05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 771–780
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780
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सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः कुत्तेका शरभकी योनिमें जाकर महर्षिके शापसे पुनः कुत्ता हो जाना भीष्म उवाच
व्याघ्रश्चोटजमूलस्थस्तृप्तः सुप्तो हतैर्मृगैः ।
नागश्चागात् तमुद्देशं मत्तो मेघ इवोद्धतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! वह बाघ अपने मारे हुए मृगोंके मांस खाकर तृप्त हो महर्षिकी कुटीके पास ही सो रहा था । इतनेमें ही वहाँ ऊँचे उठे हुए मेघके समान काला एक मदोन्मत्त हाथी आ पहुँचा ॥ १ ॥
प्रभिन्नकरटः प्रांशुः पद्मी विततकुम्भकः ।
सुविषाणो महाकायो मेघगम्भीरनिःस्वनः ॥ २ ॥
उसके गण्डस्थलसे मदकी धारा चू रही थी । उसका कुम्भस्थल बहुत विस्तृत था । उसके ऊपर कमलका चिह्न बना हुआ था, उसके दाँत बड़े सुन्दर थे । वह विशालकाय ऊँचा हाथी मेघके समान गम्भीर गर्जना करता था ॥ २ ॥
तं दृष्ट्वा कुञ्जरं मत्तमायान्तं बलगर्वितम् ।
व्याघ्रो हस्तिभयात् त्रस्तस्तमृषिं शरणं ययौ ॥ ३ ॥
उस बलाभिमानी मदोन्मत्त गजराजको आते देख वह बाघ भयभीत हो पुनः ऋषिकी शरणमें गया ॥ ३ ॥
ततोऽनयत् कुञ्जरत्वं व्याघ्रं तमृषिसत्तमः ।
महामेघनिभं दृष्ट्वा स भीतो ह्यभवद् गजः ॥ ४ ॥
तब उन मुनिश्रेष्ठने उस बाघको हाथी बना दिया । उस महामेघके समान हाथीको देखकर वह जंगली हाथी भयभीत होकर भाग गया ॥ ४ ॥
ततः कमलषण्डानि शल्लकीगहनानि च ।
व्यचरत् स मुदायुक्तः पद्मरेणुविभूषितः ॥ ५ ॥
तदनन्तर वह हाथी कमलोंके परागसे विभूषित और आनन्दित हो कमलसमूहों तथा शल्लकी लताकी झाड़ियोंमें विचरने लगा ॥ ५ ॥
कदाचिद् भ्रममाणस्य हस्तिनः सम्मुखं तदा ।
ऋषेस्तस्योटजस्थस्य कालोऽगच्छन्निशानिशम् ॥ ६ ॥
कभी- कभी वह हाथी आश्रमवासी ऋषिके सामने भी घूमा करता था । इस तरह उसका कितनी ही रातोंका समय व्यतीत हो गया ॥ ६ ॥
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अथाजगाम तं देशं केसरी केसरारुणः ।
गिरिकन्दरजो भीमः सिंहो नागकुलान्तकः ॥ ७ ॥
तदनन्तर उस प्रदेशमें एक केसरी सिंह आया, जो अपनी केसरके कारण कुछ लाल - सा जान पड़ता था । पर्वतकी कन्दरामें पैदा हुआ वह भयानक सिंह गजवंशका विनाश करनेवाला काल था ॥ ७ ॥
तं दृष्ट्वा सिंहमायान्तं नागः सिंहभयार्दितः ।
ऋषिं शरणमापेदे वेपमानो भयातुरः ॥ ८ ॥
उस सिंहको आते देख वह हाथी उसके भयसे पीड़ित एवं आतुर हो थर- थर काँपने लगा और ऋषिकी शरणमें गया ॥ ८ ॥
स ततः सिंहतां नीतो नागेन्द्रो मुनिना तदा ।
वन्यं नागणयत् सिंहं तुल्यजातिसमन्वयात् ॥ ९ ॥
