05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 761–770
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770
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परोक्षमें परनिन्दा करनेवाला मनुष्य सैकड़ों मनुष्योंको जो कुछ दान देता है और होम करता है, उन सब अपने कर्मोंको तत्काल नष्ट कर देता है ॥ १३
तस्मात् प्राज्ञो नरः सद्यस्तादृशं पापचेतसम् ।
वर्जयेत् साधुभिर्वर्ज्यं सारमेयामिषं यथा ॥ १४ ॥
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह वैसे पापपूर्ण विचारवाले पुरुषको तत्काल त्याग दे । वह कुत्तेके मांसके समान साधु पुरुषोंके लिये सदा ही त्याज्य है ॥
परिवादं ब्रुवाणो हि दुरात्मा वै महाजने ।
प्रकाशयति दोषांस्तु सर्पः फणमिवोच्छ्रितम् ॥ १५ ॥
जैसे साँप अपने फनको ऊँचा उठाकर प्रकाशित करता है, उसी प्रकार जनसमुदायमें किसी महापुरुषकी निन्दा करनेवाला दुरात्मा अपने ही दोषोंको प्रकट करता है ॥
तं स्वकर्माणि कुर्वाणं प्रतिकर्तुं य इच्छति ।
भस्मकूट इवाबुद्धिः खरो रजसि सज्जति ॥ १६ ॥
जो परनिन्दारूप अपना कार्य करनेवाले दुष्ट पुरुषसे बदला लेना चाहता है, वह राखमें लोटनेवाले मूर्ख गदहेके सामन केवल दुःखमें निमग्न होता है ॥ १६ ॥
मनुष्यशालावृकमप्रशान्तं जनापवादे सततं निविष्टम् । मातङ्गमुन्मत्तमिवोन्नदन्तं त्यजेत तं श्वानमिवातिरौद्रम् ॥ १७ ॥
जो सदा लोगोंकी निन्दामें ही तत्पर रहता है, वह मनुष्यके शरीररूप घरमें रहनेवाला भेड़िया है । वह सदा अशान्त बना रहता है । मतवाले हाथीके समान चीत्कार करता है और अत्यन्त भंयकर कुत्तेके समान काटनेको दौड़ता है । श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि उसे सदाके लिये त्याग दे ॥ १७ ॥
अधीरजुष्टे पथि वर्तमानं दमादपेतं विनयाच्च पापम् । अरिव्रतं नित्यमभूतिकामं धिगस्तु तं पापमतिं मनुष्यम् ॥ १८ ॥
वह मूर्खोद्वारा सेवित पथपर चलनेवाला है । इन्द्रिय- संयम और विनयसे कोसों दूर है । उसने शत्रुताका व्रत ले रखा है । वह सदा सबकी अवनति चाहता है । उस पापात्मा एवं पापबुद्धि मनुष्यको धिक्कार है ॥ १८ ॥
प्रत्युच्यमानस्त्वभिभूय एभि- र्निशाम्य मा भूस्त्वमथार्तरूपः । उच्चस्य नीचेन हि सम्प्रयोगं विगर्हयन्ति स्थिरबुद्धयो ये ॥ १ ९ ॥
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यदि ऐसे दुष्ट मनुष्य किसीपर आक्रमण करके उसकी निन्दा करने लगें और उसे सुनकर भला मनुष्य उसका उत्तर देनेके लिये उद्यत हो तो उसे रोककर कहे कि तुम दुखी न होओ; क्योंकि स्थिर बुद्धिवाले मनुष्य उच्च पुरुषका नीचके साथ होनेवाले संयोगकी अर्थात् बराबरीकी निन्दा करते हैं ॥ १ ९ ॥ क्रुद्धो दशार्धेन हि ताडयेद् वा स पांसुभिर्वा विकिरेत् तुषैर्वा । विवृत्य दन्तांश्च विभीषयेद् वा सिद्धं हि मूढे कुपिते नृशंसे ॥ २० ॥
यदि क्रूर स्वभावका मूर्ख मनुष्य कुपित हो जाय तो वह थप्पड़ मार सकता है, मुँहपर धूल अथवा भूसी झोंक सकता है और दाँत निकालकर डरा सकता है । उसके द्वारा सारी कुचेष्टाएँ सम्भव हैं ॥ २० ॥
