05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 551–560
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560
पृष्ठ 551
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीकृष्ण! अक्रूर और उग्रसेनके अधिकारमें गये हुए राज्यको भाई- बन्धुओंमें फूट पड़नेके भयसे अन्यकी तो कौन कहे इतने शक्तिशाली होकर स्वयं भी आप किसी तरह वापस नहीं ले सकते ॥ १७ ॥
तच्च सिध्येत् प्रयत्नेन कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
महाक्षयं व्ययो वा स्याद् विनाशो वा पुनर्भवेत् ॥ १८ ॥
बड़े प्रयत्नसे अत्यन्त दुष्कर कर्म महान् संहाररूप युद्ध करनेपर राज्यको वापस लेनेका कार्य सिद्ध हो सकता है, परंतु इसमें धनका बहुत व्यय और असंख्य मनुष्योंका पुनः विनाश होगा ॥ १८ ॥
अनायसेन शस्त्रेण मृदुना हृदयच्छिदा ।
जिह्वामुद्धर सर्वेषां परिमृज्यानुमृज्य च ॥ १ ९ ॥
अतः श्रीकृष्ण! आप एक ऐसे कोमल शस्त्रसे, जो लोहेका बना हुआ न होनेपर भी हृदयको छेद डालनेमें समर्थ है, परिमार्जन और अनुमार्जन करके उन सबकी जीभ उखाड़ लें — उन्हें मूक बना दें ( जिससे फिर कलहका आरम्भ न हो ) ॥ १ ९ ॥ वासुदेव उवाच
अनायसं मुने शस्त्रं मृदु विद्यामहं कथम् ।
येनैषामुद्धरे जिह्वां परिमृज्यानुमृज्य च ॥ २० ॥
= भगवान् श्रीकृष्णने कहा – मुने! बिना लोहेके बने हुए उस कोमल शस्त्रको मैं कैसे जानूँ, जिसके द्वारा परिमार्जन और अनुमार्जन करके इन सबकी जिह्वाको उखाड़ लूँ ॥ २० ॥
नारद उवाच
शक्त्यान्नदानं सततं तितिक्षार्जवमार्दवम् ।
यथार्हप्रतिपूजा च शस्त्रमेतदनायसम् ॥ २१ ॥
नारदजीने कहा – श्रीकृष्ण! अपनी शक्तिके अनुसार सदा अन्नदान करना, सहनशीलता, सरलता, कोमलता तथा यथायोग्य पूजन ( आदर- सत्कार) करना - यही बिना लोहेका बना हुआ शस्त्र है ॥ २१ ॥
ज्ञातीनां वक्तुकामानां कटुकानि लघूनि च ।
गिरा त्वं हृदयं वाचं शमयस्व मनांसि च ॥ २२ ॥
जब सजातीय बन्धु आपके प्रति कड़वी तथा ओछी बातें कहना चाहें, उस समय आप मधुर वचन बोलकर उनके हृदय, वाणी तथा मनको शान्त कर दें ॥
नामहापुरुषः कश्चिन्नानात्मा नासहायवान् ।
महतीं धुरमाधत्ते तामुद्यम्योरसा वह ॥ २३ ॥
पृष्ठ 552
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जो महापुरुष नहीं है, जिसने अपने मनको वशमें नहीं किया है तथा जो सहायकोंसे सम्पन्न नहीं है, वह कोई भारी भार नहीं उठा सकता । अतः आप ही इस गुरुतर भारको हृदयसे उठाकर वहन करें ॥ २३ ॥
सर्व एव गुरुं भारमनड्वान् वहते समे ।
दुर्गे प्रतीतः सुगवो भारं वहति दुर्वहम् ॥ २४ ॥
समतल भूमिपर सभी बैल भारी भार वहन कर लेते हैं; परंतु दुर्गम भूमिपर कठिनाईसे वहन करनेयोग्य गुरुतर भारको अच्छे बैल ही ढोते हैं ॥ २४ ॥
भेदाद् विनाशः संघानां संघमुख्योऽसि केशव ।
यथा त्वां प्राप्य नोत्सीदेदयं संघस्तथा कुरु ॥ २५ ॥
