श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 561–570
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570
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आँखोंसे देखिये । दूसरोंकी देख - भालपर विश्वास न कीजिये ॥ ३४ ॥
ये त्वादानपरा एव वसन्ति भवतो गृहे ।
अभूतिकामा भूतानां तादृशैर्मेऽभिसंहितम् ॥ ३५ ॥
जो लोग आपका खजाना लूट रहे हैं और आपके ही घरमें रहते हैं, वे प्रजाकी भलाई चाहनेवाले नहीं हैं । वैसे लोगोंने मेरे साथ वैर बाँध लिया है ॥ ३५ ॥
यो वा भवद्विनाशेन राज्यमिच्छत्यनन्तरम् ।
आन्तरैरभिसंधाय राजन् सिद्धयति नान्यथा ॥ ३६ ॥
राजन्! जो आपका विनाश करके आपके बाद इस राज्यको अपने हाथमें लेना चाहता है, उसका वह कर्म अन्तः पुरके सेवकोंसे मिलकर कोई षड्यन्त्र करनेसे ही सफल हो सकता है; अन्यथा नहीं ( अतः आपको सावधान हो जाना चाहिये ) ॥ ३६ ॥
तेषामहं भयाद् राजन् गमिष्याम्यन्यमाश्रमम् ।
तैर्हि मे संधितो बाणः काके निपतितः प्रभो ॥ ३७ ॥
नरेश्वर! मैं उन विरोधियोंके भयसे दूसरे आश्रममें चला जाऊँगा । प्रभो! उन्होंनें मेरे लिये ही बाणका संधान किया था; किंतु वह उस कौएपर जा गिरा ॥ ३७ ॥
छद्मकामैरकामस्य गमितो यमसादनम् ।
दृष्टं ह्येतन्मया राजंस्तपोदीर्घेन चक्षुषा ॥ ३८ ॥
मैं कोई कामना लेकर यहाँ नहीं आया था तो भी छल- कपटकी इच्छा रखनेवाले षड्यन्त्रकारियोंने मेरे कौएको मारकर यमलोक पहुँचा दिया । राजन्! तपस्याके द्वारा प्राप्त हुई दूरदर्शिनी दृष्टिसे मैंने यह सब देखा है ॥
बहुनक्रझषग्राहां तिमिङ्गिलगणैर्युताम् ।
काकेन बालिशेनेमां यामतार्षमहं नदीम् ॥ ३ ९ ॥
यह राजनीति एक नदीके समान है । राजकीय पुरुष उसमें मगर, मत्स्य, तिमिङ्गल- समूहों और ग्राहोंके समान हैं । बेचारे कौएके द्वारा मैं किसी तरह इस नदीसे पार हो सका हूँ ॥ ३ ९ ॥
स्थाण्वश्मकण्टकवतीं सिंहव्याघ्रसमाकुलाम् ।
दुरासदां दुष्प्रसहां गुहां हैमवतीमिव ॥ ४० ॥
जैसे हिमालयकी कन्दरामें ठूंठ, पत्थर और काँटे होते हैं, उसके भीतर सिंह और व्याघ्रोंका भी निवास होता है तथा इन्हीं सब कारणोंसे उसमें प्रवेश पाना या रहना अत्यन्त कठिन एवं दुःसह हो जाता है, उसी प्रकार दुष्ट अधिकारियोंके कारण इस राज्यमें किसी भले मनुष्यका रहना मुश्किल है ॥ ४० ॥
अग्निना तामसं दुर्गं नौभिराप्यं च गम्यते ।
राजदुर्गावतरणे नोपायं पण्डिता विदुः ॥ ४१ ॥
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अन्धकारमय दुर्गको अग्निके प्रकाशसे तथा जल- दुर्गको नौकाओंद्वारा पार किया जा सकता है; परंतु राजारूपी दुर्गसे पार होनेके लिये विद्वान् पुरुष भी कोई उपाय नहीं जानते हैं ॥ ४१ ॥
गहनं भवतो राज्यमन्धकारं तमोऽन्वितम् ।
नेह विश्वसिंतु शक्यं भवतापि कुतो मया ॥ ४२ ॥
