05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 461–470

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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अष्टषष्टितमोऽध्यायः वसुमना और बृहस्पतिके संवादमें राजाके न होनेसे प्रजाकी हानि और होनेसे लाभका वर्णन युधिष्ठिर उवाच

किमाहुर्दैवतं विप्रा राजानं भरतर्षभ ।

मनुष्याणामधिपतिं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — भरतश्रेष्ठ पितामह! जो मनुष्योंका अधिपति है, उस राजाको ब्राह्मणलोग देवस्वरूप क्यों बताते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

बृहस्पतिं वसुमना यथा पप्रच्छ भारत ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- भारत! इस विषयमें जानकार लोग उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिसके अनुसार राजा वसुमनाने बृहस्पतिजीसे यही बात पूछी थी ॥ २ ॥

राजा वसुमना नाम कौसल्यो धीमतां वरः ।

महर्षिं किल पप्रच्छ कृतप्रज्ञं बृहस्पतिम् ॥३ ॥

कहते हैं, प्राचीन कालमें बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कोसल- नरेश राजा वसुमनाने शुद्ध बुद्धिवाले महर्षि बृहस्पतिसे कुछ प्रश्न किया ॥ ३ ॥

सर्वं वैनयिकं कृत्वा विनयज्ञो बृहस्पतिम् ।

दक्षिणानन्तरो भूत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् ॥ ४ ॥

विधिं पप्रच्छ राज्यस्य सर्वलोकहिते रतः ।

प्रजानां सुखमन्विच्छन् धर्मशीलं बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥

राजा वसुमना सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे । वे विनय प्रकट करनेकी कलाको जानते थे । बृहस्पतिजीके आनेपर उन्होंने उठकर उनका अभिवादन किया और चरणप्रक्षालन आदि सारा विनयसम्बन्धी बर्ताव पूर्ण करके महर्षिकी परिक्रमा करनेके अनन्तर उन्होंने विधिपूर्वक उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया । फिर प्रजाके सुखकी इच्छा रखते हुए राजाने धर्मशील बृहस्पतिसे राज्यसंचालनकी विधिके विषयमें इस प्रकार प्रश्न उपस्थित किया ॥ ४-५ ॥ वसुमना उवाच केन भूतानि वर्धन्ते क्षयं गच्छन्ति केन वा ।

पृष्ठ 462

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कमर्चन्तो महाप्राज्ञ सुखमव्ययमाप्नुयुः ॥ ६ ॥

वसुमना बोले – महामते! राज्यमें रहनेवाले प्राणियोंकी वृद्धि कैसे होती है? उनका ह्रास कैसे हो सकता है? किस देवताकी पूजा करनेवाले लोगोंको अक्षय सुखकी प्राप्ति हो सकती है? ॥ ६ ॥

एवं पृष्टो महाप्राज्ञः कौसल्येनामितौजसा ।

राजसत्कारमव्यग्रं शशंसास्मै बृहस्पतिः ॥ ७ ॥

अमित तेजस्वी कोसलनरेशके इस प्रकार प्रश्न करनेपर महाज्ञानी बृहस्पतिजीने शान्तभावसे राजाके सत्कारकी आवश्यकता बताते हुए इस प्रकार उत्तर देना आरम्भ किया ॥ बृहस्पतिरुवाच

राजमूलो महाप्राज्ञ धर्मो लोकस्य लक्ष्यते ।

प्रजा राजभयादेव न खादन्ति परस्परम् ॥ ८ ॥

बृहस्पतिजीने कहा – महाप्राज्ञ! लोकमें जो धर्म देखा जाता है, उसका मूल कारण राजा ही है । राजाके भयसे ही प्रजा एक- दूसरेको हड़प नहीं लेती है ॥॥ ८ ॥

राजा ह्येवाखिलं लोकं समुदीर्णं समुत्सुकम् ।

प्रसादयति धर्मेण प्रसाद्य च विराजते ॥ ९ ॥

राजा ही मर्यादाका उल्लंघन करनेवाले तथा अनुचित भोगोंमें आसक्त हो उनकी प्राप्तिके लिये उत्कण्ठित रहनेवाले सारे जगत्के लोगोंको धर्मानुकूल शासनद्वारा प्रसन्न रखता है और स्वयं भी प्रसन्नतापूर्वक रहकर अपने तेजसे प्रकाशित होता है ॥ ९ ॥