विगर्हणां परमदुरात्मना कृतां सहेत यः संसदि दुर्जनान्नरः । पठेदिदं चापि निदर्शनं सदा न वाङ्मयं स लभति किंचिदप्रियम् ॥ २१ ॥
जो इस दृष्टान्तको सदा पढ़ता या सुनता रहता है और जो मनुष्य सभामें किसी अत्यन्त दुष्टात्माद्वारा की हुई निन्दाको सह लेता है, वह दुर्जन मनुष्यसे कभी वाणीद्वारा होनेवाले निन्दाजनित किंचिन्मात्र दुःखका भी भागी नहीं होता ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि टिट्टिभकं नाम चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ११४ ॥
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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः राजा तथा राजसेवकोंके आवश्यक गुण युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ संशयो मे महानयम् ।
संछेत्तव्यस्त्वया राजन् भवान् कुलकरो हि नः ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले – ' परमबुद्धिमान् पितामह! मेरे मनमें यह एक महान् संशय बना हुआ है । राजन्! आप मेरे उस संदेहका निवारण करें; क्योंकि आप हमारे वंशके प्रवर्तक हैं ॥ १ ॥
पुरुषाणामयं तात दुर्वृत्तानां दुरात्मनाम् ।
कथितो वाक्यसंचारस्ततो विज्ञापयामि ते ॥ २ ॥
तात! आपने दुरात्मा और दुराचारी पुरुषोंके बोलचालकी चर्चा की है; इसीलिये मैं आपसे कुछ निवेदन कर रहा हूँ ॥ २ ॥
यद्धितं राज्यतन्त्रस्य कुलस्य च सुखोदयम् ।
आयत्यां च तदात्वे च क्षेमवृद्धिकरं च यत् ॥ ३ ॥
पुत्रपौत्राभिरामं च राष्ट्रवृद्धिकरं च यत् ।
अन्नपाने शरीरे च हितं यत्तद् ब्रवीहि मे ॥ ४ ॥
आप मुझे ऐसा कोई उपाय बताइये जो हमारे इस राज्यतन्त्रके लिये हितकारक, कुलके लिये सुखदायक, वर्तमान और भविष्यमें भी कल्याणकी वृद्धि करनेवाला, पुत्र और पौत्रोंकी परम्पराके लिये हितकर, राष्ट्रकी उन्नति करनेवाला तथा अन्न, जल और शरीरके लिये भी लाभकारी हो ॥ ३-४ ॥
अभिषिक्तो हि यो राजा राष्ट्रस्थो मित्रसंवृतः ।
ससुहृत्समुपेतो वा स कथं रञ्जयेत् प्रजाः ॥ ५ ॥
जो राजा अपने राज्यपर अभिषिक्त हो देशमें मित्रोंसे घिरा हुआ रहता है, तथा जो हितैषी सुहृदोंसे भी सम्पन्न है, वह किस प्रकार अपनी प्रजाको प्रसन्न रखे? ॥ ५ ॥
यो ह्यसत्प्रग्रहरतिः स्नेहरागबलात्कृतः ।
इन्द्रियाणामनीशत्वादसज्जनबुभूषकः ॥ ६ ॥
तस्य भृत्या विगुणतां यान्ति सर्वे कुलोद्गताः ।
न च भृत्यफलैरर्थैः स राजा सम्प्रयुज्यते ॥ ७ ॥
जो असद् वस्तुओंके संग्रहमें अनुरक्त है, स्नेह और रागके वशीभूत हो गया है और इन्द्रियोंपर वश न चलनेके कारण सज्जन बननेकी चेष्टा नहीं करता, उस राजाके उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए समस्त सेवक भी विपरीत गुणवाले हो जाते हैं । ऐसी दशामें सेवकोंके
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रखनेका जो फल धनकी वृद्धि आदि है, उससे वह राजा सर्वथा वंचित रह जाता है ॥ ६-७ ॥
एतन्मे संशयस्यास्य राजधर्मान् सुदुर्विदान् ।
बृहस्पतिसमो बुद्धया भवान् शंसितुगर्हति ॥ ८ ॥
मेरे इस संशयका निवारण करके आप दुर्बोध राजधर्मोंका वर्णन कीजिये; क्योंकि आप बुद्धिमें साक्षात् बृहस्पतिके समान हैं ॥ ८ ॥