आपका यह राज्य गहन अन्धकारसे आच्छन्न और दुःखसे परिपूर्ण है । आप स्वयं भी इस राज्यपर विश्वास नहीं कर सकते; फिर मैं कैसे करूंगा ॥ ४२ ॥
अतो नायं शूभो वासस्तुल्ये सदसती इह ।
वधो ह्येवात्र सुकृते दुष्कृते न च संशयः ॥ ४३ ॥
अतः यहाँ रहनेमें किसीका कल्याण नहीं है । यहाँ भले - बुरे सब एक समान हैं । इस राज्यमें बुराई करनेवाले और भलाई करनेवालेका भी वध हो सकता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४३ ॥
न्यायतो दुष्कृते घातः सुकृते न कथंचन ।
नेह युक्तं स्थिरं स्थातुं जवेनैवाव्रजेद् बुधः ॥ ४४ ॥
न्यायकी बात तो यह है कि बुराई करनेवालेको ही मारा जाय और पुण्य— श्रेष्ठ कर्म करनेवालेको किसी तरह भी कोई कष्ट न होने पावे, परंतु यहाँ ऐसा नहीं होता; अतः इस राज्यमें स्थिरभावसे निवास करना किसीके लिये भी उचित नहीं है । विद्वान् पुरुषको यहाँसे अति शीघ्र हट जाना चाहिये ॥ ४४ ॥
सीता नाम नदी राजन् प्लवो यस्यां निमज्जति ।
तथोपमामिमां मन्ये वागुरां सर्वघातिनीम् ॥ ४५ ॥
राजन्! सीता नामसे प्रसिद्ध एक नदी है, जिसमें नाव भी डूब जाती है, वैसी ही यहाँकी राजनीति भी है ( इसमें मेरे जैसे सहायकोंके भी डूब जानेकी आशङ्का है ) । मैं तो इसे समस्त प्राणियोंका विनाश करनेवाली फाँसी ही समझता हूँ ॥ ४५ ॥
मधुप्रपातो हि भवान् भोजनं विषसंयुतम् ।
असतामिव ते भावो वर्तते न सतामिव ॥ ४६ ॥
आप शहदके छत्तेसे युक्त पेड़की उस ऊँची डालीके समान हैं, जहाँसे नीचे गिरनेका ही भय है । आप विष मिलाये हुए भोजनके तुल्य हैं, आपका भाव असज्जनोंके समान है, सज्जनोंके तुल्य नहीं है ॥ ४६ ॥
आशीविषैः परिवृतः कूपस्त्वमसि पार्थिव ।
दुर्गतीर्था बृहत्कूला कारीरा वेत्रसंयुता ॥ ४७ ॥
नदी मधुरपानीया यथा राजंस्तथा भवान् ।
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भूपाल! आप विषैले सर्पोंसे घिरे हुए कुएँके समान हैं, राजन्! आपकी अवस्था उस मीठे जलवाली नदीके समान हो गयी है, जिसके घाटतक पहुँचना कठिन है, जिसके दोनों किनारे बहुत ऊँचे हों और वहाँ करीलके झाड़ तथा बेंतकी वल्लरियाँ सब ओर छा रही हों ॥ ४७ ॥
श्वगृध्रगोमायुयुतो राजहंससमो ह्यसि ॥ ४८ ॥
यथाऽऽश्रित्य महावृक्षं कक्षः संवर्धते महान् ।
ततस्तं संवृणोत्येव तमतीत्य च वर्धते ॥ ४ ९ ॥
तेनैवोग्रेन्धनेनैनं दावो दहति दारुणः ।
तथोपमा ह्यमात्यास्ते राजंस्तान् परिशोधय ॥ ५० ॥
जैसे कुत्तों, गीधों और गीदड़ोंसे घिरा हुआ राजहंस बैठा हो, उसी तरह दुष्ट कर्मचारियोंसे आप घिरे हुए हैं । जैसे लताओंका विशाल समूह किसी महान् वृक्षका आश्रय लेकर बढ़ता है, फिर धीरे- धीरे उस वृक्षको लपेट लेता है और उसका अतिक्रमण करके उससे भी ऊँचेतक फैल जाता है, फिर वही सूखकर भयानक ईंधन बन जाता है, तब दारुण दावानल उसी ईंधनके सहारे उस विशाल वृक्षको भी जला डालता है, राजन्! आपके मन्त्री भी उन्हीं सूखी लताओंके समान हो गये हैं अर्थात् आपके ही आश्रयसे बढ़कर आपहीके