यथा ह्यनुदये राजन् भूतानि शशिसूर्ययोः ।

अन्धे तमसि मज्जेयुरपश्यन्तः परस्परम् ॥ १० ॥

यथा ह्यनुदके मत्स्या निराक्रन्दे विहङ्गमाः ।

विहरेयुर्यथाकामं विहिंसन्तः पुनः पुनः ॥ ११ ॥

विमथ्यातिक्रमेरंश्च विषह्यापि परस्परम् ।

अभावमचिरेणैव गच्छेयुर्नात्र संशयः ॥ १२ ॥

एवमेव विना राज्ञा विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।

अन्धे तमसि मज्जेयुरगोपाः पशवो यथा ॥ १३ ॥

राजन्! जैसे सूर्य और चन्द्रमाका उदय न होनेपर समस्त प्राणी घोर अन्धकारमें डूब जाते हैं और एक- दूसरेको देख नहीं पाते हैं, जैसे थोड़े जलवाले तालाबमें मत्स्यगण तथा रक्षकरहित उपवनमें पक्षियोंके झुंड परस्पर एक- दूसरेपर बारंबार चोट करते हुए इच्छानुसार विचरण करते हैं, वे कभी तो अपने प्रहारसे दूसरोंको कुचलते और मथते हुए आगे बढ़ जाते हैं और कभी स्वयं दूसरेकी चोट खाकर व्याकुल हो उठते हैं । इस प्रकार

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आपसमें लड़ते हुए वे थोड़े ही दिनोंमें नष्टप्राय हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है । इसी तरह राजाके बिना वे सारी प्रजाएँ आपसमें लड़- झगड़कर बात--की-बातमें नष्ट हो जायँगी और बिना चरवाहेके पशुओंकी भाँति दुःखके घोर अन्धकारमें डूब जायँगी ॥ १०–१३ ॥

हरेयुर्बलवन्तोऽपि दुर्बलानां परिग्रहान् ।

हन्युर्व्यायच्छमानांश्च यदि राजा न पालयेत् ॥ १४ ॥

यदि राजा प्रजाकी रक्षा न करे तो बलवान् मनुष्य दुर्बलोंकी बहू- बेटियोंको हर ले जायँ और अपने घरबारकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेवालोंको मार डालें ॥ १४ ॥

ममेदमिति लोकेऽस्मिन् न भवेत् सम्परिग्रहः ।

न दारा न च पुत्रः स्यान्न धनं न परिग्रहः ।

विष्वग्लोपः प्रवर्तेत यदि राजा न पालयेत् ॥ १५ ॥

यदि राजा रक्षा न करे तो इस जगत् में स्त्री, पुत्र, धन अथवा घरबार कोई भी ऐसा संग्रह सम्भव नहीं हो सकता, जिसके लिये कोई कह सके कि यह मेरा है, सब ओर सबकी सारी सम्पत्तिका लोप हो जाय ॥ १५ ॥

यानं वस्त्रमलङ्कारान् रत्नानि विविधानि च ।

हरेयुः सहसा पापा यदि राजा न पालयेत् ॥ १६ ॥

यदि राजा प्रजाका पालन न करे तो पापाचारी लुटेरे सहसा आक्रमण करके वाहन, वस्त्र, आभूषण और नाना प्रकारके रत्न लूट ले जायँ ॥ १६ ॥

पतेद् बहुविधं शस्त्रं बहुधा धर्मचारिषु ।

अधर्मः प्रगृहीतः स्याद् यदि राजा न पालयेत् ॥ १७ ॥

यदि राजा रक्षा न करे तो धर्मात्मा पुरुषोंपर बारंबार नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंकी मार पड़े और विवश होकर लोगोंको अधर्मका मार्ग ग्रहण करना पड़े ॥ १७ ॥

मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् ।

क्लिश्नीयुरपि हिंस्युर्वा यदि राजा न पालयेत् ॥ १८ ॥

यदि राजा पालन न करे तो दुराचारी मनुष्य माता, पिता, वृद्ध, आचार्य, अतिथि और गुरुको क्लेश पहुँचावें अथवा मार डालें ॥ १८ ॥