तब मुनिने उस गजराजको सिंह बना दिया । अब वह समान जातिके सम्बन्धसे जंगली सिंहको कुछ भी नहीं गिनता था ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा च सोऽभवत् सिंहो वन्यो भयसमन्वितः ।
स चाश्रमेऽवसत् सिंहस्तस्मिन्नेव महावने ॥ १० ॥
उसे देखकर जंगली सिंह स्वयं ही डर गया । वह सिंह बना हुआ कुत्ता महावनमें उसी आश्रममें रहने लगा ॥ १० ॥
तद्भयात् पशवो नान्ये तपोवनसमीपतः ।
व्यदृश्यन्त तदा त्रस्ता जीविताकांक्षिणस्तथा ॥ ११ ॥
उसके भयसे जंगलके दूसरे पशु डर गये और अपनी जान बचानेकी इच्छासे तपोवनके समीप कभी नहीं दिखायी दिये ॥ ११ ॥
कदाचित् कालयोगेन सर्वप्राणिविहिंसकः ।
बलवान् क्षतजाहारो नानासत्त्वभयंकरः ॥ १२ ॥
अष्टपादूर्ध्वनयनः शरभो वनगोचरः ।
तं सिंहं हन्तुमागच्छन्मुनेस्तस्य निवेशनम् ॥ १३ ॥
तदनन्तर कालयोगसे वहाँ एक बलवान् वनवासी समस्त प्राणियोंका हिंसक शरभ आ पहुँचा, जिसके आठ पैर और ऊपरकी ओर नेत्र थे । वह रक्त पीनेवाला जानवर नाना प्रकारके वन- जन्तुओंके मनमें भय उत्पन्न कर रहा था । वह उस सिंहको मारनेके लिये मुनिके आश्रमपर आया ॥ १२-१३ ॥ ( तं दृष्ट्वा शरभं यान्तं सिंहः परभयातुरः । ऋषिं शरणमापेदे वेपमानः कृताञ्जलिः ॥ ) शरभको आते देख सिंह अत्यन्त भयसे व्याकुल हो काँपता हुआ हाथ जोड़कर मुनिकी शरणमें आया ॥
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तं मुनिः शरभं चक्रे बलोत्कटमरिंदम ।
ततः स शरभो वन्यो मुनेः शरभमग्रतः ॥ १४ ॥
दृष्ट्वा बलिनमत्युग्रं द्रुतं सम्प्राद्रवद् वनात् । शत्रुदमन युधिष्ठिर! तब मुनिने उसे बलोन्मत्त शरभ बना दिया । जंगली शरभ उस मुनिनिर्मित अत्यन्त भयंकर एवं बलवान् शरभको सामने देखकर भयभीत हो तुरंत ही उस वनसे भाग गया ॥ १४ ॥
स एवं शरभस्थाने संन्यस्तो मुनिना तदा ॥ १५ ॥
मुनेः पार्श्वगतो नित्यं शरभः सुखमाप्तवान् । इस प्रकार मुनिने उस कुत्तेको उस समय शरभके स्थानमें प्रतिष्ठित कर दिया । वह शरभ प्रतिदिन मुनिके पास सुखसे रहने लगा ॥ १५३ ॥
ततः शरभसंत्रस्ताः सर्वे मृगगणास्तदा ॥ १६ ॥
दिशः सम्प्राद्रवन् राजन् भयाज्जीवितकांक्षिणः । राजन्! उस शरभसे भयभीत हो जंगलके सभी पशु अपनी जान बचानेके लिये डरके मारे सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ १६३ ॥
शरभोऽप्यतिसंहृष्टो नित्यं प्राणिवधे रतः ॥ १७ ॥
फलमूलाशनं कर्तुं नैच्छत् स पिशिताशनः । शरभ भी अत्यन्त प्रसन्न हो सदा प्राणियोंके वधमें तत्पर रहता था । वह मांसभोजी जीव फल - मूल खानेकी कभी इच्छा नहीं करता था ॥ १७३ ॥
ततो रुधिरतर्षेण बलिना शरभोऽन्वितः ॥ १८ ॥
इयेष तं मुनिं हन्तुमकृतज्ञः श्वयोनिजः । तदनन्तर एक दिन रक्तकी प्रबल प्याससे पीड़ित वह शरभ, जो कुत्तेकी जातिसे पैदा होनेके कारण कृतघ्न बन गया था, मुनिको ही मार डालनेकी इच्छा करने लगा ॥ १८६३ ॥
( चिन्तयामास च तदा शरभः श्वानपूर्वकः ।