विनाशका कारण बन रहे हैं । अतः आप उनका शोधन कीजिये ॥ ४८–५० ॥
त्वया चैव कृता राजन् भवता परिपालिताः ।
भवन्तमभिसंधाय जिघांसन्ति भवत्प्रियम् ॥ ५१ ॥
नरेश्वर! आपने ही जिन्हें मन्त्री बनाया और आपने जिनका पालन किया, वे आपसे ही कपटभाव रखकर आपके ही हितका विनाश करना चाहते हैं ॥ ५१ ॥
उषितं शङ्कमानेन प्रमादं परिरक्षता ।
अन्तःसर्प इवागारे वीरपत्न्या इवालये ॥ ५२ ॥
शीलं जिज्ञासमानेन राज्ञश्च सहजीविनः । मैं राजाके साथ रहनेवाले अधिकारियोंका शील स्वभाव जानना चाहता था, इसलिये सदा सशङ्क रहकर बड़ी सावधानीके साथ यहाँ रहा हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे कोई साँपवाले मकानमें रहता हो अथवा किसी शूरवीरकी पत्नीके घरमें घुस गया हो ॥ ५२३ ॥
कच्चिज्जितेन्द्रियो राजा कच्चिदस्यान्तरा जिताः ॥ ५३ ॥
कच्चिदेषां प्रियो राजा कच्चिद् राज्ञः प्रिया प्रजाः ।
विजिज्ञासुरिह प्राप्तस्तवाहं राजसत्तम ॥ ५४ ॥
क्या इस देशके राजा जितेन्द्रिय हैं? क्या इनके अंदर रहनेवाले सेवक इनके वशमें हैं? क्या यहाँकी प्रजाओंका राजापर प्रेम है? और राजा भी क्या अपनी प्रजाओंपर प्रेम रखते हैं? नृपश्रेष्ठ! इन्हीं सब बातोंको जाननेकी इच्छासे मैं आपके यहाँ आया था ॥ ५३-५४ ॥ तस्य मे रोचते राजन् क्षुधितस्येव भोजनम् ।
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अमात्या मे न रोचन्ते वितृष्णस्य यथोदकम् ॥ ५५ ॥
जैसे भूखेको भोजन अच्छा लगता है, उसी प्रकार आपका दर्शन मुझे बड़ा प्रिय लगता है; परंतु जैसे प्यास न रहनेपर पानी अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार आपके ये मन्त्री मुझे अच्छे नहीं जान पड़ते हैं ॥ ५५ ॥
भवतोऽर्थकृदित्येवं मयि दोषो हि तैः कृतः ।
विद्यते कारणं नान्यदिति मे नात्र संशयः ॥ ५६ ॥
मैं आपकी भलाई करनेवाला हूँ, यही इन मन्त्रियोंने मुझमें बड़ा भारी दोष पाया है और इसीलिये ये मुझसे द्वेष रखने लगे हैं । इसके सिवा दूसरा कोई इनके रोषका कारण नहीं है । मुझे अपने इस कथनकी सत्यतामें कोई संदेह नहीं है ॥ ५६ ॥
न हि तेषामहं द्रुग्धस्तत्तेषां दोषदर्शनम् ।
अरेर्हि दुर्हृदाद् भेयं भग्नपुच्छादिवोरगात् ॥ ५७ ॥
यद्यपि मैं इन लोगोंसे द्रोह नहीं करता तो भी मेरे प्रति इन लोगोंकी दोष - दृष्टि हो गयी है । जिसकी पूँछ दबा दी गयी हो, उस सर्पके समान दुष्ट हृदयवाले शत्रुसे सदा डरते रहना चाहिये ( इसलिये अब मैं यहाँ रहना नहीं चाहता) ॥ ५७ ॥
राजोवाच
भूयसा परिहारेण सत्कारेण च भूयसा ।