वधबन्धपरिक्लेशो नित्यमर्थवतां भवेत् ।

ममत्वं च न विन्देयुर्यदि राजा न पालयेत् ॥ १ ९ ॥

यदि राजा रक्षा न करे तो धनवानोंको प्रतिदिन वध या बन्धनका क्लेश उठाना पड़े और किसी भी वस्तुको वे अपनी न कह सकें ॥ १ ९ ॥

अन्ताश्चाकाल एव स्युर्लोकोऽयं दस्युसाद् भवेत् ।

पतेयुर्नरकं घोरं यदि राजा न पालयेत् ॥ २० ॥

यदि राजा प्रजाका पालन न करे तो अकालमें ही लोगोंकी मृत्यु होने लगे, यह समस्त जगत् डाकुओंके अधीन हो जाय और ( पापके कारण ) घोर नरकमें गिर जाय ॥ २० ॥

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न योनिदोषो वर्तेत न कृषिर्न वणिक्पथः ।

मज्जेद् धर्मस्त्रयी न स्याद् यदि राजा न पालयेत् ॥ २१ ॥

यदि राजा पालन न करे तो व्यभिचारसे किसीको घृणा न हो, खेती नष्ट हो जाय, व्यापार चौपट हो जाय, धर्म डूब जाय और तीनों वेदोंका कहीं पता न चले ॥ २१ ॥

न यज्ञाः सम्प्रवर्तेयुर्विधिवत् स्वाप्तदक्षिणाः ।

न विवाहाः समाजो वा यदि राजा न पालयेत् ॥ २२ ॥

यदि राजा जगत्की रक्षा न करे तो विधिवत् पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञोंका अनुष्ठान बंद हो जाय, विवाह न हो और सामाजिक कार्य रुक जायँ ॥ २२ ॥

न वृषाः सम्प्रवर्तेरन् न मथ्येरंश्च गर्गराः ।

घोषाः प्रणाशं गच्छेयुर्यदि राजा न पालयेत् ॥ २३ ॥

यदि राजा पशुओंका पालन न करे तो साँड़ गायोंमें गर्भाधान न करें, दूध - दहीसे भरे हुए घड़े या मटके कभी महे न जायँ और गोशाले नष्ट हो जायँ ॥ २३ ॥

त्रस्तमुद्विग्नहृदयं हाहाभूतमचेतनम् ।

क्षणेन विनशेत् सर्वं यदि राजा न पालयेत् ॥ २४ ॥

यदि राजा रक्षा न करे तो सारा जगत् भयभीत, उद्विग्नचित्त, हाहाकारपरायण तथा अचेत हो क्षणभरमें नष्ट हो जाय ॥ २४ ॥

न संवत्सरसत्राणि तिष्ठेयुरकुतोभयाः ।

विधिवद् दक्षिणावन्ति यदि राजा न पालयेत् ॥ २५ ॥

यदि राजा पालन न करे तो उनमें विधिपूर्वक दक्षिणाओंसे युक्त वार्षिक यज्ञ बेखटके न चल सकें ॥ २५ ॥

ब्राह्मणाश्चतुरो वेदान् नाधीयीरंस्तपस्विनः ।

विद्यास्नाता व्रतस्नाता यदि राजा न पालयेत् ॥ २६ ॥

यदि राजा पालन न करे तो विद्या पढ़कर स्नातक हुए ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करनेवाले और तपस्वी तथा ब्राह्मण लोग चारों वेदोंका अध्ययन छोड़ दें ॥ २६ ॥

न लभेद् धर्मसंश्लेषं हतविप्रहतो जनः ।

हर्ता स्वस्थेन्द्रियो गच्छेद् यदि राजा न पालयेत् ॥ २७ ॥

यदि राजा पालन न करे तो मनुष्य हताहत होकर धर्मका सम्पर्क छोड़ दें और चोर घरका मालमत्ता लेकर अपने शरीर और इन्द्रियोंपर आँच आये बिना ही सकुशल लौट जायँ ॥ २७ ॥