अस्य प्रभावात् सम्प्राप्तो वाङ्मात्रेण तु केवलम् ॥
शरभत्वं सुदुष्प्रापं सर्वभूतभयङ्करम् । उस पहलेके कुत्ते और वर्तमानकालके शरभने सोचा कि इन महर्षिके प्रभावसे —इनके वाणीद्वारा केवल कह देनेमात्रसे मैंने परम दुर्लभ शरभका शरीर पा लिया, जो समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर है ॥ अन्येऽप्यत्र भयत्रस्ताः सन्ति हस्तिभयार्दिताः ॥
मुनिमाश्रित्य जीवन्तो मृगाः पक्षिगणास्तथा ।
तेषामपि कदाचिच्च शरभत्वं प्रयच्छति ॥
सर्वसत्त्वोत्तमं लोके बलं यत्र प्रतिष्ठितम् ।
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इन मुनीश्वरकी शरण लेकर जीवन धारण करनेवाले दूसरे भी बहुत - से मृग और पक्षी हैं, जो हाथी तथा दूसरे भयानक जन्तुओंसे भयभीत रहते हैं। सम्भव है, ये उन्हें भी कदाचित् शरभका शरीर प्रदान कर दें, जहाँ संसारके सभी प्राणियोंसे श्रेष्ठ बल प्रतिष्ठित है ॥ पक्षिणामप्ययं दद्यात् कदाचिद् गारुडं बलम् ॥
यावदन्यस्य सम्प्रीतः कारुण्यं च समाश्रितः ।
न ददाति बलं तुष्टः सत्त्वस्यान्यस्य कस्यचित् ॥
तावदेनमहं विप्रं वधिष्यामि च शीघ्रतः । स्थातुं मया शक्यमिह मुनिघातान्न संशयः ॥ ) ये चाहें तो कभी पक्षियोंको भी गरुड़का बल दे सकते हैं । अतः दयाके वशीभूत हो जबतक किसी दूसरे जीवपर संतुष्ट या प्रसन्न हो ये उसे ऐसा ही बल नहीं दे देते, तबतक ही इन ब्रह्मर्षिका मैं शीघ्र वध कर डालूँगा । मुनिका वध हो जानेके पश्चात् मैं यहाँ बेखटके रह सकूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ततस्तेन तपःशक्त्या विदितो ज्ञानचक्षुषा ॥ १ ९ ॥ विज्ञाय स महाप्राज्ञो मुनिः श्वानं तमुक्तवान् । ज्ञाननेत्रोंसे युक्त उन मुनीश्वरने अपनी तपः शक्तिसे शरभके उस मनोभावको जान लिया । जानकर उन महाज्ञानी मुनिने उस कुत्तेसे कहा— ॥ १ ९ ३ ॥ श्वा त्वं द्वीपित्वमापन्नो द्वीपीव्याघ्रत्वमागतः ॥ २० ॥
व्याघ्रान्नागो मदपटुर्नागः सिंहत्वमागतः ।
सिंहस्त्वं बलमापन्नो भूयः शरभतां गतः ॥ २१ ॥
' अरे! तू पहले कुत्ता था, फिर चीता बना, चीतेसे बाघकी योनिमें आया, बाघसे मदोन्मत्त हाथी हुआ, हाथीसे सिंहकी योनिमें आ गया, बलवान् सिंह रहकर फिर शरभका शरीर पा गया ॥ २०-२१ ॥ मया स्नेहपरीतेन विसृष्टो न कुलान्वयः ।
यस्मादेवमपापं मां पाप हिंसितुमिच्छसि ।
तस्मात् स्वयोनिमापन्नः श्वैव त्वं हि भविष्यसि ॥ २२ ॥
‘ यद्यपि तू नीच कुलमें पैदा हुआ था, तो भी मैंने स्नेहवश तेरा परित्याग नहीं किया । पापी! तेरे प्रति मेरे मनमें कभी पापभाव नहीं हुआ था, तो भी इस प्रकार तू मेरी हत्या करना चाहता है; अतः तू फिर अपनी पूर्वयोनिमें ही आकर कुत्ता हो जा ' ॥ २२ ॥
ततो मुनिजनद्वेष्टा दुष्टात्मा प्राकृतोऽबुधः ।
ऋषिणा शरभः शप्तस्तद्रूपं पुनराप्तवान् ॥ २३ ॥
महर्षिके इस प्रकार शाप देते ही वह मुनिजनद्रोही दुष्टात्मा नीच और मूर्ख शरभ फिर कुत्तेके रूपमें परिणत हो गया ॥ २३ ॥
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्वर्षिसंवादे सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमेंकुत्ता तथाऋ संवादविषयक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं । )
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अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ भीष्म उवाच
स श्वा प्रकृतिमापन्नः परं दैन्यमुपागतः ।
ऋषिणा हुङ्कृतः पापस्तपोवनबहिष्कृतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार अपनी योनिमें आकर वह कुत्ता अत्यन्त दीनदशाको पहुँच गया । ऋषिने हुंकार करके उस पापीको तपोवनसे बाहर निकाल दिया ॥
एवं राज्ञा मतिमता विदित्वा सत्यशौचताम् ।
आर्जवं प्रकृतिं सत्यं श्रुतं वृत्तं कुलं दमम् ॥ २ ॥
अनुक्रोशं बलं वीर्यं प्रभावं प्रश्रयं क्षमाम् ।
भृत्या ये यत्र योग्याः स्युस्तत्र स्थाप्याः सुरक्षिताः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार बुद्धिमान् राजाको चाहिये कि वह पहले अपने सेवकोंकी सच्चाई, शुद्धता, सरलता, स्वभाव, शास्त्रज्ञान, सदाचार, कुलीनता, जितेन्द्रियता, दया, बल, पराक्रम, प्रभाव, विनय तथा क्षमा आदिका पता लगाकर जो सेवक जिस कार्यके योग्य जान पड़ें, उन्हें उसीमें लगावे और उनकी रक्षाका पूरा - पूरा प्रबन्ध कर दे ॥ २-३ ॥
नापरीक्ष्य महीपालः सचिवं कर्तुमर्हति ।
अकुलीननराकीर्णो न राजा सुखमेधते ॥ ४ ॥
राजा परीक्षा लिये बिना किसीको भी अपना मन्त्री न बनावे; क्योंकि नीच कुलके मनुष्यका साथ पाकर राजाको न तो सुख मिलता है और न उसकी उन्नति ही होती है ॥ ४ ॥
कुलजः प्राकृतो राज्ञा स्वकुलीनतया सदा ।
न पापे कुरुते बुद्धिं भिद्यमानोऽप्यनागसि ॥ ५ ॥
कुलीन पुरुष यदि कभी राजाके द्वारा बिना अपराधके ही तिरस्कृत हो जाय और लोग उसे फोड़ें या उभाड़ें तो भी वह अपनी कुलीनताके कारण राजाका अनिष्ट करनेकी बात कभी मनमें नहीं लाता है ॥ ५ ॥
अकुलीनस्तु पुरुषः प्राकृतः साधुसंश्रयात् ।
दुर्लभैश्वर्यतां प्राप्तो निन्दितः शत्रुतां व्रजेत् ॥ ६ ॥
किंतु नीच कुलका मनुष्य साधुस्वभावके राजाका आश्रय पाकर यद्यपि दुर्लभ ऐश्वर्यका भोग करता है तथापि यदि राजाने एक बार भी उसकी निन्दा कर दी तो वह उसका शत्रु बन
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जाता है ॥ ६ ॥
कुलीनं शिक्षितं प्राज्ञं ज्ञानविज्ञानपारगम् ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सहिष्णुं देशजं तथा ॥ ७ ॥
कृतज्ञं बलवन्तं च क्षान्तं दान्तं जितेन्द्रियम् ।
अलुब्धं लब्धसंतुष्टं स्वामिमित्रबुभूषकम् ॥ ८ ॥
सचिवं देशकालज्ञं सत्त्वसंग्रहणे रतम् ।
सततं युक्तमनसं हितैषिणमतन्द्रितम् ॥ ९ ॥
युक्तचारं स्वविषये संधिविग्रहकोविदम् ।
राज्ञस्त्रिवर्गवेत्तारं पौरजानपदप्रियम् ॥ १० ॥
खातकव्यूहतत्त्वज्ञं बलहर्षणकोविदम् ।
इङ्गिताकारतत्त्वज्ञं यात्राज्ञानविशारदम् ॥ ११ ॥
हस्तिशिक्षासु तत्त्वज्ञमहंकारविवर्जितम् ।
प्रगल्भं दक्षिणं दान्तं बलिनं युक्तकारिणम् ॥ १२ ॥
चौक्षं चौक्षजनाकीर्ण सुमुखं सुखदर्शनम् ।
नायकं नीतिकुशलं गुणचेष्टासमन्वितम् ॥ १३ ॥
अस्तब्धं प्रश्रितं श्लक्ष्णं मृदुवादिनमेव च ।
धीरं शूरं महर्द्धि च देशकालोपपादकम् ॥ १४ ॥
अतः राजा उसीको मन्त्री बनावे, जो कुलीन, सुशिक्षित, विद्वान्, ज्ञान- विज्ञानमें पारंगत, सब शास्त्रोंका तत्त्व जाननेवाला, सहनशील, अपने देशका निवासी, कृतज्ञ, बलवान्, क्षमाशील, मनका दमन करनेवाला, जितेन्द्रिय, निर्लोभ, जो मिल जाय उसीसे संतोष करनेवाला, स्वामी और उसके मित्रकी उन्नति चाहनेवाला, देश- कालका ज्ञाता, आवश्यक वस्तुओंके संग्रहमें तत्पर, सदा मनको वशमें रखनेवाला, स्वामीका हितैषी, आलस्य-२-रहित, अपने राज्यमें गुप्तचर लगाये रखनेवाला, संधि और विग्रहके अवसरको समझनेमें कुशल, राजाके धर्म, अर्थ और कामकी उन्नतिका उपाय जाननेवाला, नगर और ग्रामवासी लोगोंका प्रिय, खाईं और सुरंग खुदवाने तथा व्यूह निर्माण करानेकी कलामें कुशल, अपनी सेनाका उत्साह बढ़ानेमें प्रवीण, शकल- सूरत और चेष्टा देखकर ही मनके यथार्थ भावको समझ लेनेवाला, शत्रुओंपर चढ़ाई करनेके अवसरको समझनेमें विशेष चतुर, हाथीकी शिक्षाके यथार्थ तत्त्वको जाननेवाला, अहंकाररहित, निर्भीक, उदार, संयमी, बलवान्, उचित कार्य करनेवाला, शुद्ध, शुद्ध पुरुषोंसे युक्त, प्रसन्नमुख, प्रियदर्शन, नेता, नीतिकुशल, श्रेष्ठ गुण और उत्तम चेष्टाओंसे सम्पन्न उद्दण्डतारहित, विनयशील, स्नेही, मृदुभाषी, धीर, शूरवीर, महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न तथा देश और कालके अनुसार कार्य करनेवाला हो ॥ ७–१४ ॥ सचिवं यः प्रकुरुते न चैनमवमन्यते ।
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तस्य विस्तीर्यते राज्यं ज्योत्स्ना ग्रहपतेरिव ॥ १५ ॥
जो राजा ऐसे योग्य पुरुषको सचिव ( मन्त्री ) बनाता है और उसका कभी अनादर नहीं करता है, उसका राज्य चन्द्रमाकी चाँदनीके समान चारों ओर फैल जाता है ॥ १५ ॥
एतैरेव गुणैर्युक्तो राजा शास्त्रविशारदः ।
एष्टव्यो धर्मपरमः प्रजापालनतत्परः ॥ १६ ॥
राजाको भी ऐसे ही गुणोंसे युक्त होना चाहिये। साथ ही उसमें शास्त्रज्ञान, धर्मपरायणता तथा प्रजापालनकी लगन भी होनी चाहिये; ऐसा ही राजा प्रजाजनोंके लिये वांछनीय होता है ॥ १६ ॥
धीरो मर्षी शुचिस्तीक्ष्णः काले पुरुषकारवित् ।
शुश्रूषुः श्रुतवान् श्रोता ऊहापोहविशारदः ॥ १७ ॥