पूजितो ब्राह्मणश्रेष्ठ भूयो वस गृहे मम ॥ ५८ ॥
राजाने कहा – विप्रवर! आपपर आनेवाले भय अथवा संकटका विशेषरूपसे निवारण करतेहुए मैं आपको बड़े आदर - सत्कारके साथ अपने यहाँ रखूँगा । आप मेरे द्वारा सम्मानित हो बहुत कालतक मेरे महलमें निवास कीजिये ॥ ५८ ॥
ये त्वां ब्राह्मण नेच्छन्ति ते न वत्स्यन्ति मे गृहे ।
भवतैव हि तज्ज्ञेयं यत्तदेषामनन्तरम् ॥ ५ ९ ॥
ब्रह्मन्! जो आपको मेरे यहाँ नहीं रहने देना चाहते हैं, वे स्वयं ही मेरे घरमें नहीं रहने पायेंगे अब इन विरोधियोंका दमन करनेके लिये जो आवश्यक कर्त्तव्य हो, उसे आप स्वयं ही सोचिये और समझिये ॥ ५ ९ ॥
यथा स्यात् सुधृतो दण्डो यथा च सुकृतं कृतम् ।
तथा समीक्ष्य भगवन् श्रेयसे विनियुङ्क्ष्व माम् ॥ ६० ॥
भगवन्! जिस तरह राजदण्डको मैं अच्छी तरह धारण कर सकूँ और मेरे द्वारा अच्छे ही कार्य होते रहें, वह सब सोचकर आप मुझे कल्याणके मार्गपर लगाइये ॥ ६० ॥
मुनिरुवाच
अदर्शयन्निमं दोषमेकैकं दुर्बलीकुरु ।
ततः कारणमाज्ञाय पुरुषं पुरुषं जहि ॥ ६१ ॥
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मुनिने कहा — राजन्! पहले तो कौएको मारनेका जो अपराध है, इसे प्रकट किये बिना ही एक-एक मन्त्रीको उसका अधिकार छीनकर दुर्बल कर दीजिये । उसके बाद अपराधके कारणका पूरा- पूरा पता लगाकर क्रमशः एक-एक व्यक्तिका वध कर डालिये ॥ ६१ ॥
एकदोषा हि बहवो मृद्नीयुरपि कण्टकान् ।
मन्त्रभेदभयाद् राजंस्तस्मादेतद् ब्रवीमि ते ॥ ६२ ॥
नरेश्वर! जब बहुत - से लोगोंपर एक ही तरहका दोष लगाया जाता है तो वे सब मिलकर एक हो जाते हैं और उस दशामें वे बड़े - बड़े कण्टकोंको भी मसल डालते हैं, अतः यह गुप्त विचार दूसरोंपर प्रकट न हो जाय, इसी भयसे मैं तुम्हें इस प्रकार एक- एक करके विरोधियोंके वधकी सलाह दे रहा हूँ ॥ ६२ ॥
वयं तु ब्राह्मणा नाम मृदुदण्डाः कृपालवः ।
स्वस्ति चेच्छाम भवतः परेषां च यथाऽऽत्मनः ॥ ६३ ॥
महाराज! हमलोग ब्राह्मण हैं । हमारा दण्ड भी बहुत कोमल होता है । हम स्वभावसे ही दयालु होते हैं; अतः अपने ही समान आपका और दूसरोंका भी भला चाहते हैं ॥ ६३ ॥
राजन्नात्मानमाचक्षे सम्बन्धी भवतो ह्यहम् ।
मुनिः कालकवृक्षीय इत्येवमभिसंज्ञितः ॥ ६४ ॥
राजन्! अब मैं आपको अपना परिचय देता हूँ । मैं आपका सम्बन्धी हूँ। मेरा नाम है कालकवृक्षीय मुनि ॥
पितुः सखा च भवतः सम्मतः सत्यसङ्गरः ।
व्यापन्ने भवतो राज्ये राजन् पितरि संस्थिते ॥ ६५ ॥
सर्वकामान् परित्यज्य तपस्तप्तं तदा मया ।
स्नेहात् त्वां तु ब्रवीम्येतन्मा भूयो विभ्रमेदिति ॥ ६६ ॥