हस्ताद्धस्तं परिमुषेद् भिद्येरन् सर्वसेतवः ।

भयार्तं विद्रवेत् सर्वं यदि राजा न पालयेत् ॥ २८ ॥

यदि राजा पालन न करे तो चोर और लुटेरे हाथमें रखी हुई वस्तुको भी हाथसे छीन ले जायँ, सारी मर्यादाएँ टूट जायँ और सब लोग भयसे पीड़ित हो चारों ओर भागते

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फिरें ॥ २८ ॥

अनयाः सम्प्रवर्तेरन् भवेद् वै वर्णसंकरः ।

दुर्भिक्षमाविशेद् राष्ट्रं यदि राजा न पालयेत् ॥। २ ९ ॥

यदि राजा पालन न करे तो सब ओर अन्याय एवं अत्याचार फैल जाय, वर्णसंकर संतानें पैदा होने लगें और समूचे देशमें अकाल पड़ जाय ॥ २ ९ ॥

विवृत्य हि यथाकामं गृहद्वाराणि शेरते ।

मनुष्या रक्षिता राज्ञा समन्तादकुतोभयाः ॥ ३० ॥

राजासे रक्षित हुए मनुष्य सब ओरसे निर्भय हो जाते हैं और अपनी इच्छाके अनुसार घरके दरवाजे खोलकर सोते हैं ॥ ३० ॥

नाक्रुष्टं सहते कश्चित् कुतो वा हस्तलाघवम् ।

यदि राजा न सम्यग् गां रक्षयत्यपि धार्मिकः ॥ ३१ ॥

यदि धर्मात्मा राजा भलीभाँति पृथ्वीकी रक्षा न करे तो कोई भी मनुष्य गाली - गलौज अथवा हाथसे पीटे जानेका अपमान कैसे सहन करे ॥ ३१ ॥

स्त्रियश्चापुरुषा मार्ग सर्वालङ्कारभूषिताः ।

निर्भयाः प्रतिपद्यन्ते यदि रक्षति भूमिपः ॥ ३२ ॥

यदि पृथ्वीका पालन करनेवाला राजा अपने राज्यकी रक्षा करता है तो समस्त आभूषणोंसे विभूषित हुई सुन्दरी स्त्रियाँ किसी पुरुषको साथ लिये बिना भी निर्भय होकर मार्गसे आती - जाती हैं ॥ ३२ ॥

धर्ममेव प्रपद्यन्ते न हिंसन्ति परस्परम् ।

अनुगृह्णन्ति चान्योन्यं यदा रक्षति भूमिपः ॥ ३३ ॥

जब राजा रक्षा करता है, तब सब लोग धर्मका ही पालन करते हैं, कोई किसीकी हिंसा नहीं करते और सभी एक- दूसरेपर अनुग्रह रखते हैं ॥ ३३ ॥

यजन्ते च महायज्ञैस्त्रयो वर्णाः पृथग्विधैः ।

युक्ताश्चाधीयते विद्यां यदा रक्षति भूमिपः ॥ ३४ ॥

जब राजा रक्षा करता है, तब तीनों वर्णोंके लोग नाना प्रकारके बड़े - बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं और मनोयोगपूर्वक विद्याध्ययनमें लगे रहते हैं ॥ ३४ ॥

वार्तामूलो ह्ययं लोकस्त्रय्या वै धार्यते सदा ।

तत् सर्वं वर्तते सम्यग् यदा रक्षति भूमिपः ॥ ३५ ॥

खेती आदि समुचित जीविकाकी व्यवस्था ही इस जगत्के जीवनका मूल है तथा वृष्टि आदिकी हेतुभूत त्रयी विद्यासे ही सदा जगत्का धारण- पोषण होता है । जब राजा प्रजाकी रक्षा करता है, तभी वह सब कुछ ठीक ढंगसे चलता रहता है ॥ ३५ ॥

यदा राजा धुरं श्रेष्ठामादाय वहति प्रजाः ।

महता बलयोगेन तदा लोकः प्रसीदति ॥ ३६ ॥

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जब राजा विशाल सैनिक शक्तिके सहयोगसे भारी भार उठाकर प्रजाकी रक्षाका भार वहन करता है, तब यह सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न होता है ॥ ३६ ॥