शंसिता पुरुषव्याघ्र त्वन्नः कुलहिते रतः ।
क्षत्ता चैको महाप्राज्ञो यो नः शंसति सर्वदा ॥ ९ ॥
पुरुषसिंह! हमारे कुलके हितमें तत्पर रहनेवाले आप ही हमें ऐसा उपदेश दे सकते हैं । दूसरे हमारे हितैषी महाज्ञानी विदुरजी हैं, जो हमें सर्वदा सदुपदेश दिया करते हैं ॥ ९ ॥
त्वत्तः कुलहितं वाक्यं श्रुत्वा राज्यहितोदयम् ।
अमृतस्याव्ययस्येव तृप्तः स्वप्स्याम्यहं सुखम् ॥ १० ॥
आपके मुखसे कुलके लिये हितकारी तथा राज्यके लिये कल्याणकारी उपदेश सुनकर मैं अक्षय अमृतसे तृप्त होनेके समान सुखसे सोऊँगा ॥ १० ॥
कीदृशाः संनिकर्षस्था भृत्याः सर्वगुणान्विताः ।
कीदृशैः किं कुलीनैर्वा सह यात्रा विधीयते ॥ ११ ॥
कैसे सर्वगुणसम्पन्न सेवक राजाके निकट रहने चाहिये और किस कुलमें उत्पन्न हुए कैसे सैनिकोंके साथ राजाको युद्धकी यात्रा करनी चाहिये? ॥ ११ ॥
न ह्येको भृत्यरहितो राजा भवति रक्षिता ।
राज्यं चेदं जनः सर्वस्तत्कुलीनोऽभिकांक्षति ॥ १२ ॥
सेवकोंके बिना अकेला राजा राज्यकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि उत्तम कुलमें उत्पन्न सभी लोग इस राज्यकी अभिलाषा करते हैं ॥ १२ ॥
भीष्म उवाच
न च प्रशास्तुं राज्यं हि शक्यमेकेन भारत ।
असहायवता तात नैवार्थाः केचिदप्युत ॥ १३ ॥
लब्धुं लब्धा ह्यपि सदा रक्षितुं भरतर्षभ ।
यस्य भृत्यजनः सर्वो ज्ञानविज्ञानकोविदः ॥ १४ ॥
हितैषी कुलजः स्निग्धः स राज्यफलमश्नुते ॥ १५ ॥
भीष्मजीने कहा – तात भरतनन्दन! कोई भी सहायकोंके बिना अकेले राज्य नहीं चला सकता । राज्य ही क्या? सहायकोंके बिना किसी भी अर्थकी प्राप्ति नहीं होती । यदि प्राप्ति हो भी गयी तो सदा उसकी रक्षा असम्भव हो जाती है ( अतः सेवकों या सहायकोंका
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होना आवश्यक है ) । जिसके सभी सेवक ज्ञान - विज्ञानमें कुशल, हितैषी, कुलीन और स्नेही हों, वही राजा राज्यका फल भोग सकता है ॥ १३–१५ ॥
मन्त्रिणो यस्य कुलजा असंहार्याः सहोषिताः ।
नृपतेर्मतिदाः सन्तः सम्बन्धज्ञानकोविदाः ॥ १६ ॥
अनागतविधातारः कालज्ञानविशारदाः ।
अतिक्रान्तमशोचन्तः स राज्यफलमश्नुते ॥ १७ ॥
जिसके मन्त्री कुलीन, धनके लोभसे फोड़े न जा सकनेवाले, सदा राजाके साथ रहनेवाले, उन्हें अच्छी बुद्धि देनेवाले, सत्पुरुष, सम्बन्ध- ज्ञानकुशल, भविष्यका भलीभाँति प्रबन्ध करनेवाले, समयके ज्ञानमें निपुण तथा बीती हुई बातके लिये शोक न करनेवाले हों, वही राजा राज्यके फलका भागी होता है ॥ १६-१७ ॥
समदुःखसुखा यस्य सहायाः प्रियकारिणः ।
अर्थचिन्तापराः सत्याः स राज्यफलमश्नुते ॥ १८ ॥
जिसके सहायक राजाके सुखमें सुख और दुःखमें दुःख मानते हों, सदा उसका प्रिय करनेवाले हों और राजकीय धन कैसे बढ़े - इसकी चिन्तामें तत्पर तथा सत्यवादी हों, वह राजा राज्यका फल पाता है ॥ १८ ॥
यस्य नार्तो जनपदः संनिकर्षगतः सदा ।
अक्षुद्रः सत्यथालम्बी स राजा राज्यभाग्भवेत् ॥ १ ९ ॥
जिसका देश दुखी न हो तथा सदा समीपवर्ती बना रहे, जो स्वयं भी छोटे विचारका न होकर सदा सन्मार्गका अवलम्बन करनेवाला हो, वही राजा राज्यका भागी होता है ॥ १ ९ ॥