मैं आपके पिताका आदरणीय एव सत्यप्रतिज्ञ मित्र हूँ। नरेश्वर! आपके पिताके स्वर्गवास हो जानेके पश्चात् जब आपके राज्यपर भारी संकट आ गया था, तब अपनी समस्त कामनाओंका परित्याग करके मैंने ( आपके हितके लिये ) तपस्या की थी । आपके प्रति स्नेह होनेके कारण मैं फिर यहाँ आया हूँ और आपको ये सब बातें इसलिये बता रहा हूँ कि आप फिर किसीके चक्करमें न पड़ जायँ ॥ ६५-६६ ॥
उभे दृष्ट्वा दुःखसुखे राज्यं प्राप्य यदृच्छया ।
राज्येनामात्यसंस्थेन कथं राजन् प्रमाद्यसि ॥ ६७ ॥
महाराज! आपने सुख और दुःख दोनों देखे हैं । यह राज्य आपको दैवेच्छासे प्राप्त हुआ है तो भी आप इसे केवल मन्त्रियोंपर छोड़कर क्यों भूल कर रहे हैं? ॥
ततो राजकुले नान्दी संजज्ञे भूयसा पुनः ।
पुरोहितकुले चैव सम्प्राप्ते ब्राह्मणर्षभे ॥ ६८ ॥
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तदनन्तर पुरोहितके कुलमें उत्पन्न विप्रवर कालकवृक्षीय मुनिके पुनः आ जानेसे राजपरिवारमें मंगलपाठ एवं आनन्दोत्सव होने लगा ॥ ६८ ॥
एकच्छत्रां महीं कृत्वा कौसल्याय यशस्विने ।
मुनिः कालकवृक्षीय ईजे क्रतुभिरुत्तमैः ॥ ६ ९ ॥
कालकवृक्षीय मुनिने अपने बुद्धिबलसे यशस्वी कोसलनरेशको भूमण्डलका एकच्छत्र सम्राट् बनाकर अनेक उत्तम यज्ञोंद्वारा यजन किया ॥ ६ ९ ॥
हितं तद्वचनं श्रुत्वा कौसल्योऽप्यजयन्महीम् ।
तथा च कृतवान् राजा यथोक्तं तेन भारत ॥ ७० ॥
भारत! कोसलराजने भी पुरोहितका हितकारी वचन सुना और उन्होंने जैसा कहा, वैसा ही किया । इससे उन्होंने समस्त भूमण्डलपर विजय प्राप्त कर ली ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अमात्यपरीक्षायां कालकवृक्षीयोपाख्याने द्वयशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें मन्त्रियोंकी परीक्षाके प्रसङ्गमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यानविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
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त्र्यशीतितमोऽध्यायः सभासद् आदिके लक्षण, गुप्त सलाह सुननेके अधिकारी और अनधिकारी तथा गुप्त मन्त्रणाकी विधि एवं स्थानका निर्देश युधिष्ठिर उवाच
सभासदः सहायाश्च सुहृदश्च विशाम्पते ।
परिच्छदास्तथामात्याः कीदृशाः स्युः पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा – प्रजापालक पितामह! राजाके सभासद्, सहायक, सुहृद्, परिच्छद ( सेनापति आदि) तथा मन्त्री कैसे होने चाहिये? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
ह्रीनिषेवास्तथा दान्ताः सत्यार्जवसमन्विताः ।
शक्ताः कथयितुं सम्यक् ते तव स्युः सभासदः ॥ २ ॥
भीष्मजी ने कहा- बेटा! जो लज्जाशील, जितेन्द्रिय, सत्यवादी, सरल और किसी विषयपर अच्छी तरह प्रवचन करनेमें समर्थ हों, ऐसे ही लोग तुम्हारे सभासद् होने चाहिये ॥ २ ॥
अमात्यांश्चातिशूरांश्च ब्राह्मणांश्च परिश्रुतान् ।
सुसंतुष्टांश्च कौन्तेय महोत्साहांश्च कर्मसु ॥ ३ ॥
एतान् सहायाँल्लिप्सेथाः सर्वास्वापत्सु भारत । भरतनन्दन युधिष्ठिर! मन्त्रियोंको, अत्यन्त शूरवीर पुरुषोंको, विद्वान् ब्राह्मणोंको, पूर्णतया संतुष्ट रहनेवालोंको और सभी कार्योंके लिये उत्साह रखनेवालोंको — इन सब लोगोंको तुम सभी आपत्तियोंके समय सहायक बनानेकी इच्छा करना ॥ ३३ ॥
कुलीनः पूजितो नित्यं न हि शक्तिं निगूहति ॥ ४ ॥
प्रसन्नमप्रसन्नं वा पीडितं हतमेव वा ।
आवर्तयति भूयिष्ठं तदेव ह्यनुपालितम् ॥ ५ ॥
जो कुलीन हो, जिसका सदा सम्मान किया जाय, जो अपनी शक्तिको छिपावे नहीं तथा राजा प्रसन्न हो या अप्रसन्न हो, पीड़ित हो अथवा हताहत हो, प्रत्येक अवस्थामें जो बारंबार उसका अनुसरण करता हो, वही सुहृद् होने योग्य है ॥ ४-५ ॥
कुलीना देशजाः प्राज्ञा रूपवन्तो बहुश्रुताः ।
प्रगल्भाश्चानुरक्ताश्च ते तव स्युः परिच्छदाः ॥ ६ ॥
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जो उत्तम कुल और अपने ही देशमें उत्पन्न हुए हों, बुद्धिमान्, रूपवान्, बहुज्ञ, निर्भय और अनुरक्त हों, वे ही तुम्हारे परिच्छद ( सेनापति आदि) होने चाहिये ॥ ६ ॥
दौष्कुलेयाश्च लुब्धाश्च नृशंसा निरपत्रपाः ।
ते त्वां तात निषेवेयुर्यावदार्द्रकपाणयः ॥ ७ ॥
तात! जो निन्दित कुलमें उत्पन्न, लोभी, क्रूर और निर्लज्ज हैं, वे तभीतक तुम्हारी सेवा करेंगे, जबतक उनके हाथ गीले रहेंगे ॥ ७ ॥
कुलीनात् शीलसम्पन्नानिङ्गितज्ञाननिष्ठुरान् ।
देशकालविधानज्ञान् भर्तृकार्यहितैषिणः ॥ ८ ॥
नित्यमर्थेषु सर्वेषु राजा कुर्वीत मन्त्रिणः । अच्छे कुलमें उत्पन्न, शीलवान्, इशारे समझनेवाले, निष्ठुरतारहित (दयालु), देशकालके विधानको समझनेवाले और स्वामीके अभीष्ट कार्यकी सिद्धि तथा हित चाहनेवाले मनुष्योंको राजा सदा सभी कार्योंके लिये अपना मन्त्री बनावे ॥ ८३ ॥
अर्थमानार्घ्यसत्कारैर्भोगैरुच्चावचैः प्रियान् ॥ ९ ॥
यानर्थभाजो मन्येथास्ते ते स्युः सुखभागिनः । तुम जिन्हें अपना प्रिय मानते हो, उन्हें धन, सम्मान, अर्घ्य, सत्कार तथा भिन्न - भिन्न प्रकारके भोगोंद्वारा संतुष्ट करो, जिससे वे तुम्हारे प्रियजन धन और सुखके भागी हों ॥ ९ ३ ||
अभिन्नवृत्ता विद्वांसः सद्वृत्ताश्चरितव्रताः ।
न त्वां नित्यार्थिनो जह्युरक्षुद्राः सत्यवादिनः ॥ १० ॥
जिनका सदाचार नष्ट नहीं हुआ है, जो विद्वान्, सदाचारी और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं; जिन्हें सदा तुमसे अभीष्ट वस्तुके लिये प्रार्थना करनेकी आवश्यकता पड़ती है तथा जो श्रेष्ठ और सत्यवादी हैं, वे कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ सकते ॥ १० ॥
अनार्या ये न जानन्ति समयं मन्दचेतसः ।
तेभ्यः परिजुगुप्सेथा ये चापि समयच्युताः ॥ ११ ॥
