श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 21–30
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30
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३३- परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग- द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना, व्यासजीकी आज्ञासे विधवा क्षत्राणियोंका गंगाजीमें गोता लगाकर अपने - अपने पतिके लोकको प्राप्त करना तथा इस पर्वके श्रवणकी महिमा ३४- मरे हुए_पुरुषोंका अपने पूर्व शरीरसे ही यहाँ पुनः दर्शन देना कैसे सम्भव है, जनमेजयकी इस शंकाका वैशम्पायनद्वारा समाधान ३५- व्यासजीकी कृपासे जनमेजयको अपने पिताका दर्शन प्राप्त होना ३६- व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्र आदिका पाण्डवोंको विदा करना और पाण्डवोंका सदलबल हस्तिनापुरमें आना (नारदागमनपर्व ). ३७- नारदजीसे धृतराष्ट्र आदिके दावानलमें दग्ध हो जानेका हाल जानकर युधिष्ठिर आदिका शोक करना ३८- नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन ३९- राजा युधिष्ठिरद्वारा धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती–इन तीनोंकी हड्डियोंको गंगामें प्रवाहित कराना तथा श्राद्धकर्म करना मौसलपर्व 3- युधिष्ठिरका अपशकुन देखना, यादवोंके विनाशका समाचार सुनना, _द्वारकामें ऋषियोंके शापवश साम्बके पेटसे मूसलकी उत्पत्ति तथा मदिराके निषेधकी कठोर आज्ञा २- द्वारकामें भयंकर उत्पात देखकर भगवान् श्रीकृष्णका यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये आदेश देना ३- कृतवर्मा आदि समस्त यादवोंका परस्पर संहार ४- दारुकका अर्जुनको सूचना देनेके लिये हस्तिनापुर जाना, बभ्रुका देहावसान एवं बलराम और श्रीकृष्णका परमधाम - गमन ५- अर्जुनका द्वारकामें आना और द्वारका तथा श्रीकृष्ण- पत्नियोंकी दशा देखकर दुःखी होना ६. द्वारकामें अर्जुन और वसुदेवजीकी बातचीत
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७- वसुदेवजी तथा मौसलयुद्धमें मरे हुए यादवोंका अन्त्येष्टि- संस्कार करके अर्जुनका द्वारकावासी स्त्री - पुरुषोंको अपने साथ ले जाना, समुद्रका द्वारकाको डूबो देना और मार्गमें अर्जुनपर डाकुओंका आक्रमण, अवशिष्ट यादवोंको अपनी राजधानीमें बसा देना ८- अर्जुन और व्यासजीकी बातचीत महाप्रस्थानिकपर्व 3- वृष्णिवंशियोंका श्राद्ध करके प्रजाजनोंकी अनुमति ले द्रौपदीसहित पाण्डवोंका महाप्रस्थान २- मार्गमें द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन, और भीमसेनका गिरना तथा युधिष्ठिरद्वारा प्रत्येकके गिरनेका कारण बताया जाना ३- युधिष्ठिर इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, युधिष्ठिरका अपने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना स्वर्गारोहणपर्व 3 - स्वर्गमें नारद और युधिष्ठिरकी बातचीत २- देवदूतका युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा भाइयोंका करुणक्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निश्चय करना ३- इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना ४- युधिष्ठिरका दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण, अर्जुन आदिका दर्शन करना ५- भीष्म आदि वीरोंका अपने - अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य 3- महाभारत श्रवणविधि २- महाभारत- माहात्म्य
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चित्र - सूची (सादा) क्रमसंख्या विषय 3 - धर्मात्मा शुक और इन्द्रकी बातचीत २- म॒हर्षि वसिष्ठका ब्रह्माजीके साथ प्रश्नोत्तर ३- भगवान् श्रीकृष्ण एवं विभिन्न महर्षियोंका युधिष्ठिरको उपदेश ४- भयभीत कबूतर महाराज शिबिकी गोदमें ५- पृथ्वी और श्रीकृष्णका संवाद ६- जालके साथ नदीमेंसे निकाले गये महर्षि च्यवन ७- महर्षि च्यवनका मूल्यांकन ८- इन्द्रका ब्रह्माजीके साथ गौओंके सम्बन्धमें प्रश्नोत्तर ९- म॒हर्षि वसिष्ठका राजा सौदाससे गौओंका माहात्म्य- कथन १०- भगवती लक्ष्मीकी गौओंसे आश्रयके लिये प्रार्थना ११- गृहस्थ- धर्मके सम्बन्धमें श्रीकृष्णका पृथ्वीके साथ संवाद १२- बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको उपदेश १३- देवलोकमें पतिव्रता शाण्डिली और सुमनाकी बातचीत १४- सामनीतिकी विजय १५- इन्द्रका भगवान् विष्णुके साथ प्रश्नोतर १६- भगवान् श्रीकृष्णकी तपस्या १७- भगवान् शंकर श्रीकृष्णका माहात्म्य कह रहे हैं १८- भगवान् दत्तात्रेयकी कार्तवीर्यपर कृपा १९- शर- शय्यापर पड़े भीष्मकी युधिष्ठिरसे बातचीत २०- श्रीकृष्ण और व्यासजीके द्वारा पुत्र- शोकाकुला गंगाजीको सान्त्वना २१- महाराज मरुत्तकी देवर्षिसे भेंट २२- महाराज मरुत्तका संवर्त मुनिसे संवाद २३- ब्रह्माजीका ऋषियोंको उपदेश २४- उत्तंक मुनिकी श्रीकृष्णसे विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना २५- महारानी मदयन्तीका उत्तंकको कुण्डल-दान २६- उत्तंकका गुरुपत्नीको कुण्डल अर्पण करना २७- भगवान् श्रीकृष्ण अपने माता- पिता आदिको महाभारतका वृत्तान्त सुना रहे हैं २८- अश्वमेधयज्ञके लिये छोड़े हुए घोड़ेका अर्जुनके द्वारा अनुगमन
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२९- अर्जुन अपने पुत्र बभ्रुवाहनको छातीसे लगा रहे हैं ३०- महाराज युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञमें एक नेवलेका आगमन ३१- म॒हर्षि अगस्त्यकी यज्ञके समय प्रतिज्ञा ३२- विदुरका सूक्ष्मशरीरसे युधिष्ठिरमें प्रवेश ३३- व्यासजीके द्वारा कौरव- पाण्डवपक्षके मरे हुए सम्बन्धियोंका सेनासहित परलोकसे आवाहन ३४- साम्बके पेटसे यदुवंश विनाशके लिये मूसल पैदा होनेका ऋषियोंद्वारा शाप ३५- वसुदेवजी अर्जुनको यादव- विनाशका वृत्तान्त और श्रीकृष्णका संदेश सुना रहे हैं ३६- अग्निकी प्रेरणासे अर्जुन अपने गाण्डीव धनुष और अक्षय तरकसको जलमें डाल रहे हैं ३७- देवदूतका युधिष्ठिरको मायामय नरकका दर्शन कराना
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्रीमहाभारतम् अनुशासनपर्व दानधर्मपर्व प्रथमोऽध्यायः युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, ( उनके नित्य सखा ) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, ( उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और ( उन लीलाओंका संकलन करनेवाले ) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत) का पाठ करना चाहिये ॥ युधिष्ठिर उवाच
शमो बहुविधाकारः सूक्ष्म उक्तः पितामह ।
न च मे हृदये शान्तिरस्ति श्रुत्वेदमीदृशम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा — पितामह! आपने नाना प्रकारसे शान्तिके सूक्ष्म स्वरूपका ( शोकसे मुक्त होनेके विविध उपायोंका ) वर्णन किया; परंतु आपका यह ऐसा उपदेश सुनकर भी मेरे हृदयमें शान्ति नहीं है ॥ १ ॥
अस्मिन्नर्थे बहुविधा शान्तिरुक्ता पितामह ।
स्वकृते का नु शान्तिः स्याच्छमाद् बहुविधादपि ॥ २ ॥
दादाजी! आपने इस विषयमें शान्तिके बहुत से उपाय बताये, परंतु इन नाना प्रकारके शान्तिदायक उपायोंको सुनकर भी स्वयं ही किये गये अपराधसे मनको शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है ॥ २ ॥
शराचितशरीरं हि तीव्रव्रणमुदीक्ष्य च ।
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शर्म नोपलभे वीर दुष्कृतान्येव चिन्तयन् ॥ वीरवर! बाणोंसे भरे हुए आपके शरीर और इसके गहरे घावको देखकर मैं बार - बार अपने पापोंका ही चिन्तन करता हूँ; अतः मुझे तनिक भी चैन नहीं मिलता है ॥ ३ ॥
रुधिरेणावसिक्ताङ्गं प्रस्रवन्तं यथाचलम् ।
त्वां दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्र सीदे वर्षास्विवाम्बुजम् ॥ ४ ॥
पुरुषसिंह! पर्वतसे गिरनेवाले झरनेकी तरह आपके शरीरसे रक्तकी धारा बह रही है— आपके सारे अङ्ग खूनसे लथपथ हो रहे हैं । इस अवस्थामें आपको देखकर मैं वर्षाकालके कमलकी तरह गला ( दुःखित होता ) जाता हूँ ॥ ४ ॥
अतः कष्टतरं किं नु मत्कृते यत् पितामहः ।
इमामवस्थां गमितः प्रत्यमित्रै रणाजिरे ॥ ५ ॥
मेरे ही कारण समराङ्गणमें शत्रुओंने जो पितामहको इस अवस्थामें पहुँचा दिया, इससे बढ़कर कष्टकी बात और क्या हो सकती है? ॥ ५ ॥
तथा चान्ये नृपतयः सहपुत्राः सबान्धवाः ।
मत्कृते निधनं प्राप्ताः किं नु कष्टतरं ततः ॥ ६ ॥
आपके सिवा और भी बहुत- से नरेश मेरे ही कारण अपने पुत्रों और बान्धवोंसहित
युद्धमें मारे गये हैं । इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या होगी? ॥ ६ ॥
वयं हि धार्तराष्ट्राश्च कालमन्युवशंगताः ।
कृत्वेदं निन्दितं कर्म प्राप्स्यामः कां गतिं नृप ॥ ७ ॥
नरेश्वर! हम पाण्डव और धृतराष्ट्रके सभी पुत्र काल और क्रोधके वशीभूत हो यह निन्दित कर्म करके न जाने किस दुर्गतिको प्राप्त होंगे! ॥ ७ ॥
इदं तु धार्तराष्ट्रस्य श्रेयो मन्ये जनाधिप ।
इमामवस्थां सम्प्राप्तं यदसौ त्वां न पश्यति ॥ ८ ॥
नरेश्वर! मैं राजा दुर्योधनके लिये उसकी मृत्युको श्रेष्ठ समझता हूँ, जिससे कि वह आपको इस अवस्थामें पड़ा हुआ नहीं देखता है ॥ ८ ॥
सोऽहं तव ह्यन्तकरः सुहृद्वधकरस्तथा ।
न शान्तिमधिगच्छामि पश्यंस्त्वां दुःखितं क्षितौ ॥ ९ ॥
मैं ही आपके जीवनका अन्त करनेवाला हूँ और मैं ही दूसरे दूसरे सुहृदोंका भी वध करनेवाला हूँ । आपको इस दुःखमयी दुरवस्थामें भूमिपर पड़ा देख मुझे शान्ति नहीं मिलती है ॥ ९ ॥
दुर्योधनो हि समरे सहसैन्यः सहानुजः ।
निहतः क्षत्रधर्मेऽस्मिन् दुरात्मा कुलपांसनः ॥ १० ॥
दुरात्मा एवं कुलाङ्गार दुर्योधन सेना और बन्धुओं सहित क्षत्रियधर्मके अनुसार होनेवाले इस युद्धमें मारा गया ॥ १० ॥
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न स पश्यति दुष्टात्मा त्वामद्य पतितं क्षितौ ।
अतः श्रेयो मृतं मन्ये नेह जीवितमात्मनः ॥ ११ ॥
वह दुष्टात्मा आज आपको इस तरह भूमिपर पड़ा हुआ नहीं देख रहा है, अतः उसकी मृत्युको ही मैं यहाँ श्रेष्ठ मानता हूँ; किन्तु अपने इस जीवनको नहीं ॥ ११ ॥
अहं हि समरे वीर गमितः शत्रुभिः क्षयम् ।
अभविष्यं यदि पुरा सह भ्रातृभिरच्युत ॥ १२ ॥
न त्वामेवं सुदुःखार्तमद्राक्षं सायकार्दितम् । अपनी मर्यादासे कभी नीचे न गिरनेवाले वीरवर! यदि भाइयोंसहित मैं शत्रुओंद्वारा पहले ही युद्धमें मार डाला गया होता तो आपको इस प्रकार सायकोंसे पीड़ित और अत्यन्त दुःखसे आतुर अवस्थामें नहीं देखता ॥ १२३ ॥
नूनं हि पापकर्माणो धात्रा सृष्टाः स्म हे नृप ॥ १३ ॥
अन्यस्मिन्नपि लोके वै यथा मुच्येम किल्बिषात् ।
तथा प्रशाधि मां राजन् मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ १४ ॥
नरेश्वर! निश्चय ही विधाताने हमें पापी ही रचा है । राजन्! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे परलोकमें भी मुझे इस पापसे छुटकारा मिल सके ॥ १३-१४ ॥ भीष्म उवाच
परतन्त्रं कथं हेतुमात्मानमनुपश्यसि ।
कर्मणां हि महाभाग सूक्ष्मं ह्येतदतीन्द्रियम् ॥ १५ ॥
भीष्मजी कहते हैं - महाभाग! तुम तो सदा परतन्त्र हो ( काल, अदृष्ट और ईश्वरके अधीन हो ), फिर अपनेको शुभाशुभ कर्मोंका कारण क्यों समझते हो? वास्तवमें कर्मोंका कारण क्या है, यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म तथा इन्द्रियोंकी पहुँचसे बाहर है ॥ १५ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
संवादं मृत्युगौतम्योः काललुब्धकपन्नगैः ॥ १६ ॥
इस विषयमें विद्वान् पुरुष गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १६ ॥
गौतमी नाम कौन्तेय स्थविरा शमसंयुता ।
सर्पेण दष्टं स्वं पुत्रमपश्यद्गतचेतनम् ॥ १७ ॥
कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें गौतमी नामवाली एक बूढ़ी ब्राह्मणी थी, जो शान्तिके साधनमें संलग्न रहती थी । एक दिन उसने देखा, उसके इकलौते बेटेको साँपने डँस लिया और उसकी चेतनाशक्ति लुप्त हो गयी ॥ अथ तं स्नायुपाशेन बद्ध्वा सर्पममर्षितः ।
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लुब्धकोऽर्जुनको नाम गौतम्याः समुपानयत् ॥ १८ ॥
इतनेहीमें अर्जुनक नामवाले एक व्याधने उस साँपको ताँतके फाँसमें बाँध लिया और अमर्षवश वह उसे गौतमीके पास ले आया ॥ १८ ॥
स चाब्रवीदयं ते स पुत्रहा पन्नगाधमः ।
ब्रूहि क्षिप्रं महाभागे वध्यतां केन हेतुना ॥ १ ९ ॥
लाकर उसने कहा — ‘ महाभागे! यही वह नीच सर्प है, जिसने तुम्हारे पुत्रको मार डाला है । जल्दी बताओ, मैं किस तरह इसका वध करूँ? ॥ १ ९ ॥
अग्नौ प्रक्षिप्यतामेष च्छिद्यतां खण्डशोऽपि वा ।
न ह्ययं बालहा पापश्चिरं जीवितुमर्हति ॥ २० ॥
' मैं इसे आगमें झोंक दूँ या इसके टुकड़े -टुकड़े कर डालूँ? बालककी हत्या करनेवाला यह पापी सर्प अब अधिक समयतक जीवित रहने योग्य नहीं है ' ॥ गौतम्युवाच
विसृजैनमबुद्धिस्त्वमवध्योऽर्जुनक त्वया ।
को ह्यात्मानं गुरुं कुर्यात् प्राप्तव्यमविचिन्तयन् ॥ २१ ॥
गौतमी बोली — अर्जुनक! छोड़ दे इस सर्पको । तू अभी नादान है । तुझे इस सर्पको -नहीं मारना चाहिये । होनहारको कोई टाल नहीं सकता— इस बातको जानते हुए भी इसकी उपेक्षा करके कौन अपने ऊपर पापका भारी बोझ लादेगा? ॥ २१ ॥
प्लवन्ते धर्मलघवो लोकेऽम्भसि यथा प्लवाः ।
मज्जन्ति पापगुरवः शस्त्रं स्कन्नमिवोदके ॥ २२ ॥
संसारमें धर्माचरण करके जो अपनेको हलके रखते हैं ( अपने ऊपर पापका भारी बोझ नहीं लादते हैं ), वे पानीके ऊपर चलनेवाली नौकाके समान भवसागरसे पार हो जाते हैं; परंतु जो पापके बोझसे अपनेको बोझिल बना लेते हैं, वे जलमें फेंके हुए हथियारकी भाँति नरक- समुद्रमें डूब जाते हैं ॥ २२ ॥
हत्वा चैनं नामृतः स्यादयं मे
जीवत्यस्मिन् कोऽत्ययःस्यादयं ते ।
अस्योत्सर्गे प्राणयुक्तस्य जन्तो- र्मृत्योर्लोकं को नु गच्छेदनन्तम् ॥ २३ ॥
इसको मार डालनेसे मेरा यह पुत्र जीवित नहीं हो सकता और इस सर्पके जीवित रहनेपर भी तुम्हारी क्या हानि हो सकती है? ऐसी दशामें इस जीवित प्राणीके प्राणोंका नाश करके कौन यमराजके अनन्त लोकमें जाय? ॥ २३ ॥
लुब्धक उवाच नाम्यहं देवि गुणागुणज्ञे
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सर्वार्तियुक्ता गुरवो भवन्ति । स्वस्थस्यैते तूपदेशा भवन्ति तस्मात् क्षुद्रं सर्पमेनं हनिष्ये ॥ २४ ॥
व्याधने कहा — गुण और अवगुणको जाननेवाली देवि! मैं जानता हूँ कि बड़े - बूढ़े लोग किसी भी प्राणीको कष्टमें पड़ा देख इसी तरह दुःखी हो जाते हैं । परंतु ये उपदेश तो स्वस्थ पुरुषके लिये हैं ( दुःखी मनुष्यके मनपर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता ) । अतः मैं इस नीच सर्पको अवश्य मार डालूँगा ॥ २४ ॥
शमार्थिनः कालगतिं वदन्ति सद्यः शुचं त्वर्थविदस्त्यजन्ति । श्रेयः क्षयं शोचति नित्यमोहात् तस्माच्छुचं मुञ्च हते भुजङ्गे ॥ २५ ॥
शान्ति चाहनेवाले पुरुष कालकी गति बताते हैं ( अर्थात् कालने ही इसका नाश कर दिया है, ऐसा कहते हुए शोकका त्याग करके संतोष धारण करते हैं ) । परंतु जो अर्थवेत्ता हैं -बदला लेना जानते हैं, वे शत्रुका नाश करके तुरंत ही शोक छोड़ देते हैं । दूसरे लोग श्रेयका नाश होनेपर मोहवश सदा उसके लिये शोक करते रहते हैं; अतः इस शत्रुभूत सर्पके मारे जानेपर तुम भी तत्काल ही अपने पुत्र- शोकको त्याग देना ॥ २५ ॥
गौतम्युवाच आर्तिर्नैवं विद्यतेऽस्मद्विधानां धर्मात्मानः सर्वदा सज्जना हि । नित्यायस्तो बालकोऽप्यस्य तस्मा- दीशे नाहं पन्नगस्य प्रमाथे ॥ २६ ॥
गौतमी बोली- अर्जुनक! हम जैसे लोगोंको कभी किसी तरहकी हानिसे भी पीड़ा नहीं होती । धर्मात्मा सज्जन पुरुष सदा धर्ममें ही लगे रहते हैं । मेरा यह बालक सर्वथा मरनेहीवाला था; इसलिये मैं इस सर्पको मारनेमें असमर्थ हूँ ॥ २६ ॥
न ब्राह्मणानां कोपोऽस्ति कुतः कोपाच्च यातनाम् ।
मार्दवात् क्षम्यतां साधो मुच्यतामेष पन्नगः ॥ २७ ॥
ब्राह्मणोंको क्रोध नहीं होता; फिर वे क्रोधवश दूसरोंको पीड़ा कैसे दे सकते हैं; अतः साधो! तू भी कोमलताका आश्रय लेकर इस सर्पके अपराधको क्षमा कर और इसे छोड़ दे ॥ २७ ॥
लुब्धक उवाच हत्वा लाभः श्रेय एवाव्ययः स्या- ल्लभ्यो लाभ्यः स्याद् बलिभ्यः प्रशस्तः ।
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कालाल्लाभो यस्तु सत्यो भवेत श्रेयोलाभः कुत्सितेऽस्मिन्न ते स्यात् ॥ २८ ॥
व्याधने कहा — देवि! इस सर्पको मार डालनेसे जो बहुतोंका भला होगा, यही अक्षय लाभ है । बलवानोंसे बलपूर्वक लाभ उठाना ही उत्तम लाभ है । कालसे जो लाभ होता है वही सच्चा लाभ है । इस नीच सर्पके जीवित रहनेसे तुम्हें कोई श्रेय नहीं मिल सकता ॥ २८ ॥
गौतम्युवाच का नु प्राप्तिर्गृह्य शत्रुं निहत्य का कामाप्तिः प्राप्य शत्रुं न मुक्त्वा । कस्मात् सौम्याहं न क्षमे नो भुजङ्गे मोक्षार्थं वा कस्य हेतोर्न कुर्याम् ॥ २ ९ ॥ गौतमी बोली- अर्जुनक! शत्रुको कैद करके उसे मार डालनेसे क्या लाभ होता है; तथा शत्रुको अपने हाथमें पाकर उसे न छोड़नेसे किस अभीष्ट मनोरथकी प्राप्ति हो जाती है? सौम्य! क्या कारण है कि मैं इस सर्पके अपराधको क्षमा न करूँ? तथा किसलिये इसको छुटकारा दिलानेका प्रयत्न न करूँ? ॥ २ ९ ॥ लुब्धक उवाच अस्मादेकाद् बहवो रक्षितव्या को बहुभ्यो गौतम रक्षितव्यः । कृतागसं धर्मविदस्त्यजन्ति सरीसृपं पापमिमं जहि त्वम् ॥ ३० ॥
व्याधने कहा — गौतमी! इस एक सर्पसे बहुतेरे मनुष्योंके जीवनकी रक्षा करनी चाहिये । ( क्योंकि यदि यह जीवित रहा तो बहुतोंको काटेगा । ) अनेकोंकी जान लेकर एककी रक्षा करना कदापि उचित नहीं है । धर्मज्ञ पुरुष अपराधीको त्याग देते हैं; इसलिये तुम भी इस पापी सर्पको मार डालो ॥ ३० ॥
गौतम्युवाच नास्मिन् हते पन्नगे पुत्रको मे सम्प्राप्स्यते लुब्धक जीवितं वै । गुणं चान्यं नास्य वधे प्रपश्ये तस्मात् सर्पं लुब्धक मुञ्च जीवम् ॥ ३१ ॥
गौतमी बोली - व्याध! इस सर्पके मारे जानेपर मेरा पुत्र पुनः जीवन प्राप्त कर लेगा, ऐसी बात नहीं है । इसका वध करनेसे दूसरा कोई लाभ भी मुझे नहीं दिखायी देता है ।