कोशाख्यपटलं यस्य कोशवृद्धिकरैर्नरैः ।
आप्तैस्तुष्टैश्च सततं चीयते स नृपोत्तमः ॥ २० ॥
विश्वासपात्र, संतोषी तथा खजाना बढ़ानेका सतत प्रयत्न करनेवाले, खजांचियोंके द्वारा जिसके कोषकी सदा वृद्धि हो रही हो, वही राजाओंमें श्रेष्ठ है ॥ २० ॥
कोष्ठागारमसंहार्यैराप्तैः संचयतत्परैः ।
पात्रभूतैरलुब्धैश्च पाल्यमानं गुणी भवेत् ॥ २१ ॥
यदि लोभवश फूट न सकनेवाले, विश्वासपात्र, संग्रही सुपात्र एवं निर्लोभ मनुष्य अन्नादि भण्डारकी रक्षामें तत्पर हों तो उसकी विशेष उन्नति होती है ॥ २१ ॥
व्यवहारश्च नगरे यस्य कर्मफलोदयः ।
दृश्यते शंखलिखितः स धर्मफलभाङ् नृपः ॥ २२ ॥
जिसके नगरमें कर्मके अनुसार फलकी प्राप्तिका प्रतिपादन करनेवाले शंख - लिखित मुनिके बनाये हुए न्याय- व्यवहारका पालन होता देखा जाता है, वह राजा धर्मके फलका भागी होता है ॥ २२ ॥
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संगृहीतमनुष्यश्च यो राजा राजधर्मवित् ।
षड्वर्ग प्रतिगृह्णाति स धर्मफलमश्नुते ॥ २३ ॥
जो राजा राजधर्मको जानता और अपने यहाँ अच्छे लोगोंको जुटाकर रखता है तथा अवसरके अनुसार संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव एवं समाश्रय नामक छः गुणोंका उपयोग करता है, वह धर्मके फलका भागी होता है ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें एक सौ पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११५ ॥
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षोडशाधिकशततमोऽध्यायः सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा युधिष्ठिर उवाच (न सन्ति कुलजा यत्र सहायाः पार्थिवस्य तु । अकुलीनाश्च कर्तव्या न वा भरतसत्तम ॥ ) युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! जहाँ राजाके पास अच्छे कुलमें उत्पन्न सहायक नहीं हैं, वहाँ वह नीच कुलके मनुष्योंको सहायक बना सकता है या नहीं? ॥ भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
निदर्शनं परं लोके सज्जानाचरिते सदा ॥ १ ॥
भीष्मजी ने कहा - युधिष्ठिर! इस विषय में जानकार लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जो लोकमें सत्पुरुषोंके आचरणके सम्बन्धमें सदा उत्तम आदर्श माना जाता है ॥ १ ॥
अस्यैवार्थस्य सदृशं यच्छ्रुतं मे तपोवने ।
जामदग्न्यस्य रामस्य यदुक्तमृषिसत्तमैः ॥ २ ॥
मैंने तपोवनमें इस विषयके अनुरूप बातें सुनी हैं, जिन्हें श्रेष्ठ महर्षियोंने जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे कहा था ॥ २ ॥
वने महति कस्मिंश्चिदमनुष्यनिषेविते ।
ऋषिर्मूलफलाहारो नियतो नियतेन्द्रियः ॥ ३ ॥
किसी महान् निर्जन वनमें फल- मूलका आहार करके रहनेवाले एक नियमपरायण जितेन्द्रिय महर्षि रहते थे ॥ ३ ॥
दीक्षादमपरः शान्तः स्वाध्यायपरमः शुचिः ।
उपवासविशुद्धात्मा सततं सत्त्वमास्थितः ॥ ४ ॥
वे उत्तम व्रतकी दीक्षा लेकर इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह करते हुए प्रतिदिन पवित्रभावसे वेद - शास्त्रोंके स्वाध्यायमें लगे रहते थे । उपवाससे उनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया था । वे सदा सत्त्वगुणमें स्थित थे ॥ ४ ॥
