मंगलमय हैं और गरुडध्वज मंगलमय हैं ॥

यस्तनोति सतां सेतुमृतेनामृतयोनिना ।

धर्मार्थव्यवहाराङ्गैस्तस्मै सत्यात्मने नमः ॥ ५० ॥

जिनका सारा व्यवहार केवल धर्मके ही लिये है, उन वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा जो मोक्षके साधनभूत वैदिक उपायोंसे काम लेकर संतोंकी धर्म- मर्यादाका प्रसार करते हैं, उन सत्यस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥

यं पृथग्धर्मचरणाः पृथग्धर्मफलैषिणः ।

पृथग्धर्मैः समर्चन्ति तस्मै धर्मात्मने नमः ॥ ५१ ॥

जो भिन्न-भिन्न धर्मोंका आचरण करके अलग- अलग उनके फलोंकी इच्छा रखते हैं, ऐसे पुरुष पृथक् धर्मोंके द्वारा जिनकी पूजा करते हैं, उन धर्मस्वरूप भगवान्को प्रणाम है ॥ ५१ ॥

यतः सर्वे प्रसूयन्ते ह्यनङ्गात्माङ्गदेहिनः ।

उन्मादः सर्वभूतानां तस्मै कामात्मने नमः ॥ ५२ ॥

जिस अनङ्गकी प्रेरणासे सम्पूर्ण अंगधारी प्राणियोंका जन्म होता है, जिससे समस्त जीव उन्मत्त हो उठते हैं, उस कामके रूपमें प्रकट हुए परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ५२ ॥

यं च व्यक्तस्थमव्यक्तं विचिन्वन्ति महर्षयः ।

क्षेत्रे क्षेत्रज्ञमासीनं तस्मै क्षेत्रात्मने नमः ॥ ५३ ॥

जो स्थूल जगत्में अव्यक्त रूपसे विराजमान है, बड़े- बड़े महर्षि जिसके तत्त्वका अनुसंधान करते रहते हैं, जो सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञके रूपमें बैठा हुआ है, उस क्षेत्ररूपी परमात्माको प्रणाम है ॥ ५३ ॥

यं त्रिधाऽऽत्मानमात्मस्थं वृतं षोडशभिर्गुणैः ।

प्राहुः सप्तदशं सांख्यास्तस्मै सांख्यात्मने नमः ॥ ५४ ॥

जो सत्, रज और तम — इन तीन गुणोंके भेदसे त्रिविध प्रतीत होते हैं, गुणोंके कार्यभूत सोलह विकारोंसे आवृत होनेपर भी अपने स्वरूपमें ही स्थित हैं, सांख्यमतके अनुयायी जिन्हें सत्रहवाँ तत्त्व ( पुरुष ) मानते हैं, उन सांख्यरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ५४ ॥

यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः संयतेन्द्रियाः ।

ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥ ५५ ॥

जो नींदको जीतकर प्राणोंपर विजय पा चुके हैं और इन्द्रियोंको अपने वशमें करके शुद्ध सत्त्वमें स्थित हो गये हैं, वे निरन्तर योगाभ्यासमें लगे हुए योगिजन जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका साक्षात्कार करते हैं, उन योगरूप परमात्माको प्रणाम है ॥ ५५ ॥

अपुण्यपुण्योपरमे यं पुनर्भवनिर्भयाः ।

शान्ताः संन्यासिनो यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः ॥ ५६ ॥