जो अनार्य और मन्दबुद्धि हैं, जिन्हें की हुई प्रतिज्ञाके पालनका ध्यान नहीं रहता तथा जो कई बार अपनी प्रतिज्ञासे गिर चुके हैं, उनसे अपनेको सुरक्षित रखनेके लिये तुम्हें सदा सावधान रहना चाहिये ॥ ११ ॥
नैकमिच्छेद् गणं हित्वा स्वाच्चेदन्यतरग्रहः ।
यस्त्वेको बहुभिः श्रेयान् कामं तेन गणं त्यजेत् ॥ १२ ॥
एक ओर एक व्यक्ति हो और दूसरी ओर एक समूह हो तो समूहको छोड़कर एक व्यक्तिको ग्रहण करनेकी इच्छा न करे। परंतु जो एक मनुष्य बहुत मनुष्योंकी अपेक्षा गुणोंमें श्रेष्ठ हो और इन दोनोंमेंसे एकको ही ग्रहण करना पड़े तो ऐसी परिस्थितिमें कल्याण चाहनेवाले पुरुषको उस एकके लिये समूहको त्याग देना चाहिये ॥ १२ ॥
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श्रेयसो लक्षणं चैतद् विक्रमो यस्य दृश्यते ।
कीर्तिप्रधानो यश्च स्यात् समये यश्च तिष्ठति ॥ १३ ॥
समर्थान् पूजयेद् यश्च नास्पर्धेः स्पर्धते च यः ।
न च कामाद् भयात् क्रोधाल्लोभाद् वा धर्ममुत्सृजेत् ॥ १४ ॥
अमानी सत्यवान् क्षान्तो जितात्मा मानसंयुतः ।
स ते मन्त्रसहायः स्यात् सर्वावस्थापरीक्षितः ॥ १५ ॥
श्रेष्ठ पुरुषका लक्षण इस प्रकार है -जिसका पराक्रम देखा जाता हो, जिसके जीवनमें कीर्तिकी प्रधानता हो, जो अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर रहता हो, सामर्थ्यशाली पुरुषोंका सम्मान करता हो, जो स्पर्धाके अयोग्य पुरुषोंसे ईर्ष्या न रखता हो, कामना, भय, क्रोध अथवा लोभसे भी धर्मका उल्लंघन न करता हो, जिसमें अभिमानका अभाव हो, जो सत्यवान्, क्षमाशील, जितात्मा तथा सम्मानित हो और जिसकी सभी अवस्थाओंमें परीक्षा कर ली गयी हो, ऐसा पुरुष ही तुम्हारी गुप्त मन्त्रणामें सहायक होना चाहिये ॥ १३–१५ ॥
कुलीनः कुलसम्पन्नस्तितिक्षुर्दक्ष आत्मवान् ।
शूरः कृतज्ञः सत्यश्च श्रेयसः पार्थ लक्षणम् ॥ १६ ॥
कुन्तीनन्दन! उत्तम कुलमें जन्म होना, सदा श्रेष्ठ कुलके सम्पर्कमें रहना, सहनशीलता, कार्यदक्षता, मनस्विता, शूरता, कृतज्ञता और सत्यभाषण –ये ही श्रेष्ठ पुरुषके लक्षण हैं ॥ १६ ॥
तस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्य विजानतः ।
अमित्राः सम्प्रसीदन्ति तथा मित्रीभवन्त्यपि ॥ १७ ॥
ऐसा बर्ताव करनेवाले विज्ञ पुरुषके शत्रु भी प्रसन्न हो जाते हैं और उसके साथ मैत्री स्थापित कर लेते हैं ॥ १७ ॥
अत ऊर्ध्वममात्यानां परीक्षेत गुणागुणम् ।
संयतात्मा कृतप्रज्ञो भूतिकामश्च भूमिपः ॥ १८ ॥
इसके बाद मनको वशमें रखनेवाला शुद्धबुद्धि और ऐश्वर्यकामी भूपाल अपने मन्त्रियोंके गुण और अवगुणकी परीक्षा करे ॥ १८ ॥
सम्बन्धिपुरुषैराप्तैरभिजातैः स्वदेशजैः ।
अहार्यैरव्यभीचारैः सर्वशः सुपरीक्षितैः ॥ १ ९ ॥
यौनाः श्रौतास्तथा मौलास्तथैवाप्यनहंकृताः ।
कर्तव्या भूतिकामेन पुरुषेण बुभूषता ॥ २० ॥
जिनके साथ कोई- न - कोई सम्बन्ध हो, जो अच्छे कुलमें उत्पन्न, विश्वासपात्र, स्वदेशीय, घूस न खानेवाले तथा व्यभिचार -दोषसे रहित हों, जिनकी सब प्रकारसे भलीभाँति परीक्षा ले ली गयी हो, जो उत्तम जातिवाले, वेदके मार्गपर चलनेवाले, कई पीढ़ियोंसे राजकीय
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सेवा करनेवाले तथा अहङ्कारशून्य हों, ऐसे ही लोगोंको अपनी उन्नति चाहनेवाला ऐश्वर्यकामी पुरुष मन्त्री बनावे ॥
येषां वैनयिकी बुद्धिः प्रकृतिश्चैव शोभना ।
तेजो धैर्यं क्षमा शौचमनुरागः स्थितिर्धृतिः ॥ २१ ॥
परीक्ष्य च गुणान् नित्यं प्रौढभावान् धुरंधरान् ।
पञ्चोपधाव्यतीतांश्च कुर्याद् राजार्थकारिणः ॥ २२ ॥
जिनमें विनययुक्त बुद्धि, सुन्दर स्वभाव, तेज, वीरता, क्षमा, पवित्रता, प्रेम, धृति और स्थिरता हो, उनके इन गुणोंकी परीक्षा करके यदि वे राजकीय कार्यभारको सँभालनेमें प्रौढ़ तथा निष्कपट सिद्ध हों तो राजा उनमेंसे पाँच व्यक्तियोंको चुनकर अर्थमन्त्री बनावे ॥
पर्याप्तवचनान् वीरान् प्रतिपत्तिविशारदान् ।
कुलीनात् सत्त्वसम्पन्नानिङ्गितज्ञाननिष्ठुरान् ॥ २३ ॥
देशकालविधानज्ञान् भर्तृकार्यहितैषिणः ।
नित्यमर्थेषु सर्वेषु राजन् कुर्वीत मन्त्रिणः ॥ २४ ॥
राजन्! जो बोलनेमें कुशल, शौर्यसम्पन्न, प्रत्येक बातको ठीक -ठीक समझनेमें निपुण, कुलीन, सत्त्वयुक्त, संकेत समझनेवाले, निष्ठुरतासे रहित ( दयालु), देश और कालके विधानको जाननेवाले तथा स्वामीके कार्य एवं हितकी सिद्धि चाहनेवाले हों, ऐसे पुरुषोंको सदा सभी प्रयोजनोंकी सिद्धिके लिये मन्त्री बनाना चाहिये ॥
हीनतेजोऽभिसंसृष्टो नैव जातु व्यवस्यति ।
अवश्यं जनयत्येव सर्वकर्मसु संशयम् ॥ २५ ॥
तेजोहीन मन्त्रीके सम्पर्कमें रहनेवाला राजा कभी कर्तव्य और अकर्तव्यका निर्णय नहीं कर सकता । वैसा मन्त्री सभी कार्योंमें अवश्य ही संशय उत्पन्न कर देता है ॥ २५ ॥
एवमल्पश्रुतो मन्त्री कल्याणाभिजनोऽप्युत ।
धर्मार्थकामसंयुक्तो नालं मन्त्रं परीक्षितुम् ॥ २६ ॥
इसी प्रकार जो मन्त्री उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेपर भी शास्त्रोंका बहुत कम ज्ञान रखता हो, वह धर्म, अर्थ और कामसे संयुक्त होकर भी गुप्त मन्त्रणाकी परीक्षा नहीं कर सकता ॥ २६ ॥
तथैवानभिजातोऽपि काममस्तु बहुश्रुतः ।
अनायक इवाचक्षुर्मुह्यत्यणुषु कर्मसु ॥ २७ ॥
वैसे ही जो अच्छे कुलमें उत्पन्न नहीं है, वह भले ही अनेक शास्त्रोंका विद्वान् हो, किंतु नायकरहित सैनिक तथा नेत्रहीन मनुष्यकी भाँति वह छोटे -छोटे कार्योंमें भी मोहित हो जाता है— कर्तव्याकर्तव्यका विवेक नहीं कर पाता ॥ २७ ॥
यो वाप्यस्थिरसंकल्पो बुद्धिमानागतागमः ।
उपायज्ञोऽपि नालं स कर्म प्रापयितुं चिरम् ॥ २८ ॥