राजा धीर, क्षमाशील, पवित्र, समय- समयपर तीक्ष्ण, पुरुषार्थको जाननेवाला, सुननेके लिये उत्सुक, वेदज्ञ, श्रवणपरायण तथा तर्क - वितर्कमें कुशल हो ॥ १७ ॥
मेधावी धारणायुक्तो यथान्यायोपपादकः ।
दान्तः सदा प्रियाभाषी क्षमावांश्च विपर्यये ॥ १८ ॥
मेधावी, धारणाशक्तिसे सम्पन्न, यथोचित कार्य करनेवाला, इन्द्रियसंयमी, प्रिय वचन बोलनेवाला, तथा शत्रुको भी क्षमा प्रदान करनेवाला हो ॥ १८ ॥
दानाच्छेदे स्वयंकारी श्रद्धालुः सुखदर्शनः ।
आर्तहस्तप्रदो नित्यमाप्तामात्यो नये रतः ॥ १ ९ ॥
राजाको दानकी परम्पराका कभी उच्छेद न करनेवाला, श्रद्धालु, दर्शनमात्रसे सुख देनेवाला, दीन-दुःखियोंको सदा हाथका सहारा देनेवाला, विश्वसनीय मन्त्रियोंसे युक्त तथा नीतिपरायण होना चाहिये ॥ १ ९ ॥
नाहंवादी न निर्द्वन्द्वो न यत्किंचनकारकः ।
कृते कर्मण्यमात्यानां कर्ता भृत्यजनप्रियः ॥ २० ॥
वह अहंकार छोड़ दे, द्वन्द्वोंसे प्रभावित न हो, जो ही मनमें आवे वही न करने लगे, मन्त्रियोंके किये हुए कर्मका अनुमोदन करे और सेवकोंपर प्रेम रखे ॥ २० ॥
संगृहीतजनोऽस्तब्धः प्रसन्नवदनः सदा ।
सदा भृत्यजनापेक्षी न क्रोधी सुमहामनाः ॥ २१ ॥
अच्छे मनुष्योंका संग्रह करे, जडताको त्याग दे, सदा प्रसन्नमुख रहे, सेवकोंका सदा ख्याल रखे, किसीपर क्रोध न करे, अपना हृदय विशाल बनाये रखे ॥ २१ ॥
युक्तदण्डो न निर्दण्डो धर्मकार्यानुशासनः ।
चारनेत्रः प्रजावेक्षी धर्मार्थकुशलः सदा ॥ २२ ॥
न्यायोचित दण्ड दे, दण्डका कभी त्याग न करे, धर्मकार्यका उपदेश दे, गुप्तचररूपी नेत्रोंद्वारा राज्यकी देखभाल करे, प्रजापर कृपादृष्टि रखे तथा सदा ही धर्म और अर्थके
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उपार्जनमें कुशलतापूर्वक लगा रहे ॥ २२ ॥
राजा गुणशताकीर्ण एष्टव्यस्तादृशो भवेत् ।
योधाश्चैव मनुष्येन्द्र सर्वे गुणगणैर्वृताः ॥ २३ ॥
अन्वेष्टव्याः सुपुरुषाः सहाया राज्यधारणे ।
न विमानयितव्यास्ते राज्ञा वृद्धिमभीप्सता ॥ २४ ॥
ऐसे सैकड़ों गुणोंसे सम्पन्न राजा ही प्रजाके लिये वांछनीय होता है । नरेन्द्र! राज्यकी रक्षामें सहायता देनेवाले समस्त सैनिक भी इसी प्रकार श्रेष्ठ गुण- समूहोंसे सम्पन्न होने चाहिये, इस कार्यके लिये अच्छे पुरुषोंकी ही खोज करनी चाहिये तथा अपनी उन्नतिकी इच्छा रखनेवाले राजाको कभी अपने सैनिकोंका अपमान नहीं करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥
योधाः समरशौटीराः कृतज्ञाः शस्त्रकोविदाः ।
धर्मशास्त्रसमायुक्ताः पदातिजनसंवृताः ॥ २५ ॥
अभया गजपृष्ठस्था रथचर्याविशारदाः ।
इष्वस्त्रकुशला यस्य तस्येयं नृपतेर्मही ॥ २६ ॥
