06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 11–20

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

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१४०- नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुनः प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव - पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना १४१- शिव- पार्वतीका धर्मविषयक संवाद –वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति- निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण १४२- उमा-महेश्वर- संवाद, वानप्रस्थ धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा १४३- ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन १४४- बन्धन- मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन १४५: स्वर्ग और नरक तथा उत्तम और अधम कुलमें जन्मकी प्राप्ति करानेवाले कर्मोंका वर्णन 3. राजधर्मका वर्णन २. योद्धाओंके धर्मका वर्णन तथा रणयज्ञमें प्राणोत्सर्गकी महिमा ३. संक्षेपसे राजधर्मका वर्णन ४. अहिंसाकी और इन्द्रिय- संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता ५. त्रिवर्गका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार- व्यवहारका वर्णन ६. विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन ७. अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका वर्णन ८. उमा- महेश्वर- संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन ९. प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन १०. यमलोक तथा वहाँके मार्गोंका वर्णन, पापियोंकी नरकयातनाओं तथा कर्मानुसार विभिन्न योनियोंमें उनके जन्मका उल्लेख ११. शुभाशुभ मानस आदि तीन प्रकारके कर्मोंका स्वरूप और उनके फलका एवं मद्यसेवनके दोषोंका वर्णन, आहार- शुद्धि, मांस भक्षणसे दोष, मांस न खानेसे लाभ, जीवदयाके महत्त्व, गुरुपूजाकी विधि, उपवास- विधि, ब्रह्मचर्य पालन, तीर्थचर्चा, सर्वसाधारण द्रव्यके दानसे पुण्य, अन्न, सुवर्ण, गौ, भूमि, कन्या और विद्यादानका माहात्म्य, _पुण्यतम देशकाल, दिये हुए दान और धर्मकी निष्फलता, विविध प्रकारके दान, लौकिक- वैदिक यज्ञ तथा देवताओंकी पूजाका निरूपण

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१२. श्राद्ध विधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन १३. प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य - मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य पालनपूर्वक शरीर त्यागका महान् फल और काम, क्रोध आदिद्वारा देह त्याग करनेसे नरककी प्राप्ति १४. मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्ष साधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता १५. सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन १६. योगधर्मका प्रतिपादनपूर्वक उसके फलका वर्णन १७. पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग पूजनका माहात्म्य १४६- पार्वतीजीके द्वारा स्त्री- धर्मका वर्णन १४७- वंशपरम्पराका कथन और भगवान् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन १४८- भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना १४ ९: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् १५०- जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे- शाम कीर्तन करनेयोग्य देवता, ऋषियों और राजाओंके मंगलमय नामोंका कीर्तन - माहात्म्य तथा गायत्री जपका फल १५१- ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन १५२- कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजीसे चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख १५३- वायुद्वारा उदाहरणसहित ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन १५४- ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्यके प्रभावका वर्णन १५५- ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन १५६- अत्रि और च्यवन ऋषिके प्रभावका वर्णन १५७- कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्मणोंका कपोंको भस्म कर देना, वायुदेव और कार्तवीर्य अर्जुनके संवादका उपसंहार १५८- भीष्मजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन १५ ९- श्रीकृष्णका प्रद्युम्नको ब्राह्मणोंकी महिमा बताते हुए दुर्वासाके चरित्रका वर्णन करना और यह सारा प्रसंग युधिष्ठिरको सुनाना

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१६०- श्रीकृष्णद्वारा भगवान् शंकरके माहात्म्यका वर्णन १६१- भगवान् शंकरके माहात्म्यका वर्णन १६२- धर्मके विषयमें आगम - प्रमाणकी श्रेष्ठता, धर्माधर्मके फल, साधु - असाधुके लक्षण तथा शिष्टाचारका निरूपण १६३- युधिष्ठिरका विद्या, बल और बुद्धिकी अपेक्षा भाग्यकी प्रधानता बताना और भीष्मजीद्वारा उसका उत्तर १६४- भीष्मका शुभाशुभ कर्मोंको ही सुख-दुःखकी प्राप्तिमें कारण बताते हुए धर्मके अनुष्ठानपर जोर देना १६५- नित्य स्मरणीय देवता, नदी, पर्वत, ऋषि और राजाओंके नाम- कीर्तनका माहात्म्य १६६- भीष्मकी अनुमति पाकर युधिष्ठिरका सपरिवार हस्तिनापुरको प्रस्थान ( भीष्मस्वर्गारोहणपर्व ). १६७- भीष्मके अन्त्येष्टि- संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका उनके पास जाना और भीष्मका श्रीकृष्ण आदिसे देह त्यागकी अनुमति लेते हुए धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरको कर्तव्यका उपदेश देना १६८- भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह- संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना OF FULL आश्वमेधिकपर्व (अश्वमेधपर्व) १- युधिष्ठिरका शोकमग्न होकर गिरना और धृतराष्ट्रका उन्हें समझाना २- श्रीकृष्ण और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना ३- व्यासजीका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये धनकी प्राप्तिका उपाय बताते हुए संवर्त और मरुत्तका प्रसंग उपस्थित करना ४- मरुत्तके पूर्वजोंका परिचय देते हुए व्यासजीके द्वारा उनके गुण, प्रभाव एवं यज्ञका दिग्दर्शन ५- इन्द्रकी प्रेरणासे बृहस्पतिजीका मनुष्यको यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा करना

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६- नारदजीकी आज्ञासे मरुत्तका उनकी बतायी हुई युक्तिके अनुसार संवर्तसे भेंट करना ७- संवर्त और मरुत्तकी बातचीत, मरुत्तके विशेष आग्रहपर संवर्तका यज्ञ करानेकी स्वीकृति देना ८- संवर्तका मरुत्तको सुवर्णकी प्राप्तिके लिये महादेवजीकी नाममयी स्तुतिका उपदेश और धनकी प्राप्ति तथा मरुत्तकी सम्पत्तिसे बृहस्पतिका चिन्तित होना ९- बृहस्पतिका इन्द्रसे अपनी चिन्ताका कारण बताना, इन्द्रकी आज्ञासे अग्निदेवका मरुत्तके पास उनका संदेश लेकर जाना और संवर्तके भयसे पुनः लौटकर इन्द्रसे ब्रह्मबलकी श्रेष्ठता बताना १०- इन्द्रका गन्धर्वराजको भेजकर मरुत्तको भय दिखाना और संवर्तका मन्त्र- बलसे इन्द्रसहित सब देवताओंको बुलाकर मरुत्तका यज्ञ पूर्ण करना ११- श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको इन्द्रद्वारा शरीरस्थ वृत्रासुरका संहार करनेका इतिहास सुनाकर समझाना १२- भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको मनपर विजय करनेके लिये आदेश १३- श्रीकृष्णद्वारा ममताके त्यागका महत्त्व, काम - गीताका उल्लेख और युधिष्ठिरको यज्ञके लिये प्रेरणा करना १४- ऋषियोंका अन्तर्धान होना, भीष्म आदिका श्राद्ध करके युधिष्ठिर आदिका हस्तिनापुरमें जाना तथा युधिष्ठिरके धर्म- राज्यका वर्णन १५- भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना (अनुगीतापर्व ) १६- अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, म॒हर्षि एवं काश्यपका संवाद सुनाना १७- काश्यपके प्रश्नोंके उत्तरमें सिद्ध महात्माद्वारा जीवकी विविध गतियोंका वर्णन १८- जीवके गर्भ-प्रवेश, आचार- धर्म, कर्म- फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन १९- गुरु- शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन २०- ब्राह्मणगीता —एक ब्राह्मणका अपनी पत्नीसे ज्ञानयज्ञका उपदेश करना २१- दस होताओंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञका वर्णन तथा मन और वाणीकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन २२- मन- बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन- इन्द्रिय - संवादका वर्णन २३- प्राण, अपान आदिका संवाद और ब्रह्माजीका सबकी श्रेष्ठता बतलाना २४- देवर्षि नारद और देवमतका संवाद एवं उदानके उत्कृष्ट रूपका वर्णन

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२५- चातुर्होम यज्ञका वर्णन २६- अन्तर्यामीकी प्रधानता २७- अध्यात्मविषयक महान वनका वर्णन २८- ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद २ ९- परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय- कुलका संहार ३०- अलर्कके ध्यान- योगका उदाहरण देकर पितामहोंका परशुरामजीको समझाना और परशुरामजीका तपस्याके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना ३१- राजा अम्बरीषकी गायी हुई आध्यात्मिक स्वराज्यविषयक गाथा ३२- ब्राह्मण- रूपधारी धर्म और जनकका ममत्वत्याग विषयक संवाद ३३- ब्राह्मणका पत्नीके प्रति अपने ज्ञाननिष्ठ स्वरूपका परिचय देना ३४- भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा ब्राह्मण, ब्राह्मणी और क्षेत्रज्ञका रहस्य बतलाते हुए ब्राह्मण- गीताका उपसंहार ३५- श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनसे मोक्ष- धर्मका वर्णन– गुरु और शिष्यके संवादमें ब्रह्म और महर्षियोंके प्रश्नोत्तर ३६- ब्रह्माजीके द्वारा तमोगुणका, उसके कार्यका और फलका वर्णन ३७- रजोगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल ३८- सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल ३९- सत्त्व आदि गुणोंका और प्रकृतिके नामोंका वर्णन ४०- म॒हत्तत्त्वके नाम और परमात्मतत्त्वको जाननेकी महिमा ४१- अहंकारकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका वर्णन ४२- अ॒हंकारसे पंच महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश ४३- चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता ४४- सब पदार्थोंके आदि- अन्तका और ज्ञानकी नित्यताका वर्णन ४५- देहरूपी कालचक्रका तथा गृहस्थ और ब्राह्मणके धर्मका कथन ४६- ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन ४७- मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान- खड्गसे उसे काटनेका वर्णन ४८- आत्मा और परमात्माके स्वरूपका विवेचन ४९- धर्मका निर्णय जाननेके लिये ऋषियोंका प्रश्न ५०- सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमानकी प्रशंसा, पंचभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन

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५१- तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार ५२- श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ हस्तिनापुर जाना और वहाँ सबसे मिलकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले सुभद्राके साथ द्वारकाको प्रस्थान करना ५३- मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तंकमुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना ५४- भगवान् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना ५५- श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना ५६- उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, _गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, _गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना ५७- उत्तंकका सौदाससे उनकी रानीके कुण्डल माँगना और सौदासके कहनेसे रानी मदयन्तीके पास जाना ५८- कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना ५९- भगवान् श्रीकृष्णका द्वारकामें जाकर रैवतक पर्वतपर महोत्सवमें सम्मिलित होना और सबसे मिलना ६०- वसुदेवजीके पूछनेपर श्रीकृष्णका उन्हें महाभारत- युद्धका वृत्तान्त संक्षेपसे सुनाना ६१- श्रीकृष्णका सुभद्राके कहनेसे वसुदेवजीको अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनाना ६२- वसुदेव आदि यादवोंका अभिमन्युके निमित्त श्राद्ध करना तथा व्यासजीका उत्तरा और अर्जुनको समझाकर युधिष्ठिरको अश्वमेधयज्ञ करनेकी आज्ञा देना ६३- युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना ६४- पाण्डवोंका हिमालयपर पहुँचकर वहाँ पड़ाव डालना और रातमें उपवासपूर्वक निवास करना ६५- ब्राह्मणोंकी आज्ञासे भगवान् शिव और उनके पार्षद आदिकी पूजा करके युधिष्ठिरका उस धनराशिको खुदवाकर अपने साथ ले जाना ६६- श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें आगमन और उत्तराके मृत बालकको जिलानेके लिये कुन्तीकी उनसे प्रार्थना ६७- परीक्षितको जिलानेके लिये सुभद्राकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना ६८- श्रीकृष्णका प्रसूतिकागृहमें प्रवेश, उत्तराका विलाप और अपने पुत्रको जीवित करनेके लिये प्रार्थना

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महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 17 का मूल पृष्ठ
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६९- उत्तराका विलाप और भगवान् श्रीकृष्णका उसके मृत बालकको जीवन- दान देना ७०- श्रीकृष्णद्वारा राजा परीक्षितका नामकरण तथा पाण्डवोंका हस्तिनापुरके समीप आगमन ७१- भगवान् श्रीकृष्ण और उनके साथियोंद्वारा पाण्डवोंका स्वागत, पाण्डवोंका नगरमें आकर सबसे मिलना और व्यासजी तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको यज्ञके लिये आज्ञा देना ७२- व्यासजीकी आज्ञासे अश्वकी रक्षाके लिये अर्जुनकी, राज्य और नगरकी रक्षाके लिये भीमसेन और नकुलकी तथा कुटुम्ब- पालनके लिये सहदेवकी नियुक्ति ७३- सेनासहित अर्जुनके द्वारा अश्वका अनुसरण ७४- अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय ७५: अर्जुनका प्राग्ज्योतिषपुरके राजा वज्रदत्तके साथ युद्ध ७६- अर्जुनके द्वारा वज्रदत्तकी पराजय ७७- अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध ७८- अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दुःशलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति ७ ९- अर्जुन और बभ्रुवाहनका युद्ध एवं अर्जुनकी मृत्यु ८०- चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोद्गार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुनः जीवित होना ८१- उलूपीका अर्जुनके पूछनेपर अपने आगमनका कारण एवं अर्जुनकी पराजयका रहस्य बताना, पुत्र और पत्नीसे विदा लेकर पार्थका पुनः अश्वके पीछे जाना ८२- मगधराज मेघसन्धिकी पराजय ८३- दक्षिण और पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें होते हुए अश्वका द्वारका, पंचनद एवं गान्धार देशमें प्रवेश ८४- शकुनिपुत्रकी पराजय ८५- यज्ञभूमिकी तैयारी, नाना देशोंसे आये हुए राजाओंका यज्ञकी सजावट और आयोजन देखना ८६- राजा युधिष्ठिरका भीमसेनको राजाओंकी पूजा करनेका आदेश और श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे अर्जुनका संदेश कहना ८७- अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्रांगदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन ८८- उलूपी और चित्रांगदाके सहित बभ्रुवाहनका रत्न आभूषण आदिसे सत्कार तथा अश्वमेधयज्ञका आरम्भ ८९- युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना

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९०- युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छ-5- वृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना ९१- हिंसामिश्रित यज्ञ और धर्मकी निन्दा ९२- म॒हर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा ( वैष्णवधर्मपर्व ) १- युधिष्ठिरका वैष्णवधर्मविषयक प्रश्न और भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा धर्मका तथा अपनी महिमाका वर्णन २- चारों वर्णोंके कर्म और उनके फलोंका वर्णन तथा धर्मकी वृद्धि और पापके क्षय होनेका उपाय ३- व्यर्थ जन्म, दान और जीवनका वर्णन, सात्त्विक दानोंका लक्षण, दानका योग्य पात्र और ब्राह्मणकी महिमा ४- बीज और योनिकी शुद्धि तथा गायत्री -जपकी और ब्राह्मणोंकी महिमाका और उनके तिरस्कारके भयानक फलका वर्णन ५- यमलोकके मार्गका कष्ट और उससे बचनेके उपाय ६- जल-दान, अन्न-दान और अतिथि सत्कारका माहात्म्य ७- भूमिदान, तिलदान और उत्तम ब्राह्मणकी महिमा ८- अनेक प्रकारके दानोंकी महिमा ९- पंचमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान्के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन १०- कपिला गौका तथा उसके दानका माहात्म्य और कपिला गौके दस भेद ११- कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन १२- ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है, उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन १३- धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार, द्वानपात्र ब्राह्मण तथा अन्नदानकी प्रशंसा १४- भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध १५- आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तमकाल और मानव - धर्म- सारका वर्णन १६- अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन

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१७- चान्द्रायणव्रतकी विधि, प्रायश्चित्तरूपमें उसके करनेका विधान तथा महिमाका वर्णन १८- सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, _द्वादशीव्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान्की स्तुति १९- विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त २०- उत्तम और अधम ब्राह्मणोंके लक्षण, भक्त, गौ और पीपलकी महिमा २१- भगवान्के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन card आश्रमवासिकपर्व ( आश्रमवासपर्व). १- भाइयोंसहित युधिष्ठिर तथा कुन्ती आदि देवियोंके द्वारा धृतराष्ट्र और गान्धारीकी सेवा २- पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव ३- राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिरसे और कुन्ती आदिका दुःखी होना ४- व्यासजीके समझानेसे युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेके लिये अनुमति देना ५- धृतराष्ट्रके द्वारा युधिष्ठिरको राजनीतिका उपदेश ६- धृतराष्ट्रद्वारा राजनीतिका उपदेश ७- युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके द्वारा राजनीतिका उपदेश ८- धृतराष्ट्रका कुरुजांगल देशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना ९- प्रजाजनोंसे धृतराष्ट्रकी क्षमा-प्रार्थना १०- प्रजाकी ओरसे साम्बनामक ब्राह्मणका धृतराष्ट्रको सान्त्वनापूर्ण उत्तर देना 33- धृतराष्ट्रका विदुरके द्वारा युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना, अर्जुनकी सहमति और भीमसेनका विरोध १२- अर्जुनका भीमको समझाना और युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको यथेष्ट धन देनेकी स्वीकृति प्रदान करना १३- विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिरका उदारतापूर्ण उत्तर सुनाना १४- राजा धृतराष्ट्रके द्वारा मृत व्यक्तियोंके लिये श्राद्ध एवं विशाल दान - यज्ञका अनुष्ठान १५- गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका वनको प्रस्थान

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१६- धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना और पाण्डवोंके अनुरोध करनेपर भी कुन्तीका वनमें जानेसे न रुकना १७- कुन्तीका पाण्डवोंको उनके अनुरोधका उत्तर १८- पाण्डवोंका स्त्रियोंसहित निराश लौटना, कुन्तीसहित गान्धारी और धृतराष्ट्र आदिका मार्गमें गंगा - तटपर निवास करना १ ९- धृतराष्ट्र आदिका गंगातटपर निवास करके वहाँसे कुरुक्षेत्रमें जाना और शतयूपके आश्रमपर निवास करना २०- नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तपः सिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना २१- धृतराष्ट्र आदिके लिये पाण्डवों तथा पुरवासियोंकी चिन्ता २२- माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठिरका वनको प्रस्थान २३- सेनासहित पाण्डवोंकी यात्रा और उनका कुरुक्षेत्रमें पहुँचना २४- पाण्डवों तथा पुरवासियोंका कुन्ती, गान्धारी और धृतराष्ट्रके दर्शन करना २५- संजयका ऋषियोंसे पाण्डवों, उनकी पत्नियों तथा अन्यान्य स्त्रियोंका परिचय देना २६- धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा विदुरजीका युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश २७- युधिष्ठिर आदिका ऋषियोंके आश्रम देखना, कलश आदि बाँटना और धृतराष्ट्रके पास आकर बैठना, उन सबके पास अन्यान्य ऋषियोंसहित महर्षि व्यासका आगमन २८- महर्षि व्यासका धृतराष्ट्रसे कुशल पूछते हुए विदुर और युधिष्ठिरकी धर्मरूपताका प्रतिपादन करना और उनसे अभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये कहना ( पुत्रदर्शनपर्व) २९- धृतराष्ट्रका मृत बान्धवोंके शोकसे दुःखी होना तथा गान्धारी और कुन्तीका व्यासजीसे अपने मरे हुए पुत्रोंके दर्शन करनेका अनुरोध ३०- कुन्तीका कर्णके जन्मका गुप्त रहस्य बताना और व्यासजीका उन्हें सान्त्वना देना ३१- व्यासजीके द्वारा धृतराष्ट्र आदिके पूर्वजन्मका परिचय तथा उनके कहनेसे सब लोगोंका गंगा- तटपर जाना ३२- व्यासजीके प्रभावसे कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये कौरव- पाण्डववीरोंका गंगाजीके जलसे प्रकट होना