यस्याभावेन भूतानामभावः स्यात् समन्ततः ।

भावे च भावो नित्यं स्यात् कस्तं न प्रतिपूजयेत् ॥ ३७ ॥

जिसके न रहनेपर सब ओरसे समस्त प्राणियोंका अभाव होने लगता है और जिसके रहनेपर सदा सबका अस्तित्व बना रहता है, उस राजाका पूजन ( आदर- सत्कार ) कौन नहीं करेगा? ॥ ३७ ॥

तस्य यो वहते भारं सर्वलोकभयावहम् ।

तिष्ठन् प्रियहिते राज्ञ उभौ लोकाविमौ जयेत् ॥ ३८ ॥

जो उस राजाके प्रिय एवं हितसाधनमें संलग्न रहकर उसके सर्वलोकभयंकर शासन-भारको वहन करता है, वह इस लोक और परलोक दोनोंपर विजय पाता है ॥ ३८ ॥

यस्तस्य पुरुषः पापं मनसाप्यनुचिन्तयेत् ।

असंशयमिह क्लिष्टः प्रेत्यापि नरकं व्रजेत् ॥ ३ ९ ॥

जो पुरुष मनसे भी राजाके अनिष्टका चिन्तन करता है, वह निश्चय ही इह लोकमें कष्ट भोगता है और मरनेके बाद भी नरकमें पड़ता है ॥ ३ ९ ॥

न हि जात्ववमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः ।

महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥ ४० ॥

' यह भी एक मनुष्य है ' ऐसा समझकर कभी भी पृथ्वीपालक नरेशकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि राजा मनुष्यरूपमें एक महान् देवता है ॥ ४० ॥

कुरुते पञ्चरूपाणि कालयुक्तानि यः सदा ।

भवत्यग्निस्तथाऽऽदित्यो मृत्युर्वैश्रवणो यमः ॥ ४१ ॥

राजा ही सदा समयानुसार पाँच रूप धारण करता है । वह कभी अग्नि, कभी सूर्य, कभी मृत्यु, कभी कुबेर और कभी यमराज बन जाता है ॥ ४१ ॥

यदा ह्यासीदतः पापान् दहत्युग्रेण तेजसा ।

मिथ्योपचरितो राजा तदा भवति पावकः ॥ ४२ ॥

जब पापात्मा मनुष्य राजाके साथ मिथ्या बर्ताव करके उसे ठगते हैं, तब वह अग्निस्वरूप हो जाता है और अपने उग्र तेजसे समीप आये हुए उन पापियोंको जलाकर भस्म कर देता है ॥ ४२ ॥

यदा पश्यति चारेण सर्वभूतानि भूमिपः ।

क्षेमं च कृत्वा व्रजति तदा भवति भास्करः ॥ ४३ ॥

जब राजा गुप्तचरोंद्वारा समस्त प्रजाओंकी देख- भाल करता है और उन सबकी रक्षा करता हुआ चलता है, तब वह सूर्यरूप होता है ॥ ४३ ॥

अशुचींश्च यदा क्रुद्धः क्षिणोति शतशो नरान् ।

पृष्ठ 467

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सपुत्रपौत्रान् सामात्यांस्तदा भवति सोऽन्तकः ॥ ४४ ॥

जब राजा कुपित होकर अशुद्धाचारी सैकड़ों मनुष्योंका उनके पुत्र, पौत्र और मन्त्रियोंसहित संहार कर डालता है, तब वह मृत्युरूप होता है ॥ ४४ ॥

यदा त्वधार्मिकान् सर्वांस्तीक्ष्णैर्दण्डैर्नियच्छति ।

धार्मिकांश्चानुगृह्णाति भवत्यथ यमस्तदा ॥ ४५ ॥

जब वह कठोर दण्डके द्वारा समस्त अधार्मिक पुरुषोंको काबूमें करके सन्मार्गपर लाता है और धर्मात्माओंपर अनुग्रह करता है, उस समय वह यमराज माना जाता है ॥ ४५ ॥

यदा तु धनधाराभिस्तर्पयत्युपकारिणः ।

आच्छिनत्ति च रत्नानि विविधान्यपकारिणाम् ॥ ४६ ॥

श्रियं ददाति कस्मैचित् कस्माच्चिदपकर्षति ।

तदा वैश्रवणो राजा लोके भवति भूमिपः ॥ ४७ ॥

जब राजा उपकारी पुरुषोंको धनरूपी जलकी धाराओंसे तृप्त करता है और अपकार करनेवाले दुष्टोंके नाना प्रकारके रत्नोंको छीन लेता है, किसी राज्यहितैषीको धन देता है तो किसी ( राज्यविद्रोही ) के धनका अपहरण कर लेता है, उस समय वह पृथिवीपालक नरेश इस संसारमें कुबेर समझा जाता है ॥ ४६-४७ ॥

नास्यापवादे स्थातव्यं दक्षेणाक्लिष्टकर्मणा ।

धर्म्यमाकांक्षता लोकमीश्वरस्यानसूयता ॥ ४८ ॥

जो समस्त कार्योंमें निपुण, अनायास ही कार्य-साधन करनेमें समर्थ, धर्ममय लोकोंमें जानेकी इच्छा रखनेवाला तथा दोषदृष्टिसे रहित हो, उस पुरुषको अपने देशके शासक नरेशकी निन्दाके काममें नहीं पड़ना चाहिये ॥

न हि राज्ञः प्रतीपानि कुर्वन् सुखमवाप्नुयात् ।

पुत्रो भ्राता वयस्यो वा यद्यप्यात्मसमो भवेत् ॥ ४ ९ ॥

राजाके विपरीत आचरण करनेवाला मनुष्य उसका पुत्र, भाई, मित्र अथवा आत्माके तुल्य ही क्यों न हो, कभी सुख नहीं पा सकता ॥ ४ ९ ॥

कुर्यात् कृष्णगतिः शेषं ज्वलितोऽनिलसारथिः ।

न तु राजाभिपन्नस्य शेषं क्वचन विद्यते ॥ ५० ॥

वायुकी सहायतासे प्रज्वलित हुई आग जब किसी गाँव या जंगलको जलाने लगे तो सम्भव है कि वहाँका कुछ भाग जलाये बिना शेष छोड़ दे; परंतु राजा जिसपर आक्रमण करता है, उसकी कहीं कोई वस्तु शेष नहीं रह जाती ॥

तस्य सर्वाणि रक्ष्याणि दूरतः परिवर्जयेत् ।

मृत्योरिव जुगुप्सेत राजस्वहरणान्नरः ॥ ५१ ॥

पृष्ठ 468

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मनुष्यको चाहिये कि राजाकी सारी रक्षणीय वस्तुओंको दूरसे ही त्याग दे और मृत्युकी ही भाँति राजधनके अपहरणसे घृणा करके उससे अपनेको बचानेका प्रयत्न करे ॥ ५१ ॥

नश्येदभिमशन सद्यो मृगः कूटमिव स्पृशन् ।

आत्मस्वमिव रक्षेत राजस्वमिह बुद्धिमान् ॥ ५२ ॥

जैसे मृग मारण- मन्त्रका स्पर्श करते ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठता है, उसी प्रकार राजाके धनपर हाथ लगानेवाला मनुष्य तत्काल मारा जाता है; अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह अपने ही धनके समान इस जगत्में राजाके धनकी भी रक्षा करे ॥ ५२ ॥

महान्तं नरकं घोरमप्रतिष्ठमचेतनम् ।

पतन्ति चिररात्राय राजवित्तापहारिणः ॥ ५३ ॥

राजाके धनका अपहरण करनेवाले मनुष्य दीर्घकालके लिये विशाल, भयंकर, अस्थिर और चेतनाशक्तिको लुप्त कर देनेवाले नरकमें गिरते हैं ॥ ५३ ॥

राजा भोजो विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः ।

य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति ॥ ५४ ॥

भोज, विराट्, सम्राट् क्षत्रिय, भूपति और नृप -इन शब्दोंद्वारा जिस राजाकी स्तुति की जाती है, उस प्रजापालक नरेशकी पूजा कौन नहीं करेगा? ॥ ५४ ॥

तस्माद् बुभूषुर्नियतो जितात्मा नियतेन्द्रियः ।

मेधावी स्मृतिमान् दक्षः संश्रयेत महीपतिम् ॥ ५५ ॥

इसलिये अपनी उन्नतिकी इच्छा रखनेवाला, मेधावी, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न एवं कार्यदक्ष मनुष्य नियमपूर्वक रहकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए राजाका आश्रय ग्रहण करे ॥ ५५ ॥