जिसके योद्धा युद्धमें वीरता दिखानेवाले, कृतज्ञ, शस्त्र चलानेकी कलामें कुशल, धर्मशास्त्रके ज्ञानसे सम्पन्न, पैदल सैनिकोंसे घिरे हुए, निर्भय, हाथीकी पीठपर बैठकर युद्ध करनेमें समर्थ, रथचर्यामें निपुण तथा धनुर्विद्यामें प्रवीण होते हैं, उसी राजाके अधीन इस भूमण्डलका राज्य होता है ॥ २५-२६ ॥
(ज्ञातीनामनवज्ञानं भृत्येष्वशठता सदा ।
नैपुण्यं चार्थचर्यासु यस्यैते तस्य सा मही ॥
जो जातिभाइयोंका अपमान तथा सेवकोंके प्रति शठता कभी नहीं करता और कार्यसाधनमें कुशल है, उसी राजाके अधिकारमें यह पृथ्वी रहती है ॥
आलस्यं चैव निद्रा च व्यसनान्यतिहास्यता ।
यस्यैतानि न विद्यान्ते तस्यैव सुचिरं मही ॥
जिस राजामें आलस्य, निद्रा, दुर्व्यसन तथा अत्यन्त हास्यप्रियता – ये दुर्गुण नहीं हैं, उसीके अधिकारमें यह पृथ्वी दीर्घकालतक रहती है ॥
वृद्धसेवी महोत्साहो वर्णानां चैव रक्षिता ।
धर्मचर्याः सदा यस्य तस्येयं सुचिरं मही ॥
जो बड़े- बूढ़ोंको सेवा करनेवाला, महान् उत्साही, चारों वर्णोंका रक्षक तथा सदा धर्माचरणमें तत्पर रहता है, उसीके पास यह पृथ्वी चिरकालतक स्थिर रहती है ॥
नीतिमार्गानुसरणं नित्यमुत्थानमेव च ।
रिपूणामनवज्ञानं तस्येयं सुचिरं मही ॥
जो राजा नीतिमार्गका अनुसरण करता, सदा ही उद्योगमें तत्पर रहता और शत्रुओंकी अवहेलना नहीं करता, उसके अधिकारमें दीर्घकालतक इस पृथ्वीका राज्य बना रहता है ॥
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उत्थानं चैव दैवं च तयोर्नानात्वमेव च ।
मनुना वर्णितं पूर्वं वक्ष्ये शृणु तदेव हि ॥
पूर्वकालमें मनुजीने पुरुषार्थ, दैव तथा उन दोनोंके अनेक भेदोंका वर्णन किया था । वह बताता हूँ, सुनो ॥
उत्थानं हि नरेन्द्राणां बृहस्पतिरभाषत ।
नयानयविधानज्ञः सदा भव कुरूद्वह ॥
कुरुश्रेष्ठ! बृहस्पतिजीने नरेशोंके लिये सदा ही उद्योगशील बने रहनेका उपदेश दिया है । तुम सदा नीति और अनीतिके विधानको जानो ॥ दुर्हृदां छिद्रदर्शी यः सुहृदामुपकारवान् । विशेषविच्च भृत्यानां स राज्यफलमश्नुते ॥ ) जो शत्रुओंके छिद्र देखे, सुहृदोंका उपकार करे और सेवकोंकी विशेषताको समझे, वह राज्यके फलका भागी होता है ॥
सर्वसंग्रहणे युक्तो नृपो भवति यः सदा ।
उत्थानशीलो मित्राढ्यः स राजा राजसत्तमः ॥ २७ ॥
जो राजा सदा सबके संग्रहमें संलग्न, उद्योगशील और मित्रोंसे सम्पन्न होता है, वही सब राजाओंमें श्रेष्ठ है ॥
शक्या चाश्वसहस्रेण वीरारोहेण भारत ।
संगृहीतमनुष्येण कृत्स्ना जेतुं वसुन्धरा ॥ २८ ॥
भारत! जो उपर्युक्त मनुष्योंका संग्रह करता है, वह केवल एक सहस्र अश्वारोही वीरोंके द्वारा सारी पृथ्वीको जीत सकता है ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्वर्षिसंवादे अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कुत्ता औरऋषिका संवादविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल ३५ श्लोक हैं । )