तस्य संदृश्य सद्भावमुपविष्टस्य धीमतः ।
सर्वे सत्त्वाः समीपस्था भवन्ति वनचारिणः ॥ ५ ॥
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एक जगह बैठे हुए उन बुद्धिमान् महर्षिके सद्भावको देखकर सभी वनचारी जीव-जन्तु उनके निकट आया करते थे ॥ ५ ॥
सिंहव्याघ्रगणाः क्रूरा मत्ताश्चैव महागजाः ।
द्वीपिनः खड्गभल्लूका ये चान्ये भीमदर्शनाः ॥ ६ ॥
क्रूर स्वभाववाले सिंह और व्याघ्र, बड़े - बड़े मतवाले हाथी, चीते, गैंड़े, भालू तथा और भी जो भयानक दिखायी देनेवाले जानवर थे, वे सब उनके पास आते थे ॥ ६ ॥
ते सुखप्रश्नदाः सर्वे भवन्ति क्षतजाशनाः ।
तस्यर्षेः शिष्यवच्चैव न्यग्भूताः प्रियकारिणः ॥ ७ ॥
यद्यपि वे सारे - के - सारे मांसाहारी हिंसक जानवर थे, तो भी उस ऋषिके शिष्यकी भाँति नीचे सिर किये उनके पास बैठते थे, उनके सुख और स्वास्थ्यकी बात पूछते थे और सदा उनका प्रिय करते थे ॥ ७ ॥
दत्त्वा च ते सुखप्रश्नं सर्वे यान्ति यथागतम् ।
ग्राम्यस्त्वेकः पशूस्तत्रनाजहात् स महामुनिम् ॥ ८ ॥
वे सब जानवर ऋषिसे उनका कुशल- समाचार पूछकर जैसे आते, वैसे लौट जाते थे; परंतु एक ग्रामीण कुत्ता वहाँ उन महामुनिको छोड़कर कहीं नहीं जाता था ॥ ८ ॥
भक्तोऽनुरक्तः सततमुपवासकृशोऽबलः ।
फलमूलोदकाहारः शान्तः शिष्टाकृतिर्यथा ॥ ९ ॥
वह उन महामुनिका भक्त और उनमें अनुरक्त था; उपवास करनेके कारण दुर्बल एवं निर्बल हो गया था । वह भी फल- मूल और जलका आहार करके रहता, मनको वशमें रखता और साधु - पुरुषोंके समान जीवन बिताता था ॥ ९ ॥
तस्यर्षेरुपविष्टस्य पादमूले महामते ।
मनुष्यवद्गतो भावो स्नेहबद्धोऽभवद् भृशम् ॥ १० ॥
महामते! उन महर्षिके चरणप्रान्तमें बैठे हुए उस कुत्तेके मनमें मनुष्यके समान भाव ( स्नेह ) हो गया । वह उनके प्रति अत्यन्त स्नेहसे बँध गया ॥ १० ॥
ततोऽभ्ययान्महावीर्यो द्वीपी क्षतजभोजनः ।
स्वार्थमत्यन्तसंतुष्टः क्रूरकाल इवान्तकः ॥ ११ ॥
तदनन्तर एक दिन कोई महाबली रक्तभोजी चीता अत्यन्त प्रसन्न होकर उस कुत्तेको पकड़नेके लिये क्रूर काल एवं यमराजके समान उधर आ निकला ॥ ११ ॥
लेलिह्यमानस्तृषितः पुच्छास्फोटनतत्परः ।
व्यादितास्यः क्षुधाभुग्नः प्रार्थयानस्तदामिषम् ॥ १२ ॥
वह बारंबार अपने दोनों जबड़े चाटता और पूँछ फटकारता था, उसे प्यास सता रही थी । उसने मुँह फैला रखा था । भूखसे उसकी व्याकुलता बढ़ गयी थी और वह उस कुत्तेका मांस प्राप्त करना चाहता था ॥
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दृष्ट्वा तं क्रूरमायान्तं जीवितार्थी नराधिप ।
प्रोवाच इवा मुनिं तत्र तच्छृणुष्व विशाम्पते ॥ १३ ॥
प्रजानाथ! नरेश्वर! उस क्रूर चीतेको आते देख अपनी प्राणरक्षा चाहते हुए वहाँ कुत्तेने मुनिसे जो कुछ कहा, वह सुनो— ॥ १३ ॥
श्वशत्रुर्भगवन्नेष द्वीपी मां हन्तुमिच्छति ।
त्वत्प्रसादाद् भयं न स्यादस्मान्मम महामुने ॥ १४ ॥
तथा कुरु महाबाहो सर्वज्ञस्त्वं न संशयः । ' भगवन्! यह चीता कुत्तोंका शत्रु है और मुझे मार डालना चाहता है । महामुने! महाबाहो! आप ऐसा करें, जिससे आपकी कृपासे मुझे इस चीतेसे भय न हो । आप सर्वज्ञ हैं, इसमें संशय नहीं है । ( अतः मेरी प्रार्थना सुनकर उसको अवश्य पूर्ण करें ) ' ॥ १४३ ॥