केशव! आप इस यादवसंघके मुखिया हैं । यदि इसमें फूट हो गयी तो इस समूचे संघका विनाश हो जायगा; अतः आप ऐसा करें जिससे आपको पाकर इस संघका —इस यादवगणतन्त्र राज्यका मूलोच्छेद न हो जाय ॥ २५ ॥
नान्यत्र बुद्धिक्षान्तिभ्यां नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् ।
नान्यत्र धनसंत्यागाद् गणः प्राज्ञेऽवतिष्ठते ॥ २६ ॥
बुद्धि, क्षमा और इन्द्रिय-निग्रहके बिना तथा धन वैभवका त्याग किये बिना कोई गण अथवा संघ किसी बुद्धिमान् पुरुषकी आज्ञाके अधीन नहीं रहता है ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वपक्षोद्भावनं सदा ।
ज्ञातीनामविनाशः स्याद् यथा कृष्ण तथा कुरु ॥ २७ ॥
श्रीकृष्ण! सदा अपने पक्षकी ऐसी उन्नति होनी चाहिये जो धन, यश तथा आयुकी वृद्धि करनेवाली हो और कुटुम्बीजनोंमेंसे किसीका विनाश न हो । यह सब जैसे भी सम्भव हो, वैसा ही कीजिये ॥ २७ ॥
आयत्यां च तदात्वे च न तेऽस्त्यविदितं प्रभो ।
षाड्गुण्यस्य विधानेन यात्रायानविधौ तथा ॥ २८ ॥
प्रभो! संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय -इन छहों गुणोंके यथासमय प्रयोगसे तथा शत्रुपर चढ़ाई करनेके लिये यात्रा करनेपर वर्तमान या भविष्यमें क्या परिणाम निकलेगा? यह सब आपसे छिपा नहीं है ॥ २८ ॥
यादवाः कुकुरा भोजाः सर्वे चान्धकवृष्णयः ।
त्वय्यासक्ता महाबाहो लोका लोकेश्चराश्च ये ॥ २ ९ ॥
उपासते हि त्वबुद्धिमृषयश्चापि माधव । महाबाहु माधव! कुकुर, भोज, अन्धक और वृष्णिवंशके सभी यादव आपमें प्रेम रखते हैं । दूसरे लोग और लोकेश्वर भी आपमें अनुराग रखते हैं । औरोंकी तो बात ही क्या है? बड़े-बड़े ऋषि - मुनि भी आपकी बुद्धिका आश्रय लेते हैं ॥ २ ९ ३ ॥ त्वं गुरुः सर्वभूतानां जानीषे त्वं गतागतम् ।
पृष्ठ 553
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्वामासाद्य यदुश्रेष्ठमेधन्ते यादवाः सुखम् ॥ ३० ॥
आप समस्त प्राणियोंके गुरु हैं । भूत, वर्तमान और भविष्यको जानते हैं । आप- जैसे यदुकुलतिलक महापुरुषका आश्रय लेकर ही समस्त यादव सुखपूर्वक अपनी उन्नति करते ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि वासुदेवनारदसंवादो नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्रीकृष्ण-नारदसंवाद नामक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥
१. जो आपत्तियाँ स्वतः अपने ही करतूतों से आती हैं, उन्हें स्वकृत कहते हैं । २. जिन्हें लानेमें दूसरे लोग निमित्त बनते हैं, वे विपत्तियाँ परकृत कहलाती हैं । 3. क्षमा, सरलता और कोमलताके द्वारा दोषोंको दूर करना ' परिमार्जन ' कहलाता है । २. यथायोग्य सेवा- सत्कारके द्वारा हृदयमें प्रीति उत्पन्न करना, ' अनुमार्जन' कहा गया है ।
पृष्ठ 554
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वयशीतितमोऽध्यायः मन्त्रियोंकी परीक्षाके विषयमें तथा राजा और राजकीय मनुष्योंसे सतर्क रहनेके विषयमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यान भीष्म उवाच
एषा प्रथमतो वृत्तिर्द्वितीयां शृणु भारत ।
यः कश्चिज्जनयेदर्थं राज्ञा रक्ष्यः सदा नरः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं- भरतनन्दन! यह राजा अथवा राजनीतिकी पहली वृत्ति है, अब दूसरी सुनो । जो कोई मनुष्य राजाके धनकी वृद्धि करे, उसकी राजाको सदा रक्षा करनी चाहिये ॥ १ ॥
ह्रियमाणममात्येन भृत्यो वा यदि वा भृतः ।
यो राजकोशं नश्यन्तमाचक्षीत युधिष्ठिर ॥ २ ॥
श्रोतव्यमस्य च रहो रक्ष्यश्चामात्यतो भवेत् ।
अमात्या ह्यपहर्तारो भूयिष्ठं घ्नन्ति भारत ॥ ३ ॥
भरतवंशी युधिष्ठिर! यदि मन्त्री राजाके खजानेसे धनका अपहरण करता हो और कोई सेवक अथवा राजाके द्वारा पालित हुआ दूसरा कोई मनुष्य राजकीय कोषके नष्ट होनेका समाचार राजाको बतावे, तब राजाको उसकी बात एकान्तमें सुननी चाहिये और मन्त्रीसे उसके जीवनकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि चोरी करनेवाले मन्त्री अपना भंडाफोड़ करनेवाले मनुष्यको प्रायः मार डाला करते हैं ॥ २-३ ॥
राजकोशस्य गोप्तारं राजकोशविलोपकाः ।
समेत्य सर्वे बाधन्ते स विनश्यत्यरक्षितः ॥ ४ ॥
जो राजाके खजानेकी रक्षा करनेवाला है, उस पुरुषको राजकीय कोष लूटनेवाले सब लोग एकमत होकर सताने लगते हैं । यदि राजाके द्वारा उसकी रक्षा नहीं की जाय तो वह बेचारा बेमौत मारा जाता है ॥ ४ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
मुनिः कालकवृक्षीयः कौसल्यं यदुवाच ह ॥ ५ ॥
इस विषयमें जानकार लोग, कालकवृक्षीय मुनिने कोसलराजको जो उपदेश दिया था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ५ ॥
कोसलानामाधिपत्यं सम्प्राप्तं क्षेमदर्शिनम् ।
मुनिः कालकवृक्षीय आजगामेति नः श्रुतम् ॥ ६ ॥
पृष्ठ 555
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
हमने सुना है कि राजा क्षेमदर्शी जब कोसल प्रदेशके राजसिंहासनपर आसीन थे, उन्हीं दिनों कालक--वृक्षीय मुनि उस राज्यमें पधारे थे ॥ ६ ॥
स काकं पञ्जरे बद्ध्वा विषयं क्षेमदर्शिनः ।
सर्वं पर्यचरद् युक्तः प्रवृत्त्यर्थी पुनः पुनः ॥ ७ ॥
उन्होंने क्षेमदर्शीके सारे देशमें, उस राज्यका समाचार जाननेके लिये एक कौएको पिंजड़ेमें बाँधकर साथ ले बड़ी सावधानीके साथ बारंबार चक्कर लगाया ॥
अधीध्वं वायसीं विद्यां शंसन्ति मम वायसाः ।
अनागतमतीतं च यच्च सम्प्रति वर्तते ॥ ८ ॥
घूमते समय वे लोगोंसे कहते थे, 'सज्जनो! तुमलोग मुझसे वायसी विद्या ( कौओंकी बोली समझनेकी कला) सीखो । मैंने सीखी है, इसलिये कौए मुझसे भूत, भविष्य तथा इस समय जो वर्तमान है, वह सब बता देते हैं ' ॥ ८ ॥
इति राष्ट्रे परिपतन् बहुभिः पुरुषैः सह ।
सर्वेषां राजयुक्तानां दुष्करं परिदृष्टवान् ॥ ९ ॥
यही कहते हुए वे बहुतेरे मनुष्योंके साथ उस राष्ट्रमें सब ओर घूमते फिरे । उन्होंने राजकार्यमें लगे हुए समस्त कर्मचारियोंका दुष्कर्म अपनी आँखों देखा ॥ ९ ॥
स बुद्ध्वा तस्य राष्ट्रस्य व्यवसायं हि सर्वशः ।
राजयुक्तापहारांश्च सर्वान् बुद्ध्वा ततस्ततः ॥ १० ॥
ततः स काकमादाय राजानं द्रष्टुमागमत् ।
सर्वज्ञोऽस्मीति वचनं ब्रुवाणः संशितव्रतः ॥ ११ ॥
उस राष्ट्रके सारे व्यवसायोंको जानकर तथा राजकीय कर्मचारियोंद्वारा राजाकी सम्पत्तिके अपहरण होनेकी सारी घटनाओंका जहाँ-तहाँसे पता लगाकर वे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि अपनेको सर्वज्ञ घोषित करते हुए उस कौएको साथ ले राजासे मिलनेके लिये आये ॥ १०-११ ॥
स स्म कौसल्यमागम्य राजामात्यमलंकृतम् ।
प्राह काकस्य वचनादमुत्रेदं त्वया कृतम् ॥ १२ ॥
असौ चासौ च जानीते राजकोशस्त्वया हृतः ।
एवमाख्याति काकोऽयं तच्छीघ्रमनुगम्यताम् ॥ १३ ॥
कोसलनरेशके निकट उपस्थित हो मुनिने सज- धजकर बैठे हुए राजमन्त्रीसे कौएके कथनका हवाला देते हुए कहा- ' तुमने अमुक स्थानपर राजाके अमुक धनकी चोरी की है । अमुक- अमुक व्यक्ति इस बातको जानते हैं, जो इसके साक्षी हैं' । हमारा यह कौआ कहता है कि ' तुमने राजकीय कोषका अपहरण किया है; अतः तुम अपने इस अपराधको शीघ्र स्वीकार करो ' ॥ १२-१३ ॥ तथान्यानपि स प्राह राजकोशहरांस्तदा ।
पृष्ठ 556
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
न चास्य वचनं किंचिदनृतं श्रूयते क्वचित् ॥ १४ ॥
इसी प्रकार मुनिने राजाके खजानेसे चोरी करनेवाले अन्य कर्मचारियोंसे भी कहा -' तुमने चोरी की है । मेरे इस कौएकी कही हुई कोई भी बात कभी और कहीं भी झूठी नहीं सुनी गयी है ' ॥ १४ ॥
तेन विप्रकृताः सर्वे राजयुक्ताः कुरूद्वह ।
तमस्यभिप्रसुप्तस्य निशि काकमवेधयन् ॥ १५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार मुनिके द्वारा तिरस्कृत हुए सभी राजकर्मचारियोंने अँधेरी रातमें सोये हुए मुनिके उस कौएको बाणसे बींधकर मार डाला ॥ १५ ॥
वायसं तु विनिर्भिन्नं दृष्ट्वा बाणेन पञ्जरे ।
पूर्वाह्णे ब्राह्मणो वाक्यं क्षेमदर्शिनमब्रवीत् ॥ १६ ॥
अपने कौएको पिंजड़ेमें बाणसे विदीर्ण हुआ देखकर ब्राह्मणने पूर्वाह्णमें राजा क्षेमदर्शीसे इस प्रकार कहा— ॥
राजंस्त्वामभयं याचे प्रभुं प्राणधनेश्वरम् ।
अनुज्ञातस्त्वया ब्रूयां वचनं भवतो हितम् ॥ १७ ॥
' राजन्! आप प्रजाके प्राण और धनके स्वामी हैं । मैं आपसे अभयकी याचना करता हूँ । यदि आज्ञा हो तो मैं आपके हितकी बात कहूँ ॥ १७ ॥
मित्रार्थमभिसंतप्तो भक्त्या सर्वात्मनाऽऽगतः । ' आप मेरे मित्र हैं । मैं आपके ही हितके लिये आपके प्रति सम्पूर्ण हृदयसे भक्तिभाव रखकर यहाँ आया हूँ । आपकी जो हानि हो रही है, उसे देखकर मैं बहुत संतप्त हूँ ॥ १७३ || अयं तवार्थो ह्रियते यो ब्रूयादक्षमान्वितः ॥ १८ ॥
सम्बुबोधयिषुर्मित्रं सदश्वमिव सारथिः ।
अतिमन्युप्रसक्तो हि प्रसह्य हितकारणात् ॥ १ ९ ॥
तथाविधस्य सुहृदा क्षन्तव्यं स्वं विजानता ।
ऐश्वर्यमिच्छता नित्यं पुरुषेण बुभूषता ॥ २० ॥
‘ जैसे सारथि अच्छे घोड़ेको सचेत करता है, उसी प्रकार यदि कोई मित्र मित्रको समझानेके लिये आया हो, मित्रकी हानि देखकर जो अत्यन्त दुखी हो और उसे सहन न कर सकनेके कारण जो हठपूर्वक अपने सुहृद् राजाका हितसाधन करनेके लिये उसके पास आकर कहे कि ‘ राजन्! तुम्हारे इस धनका अपहरण हो रहा है ' तो सदा ऐश्वर्य और उन्नतिकी इच्छा रखनेवाले विज्ञ एवं सुहृद् पुरुषको अपने उस हितकारी मित्रकी बात सुननी चाहिये और उसके अपराधको क्षमा कर देना चाहिये ' ॥ १८–२० ॥
तं राजा प्रत्युवाचेदं यत् किंचिन्मां भवान् वदेत् ।
कस्मादहं न क्षमेयमाकाङ्क्षन्नात्मनो हितम् ॥ २१ ॥
पृष्ठ 557
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ब्राह्मण प्रतिजाने ते प्रब्रूहि यदिहेच्छसि ।
करिष्यामि हि ते वाक्यं यदस्मान्विप्र वक्ष्यसि ॥ २२ ॥
पृष्ठ 558
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजा क्षेमदर्शी और कालकवृक्षीय मुनि
पृष्ठ 559
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तब राजाने मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया-' ब्राह्मण! आप जो कुछ कहना चाहें, मुझसे निर्भय होकर कहें । अपने हितकी इच्छा रखनेवाला मैं आपको क्षमा क्यों नहीं करूँगा? विप्रवर! आप जो चाहें, कहिये । मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप मुझसे जो कोई भी बात कहेंगे, आपकी उस आज्ञाका मैं पालन करूँगा' ॥ २१-२२ ॥ मुनिरुवाच
ज्ञात्वा पापानपापांश्च भृत्यतस्ते भयानि च ।
भक्त्या वृत्तिं समाख्यातुं भवतोऽन्तिकमागमम् ॥ २३ ॥
मुनि बोले- महाराज! आपके कर्मचारियोंमेंसे कौन अपराधी है और कौन निरपराध? इस बातका पता लगाकर तथा आपपर आपके सेवकोंकी ओरसे ही अनेक भय आने वाले हैं, यह जानकर प्रेमपूर्वक राज्यका सारा समाचार बतानेके लिये मैं आपके पास आया था ॥ २३ ॥
प्रागेवोक्तस्तु दोषोऽयमाचार्यैर्नृपसेविनाम् ।
अगतीकगतिर्ह्येषा पापा राजोपसेविनाम् ॥ २४ ॥
नीतिशास्त्रके आचार्योंने राजसेवकोंके इस दोषका पहलेसे ही वर्णन कर रखा है कि जो राजाकी सेवा करनेवाले लोग हैं, उनके लिये यह पापमयी जीविका अगतिक गति है, अर्थात् जिन्हें कहीं भी सहारा नहीं मिलता, वे राजाके सेवक होते हैं ॥ २४ ॥
आशीविषैश्च तस्याहुः संगतं यस्य राजभिः ।
बहुमित्राश्च राजानो बह्वमित्रास्तथैव च ॥ २५ ॥
तेभ्यः सर्वेभ्य एवाहुर्भयं राजोपजीविनाम् ।
तथैषां राजतो राजन् मुहूर्तादेव भीर्भवेत् ॥ २६ ॥
जिसका राजाओंके साथ मेल- जोल हो गया, उसकी विषधर सर्पोंके साथ सङ्गति हो गयी, ऐसा नीतिज्ञोंका कथन है । राजाके जहाँ बहुतसे मित्र होते हैं, वहीं उनके अनेक शत्रु भीहुआ करते हैं । राजाके आश्रित होकर जीविका चलानेवालोंको उन सभीसे भय बताया गया है । राजन्! स्वयं राजासे भी उन्हें घड़ी - घड़ीमें खतरा रहता है ॥ २५-२६ ॥
नैकान्तेन प्रमादो हि शक्यः कर्तुं महीपतौ ।
न तु प्रमादः कर्तव्यः कथंचिद् भूतिमिच्छता ॥ २७ ॥
राजाके पास रहनेवालोंसे कभी कोई प्रमाद हो ही नहीं, यह तो असम्भव है, परंतु जो अपना भला चाहता हो उसे किसी तरह उसके पास जान- बूझकर प्रमाद नहीं करना चाहिये ॥ २७ ॥
प्रमादाद्धि स्खलेद् राजा स्खलिते नास्ति जीवितम् ।
अग्निं दीप्तमिवासीदेद् राजानमुपशिक्षितः ॥ २८ ॥
पृष्ठ 560
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
यदि सेवकके द्वारा असावधानीके कारण कोई अपराध बन गया तो राजा पहलेके उपकारको भुलाकर कुपित हो उससे द्वेष करने लगता है और जब राजा अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हो जाय तो उस सेवकके जीवनकी आशा नहीं रह जाती । जैसे जलती हुई आगके पास मनुष्य सचेत होकर जाता है, उसी प्रकार शिक्षित पुरुषको राजाके पास सावधानीसे रहना चाहिये ॥ २८ ॥
आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणधनेश्वरम् ।
यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति मानवः ॥ २ ९ ॥
राजा प्राण और धन दोनोंका स्वामी है । जब वह कुपित होता है तो विषधर सर्पके समान भयंकर हो जाता है; अतः मनुष्यको चाहिये कि ' मैं जीवित नहीं हूँ' ऐसा मानकर अर्थात् अपनी जानको हथेलीपर लेकर सदा बड़े यत्नसे राजाकी सेवा करे ॥ २ ९ ॥
दुर्व्याहृताच्छङ्कमानो दुष्कृताद् दुरधिष्ठितात् ।
दुरासिताद् दुर्व्रजितादिङ्गितादङ्गचेष्टितात् ॥ ३० ॥
मुँह कोई बुरी बात न निकल जाय, कोई बुरा काम न बन जाय, खड़ा होते, किसी आसनपर बैठते, चलते, संकेत करते तथा किसी अंगके द्वारा कोई चेष्टा करते समय असभ्यता अथवा बेअदबी न हो जाय, इसके लिये सदा सतर्क रहना चाहिये ॥ ३० ॥
देवतेव हि सर्वार्थान् कुर्याद् राजा प्रसादितः ।
वैश्वानर इव क्रुद्धः समूलमपि निर्दहेत् ॥ ३१ ॥
यदि राजाको प्रसन्न कर लिया जाय तो वह देवताकी भाँति सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध कर देता है और यदि कुपित हो जाय तो जलती हुई आगकी भाँति जड़- मूलसहित भस्म कर डालता है ॥ ३१ ॥
इति राजन् यमः प्राह वर्तते च तथैव तत् ।
अथ भूयांसमेवार्थं करिष्यामि पुनः पुनः ॥ ३२ ॥
राजन्! यमराजने जो यह बात कही है, वह ज्यों- की- त्यों ठीक है; फिर भी मैं तो बारंबार आपके महान् अर्थका साधन करूँगा ही ॥ ३२ ॥
ददात्यस्मद्विधोऽमात्यो बुद्धिसाहाय्यमापदि ।
वायसस्त्वेष मे राजन् ननु कार्याभिसंहितः ॥ ३३ ॥
मेरे जैसा मन्त्री आपत्तिकालमें बुद्धिद्वारा सहायता देता है । राजन्! मेरा यह कौआ भी आपके कार्यसाधनमें संलग्न था; किंतु मारा गया ( सम्भव है मेरी भी वही दशा हो) ॥ ३३ ॥
न च मेऽत्र भवान् गह्य न च येषां भवान् प्रियः ।
हिताहितांस्तु बुद्धयेथा मा परोक्षमतिर्भवेः ॥ ३४ ॥
परंतु इसके लिये मैं आपकी और आपके प्रेमियोंकी निन्दा नहीं करता । मेरा कहना तो इतना ही है कि आप स्वयं अपने हित और अनहितको पहचानिये । प्रत्येक कार्यको अपनी