कृतज्ञं प्राज्ञमक्षुद्रं दृढभक्तिं जितेन्द्रियम् ।

धर्मनित्यं स्थितं नीत्यं मन्त्रिणं पूजयेन्नृपः ॥ ५६ ॥

राजाको उचित है कि वह कृतज्ञ, विद्वान्, महामना, राजाके प्रति दृढ़ भक्ति रखनेवाले, जितेन्द्रिय, नित्य धर्मपरायण और नीतिज्ञ मन्त्रीका आदर करे ॥ ५६ ॥

दृढभक्तिं कृतप्रज्ञं धर्मज्ञं संयतेन्द्रियम् ।

शूरमक्षुद्रकर्माणं निषिद्धजनमाश्रयेत् ॥ ५७ ॥

इसी प्रकार राजा अपने प्रति दृढ़ भक्तिसे सम्पन्न, युद्धकी शिक्षा पाये हुए, बुद्धिमान्, धर्मज्ञ, जितेन्द्रिय, शूरवीर और श्रेष्ठ कर्म करनेवाले ऐसे वीर पुरुषको सेनापति बनावे, जो अपनी सहायताके लिये दूसरोंका आश्रय लेनेवाला न हो ॥ ५७ ॥

राजा प्रगल्भं कुरुते मनुष्यं राजा कृशं वै कुरुते मनुष्यम् । राजाभिपन्नस्य कुतः सुखानि राजाभ्युपेतं सुखिनं करोति ॥ ५८ ॥

पृष्ठ 469

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राजा मनुष्यको धृष्ट एवं सबल बनाता है और राजा ही उसे दुर्बल कर देता है । राजाके रोषका शिकार बने हुए मनुष्यको कैसे सुख मिल सकता है? राजा अपने शरणागतको सुखी बना देता है ॥ ५८ ॥

( राजा प्रजानां प्रथमं शरीरं प्रजाश्च राज्ञोऽप्रतिमं शरीरम् । राज्ञा विहीना न भवन्ति देशा देशैर्विहीना न नृपा भवन्ति ॥ ) राजा प्रजाओंका प्रथम अथवा प्रधान शरीर है । प्रजा भी राजाका अनुपम शरीर है । राजाके बिना देश और वहाँके निवासी नहीं रह सकते और देशों तथा देशवासियोंके बिना राजा भी नहीं रह सकते हैं ॥ राजा प्रजानां हृदयं गरीयो गतिः प्रतिष्ठा सुखमुत्तमं च । समाश्रिता लोकमिमं परं च जयन्ति सम्यक् पुरुषा नरेन्द्र ॥ ५ ९ ॥ राजा प्रजाका गुरुतर हृदय, गति, प्रतिष्ठा और उत्तम सुख है । नरेन्द्र! राजाका आश्रय लेनेवाले मनुष्य इस लोक और परलोकपर भी पूर्णतः विजय पा लेते हैं ॥ ५ ९ ॥ नराधिपश्चाप्यनुशिष्य मेदिनीं

दमेन सत्येन च सौहृदेन ।

महद्भिरिष्ट्वा क्रतुभिर्महायशा- स्त्रिविष्टपे स्थानमुपैति शाश्वतम् ॥ ६० ॥

राजा भी इन्द्रियसंयम, सत्य और सौहार्दके साथ इस पृथ्वीका भलीभाँति शासन करके बड़े - बड़े यज्ञोंके अनुष्ठानद्वारा महान् यशका भागी हो स्वर्गलोकमें सनातन स्थान प्राप्त कर लेता है ॥ ६० ॥

स एवमुक्तोऽङ्गिरसा कौसल्यो राजसत्तमः ।

प्रयत्नात् कृतवान् वीरः प्रजानां परिपालनम् ॥ ६१ ॥

राजन्! बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर राजाओंमें श्रेष्ठ कोसलनरेश वीर वसुमना अपनी प्रजाओंका प्रयत्नपूर्वक पालन करने लगे ॥ ६१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि आङ्गिरसवाक्येऽष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें बृहस्पतिजीका उपदेशविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं । )

पृष्ठ 470

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