स मुनिस्तस्य विज्ञाय भावज्ञो भयकारणम् ।
रुतज्ञः सर्वसत्त्वानां तमैश्वर्यसमन्वितः ॥ १५ ॥
वे सिद्धिके ऐश्वर्यसे सम्पन्न मुनि सबके मनोभावको जाननेवाले और समस्त प्राणियोंकी बोली समझनेवाले थे । उन्होंने उस कुत्तेके भयका कारण जानकर उससे कहा ॥ १५ ॥
मुनिरुवाच
न भयं द्वीपिनः कार्यं मृत्युतस्ते कथंचन ।
एष श्वरूपरहितो द्वीपी भवसि पुत्रक ॥ १६ ॥
मुनिने कहा- बेटा! अपने लिये मृत्युस्वरूप इस चीतेसे तुम्हें किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिये । यह लो, तुम अभी कुत्तेके रूपसे रहित चीता हुए जाते हो ॥ १६ ॥
ततः श्वा द्वीपितां नीतो जाम्बूनदनिभाकृतिः ।
चित्राङ्गो विस्फुरद्दंष्ट्रो वने वसति निर्भयः ॥ १७ ॥
तदनन्तर मुनिने कुत्तेको चीता बना दिया। उसकी आकृति सुवर्णके समान चमकने लगी। उसका सारा शरीर चितकबरा हो गया और बड़ी - बड़ी दाढ़ें चमक उठीं । अब वह निर्भय होकर वनमें रहने लगा ॥ १७ ॥
तं दृष्ट्वा सम्मुखे द्वीपी आत्मनः सदृशं पशुम् ।
अविरुद्धस्ततस्तस्य क्षणेन समपद्यत ॥ १८ ॥
चीतेने अपने सामने जब अपने ही समान एक पशुको देखा, तब उसका विरोधी भाव क्षणभरमें दूर हो गया ॥ १८ ॥
ततोऽभ्ययान्महारौद्रो व्यादितास्यः क्षुधान्वितः ।
द्वीपिनं लेलिहद्वक्रो व्याघ्रो रुधिरलालसः ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर एक दिन एक महाभयंकर भूखे बाघने उसका रक्त पीनेकी इच्छासे मुँह फैलाकर दोनों जबड़ोंको चाटते हुए उस चीतेका पीछा किया ॥ १ ९ ॥
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व्याघ्रं दृष्ट्वा क्षुधा भुग्नं दंष्ट्रिणं वनगोचरम् ।
द्वीप जीवितरक्षार्थमृषिं शरणमेयिवान् ॥ २० ॥
बड़ी - बड़ी दाढ़ोंसे युक्त वनचारी बाघको भूखसे कुटिल भाव धारण किये देख वह चीता अपने जीवनकी रक्षाके लिये पुनः ऋषिकी शरणमें आया ॥ २० ॥
संवासजं परं स्नेहमृषिणा कुर्वता तदा ।
स द्वीपी व्याघ्रतां नीतो रिपूणां बलवत्तरः ॥ २१ ॥
तब सहवासजनित उत्तम स्नेहका निर्वाह करते हुए महर्षिने चीतेको बाघ बना दिया ।
अब वह अपने शत्रुओंके लिये अत्यन्त प्रबल हो उठा ॥ २१ ॥
ततो दृष्ट्वा स शार्दूलो नाहनत् तं विशाम्पते ।
स तु श्वा व्याघ्रतां प्राप्य बलवान् पिशिताशनः ॥ २२ ॥
प्रजानाथ! तदनन्तर वह बाघ उसे अपने समान रूपमें देखकर मार न सका । उधर वह कुत्ता बलवान् बाघ होकर मांसका आहार करने लगा ॥ २२ ॥
न मूलफलभोगेषु स्पृहामप्यकरोत् तदा ।
यथा मृगपतिर्नित्यं प्रकाङ्क्षति वनौकसः ।
तथैव स महाराज व्याघ्रः समभवत् तदा ॥ २३ ॥
महाराज! अब तो उसे फल- मूल खानेकी कभी इच्छा ही नहीं होती थी । जैसे वनराज सिंह प्रतिदिन जन्तुओंका मांस खाना चाहता है, उसी प्रकार वह बाघ भी उस समय मांसभोजी हो गया ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्वर्षिसंवादे षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कुत्ता औरऋषिका संवादविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं )